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निओ दिप

“अरण्य में राम”


[ यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी मंतव्यों वाला लेख है। सुधी पाठकों से आग्रह होगा कि इसके एक-एक शब्द को मननपूर्वक पढ़ें और इसे अधिकाधिक पाठकों तक प्रसारित करें ]

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“वाल्मीकि रामायण” के “अरण्यकांड” में श्रीराम के वनगमन का वर्णन है।

अयोध्या से चलकर श्रीराम ने तमसा नदी लांघी थी और सिंगरौर में “केवट-प्रसंग” हुआ था। कुरई गांव होते हुए वे प्रयाग पहुंचे थे। फिर वे चित्रकूट पहुंचे, जहां “भरत-मिलाप” हुआ। सतना में अत्रि ऋषि के आश्रम के समीप “रामवन” में ठहरे। फिर “दंडक वन” चले गए, जो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों को मिलकर बना था। भद्राचलम से वे नासिक में “पंचवटी” पहुंचे। यहीं सर्वतीर्थ में खर-दूषण का वध किया। यहीं “सीता-हरण” हुआ। यहीं पर जटायु का अंतिम संस्कार किया गया था। यहां से सीता-शोध में पर्णशाला गए, तुंगभद्रा और कावेरी नदी घाटी में शबरी के जूठे बेर खाए, ऋष्यमूक पर्वत पर बाली का वध किया, हनुमान और सुग्रीव के साथ मिलकर “वानर-सेना” बनाई और रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना करने के बाद “धनुषकोटि” से लंका की ओर प्रस्थान कर गए।

यह समूचा राम गमन पथ है।

श्रीराम एक पौराणिक चरित्र हैं या ऐतिहासिक व्यक्तित्व, इसके पक्ष-विपक्ष में तर्क-वितर्कों की एक लम्बी शृंखला प्रवाहित होती रही है।

1990 के दशक में सीताराम गोयल और रामस्वरूप की अगुवाई में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए हिंदू मंदिरों पर शोध किया गया था। दो खंडों में प्रकाशित उस शोध में एक विशेष अध्याय रामजन्मभूमि पर भी था, जिसमें ठोस साक्ष्यों के साथ यह सिद्ध किया गया था कि प्रभु श्रीराम का जन्म उसी स्थल पर हुआ था, जहां रामलला विराजित हैं।

लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में चलाए गए “रामजन्मभूमि आंदोलन” के पीछे सीताराम गोयल और रामस्वरूप के द्वारा दिए गए तर्कों का अत्यंत महत्व था, क्योंकि रोमिला थापर जैसी धुरंधर मार्क्सवादी इतिहासकार भी इनके द्वारा दिए गए तर्कों के सम्मुख निरुत्तर हो गई थीं और दो खंडों में प्रकाशित उस पुस्तक में उस प्रश्नोत्तरी को भी सम्मिलित किया गया है।

जब श्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो यह विचार उनके मन में आया कि “रामजन्मभूमि” की तरह वह समस्त भूभाग भी भारतवासियों के लिए आस्था का केंद्र है, जहां-जहां वनगमन के दौरान प्रभु श्रीराम के चरण पड़े।

यह प्रस्ताव रखा गया कि देश के समस्य राज्य अपने-अपने क्षेत्रों में पड़ने वाले “राम वनगमन पथ” का शोध करें और एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें।

इसके बाद केंद्र में सरकार बदल गई और अटलजी विस्मृति के अंतरालों में खो गए।

जिन-जिन राज्यों में भाजपा सरकार नहीं थी, वहां पर इस प्रस्ताव की अनदेखी कर दी गई। किंतु भाजपा सरकारों वाले राज्यों ने अटलजी के इस प्रस्ताव को उनके प्रधानमंत्री नहीं रहने के बावजूद स्वीकार किया और इस प्रकार “राम वनगमन पथ” के शोध का यज्ञ आरम्भ हुआ।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष 2007 में चित्रकूट से “राम वनगमन पथ” में पड़ने वाली मध्यप्रदेश की भूमि के शोध की घोषणा की। यह शोध चित्रकूट से लेकर अमरकंटक तक दंडकारण्य वनक्षेत्र में निष्पादित होना था।

ऐसा माना जाता है कि अपनी वनगमन यात्रा के दौरान प्रभु श्रीराम मध्यप्रदेश के सतना, रीवा, पन्ना, छतरपुर, शहडोल और अनूपपुर ज़िलों से होकर गुज़रे थे। शोधदल का ध्यान इन्हीं ज़िलों पर केंद्रित था।

वर्ष 2008 में संस्कृति विभाग ने एक बैठक बुलाई, जिसमें 11 विद्वानों की समिति बनाकर “राम वनगमन पथ” योजना पर शोध का काम आरम्भ किया गया। तत्कालीन धर्मस्व न्यास मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा को इस योजना का प्रभार सौंपा गया।

दो चरणों में चले सर्वेक्षण के तहत इतिहास, पुरातत्व और रामकथा के इन 11 विद्वानों ने मार्च 2009 से दिसंबर 2010 तक “राम वनगमन पथ” का शोध किया।

इस दल में नर्मदायात्री अमृतलाल वेगड़ सहित अवधेश प्रताप पांडे, भोपाल के रामचंद्र तिवारी, उज्जैन के बालकृष्ण शर्मा, रामसुमन पांडे, ग्वालियर के आर. सी. शर्मा प्रभृति विद्वान सम्मिलित थे।

भोपाल के ही प्रो. आनंद कुमार सिंह (Aanand Singh) भी उस 11 सदस्यीय दल में सम्मिलित थे। वे तंत्र, ज्योतिष और साहित्य के गहन अध्येता हैं। वे अपने साथ “वाल्मीकि रामायण” की प्रति ले गए थे और वाल्मीकि द्वारा वर्णित भूक्षेत्र का मिलान करते जा रहे थे।

उन्होंने आश्चर्यजनक समानताएं पाईं। कई स्थानों पर तो हूबहू वही दृश्यचित्र, जो कि वाल्मीकि द्वारा वर्णित था।

मई 2018 में प्रकाशित प्रो. आनंद कुमार सिंह के एक लेख में यह पंक्तियां आती हैं-

“वाल्मीकि ने यद्यपि उत्तम पुरुष में यात्राओं का वर्णन नहीं किया, परंतु क्या राम का वनपथ आदि कवि ने घूमा न होगा? राम की यात्रा भारतीय मानस की यात्रा है। लोक-मानस से जुड़ाव और लोक-संवेदना की पहचान इस लोक-गाथा में यों ही नहीं समाहित हो सकी है। आज से नौ-दस साल पहले “राम वनगमन पथ” की खोज करते समय मैं वाल्मीकि के रामायण वर्णनों का मिलान करते हुए सतना जिले में शरभंग मुनि के आश्रम की खोज में भटक रहा था। तब मुझे लगा कि बिना इन दिशाओं में पैर पटके कोई इन बातों को हूबहू कैसे लिख सकता है! वाल्मीकि का “अरण्यकांड” आदिकवि का निजी वनपथ ही है, जो राम के माध्यम से जी उठा है।”

वाल्मीकि के अनुसार भगवान राम ने मध्यप्रदेश में सतना के जंगलों में बहुत समय बिताया था। लगभग दस-ग्यारह सालों का प्रवास। शरभंग ऋषि के आश्रम में ही उन्हें सुतीक्ष्ण मुनि के बारे में पता चला, जो उनके आगमन की बाट ही जोह रहे थे।

वर्ष 2010 में दूसरी सर्वेक्षण यात्रा के बाद शोधदल ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सबमिट कर दी।

दुर्योग ही रहा कि उसके बाद किन्हीं कारणों से श्री लक्ष्मीकांत शर्मा अपने पद पर नहीं रहे और वह रिपोर्ट धर्मस्व मंत्रालय की फ़ाइलों में कहीं खोकर रह गई, उस शोध पर फिर कोई कार्य नहीं किया जा सका।

मेरी निजी राय में “राम वनगमन पथ” के शोध सम्बंधी वह फ़ाइल एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।

उसका महत्व सीताराम गोयल और रामस्वरूप द्वारा 1990 के दशक में दो खंडों में लिखे गए उस ग्रंथ से कम नहीं है, जिसमें हिंदू धर्मस्थलों और विशेषकर रामजन्मभूमि के सम्बंध में प्रामाणिक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे।

मैं केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार से अनुरोध करूंगा कि उस रिपोर्ट को प्रकाश में लाकर शोध में प्राप्त हुई निष्पत्तियों पर आगे काम किया जाए और लोकवृत्त में श्रीराम के यात्रापथ के सम्बंध में सुस्पष्ट साक्ष्यों की स्थापना की जाए।

वामपंथी बंधुओं द्वारा इस प्रकार के किसी भी कार्य को “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” कहकर पुकारा जाएगा, किंतु स्मरण रहे कि यूनान में ज़ीयस देवता के गुह्यस्थल की खोज करने वाले विद्वान “आर्कियोलॉजिस्ट” कहलाकर समादृत होते हैं। यह पुरातत्व का विषय है। भारत-भावना और लोकमानस से इसका गहरा सम्बंध है। इसे प्रकाश में आना ही चाहिए। प्रो. आनंद कुमार सिंह तो अपने अनुभवों के आधार पर पृथक से एक पुस्तक इस विषय पर लिख ही रहे हैं।

किंतु कौन जाने, राज्यसत्ता को यह अवसर फिर मिले ना मिले। उस तक यह संदेश पहुंचाया जाना आवश्यक है।

श्रीरामजानकी की मंगलमूर्ति समस्त चराचर विश्व पर अनुकम्पा करे, यही मंगलकामना। 🙏 अस्तु!

सुशोभित जी से आभार सहित

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अनूप सिन्हा

                                प्रेरक   प्रसंग

  आज गुरू पूर्णिमा है और मैं इस अवसर पर आप सबों के शुभ की कामना करता हूँ ।  मुझे पूरी उम्मीद है कि आज आप अपने गुरु के साथ कुछ समय बिताकर आध्यात्मिक आनन्द का अनुभव किये होंगे । गुरू ही ईश्वर हैं ।  अपने गुरु पर पूर्णरुपेण श्रद्धा रखकर आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ते जाएंँ ।
     वैसे तो मैं इस प्रसंग को पहले आप सबों के बीच प्रस्तुत कर चुका हूँ, लेकिन आज गुरुभक्ति का विषेश और पावन दिन है, अतः इसे एक बार दुबारा आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

एकनिष्ठा

  समर्थ गुरु रामदास स्वामी अपने शिष्यों से अधिक छत्रपति शिवाजी महाराज से प्यार करते थे ।  शिष्य सोचते कि उन्हें शिवाजी से उनके राजा होने के कारण ही अधिक प्रेम है ।
  समर्थ ने शिष्यों का भ्रम दूर करने की सोची ।
  एक दिन वे शिवाजी सहित अपनी शिष्य-मण्डली के साथ जंगल से जा रहे थे कि रात्रि हो गयी ।  उन्होंने समीप की गुफा में जाकर डेरा डाला ।  समर्थ वहाँ लेट गये, किन्तु थोड़ी ही देर में उनके कराहने की आवाज आने लगी ।  शिष्यों ने कराहने का कारण पूछा, तो उन्होंने उदर-शूल बताया ।  अन्य शिष्य तो चुप रहे, किन्तु शिवाजी ने पूछा,  "महाराज ! क्या इसकी कोई दवा नहीं ?"
  समर्थ बोले,  शिवा !  इसका एकमात्र उपाय है सिंहनी का ताजा दूध, किन्तु वह तो दुष्प्राय है ।"
  शिवाजी ने सुना, तो गुरूदेव का तुम्बा उठाकर सिंहनी की खोज में निकल पड़े ।  कुछ ही देर में उन्हें एक गुफा में सिंहनी की गर्जना सुनाई दी ।  वे वहाँ गये, तो उन्हें वहाँ एक सिंहनी दो शावकों के साथ दिखाई दी ।  वे पास गये और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोले,  "माँ ! मैं तुम्हें मारने या इन शावकों को लेने नहीं आया हूँ ।  गुरूदेव अस्वस्थ हैं और उन्हें तुम्हारे दूध की आवश्यकता है ।  उनके स्वस्थ होने पर यदि तुम चाहो, तो मुझे खा सकती हो ।"
  सिंहनी उनके पैरों को चाटने लगी ।  मौका देख शिवाजी ने उसकी कोख में हाथ डाल, दूध निचोड़कर तुम्बा भर लिया और प्रणाम करके वे स्वामीजी के पास पहुँचे ।  दूध लाया देख समर्थ बोले,  "धन्य हो शिवा ! आखिर दूध ले ही आये ।  अरे, मैं तो तुम सबकी परीक्षा ले रहा था ।  उदर-शूल तो बहाना मात्र था ।  तुम उसमें सफल हुए ।  शिवा !  तुम्हारे जैसा एकनिष्ठ शिष्य हो, तो क्या उसके गुरु को कभी पीड़ा रह सकती है ?"
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ज्योति अग्रवाल

🍁🌿🍁🌿#करवा_चौथ🌿🍁🌿🍁🌿

🌿🍁🌿🍁🌿करवा चौथ
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आज पूर्णा का पहला करवा चौथ था. सास मायाजी सुबह से कितनी ही बार उसे बता गई थीं इस व्रत की विधि. “पूर्णा आज सिंदूर लगा लेना व बिछुए भी पहन लेना. चूड़ियां तो पूरे हाथों में होनी चाहिए…” मायाजी कहती जा रही थीं और पूर्णा सोच रही थी कि सारी हिदायतें स़िर्फ उसी के लिए. रविवार तो पूरे सप्ताह में एक ही होता है, पर उसे सुबह उठना पड़ा. मयंक अभी तक सो रहे थे.
बचपन से वह ये सब देख रही थी. सारे नियम-क़ायदे स़िर्फ लड़कियों के लिए. पहले अच्छे पति के लिए व्रत रखो. भाई के लिए भी व्रत रखो. और जब शादी हो जाए, तो उसके बाद भी पति के लिए व्रत रखो. जैसे स्त्री के रूप में पैदा होना कोई पाप हो गया. इसीलिए पूरी उम्र एक न एक व्रत रखकर पाप की सज़ा भुगतना है. इस नाटक से उसे हमेशा से चिढ़ थी.
बचपन में मां और मोहल्ले की सभी औरतों का बनाव-शृंगार देखती थी, तो सोचती थी कि कितना अच्छा लगता होगा. जब भी मां व्रत करके पापा के पैर छूती, तो वो सोचा करती थी कि पैर तो पापा को छूने चाहिए. आख़िर मां ने उनके लिए व्रत रखा था. वह हमेशा सोचती थी कि ये सब ग़लत है. वह विरोध भी करती थी, पर उसकी आवाज़ दब जाती थी. तब से लेकर आज तक, जब वो एक मल्टीनेशनल कंपनी के बड़े पद पर पहुंच गई है, कहने के लिए समाज काफ़ी आधुनिक हो गया है. करवा चौथ का व्यापारीकरण हो गया है, पर सोच वही पुरानी है.
“पूर्णा, तैयार नहीं हुई क्या? सब आ गई हैं.” तभी मायाजी की आवाज़ सुनाई दी. जाने से पहले पूर्णा ने अपने आपको आईने में देखा, एक गहरी सांस ली और चल पड़ी.
कमरे में इतनी सारी आंखें उसे अजीब नज़रों से देख रही थीं. मायाजी को देख लग रहा था, जैसे उसे खा ही जाएंगी.
“अरे, ये क्या? इतना सादा सूट, साड़ी क्यों नहीं पहनी? सिंदूर भी नहीं लगाया? क्या चाहती हो? बोलो, मेरे बेटे की ज़रा भी चिंता नहीं तुम्हें? या मेरा अपमान करना चाहती हो.” मायाजी ने लगभग चीखते हुए कहा. पूर्णा जानती थी कि ये सब होगा और वो तैयार भी थी.
“मम्मीजी, मैं आपका बहुत सम्मान करती हूं. आपको पता है कि मैं साड़ी में सहज महसूस नहीं करती. मैं मयंक से भी बहुत प्यार करती हूं, पर मेरे सिंदूर लगाने से मयंक का हित कैसे हो सकता है, ये मेरी समझ में नहीं आता.” पूर्णा के इतना कहते ही पड़ोस की सरला आंटी बोलीं, “छोड़िए बहनजी, इसका तो दिमाग़ ख़राब है. व्रत रखा है या वो भी नहीं रखा.”
“रखा है आंटी, बिल्कुल रखा है.” पूर्णा ने बस इतना कहा. वो बात और बढ़ाना नहीं चाहती थी. मायाजी की ख़ुशी के लिए उसने उपवास रखने का सोच लिया था.
सभी महिलाएं पूजा-पाठ में लग गईं. उसके बाद गाना-बजाना शुरू हो गया. मयंक अपने किसी दोस्त से मिलने चले गए थे. पूर्णा तो वहीं थी, उसे तो रहना ही था. उसकी कई सहेलियां ब्यूटीपार्लर से सज-धज कर आई थीं. कहने के लिए वो सब काफ़ी पढ़ी-लिखी थीं, बड़े पद पर भी थीं, पर वे सब यहां भूखी-प्यासी पति की लंबी उम्र के लिए सात भाइयों की बहन की कहानी सुन रही थीं.
किसकी बेटी का चक्कर किसके साथ है?, अपनी-अपनी बहुओं की बुराई, बेटों की कमाई की डींगें मारना… उम्रदराज़ महिलाओं में इस तरह की चर्चाएं हो रही थीं.
मेरे बच्चे को उसके बच्चे ने मारा, मेरा बच्चा पढ़ने में उसके बच्चे से अच्छा, गहने कितने के बनवाए?, पति का प्रमोशन, देर से घर आना, सासू मां की बातें… महिलाओं का एक ग्रुप इस तरह की बातों में लगा हुआ था.
और उसकी सहेलियां, उनकी बातें भी कुछ कम न थीं, जैसे- पति से क्या गिफ्ट लेना है?, ऑफिस में कौन कितना बड़ा चापलूस है, सास को ताना मारने के तरी़के, पति को कैसे अपने मनमुताबिक़ चलाना है… आदि. और तो और, वे दूसरी सभी महिलाओं को पिछड़ा कहकर हंस भी रही थीं.
पूर्णा को वहां बैठना भारी लग रहा था. इन सभी ने व्रत रखा था. क्या किसी कथा में इन्हें ये नहीं बताया गया कि सच्ची पूजा आत्मा की पवित्रता है. जब दम ज़्यादा घुटने लगा, तो वो वहां से उठकर अंदर कमरे में चली गई.
“दीदी, अरे ओ दीदी… ” तभी छोटू की तेज़ आवाज़ सुनाई दी. अभी तो कमरे में आई थी वो इतनी जल्दी क्या हो गया?
“क्या हुआ छोटू?” पूर्णा ने कमरे से बाहर आते हुए पूछा.
छोटू हांफता हुआ बोला, “दीदी, नमन भइया का फोन आया था. वो बोल रहे थे कि मयंक भइया का एक्सीडेंट हो गया है. वे उन्हें लेकर सिटी हॉस्पिटल जा रहे हैं. आप भी वहां पहुंचो.” सुनते ही पूर्णा को चक्कर आ गया. उसके हाथ-पैर फूलने लगे. लेकिन ये वक़्त धैर्य खोने का नहीं था. ससुरजी अपनी बहन को मिलने गए थे. शाम को आनेवाले थे. समय बिल्कुल नहीं था. उसने छोटू को सारी बात
सास-ससुर को बताने के लिए कहा और ख़ुद तुरंत निकल गई. रास्ते में उसने अपने मां-पापा को भी फोन कर दिया. जब वह अस्पताल पहुंची, तब डॉक्टर ऑपरेशन की तैयारी कर रहे थे. वह सबसे पहले मयंक को देखना चाहती थी. लेकिन डॉक्टर ने उसे बीच में ही
रोक दिया.
“अच्छा आप इनकी पत्नी हैं. देखिए बहुत ख़ून बह चुका है. हमें तुरंत ऑपरेशन करना होगा. इनका ब्लड ग्रुप ओ पॉज़ीटिव है. आप ब्लड का इंतज़ाम करें. वैसे हम भी कोशिश कर रहे हैं.”
पूर्णा ने तुरंत उसके सारे दोस्तों को फोन कर दिया. डॉक्टर से भी ऑपरेशन शुरू करने को कहा. लेकिन ऑपरेशन शुरू करने के लिए दो बॉटल ब्लड की ज़रूरत थी.
पूर्णा ने कुछ सोचा और बोली, “नमनजी, मैंने सुबह से कुछ खाया नहीं है, मेरे लिए ज़रा एक टोस्ट और चाय ला दीजिए.”
फिर डॉक्टर की तरफ़ घूमकर बोली, “सर, मेरा ब्लड ग्रुप ओ पॉज़ीटिव है. प्लीज़, मेरा ब्लड ले लीजिए और जल्द से जल्द इलाज शुरू कीजिए.” ब्लड देने के लिए कुछ न कुछ खाना बहुत ज़रूरी था.
थोड़ी देर बाद ऑपरेशन शुरू हो गया. बाकी ब्लड का इंतज़ाम थोड़ी देर में हो गया. अब सब बैठकर ऑपरेशन ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे थे. दो घंटे बीत चुके थे.
नमन ने कैंटीन से सबके लिए चाय मंगवा ली थी. सारे दोस्त चाय पीने लगे. पूर्णा अभी चाय का एक घूंट भरने ही जा रही थी कि…
“हां खाओ-पीओ, मेरे इकलौते बेटे को मौत के मुंह में… तेरी वजह से आज उसकी ये हालत है. तूने…” बस इतना ही कह पाईं मायाजी, फिर फूट-फूट कर रोने लगीं.
“बताओ, करवा चौथ का व्रत पति की लंबी उम्र के लिए निर्जल रखकर करते हैं और ये महारानी चाय-बिस्किट उड़ा रही हैं. सिंदूर जितना लंबा होगा, पति की उम्र उतनी ही लंबी होती है और ये तो सिंदूर लगाती ही नहीं.” सरला आंटी फुसफुसाई. उन्हें तो अच्छा मौक़ा मिला था. रमा आंटी भी उनके पीछे ही थीं.
“और क्या? नियम-क़ायदे ऐसे ही थोड़े बनाए जाते हैं. अब व्रत भंग किया है, तो भुगतना ही पड़ेगा. हे करवा माता, माफ़ कर देना इस मूर्ख लड़की को. इस बेचारी मां की सुन ले. कितने उपवास किए हैं, इस बेचारी ने.” ये सभी शायद इसीलिए आई थीं. पूर्णा तो पहले से इतनी परेशान थी, उस पर सरला आंटी की बातों ने उसे और परेशान कर दिया. वह सोचने लगी, ‘अगर सिंदूर लगाने से पति की उम्र लंबी होती है, तो आंटी पूरा शरीर ही सिंदूर से क्यों नहीं रंग लेतीं. क्या वे इतनी लंबी उम्र तक अंकल को झेल नहीं पाएंगी या शायद बेचारे अंकल. ख़ैर…’ पूर्णा ने मायाजी को चुप कराना चाहा, पर वे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं.
“परेशान मत हो पूर्णा, सब ठीक हो जाएगा.” पापा की आवाज़ थी ये. वे और मां पता नहीं कब आकर खड़े हो गए थे. पापा को देखकर नहीं रोक पाई वो ख़ुद को. उनके गले लग रो पड़ी.
“अब क्यों रो रही है मेरे बेटे को…”
“माया चुप रहो, ये अस्पताल है.” ससुरजी की गंभीर आवाज़ से सासू मां चुप हो गईं. तभी डॉक्टर ने आकर कहा, “ऑपरेशन हो गया है. मयंकजी अब ख़तरे से बाहर हैं. थोड़ी देर बाद उन्हें कमरे में ले जाएंगे. आप उनसे वहां मिल लेना.”
लगभग दो सप्ताह तक मयंक अस्पताल में रहे. मायाजी अभी भी शायद उसे ही दुर्घटना का ज़िम्मेदार मान रही थीं. मयंक कई बार बता चुके थे कि दुर्घटना उनकी अपनी लापरवाही से हुई थी. अब पूर्णा कैसे मायाजी को समझाए कि सिंदुर, बिछुआ व चूड़ियों से किसी दुर्घटना को रोका नहीं जा सकता. न ही करवा चौथ लंबी उम्र की गारंटी है.
आज मयंक को अस्पताल से छुट्टी मिलनेवाली थी. पूर्णा सामान पैक कर रही थी. मायाजी मयंक को सूप पिला रही थीं. तभी डॉक्टर आए और मयंक को आगे के लिए हिदायतें देने लगे. मायाजी ने उनको धन्यवाद कहा. इस पर वे बोले, “धन्यवाद की हक़दार तो आपकी बहू है. उस दिन जब मयंक को ख़ून की ज़रूरत थी, तो पहले दो बॉटल ख़ून पूर्णा ने ही दिया था. थैंक गॉड! उसने समझदारी से काम लिया. उपवास से ज़रूरी मयंक की जान बचाना था. आप और मयंक काफ़ी लकी हैं. ओके मयंक अपना ध्यान रखना. हां, पूर्णा ज़रा मुझसे जाते समय मिल लेना.”
घर आने पर पूर्णा को सास से बात करने का समय ही नहीं मिल पाया था. मिलने आनेवालों का तो जैसे मेला लग गया था.
सास की सारी सहेलियां आई थीं आज. सरला आंटी, रमा आंटी, अंजू आंटी और उनके साथ दो-चार और थीं. पूर्णा ने उन्हें चाय-नाश्ता दिया और वहां से हट गई. वे सब उसे अजीब नज़रों से घूर रही थीं. जाते समय उसे अंजू आंटी की फुसफुसाहट साफ़ सुनाई दी, “देख ज़रा, अभी भी सुहाग की कोई निशानी नहीं लगाई है. कैसी है ये…”
सभी आंटियों को छोड़ने जब मायाजी बाहर गईं, तो मौक़ा देखकर सरला बोली, “अरे, तेरी बहू तो अभी भी वैसे ही घूम रही है. उसको कहा नहीं क्या? अरी सुन एक व्रत और आ रहा है. उसको करने से…”
सरला की बात को बीच में रोकते हुए मायाजी ने बोलना शुरू किया, जो वे इतने दिनों से सोच रही थीं. “पूर्णा बिल्कुल सही है. सारे नियम हम महिलाओं के लिए क्यों? विवाह के बंधन में तो स्त्री-पुरुष दोनों बंधते हैं. फिर सुहाग चिह्न स्त्रियों के लिए क्यों? पुरुषों के लिए कोई सुहाग चिह्न क्यों नहीं? ये सब स़िर्फ व स़िर्फ शृंगार के सामान हैं, जो स्त्री इसे चाहे पहने, जो न चाहे न पहने. बिल्कुल लिपस्टिक की तरह. तुम्हें अच्छा लगता है लगाना, तुम लगाती हो. मुझे नहीं लगता. मैं नहीं लगाती.
जहां तक करवा चौथ की बात है, तो यह एक त्योहार है और हमें इसे एक त्योहार की तरह ही मनाना चाहिए. जो उपवास रखना चाहे रखे, जो न चाहे वो न रखे. किसी व्रत से अगर उम्र लंबी होती, तो हमारे देश में शायद कोई महिला विधवा ही नहीं होती. पता है सरला, सबसे ज़रूरी है हम स्त्रियों का अपने आप से प्यार करना. सबसे प्यार करते-करते हम अपने आप से प्यार करना ही भूल जाते हैं. मुझे गर्व है अपनी पूर्णा पर.” सब को चकित छोड़कर मायाजी जब पलटीं, तो सामने पूर्णा खड़ी थी. उसकी आंखों में ढेर सारा प्यार व सम्मान था और साथ में आंसू भी थे, पर ख़ुशी के. किसी को कुछ कहने की ज़रूरत न थी, दोनों गले लग गईं. उसे अंदर आने को कहकर मायाजी अंदर चली गईं.
पूर्णा आसमान में देख रही थी. चांद चमक रहा था. यही था उसके करवा चौथ का चांद, जिसने रिश्तों पर पड़े हुए ग्रहण को हटा दिया था. “पूर्णा जल्दी अंदर आ जा बेटे, सब एक साथ डिनर करेंगे आज.” तभी मायाजी की आवाज़ आई. विचारों को झटककर उसने घर के अंदर प्रवेश किया. सामने सब मुस्कुराते हुए चेहरे से उसका स्वागत कर रहे थे. आज सही मायने में उसका गृह-प्रवेश हुआ था.

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बेताल पच्चीसी तीसरी कहानी पुण्य किसका ?

वर्धमान नगर में रूपसेन नाम का राजा राज करता था। एक दिन उसके यहाँ वीरवर नाम का एक राजपूत नौकरी के लिए आया। राजा ने उससे पूछा कि उसे ख़र्च के लिए क्या चाहिए तो उसने जवाब दिया, हज़ार तोले सोना। सुनकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। राजा ने पूछा, “तुम्हारे साथ कौन-कौन है?” उसने जवाब दिया, “मेरी स्त्री, बेटा और बेटी।” राजा को और भी अचम्भा हुआ। आख़िर चार जने इतने धन का क्या करेंगे? फिर भी उसने उसकी बात मान ली।उस दिन से वीरवर रोज हज़ार तोले सोना भण्डारी से लेकर अपने घर आता। उसमें से आधा ब्राह्मणों में बाँट देता, बाकी के दो हिस्से करके एक मेहमानों, वैरागियों और संन्यासियों को देता और दूसरे से भोजन बनवाकर पहले ग़रीबों को खिलाता, उसके बाद जो बचता, उसे स्त्री-बच्चों को खिलाता, आप खाता। काम यह था कि शाम होते ही ढाल-तलवार लेकर राज के पलंग की चौकीदारी करता। राजा को जब कभी रात को ज़रूरत होती, वह हाज़िर रहता।
एक आधी रात के समय राजा को मरघट की ओर से किसी के रोने की आवाज़ आयी। उसने वीरवर को पुकारा तो वह आ गया। राजा ने कहा, “जाओ, पता लगाकर आओ कि इतनी रात गये यह कौन रो रहा है ओर क्यों रो रहा है?”
वीरवर तत्काल वहाँ से चल दिया। मरघट में जाकर देखता क्या है कि सिर से पाँव तक एक स्त्री गहनों से लदी कभी नाचती है, कभी कूदती है और सिर पीट-पीटकर रोती है। लेकिन उसकी आँखों से एक बूँद आँसू की नहीं निकलती। वीरवर ने पूछा, “तुम कौन हो? क्यों रोती हो?”
उसने कहा, “मैं राज-लक्ष्मी हूँ। रोती इसलिए हूँ कि राजा विक्रम के घर में खोटे काम होते हैं, इसलिए वहाँ दरिद्रता का डेरा पड़ने वाला है। मैं वहाँ से चली जाऊँगी और राजा दु:खी होकर एक महीने में मर जायेगा।”
सुनकर वीरवर ने पूछा, “इससे बचने का कोई उपाय है!”
स्त्री बोली, “हाँ, है। यहाँ से पूरब में एक योजन पर एक देवी का मन्दिर है। अगर तुम उस देवी पर अपने बेटे का शीश चढ़ा दो तो विपदा टल सकती है। फिर राजा सौ बरस तक बेखटके राज करेगा।”
वीरवर घर आया और अपनी स्त्री को जगाकर सब हाल कहा। स्त्री ने बेटे को जगाया, बेटी भी जाग पड़ी। जब बालक ने बात सुनी तो वह खुश होकर बोला, “आप मेरा शीश काटकर ज़रूर चढ़ा दें। एक तो आपकी आज्ञा, दूसरे स्वामी का काम, तीसरे यह देह देवता पर चढ़े, इससे बढ़कर बात और क्या होगी! आप जल्दी करें।”
वीरवर ने अपनी स्त्री से कहा, “अब तुम बताओ।”
स्त्री बोली, “स्त्री का धर्म पति की सेवा करने में है।”
निदान, चारों जने देवी के मन्दिर में पहुँचे। वीरवर ने हाथ जोड़कर कहा, “हे देवी, मैं अपने बेटे की बलि देता हूँ। मेरे राजा की सौ बरस की उम्र हो।”
इतना कहकर उसने इतने ज़ोर से खांडा मारा कि लड़के का शीश धड़ से अलग हो गया। भाई का यह हाल देख कर बहन ने भी खांडे से अपना सिर अलग कर डाला। बेटा-बेटी चले गये तो दु:खी माँ ने भी उन्हीं का रास्ता पकड़ा और अपनी गर्दन काट दी। वीरवर ने सोचा कि घर में कोई नहीं रहा तो मैं ही जीकर क्या करूँगा। उसने भी अपना सिर काट डाला। राजा को जब यह मालूम हुआ तो वह वहाँ आया। उसे बड़ा दु:ख हुआ कि उसके लिए चार प्राणियों की जान चली गयी। वह सोचने लगा कि ऐसा राज करने से धिक्कार है! यह सोच उसने तलवार उठा ली और जैसे ही अपना सिर काटने को हुआ कि देवी ने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया। बोली, “राजन्, मैं तेरे साहस से प्रसन्न हूँ। तू जो वर माँगेगा, सो दूँगी।”
राजा ने कहा, “देवी, तुम प्रसन्न हो तो इन चारों को जिन्दा कर   दो।”
देवी ने अमृत छिड़ककर उन चारों को फिर से जिन्दा कर  दिया।
इतना कहकर बेताल बोला, राजा, बताओ, सबसे ज्यादा पुण्य किसका हुआ?”
राजा बोला, “राजा का।”
बेताल ने पूछा, “क्यों?”
राजा ने कहा, “इसलिए कि स्वामी के लिए चाकर का प्राण देना धर्म है; लेकिन चाकर के लिए राजा का राजपाट को छोड़, जान को तिनके के समान समझकर देने को तैयार हो जाना बहुत बड़ी बात है।”
यह सुन बेताल ग़ायब हो गया और पेड़ पर जा लटका। बेचारा राजा दौड़ा-दौड़ा वहाँ पहुँचा ओर उसे फिर पकड़कर लाया तो बोताल ने चौथी कहानी कही।
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बेताल पच्चीसी दूसरी कहानी पति कौन ?

यमुना के किनारे धर्मस्थान नामक एक नगर था। उस नगर में गणाधिप नाम का राजा राज करता था। उसी में केशव नाम का एक ब्राह्मण भी रहता था। ब्राह्मण यमुना के तट पर जप-तप किया करता था। उसकी एक पुत्री थी, जिसका नाम मालती था। वह बड़ी रूपवती थी। जब वह ब्याह के योग्य हुई तो उसके माता, पिता और भाई को चिन्ता हुई। संयोग से एक दिन जब ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया था और भाई पढ़ने गया था, तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया। लड़की की माँ ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी लडकी का ब्याह करूँगी। होनहार की बात कि उधर ब्राह्मण पिता को भी एक दूसरा लड़का मिल गया और उसने उस लड़के को भी यही वचन दे दिया। उधर ब्राह्मण का लड़का जहाँ पढ़ने गया था, वहाँ वह एक लड़के से यही वादा कर आया।

कुछ समय बाद बाप-बेटे घर में इकट्ठे हुए तो देखते क्या हैं कि वहाँ एक तीसरा लड़का और मौजूद है। दो उनके साथ आये थे। अब क्या हो? ब्राह्मण, उसका लड़का और ब्राह्मणी बड़े सोच में पड़े। दैवयोग से हुआ क्या कि लड़की को साँप ने काट लिया और वह मर गयी। उसके बाप, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भाग-दौड़ की, ज़हर झाड़नेवालों को बुलाया, पर कोई नतीजा न निकला। सब अपनी-अपनी करके चले गये।दु:खी होकर वे उस लड़की को श्मशान में ले गये और क्रिया-कर्म कर आये। तीनों लड़कों में से एक ने तो उसकी हड्डियाँ चुन लीं और फकीर बनकर जंगल में चला गया। दूसरे ने राख की गठरी बाँधी और वहीं झोपड़ी डालकर रहने लगा। तीसरा योगी होकर देश-देश घुमने लगा।

एक दिन की बात है, वह तीसरा लड़का घूमते-घामते किसी नगर में पहुँचा और एक ब्राह्मणी के घर भोजन करने बैठा। जैसे ही उस घर की ब्राह्मणी भोजन परोसने आयी कि उसके छोटे लड़के ने उसका आँचल पकड़ लिया। ब्राह्मणी से अपना आँचल छुड़ता नहीं था। ब्राह्मणी को बड़ा गुस्सा आया। उसने अपने लड़के को झिड़का, मारा-पीटा, फिर भी वह न माना तो ब्राह्मणी ने उसे उठाकर जलते चूल्हें में पटक दिया। लड़का जलकर राख हो गया। ब्राह्मण बिना भोजन किये ही उठ खड़ा हुआ। घरवालों ने बहुतेरा कहा, पर वह भोजन करने के लिए राजी न हुआ। उसने कहा जिस घर में ऐसी राक्षसी हो, उसमें मैं भोजन नहीं कर सकता।

इतना सुनकर वह आदमी भीतर गया और संजीवनी विद्या की पोथी लाकर एक मन्त्र पढ़ा। जलकर राख हो चुका लड़का फिर से जीवित हो गया।

यह देखकर ब्राह्मण सोचने लगा कि अगर यह पोथी मेरे हाथ पड़ जाये तो मैं भी उस लड़की को फिर से जिला सकता हूँ। इसके बाद उसने भोजन किया और वहीं ठहर गया। जब रात को सब खा-पीकर सो गये तो वह ब्राह्मण चुपचाप वह पोथी लेकर चल दिया। जिस स्थान पर उस लड़की को जलाया गया था, वहाँ जाकर उसने देखा कि दूसरे लड़के वहाँ बैठे बातें कर रहे हैं। इस ब्राह्मण के यह कहने पर कि उसे संजीवनी विद्या की पोथी मिल गयी है और वह मन्त्र पढ़कर लड़की को जिला सकता है, उन दोनों ने हड्डियाँ और राख निकाली। ब्राह्मण ने जैसे ही मंत्र पढ़ा, वह लड़की जी उठी। अब तीनों उसके पीछे आपस में झगड़ने लगे।

इतना कहकर बेताल बोला, “राजा, बताओ कि वह लड़की किसकी स्त्री होनी चाहिए?”

राजा ने जवाब दिया, “जो वहाँ कुटिया बनाकर रहा, उसकी।”

बेताल ने पूछा, “क्यों?”

राजा बोला, “जिसने हड्डियाँ रखीं, वह तो उसके बेटे के बराबर हुआ। जिसने विद्या सीखकर जीवन-दान दिया, वह बाप के बराबर हुआ। जो राख लेकर रमा रहा, वही उसकी हक़दार है।”

राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा को फिर लौटना पड़ा और जब वह उसे लेकर चला तो बेताल ने तीसरी कहानी सुनायी।

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अग्नि यम शनि और काल


राजा विक्रम ने हठ नहीं छोड़ा । वह श्मशान की ओर चल पड़ा ।
जब उसने शव को कंधे पर रखा तो शव में स्थित वेताल की निद्रा खुल गई !
राजन्! तुम इतना श्रम करते हो, किसलिए? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि परिणाम का विचार किए बिना किए जानेवाले शुभ कर्म भी न केवल अपने लिए बल्कि कभी-कभी संसार के लिए भी अंतहीन शोक और विषाद की श्रंखला बन जाते हैं । तुम्हारे श्रम के परिहार के लिए भविष्य-पुराण की यह कथा सुनो । आज से लगभग दो सहस्र वर्षों बाद की कथा है यह । तुम्हें पता है कि हम लोग (प्रेतात्माएँ) तिर्यक्-दृष्टि संपन्न होते हैं अर्थात् कभी तो हम अतीत को भविष्य की तरह समझने की भूल कर बैठते हैं तो कभी भविष्य को अतीत की तरह समझने की भूल । काल का प्रवाह विलक्षण है, यद्यपि तुम मनुष्यों के लिए यह सीधा अतीत से भविष्य की दिशा में गतिशील प्रतीत होता है, किन्तु काल की अपनी कोई स्वतंत्र गति न होते हुए भी यह प्राणिमात्र के प्रारब्ध के अनुसार यह उसे अनेक विचित्र गतियाँ करता हुआ प्रतीत होता है । वैसे तुम्हारे समय में तो इसका आरंभ हुए कुछ सौ वर्ष बीते हैं । लो कथा सुनो :
“अवज्ञप्ति देश में किसी नृप को इच्छा हुई कि वह मृत्यु के बाद भी इसी शरीर में चिरकाल तक रहता हुआ संसार के सुखों का भोग करता रहे । उसने पुरोहित को इसके लिए आवश्यक कर्मकाण्ड करने का निर्देश दिया । यद्यपि पुरोहित जानता था कि इस प्रकार से राजा की मृत्यु होने के बाद भी वह प्रेत-रूप में दीर्घ-काल तक ऐसा कर सकता है लेकिन यह काल भी उसकी तिर्यक्-दृष्टि से युक्त होने के कारण उसे कभी बहुत अल्प तो कभी बहुत दीर्घ अनुभव हो सकता है और अंततः कभी न कभी भौतिक समय में उसके कक्ष के ध्वस्त होने से समाप्त भी होना ही है, फिर भी उसने तन्त्र के अभिचार-प्रयोग से राजा की इच्छा  पूर्ण करने का निश्चय किया । क्योंकि ऐसा करने में ही उसे उसके कुल का भविष्य भी सुरक्षित और सुखपूर्ण प्रतीत हुआ ।
राजा की मृत्यु के बाद योजना के अनुरूप उसके शव-गृह के कक्ष पर विशाल पर्यामित (पिरामिड) की संकल्पना की गई जो चार स्तरों (फलकों) से चार महाभूतों से होनेवाले किसी भी संभावित संकट से उसकी सुरक्षा कर सके । उसके अपने कक्ष में वह अपने राज्य और प्रजा और उपभोगों की अक्षरशः वैसी ही यथावत् कल्पना कर सकता था जैसा कि उसने जीवन में अपने शासन में किया था । वस्तुतः ययाति ने ही उस राजा के रूप में नया जन्म प्राप्त किया था, लेकिन यह उसे विस्मृत हो चुका था ।
इसलिए भी उसके राज्य का नाम अवज्ञप्ति (ईजिप्ट) था । ईजिप्ट का एक अर्थ ययाति भी है ।
सहस्रों वर्षों तक वहाँ उनके उन पर्यामित (पिरामिड) में रहते हुए किसी समय पृथ्वी पर घूमते अपराध-कर्म करनेवाले कुछ दस्युओं के मन में विचार उठा कि इस विशाल संरचना (ढाँचा) के भीतर अवश्य ही रत्नखचित स्वर्ण-आभूषणों का कोई ख़ज़ाना छिपाकर रखा गया होगा । इस विचार से प्रेरित होकर उन्होंने उसके फलकों को तोड़ना प्रारंभ किया । क्रमशः अनेक वर्षों बाद अनेक स्थानों से उसकी भित्तियाँ टूट-फूट जाने से प्रकृति और भौतिक चार महाभूतों ने शीघ्र ही उस आवास को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया और अवज्ञप्ति (ईजिप्ट) की वह मिश्रित सभ्यता धीरे-धीरे काल का ग्रास हो गई!  किंतु उस नृप की तथा उसके अनेक वंशजों की आत्माएँ जिनके शवों को वहाँ भूमि में दबाया गया था, वे वहाँ से त्रस्त होकर इधर-उधर भटकने लगीं । उनके घोष से आकृष्ट हुए लोगों ने उन्हें घोष की संज्ञा दी जो धीरे-धीरे गोश, गॉड, गॉट्ट में बदलकर उनका पूज्य और आराध्य बन गया ।
जैसे दिव् > दीव्यते से देवता का उद्भव होता है, वैसे ही घुष् > घुष्यते, घोषयति, उद्घोष से इन प्रेतात्माओं का जो नित्य अतृप्त रहती हैं । देवताओं को उनका अंश यज्ञ के माध्यम से हव्य से प्रदान किया जाता है और वे देवता पृथ्वी पर मनुष्यों और संसार के लिए शुभप्रद होते हैं । पितरों का तर्पण भी इसी प्रकार जल में तिल आदि के पिण्ड के दान से होता है । इन प्रेतात्माओं का किसी विधि से तर्पण न होने से वे येन-केन-प्रकारेण मनुष्यों से बल-पूर्वक भोग ग्रहण करने लगीं ।
मनुष्यों ने भी तब तब मृतकों के दाह-संस्कार और तर्पण आदि का अनुष्ठान करना त्याग दिया और उन्हें भूमिगत कक्षों में सुरक्षित रखने लगे । इस आशा में कि किसी ’न्याय के दिन’ उन्हें अपने कक्षों ’शैयाओं’ से उठाया और उनके आराध्य के सामने न्याय के लिए प्रस्तुत किया जाएगा ।
राजा! तुम्हें मेरी कथा कपोल-कल्पना लग रही होगी किंतु मेरी तिर्यक्-दृष्टि के अनुसार यही सत्य है । तुम्हें स्मरण होगा, शनि ने तुम्हें कैसी पीड़ा दी थी? और शनि की तीसरी दृष्टि भी तिर्यक्-दृष्टि होती है यह भी तुम्हें विदित ही होगा ! शनि, शुक्र और राहु की त्रयी से हम भी संचालित और शासित हैं यह भी तुम्हें पता ही होगा । शुक्र भोग के कारक हैं, शनि विषाद और निराशा के, राहु , केतु के रूप में द्यूत अर्थत् कैतव के, पुनः शुक्र दैत्य-गुरु हैं । यह संयोजन आकस्मिक नहीं है । अवज्ञप्ति के काल से मृतकों को भूमि में नश् > प्रणश् > फ़ना करने अर्थात् दफ़नाने की परंपरा शुरु हुई जिससे मृतकों की मरणोत्तर सद्गति अवरुद्ध हो गई । इससे पहले एक प्रकार की अंत्येष्टि में मृतक की देह को अग्नि में समर्पित किया जाता था, अग्नि से प्रार्थना की जाती थी कि वह मृतक को पितृस् लोक में ले जाए । मृत्यु के बाद वैसे तो मनुष्य यम को प्राप्त होता है किंतु विधिपूर्वक वैसा न होने पर वह अधोलोक में चला जाता है । इसी परंपरा का प्रचलन बाद में भी होता रहा है । शैव सिद्धान्त की दृष्टि से यह युक्तिसंगत है किंतु वैदिक-विधि से भिन्न भी है । शिव पतितपावन हैं और उनके भक्तों के लिए तो यह सर्वथा उपयुक्त है, किंतु उनका भक्त न होने पर मृतक ऐसी गति को प्राप्त होता है जिसका कोई उपचार नहीं है । परंतु वह भी औपचारिक है । तुम्हें यह काल भी बहुत लंबा लग रहा है न!
अवज्ञप्ति से प्रारंभ यह क्रम ऐसा ही दुर्बोध और रहस्यमय है ।
राजन् इस कथा का इसलिए क्या अंत हुआ यह तो मैं तुमसे नहीं कहूँगा क्योंकि अभी तुम्हारे लिए उसका समय नहीं है, किंतु मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो कि तुम्हारे काल के पैमाने (प्रमाण) पर, इस कथा का क्या संभावित अंत होगा? मुझे पता है, तुम्हें भी शायद ज्ञात होगा कि अवज्ञप्ति (ईजिप्ट) की सभ्यता नष्ट हो चुकी है शिवसंकल्प से उसका अस्तित्व था / है / होता, बनता / मिटता रहता है। यदि जानते हुए भी तुमने उत्तर न दिया तो तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा ।”
वेताल के द्वारा प्रश्न किए जाने पर विक्रम ने कहा :
“वेताल यह कथा न तो प्रारंभ हुई न इसका कोई अंत है, यह केवल तुम्हारी वातानुकूलित (वायुतत्वप्रधान) प्रकृति है जो इस सारे प्रपञ्च को तुम्हारे लिए रचती है । और मैं स्वयं भी तुम्हारे लिए ही सही उस प्रपञ्च का एक अंश-मात्र हूँ । काल ही वह प्रपञ्च है और उसका कोई सुनिश्चित अधिष्ठान न होने से अपने अस्तित्व में विद्यमान असंख्य प्राणियों को वह अनंत रूपों में दिखलाई देता है । वे सारे रूप परस्पर सापेक्ष सत्य हैं …।”
राजा का मौन भंग होते ही वेताल ने शक्ति प्राप्त कर स्वयं को उसकी पकड़ से मुक्त किया और उड़ चला !

 

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गुरू का सम्मान


गुरूपूर्णिमा के पावन अवसर पर एक गुऱ और शिष्य की सुंदर और प्रेरणादायक कथा प्रस्तुत है|

Deepak Koli

आप सभी शेयर चेट सदस्यों को गुरू पूर्णिमा की हार्दिक 🌹शुभकामनाएँ 🌹
गुरू का सम्मान

💐 गुरू का सम्मान💐
 गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम में कई शिष्य थे। उनमें अरूणि गुरू का सबसे प्रिय शिष्य था। आश्रम के पास खेती की बहुत ज़मीन थी। खेतों में फसल लहलहा रही थी। एक दिन शाम को एकाएक घनघोर घटा घिर आई और थोडी देर में तेज वर्षा होने लगी। उस समय ज्यादातर शिष्य उठ कर चले गए थे। अरूणि गुरूदेव के पास बैठा था। गुरू धौम्य ने कहा, अरूणि तुम खेतों की तरफ चले जाओ और मेडों की जाँच कर लो। जहाँ कहीं से पानी बह रहा हो और मेड कमजोर हो तो वहाँ मिट्टी डाल कर ठीक कर देना। अरूणि चला गया। कई जगह मेड के ऊपर से पानी बह रहा था। उसने मिट्टी डाल कर ठीक किया। एक जगह मेड में बडा छेद हो गया था। उससे पानी तजी से बह रहा था। वह उस छेद को बंद करने के लिये मिट्टी का लौदां उठा-उठा कर भरने लगा, लेकिन ज्योंही एक लौंदा रखकर दुसरा लेने आता, पहले वाला लौंदा भी बह जाता। उसका बार-बार क प्रयास बेकार जा रहा था कि उसे एक उपाय सूझा। उसने मिट्टी का एक लौंदा उठाया और छेद को बंद करके स्व्यं मेड के सहारे वहीं लेट गया, जिससे पानी बहना बंद हो गया। रात होने लगी थी। अरूणि लौट कर आश्रम नहीं आया था, जिसकी वजह से गुरू को चिंता हो रही थी। वे कुछ शिष्यों को लेकर खेत की तरफ गये। खेत के पास पहुँच कर पुकारा, अरूणि तुम कहाँ हो। वह बोला, गुरूवर मैं यहाँ हूँ। गुरूवर उस जगह गए। उन्होंने देखा कि अरूणि मेड से चिपटा हुआ है। गुरूदेव बोले, वत्स तुम्हें इस तरह यहाँ पडे रहने की जरूरत क्या थी| तुम्हें कुछ हो जाता तो …।

अरूणि बोले, गुरूवर, यदि मैं अपना कर्तव्य अधूरा छोड कर चला आता तो वह गुरू का अपमान होता। जहाँ तक कुछ होने की बात है तो जब तक गुरू का आशिर्वाद शिष्य के सिर पर है तब तक शिष्य को कुछ नहीं होगा। गुरू का दर्जा तो भगवान से बडा है। इस पर महर्षि बोले, वत्स, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने आज गुरू-शिष्य के संबधों की अनूठी मिसाल कायम की है जो हमेशा के लिये जनमानस में एक मिसाल बनी रहेगी। तुमने अंतिम परीक्षा पास कर ली है।

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जूठा गुड़


बहुत ध्यान से यह कहानी पढ़िएगा। दिल को छूने वाली कथा है ।

Deepak Koli 

“जूठा गुड़”
एक शादी के निमंत्रण पर जाना था। पर मैं जाना नहीं चाहता था। कारण की एक तो व्यस्त होना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना..
लेक‌िन घर परिवार का दबाव था सो जाना ही पड़ा।
उस दिन शादी की सुबह में काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने वाली रोड़ पर बैठा हुआ था। हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था। पास ही के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी।

तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी और उसमें से एक वृद्ध उतरे। अमीरी उनके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।
वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये। पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी, उसमे गुड़ भरा हुआ था। अब उन्होने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया। सभी गायें पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बिछुड़ने के बाद बच्चे अपने मां बाप को घेर लेते हैं। वे कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी। वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।
कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई,इसके बाद जो हुआ वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता।
हुआ यूँ कि गायो के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था, वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे, मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।
मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला अंकल जी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का जूठा गुड क्यों खाया ??
उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे, और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता।
जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।
मैं अब भी नहीं समझा अंकल जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ???
वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था, भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।
तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए ,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था,मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण से आ गये।

मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।
शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय।
कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने, गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया।
और वही सो गया, सुबह काम तलासने निकल गया, आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।
इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई,मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया, इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था,
मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा,और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया,
शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका जूठा गुड़ खाता हूँ,

मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ , परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यही आकर मिटती हैं बेटे।

मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम,
मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े,गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई , मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला
बापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ।
सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था।
उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।

घर आकर गाय के बारे जानने के लिए कुछ किताबें पढ़ने के बाद जाना कि…..,
गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है,
जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। अत: इस पृथ्वी पर गोमाता मनुष्यों के लिए भगवान का प्रसाद है। भगवान के प्रसादस्वरूप अमृतरूपी गोदुग्ध का पान कर मानव ही नहीं अपितु देवगण भी तृप्त होते हैं।
इसीलिए गोदुग्ध को ‘अमृत’ कहा जाता है। गौएं विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं। सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं।
ऋग्वेद में गौ को‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।

 

Posted in मंत्र और स्तोत्र

सूर्यनमस्कार मन्त्राः


॥ सूर्यनमस्कार मन्त्राः ॥

     ॐ ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्ति ।
     नारायणः सरसिजासन्संइविष्टः ।
     केयूरवान मकरकुण्डलवान किरीटी ।
     हारी हिरण्मयवपुधृतशङ्खचक्रः ॥

          ॐ ह्रां मित्राय नमः ।
          ॐ ह्रीं रवये नमः ।
          ॐ ह्रूं सूर्याय नमः ।
          ॐ ह्रैं भानवे नमः ।
          ॐ ह्रौं खगाय नमः ।
          ॐ ह्रः पूष्णे नमः ।
          ॐ ह्रां हिरण्यगर्भाय नमः ।
          ॐ ह्रीं मरीचये नमः ।
          ॐ ह्रूं आदित्याय नमः ।
          ॐ ह्रैं सवित्रे नमः ।
          ॐ ह्रौं अर्काय नमः ।
          ॐ ह्रः भास्कराय नमः ।
     ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः
     ॐ श्रीसवितृसूर्यनारायणाय नमः ॥

     आदितस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने ।
     जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं दोष नाशते ।
     अकालमृत्यु हरणं सर्वव्याधि विनाशनम् ।
     सूर्यपादोदकं तीर्थं जठरे धारयाम्यहम् ॥

     योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शरीरस्य च वैद्यकेन ।
     योपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ॥


Surya Beej Mantra

Powerful Beej Mantra of Lord Surya gives positive vibrations and grace from the Lord Sun.

In Sanskrit

ॐ  हराम  हरिम ह्रौं सह सूर्याय नमः

 

Surya Gayatri Mantra

Best time to chant this most powerful Surya mantra is during eclipse of the sun and Sunday mornings at sunrise. April 12th to 23rd is most auspicious for Sun Worship, so one should try to spend more time reciting the mantra during this period.

In Sanskrit

ॐ भास्कराय  विद्महे  महादुत्याथिकराया  धीमहि तनमो  आदित्य  प्रचोदयात

Surya Mantra

In Sanskrit

नमः सूर्याय शान्ताय सर्वरोग निवारिणे

आयु ररोग्य मैस्वैर्यं देहि देवः जगत्पते ||

Aditya Hrudhayam Mantra

The word ‘Hridaya’ means that which is especially nourishing and healing for the heart or heart of Aditya. The word hridayam refers to the One who is shining or dwelling in the heart.

In Sanskrit

आधित्य ह्रुधाय पुण्यं सर्व सथृ विनासनं
जयावहं जबे नित्यं अक्षयं परमं शिवं

 

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

महर्षि याज्ञवल्क्य


 

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1979/September/v2.5

 

महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थी, मैत्रेयी और कात्यायनी। जब महर्षि ने संन्यास लेना चाहा, तब अपनी दोनों पत्नियों को बुलाकर कर कहा-हम अब संन्यास लेने वाले है तुम दोनों घर की सम्पूर्ण संपत्ति को आधा-आधा बाँट लो। यह सुनते ही मैत्रेयी बोल उठी देव! क्या इन धन सम्पदाओं को प्राप्त कर मैं अमर हो जाऊँगी? नहीं-याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया। जिस प्रकार धन-सम्पत्ति वालों का लोभ-मोह से भरा जीवन होता है देवि! उसी प्रकार का तुम्हारा भी जीवन हो सकेगा। तब तो ऐसे धन की हमें आवश्यकता नहीं- मैत्रेयी ने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा। पुनः निवेदन किया कि-देव हमें तो अमरत्व का साधन बाताइये। हमें धन-संपदा नहीं चाहिए।

मैत्रेयी के बार-बार आग्रह करने पर महर्षि को विवशतः अमरत्व का साधन-आत्म-कल्याण का साधन बताना ही पड़ा। उनने सूत्र रूप में कहा-

आत्मा वाऽऽदे मैत्रेयि! द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निविध्यासितव्यश्च। आत्मानः खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति। (वृहदारण्यकोनिषद)

है मैत्रेयी! आत्मा ही देखने योग्यताएं सुनने योग्य, मनन करने योग्य और अनुभव करने योग्य है। अपने आपको-आत्मा को-जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। यही अमरत्व का साधन है-यह आत्म- कल्याण का मार्ग है।

अपने को जान लेना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। गीताकार ने आत्मोत्कर्ष की गरिमा समझाते हुए कहा है-

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ळयात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

अपनी आत्मा द्वारा अपना उद्धार करो, आत्मा को पतित न करो। आत्मा ही अपना बन्धु है और आत्मा ही अपना शत्रु है।

व्यक्ति को दुनिया की, विश्व ब्रह्माण्ड की यत्किंचित् जानकारी कितना सन्तोष प्रदान करती है। जान पहचान के लोगों से मिलने पर कितनी प्रसन्नता होगी है, कदा-चित् अपने को पहचाना जा सके-आत्मा को जाना जा सके-तो कितने महान् आनन्द की प्राप्ति हो। उपनिषद्- कार के शब्दों में अपने आपको जान लेने वाले को ही सर्वोपरि सुख की प्राप्ति होती है-

तमात्मस्थं येनुपश्यन्ति धीराः तेषा सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ कठोपनिषद् 2।2।12

उस अपने में स्थित आत्मा को जो विवेकी पुरुष देख लेते हैं -जान लेते है-उन्हीं को नित्य सुख प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं।

अपनी आत्मा को जान लेने पर भवबन्धनों से मुक्ति हो जाती है-

न मुक्तिर्जपनाद्धोमादुपवास शतैरपित। ब्रळमैवाहमिति ज्ञात्वा मुक्तो भवति जीवभृत॥

जप, हवन, तथा सैकड़ों उपवास से भी मुक्ति नहीं मिल पाती, आत्मज्ञान, हो जाने पर जीव और ब्रह्म की एकता, की अनुभूति होने पर आत्मा मुक्त हो जाती है।

अनाद्यनन्त महतः परं ध्रुवं, निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते। कठो.1।3।15

उस अनादि अनन्त, महत्तत्व (बुद्धि) से परे तथा ध्रुव (निश्चल) आत्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से छुट जाता है।

महान्त विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति। कठो.2।1।4

उस महान और विभु (सर्वसमर्थ) आत्मा को जान कर बुद्धिमान पुरुष शोकाकुल नहीं होता।

इस प्रकार अनेकानेक श्रुतिवचनों द्वारा आत्मज्ञान की गरिमा को प्रतिपादित कर उसे प्राप्त करने की प्रेरणा दी गई है। व्यक्ति को जिसमें अपना लाभ दिखाई पड़ता है, उस कार्य को बड़े परिश्रम, मनोयोग व प्रसन्नतापूर्वक सम्पन्न करता है। यदि आत्मज्ञान के लाभों को जाना जा सके तथा इसे प्राप्त करने का प्रयास किया जा सके तो व्यक्ति धन्य हो जायेगा।

आत्म ज्ञान का तात्पर्य अपने को जानने से है। मैं कौन हूँ? किस लिए हूँ कहाँ से आया हूँ? इत्यादि प्रश्नों का उत्तरज्ञान कहा जायेगा। इसी प्रकार की प्रबल जिज्ञासा एक बार देवराज इन्द्र और दैत्यराज विरोचन को हुई। दोनों एक साथ प्रजा-पति के पास गये ओर विनम्रतापूर्वक अपना प्रश्न उनके सामने रखा। प्रजापति ने एक बड़े पात्र में पानी मँगवा कर उसमें अपना-अपना शरीर, मुख देखने का कहाँ और बताया-यही तुम हो-यही तुम्हारा स्वरूप है। वस्तुतः प्रजापति ने दोनों की विवेकबुद्धि का अन्दाज लगाने के लिए ऐसा किया था। क्या इनमें आत्मा को जानने की उत्कट अभिलाषा है? आत्मा को पहचान सकने की क्षमता है? इसका पता लगाने के लिए ऐसा किया था। विरोचन तो जल में अपनी आकृति देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और बोला मैंने तो अपने को जान लिया ऐसा कहता हुआ, अपने घर चला गया, वहाँ सभी को इसी प्रकार दर्पण में खूब सज-धज कर अपने स्वरूप को देखने और प्रसन्न होने का कहा।

लेकिन इन्द्र को इतने भर से सन्तोष न हो सका, वे पुनः प्रजापति के पास जाकर बोले-

‘‘……………………..-नाहपात्र भोग्यं पश्यामि।’’

मैं तो इसमें कोई भलाई, लाभ, नहीं देखता। जब शरीर ही आत्मा को भी यह सब दुःख, कष्ट, प्रसन्नता के साथ आत्मा को भी यह सब अनुभव होता होगा और शरीर के नष्ट हो जाने पर आत्मा भी नष्ट हो जाती होगी।

इन्द्र की यह शंका सही थी। जिज्ञासा से प्रसन्न होकर प्रजापति ने आगे की बात बताते हुए कहा-आत्मा परमात्मा का ही अंश है-उसी का लघु रूप है। परमात्मा की समस्त विशेषताएँ इसमें विद्यमान है। शरीर के नष्ट होने पर भी इसका विनाश नहीं होता। तुम वही तो-तत् त्वम् असि।

व्यक्ति जब अपने को ईश्वर का परम पवित्र अविनाशी अंश समझता है, आत्मा के रूप में अनुभव करता है और शरीर को एक उपकरण भी स्वीकारता है, तब वही दीन-दीन स्थिति से ऊपर उठकर, उन कार्यों को ही करता है, जो उसके गौरव के अनुरूप होते हैं-आत्म-संतोष प्रदान करते हैं।

आत्मा के इस स्वरूप को जानने की एक लम्बी प्रक्रिया है। आत्म-बोध, आत्म परिष्कार, आत्म -निर्माण और आत्म-विकास की लम्बी मंजिल पार करके ही आत्मा के सही स्वरूप का अनुभव किया जा सकता है।

सर्वप्रथम अपने को शरीर से भिन्न होने की धारणा को पुष्ट करना पड़ता है। हम दूसरे हैं और हमारा साध्य नहीं। हम अपनी सारी शक्ति शरीर को ही सुख पहुँचाने में न झोंक दें। शरीर से भिन्न भी कुछ है- वही मैं है। इस प्रकार का बोध हो जाने पर अपने द्वारा किये जाने वाले ओछे कार्यों को छोड़ना पड़ता है। यहीं से आत्म-परिष्कार आरम्भ होता है।

दोष-दुर्गुणों के दूर हो जाने पर उनके स्थान पर सद्गुणों-श्रेष्ठताओं का समावेश करना आवश्यक होता है। कषाय-कल्मषों से रहित होने पर शुद्ध अन्त-करण में श्रेष्ठ-सद्गुणों की अभिवृद्धि होने लगती है। सही आत्म-निर्माण है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्ट स्तर के चिन्तन एवं कर्तृत्व को स्थान देना आत्मज्ञान का तृतीय चरण है।

इसके उपरान्त आत्मविकास आता है। अपने ही समान सभी प्राणियों को, जीव, जन्तुओं को, समझाना ही आत्म-विकास है। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ का सही आदर्श है।

किन्तु ‘आत्मज्ञान’ की लक्ष्य प्राप्ति इतनी सुगम नहीं होती अनेकानेक विघ्न बाधाएँ चुनौती बनकर साधक के समक्ष आ खड़ी होती है। बिना परीक्षा के तो सामान्य कार्य की दक्षता भी प्रमाणित नहीं हो पाती, तो इतने महान लक्ष्य की कौन कहे? काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य-यह छः दोष, छः बाधक तत्व, आत्मिक प्रगति के मार्ग में अवरोधक बन कर आड़े आ जाते हैं-

तप्प्रत्यूहाः षडाख्याता योगविघ्न करानघ। काम क्रोधौ, लोभमोहौ, मदमार्त्सय संज्ञकौ॥ -देवी भागवत

‘काम, क्रोध, लोभ, मोह, पद और मात्सर्य-यह छः योग मार्ग के -आत्मिक उन्नति के शत्रु है, जो इस कार्य में विघ्न डाला करते हैं।

आत्म-साधना के अधिकाँशतः साधक इन बाधकों द्वारा विचलित कर दिये जाते हैं। काम-क्रोध की लिप्सा में फंसकर अपनी साधन-सम्पत्ति को गवाँ बैठते हैं। इस स्थिति को संभालना बहुत आवश्यक होता है। आत्म-लाभ की फसल की रखवाली, काम क्रोधादि पक्षियों से इन्हीं दिनों करनी पड़ती है। इन बाधक तत्वों से बच निकलता बड़े पुरुषार्थ की बात होती है। इसी स्थिति को ‘साधना-समर’ कहा गया है।

आत्मज्ञान की प्राप्ति सर्वोपरि उपलब्धि है। ‘अपने आपको जान लेने वाला पुनः कुपथगामी नहीं होता है, फलतः दुष्कर्म अन्य दुष्परिणामों को, उसे नहीं भुगतना पड़ता। वह परमात्मा की ही तरह निर्विकार और शुद्ध हो जाता है-

‘यदा तु शुद्ध निजरुपि सर्व कामक्षये ज्ञान-मपस्तदोषाम्।’-विष्णु पुराण

‘आत्मज्ञान प्राप्त होने पर मानव निर्दोष हो जाता है, तथा सभी कर्मों के क्षय हो जाने से अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान लेता है।’ इस समय व्यक्ति अपने पराये में कोई भेद नहीं देखता है, क्योंकि अपने और पराये का भेद तो संकीर्णता की स्थिति में ही रहता है। संकीर्णता से ऊपर उठने वाले को ही आत्म-लाभ हो पाता है। उस समय सम्पूर्ण संसार को ही वह अपना परिवार मानने लगता है-

‘अयं निजः परोषेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचारितानाँ तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

‘यह हमारा है यह दूसरे का है-ऐसा विचार क्षुद्र हृदय वाले-संकीर्ण-विचारों वाले करते हैं, उदार चेता-आत्मज्ञानी-तो सम्पूर्ण विश्व को ही अपना परिवार समझते हैं।

इसके अतिरिक्त आत्मज्ञान हो जाने पर-अपने सच्चे स्वरूप को पहचान लेने पर-व्यक्ति परमात्म-शक्तियों से ओत-प्रोत हो जाता है। ‘आत्मज्ञान’ हो जाने पर ‘ब्रह्माण्ड ज्ञान’ भी हो जाता है। पिण्ड और ब्रह्माण्ड में तात्विक अन्तर कुछ भी नहीं है’ अन्तर है तो केवल स्वरूप का। इसलिए पिण्ड (आत्मा) को जानने वाला ‘ब्रह्माण्ड को भी जान लेता है-

ब्रहमाप्डे ये गुणाः सन्ति पिण्डमध्ये च ते स्थिताः।

ब्रह्माण्ड में जो गुण है, वे पिण्ड में भी विद्यमान हैं। ‘आत्मज्ञान’ के महान् लाभ से लाभान्वित होना ही सर्वोपरि बुद्धिमत्ता है। उसी में जीवन की सार्थकता है।