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माता ” मदालसा “की कथा

संजय गुप्ता

,,, माता-पिता का जीवन उच्च आदर्श में गढ़ा होना चाहिये!!!!!!

ज्ञानी जनों के मुख से निकली बातों में बहुत बल होता है। क्योंकि वे लोग स्वयं जो देखते हैं, उपलब्धी कर चुके होते हैं; वही बात कहते हैं। केवल अनुमान के आधार पर, या दूसरों से सुनकर, या पुस्तकों को पढ़ कर वे कुछ नहीं कहते हैं। इसीलिए उनकी बातों में इतनी शक्ति आ जाती है। उनकी बातें सीधा श्रोताओं के हृदय को स्पर्श करती हैं, और वहाँ अपनी एक छाप छोड़ जाती हैं।

प्राचीन काल में गन्धर्वलोक में विश्वा-वसु नाम के राजा राज करते थे। उनकी एक सुन्दर कन्या थीं। उसका नाम मदालसा था। उन दिनों पृथ्वी पर पाताल-केतु नाम का एक बड़ा पराक्रमी दानव रहता था। पतालकेतु दानवों का राजा था। उसने छल से मदालसा का अपहरण कर लिया, और अपने पाताललोक में बने हुए किले में कैद कर दिया।

उन्हीं दिनों गालव नाम के एक बडे भारी तेजस्वी ऋषि महाराज शत्रुजित् के राज्य में तपस्या करते थे। उनकी तपस्या में भी पातालकेतु बडा ही विघन् करता था। इससे ऋषि बड़े दुखी होते। एक दिन किसी दैवी पुरुष ने ऋषि को एक घोडा देते हुए कहा-भगवन्!

आप इस घोडे को लीजिये, इसका नाम कुवलयाश्व है। यह आकाश-पाताल में सब जगह जा सकता है, इसे आप जाकर महाराज शत्रुजित् के राजकुमार ऋतुध्वज को दें। ऋतुध्वज इस पर चढकर पातालकेतु तथा अन्यान्य राक्षसों को मारेगा। इतना कहकर वह दैवी पुरुष चला गया।

राजकुमार ऋतुध्वज घोड़े के रूप और गुणों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। और अपने पिता के आदेश अनुसार पतालकेतु के राज्य पर आक्रमण कर दिये और उसे परास्त करके, मदालसा को कैद से छुड़ा कर लौट आये।

अपने राज्य में लौट कर उन्होंने मदालसा से विवाह कर लिया। विवाह के कुछ ही दिनों बाद ऋतुध्वज के उपर दानवों ने पुनः आक्रमण कर दिया। यह युद्ध बहुत दिनों तक चलता रहा।

युद्ध के समय शत्रुपक्ष जानबूझ कर तरह तरह के अफवाह फैला दिया करते हैं। उसमें से कौन खबर सही कौन झूठ इसका निर्णय करना मुश्किल हो जाता है। दानवों ने षड्यंत्र करके ऐसी ही एक झूठी खबर को फैला दिया। वे लोग सब जगह यह कहते हुए घुमने लगे कि ऋतुध्वज यूद्ध में मारे गये हैं।

रानी मदालसा बहुत चिन्तित होकर राजभवन में समय काट रही थीं। यह समाचार उड़ते उड़ते उनके कानों तक भी पहुँच गया। अपने पति के शोक में वे अत्यधिक उद्विग्न रहने लगीं। और अन्त में शोक नहीं सह सकने के कारण उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया।

इधर कुछ दिनों बाद दानवों को पराजित कर ऋतुध्वज राजधानी में लौट आते हैं। बड़ी आशा के साथ यह आनन्द-समाचार मदालसा को सुनाने जब वे राजभवन पहुँचे, तो मदालसा के इस प्रकार प्राण त्याग देने का समाचार सुनकर एकदम मूर्छित हो गये हैं।

मदालसा को याद करके उनका हृदय शोकाकुल हो गया। यूद्ध में विजय प्राप्ति से प्राप्त होने वाले आनन्द उल्ल्हास के बदले राजधानी में विषाद की काली छाया उतर आई थी। पत्नी के शोक में आहार-निद्रा का त्याग दिये, और लगभग पागलों जैसी हालत उनकी हो गयी।
उनके पड़ोसी राज्य के राजा नागराज ऋतुध्वज के परम मित्र थे।

राजा की अवस्था को देखकर वे बड़े चिन्तित हुए। अपने मित्र का दुःख दूर करने की इच्छा से नागराज हिमालय जाकर तपस्या में लीन हो गये। इस आशा से वे तपस्या में रत हुए कि यदि उनकी तपस्या से शिवजी प्रसन्न हो गये तो शायद वे कोई उपाय निकाल देंगे।और उपाय भी निकल गया !

भगवान शिव उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर उनको दर्शन दिए और उनकी कामना को पूर्ण कर दिये। शिवजी के वरदान से मदालसा अपना पहले जैसे ही रूप और यौवन को लेकर वापस लौट आई। नागराज उनको लेकर राज्य में लौटे और उनको ऋतुध्वज के हाथों में सौंप दिया। किसी मृत व्यक्ति के इस प्रकार पुनः लौट आने की बात तो कल्पना से भी परे है।

किन्तु ऋतुध्वज के आनन्द की सीमा नहीं थी। नागराज के उद्योग से मृत्युञ्जय शिवजी की कृपा से ऋतुध्वज को मदालसा पुनः मिल गयी और ऋतुध्वज सुखपूर्वक रहने लगे।

मृत्यु के बाद दुबारा उसी शरीर में वापस लौट आने के कारण मदालसा के मन का अज्ञान मिट चुका था। जीवन का सार तत्व, इसका चरम तत्व, उनको ज्ञात हो चुका था। किन्तु इस बात को वे किसी के सामने प्रकट नहीं करती थीं।

जैसे साधारण लोग जीवन यापन करते हैं, उसी प्रकार वे भी अपना जीवन यापन करती थीं। किन्तु ज्ञान की बात केवल अपने पुत्रों को ही सुनाती थीं। अपने लड़के को पालने में रख कर, झुलाते झुलाते यह लोरी गा कर सुनाती थीं-

हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। वह शरीर भी पाँच भूतों का बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है?

यह कल्पित नाम ‘ विक्रान्त ‘ तो तुझे अभी मिला है। तुम्हारा (आत्मा का) न तो जन्म है, न मृत्यु। तुम भय, शोक, आदि दुःख से परे हो। शरीर के भीतर तुम हो, किन्तु तुम शरीर नहीं हो। तुम हो मेरे लाल, निरंजन ! अति पावन निष्पाप !

अथवा तू नहीं रोता है, यह शब्द तो राजकुमार के पास पहुँचकर अपने आप ही प्रकट होता है। तेरी संपूर्ण इन्द्रियों में जो भाँति भाँति के गुण-अवगुणों की कल्पना होती है वे भी पाञ्चभौतिक ही है?

जैसे इस जगत में अत्यंत दुर्बल भूत अन्य भूतों के सहयोग से वृद्धि को प्राप्त होते है, उसी प्रकार अन्न और जल आदि भौतिक पदार्थों को देने से पुरुष के पाञ्चभौतिक शरीर की ही पुष्टि होती है । इससे तुझ शुद्ध आत्मा को न तो वृद्धि होती है और न हानि ही होती है।

तुम्हारा शरीर जैसे एक दिन जन्मा है, उसी प्रकार एकदिन नष्ट भी हो जायेगा। जिस प्रकार पुराने वस्त्र फट जाने पर लोग उसको त्याग देते हैं, शरीर का त्याग भी ठीक वैसा ही है। शरीर नष्ट होने से तुम्हारा कुछ नहीं नष्ट होता। तुम तो आनन्दमय आत्मा हो; फिर किस लिये रो रहे हो ?

तू अपने उस चोले तथा इस देहरुपि चोले के जीर्ण शीर्ण होने पर मोह न करना। शुभाशुभ कर्मो के अनुसार यह देह प्राप्त हुआ है। तेरा यह चोला (शरीर और मन) षड रिपुओं काम,क्रोध,लोभ, मद,मोह मात्सर्य आदि से बंधा हुआ है (तू तो सर्वथा इससे मुक्त है) ।

कोई जीव पिता के रूप में प्रसिद्ध है, कोई पुत्र कहलाता है, किसी को माता और किसी को प्यारी स्त्री कहते है, कोई ‘यह मेरा है’ कहकर अपना माना जाता है और कोई ‘मेरा नहीं है’ इस भाव से पराया माना जाता है। किन्तु ये सभी भूतसमुदाय के ही नाना रूप है, ऐसा तुझे मानना चाहिये।

यद्यपि समस्त भोग दु:खरूप है तथापि मूढ़चित्तमानव उन्हे दु:ख दूर करने वाला तथा सुख की प्राप्ति करानेवाला समझता है, किन्तु जो विद्वान है, जिनका चित्त मोह से आच्छन्न नहीं हुआ है, वे उन भोगजनित सुखों को भी दु:ख ही मानते है।

स्त्रियों की हँसी क्या है, कंकाल के हड्डियों का प्रदर्शन । जिसे हम अत्यंत सुंदर नेत्र कहते है, वह मज्जा की कलुषता है। और मोटे मोटे कुच आदि घने मांस की ग्रंथियाँ है, अतः पुरुष जिस स्त्री शरीर पर अनुराग करता है, उस युवती स्त्री के शरीर में आसक्त होकर पाशविक विचारों से ग्रस्त रहना क्या नरक की अवस्था में रहने जैसा नहीं है?

पृथ्वी पर सवारी चलती है, सवारी पर यह शरीर रहता है और इस शरीर में भी एक दूसरा पुरुष बैठा रहता है, किन्तु पृथ्वी और सवारी में वैसी अधिक ममता नहीं देखी जाती, जैसी कि अपने देह में दृष्टिगोचर होती है। यही मूर्खता है।

मदालसा को कालान्तर में दो पुत्र और हुए और उन दोनों को भी महारानी ने बाल्यकाल से ही ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया ,और वे तीनों ही निवृत्ति मार्गी ( संसारत्यागी) संन्यासी बन गये। वे तीनों भाई राज्य छोड़कर कठोर साधना करने लगे।

भारत में मनुष्य जीवन को १०० वर्षों का मानकर उसे चार आश्रमों में बाँटा गया है –

१. विद्यार्थी का जीवन जिसे ब्रह्मचर्य आश्रम कहते हैं।

२. विवाहित गृहस्थ का जीवन जिसे गृहस्थ आश्रम कहते हैं।

३. रिटायरमेंट के बाद समाज में चरित्रनिर्माण कारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाले लोक-शिक्षक का जीवन जिसे वानप्रस्थ आश्रम कहते हैं।

४. प्रवृत्ति मार्ग से चलते हुए किन्तु मनुमहाराज के उपदेश ‘निवृत्ति अस्तु महाफला ‘ का श्रवण,मनन निदिध्यासन करते करते पूर्णतया त्यागी जीवन -निवृत्ति मार्ग में उन्नत हो जाना, उसे संन्यास आश्रम कहते हैं। किन्तु महारानी मदालसा ने अपने तीनों पुत्रों को बचपन से ही (ब्रह्म) ज्ञान और वैराग्य का उपदेश देकर निवृत्तिमार्गी संन्यासी बना दिया।

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार मदालसा महाराज ऋतुध्वज की पटरानी थी। मदालसा शब्दका अर्थ ही होता है मदः अलसः यया सा मदालसा अर्थात् जिनके कारण मद नीरस हो जाता है वे हैं मदालसा। माँ मदालसा ने यह प्रतिज्ञा की थी कि उनके गर्भ में जो बालक आ जाएगा वह दुबारा किसी दूसरी माता के गर्भ में नहीं आएगा।

इसीलिये जब चतुर्थ बालक ने जन्म लिया तब महारानी उसे भी बचपन से ही जब निवृत्तिमार्ग की शिक्षा देने लगी। उस समय महाराज ने मदालसा से विनती की कि-देवि! पितृ-पितामह के समय से चले आये मेरे इस राज्य को चलाने के लिये तो एक बालक को राजा बनना ही चाहिये, अतः इसको विरक्त मत बनाइये। मदालसाने महाराजकी बात मान ली, लेकिन मदालसा ने कहा कि उसका नाम मैं रखूंगी। उसने इस पुत्र का नाम “अलर्क” रखा।

जिसका अर्थ होता है मदोन्मत्त व्यक्ति या पागल कुत्ता। यह राज्य करेगा इसलिए यह राज के मद में उन्मत्त होगा व प्रजाजनों के कर से प्राप्त होने वाले संसाधनों को अत्यधिक भोगने लगेगा तो उसके पागल कुत्ते की तरह कहीं भोगी हो जाने की संभावना न हो। इसीलिये और अपने चौथे पुत्र को प्रवृत्तिमार्ग के कर्मयोग, भक्तियोग और राजयोग का उपदेश इस प्रकार दिया:

बेटा ! तू धन्य है, जो शत्रुरहित होकर अकेला ही चिरकाल तक इस पृथ्वी का पालन करता रहेगा। पृथ्वी के पालन से तुझे सुखभोगकी प्राप्ति हो और धर्म के फलस्वरूप तुझे अमरत्व मिले।

पर्वों के दिन ब्राह्मणों को भोजन द्वारा तृप्त करना, बंधु-बांधवों की इच्छा पूर्ण करना, अपने हृदय में दूसरों की भलाई का ध्यान रखना और परायी स्त्रियों की ओर कभी मन को न जाने देना । अपने मन में सदा श्रीविष्णुभगवान के किसी अवतार का चिंतन करना, उनके ध्यान से अंतःकरण के काम-क्रोध आदि छहों शत्रुओं को जीतना, ज्ञान के द्वारा माया का निवारण करना और जगत की अनित्यता का विचार करते रहना ।

धन की आय के लिए राजाओं पर विजय प्राप्त करना, यश के लिए धन का सद्व्यय करना परायी निंदा सुनने से डरते रहना तथा विपत्ति के समुद्र में पड़े हुए लोगों का उद्धार करना।

अन्ततोगत्वा मदालसा ने उसे एक उपदेश भी लिखकर अलर्क के हाथ में विराजमान मुद्रिका के भीतर छिपाकर रख दिया, और कहा – “जब कोई बड़ी विपत्ति पड़े,या संकटों से घिर जाओ तब तुम यह उपदेश पढ़ लेना।” अलर्क राजा हुए और उन्होंने गङ्गा-यमुना के संगम पर अपनी अलर्कपुरी नाम की राजधानी बनायी(जो आजकल अरैल के नाम से प्रसिद्ध है।)

किन्तु अलर्क भी राज के मोह में आसक्त हो गया । माता के उपदेश को भूल गया । तीनों भाई आये, खबर कराई कि आपके भ्राता आये हैं ।

अलर्क ने नमस्कार किया और कहा ~ ‘‘आज्ञा ।’’ भ्राताओं ने कहा ~ ‘‘माता की प्रतिज्ञा को सत्य करो, अपने पुत्रों को राज देकर हमारे साथ चलो ।’’ वह हँसने लगा और बोला ~ ‘‘तुम तो फकीर हो ही, मुझे भी फकीर बनाना चाहते हो ? चलो, किले से बाहर हो जाओ ।’’ वे तीनों काशीराज मामा के पास गये।

सेना लेकर आये और अलर्क के राज को घेऱ लिया । जब अलर्क ने किले के उपर चढ़ कर देखा, तो चारों तरफ सेना है । वह उदास हो गया। तब माता का उपदेश याद आया और यंत्र को खोलकर कागज निकाला ।

उसमें माता ने लिखा था ~ हे पुत्र ! तू शुद्ध है, तू बुद्ध है, तू निरंजन है, संसार रूप माया से तू वर्जित अर्थात निर्लिप्त है । संसार स्वप्न के समान प्रतिभासिक सत्ता वाला है । इस मोह रूपी निद्रा से आँखें खोल । यह माता मदालसा के वचन हैं, विचार कर।

जब अलर्क ने इस श्‍लोक का विचार किया, तो ज्ञान हो गया; अलर्क प्रवृत्ति को छोड़कर निवृत्ति के मार्ग में आ गए। और खुले सिर नंगे पांव जैसे था, वैसे ही उठकर चल पड़ा। और ‘‘अहं शुद्धोऽसि, अहं बुद्धोऽसि, अहं निरंजनोऽसि’’ इस प्रकार बोलते हुए को भ्राताओं ने देखा।सेना ने रास्ता दे दिया । जंगल में दत्तात्रेय महाराज से जाकर मिला।

गुरुदेव ने अलर्क को आत्म – ज्ञान का उपदेश दे – देकर शीतल बना दिया। महाराज अलर्क उसी समय राज्य को अपने पुत्र राजा को सुपुर्द करके वन चले गये। इस प्रकार योग्य माता मदालसा ने अपने चारों पुत्रों को ब्रह्मज्ञानी बना दिया। उसके पुत्रों को राज देकर तीनों भ्राताओं ने भी माता की प्रतिज्ञा को सत्य किया।

मदालसा स्वयं ज्ञानी थीं, इसीलिए अपने बच्चों को भी ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी बना दी थीं। उनकी बातो को सुनने से उनको चैतन्य हो गया था। मातापिता स्वयं अपने जीवन में यदि उच्च आदर्श को रूपायित कर सकें, तो उनके उपदेश को सुनने से, उनके बच्चे भी योग्य मनुष्य बन जाते हैं। खोखले उपदेशों से ज्यादा लाभ नहीं होता।

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अधूरी भक्ति

संजय गुप्ता

          एक छोटी सी कहानी

एक छोटे से गाँव में साधू रहता था, वहाँ हर वक्त कान्हा के स्मरण में लगा रहता था, वहाँ कान्हा के लिए रोज_ खीर_चावल बनाता था, और हर दिन उनकें इंतजार में आस लगाए बैठा रहता था, कि मेरे कान्हा कब आयेंगे,
उस साधू की एक बुरी आदत थी, वहाँ गाँव में रहने वाले नीची जाती के लोगो से दूर रहता था, उन्हें आश्रम में नही आने देता था, उसका मानना था, कान्हा इससे नाराज हो जाएंगे, वो तो स्वामी हैं, इन नीच छोटी जाति वालों के, आश्रम में प्रवेश करने से और मुजे दर्शन नही देंगे, इसलिए वहाँ कभी किसी से ठीक से बात नही करता था………..🌳

उसके आश्रम से थोड़ी दूर एक कोड़ी रहता था, वहाँ भी कान्हा का भक्त था, नित्य प्रतिदिन वहाँ उनकी उपासना करता था, और हर वक्त कान्हा की भक्ति में डूबा रहता था,
जब भी साधू, उसके घर के पास से गुजरता तो कोड़ी को कहता नीच तुज जैंसे कोड़ी से कान्हा क्या मिलने आयेंगे, वो तो स्वामी हैं, तुज जैंसे के घर में क्यूं आने लगें भला, और बोलते_बोलते वहाँ आश्रम चले जाता……….🌿

कुछ वर्ष व्यतित हुये, अब साधू को लगने लगा, कान्हा क्यूं मुजे दर्शन नही दे रहे, और साधू उसकी मूर्ति के सामने रोने लगा, और कहने लगा प्रभु एक बार तो मुजे दर्शन दें दो, मैं प्रतिदन आपके लिए खीर_चावल बनाता हूं, एक बार तो आ कर भोज लगा लें, और उदास होकर कान्हा के चरणों में सो गया………🌴

दूसरे दिन एक गरीब दरिद्र, छोटा सा बालक साधू के आश्रम आया, साधू उस वक्त कान्हा को भोग लगाने जा रहा था, उस बालक ने कहा, साधू महराज मुजे कुछ खाने दे दीजिए मुजे जोरो की भूख लगी हैं,
साधू गुस्सें से तिलमिला गया, एक तो दरिद्र और दूसरा कान्हा की भक्ति में विध्न, उसने आव देखा ना ताव, एक पत्थर उठाकर बच्चें को दे मारा, उस दरिद्र बच्चें के सर से खून निकलने लगा, साधू ने कहा भाग यहाँ सें, बच्चा उसके आश्रम से निकल गया,
और जाकर उस कोडी के घर में चला गया, कोड़ी ने उसके रक्त साफ किया पट्टी बाँधी और उस भूखें बच्चें को भोजन दिया, बच्चा भोजन कर के चला गया……….🌱

दूसरे दिन फिर वो बच्चा साधू के आश्रम आया, साधू ने फिर उसे मारा और भागा दिया, फिर वहाँ कोड़ी के घर चला गया, कोड़ी ने फिर उसकी पट्टी बाँधी और खाने को दिया, बच्चा खाना खाकर चला जाता……🌳

वो बच्चा रोज आता, साधू उसे मारता और वो कोड़ी के पास चला जाता,
एक दिन साधू स्नान के लिए जा रहा था, उसे रास्तें पर वही कोड़ी दिखा, साधू ने उसे देखा तो अश्चाचर्य से भर गया, उस कोड़ी का कोड़ गायब हो चुका था, वहाँ बहुत ही सुंदर पुरूष बन चुका था, साधू ने कोड़ी नाम लेकर कहा, तुम कैंसे ठीक हो गयें, कोड़ी ने कहा, मेरे कान्हा की मर्जी, पर साधू को रास नही आया, उसने मन ही मन फैसला किया, पता लगाना पड़ेगा………..🌾

दूसरे दिन फिर वहाँ दरिद्र बच्चा साधू के आश्रम आया, साधू ने फिर उसे मारा, बच्चा जाने लगा, तो साधू उठ खड़ा हुआ और मन ही मन सोचने लगा, मैं इस दरिद्र बच्चें को रोज मारता हूं, ये रोज उस कोड़ी के घर जाता हैं, आखिर चक्कर क्या हैं देखना पड़ेगा, साधू पीछे_पीछे जाने लगता हैं जैसें ही वहाँ कोड़ी की झोपड़ी में पहुंचता हैं, उसकी ऑखें फटी की फटी रह जाती हैं…………🌳

स्वंय तीनो लोक के स्वामी कान्हा बांके बिहारी कोड़ी के घर पर बैंठे हैं और कोड़ी उनकी चोट पर मलहम लगा रहा हैं, और कान्हा जी भिक्षा में मांगी ना जाने कितनो दिनों की भासी रोटी को बड़े चाव से खा रहें हैं,

साधू कान्हा चरणों गिरते कहने लगा, मेरे कान्हा मेरे स्वामी मेरे आराध्य आपने मुज भक्त को दर्शन नही दिये, और इस नीच को दर्शन दे दीये, मुजसे क्या गलती हो गयी, जो आप इस कोड़ी की झोपड़ी में आ गयें, भिख में मांगी भासी रोटी खा ली पर, मैं आपके नित्य प्रतिदिन खीर_चावल बनाता हूं उसे खाने नही खाए, बोलो कान्हा बोलो…….🌾

तब कान्हा जी ने कहा ये साधू, मैं तो रोज तेरे पास खाना मांगने आता था, पर तु ही रोज मुजे पत्थर से मारकर भागा देता था, मुजे भूख लगती थी, और मैं इतना भूखा रहता था, की इस मानव के घर चला आता था, वो जो मुजे प्यार से खिलाता मैं खाकर चला जाता, अब तु ही बता इसमें मेरी क्या गलती,,,,,,,,,,,,
साधू पैर पकड़ कान्हा के रोने लगता हैं और कहता हैं, मुजसे गलती हो गयी, मैं आपको पहचान नही पाया, मुजे माफ कर दिजिए, और फिर कहता हैं, तीनो लोक के स्वामी गरीब भिखारी दरिद्र बच्चा बनकर आप मेरे आश्रम क्यूं आते थे, मैं तो आपको दरिद्र समझकर मारता था, क्यूकि मेरे कान्हा तो स्वामी हैं वो दरिद्र कैसें हो सकते हैं………🌴

कान्हा जी ने कहा,
हे साधू, तुजे किसने कहा मैं सिर्फ महलों में रहता हूं,
तुजे किसने कहा, मैं सिर्फ 56 भोज खाता हूं,
तुजे किसने कहा मैं, नंगे पैर नही आता,
तुजे किसने कहा
मैं दरिद्र नही,
हे साधू, ये समस्त चरचरा मैं ही हूं, धरती आकाश पृथ्वी सब मैं ही हूं, मैं ही हूं महलों का स्वामी, तो मैं ही हूं झोपड़ी का दरिद्र भिखारी, मैं ही हूं जो प्यार और सच्ची श्राध्दा से खिलाने पर बासी रोटी खा लेता हैं और स्वार्थ से खिलाने पर 56 भोग को नही छूता, मैं हर जीव में बसा हूं, तु मुजे अमीर_गरीब में ढूंढता हैं……………🌴

तुजसे अच्छा तो ये कोड़ी हैं जो सिर्फ एक ही बात जानता हैं, ईश्वर हर किसी में निवास करते हैं ना की धनवान में,
कान्हा कहने लगे,
तुने मेरी भक्ति तो की पर अधूरी
और कान्हा अंन्तरधय्न हो जाते हैं…………🌳

साधू उनकी चरण बज्र पकड़ फूटफूटकर रोने लगता हैं और कहता हैं जिसका एक पल पाने के लिए लोग जन्मोंजन्म तप करते है वो मेरी कुटिया में भीख मांगने आता था और मैं मूर्ख दरिद्र समपन्न देखता था,,,,
और कोड़ी के पैर पकड़ कहता हैं,,,,,,
मैंने तो सारी जिंदगी अधूरी भक्ति की,,,,,,
आप मुजे सच्ची भक्ति के पथ पर ले आइयें, मुझे अपना शिष्य बना लीजिए, कोड़ी उसे गले लगा लेता हैं……… 🙏

 "🌾ईश्वर कण_कण में हैं वो भिखारी भी जो आपकी चौखट पर आता हैं ना, वो भी ईश्वर की मर्जी हैं

क्यूकि किसी ने कहा हैं वो भिख लेने बस नही, दुआ देने भी आता हैं, और किसी महान आदमी ने कहा हैं,,,,,
दानें_दानें पर लिखा हैं खाने वालें का नाम

इसलिए कभी किसी का अनादर मत कीजिए🌾”

       🌿 जय बाँकेबिहारी लाल की 🌿

         🙏राधें_राधें🙏
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संजय गुप्ता

“ऐ बाबू लेडीज खड़ी है, आ तुम हट्टा कट्टा हो कर चौड़े हो कर बईठे हो । बहुत सरम का बात है ।” 40 की उम्र में 45 के दिखने वाले ( शारीरिक रूप से ठीक ठाक ) अंकल ने (सारा दिन धूप में भाग दौड़ करने के बाद थके टूटे) नौजवान लड़के को हू ब हू “आदेश” जैसा लग रहा “आग्रह” किया ।
मगर लड़का टस से मस नहीं हो रहा था । एक तो बहुत थका हुआ था दूसरा कुछ अंकल के ज्ञान को नज़रअंदाज़ भी कर रहा था । आखिर में अंकल ने (कानों में हेड फोन ठूंसे हुए) सामने खड़ी लड़की के हक़ के लिए लड़के को ज़ोर से हिलाया “सुनाई नहीं देता तुमको कह रहे हैं लेडिज है, बैईठने दो उनको ।”
एक तो थकान चिढ़ा रही थी ऊपर से अंकल की बकलोली, भला जवान खून इतना सहनशील थोड़े होता है, लड़के ने लगभग चिलाते हुए अपनी भड़ास निकाली “तुम वकील हो इसके ? तब से टें टें करे जा रहे हो । हम साला उम्र का लिहाज कर के बोल नहीं रहे कुछ तो तुम सर पर चढ़ के हगोगे । और काहे दें सीट अपना किसी को? पईसा खरचे हैं, कोनो तुम्हारी तरह एस्टाफ कह कर मुफत में नही चढ़े । ई लड़की अपाहिज है या उसको चक्कर आ रहा है जो सीट छोड़ दें ? साला रोज़ नारी सस्क्तिकरण का नया नारा ले कर जलूस पर जलूस निकलता जा रहा है और तुम हो कि कहते हो लड़की है, कमजोर है, सीट छोड़ दो । और इतना ही तुमको दिक्कत है तो साला तुम छोड़ दो सीट, ऐतना देह ले के अंचार डालोगे । आ हम सब बूझते हैं कि एतना नारीवादी काहे हुए जा रहे हो । अब हमको टोके तो साला सारा नारीबाद हम घुसा देंगे हेने होने ।” लड़के का रूद्र रूप देख अंकल एक कोने में दुबक कर बैठ गए । दोबारा एक जफ्ज़ ना उनके मुंह से निकला ।
दो स्टाॅप बाद बस रुकी । कुछ सवारियाँ उतर गईं कुछ नई चढ़ी । कंडक्टर के चिल्लाने की आवाज़ आई “ऐ बुढ़ी चढ़ना है तो चढ़ो जल्दी एतना टाईम नहीं है हमारे पास ।” बस के पिछले गेट से एक बुढ़ी माई चढ़ी जिसकी देह पूरी तरह पसीने में भीगी थी । उम्र का असर उसके हाँफने में दिख रहा था । खुद का वजन संभालना मुश्किल था ऊपर से इतना बड़ा झोला उठाई थी । उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं था सिवाए उस लड़के के ।
बस के चलते ही झटका लगा जिसने बुढ़ी माई को लगभग गिरा ही दिया था अगर लड़का झट से खड़ा हो कर उसे संभालता नहीं । संभालने के साथ ही लड़के ने उसे अपनी सीट बूढ़ी माई को ये कह कर दे दी “ईहाँ अराम से बईठो माई । आ टिकट मत कटाना हम कटा लेंगे ।” शायद बुढ़ी माई यही दुआ कर रही थी की कोई उसकी टिकट कटा दे इसीलिए बिना दाँतों वाली प्यारी सी मुस्कुराहट बिखेरते हुए खूब आशीर्वाद दिया ।
सामने बैठा अंकल लड़के की तरफ गौर सी देख रहा था । मानों कह रहा हो “हम कहे तो नहीं दिए और अब सीट भी दे दिए और टिकट भी कटा लिए बुढ़ी का ।”
इधर से लड़का भी मुस्कुरा कर अंकल को देख ऐसे देख रहा था जैसे उत्तर दे रहा हो कि “उसे सीट की ज़रूरत नहीं थी लेकिन बूढ़ी माई को ज़रूरत थी, सीट की भी और टिकट की भी ।”
दिखावे से ज़्यादा ज़रूरी है यह महसूस करना कि ज़रूरत किसकी बड़ी है । कई बार एक भिखारी जिस पर तरस खा कर हम पचास रुपए भी दे देते हैं वो पहले से जेब में हज़ार दो हज़ार दबाए बैठा होता है और कई बार कोई अच्छे कपड़े पहना हुआ आदमी खाली जेब लिए परेशान घूम रहा होता है । भेड़ चाल में चलते हुए नहीं बल्कि अपनी समझ से किसी की मदद करना ज़रूरी है । जिसको ज़रूरत होगी वो अपनी ज़रूरत आपको बिना बोले महसूस करा लेगा ।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

संजय गुप्ता

एक अति प्राचीन मंदिर जहाँ स्त्री रूप में होती है हनुमान जी की पूजा
आपको सुनकर आश्चर्य लगेगा, लेकिन दुनिया में एक मंदिर ऐसा भी है जहां हनुमान पुरुष नहीं बल्कि स्त्री के वेश में नजर आते हैं। यह प्राचीन मंदिर बिलासपुर के पास है। हनुमानजी के स्त्री वेश में आने की यह कथा कोई सौ दौ सौ नहीं बल्कि दस हजार साल पुरानी मानी जाती है।

बिलासपुर से 25 कि. मी. दूर एक स्थान है रतनपुर। इसे महामाया नगरी भी कहते हैं। यह देवस्थान पूरे भारत में सबसे अलग है। इसकी मुख्य वजह मां महामाया देवी और गिरजाबंध में स्थित हनुमानजी का मंदिर है। खास बात यह है कि विश्व में हनुमान जी का यह अकेला ऐसा मंदिर है जहां हनुमान नारी स्वरूप में हैं। इस दरबार से कोई निराश नहीं लौटता। भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

पौराणिक और एतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस देवस्थान के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह लगभग दस हजार वर्ष पुराना है। एक दिन रतनपुर के राजा पृथ्वी देवजू क़ा ध्यान अपनी शारीरिक अस्वस्थता की ओर गया। वे विचार करने लगे-मैं इतना बडा राजा हूं मगर किसी काम का नहीं। मुझे कोढ़ का रोग हो गया है। अनेक इलाज करवाया पर कोई दवा काम नहीं आई। इस रोग के रहते न मैं किसी को स्पर्श कर सकता हूं। न ही किसी के साथ रमण कर सकता हूं, इस त्रास भरे जीवन से मर जाना अच्छा है।सोचते सोचते राजा को नींद आ गयी।

राजा ने सपने में देखा कि संकटमोचन हनुमान जी उनके सामने हैं, भेष देवी सा है, पर देवी है नहीं, लंगूर हैं पर पूंछ नहीं जिनके एक हाथ में लड्डू से भरी थाली है तो दूसरे हाथ में राम मुद्रा अंकित है। कानों में भव्य कुंडल हैं। माथे पर सुंदर मुकुट माला। अष्ट सिंगार से युक्त हनुमान जी की दिव्य मंगलमयी मूर्ति ने राजा से एक बात कही। हनुमानजी ने राजा से कहा कि हे राजन् मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूं। तुम्हारा कष्ट अवश्य दूर होगा। तू मंदिर का निर्माण करवा कर उसमें मुझे बैठा। मंदिर के पीछे तालाब खुदवाकर उसमें स्नान कर और मेरी विधिवत् पूजा कर। इससे तुम्हारे शरीर में हुए कोढ़ का नाश हो जाएगा।इसके बाद राजा ने विद्धानों से सलाह ली। उन्होंने राजा को मंदिर बनाने की सलाह दी। राजा ने गिरजाबन्ध में मंदिर बनवाया। जब मंदिर पूरा हुआ तो राजा ने सोचा मूर्ति कहां से लायी जाए। एक रात स्वप्न में फिर हनुमान जी आए और कहा मां महामाया के कुण्ड में मेरी मूर्ति रखी हुई है। तू कुण्ड से उसी मूर्ति को यहां लाकर मंदिर में स्थापित करवा। दूसरे दिन राजा अपने परिजनों और पुरोहितों को साथ देवी महामाया के दरबार में गए। वहां राजा व उनके साथ गए लोगों ने कुण्ड में मूर्ति की तलाश की पर उन्हें मूर्ति नहीं मिली।हताश राजा महल में लौट आए।

संध्या आरती पूजन कर विश्राम करने लगे। मन बैचेन हनुमान जी के दर्शन देकर कुण्ड से मूर्ति लाकर मंदिर में स्थापित करने को कहा है। और कुण्ड में मूर्ति मिली नहीं इसी उधेड़ बुन में राजा को नींद आ गई। नींद का झोंका आते ही सपने में फिर हनुमान जी आ गए और करने लगे- राजा तू हताश न हो मैं वहीं हूं तूने ठीक से तलाश नहीं किया। जाकर वहां घाट में देखो जहां लोग पानी लेते हैं, स्नान करते हैं उसी में मेरी मूर्ति पड़ी हुई है।राजा ने दूसरे दिन जाकर देखा तो सचमुच वह अदभुत मूर्ति उनको घाट में मिल गई। यह वही मूर्ति थी जिसे राजा ने स्वप्न में देखा था। जिसके अंग प्रत्यंग से तेज पुंज की छटा निकल रही थी। अष्ट सिंगार से युक्त मूर्ति के बायें कंधे पर श्री राम लला और दायें पर अनुज लक्ष्मण के स्वरूप विराजमान, दोनों पैरों में निशाचरों दो दबाये हुए। इस अदभुत मूर्ति को देखकर राजा मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए। फिर विधिविधान पूर्वक मूर्ति को मंदिर में लाकर प्रतिष्ठित कर दी और मंदिर के पीछे तालाब खुदवाया जिसका नाम गिरजाबंद रख दिया।मनवांछित फल पाकर राजा ने हनुमान जी से वरदान मांगा कि हे प्रभु, जो यहां दर्शन करने को आये उसका सभी मनोरथ सफल हो। इस तरह राजा प्रृथ्वी देवजू द्वारा बनवाया यह मंदिर भक्तों के कष्ट निवारण का एसा केंद्र हो गया, जहां के प्रति ये आम धारणा है कि हनुमान जी का यह स्वरूप राजा के ही नहीं प्रजा के कष्ट भी दूर करने के लिए स्वयं हनुमानी महाराज ने राजा को प्रेरित करके बनवाया है।

दक्षिण मुखी हनुमान जी की मूर्ति में पाताल लोक़ का चित्रण हैं। रावण के पुत्र अहिरावण का संहार करते हुए उनके बाएं पैर के नीचे अहिरावण और दाये पैर के नीचे कसाई दबा है। हनुमान जी के कंधों पर भगवान राम और लक्ष्मण को बैठाया है। एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में लड्डू से भरी थाली है।

इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 84 किलोमीटर दूर रमई पाट में भी एक ऐसी ही हनुमान प्रतिमा है।

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(((( कबीर का थान ))))

संजय गुप्ता
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भगत जी, आज घर मे खाने को कुछ नही है, आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ शक्कर सब खत्म हो गया है, शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आईयेगा….
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कन्धे पर कपड़े का थान लादे, हाट बाजार जाने की तैयारी करते हुए, भगत कबीर जी को माता लोई जी ने सम्बोधन करते हुए कहा
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देखता हूँ, लोई जी, अगर कोई अच्छा मूल्य मिला, तो निश्चय ही घर मे आज धन धान्य आ जायेगा… कबीर जी ने उत्तर दिया
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सांई जी, अगर अच्छी कीमत ना भी मिले तब भी इस बुने थान को बेच कर कुछ राशन तो ले आना, घर के बड़े बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे पर कमाल ओर कमाली अभी छोटे हैं, उनके लिए तो कुछ ले ही आना
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जैसी मेरे राम की इच्छा, ऐसा कह के कबीर हाट बाजार को चले गए
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बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा..
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वाह सांई, कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है, ठोक भी अच्छी लगाई है, तेरा परिवार बसता रहे, ये फकीर ठंड में कांप कांप कर मर जाएगा, दया के घर मे आ, ओर रब के नाम पर 2 चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे
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दो चादरो में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी ?
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फकीर ने जितना कपड़ा मांगा, इतेफाक से कबीर जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था
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कबीर जी ने थान फकीर को दान कर दिया
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दान करने के बाद, जब घर लौटने लगे तो उनके सामने अपनी माँ नीमा, वृद्ध पिता नीरू, छोटे बच्चे कमाल ओर कमाली के भूखे चेहरे नजर आने लगे
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फिर लोई जी की कही बात…. घर मे खाने की सब सामग्री खत्म है, दाम कम भी मिले तो भी कमाल ओर कमाली के लिए कुछ ले आना
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अब दाम तो क्या ? थान भी दान जा चुका था
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कबीर गंगा तट पर आ गए
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जैसी मेरे राम की इच्छा, जब सारी सृष्टि की सार खुद करता है, अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा
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कबीर अपने राम की बन्दगी में खो गए
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अब भगवान् कहां रुकने वाले थे, कबीर ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द कर दी थी
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अब भगवान् जी ने कबीर जी की झोपड़ी का दरवाजा खटखटाया
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कौन है…! माता लोई जी ने पूछा
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कबीर का घर यहीं है ना ? भगवान् जी ने पूछा
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हांजी, लेकिन आप कौन ?
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सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी ? जैसे कबीर राम का सेवक, वैसे मैं कबीर का सेवक
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ये राशन का सामान रखवा लो..
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माता लोई जी ने दरवाजा पूरा खोल दिया
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फिर इतना राशन घर मे उतरना शुरू हुआ कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह कम पड़ गई
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इतना सामान, कबीर जी ने भेजा ? मुझे नही लगता
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हाँ भगतानी, आज कबीर का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है
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जो कबीर का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया..!
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जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है..!!
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जगह और बना, सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में
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शाम ढलने लगी थी, रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था
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समान रखवाते रखवाते लोई जी थक चुकी थी, नीरू ओर नीमा घर मे अमीरी आते देख खुश थे,
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कमाल ओर कमाली कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते, कभी गुड़, कभी मेवे देख कर मन ललचाते, झोली भर भर कर मेवे ले कर बैठे उनके बालमन, अभी तक तृप्त नही हुए थे
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कबीर अभी तक घर नही आये थे, सामान आना लगातार जारी था
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आखिर लोई जी ने हाथ जोड़ कर कहा
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सेवक जी, अब बाकी का सामान कबीर जी के आने के बाद ही आप ले आना, हमे उन्हें ढूंढने जाना है, वो अभी तक घर नही आए
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वो तो गंगा किनारे सिमरन कर रहे हैं भगवान् बोले
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नीरू, नीमा, लोई जी, कमाल ओर कमाली को ले गंगा किनारे आ गए कबीर जी को समाधि से उठाया
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सब परिवार को सामने देख, कबीर जी सोचने लगे जरूर ये भूख से बेहाल हो मुझे ढूंढ रहे हैं
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इससे पहले कबीर जी कुछ बोलते.. उनकी माँ नीमा जी बोल पड़ी
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कुछ पैसे बचा लेने थे, अगर थान अच्छे भाव बिक गया था, सारा सामान तूने आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या ?
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कबीर जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए
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फिर लोई जी, माता पिता और बच्चों के खिलते चेहरे देख कर उन्हें एहसास हो गया
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जरूर मेरे राम ने कोई खेल कर दी है
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सच्ची सरकार को आपने थान बेचा, वो तो समान घर मे फैंकने से रुकता ही नही था, पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया,
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उससे मिन्नत कर के रुकवाया, बस कर, बाकी कबीर जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रख्वाएँगे लोई जी ने शिकायत की
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कबीर हँसने लगे और बोले
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लोई जी, वो सरकार है ही ऐसी, जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते है, उसकी बख्शीश कभी भी खत्म नही होती, उस सच्ची सरकार की तरह सदा कायम रहती है….

((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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संजय गुप्ता

इस कारण राजा जनक ने अयोध्या नरेश को सीता के स्वयंवर में नही किया था आमंत्रित??????

राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-संवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक गाय फंसी हुई थी, जो लगभग मरने के कगार पर थी। उसने विचार किया कि गाय तो कुछ देर में मरने वाली ही है तथा कीचड़ में जाने पर मेरे कपड़े तथा जूते खराब हो जाएंगे, अतः उसने गाय के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ गया। जैसे ही वह आगे बढ़ा गाय ने तुरंत दम तोड़ दिया तथा शाप दिया कि जिसके लिए तू जा रहा है, उसे देख नहीं पाएगा, यदि देखेगा तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी।

वह व्यक्ति अपार दुविधा में फंस गया और गौ-शाप से मुक्त होने का विचार करने लगा। ससुराल पहुंचकर वह दरवाजे के बाहर घर की ओर पीठ करके बैठ गया और यह विचार करने लगा कि यदि पत्नी पर नजर पड़ी, तो अनिष्ट नहीं हो जाए। परिवार के अन्य सदस्यों ने उसको घर के अंदर चलने का काफी अनुरोध किया, किंतु वह नहीं गया और न ही रास्ते में घटित घटना के बारे में किसी को बताया।

उसकी पत्नी को जब पता चला, तो उसने कहा कि चलो, मैं ही चलकर उन्हें घर के अंदर लाती हूं। पत्नी ने जब उससे कहा कि आप मेरी ओर देखते क्यों नहीं हो तो भी वह चुप रहा। काफी अनुरोध करने के उपरांत उसने रास्ते का सारा वृतान्त कह सुनाया। पत्नी ने कहा कि मैं भी पतिव्रता स्त्री हूं। ऐसा कैसे हो सकता है। आप मेरी ओर अवश्य देखो। पत्नी की ओर देखते ही उसकी आंखों की रोशनी चली गई और वह गाय के शापवश पत्नी को नहीं देख सका।

पत्नी पति को साथ लेकर राजा जनक के दरबार में गई और सारा कह सुनाया। राजा जनक ने राज्य के सभी विद्वानों को सभा में बुलाकर समस्या बताई और गौ-शाप से निवृत्ति का सटीक उपाय पूछा। सभी विद्वानों ने आपस में मंत्रणा करके एक उपाय सुझाया कि यदि कोई पतिव्रता स्त्री छलनी मेम गंगाजल लाकर उस जल के छींटे इस व्यक्ति की दोनों आंखों पर लगाए, तो गौ-शाप से मुक्ति मिल जाएगी और इसकी आंखों की रोशनी पुनः लौट सकती है।

राजा ने पहले अपने महल के अंदर की रानियों सहित सभी स्त्रियों से पूछा, तो राजा को सभी के पतिव्रता होने में संदेह की सूचना मिली। अब तो राजा जनक चिंतित हो गए। तब उन्होंने आस-पास के सभी राजाओं को सूचना भेजी कि उनके राज्य में यदि कोई पतिव्रता स्त्री है, तो उसे सम्मान सहित राजा जनक के दरबार में भेजा जाए।

जब यह सूचना राजा दशरथ (अयोध्या नरेश) को मिली, तो उसने पहले अपनी सभी रानियों से पूछा। प्रत्येक रानी का यही उत्तर था कि राजमहल तो क्या आप राज्य की किसी भी महिला यहां तक कि झाडू लगाने वाली, जो कि उस समय अपने कार्यों के कारण सबसे निम्न श्रेणी की मानी जाती थी से भी पूछेंगे, तो उसे भी पतिव्रता पाएंगे। राजा दशरथ को इस समय अपने राज्य की महिलाओं पर आश्चर्य हुआ और उसने राज्य की सबसे निम्न मानी जाने वाली सफाई वाली को बुला भेजा और उसके पतिव्रता होने के बारे में पूछा। उस महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी।

तब राजा ने यह दिखाने के लिए कि अयोध्या का राज्य सबसे उत्तम है, उस महिला को ही राज-सम्मान के साथ जनकपुर भेज दिया। राजा जनक ने उस महिला का पूर्ण राजसी ठाठ-बाट से सम्मान किया और उसे समस्या बताई। महिला ने कार्य करने की स्वीकृति दे दी। महिला छलनी लेकर गंगा किनारे गई और प्रार्थना की, ‘हे गंगा माता! यदि मैं पूर्ण पतिव्रता हूं तो गंगाजल की एक बूंद भी नीचे नहीं गिरनी चाहिए।

’ प्रार्थना करके उसने गंगाजल को छलनी में पूरा भर लिया और पाया कि जल की एक बूंद भी नीचे नहीं गिरी। तब उसने यह सोचकर कि यह पवित्र गंगाजल कहीं रास्ते में छलककर नीचे नहीं गिर जाए, उसने थोड़ा-सा गंगाजल नदी में ही गिरा दिया और पानी से भरी छलनी को लेकर राजदरबार में चली आई।

राजा और दरबार में उपस्थित सभी नर-नारी यह दृश्य देक आश्चर्यचकित रह गए तथा उस महिला को ही उस व्यक्ति की आंखों पर छींटे मारने का अनुरोध किया और पूर्ण राज सम्मान देकर काफी पारितोषिक दिया। जब उस महिला ने अपने राज्य को वापस जाने की अनुमति मांगी, तो राजा जनक ने अनुमति देते हुए जिज्ञाा वश उस महिला से उसकी जाति के बारे में पूछा। महिला द्वारा बताए जाने पर, राजा आश्चर्यचकित रह गए।

सीता स्वयंवर के समय यह विचार कर कि जिस राज्य की सफाई करने वाली इतनी पतिव्रता हो सकती है, तो उसका पति कितना शक्तिशाली होगा। यदि राजा दशरथ ने उसी प्रकार के किसी व्यक्ति को स्वयंवर में भेज दिया, तो वह तो धनुष को आसानी से संधान कर सकेगा और कहीं राजकुमारी किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति को न वर ले।

इस वजह से राजा जनक ने अयोध्या नरेश को सीता के स्वयंवर मे निमंत्रण नहीं भेजा। किंतु विधाता की लेखनी को कौन मिटा सकता है। अयोध्या के राजकुमार वन में विचरण करते हुए अपने गुरु के साथ जनकपुर पहुंच ही गए और धनुष तोड़कर श्री राम ने सीता को वर लिया।

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संजय गुप्ता

महाभारत की सात रहस्यमयी व्यक्तियों के जन्म की कथायें!!!!!!!•

महाभारत के हर व्यक्ति या यौद्धा की जन्म कथा विचित्रता लिए हुए है। उस काल में बहुत कम ही ऐसे लोग थे जो सामान्य तरीके से जन्मे हो। अधिकतर के जन्म से जुड़ी कथाएं विचित्र और रहस्यमयी है।

भगवान कृष्ण और अश्‍वत्थामा का जन्म भी रहस्य और विचित्रताओं से भरा हुआ है। इसी तरह और भी कई थे जिनमें से कुछ लोगों के जन्म के रहस्य के बारे में जानिए…

पहली रहस्यमी जन्म कथा विचित्रवीर्य : – विचित्रवीर्य की 2 पत्नियां अम्बिका और अम्बालिका थीं। दोनों को कोई पुत्र नहीं हो रहा था तो सत्यवती के पुत्र वेदव्यास माता की आज्ञा मानकर बोले, ‘माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिए कि वे मेरे सामने से निर्वस्त्र होकर गुजरें जिससे कि उनको गर्भ धारण होगा।’

सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका और फिर छोटी रानी अम्बालिका गई, पर अम्बिका ने उनके तेज से डरकर अपने नेत्र बंद कर लिए जबकि अम्बालिका वेदव्यास को देखकर भय से पीली पड़ गई। वेदव्यास लौटकर माता से बोले, ‘माता अम्बिका को बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किंतु नेत्र बंद करने के दोष के कारण वह अंधा होगा जबकि अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र पैदा होगा।’

यह जानकर के माता सत्यवती ने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जाकर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी बिना किसी संकोच के वेदव्यास के सामने से गुजरी। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आकर कहा, ‘माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदांत में पारंगत अत्यंत नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।’ इतना कहकर वेदव्यास तपस्या करने चले गए।

अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और दासी से विदुर का जन्म हुआ। तीनों ही ऋषि वेदव्यास की संतान थी। अब आप सोचिए इन्हीं 2 पुत्रों में से एक धृतराष्ट्र के यहां जब कोई पुत्र नहीं हुआ तो वेदव्यास की कृपा से ही 99 पुत्र और 1 पुत्री का जन्म हुआ।

दूसरी रहस्यमी जन्म कथा पाण्डु पुत्र : – महाभारत के आदिपर्व के अनुसार एक दिन राजा पांडु आखेट के लिए निकलते हैं। जंगल में दूर से देखने पर उनको एक हिरण दिखाई देता है। वे उसे एक तीर से मार देते हैं। वह हिरण एक ऋषि निकलते हैं तो अपनी पत्नी के साथ मैथुनरत थे। वे ऋषि मरते वक्त पांडु को शाप देते हैं कि तुम भी मेरी तरह मरोगे, जब तुम मैथुनरत रहोगे। इस शाप के भय से पांडु अपना राज्य अपने भाई धृतराष्ट्र को सौंपकर अपनी पत्नियों कुंती और माद्री के साथ जंगल चले जाते हैं।

जंगल में वे संन्यासियों का जीवन जीने लगते हैं, लेकिन पांडु इस बात से दुखी रहते हैं कि उनकी कोई संतान नहीं है और वे कुंती को समझाने का प्रयत्न करते हैं कि उसे किसी ऋषि के साथ समागम करके संतान उत्पन्न करनी चाहिए।

लाख समझाने के बाद तब कुंति मंत्र शक्ति के बल पर एक-एक कर 3 देवताओं का आह्वान कर 3 पुत्रों को जन्म देती है। धर्मराज से युधिष्टिर, इंद्र से अर्जुन, पवनदेव से भीम को जन्म देती है वहीं इसी मंत्र शक्ति के बदल पर माद्री ने भी अश्विन कुमारों का आह्वान कर नकुल और सहदेव को जन्म दिया। इसका मतलब यह कि पांडु पुत्र असल में पांडु पुत्र नहीं थे। उसी तरह कुंति अपनी कुंवारी अवस्था में सूर्यदेव का आह्‍वान कर कर्ण को जन्म देती है इस तरह कुंति के 4 और माद्री के 2 पुत्र मिलाकर कुल 6 पु‍त्र होते हैं।

तीसरी रहस्यमी जन्म कथा कौरवों का जन्म एक रहस्य : – कौरवों को कौन नहीं जानता। धृतराष्ट्र और गांधारी के 99 पुत्र और एक पुत्री थीं जिन्हें कौरव कहा जाता था। कुरु वंश के होने के कारण ये कौरव कहलाए। सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। गांधारी जब गर्भवती थी, तब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास किया था जिसके चलते युयुत्सु नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह कौरव सौ हो गए। युयुत्सु एन वक्त पर कौरवों की सेना को छोड़कर पांडवों की सेना में शामिल हो गया था।

गांधारी ने वेदव्यास से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर किया। गर्भ धारण कर लेने के पश्चात भी दो वर्ष व्यतीत हो गए, किंतु गांधारी के कोई भी संतान उत्पन्न नहीं हुई। इस पर क्रोधवश गांधारी ने अपने पेट पर जोर से मुक्के का प्रहार किया जिससे उसका गर्भ गिर गया।

वेदव्यास ने इस घटना को तत्काल ही जान लिया। वे गांधारी के पास आकर बोले- ‘गांधारी! तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र ही सौ कुंड तैयार करवाओ और उनमें घृत (घी) भरवा दो।’

वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से निकले मांस पिण्ड पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिससे उस पिण्ड के अंगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गए। वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गांधारी के बनवाए हुए सौ कुंडों में रखवा दिया और उन कुंडों को दो वर्ष पश्चात खोलने का आदेश देकर अपने आश्रम चले गए। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुंड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। फिर उन कुंडों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दु:शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ।

चौथी रहस्यमी जन्म कथा द्रौपदी की जन्मकथा : – कहते हैं कि द्रौपदी का जन्म महाराज द्रुपद के यहां यज्ञकुण्ड से हुआ था इसीलिए उनका एक नाम यज्ञसेनी भी है। श्याम वर्ण होने के कारण उन्हें कृष्णा, अज्ञातकाल में इत्र बेचने के कारण सैरंध्री कहा जाने लगा। पांचों पांडवों की पत्नी होने के कारण लोग उन्हें पांचाली भी कहते थे।

पांडवों द्वारा इनसे जन्मे पांच पुत्र (क्रमशः प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ती, शतानीक व श्रुतकर्मा) उप-पांडव नाम से विख्यात थे।

जब द्रोणाचार्य ने बदले की भावना से गुरुदक्षिणा में पांडवों से द्रुपद राजा को बंदी बनाकर लाने का कहा तो पांडवों ने ऐसा ही किया। राजा द्रुपद को अपमानित महसूस करना पड़ा जिसके चलते वे जंगल चले गए जहां उनकी भेंट दो मुनिकुमारों याज और उपयाज से हुई।

उन्होंने उनसे पूछा की द्रोणाचार्य को मारने का कोई उपाय है तो मुनिकुमारों ने कहा कि आप यज्ञ का आयोजन कीजिए। द्रुपद ने ऐसा ही किया और उनके यज्ञ से अग्निदेव प्रकट हुए जिन्होंने एक शक्तिशाली पुत्र दिया जो संपूर्ण आयुध और कवच युक्त था। फिर उन्होंने एक पुत्री दी जो श्यामला रंग की थी। उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के संहार और कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है। बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया। यही कृष्णा द्रुपद पुत्री होने के कारण द्रौपदी कहलाई।

पांचवीं रहस्यमी जन्म कथा – कृपाचार्य की जन्मकथा : गौतम ऋषि के पुत्र शरद्वान और शरद्वान के पुत्र कृपाचार्य महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे और वह जिंदा बच गए 18 महायोद्धाओं में से एक थे। लेकिन उन्हों चिरंजीवी रहने का वरदान भी था।

कृपाचार्य के पिता का नाम था शरद्वान और माता का नाम था नामपदी। नामपदी एक देवकन्या थी। इंद्र ने शरद्वान को साधने से डिगाने के लिए नामपदी को भेजा था, क्योंकि वे शक्तिशाली और धनुर्विद्या में पारंगत थे जिससे इंद्र खतरा महसूस होने लगा था।

देवकन्या नामपदी (जानपदी) के सौंदर्य के प्रभाव से शरद्वान इतने कामपीड़ित हो गए कि उनका वीर्य स्खलित होकर एक सरकंडे पर गिर पड़ा। वह सरकंडा दो भागों में विभक्त हो गया जिसमें से एक भाग से कृप नामक बालक उत्पन्न हुआ और दूसरे भाग से कृपी नामक कन्या उत्पन्न हुई।

शरद्वान-नामपदी ने दोनों बच्चों को जंगल में छोड़ दिया जहां महाराज शांतनु ने इनको देखा और इन पर कृपा करके दोनों का लालन पालन किया जिससे इनके नाम कृप तथा कृपी पड़ गए।

पांडवों और कौरवों के गुरु : कृप भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत हुए। भीष्म ने इन्हीं कृप को पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिए नियुक्त किया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुए।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में ये कौरवों के साथ थे और कौरवों के नष्ट हो जाने पर ये पांडवों के पास आ गए। बाद में इन्होंने परीक्षित को अस्त्रविद्या सिखाई। कृपाचार्य की बहन कृपी का विवाह गुरु द्रोण के साथ हुआ था। कई का पुत्र का नाम था- अश्वत्थामा।

छठी रहस्यमी जन्म कथा द्रोणाचार्य : – महर्षि भारद्वाज मुनि का वीर्य किसी द्रोणी (यज्ञकलश अथवा पर्वत की गुफा) में स्खलित होने से जिस पुत्र का जन्म हुआ, उसे द्रोण कहा गया। ऐसे भी ‍उल्लेख है कि भारद्वाज ने गंगा में स्नान करती घृताची को देखा और उसे देखकर वे आसक्त हो गए जिसके कारण उनका वीर्य स्खलन हो गया जिसे उन्होंने द्रोण (यज्ञकलश) में रख दिया। बाद में उससे उत्पन्न बालक द्रोण कहलाया। द्रोण का जन्म उत्तरांचल की राजधानी देहरादून में बताया जाता है, जिसे हम देहराद्रोण (मिट्टी का सकोरा) भी कहते थे।

द्रोणाचार्य संसार के श्रेष्ठ धनुर्धर थे। द्रोण अपने पिता भारद्वाज मुनि के आश्रम में ही रहते हुये चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में पारंगत हो गए थे। द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहिन कृपि से हुआ था जिससे उनको एक ‍पुत्र मिला जिसका नाम अश्वत्थामा था। अश्वत्थामा के जन्म की कथा भी बड़ी विचित्र बताई जाती है।

सातवीं रहस्यमी विचित्र कथा…

महाभारत के आदिपर्व में उल्लेख है कि वैशंपायनजी जन्मेजय को कथाक्रम में बताते हैं कि इक्ष्वाकु वंश में महाभिष नामक राजा थे। उन्होंने अश्वमेध और राजसूय यज्ञ करके स्वर्ग प्राप्त किया। एक दिन सभी देवता आदि ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित हुए। वायु ने श्रीगंगाजी के वस्त्र को उनके शरीर से खिसका दिया। तब सबों ने आंखें नीची कर लीं, किंतु महाभिष उन्हें देखते रहे। तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि तुम मृत्युलोक जाओ। जिस गंगा को तुम देखते रहे हो, वह तुम्हारा अप्रिय करेगी। इस प्रकार उनका जन्म प्रतीक के पुत्र शांतनु के रूप में हुआ।

प्रतापी राजा प्रतीप के बाद उनके पुत्र शांतनु हस्तिनापुर के राजा हुए। पुत्र की कामना से शांतनु के पिता महाराजा प्रतीप गंगा के किनारे तपस्या कर रहे थे। उनके तप, रूप और सौंदर्य पर मोहित होकर गंगा उनकी दाहिनी जंघा पर आकर बैठ गईं और कहने लगीं, ‘राजन! मैं आपसे विवाह करना चाहती हूं। मैं जह्नु ऋषि की पुत्री गंगा हूं।’

इस पर राजा प्रतीप ने कहा, ‘गंगे! तुम मेरी दाहिनी जंघा पर बैठी हो, जबकि पत्नी को तो वामांगी होना चाहिए, दाहिनी जंघा तो पुत्र का प्रतीक है अतः मैं तुम्हें अपने पुत्रवधू के रूप में स्वीकार कर सकता हूं।’ यह सुनकर गंगा वहां से चली गईं।’

जब महाराज प्रतीप को पुत्र की प्राप्ति हुई तो उन्होंने उसका नाम शांतनु रखा और इसी शांतनु से गंगा का विवाह हुआ। गंगा से उन्हें 8 पुत्र मिले जिसमें से 7 को गंगा नदी में बहा दिया गया और 8वें पुत्र को पाला-पोसा। उनके 8वें पुत्र का नाम देवव्रत था। यह देवव्रत ही आगे चलकर भीष्म कहलाया।

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संजय गुप्ता

महाकुम्भ मेले के बड़े जमावड़े के पीछे क्या विज्ञान है? और इस विज्ञान का महत्व क्या है?

*माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥

भावार्थ:-माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं, तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं॥

प्रत्येक हिंदू त्यौहार और अनुष्ठान के पीछे एक कहानी है। वे उत्साह के साथ मनाए जाते हैं, साथ ही साथ मजबूत वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और विचारशील आधार भी शामिल होते हैं। ये सभी गुण एक उत्सव मनाने या अनुष्ठान करने का एक कारण बनाते हैं। ये रीति-रिवाजों को एक आध्यात्मिक मार्ग पर एक व्यक्ति का नेतृत्व करने के लिए बनाया जाता है जहां वे पूर्ण मनोवैज्ञानिक संतुलन, कायाकल्प और विश्राम का अनुभव कर सकते हैं।

महा कुंभ की तिथियां ऐसे वैज्ञानिक तरीकों के अनुसार निर्धारित की जाती हैं जिनमें मुख्य रूप से ग्रहों की स्थिति शामिल होती है। जब बृहस्पति वृषभ में प्रवेश करता है, तो यह सूर्य और चंद्र मकर में होता है, ये परिवर्तन पानी और हवा को प्रभावित करते हैं जिसके परिणामस्वरूप प्रयाग (इलाहाबाद) पूरी तरह से सकारात्मक वातावरण होता है !

केवल उस दिव्य स्थान पर उपस्थित होने और गंगा में पवित्र डुबकी लेने से आत्मा को आध्यात्मिक रूप से उजागर किया जा सकता है, जिससे वे अपने जीवन को शारीरिक और भावनात्मक रूप से तनाव मुक्त कर सकती हैं। विभिन्न ग्रह सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा को पूरा करने के लिए अलग-अलग समय लेते हैं।

बृहस्पति इस परिक्रमा को लगभग ग्यारह साल और दस महीने (लगभग बारह वर्ष) में पूरा करता है, जो इस तथ्य को इंगित करता है कि प्रत्येक बारह वर्षों में बृहस्पति एक ही स्थिति में चलता है। यह परिक्रमा पूर्ण कुम्भ के आयोजन की उत्तरदायी है जो प्रत्येक बारह वर्षों में एक बार आयोजित होता है।

विभिन्न ज्योतिषीय संकेतों में सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की स्थिति उस जगह को निर्धारित करती है जहां पर कुंभ आयोजित किया जाएगा।

कुंभ मेला हरिद्वार में आयोजित होता है जब सूर्य मेष में प्रवेश करता है और बृहस्पति कुंभ में प्रवेश करता है। ज्योतिषीय गणना की एक और श्रृंखला के अनुसार, मेष राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर और मकर राशि में सूर्य और चंद्रमा के प्रवेश होने पर, त्यौहार अमावस्या के दिन प्रयाग (इलाहाबाद) में होता है।

प्रयाग की तरह पवित्र शहर नासिक और उज्जैन के लिए भी ज्योतिषीय विकल्प उपलब्ध हैं। जब बृहस्पति सिंह में प्रवेश करता है और जब बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा अमावस्या पर कर्क में प्रवेश करते हैं, तो कुंभ नासिक में गोदावरी नदी पर तट पर आयोजित होते हैं।

उज्जैन पृथ्वी पर सबसे प्राचीन और पवित्र स्थानों में से एक है और कुंभ मेला यहां क्षिप्रा नदी के तट पर होता है जब सूर्य मेष राशि में होता है और बृहस्पति सिंह राशि में होता है। उज्जैन मे कुंभ मेला को अक्सर सिमस्थ कुंभ कहा जाता है।

इसके अलावा, जब बृहस्पति तुला में प्रवेश करता है और सूर्य और चंद्रमा कार्तिक अमावस्या (हिंदू कैलेंडर के अनुसार वर्ष का 8 वां महीना) पर एक साथ होते है तो पवित्र मोक्ष दायक (सभी बंधनों से मुक्त) कुंभ मेला उज्जैन में आयोजित होता है। विश्वास का यह शानदार उत्सव हरिद्वार से हर तीन वर्षों के अंतराल में शुरू होता है, जिसके बाद प्रयाग (इलाहाबाद), नासिक और उज्जैन में मेला मनाया जाता है।

हरिद्वार में कुंभ मेला के तीन वर्षों के बाद, प्रयाग में मनाया जाता है और प्रयाग और नासिक में कुंभ के बीच तीन साल का अंतर होता है।

एक वाक्य मे अगर वैज्ञानिक तौर पर समझा जाए तो, यह विभिन्न ग्रहों की स्थिति है जो हमारे ग्रह पृथ्वी के पानी और हवा पर प्रभाव डालती हैं। कुछ ग्रहों की स्थिति से, किसी विशेष समय के दौरान उस विशेष स्थान की सकारात्मक ऊर्जा का स्तर, अपने चरम पर बढ़ता हैं, जिससे आध्यात्मिक विकास और ज्ञान के लिए एक आदर्श वातावरण प्राप्त होता है!

रामचरितमानस में कुंभ मेले का वर्णन,,,,,

*माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥

भावार्थ:-माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं, तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं॥।

*पूजहिं माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥

भावार्थ:-श्री वेणीमाधवजी के चरणकमलों को पूजते हैं और अक्षयवट का स्पर्श कर उनके शरीर पुलकित होते हैं। भरद्वाजजी का आश्रम बहुत ही पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भाने वाला है॥

*तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥

भावार्थ:-तीर्थराज प्रयाग में जो स्नान करने जाते हैं, उन ऋषि-मुनियों का समाज वहाँ (भरद्वाज के आश्रम में) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्‌ के गुणों की कथाएँ कहते हैं॥

*ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
ककहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥

भावार्थ:-ब्रह्म का निरूपण, धर्म का विधान और तत्त्वों के विभाग का वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्य से युक्त भगवान्‌ की भक्ति का कथन करते हैं॥

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संजय गुप्ता

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*🙏दोस्तों के लिये एक दस साल का लड़का अपने दादा जी के पास आकर कहता है कि क्या आप मुझे सफल होने के कुछ टिप्स दे सकते हैं दादा जी ने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया, और बिना कुछ कहे लड़के का हाथ पकड़ा और उसे करीब की पौधशाला में ले गए।वहां जाकर दादा जी ने दो छोटे-छोटे पौधे खरीदे और घर वापस आ गए।

वापस लौट कर उन्होंने एक पौधा घर के बाहर लगा दिया और एक पौधा गमले में लगा कर घर के अन्दर रख दिया।क्या लगता है तुम्हे,इन दोनों पौधों में से भविष्य में कौन सा पौधा अधिक सफल होगा? दादा जी ने लड़के से पूछा।
लड़का कुछ क्षणों तक सोचता रहा और फिर बोला,घर के अन्दर वाला पौधा ज्यादा सफल होगा क्योंकि वो हर एक खतरे से सुरक्षित है।जबकि बाहर वाले पौधे को तेज धूप,आंधी पानी,और जानवरों से भी खतरा है।

दादाजी बोले,चलो देखते हैं आगे क्या होता है !और वह अखबार उठा कर पढने लगे।कुछ दिन बाद छुट्टियाँ ख़तम हो गयीं और वो लड़का वापस शहर चला गया।इस बीच दादाजी दोनों पौधों पर बराबर ध्यान देते रहे और समय बीतता गया।

३-४ साल बाद एक बार फिर वो अपने पेरेंट्स के साथ गाँव घूमने आया और अपने दादा जी को देखते ही बोला, दादा जी, पिछली बार मैं आपसे successful होने के कुछ टिप्स मांगे थे पर आपने तो कुछ बताया ही नहीं पर इस बार आपको ज़रूर कुछ बताना होगा।

दादा जी मुस्कुराये और लडके को उस जगह ले गए जहाँ उन्होंने गमले में पौधा लगाया था।अब वह पौधा एक खूबसूरत पेड़ में बदल चुका था।लड़का बोला, देखा दादाजी मैंने कहा था न कि ये वाला पौधा ज्यादा सफल होगा।

अरे,पहले बाहर वाले पौधे का हाल भी तो देख लो और ये कहते हुए दादाजी लड़के को बाहर ले गए।बाहर एक विशाल वृक्ष गर्व से खड़ा था! उसकी शाखाएं दूर तक फैलीं थीं और उसकी छाँव में खड़े राहगीर आराम से बातें कर रहे थे।

अब बताओ कौन सा पौधा ज्यादा सफल हुआ? दादा जी ने पूछा।“ब..ब बाहर वाला!लेकिन ये कैसे संभव है,बाहर तो उसे न जाने कितने खतरों का सामना करना पड़ा होगा फिर भी? लड़का आश्चर्य से बोला।

दादा जी मुस्कुराए और बोले, हाँ, लेकिन challenges face करने के अपने rewards भी तो हैं, बाहर वाले पेड़ के पास आज़ादी थी कि वो अपनी जड़े जितनी चाहे उतनी फैला ले, आपनी शाखाओं से आसमान को छू ले।

बेटे,इस बात को याद रखो और तुम जो भी करोगे उसमे सफल होगे।

अगर तुम जीवन भर safe option choose करते हो तो तुम कभी भी उतना नहीं grow कर पाओगे जितनी तुम्हारी क्षमता है,

लेकिन अगर तुम तमाम खतरों के बावजूद इस दुनिया का सामना करने के लिए तैयार रहते हो तो तुम्हारे लिए कोई भी लक्ष्य हासिल करना असम्भव नहीं है!

लड़के ने लम्बी सांस ली और उस विशाल वृक्ष की तरफ देखने लगा…वो दादा जी की बात समझ चुका था, आज उसे सफलता का एक बहुत बड़ा सबक मिल चुका था!**✍🙏🙏🌹🌹🙏🙏🌹🌹🙏🙏🌹🌹🙏🙏🌹🌹

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संजय गुप्ता

कौन थे राजा वीर विक्रमादित्य….. ????

बड़े ही शर्म की बात है कि महाराज विक्रमदित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था, और स्वर्णिम काल लाया था!!

उज्जैन के राजा थे गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी , सबसे बड़ी लड़की थी मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा वीर विक्रमादित्य…
बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी , जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द , आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली ,

आज ये देश और यहाँ की संस्कृति केवल विक्रमादित्य के कारण अस्तित्व में है।
अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था
भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था, देश में बौद्ध और जैन हो गए थे।

रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया
विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया।

विक्रमादित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा, जिसमे भारत का इतिहास है।
अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे।
हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे,
उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , राज अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को दे दिया , वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म बचा हुआ है, हमारी संस्कृति बची हुई है।

महाराज विक्रमादित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया
उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है
विक्रमादित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यापारी सोने के वजन से खरीदते थे।

भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमादित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे , आप गूगल इमेज कर विक्रमादित्य के सोने के सिक्के देख सकते हैं।

हिन्दू कैलंडर भी विक्रमादित्य का स्थापित किया हुआ है
आज जो भी ज्योतिष गणना है जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार , तिथीयाँ , राशि , नक्षत्र , गोचर आदि उन्ही की रचना है , वे बहुत ही पराक्रमी , बलशाली और बुद्धिमान राजा थे ।
कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे ,
विक्रमादित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय , राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था।

विक्रमादित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी

पर बड़े दुःख की बात है की भारत के सबसे महानतम राजा के बारे में कांग्रेसी और वामपंथीयों का इतिहास भारत की जनता को शून्य ज्ञान देता है, कृपया आप शेयर तो करें ताकि देश जान सके कि सोने की चिड़िया वाला देश का राजा कौन था ?