Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पिता बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था।

संजय गुप्ता

बेटा इतना मेधावी नहीं था कि NEET क्लियर कर लेता।

इसलिए दलालों से MBBS की सीट खरीदने का जुगाड़ किया ।

ज़मीन, जायदाद, ज़ेवर सब गिरवी रख के 35 लाख रूपये दलालों को दिए, लेकिन अफसोस वहाँ धोखा हो गया।

अब क्या करें…?

लड़के को तो डॉक्टर बनाना है कैसे भी…!!

फिर किसी तरह विदेश में लड़के का एडमीशन कराया गया, वहाँ लड़का चल नहीं पाया।

फेल होने लगा..
डिप्रेशन में रहने लगा।

रक्षाबंधन पर घर आया और घर में ही फांसी लगा ली।
सारे अरमान धराशायी…. रेत के महल की तरह ढह गए….

20 दिन बाद माँ-बाप और बहन ने भी कीटनाशक खा कर आत्म-हत्या कर ली।

अपने बेटे को डॉक्टर बनाने की झूठी महत्वाकांक्षा ने पूरा परिवार लील लिया।
माँ बाप अपने सपने, अपनी महत्वाकांक्षा अपने बच्चों से पूरी करना चाहते हैं …

मैंने देखा कि कुछ माँ बाप अपने बच्चों को Topper बनाने के लिए इतना ज़्यादा अनर्गल दबाव डालते हैं
कि बच्चे का स्वाभाविक विकास ही रुक जाता है।

आधुनिक स्कूली शिक्षा बच्चे की Evaluation और Grading ऐसे करती है, जैसे सेब के बाग़ में सेब की खेती की जाती है।
पूरे देश के करोड़ों बच्चों को एक ही Syllabus पढ़ाया जा रहा है ..

For Example –

जंगल में सभी पशुओं को एकत्र कर सबका इम्तिहान लिया जा रहा है और पेड़ पर चढ़ने की क्षमता देख कर Rank निकाली जा रही है।

यह शिक्षा व्यवस्था, ये भूल जाती है कि इस प्रश्नपत्र में तो बेचारा हाथी का बच्चा फेल हो जाएगा और बन्दर First आ जाएगा।

अब पूरे जंगल में ये बात फैल गयी कि कामयाब वो है जो झट से पेड़ पर चढ़ जाए।

बाकी सबका जीवन व्यर्थ है।

इसलिए उन सब जानवरों के, जिनके बच्चे कूद के झटपट पेड़ पर न चढ़ पाए, उनके लिए कोचिंग Institute खुल गए, वहां पर बच्चों को पेड़ पर चढ़ना सिखाया जाता है।

चल पड़े हाथी, जिराफ, शेर और सांड़, भैंसे और समंदर की सब मछलियाँ चल पड़ीं अपने बच्चों के साथ, Coaching institute की ओर ……..

हमारा बिटवा भी पेड़ पर चढ़ेगा और हमारा नाम रोशन करेगा।

हाथी के घर लड़का हुआ …….
तो उसने उसे गोद में ले के कहा- “हमरी जिन्दगी का एक ही मक़सद है कि हमार बिटवा पेड़ पर चढ़ेगा।”

और जब बिटवा पेड़ पर नहीं चढ़ पाया, तो हाथी ने सपरिवार ख़ुदकुशी कर ली।

अपने बच्चे को पहचानिए।
वो क्या है, ये जानिये।

हाथी है या शेर ,चीता, लकडबग्घा , जिराफ ऊँट है
या मछली , या फिर हंस , मोर या कोयल ?
क्या पता वो चींटी ही हो ?

और यदि चींटी है आपका बच्चा, तो हताश निराश न हों।
चींटी धरती का सबसे परिश्रमी जीव है और अपने खुद के वज़न की तुलना में एक हज़ार गुना ज्यादा वजन उठा सकती है।

इसलिए अपने बच्चों की क्षमता को परखें और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें…. ना कि भेड़ चाल चलाते हुए उसे हतोत्साहित करें ……

SAVE HUMAN BEHAVIOR FIRST…

Parents love your kids as they are🙏🏻

“क्योंकि किसी को शहनाई बजाने पर भी भारत रत्न से नवाज़ा गया है”

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प्राचीन भारत के इन छह युद्धों ने बदल दिया था विश्व का इतिहास!!!!!!

संजय गुप्ता

प्राचीन भारत में यूं तो कई युद्ध हुए लेकिन छह युद्ध ऐसे थे जिन्होंने संपूर्ण धरती को चपेट में ले लिया था। देखा जाए तो यह युद्ध विश्व की अन्य संस्कृति और धर्मों के इतिहास में किसी न किसी रूप में आज भी दर्ज है। तो आओ जानते हैं प्राचीन भारत के वे छह प्रमुख युद्ध।

1.इंद्र और वृत्तासुर युद्ध : जम्बूद्वीप के इलावर्त क्षे‍त्र में 12 बार देवासुर संग्राम हुआ। अंतिम बार हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद के पुत्र राजा बलि के साथ इंद्र का युद्ध हुआ और देवता हार गए तब संपूर्ण जम्बूद्वीप पर असुरों का राज हो गया। इस जम्बूद्वीप के बीच के स्थान में था इलावर्त राज्य।

देवासुर संग्रामों का परिणाम यह रहा कि असुरों और सुरों ने धरती पर भिन्न-भिन्न संस्कृतियों और धर्मों को जन्म दिया और धरती को आपस में बांट लिया। इन संघर्षों में देवता हमेशा कमजोर ही सिद्ध हुए और असुर ताकतवर।

यह सतयुग की बात है जब कालकेय नाम के एक राक्षस का संपूर्ण धरती पर आतंक था। वह वत्रासुर के अधीन रहता था। दोनों से त्रस्त होकर सभी देवताओं ने मिलकर सोचा वृत्रासुर का वध करना अब जरूरी हो गया। इस वृत्तासुर के वध के लिए ही दधीचि ऋषि की हड्डियों से एक हथियार बनाया जिसका नाम वज्र था।

वृत्रासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने आर्यों के नगरों पर कई बार आक्रमण करके उनकी नाक में दम कर रखा था। अंत में इन्द्र ने मोर्चा संभाला और उससे उनका घोर युद्ध हुआ जिसमें वृत्रासुर का वध हुआ। इन्द्र के इस वीरतापूर्ण कार्य के कारण चारों ओर उनकी जय-जयकार और प्रशंसा होने लगी थी।

शोधकर्ता मानते हैं कि वृत्रासुर का मूल नाम वृत्र ही था, जो संभवतः असीरिया का अधिपति था। पारसियों की अवेस्ता में भी उसका उल्लेख मिलता है।

वृत्र ने आर्यों पर आक्रमण किया था तथा उन्हें पराजित करने के लिए उसने अद्विशूर नामक देवी की उपासना की थी। इन्द्र और वृत्रासुर के इस युद्ध का सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं पर गहरा असर पड़ा था। तभी तो होमर के इलियड के ट्राय-युद्ध और यूनान के जियॅस और अपोलो नामक देवताओं की कथाएं इससे मिलती-जुलती हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन विश्व पर इन्द्र-वृत्र युद्ध का कितना व्यापक प्रभाव पड़ा था।

2.हैहय-परशुराम युद्ध : – भगवान राम के जन्म से सैकड़ों वर्ष पूर्व हैहय वंश के लोगों का परशुराम से युद्ध हुआ था। यह भारत के ज्ञात इतिहास का तीसरा सबसे बड़ा युद्ध था। जमदग्नि परशुराम का जन्म हरिशचन्द्रकालीन विश्वामित्र से एक-दो पीढ़ी बाद का माना जाता है। यह समय प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ‘अष्टादश परिवर्तन युग’ के नाम से जाना गया है।

इस युग में एक और जहां उत्तर में वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच संघर्ष चल रहा था तो पश्चिम में हैहयों और भार्गवों के बीच युद्ध की स्थिति बनी हुई थी। अयोध्या में सत्यव्रत नामक राजा त्रिशुंक सबसे शक्तिशाली राजा था तो दूसरी ओर आनर्त (गुजरात) में कार्तवीर्य की दुदुंभि बज रही थी।

माना जाता है कि परशुराम के नेतृत्व में आनर्त (गुजरात) के हैहय राजवंश के विरुद्ध यह युद्ध सत्ययुग अर्थात कृतयुग के अंत में लड़ा गया। हैहयों से हुए इस महासंग्राम में परशुराम ने हैहयों को एक के बाद एक 21 बार पराजित किया। परशुराम भृगुवंश से थे और परंपरागत रूप से नर्मदा (नैमिषारण्य) के किनारे रहा करते थे। आपको यह बताना जरूरी है कि राम के काल में जो परशुराम थे वे दूसरे थे और महाभारत काल में जो परशुराम थे वे तीसरे थे।

3.राम-रावण युद्ध : – राम अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र थे तो रावण लंका का राजा था। राम के जन्म को हुए 7,128 वर्ष हो चुके हैं। राम एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। राम का जन्म 5,114 ईस्वी पूर्व हुआ था। राम और रावण का युद्ध 5076 ईसा पूर्व हुआ था यानी आज से 7090 वर्ष पूर्व। तब भगवान राम 38 वर्ष के थे।

यह युद्ध 72 दिन चला था। राम और रावण युद्ध की छाप संपूर्ण दक्षिण एशिया के देश और शहरों में देखी जा सकती है। मलेशिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम और लागोस में तो इससे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

4.दशराज युद्ध : – दाशराज्ञ का युद्ध भारत के आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच हुआ था। दसराज्य युद्ध त्रेतायुग के अंत में लड़ा गया। माना जाता है कि राम-रावण युद्ध के 150 वर्ष बाद यह युद्ध हुआ था। हलांकि इसके समय को लेकर मतभेद है। इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान हैं।

इसे बैटल ऑफ टेन किंग कहा जाता है। ऋग्वेद के सातवें मंडल में इस युद्ध का वर्णन है। इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तान के पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास लगभग 5200 ईसा पूर्व हुआ था। अर्थात राम और रावण युद्ध के पूर्व यह युद्ध लड़ा गया था।

इस युद्ध में जहां एक ओर पुरु नामक आर्य समुदाय के योद्धा थे, तो दूसरी ओर ‘तृत्सु’ नामक समुदाय के योद्धा युद्ध लड़ रहे थे। दोनों ही हिन्द-आर्यों के ‘भरत’ नामक समुदाय से संबंध रखते थे। हालांकि पुरुओं के नेतृत्व में से कुछ को अनार्य माना जाता था। तुत्सु समुदाय का नेतृत्व राजा सुदास ने किया। सुदास दिवोदास के पुत्र थे, जो स्वयं सृंजय के पुत्र थे। सृंजय के पिता का नाम देवव्रत था। सुदास के युद्ध में सलाहकार ऋषि वशिष्ठ थे। सुदास के विरुद्ध दस राजा युद्ध लड़ रहे थे जिनका नेतृत्व पुरु कबीले के राजा संवरण कर रहे थे। जिनके सैन्य सलाहकार ऋषि विश्वामित्र थे। यह लड़ाई भी सत्ता और विचारधारा की लड़ाई थी।

ऋग्वेद का सुविख्यात नायक सुदास भारतों का नेता था और पुरोहित वसिष्ठ उसके सहायक थे। इनके शत्रु थे, पांच प्रमुख जनजातियां-, अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वशस् और पुरु तथा पांच गौण जनजातियां- अलिन, पक्थ, भलानस्, शिव और विषाणिन के दस राजा। विरोधी गुट के सूत्रधार ऋषि विश्वामित्र थे और उसका नेतृत्व पुरुओं ने किया था। ऋग्वेद में दासराज युद्ध को एक दुर्भाग्यशाली घटना कहा गया है। इस युद्ध में इंद्र और वशिष्ट की संयुक्त सेना के हाथों विश्‍वामित्र की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा।

5.महाभारत युद्ध : – कुरुक्षेत्र में पांडवों और कौरवों के बीच आज से 5000 वर्ष पूर्व महाभारत युद्ध हुआ था। 18 दिन तक चले इस युद्ध में भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश अर्जुन को दिया था। कृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व (अर्थात आज से 5121 वर्ष पूर्व) हुआ। महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। उस वक्त भगवान कृष्ण 55-56 वर्ष के थे। इस युद्ध का सबसे भयानक परिणाम हुआ। धर्म और संस्कृति का लगभग नाश हो गया। लाखों लोग मारे गए, उसी तरह लाखों महिलाएं विधवाएं हो गईं और उतने ही अनाथ।

6.सिकंदर और पोरस युद्ध : – पोरस के राज्य के आसपास दो छोटे राज्य थे तक्षशिला और अम्भिसार। तक्षशिला, जहां का राजा अम्भी था और अम्भिसार का राज्य कश्मीर के चारों ओर फैला हुआ था। अम्भी का पुरु से पुराना बैर था इसलिए उसने सिकंदर से हाथ मिला लिया। अम्भिसार ने तटस्थ रहकर सिकंदर की राह आसान कर दी। दूसरी ओर धनानंद का राज्य था वह भी तटस्थ था।

पोरस से पहले युद्ध में सिकंदर को हार का मुंह देखना पड़ा। पोरस से दूसरे युद्ध में पोरस का पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ। फिर पोरस से तीसरा युद्ध हुआ जिसमें भी सिकंदर को हार का सामना करने पड़ा। अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की।

इसके पश्चात संधि पर हस्ताक्षर हुए। अंतत: इतिहास में दर्ज सिर्फ उस युद्ध की ही चर्चा होती है जिसमें पुरुवास (पोरस) हार गए थे। स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सिकंदर भारत के एक भी राज्य को नहीं जीत पाया। फिर भी उसे महान माना जाता है जबकि चंद्रगुप्त मौर्य ने उसके सेनापति सेल्युकस को हराकर बंधक बना लिया था।

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स्वार्थ –

संजय गुप्ता

एक गांव पहाड़ों के बीच में बसा हुआ था। वहा के ठाकुर बहुत ही नेक दिल इंसान था। उस के पूर्वजों की सजा उस को मिली थी उस की पत्नी इस दुनिया में नहीं रही !

उसका एक बेटा था जो इस जगत को देख नहीं सकता था पर ठाकुर को उस परमात्मा पर विश्वास था कि प्रभु की कृपा से एक दिन उस का बेटा सही हो जायेगा। वह इस सोच मै पुण्य दान करता था की कभी ना कभी प्रभु की कृपा रहेगी !

ऐसे ही करते कुछ साल बीत गये अब ठाकुर को चिंता होने लगी कि मेरे मारने के बाद मेरे बेटे का क्या होगा उस की चिंता दिन पर दिन खाई जा रही थी !

तभी स्वर्ग लोक मै नारद जी नारायण नारायण बोलते हुए ब्रह्मा जी के पास जाते है और बोलते है – प्रभु ये क्या ? आप कितने निर्दय है आप उस मानव की सहायता क्यू नहीं करते वो रोज पुण्य दान करता है !

फिर भी आप उस कष्ट दे रहे हो आप बड़े स्वार्थी हो आप को उस का दुख नहीं दिखता क्या ?

तब ब्रह्मा मुस्कराए और बोले – इस मै मेरा क्या स्वार्थ है नारद मुनि?

तब नारद मुनि गुस्सा हो कर शिव जी पास जाते है और वही बात शिव जी से भी करते है तब उन की बात सुनकर शिव जी हसने लगते है और बोलते है – इंसान स्वार्थी है !

ये बात सुनकर उन्हें और गुस्सा आ गया और वो वहा से विष्णु जी पास आए और अपनी बात बताई तब
विष्णु जी बोल – जिस दिन ठाकुर निस्वार्थ पुण्य करेगा मै उस दिन उस की परेशानी को खत्म कर दुगा !

नारद जी बोले – प्रभु ! वो रोज पूजा पाठ करता है दान करता है फिर भी आप कहते हो ये स्वार्थ है तो इस प्रकार जगत मै सभी स्वार्थी है !

तब विष्णु जी बोले – हां !
नारद जी बोलते है – तब तो ठाकुर की परेशानी का कोई हल नहीं उस का दान पुण्य सब बेकार है !

विष्णु जी कहते है – जब ठाकुर निस्वार्थ काम करेगा तब सब अपने आप सही हो जायेगा !

प्रभु नारद से बोल – तुम धरती लोक पर जाओ और खुद ठाकुर की परीक्षा लो !

नारद जी धरती पर जाते है वह एक बच्चे का रूप ले लेते है भूखा नंगा सा रूप ले के ठाकुर के गांव में पहुंच जाते है !

एक दिन ठाकुर मन्दिर जा रहे थे तभी रास्ते मै उन की नजर उस बच्चे पर पड़ी उन्होंने उस बच्चे को
पूछा – बेटा कहा से आए हो और तुम्हारे मां बाप कहा है !

तब बच्चा बोलता है – बाबू जी ! भूख लगी है कुछ दो खाने को !

ठाकुर को उस बच्चे की हालत पर तरस आता है और वो उसे पूजा के लिए जो प्रसाद बनाया था उस दे देते है बिना पूजा करे घर लौट जाते है उस बालक को भी घर ले जाते है और उसे अपने साथ हवेली मै रहने देते है !

अब ठाकुर उस बालक को अपने बेटा जैसे पालने लगा इस तरह कहीं वर्ष बीत गए । एक दिन रात मै नारद जी ठाकुर के सामने प्रकट हुए !

बोले – ठाकुर ! मै तुम्हारी सेवा से खुश हुआ कोई एक वरदान मागो !

ठाकुर के आंखो मै आंसू आ जाते है और बोलता है – मै कितना स्वार्थी था । प्रभु आप नहीं जानते जिस दिन आप मुझे भूखे मिले थे सिर्फ उस दिन मेरे मन मै कोई स्वार्थ नहीं था उसी रात को मेरे बेटे की आंखो मै रोशनी आ गई थी मैंने ये बात किसी को नहीं बताई आज भी मेरा बेटा उसी हालत मै अपने कमरे में है !
बस मै तो बिना स्वार्थ के आप की सेवा कर रहा था !

यह जान कर नारद बड़े हैरत मै पड गए की आखिर ये चमत्कार किस ने किया फिर भी नारद बोले – आप मुझसे कोई वरदान मागों !

तब ठाकुर बोलता है – प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए बस आप ने मेरे घर को रोशन कर दिया है !

नारद जी वहा से विदा ले के स्वर्ग लोक मै आते है। विष्णु शिव और ब्रह्मा जी को एक साथ देख कर हैरत मै पड जाते है !

और बोलते है – प्रभु ! आप ने मुझे जिस दिन धरती पर जाने को बोला उसी दिन आप ने ठाकुर को इच्छा पूरी कर दी क्या उस दिन वह स्वार्थी नहीं था !

तब विष्णु जी बोले – उस दिन जब तुम भूखे गए थे ठाकुर के पास तब ठाकुर ने बिना स्वार्थ तुम को भोजन करवाया ये पुण्य से कम नहीं था । मै यही चाहता हूं कि बिना स्वार्थ कोई किसी की मदद करे।।

तब शिव जी बोलते है – हे मुनि ! आप ने तो उसी दिन उस वरदान दे देना चाहिए था जब उस ने आप को भोजन करवाया आप ने तो वर्षों लग दिए क्या आप स्वार्थ से परिचित नहीं थे !

नारद मुनि बोलते है – प्रभु ! आप की माया से मै अपरिचित हूं आप ने मुझे बोला ठाकुर की परीक्षा लो पर आप तो मेरी भी परीक्षा ले रहे थे !

तब ब्रह्मा जी बोलते है – स्वार्थ का मतलब होता है केवल अपने लाभ की बात सोचना, दूसरों के लाभ और भले की बात नहीं सोचना। सही मायने में स्वार्थी वो है !

अतएव जो ज्ञानी है, जिसने भगवान से अपना लक्ष्य सिद्ध करने का लक्ष्य बनाया, वो भगवान सम्बन्धी स्वार्थी है !

और जिसने माया जगत से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का सिद्धांत बनाया, वो अज्ञानी स्वार्थी है !

इसलिए दोनों स्वार्थी प्रत्येक छण (हर पल) है। दोनों अपने स्वार्थ के लिए निरंतर प्रयत्न कर रहे है

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बालि वध की कथा!!!!

संजय गुप्ता
राम और हनुमान का मिलन हुआ है और हनुमान अब राम जी कन्धों पर बिठाकर सुग्रीव जी के पास लेकर गए हैं।

  • सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भेंटेउ अनुज सहित रघुनाथा॥
    कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती॥

सुग्रीव चरणों में मस्तक नवाकर आदर सहित मिले। श्री रघुनाथजी भी छोटे भाई सहित उनसे गले लगकर मिले। सुग्रीव मन में इस प्रकार सोच रहे हैं कि हे विधाता! क्या ये मुझसे प्रीति करेंगे?॥ लेकिन तभी हनुमान जी ने अग्नि को साक्षी मानकर प्रतिज्ञापूर्वक उनकी मित्रता करवा दी। फिर लक्ष्मण ने सुग्रीव को सारी बात बताई है।

सुग्रीव ने नेत्रों में जल भरकर विश्वास दिलाया है की हे नाथ! मिथिलेशकुमारी जानकीजी मिल जाएँगी॥ सुग्रीव जी बताते हैं की मैं एक बार यहाँ मंत्रियों के साथ बैठा हुआ कुछ विचार कर रहा था। तब मैंने शत्रु के वश में पड़ी बहुत विलाप करती हुई सीताजी को आकाश मार्ग से जाते देखा था॥ हमें देखकर उन्होंने ‘राम! राम! हा राम!’ पुकारकर वस्त्र गिरा दिया था।

श्री रामजी ने उसे माँगा, तब सुग्रीव ने तुरंत ही दे दिया। वस्त्र को हृदय से लगाकर रामचंद्रजी ने बहुत ही सोच किया॥

सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर! सुनिए। सोच छोड़ दीजिए और मन में धीरज लाइए। मैं सब प्रकार से आपकी सेवा करूँगा, जिस उपाय से जानकीजी आकर आपको मिलें॥

फिर भगवान ने सुग्रीव से पूछा की तुम वन में किस कारण से रहते हो?

सुग्रीव ने कहा- हे नाथ! बालि और मैं दो भाई हैं, हम दोनों में ऐसी प्रीति थी कि वर्णन नहीं की जा सकती। मय दानव का एक पुत्र था, उसका नाम मायावी था। एक बार वह हमारे गाँव में आया॥ उसने आधी रात को नगर के फाटक पर आकर ललकारा। बालि शत्रु की ललकार को सह नहीं सका। वह दौड़ा, उसे देखकर मायावी भागा। मैं भी भाई के संग लगा चला गया॥

वह मायावी एक पर्वत की गुफा में जा घुसा। तब बालि ने मुझे समझाकर कहा- तुम एक पखवाड़े (पंद्रह दिन) तक मेरी बाट देखना। यदि मैं उतने दिनों में न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया॥ मैं वहाँ महीने भर तक रहा। उस गुफा में से) रक्त की बड़ी भारी धारा निकली। मैंने समझा कि) उसने बालि को मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा, इसलिए मैं वहाँ (गुफा के द्वार पर) एक बड़ा पत्थर लगाकर भाग आया॥ मंत्रियों ने नगर को बिना स्वामी (राजा) का देखा, तो मुझको जबर्दस्ती राज्य दे दिया।

लेकिन बालि वास्तव में मरा नही था बल्कि बालि ने उस दानव को मार दिया था। जब बालि घर आया तो उसने मुझे राजसिंहासन पर देखा । उसने समझा कि यह राज्य के लोभ से ही गुफा के द्वार पर शिला दे आया था, जिससे मैं बाहर न निकल सकूँ और यहाँ आकर राजा बन बैठा।

उसने मुझे शत्रु के समान बहुत अधिक मारा और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्री को भी छीन लिया। हे कृपालु रघुवीर! मैं उसके भय से समस्त लोकों में बेहाल होकर फिरता रहा॥ वह शाप के कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ।

सुन सेवक दुःख दीनदयाला फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला॥ सेवक का दुःख सुनकर दीनों पर दया करने वाले श्री रघुनाथजी की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं॥

सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान। ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान॥ उन्होंने कहा-) हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे॥

हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिंता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारी सहायता करूँगा।

सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर! सुनिए, बालि महान्‌ बलवान्‌ और अत्यंत रणधीर है। फिर सुग्रीव ने श्री रामजी को दुंदुभि राक्षस की हड्डियाँ व ताल के वृक्ष दिखलाए। श्री रघुनाथजी ने उन्हें बिना ही परिश्रम के (आसानी से) ढहा दिया।

श्री रामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गई और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालि का वध अवश्य करेंगे। सुग्रीव जी बोले कि हे नाथ! आपकी कृपा से अब मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, संपत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़प्पन) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा॥

फिर सुग्रीव को साथ लेकर और हाथों में धनुष-बाण धारण करके श्री रघुनाथजी चले। तब श्री रघुनाथजी ने सुग्रीव को बालि के पास भेजा। वह श्री रामजी का बल पाकर बालि के निकट जाकर गरजा॥

बालि सुनते ही क्रोध में भरकर वेग से दौड़ा। उसकी स्त्री तारा ने चरण पकड़कर उसे समझाया कि हे नाथ! सुनिए, सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई(राम-लक्ष्मण) तेज और बल की सीमा हैं॥ मैंने सुना है वे भगवान हैं और काल को भी जीत सकते हैं।

बलि ने कहा यदि वे भगवान हैं तो मरने में क्या हर्जा है। अगर मैं मारा तो परमपद पा जाऊँगा। ऐसा कहकर वह महान्‌ अभिमानी बालि सुग्रीव को तिनके के समान जानकर चला।

दोनों भिड़ गए। बालि ने सुग्रीव को बहुत धमकाया और घूँसा मारकर बड़े जोर से गरजा॥ तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा।

और जब राम जी से मिला है तो कहता है- वाह प्रभु! खूब मित्रता निभाई आपने। अगर पिटवाना ही था तो मुझे भेजा क्यों? मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं है, काल है॥

श्री रामजी ने कहा- एक रूप तुम्ह भ्राता दोऊ तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ॥ तुम दोनों भाइयों का एक सा ही रूप है। इसी भ्रम से मैंने उसको नहीं मारा। क्योंकि तुमको तीर लग सकता था।

फिर भगवान ने सुग्रीव को अपने कर(हाथ) का स्पर्श किया है और सुग्रीव की सारी पीड़ा दूर हो गई। और अब भगवान ने सुग्रीव के गले में फूलों की माला डाल दी है और सुग्रीव को कहा की तुम दोबारा जाकर बलि को ललकारो।

दोनों में दोबारा फिर से युद्ध हुआ। श्री रघुनाथजी वृक्ष की आड़ से देख रहे थे॥ जब सुग्रीव युद्ध में हारने लगा तब श्री रामजी ने तानकर बालि के हृदय में बाण मारा- मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥

बाण के लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, किंतु प्रभु श्री रामचंद्रजी को आगे देखकर वह फिर उठ बैठा। मारने वाले तो भाग जाते हैं पर भगवान की करुणा देखो बालि को दर्शन दिए हैं। बालि के ह्रदय में प्रेम उमड़ रहा है पर वाणी में कठोरता है। बालि कहता है-

मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥ मैं बैरी और सुग्रीव प्यारा? आपको सुग्रीव से प्यार है और मैं आपका दुश्मन हूँ? हे नाथ! किस दोष से आपने मुझे मारा? क्योंकि मैंने आपका कुछ नही बिगाड़ा। आपने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया है और आपने मुझे शिकारी की भांति छुपकर तीर मारा। ये कोनसी नीति है और कौनसा धर्म है?

भगवान श्री राम बोले – अरे मुर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता॥ और मैंने धर्म की मर्यादा को उठाया है।

मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना॥ रामजी बोले- हे मूढ़! तुझे अत्यंत अभिमान है। तूने अपनी स्त्री की सीख पर भी ध्यान नहीं दिया। तूने सुग्रीव को मारना चाहा।

बालि ने कहा-हे श्री रामजी! आपके सामने मेरी चतुराई नहीं चल सकती। यदि मेरा आपसे प्रेम नही होता तो मैं तारा की बात मानकर आपसे युद्ध करने आता ही नही। बालि कहते हैं- हे प्रभो! अंतकाल में आपकी गति (शरण) पाकर मैं अब भी पापी ही रहा? आपने मुझे तीर मार दिया है क्या अब भी मैं पापी ही हूँ?

बालि की अत्यंत कोमल वाणी सुनकर श्री रामजी ने उसके सिर को अपने हाथ से स्पर्श किया और कहा- बालि! मैं तुम्हारे शरीर को अचल कर दूँ, तुम प्राणों को रखो। तुम्हे एकदम स्वस्थ कर दूं?

बालि कहते हैं- जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥ मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) अनेकों प्रकार का साधन करते रहते हैं। फिर भी अंतकाल में ‘राम’ नाम उनके मुख से नही निकलता। वह श्री रामजी स्वयं मेरे नेत्रों के सामने आ गए हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा॥ आपने मुझे अत्यंत अभिमानी जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो, परंतु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्ष को काटकर उससे बबूर के बाड़ लगाएगा। हे नाथ! अब मुझ पर दयादृष्टि कीजिए और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिए। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं श्री रामजी (आप) के चरणों में प्रेम करूँ!

एक निवेदन और है मेरा-यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिये। गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिये॥

यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिए और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइए ॥

इस तरह से बालि ने अंगद को भगवान को सौंपकर अपने शरीर को त्याग दिया।

जब बलि की पत्नी तारा को मालूम चला तो वह अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं है॥

  • तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥
    छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥

भावार्थ:-तारा को व्याकुल देखकर श्री रघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। (उन्होंने कहा-) पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु- इन पाँच तत्वों से यह अत्यंत अधम शरीर रचा गया है॥

  • प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥
    उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥

भावार्थ:-वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिए रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्‌ के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया॥

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हिन्दुओं के पवित्र पांच सरोवर, जानिए कौन से हैं????????

संजय गुप्ता

‘सरोवर’ का अर्थ तालाब, कुंड या ताल नहीं होता। सरोवर को आप झील कह सकते हैं। भारत में सैकड़ों झीलें हैं लेकिन उनमें से सिर्फ 5 का ही धार्मिक महत्व है, बाकी में से कुछ का आध्यात्मिक और बाकी का पर्यटनीय महत्व है। श्रीमद् भागवत और पुराणों में प्राचीनकालीन 5 पवित्र ऐतिहासिक सरोवरों का वर्णन मिलता है।

जिस तरह 4 पवित्र वटवृक्ष (प्रयाग में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट-बौद्धवट और उज्जैन में सिद्धवट हैं) हैं, जिस तरह 7 पुरी (काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, माया, कांची और अवंति (उज्जैन)) हैं, जिस तरह पंच तीर्थ (पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गया, हरिद्वार एवं प्रयाग) हैं और जिस तरह अष्ट वृक्ष (पीपल, बढ़, नीम, इमली, कैथ, बेल, आंवला और आम) हैं, जिस तरह 9 पवित्र नदियां (गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु, कावेरी, कृष्णा, नर्मदा, ब्रह्मपु‍त्र, विस्ता) हैं उसी तरह 5 पवित्र सरोवर भी हैं।

हिन्दुओं ने अपने पवित्र स्थानों को परंपरा के नाम पर अपवित्र कर रखा है। उन्होंने इन पवित्र स्थानों को मनोरंजन और पर्यटन का केंद्र तो बना ही रखा है, साथ ही वे उन स्थलों को गंदा करने के सबसे बड़े अपराधी हैं। गंगा किनारे अपने मृतकों का दाह-संस्कार करना किसी शास्त्र में नहीं लिखा है। गंगा में पूजा का सामान फेंकना और जले हुए दीपक छोड़ना किसी भी हिन्दू शास्त्र में नहीं लिखा है। फिर भी ऐसा कोई हिन्दू करता है तो वह गंगा और सरोवरों का अपराधी और पापी है। खैर… आओ जानते हैं हम उन 5 सरोवरों के बारे में जिसमें से एक को छोड़कर बाकी सभी की हिन्दुओं ने मिलकर हत्या कर दी है।

पहला सरोवर कैलाश मानसरोवर : – बस यही एक मानसरोवर है, जो अपनी पवित्र अवस्था में आज भी मौजूद है, क्योंकि यह चीन के अधीन है। कैलाश मानसरोवर को सरोवरों में प्रथम पायदान पर रखा जाता है। इसे देवताओं की झील कहा जाता है। यह हिमालय के केंद्र में है। इसे शिव का धाम माना जाता है। मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर भगवान शिव साक्षात विराजमान हैं। यह हिन्दुओं के लिए प्रमुख तीर्थस्थल है। संस्कृत शब्द ‘मानसरोवर’, मानस तथा सरोवर को मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- ‘मन का सरोवर’। हजारों रहस्यों से भरे इस सरोवर के बारे में जितना कहा जाए, कम होगा।

हिमालय क्षेत्र में ऐसी कई प्राकृतिक झीलें हैं उनमें मानसरोवर सबसे बड़ा और केंद्र में है। लद्दाख की एक निर्मल झील।

मानसरोवर लगभग 320 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम में राक्षसताल है। इसके दक्षिण में गुरला पर्वतमाला और गुरला शिखर है। यह समुद्र तल से लगभग 4,556 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मानसरोवर टेथिस सागर का अवशेष है। जो कभी एक महासागर हुआ करता था, वह आज 14,900 फुट ऊंचे स्थान पर स्थित है। इन हजारों सालों के दौरान इसका पानी मीठा हो गया है, लेकिन जो कुछ चीजें यहां पाई जाती हैं, उनसे जाहिर है कि अब भी इसमें महासागर वाले गुण हैं।

कहते हैं कि इस सरोवर में ही माता पार्वती स्नान करती थीं। यहां देवी सती के शरीर का दायां हाथ गिरा था इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। यहां शक्तिपीठ है। यह स्थान पूर्व में भगवान विष्णु का स्थान भी था। हिन्दू पुराणों के अनुसार यह सरोवर सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुआ था। बौद्ध धर्म में भी इसे पवित्र माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि रानी माया को भगवान बुद्ध की पहचान यहीं हुई थी। जैन धर्म तथा तिब्बत के स्थानीय बोनपा लोग भी इसे पवित्र मानते हैं।

दूसरा सरोवर नारायण सरोवर : – नारायण सरोवर का संबंध भगवान विष्णु से है। ‘नारायण सरोवर’ का अर्थ है- ‘विष्णु का सरोवर’। यहां सिंधु नदी का सागर से संगम होता है। इसी संगम के तट पर पवित्र नारायण सरोवर है। पवित्र नारायण सरोवर के तट पर भगवान आदिनारायण का प्राचीन और भव्य मंदिर है। नारायण सरोवर से 4 किमी दूर कोटेश्वर शिव मंदिर है।

इस पवित्र नारायण सरोवर की चर्चा श्रीमद् भागवत में मिलती है। इस पवित्र सरोवर में प्राचीनकालीन अनेक ऋषियों के आने के प्रसंग मिलते हैं। आद्य शंकराचार्य भी यहां आए थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस सरोवर की चर्चा अपनी पुस्तक ‘सीयूकी’ में की है।

नारायण सरोवर में कार्तिक पूर्णिमा से 3 दिन का भव्य मेला आयोजित होता है। इसमें उत्तर भारत के सभी संप्रदायों के साधु-संन्यासी और अन्य भक्त शामिल होते हैं। नारायण सरोवर में श्रद्धालु अपने पितरों का श्राद्ध भी करते हैं।

गुजरात के कच्छ जिले के लखपत तहसील में स्थित है नारायण सरोवर। नारायण सरोवर पहुंचने के लिए सबसे पहले भुज पहुंचें। दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद से भुज तक रेलमार्ग से आ सकते हैं। प्राचीन कोटेश्वर मंदिर यहां से 4 किमी की दूरी पर है।

तीसरा सरोवर पुष्कर सरोवर : – राजस्थान में अजमेर शहर से 14 किलोमीटर दूर पुष्कर झील है। इस झील का संबंध भगवान ब्रह्मा से है। यहां ब्रह्माजी का एकमात्र मंदिर बना है। पुराणों में इसके बारे में विस्तार से उल्लेख मिलता है। यह कई प्राचीन ऋषियों की तपोभूमि भी रहा है। यहां विश्व का प्रसिद्ध पुष्कर मेला लगता है, जहां देश-विदेश से लोग आते हैं। पुष्कर की गणना पंच तीर्थों में भी की गई है।

पुष्कर के उद्भव का वर्णन पद्मपुराण में मिलता है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने यहां आकर यज्ञ किया था। पुष्कर का उल्लेख रामायण में भी हुआ है। विश्वामित्र के यहां तप करने की बात कही गई है। अप्सरा व मेनका यहां के पावन जल में स्नान के लिए आई थीं। सांची स्तूप दानलेखों में इसका ‍वर्णन मिलता है। पांडुलेन गुफा के लेख में, जो ई. सन् 125 का माना जाता है, उषमदवत्त का नाम आता है। यह विख्यात राजा नहपाण का दामाद था और इसने पुष्कर आकर 3,000 गायों एवं एक गांव का दान किया था। महाभारत के वन पर्व के अनुसार योगीराज श्रीकृष्ण ने पुष्कर में दीर्घकाल तक तपस्या की थी। सुभद्रा के अपहरण के बाद अर्जुन ने पुष्कर में विश्राम किया था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भी अपने पिता दशरथ का श्राद्ध पुष्कर में किया था। जैन धर्म की मातेश्वरी पद्मावती का पद्मावतीपुरम यहां जमींदोज हो चुका है जिसके अवशेष आज भी विद्यमान हैं।

पुष्कर सरोवर 3 हैं- ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर, मध्य (बूढ़ा) पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर। ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान विष्णु और कनिष्ठ पुष्कर के देवता रुद्र हैं।

ब्रह्माजी ने पुष्कर में कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णमासी तक यज्ञ किया था जिसकी स्मृति में अनादिकाल से यहां कार्तिक मेला लगता आ रहा है। पुष्कर के मुख्य बाजार के अंतिम छोर पर ब्रह्माजी का मंदिर बना है। आद्य शंकराचार्य ने संवत्‌ 713 में ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना की थी। मंदिर का वर्तमान स्वरूप गोकलचंद पारेख ने 1809 ई. में बनवाया था।

तीर्थराज पुष्कर को सब तीर्थों का गुरु कहा जाता है। इसे धर्मशास्त्रों में 5 तीर्थों में सर्वाधिक पवित्र माना गया है। पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गया, हरिद्वार और प्रयाग को पंचतीर्थ कहा गया है। अर्द्धचंद्राकार आकृति में बनी पवित्र एवं पौराणिक पुष्कर झील धार्मिक और आध्यात्मिक आकर्षण का केंद्र रही है।

झील की उत्पत्ति के बारे में किंवदंती है कि ब्रह्माजी के हाथ से यहीं पर कमल पुष्प गिरने से जल प्रस्फुटित हुआ जिससे इस झील का उद्भव हुआ। यह मान्यता भी है कि इस झील में डुबकी लगाने से पापों का नाश होता है। झील के चारों ओर 52 घाट व अनेक मंदिर बने हैं। इनमें गऊघाट, वराहघाट, ब्रह्मघाट, जयपुर घाट प्रमुख हैं। जयपुर घाट से सूर्यास्त का नजारा अत्यंत अद्भुत लगता है।

चौथा सरोवर पंपा सरोवर : – मैसूर के पास स्थित पंपा सरोवर एक ऐतिहासिक स्थल है। हंपी के निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है। तुंगभद्रा नदी को पार करने पर अनेगुंदी जाते समय मुख्य मार्ग से कुछ हटकर बाईं ओर पश्चिम दिशा में पंपा सरोवर स्थित है।

पंपा सरोवर के निकट पश्चिम में पर्वत के ऊपर कई जीर्ण-शीर्ण मंदिर दिखाई पड़ते हैं। यहीं पर एक पर्वत है, जहां एक गुफा है जिससे शबरी की गुफा कहा जाता है। माना जाता है कि वास्तव में रामायण में वर्णित विशाल पंपा सरोवर यही है, जो आजकल हास्पेट नामक कस्बे में स्थित है।

कर्नाटक में बैल्‍लारी जिले के हास्‍पेट से हम्‍पी जाकर जब आप तुंगभद्रा नदी पार करते हैं तो हनुमनहल्‍ली गांव की ओर जाते हुए आप पाते हैं शबरी की गुफा, पंपा सरोवर और वह स्‍थान जहां शबरी राम को बेर खिला रही है। इसी के निकट शबरी के गुरु मतंग ऋषि के नाम पर प्रसिद्ध ‘मतंगवन’ था।

पांचवां सरोवर बिंदु सरोवर : – बिंदु सरोवर 5 पवित्र सरोवरों में से एक है, जो कपिलजी के पिता कर्मद ऋषि का आश्रम था और इस स्थान पर कर्मद ऋषि ने 10,000 वर्ष तक तप किया था। कपिलजी का आश्रम सरस्वती नदी के तट पर बिंदु सरोवर पर था, जो द्वापर का तीर्थ तो था ही आज भी तीर्थ है। कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रणेता और भगवान विष्णु के अवतार हैं।

अहमदाबाद (गुजरात) से 130 किलोमीटर उत्तर में अवस्थित ऐतिहासिक सिद्धपुर में स्थित है विन्दु सरोवर। इस स्थल का वर्णन ऋग्वेद की ऋचाओं में मिलता है जिसमें इसे सरस्वती और गंगा के मध्य अवस्थित बताया गया है। संभवतः सरस्वती और गंगा की अन्य छोटी धाराएं पश्चिम की ओर निकल गई होंगी। इस सरोवर का उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है।

महान ऋषि परशुराम ने भी अपनी माता का श्राद्ध यहां सिद्धपुर में बिंदु सरोवर के तट पर किया था। वर्तमान गुजरात सरकार ने इस बिंदु सरोवर का संपूर्ण पुनरुद्धार कर दिया है जिसके लिए वह बधाई की पात्र है। इस स्थल को गया की तरह दर्जा प्राप्त है। इसे मातृ मोक्ष स्थल भी कहा जाता है।

अन्य सरोवर : – इसके अलावा अमृत सरोवर (कर्नाटक के नंदी हिल्स पर), कपिल सरोवर (राजस्थान- बीकानेर), कुसुम सरोवर (मथुरा- गोवर्धन), नल सरोवर (गुजरात- अहमदाबाद अभयारण्य में), लोणास सरोवर (महाराष्‍ट्र- बुलढाणा जिला), कृष्ण सरोवर, राम सरोवर, शुद्ध सरोवर आदि अनेक सरोवर हैं जिनका पुराणों में ‍उल्लेख मिलता है।

अमृत सरोवर : कर्नाटक के नंदी हिल्स पर स्थित पर्यटकों को नंदी हिल्‍स की सैर के दौरान अमृत सरोवर की यात्रा की सलाह दी जाती है जिसका विकास बारहमासी झरने से हुआ है। इसी कारण इसे ‘अमृत का तालाब’ या ‘अमृत की झील’ भी कहा जाता है। अमृत सरोवर एक खूबसूरत जलस्रोत है, जो इस इलाके का सबसे सुंदर स्‍थल है।

अमृत सरोवर सालभर पानी से भरा रहता है। यह स्‍थान रात के दौरान पानी से भरा और चांद की रोशनी में बेहद सुंदर दिखता है। पर्यटक, बेंगलुरु के रास्‍ते से अमृत सरोवर तक आसानी से पहुंच सकते हैं, जो 58 किमी की दूरी पर स्थित है। योगी नंदीदेश्‍वर मंदिर, चबूतरा और श्री उर्ग नरसिम्‍हा मंदिर यहां के कुछ प्रमुख आकर्षणों में से एक है, जो अमृत सरोवर के पास स्थित हैं।

लोणार सरोवर : महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में लोणार सरोवर विश्वप्रसिद्ध है। माना जाता है कि यहां पर लवणासुर का वध किया गया था जिसके कारण इसका नाम लवणासुर सरोवर पड़ा। बाद में यह बिगड़कर ‘लोणार’ हो गया। लोणार गांव में ही यह सरोवर स्थित है। इस सरोवर को यूनेस्को ने अपनी सूची में शामिल कर रखा है।

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श्रद्धा और समर्पण

देव शर्मा
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एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस किचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फस गए। दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।
थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।
गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।
गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?
थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक सद्गुरु का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है। किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए। अपने मालिक सद्गुरु की हमेशा जरुरत है किचड़ रुपी संसार से निकलने के लिए।
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संजय गुप्ता

आज मंगलवार को पढ़े,चमत्कारिक मेहंदीपुर बालाजी मंदिर- प्रेत-भूत बाधा दूर करने का सबसे प्रसिद्ध और विश्वसनीय स्थान

यूं तो भारत में हनुमानजी के लाखों मंदिर हैं। हर मंदिर पर भक्तों की भीड़ उमड़ती है, पर राजस्थान के दौसा जिला स्थित घाटा मेंहदीपुर बालाजी की बात ही अलग है।

मेंहदीपुर बालाजी को दुष्ट आत्माओं से छुटकारा दिलाने के लिए दिव्य शक्ति से प्रेरित हनुमानजी का बहुत ही शक्तिशाली मंदिर माना जाता है। यहां कई लोगों को जंजीर से बंधा और उल्टे लटके देखा जा सकता है। यह मंदिर और इससे जुड़े चमत्कार देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। शाम के समय जब बालाजी की आरती होती है तो भूतप्रेत से पीड़ित लोगों को जूझते देखा जाता है।

राजस्थान के दौसा जिले के पास दो पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ मेहंदीपुर नामक स्थान है। यह मंदिर जयपुर-बांदीकुई- बस मार्ग पर जयपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर है। दो पहाडिय़ों के बीच की घाटी में स्थित होने के कारण इसे घाटा मेहंदीपुर भी कहते हैं।

गीताप्रेस गोरखपुर द्वार प्रकाशित हनुमान अंक के अनुसार यह मंदिर करीब 1 हजार साल पुराना है। यहां पर एक बहुत विशाल चट्टान में हनुमान जी की आकृति स्वयं ही उभर आई थी।

इसे ही श्री हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है। इनके चरणों में छोटी सी कुण्डी है, जिसका जल कभी समाप्त नहीं होता। यह मंदिर तथा यहाँ के हनुमान जी का विग्रह काफी शक्तिशाली एवं चमत्कारिक माना जाता है तथा इसी वजह से यह स्थान न केवल राजस्थान में बल्कि पूरे देश में विख्यात है।

जंजीर में बांधकर लाए जाते हैं पीड़ित!!!!!

कहा जाता है कि कई सालों पहले हनुमानजी और प्रेत राजा अरावली पर्वत पर प्रकट हुए थे। बुरी आत्माओं और काले जादू से पीड़ित रोगों से छुटकारा पाने लोग यहां आते हैं।

इस मन्दिर को इन पीड़ाओं से मुक्ति का एकमात्र मार्ग माना जाता है। मंदिर के पंडित इन रोगोंं से मुक्ति के लिए कई उपचार बताते हैं। शनिवार और मंगलवार को यहां आने वाले भक्तों की संख्या लाखों में पहुच जाती है। कई गंभीर रोगियों को लोहे की जंजीर से बांधकर मंदिर में लाया जाता है।

यहां आने वाले पीडित लोगों को देखकर सामान्य लोगों की रूह तक कांप जाती है। ये लोग मंदिर के सामने ऐसे चिल्ला-चिल्ला के अपने अंदर बैठी बुरी आत्माओं के बारे में बताते हैं, जिनके बारे में इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता है। भूत प्रेत ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालों का तांता लगा रहता है। ऐसे लोग यहां पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं।

बादशाहों ने मूर्ति को नष्ट करने की थी कोशिश
कहा जाता है कि मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने का प्रयास किया। हर बार ये बादशाह असफ़ल रहे। वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई। थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा।

ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910 में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष पुराना चोला स्वतः ही त्याग दिया। भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था। ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका लगेज करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता।

असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया। इसके बाद बालाजी को नया चोला चढ़ाया गया। एक बार फिर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई।

बालाजी महाराज के अलावा यहां श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव) की मूर्तियां भी हैं। प्रेतराज सरकार जहां दंडाधिकारी के पद पर आसीन हैं वहीं भैरव जी कोतवाल के पद पर। यहां आने पर ही मालूम चलता है कि भूत और प्रेत किस तरह से मनुष्य को परेशान करते हैं। दुखी व्यक्ति को मंदिर में आकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है।

बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं। शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं। कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही चैंक पड़ते हैं।

उनका मानना है कि भूतप्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति को ही वहां जाना चाहिए। ऐसा सही नहीं है। कोई भी – जो बालाजी के प्रति भक्तिभाव रखने वाला है , इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है। अनेक भक्त तो देश-विदेश से बालाजी के दरबार में मात्र प्रसाद चढ़ाने नियमित रूप से आते हैं।

प्रसाद खाते ही झूमने लगते हैं पीड़ित लोग
प्रसाद का लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है। भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर चिल्लाने लगते हैं। कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोटने लता है।

पीड़ित लोग यहां पर अपने आप जो करते हैं वह एक सामान्य आदमी के लिए संभव नहीं है। इस तरह की प्रक्रियाओं के बाद वह बालाजी की शरण में आ जाता है फर उसे हमेशा के लिए इस तरह की परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है। बालाजी महाराज के मंदिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है।

श्री प्रेतराज सरकार!!!!!

बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है।

भक्तिभाव से उनकी आरती , चालीसा , कीर्तन , भजन आदि किए जाते हैं। बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है। प्रेतराज सरकार को पके चावल का भोग लगाया जाता है। भक्तजन प्रायः तीनों देवताओं को बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाते हैं।

कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव????

कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उनकी ही तरह भक्तों की थोड़ी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं। भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल , डमरू , खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पांचवां कटा शीश रहता है । वे कमर में बाघाम्बर नहीं , लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं। उनकी मूर्तियों पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है ।

इसलिए कहा जाता है कोतवाल कप्तान?????

शास्त्र और लोक कथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं। श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं।

भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं। भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं। इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर में आपके भजन, कीर्तन, आरती और चालीसा श्रद्धा से गाए जाते हैं। प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के वड़े और खीर का भोग लगाया जाता है।

किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी चढ़ा दिया करते हैं । सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूतप्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं , जो नित्य प्रति उसके साथ रहता है।