Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

मुकेश अग्नि

पंच केदार – केदारनाथ के अलावा और भी है 4 केदार

उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। सारी दुनिया में भगवान शिव के अनेकों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच केदार सर्वोपरि हैं।शास्त्रों में उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम का बड़ा ही महात्म्य बताया गया है। लेकिन उत्तराखंड में ऐसे एक नहीं बल्कि चार और केदार हैं जिनका धार्मिक महत्व केदारनाथ के बराबर है। इन सभी धामों के दर्शन से व्यक्ति की कामना पूर्ण होती है। इन स्थानों में तुंगनाथ के महादेव, रूद्रनाथ, श्रीमध्यमहेश्वर एवं कल्पेश्वर प्रमुख हैं। भगवान शिव के ये चार स्थान केदारनाथ के ही भाग हैं।
शिवपुराण के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने कुल-परिवार और सगोत्र बंधु-बाँधवों के वध के पाप का प्रायश्चित करने के लिए यहाँ तप करने आये थे। यह आज्ञा उन्हें वेदव्यास ने दी थी। पांडव स्वगोत्र-हत्या के दोषी थे। इसलिए भगवान शिव उनको दर्शन नहीं देना चाहते थे। भगवान शिव ज्यों ही महिष (भैंसे) का रूप धारण कर पृथ्वी में समाने लगे, पांडवों ने उन्हें पहचान लिया। महाबली भीम ने उनको धरती में आधा समाया हुआ पकड़ लिया। शिव ने प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन दिये और पांडव गोत्रहत के पाप से मुक्त हो गये। उस दिन से महादेव शिव पिछले हिस्से से शिलारूप में केदारनाथ में विद्यमान हैं। उनका अगला हिस्सा जो पृथ्वी में समा गया था, वह नेपाल में प्रकट हुआ, जो पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। इसी प्रकार उनकी बाहु तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमहेश्वर में और जटाएँ कल्पेश्वर में प्रकट हुईं।
आइए अब जानते है भगवान शिव के पंच केदारों के बारे में-
1):-केदारनाथ
यह मुख्य केदारपीठ है। इसे पंच केदार में से प्रथम कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, महाभारत का युद्ध खत्म होने पर अपने ही कुल के लोगों का वध करने के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वेदव्यास जी की आज्ञा से पांडवों ने यहीं पर भगवान शिव की उपासना की थी। यहाँ पर महिषरूपधारी भगवान शिव का पृष्ठभाग यहा शिलारूप में स्थित है।
केदारनाथ के आस-पास के घूमने के स्थान –
उखीमठ- उखीमठ रुद्रप्रयाग जिले में है। यह स्थान समुद्री सतह से 1317 मी. की ऊचाई पर स्थित है। यहां पर देवी उषा, भगवान शिव के मंदिर है।
गंगोत्री ग्लेशियर- उत्तराखंड स्थित गंगोत्री ग्लेशियर लगभग 28 कि.मी लम्बा और 4 कि.मी चौड़ा है। गंगोत्री ग्लेशियर उत्तर पश्चिम दिशा में मोटे तौर पर बहती है और एक गाय के मुंह समान स्थान पर मुड़ जाती हैं।

2):-मध्यमेश्वर
इन्हें मनमहेश्वर या मदनमहेश्वर भी कहा जाता हैं। इन्हें पंच केदार में दूसरा माना जाता है। यह ऊषीमठ से 18 मील दूरी पर है। यहां महिषरूपधारी भगवान शिव की नाभि लिंग रूप में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने अपनी मधुचंद्र रात्रि यही पर मनाई थी। यहां के जल की कुछ बूंदे ही मोक्ष के लिए पर्याप्त मानी जाती है।
मध्यमेश्वर के आस-पास के घूमने के स्थान-
बूढ़ा मध्यमेश्वर-मध्यमेश्वर से 2 कि.मी. दूर बूढ़ा मध्यमेश्वर नामक दर्शनीय स्थल है।
कंचनी ताल- मध्यमेश्वर से 16 कि.मी. दूर कंचनी ताल नामक झील है। यह झील समुद्री सतह से 4200 मी. की ऊचाई पर स्थित हैं।
गउन्धर- यह मध्यमेश्वर गंगा और मरकंगा गंगा का संगम स्थल है।

3):-तुंगनाथ
इसे पंच केदार का तीसरा माना जाता हैं। केदारनाथ के बद्रीनाथ जाते समय रास्ते में यह क्षेत्र पड़ता है। यहां पर भगवान शिव की भुजा शिला रूप में स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए स्वयं पांडवों ने करवाया था। तुंगनाथ शिखर की चढ़ाई उत्तराखंड की यात्रा की सबसे ऊंची चढ़ाई मानी जाती है।
तुंगनाथ के आस-पास के घूमने के स्थान-
चन्द्रशिला शिखर- तुंगनाथ से 2 कि.मी की ऊचाई पर चन्द्रशिला शिखर स्थित है। यह बहुत ही सुंदर और दर्शनीय पहाड़ी इलाका है।
गुप्तकाशी- रुद्रप्रयाग जिले से 1319 मी. की ऊचाई पर गुप्तकाशी नामक स्थान है। जहां पर भगवान शिव का विश्वनाथ नामक मंदिर स्थित है।

4):-रुद्रनाथ
यह पंच केदार में चौथे हैं। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव का मुख स्थित हैं। तुंगनाथ से रुद्रनाथ-शिखर दिखाई देता है पर यह एक गुफा में स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग बेदह दुर्गम है। यहां पंहुचने का एक रास्ता हेलंग (कुम्हारचट्टी) से भी होकर जाता है।

5):-कल्पेश्वर
यह पंच केदार का पांचवा क्षेत्र कहा जाता है। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। अलखनन्दा पुल से 6 मील पार जाने पर यह स्थान आता है। इस स्थान को उसगम के नाम से भी जाना जाता है। यहां के गर्भगृह का रास्ता एक प्राकृतिक गुफा से होकर जाता है।
कल्पेश्वर के आस-पास के घूमने के स्थान-
जोशीमठ- कल्पेश्वर से कुछ दूरी पर जोशीमठ नामक स्थान है। यहां से चार धाम तीर्थ के लिए भी रास्ता जाता है।

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संजय गुप्ता

एक चिड़ा पेड़ पर घोंसला बनाकर मजे से रहता था। एक दिन वह दाना पानी के चक्कर में दूसरी खेत में पहुंच गया। वहां खाने-पीने की मौज से बड़ा ही खुश हुआ। उस खुशी में रात को वह घर आना भी भूल गया और उसके दिन मजे में वहीं बीतने लगे।
इधर शाम को एक खरगोश उस पेड़ के पास आया जहां चिड़े का घोंसला था। पेड़ जरा भी ऊंचा नहीं था। इसलिए खरगोश ने उस घोंसलें में झांक कर देखा तो पता चला कि यह घोंसला खाली पड़ा है। घोंसला अच्छा खासा बड़ा था इतना कि वह उसमें खरगोश आराम से रह सकता था। उसने यहीं रहने का फैसला कर लिया। कुछ दिनों बाद वह चिड़ा जब खा-खा कर मोटा हो गया, तब उसे अपने घोंसलें की याद आई। जब वो अपने घोंसले के पास आया, तो उसने देखा कि घोंसलें में खरगोश आराम से बैठा हुआ है। उसे ये देख कर बहुत गुस्सा आया, उसने खरगोश से कहा, “मैं नहीं था तो तुम मेरे घर में घुस गाए? चलो निकलो मेरे घर से।” खरगोश शान्ति से जवाब देने लगा कहा, “तुम्हारा घर ? कौन सा तुम्हारा घर? यह तो मेरा घर है। कुआं, तालाब या पेड़ एक बार छोड़कर कोई जाता है तो अपना हक भी गवां देता। अब यह घर मेरा है।” यह बात सुनकर चिड़ा कहने लगा, ‘किसी धर्मपण्डित के पास चलते हैं। वह जिसके हक में फैसला सुनायेगे उसे घर मिल जाएगा।’
उस पेड़ के पास से एक नदी थी। वहां पर एक बड़ी सी बिल्ली बैठी थी। वह कुछ धर्मपाठ करती नजर आ रही थी। वैसे तो यह बिल्ली इन दोनों की जन्मजात शत्रु है, लेकिन वहां और कोई भी नहीं था इसलिए इन दोनों ने उसके पास जाना और उससे न्याय लेना ही उचित समझा। सावधानी बरतते हुए बिल्ली के पास जा कर उन्होंने अपनी समस्या बताई।
उन्होंने बिल्ली से कहा, ‘हमने अपनी उलझन तो बता दी, अब इसका हल क्या है? इसका जवाब आपसे सुनना चाहते हैं। जो भी सही होगा उसे वह घोंसला मिल जाएगा और जो झूठा होगा उसे आप खा लेना।’ बिल्ली ने कहा, ‘अरे रे !! यह तुम कैसी बातें कर रहे हो, दूसरों को मारने वाला खुद नरक में जाता है। मैं तुम्हें न्याय देने में तो मदद करूंगी लेकिन झूठे को खाने की बात है तो वह मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं एक बात तुम लोगों को कानों में कहना चाहती हूं, जरा मेरे करीब आओ!!’
खरगोश और चिड़ा खुश हो गए कि अब फैसला हो जाएगा। और उसके बिल्कुल करीब गए। फिर बिल्ली ने दोनों को पकड़ कर खा लिया। अपने शत्रु को पहचानते हुए भी उस पर विश्वास करने से खरगोश और चिड़े को अपनी जान गंवानी पड़ीं। सच है कि, शत्रु की बात पर कभी भी भरोसा नहीं करना चाहिए और संभलकर कर रहना चाहिए।

“शत्रु नहीं है विश्वास के पात्र”

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Dev Sharma

एक बुजुर्ग औरत मर गई, यमराज लेने आये।

औरत ने यमराज से पूछा, आप मुझे स्वर्ग ले जायेगें या नरक।

यमराज बोले दोनों में से कहीं नहीं।

तुमनें इस जन्म में बहुत ही अच्छे कर्म किये हैं, इसलिये मैं तुम्हें सीधे प्रभु के धाम ले जा रहा हूं।

बुजुर्ग औरत खुश हो गई, बोली धन्यवाद, पर मेरी आपसे एक विनती है।

मैनें यहां धरती पर सबसे बहुत स्वर्ग – नरक के बारे में सुना है मैं एक बार इन दोनों जगहो को देखना चाहती हूं।

यमराज बोले तुम्हारे कर्म अच्छे हैं, इसलिये मैं तुम्हारी ये इच्छा पूरी करता हूं।

चलो हम स्वर्ग और नरक के रासते से होते हुए प्रभु के धाम चलेगें।

दोनों चल पडें, सबसे पहले नरक आया।

नरक में बुजुर्ग औरत ने जो़र जो़र से लोगो के रोने कि आवाज़ सुनी।

वहां नरक में सभी लोग दुबले पतले और बीमार दिखाई दे रहे थे।

औरत ने एक आदमी से पूछा यहां आप सब लोगों कि ऐसी हालत क्यों है।

आदमी बोला तो और कैसी हालत होगी, मरने के बाद जबसे यहां आये हैं, हमने एक दिन भी खाना नहीं खाया।

भूख से हमारी आतमायें तड़प रही हैं

बुजुर्ग औरत कि नज़र एक विशाल पतिले पर पडी़, जो कि लोगों के कद से करीब 300 फुट ऊंचा होगा, उस पतिले के ऊपर एक विशाल चम्मच लटका हुआ था।

उस पतिले में से बहुत ही शानदार खुशबु आ रही थी।

बुजुर्ग औरत ने उस आदमी से पूछा इस पतिले में क्या है।

आदमी मायूस होकर बोला ये पतिला बहुत ही स्वादिष्ट खीर से हर समय भरा रहता है।

बुजुर्ग औरत ने हैरानी से पूछा, इसमें खीर है

तो आप लोग पेट भरके ये खीर खाते क्यों नहीं, भूख से क्यों तड़प रहें हैं।

आदमी रो रो कर बोलने लगा, कैसे खायें

ये पतिला 300 फीट ऊंचा है हममें से कोई भी उस पतिले तक नहीं पहुँच पाता।

बुजुर्ग औरत को उन पर तरस आ गया
सोचने लगी बेचारे, खीर का पतिला होते हुए भी भूख से बेहाल हैं।

शायद ईश्वर नें इन्हें ये ही दंड दिया होगा

यमराज बुजुर्ग औरत से बोले चलो हमें देर हो रही है।

दोनों चल पडे़, कुछ दूर चलने पर स्वर्ग आया।

वहां पर बुजुर्ग औरत को सबकी हंसने,खिलखिलाने कि आवाज़ सुनाई दी।

सब लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे थे।
उनको खुश देखकर बुजुर्ग औरत भी बहुत खुश हो गई।

पर वहां स्वर्ग में भी बुजुर्ग औरत कि नज़र वैसे ही 300 फुट उचें पतिले पर पडी़ जैसा नरक में था, उसके ऊपर भी वैसा ही चम्मच लटका हुआ था।

बुजुर्ग औरत ने वहां लोगो से पूछा इस पतिले में क्या है।

स्वर्ग के लोग बोले के इसमें बहुत स्वादिष्ट खीर है।

बुजुर्ग औरत हैरान हो गई

उनसे बोली पर ये पतिला तो 300 फीट ऊंचा है

आप लोग तो इस तक पहुँच ही नहीं पाते होगें
उस हिसाब से तो आप लोगों को खाना मिलता ही नहीं होगा, आप लोग भूख से बेहाल होगें
पर मुझे तो आप सभी इतने खुश लग रहे हो, ऐसे कैसे

लोग बोले हम तो सभी लोग इस पतिले में से पेट भर के खीर खाते हैं

औरत बोली पर कैसे,पतिला तो बहुत ऊंचा है।

लोग बोले तो क्या हो गया पतिला ऊंचा है तो

यहां पर कितने सारे पेड़ हैं, ईश्वर ने ये पेड़ पौधे, नदी, झरने हम मनुष्यों के उपयोग के लिये तो बनाये हैं

हमनें इन पेडो़ कि लकडी़ ली, उसको काटा, फिर लकड़ीयों के टुकडो़ को जोड़ के विशाल सिढी़ का निर्माण किया

उस लकडी़ की सिढी़ के सहारे हम पतिले तक पहुंचते हैं

और सब मिलकर खीर का आंनद लेते हैं

बुजुर्ग औरत यमराज कि तरफ देखने लगी

यमराज मुसकाये बोले ईशवर ने स्वर्ग और नरक मनुष्यों के हाथों में ही सौंप रखा है,चाहें तो अपने लिये नरक बना लें, चाहे तो अपने लिये स्वर्ग ईशवर ने सबको एक समान हालातो में डाला हैं।

उसके लिए उसके सभी बच्चें एक समान हैं, वो किसी से भेदभाव नहीं करता।

वहां नरक में भी पेेड़ पौधे सब थे, पर वो लोग खुद ही आलसी हैं, उन्हें खीर हाथ में चाहीये,वो कोई कर्म नहीं करना चाहते, कोई मेहनत नहीं करना चाहते, इसलिये भूख से बेहाल हैं।

क्योंकि ये ही तो ईश्वर कि बनाई इस दुनिया का नियम है,जो कर्म करेगा, मेहनत करेगा, उसी को मीठा फल खाने को मिलेगा।

ये ही आज का सुविचार है, स्वर्ग और नरक आपके हाथ में है
मेहनत करें, अच्छे कर्म करें और अपने जीवन को स्वर्ग बनाएं।
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K L Kakaad

ईश्वर के करीब
एक महात्मा अपने शिष्य के साथ कहीं जा रहे थे। देखा कि एक पेड़ के नीचे एक बाबा जी माला फेर रहे हैं। लेकिन थोड़ी-थोड़ी देर बाद आंखें जरा सी खोल कर देख भी लेते हैं कि कोई कितने पैसे दे गया है। यह देख स्वामी जी हंसे और आगे चल दिए।
एक जगह एक पंडित जी कथा सुना रहे थे। लेकिन उनके चेहरे पर श्रद्धा या भक्ति का कोई भाव नहीं था। लगता था बस कथा सुनानी है, कथा के पात्रों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। स्वामी जी कुछ देर खड़े होकर सुनते रहे, हंसे और चल दिए। वह कुछ ही दूर गए होंगे कि देखा एक बच्चा सड़क पार करता हुआ गिर गया और रोने लगा। उसे कुछ चोटें आईं। सड़क के किनारे काम कर रहा एक मजदूर दौड़ा आया। वह बच्चे को उठाकर एक तरफ ले गया। अपना अंगोछा पानी में भिगोकर उसके घावों को साफ करने लगा। बच्चा चुप हो गया। उसने बच्चे से पूछा, “कहां रहते हो ? चलो घर छोड़ आता हूं।”
बच्चे ने कहा, “मैं चला जाऊंगा।” फिर मजदूर अपने काम में व्यस्त हो गया। यह देखकर बाबा की आंखें नम हो गईं। शिष्य ने जानना चाहा, “माला फेर रहे बाबा को और कथा वाचक को कथा करते देखकर आप हंसे थे, लेकिन अब आपको यहां रोना क्यों आ गया ?” स्वामी जी बोले, “पहले दो स्थानों पर आडंबर और पाखंड था। ईश्वर के नाम को वे दोनों बदनाम कर रहे थे। इस मजदूर को देखकर मुझे यह पता चल गया कि दुनिया में इस मजदूर जैसे लोग अभी भी हैं जो किसी अजनबी की मदद करने को हमेशा तैयार रहते हैं। यह मजदूर शायद किसी मंदिर-मस्जिद में नहीं जाता लेकिन ईश्वर के बहुत करीब है। ऐसे लोगों के कारण ही यह संसार चल रहा है।”

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संजय गुप्ता

पत्नी का सम्मान(कहानी)

ग्रामीण बैंक में मैनेजर की पोस्टिंग होने के बाद पहली बार विजय किराए के नए घर में शिफ्ट हुआ था पर आज ही सीढ़ियों से फिसलने के कारण रागिनी के पैरों में जबरदस्त मोच आ गयी थी।डॉक्टर ने घर पर आकर पट्टियाँ तो बाँध दी साथ ही साथ सख्त हिदायत दे दीं की चलना फिरना बिल्कुल मना है।एक सप्ताह पहले आये नए घर के आस पास कोई जान पहचान के लोग भी नहीं थे।ये तो बहुत अच्छी बात रही कि पिछले कुछ दिनों में रागिनी ने किचन के साथ साथ पूरे घर को व्यवस्थित कर लिया था।
चार साल पहले विजय और रागिनी की परिवारवालों की सहमति से अर्रेंज मैरेज हुई थी।रागिनी खुद भी पढ़ने में काफी तेज थी और पढ़ लिख कर जीवन मे कुछ बनना चाहती थी लेकिन पापा को कैंसर का पता चला और उसी वक़्त विजय के यहाँ से रिश्ता आया तो मजबूरी के चलते शादी करनी पड़ी।शादी के बाद रागिनी पूरी तरह से ससुरालवालों की खुशियों के लिए खुद को न्योछावर कर दी ।वो पूरी तरह से आदर्श बहु बन गयी।
ससुराल में सब उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे।उसके व्यवहार ,कार्यकुशलता से सभी प्रभावित थे ।कुछ ही दिनों में उसने अपने ससुराल की काया बदल कर रख दी थी। पहले हर चीज जैसे तैसे होती थी अब हर चीज साफ सुथरी और व्यवस्थित रहने लगी ।खाना भी वो बड़े जतन से बनाती थी हर लोग उसके बनाये लजीज खाने की खूब तारीफ करते सिवाय उसके पति विजय के।
विजय को जरा भी खाने में नमक कम या ज्यादा लगता या मसाला कम होता तो वो एक कोर खाना खाकर छोड़ देता था ।परसों खीर में थोड़ी चीनी कम क्या हुई रागिनी के लाख मिन्नतों के बाद भी उसने खाने को दुबारा हाथ तक नहीं लगाया।सबसे ज्यादा विजय को मटर पनीर पसंद थी कुछ दिनों पहले जब मटर पनीर बनी और मटर थोड़ी गल गयी तो भी विजय ने खाना नहीं खाया जबकि घर के सभी सदस्यों ने खूब मजे से खाये।रागिनी के लाख मिन्नतें करने और मनाने के बाद भी विजय खाना नहीं खाता था और विजय जब भूखा सो जाता तो रागिनी भी भूखी सो जाती थी ।महीने में कई बार ऐसा होता था।अब पहली बार विजय नौकरी के लिए घर से दूर आया था।
रागिनी को पलँग पर अच्छे से सुलाकर विजय आज ज़िंदगी मे पहली बार खाना बनाने के ख्याल से घुसा।किचन में हर चीज रागिनी ने व्यवस्थित रखा था।विजय ने एक तरफ थोड़ा सा चावल गैस चूल्हे पर चढ़ा दियाऔर दूसरी तरफ थोड़ी सी दाल एक पतीले में चढ़ा दी।फिर वो थोड़े आलू प्याज लेकर भुजिया काटने लगा। काफी मेहनत के बाद बहुत ही बेतरतीब ढंग से आलू और प्याज कटे।उसे आभास होने लगा था खाना बनाने में बहुत मेहनत लगती है।दो घंटे की मेहनत के बाद उसने किसी तरह खाना बनाने में सफलता पाई।
एक थाली में भात और कटोरी में दाल और प्लेट में भुजिया लेकर वो पलँग पर रागिनी को अपने हाथों से खाना खिलाने लगा।वो कोर कोर रागिनी को खाना खिलाता जाता था और रागिनी बड़े आराम से खुशी खुशी खाना खाती जाती थी ।खाना ख़त्म होने के बाद विजय ने रागिनी से पूछा कैसा लगा खाना? रागिनी ने कहा बहुत अच्छा।मैं कितनी खुशनसीब हूँ आज ज़िन्दगी में पहली बार पति के हाथों बना गरमागरम खाना खाने को मिला।विजय से सुनकर बहुत खुश हुआ आखिर दो घंटे कड़ी मेहनत करके उसने खाना बनाया था ।खाने की तारीफ सुनकर वह फूला न समाया उसे लगा उसकी मेहनत सफल रही।
रागिनी को खाना खिलाने के बाद वो खुद खाना खाने बैठा उसे जोरों की भूख लगी थी।दाल भात मिलाकर थोड़ी भुजिया का कोर बनाकर जैसे ही मुँह में डालकर विजय ने चबाना शुरू किया तेजी से बेसिन की तरफ दौड़ा और मुँह का सारा खाना बेसिन में उगल दिया।चावल अधपका था।दाल में नमक बहुत ज्यादा था।भुजिया भी कच्चा था।ऐसा घटिया खाना रागिनी ने बिना कोई शिकवा शिकायत के खा लिया सिर्फ इसलिए कि मैंने इतनी मेहनत से बनाया था।छोटी छोटी बात पर पिछले सारे खाना न खाने वाले वक़्त की उसे याद आने लगी।उसके दोनों आँखों से आँसू निकल पड़े।अपने बनाये जिस जिस खाने को वो एक कोर भी न खा सका रागिनी ने बिना कुछ कहे पूरे खाने को खा लिए।
विजय रागिनी जे सामने सर झुकाए हाथ जोड़े धीरे से बोला”पिछले चार सालों में कई बार खाना न खाकर मैंने तुम्हारा जो अपमान किया आज खाना खाकर तुमने मेरा कितना बड़ा सम्मान किया मुझे माफ़ कर दो।
रागिनी ने मुस्कुराते हुए
कहा ।दूध गर्म कर चूड़ा के साथ आज खा लीजिए एक दो दिनों में मैं ठीक हो जाऊँगी फिर आपको कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।

इसके बाद कोई भी ऐसा वक़्त नहीं आया जब रागिनी का बनाया खाना विजय ने खुशी खुशी न खाया हो।एक बार खाना बनाने में लगी मेहनत ने विजय पत्नी का सम्मान करना सीख गया था ।

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निओ दिप

कब्र मे मुर्दे को खाने वाले कीड़े भी कुछ सालो मे नष्ट हो जाते हैं। परन्तु हिन्दू उनपर सिर रगड़ते हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक शहर है,बहराइच ।बहराइच में हिन्दू समाज का मुख्य पूजा स्थल है गाजी बाबा की मजार। मूर्ख हिंदू लाखों रूपये हर वर्ष इस पीर पर चढाते है। इतिहास का जानकार हर व्यक्ति जानता है,कि महमूद गजनवी के उत्तरी भारत को १७ बार लूटने व बर्बाद करने के कुछ समय बाद उसका भांजा सलार गाजी भारत को दारूल इस्लाम बनाने के उद्देश्य से भारत पर चढ़ आया । वह पंजाब ,सिंध, आज के उत्तर प्रदेश को रोंद्ता हुआ बहराइच तक जा पंहुचा। रास्ते में उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम कराया, लाखों हिंदू औरतों के बलात्कार हुए, हजारों मन्दिर तोड़ डाले।

राह में उसे एक भी ऐसा हिन्दू वीर नही मिला जो उसका मान मर्दन कर सके। इस्लाम की जेहाद की आंधी को रोक सके। परंतु बहराइच के राजा सुहेल देव पासी ने उसको थामने का बीडा उठाया । वे अपनी सेना के साथ सलार गाजी के हत्याकांड को रोकने के लिए जा पहुंचे। महाराजा व हिन्दू वीरों ने सलार गाजी व उसकी दानवी सेना को मूली गाजर की तरह काट डाला । सलार गाजी मारा गया। उसकी भागती सेना के एक एक हत्यारे को काट डाला गया। हिंदू ह्रदय राजा सुहेल देव पासी ने अपने धर्म का पालन करते हुए, सलार गाजी को इस्लाम के अनुसार कब्र में दफ़न करा दिया।

कुछ समय पश्चात् तुगलक वंश के आने पर फीरोज तुगलक ने सलारगाजी को इस्लाम का सच्चा संत सिपाही घोषित करते हुए उसकी मजार बनवा दी। आज उसी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलातकारी ,मूर्ती भंजन दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है। सलार गाजी हिन्दुओं का गाजी बाबा हो गया है सलार गाजी हिन्दुओं का भगवान बनकर हिन्दू समाज का पूजनीय हो गया है। अब गाजी की मजार पूजने वाले ,ऐसे हिन्दुओं को मूर्ख न कहे तो क्या कहें ।

ख्वाजा गरीब नवाज़, अमीर खुसरो, निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर
जाकर मन्नत मांगने वाले सनातन धर्मी (हिन्दू) लोगो के लिए विशेष :–

पूरे देश में स्थान स्थान पर बनी कब्रों,मजारों या दरगाहों पर हर वीरवार को जाकर शीश झुकाने व मन्नत करने वालों से कुछ प्रश्न :-

1.क्या एक कब्र जिसमे मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चुकी है वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती हैं?
2. ज्यादातर कब्र या मजार उन मुसलमानों की हैं जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए
थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजो का अपमान नहीं हैं जिन्होंने अपने प्राण धर्म की रक्षा करते हुए बलि वेदी पर समर्पित कर दियें थे?
3. क्या हिन्दुओ कोे अपने श्री राम, श्री कृष्ण अथवा अन्य देवी देवताओं पर भरोसा नहीं हैं जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक हैं?
4. जब गीता में श्री कृष्ण साफ़ साफ़ कहा हैं की कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती हैं तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा?

“यान्ति देवव्रता देवान्
पितृन्यान्ति पितृव्रताः
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति
मद्याजिनोऽपिमाम्”

श्री मद भगवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मुर्दा, पितृ (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र,मजार अथवा समाधि) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद प्रेत की योनी में ही विचरण करते हैं व उसे ही प्राप्त करते हैं l

  1. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा आदि वीरो की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता हैं तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करनेवालो की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते हैं?
  2. क्या संसार में इससे बड़ी मूर्खता का प्रमाण आपको मिल सकता हैं?

  3. हिन्दू कौनसी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजा कर प्राप्त कर रहे हैं जो वेदों- उपनिषदों में कहीं नहीं गयीं हैं?

  4. कब्र, मजार पूजा को हिन्दू मुस्लिम सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओ को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या हैं ?

आशा हैं इस लेख को पढ़ कर आपकी बुद्धि में कुछ प्रकाश हुआ होगा l अगर आप श्री राम और श्री कृष्ण को मानते हैं तो तत्काल इस मुर्खता पूर्ण अग्यान को छोड़ दे और अन्य हिन्दुओ को भी इस बारे में बता कर उनकी मूर्खता को दूर करे| अपने धर्म को जानिए l इस अज्ञानता के चक्र में से बाहर निकलिए।

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संजय गुप्ता

खाटूश्यामजी की कथा,,,,

घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को क्यों जाना जाता है, श्याम के नाम से??????

हिन्दू धर्म के अनुसार, खाटू श्याम जी कलियुग में कृष्ण के अवतार हैं। जिन्होंने श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त किया था कि वे कलियुग में उनके नाम श्याम से पूजे जाएँगे। श्री श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है।

वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे अति बलशाली गदाधारी भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या मौरवी के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ तथा श्री कृष्ण से सीखी। भगवान् शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किये; इस प्रकार तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।

महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुए तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर चल पड़े।

सर्वव्यापी श्री कृष्ण ने ब्राह्मण भेष धारण कर बर्बरीक के बारे में जानने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है; ऐसा सुनकर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिए पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तूणीर में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो पूरे ब्रह्माण्ड का विनाश हो जाएगा। यह जानकर भगवान् कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस वृक्ष के सभी पत्तों को वेधकर दिखलाओ।

वे दोनों पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। बाण ने क्षणभर में पेड़ के सभी पत्तों को वेध दिया और श्री कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था; बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए अन्यथा ये बाण आपके पैर को भी वेध देगा।

तत्पश्चात, श्री कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा; बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन को दोहराया और कहा युद्ध में जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा उसी को अपना साथ देगा। श्री कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की निश्चित है और इस कारण अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में चला जाएगा।

अत: ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण ने वीर बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की। बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया और दान माँगने को कहा। ब्राह्मण ने उनसे शीश का दान माँगा।

वीर बर्बरीक क्षण भर के लिए अचम्भित हुए, परन्तु अपने वचन से अडिग नहीं हो सकते थे। वीर बर्बरीक बोले एक साधारण ब्राह्मण इस तरह का दान नहीं माँग सकता है, अत: ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की। ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ गये।

श्री कृष्ण ने बर्बरीक को शीश दान माँगने का कारण समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पूर्व युद्धभूमि पूजन के लिए तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय के शीश की आहुति देनी होती है; इसलिए ऐसा करने के लिए वे विवश थे। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अन्त तक युद्ध देखना चाहते हैं। श्री कृष्ण ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।

श्री कृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न होकर बर्बरीक को युद्ध में सर्वश्रेष्ठ वीर की उपाधि से अलंकृत किया। उनके शीश को युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया; जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया था इस प्रकार वे शीश के दानी कहलाये।

महाभारत युद्ध की समाप्ति पर पाण्डवों में ही आपसी विवाद होने लगा कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है?

श्री कृष्ण ने उनसे कहा बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये और पहाड़ी की ओर चल पड़े, वहाँ पहुँचकर बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्री कृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उपस्थिति, युद्धनीति ही निर्णायक थी।

उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो शत्रु सेना को काट रहा था। महाकाली, कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।

श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है।