Posted in ઉત્સવ

नीरज वर्मा

सद्गुरु – “मनगढ़ंत” और “प्रतिस्पर्धा” (Competition) से जन्मा शब्द !!!
गुरु – “संपूर्ण” शब्द !!!

आप शास्त्र में और किसी भी शब्दकोष में शब्द “सद्गुरु” नहीं पाएँगे। गुरू का विलोम शब्द है – शिष्य। यदि आप सद्गुरु का विलोम शब्द ढुँढने का प्रयास करें तो कुछ भी समझ नहीं आएगा क्योंकि शब्द “सद्गुरु” तो प्रचार, प्रसार और व्यवहार में आ गया किंतु, उसके विलोम शब्द की किसी को आवश्यकता नहीं है। यदि सद्गुरु है तो असद्गुरु भी अवश्य होना चाहिए। असद्गुरु का क्या अर्थ होगा – स्वयं विचार करें।

वर्तमान में तथाकथित गुरुओं की बाढ़ सी आ गई है। उन गुरुओं में उत्कृष्ट गुरु चयन करने की प्रक्रिया या स्वयं को उत्कृष्ट घोषित करने के क्रम में ही यानी प्रतिस्पर्धा (Competition) के फलस्वरूप ही शब्द “सद्गुरु” स्थापित हो गया। वास्तव में, गुरु उत्कृष्ट और निकृष्ट होता ही नहीं है। जो हमें मोक्ष/कैवल्य प्राप्त करने में सहयोग कर सकता है केवल उसी का नाम गुरु है !

कहते हैं, “कृष्णं वंदे जगद्गुरुं” – भगवान् श्रीकृष्ण के लिए भी “गुरु” शब्द ही कहा जाता है, सद्गुरु नहीं!

शास्त्र के अनुसार, “गु” का अर्थ है – अंधकार या मूल अज्ञान/अविद्या और “रु” का अर्थ है उसका निरोधक। अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले का नाम “गुरु” है।सत् बुद्धि से युक्त और गुणातीत (सत्व, रज और तम के परे) जो निरंतर भगवान् में मन वाले और जिन्होंने भगवान् में ही प्राणों को अर्पण कर दिया है। जिनके द्वारा चेतनतत्त्व सिद्ध है। जिनका भगवान् पर विश्वास नहीं है बल्कि, जिनके द्वारा भगवान् सिद्ध है। अनन्यदर्शी (न अन्य) तथा जो अपने लिए योगक्षेम (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है) सम्बन्धी चेष्टा भी नहीं करते क्योंकि वे जीने और मरने में भी अपनी वासना नहीं रखते, केवल भगवान् ही जिनके अवलम्बन हैं तथा जो भगवान् के प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित भगवान् का कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट रहते हैं और वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं। जो संपूर्ण भक्ति और ज्ञान दोनों से युक्त हैं। इस लोक में रमण करनेवाले केवल ऐसे व्यक्तित्व का नाम “गुरु” है।

“आषाढ़ मास” की “पूर्णिमा” का नाम “गुरु पूर्णिमा” है, “सद्गुरु पूर्णिमा” नहीं है। इस दिन से चार महीने तक साधु संत ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।

क्या वर्तमान काल के ये तथाकथित धर्म गुरु ऐसा करते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं बल्कि वे तो बड़े-बड़े और महंगे मंच पर कीमती वस्त्रों में सुसज्जित होकर अपने तथाकथित शिष्यों से गुरु पूजा के बहाने स्वयं की पूजा करवाने में भी तनिक भी नहीं हिचकिचाते हैं। उन्हें तो संभवतः उपरोक्त चार महीने के महत्व का ज्ञान भी न हो।

इसी दिन “महाभारत” के रचयिता “कृष्ण द्वापायन व्यास” का जन्मदिन है। कृष्ण द्वापायन व्यास जी भी गुरु के रूप में जाने जाते हैं, सद्गुरु के रूप में नहीं!

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जय श्री कृष्ण !!

Advertisements

Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks