Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजय गुप्ता

इन्वेस्टमेंट
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”श्वेता, दो दिनों से देख रही हूं, जिसे देखो बस तेरे गुणगान गाता है… तू है बड़ी लकी… तेरी फ़िक़्र तो ऐसे करते हैं, जैसे तू बहू नहीं, इस घर की बेटी हो.” निकिता के मुंह से अनायास निकले शब्दों पर श्वेता मुस्कुराकर बोली, “सच दीदी, शादी के पहले डर लगता था, ना जाने कैसा परिवार मिले, एडजस्टमेंट हो पाएगा या नहीं? पर अब ऐसा लगता है, जैसे ये परिवार मेरे लिए ही बना था. बस, मैंने यहां रहना शुरू नहीं किया था. सब कुछ कितना सहज, कितना प्यारा है. सब अपने लगते हैं.”
“ओके-ओके, अब इतना भी मत डूब जा अपनी ससुराल में कि तेरा अपना अलग वजूद ही ना रहे. सच बताऊं, तो लकी तू नहीं, तेरे ससुरालवाले हैं, जिन्हें तेरी जैसी नौकरीपेशा और बेवकूफ़ बहू मिली है.” अपनी बड़ी बहन निकिता की विरोधाभासी बात पर सन्न श्वेता उसका चेहरा ताकती रह गई. कुछ पल को लगा शायद यह मज़ाक था या सुनने में कुछ ग़लती हुई थी.
पहली बार छोटी बहन की ससुराल आई निकिता दीदी के तीन दिन के प्रवास को जीवंत बनाने में श्वेता के सास-ससुर और पति उदित ने कोेई कसर नहीं छोड़ी थी. श्वेता साफ़ देख रही थी कि उसके वजूद को हाथोंहाथ लिए उसकी हर इच्छा को सम्मान देनेवाले इस नए भरे-पूरे परिवार को देखकर निकिता अभिभूत है. ऐसे में इस तरह की टिप्पणी… यथार्थ से नितांत परे थी.
“क्या हुआ श्वेता? बुरा मान गई क्या? मैं तो बस इतना चाहती हूं कि दूसरों को ख़ुश करने और वाहवाही लूटने के चक्कर में तू अपना मटियामेट ना कर ले. यूं ही पूरी तनख़्वाह लाकर उदित के हाथ में दे देती है और उदित अपनी मम्मी को, और तो और, आए दिन सबके लिए गिफ्ट लाती रहती है. ये सब क्या है? जब से आई हूं, तेरी सास के मुंह से सुन रही हूं, श्वेता ने ये दिया, श्वेता ने वो दिया. कुछ उन्होंने भी दिया है या नहीं.”
“दीदी, उन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया है. उदित जैसा प्यार करनेवाला पति और अपना संरक्षण, जिसके तले हम अपना जीवन सुकून से बिता रहे हैं. लाइफ में और क्या चाहिए? रही मम्मी-पापा की बात, तो उनको अपनी पेंशन मिलती है. हम क्या दे सकते हैं उन्हें? दे तो वो रहे हैं हमें, एक स्ट्रेसफ्री लाइफ…”
“फिर भी श्वेता किसी के हाथ में अपनी सारी सैलेरी रख देना, अ़क्लमंदी नहीं है. आज ये प्यार लुटा रहे हैं, कल क्या हालात हों, कौन जानता है. ये तो ख़ुदकुशी करने जैसा है.
मुझे देख, अपनी और अमोल दोनों की सैलेरी को मुट्ठी में रखती हूं.”
“दीदी, थोड़ा समर्पण और उनका विश्वास भी अपनी मुट्ठी में करना सीखो, वरना ये तो निरी रेत है, फिसल गई, तो हाथ खाली रह जाएंगे.”
“रहने दे श्वेता, समर्पण और विश्वास निरी क़िताबी बातें हैं. यही रिश्ते कल क्या रूप धरें, कौन जानता है?”
“कल के हालात से डरकर हम आज रिश्तों में दरारें डालें, उन्हें खाद-पानी से वंचित, स़िर्फ इसलिए सूखने दें कि कल इसमें फल कहीं कड़वे ना लग जाएं. आप जिसे बेव़कूफ़ी कह रही हैं, मैं उसे इन्वेस्टमेंट कहती हूं. रिश्तों का इन्वेस्टमेंट…
मेरी मानिए, तो आप भी अपनी ससुराल में यह इन्वेस्टमेंट करके जीवनभर मुनाफ़ा कमाइए.”
“तू और तेरी बड़ी-बड़ी बातें… कल जब ये लोग सब कुछ तेरी ननद को उठाकर दे देंगे, तब देखती हूं, तेरा ये इन्वेस्टमेंट कहां काम आता है?” श्वेता चुप थी. शायद दीदी को बदलना उसके हाथ में नहीं था. पर निकिता ख़ुश थी… आख़िर आज उसे श्वेता को नीचा दिखाने का मौक़ा मिल ही गया. याद आया, किस तरह से उससे तीन साल छोटी बहन ने अमोल के सामने उसे निरुत्तर कर दिया था. एक बार निकिता ने श्वेता को बताया कि अमोल ने उससे घर के पज़ेशन के वक़्त थोड़ी-सी फाइनेंशियल हेल्प मांगी थी, पर निकिता ने अमोल को साफ़ मना कर दिया था कि घर के बारे में सोचना उसका काम है. अगर वह हाउसवाइफ होती, तो क्या वह इंतज़ाम नहीं करते. यह बात अमोल को चुभी थी. उस दिन के बाद निकिता से कभी कुछ नहीं मांगा. निकिता की इस बात पर श्वेता ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे दिन दीपावली की रात अमोल ने निकिता को सोने के झुमके दिए, तो निकिता ने इतराते हुए कहा था, “दुनिया का दस्तूर है, पति की कमाई पर पत्नी का पूरा अधिकार और पत्नी की कमाई सौ टका पत्नी की. उसमें कोई हाथ नहीं लगा सकता है.” उस वक़्त श्वेता ने अपने जीजाजी का पक्ष लेते हुए हंसकर कहा था. “दीदी, ये ग़लतफ़हमी मत रखना कि हाउसवाइफ मिलने पर जीजू के हाथ खाली रह जाते. सुबह से लेकर रात को सोने तक जीजू जिस तरह से तुम्हारा हाथ बंटाते हैं, वह क़ाबिले-तारीफ़ है. आप जॉब नहीं कर रही होतीं, तो सुबह-सुबह बस स्टॉप छोड़ने की चिंता छोड़ जीजू आराम से सो रहे होते. जीजू को गर्म खाना, सुबह-शाम की चाय तो मिलती. तुम्हारे पीछे आनेवाली नौकरों की फौज संभालने का झंझट नहीं रहता.”
“अरे, बस कर, तू मेरी बहन है या दुश्मन.” निकिता ने श्वेता को टोका था. तीन साल पहले घटी इस बात को श्वेता मज़ाक समझकर भूल गई थी, पर निकिता इस सच को अमोल के सामने उजागर करने के अपराध से श्वेता को मुक्त नहीं कर पाई थी. आज हाथ आया मौक़ा वो कैसे
गंवाती, तभी शायद श्वेता को उसकी तल्ख़ बातों का सामना करना पड़ा था.
निकिता कुछ और कहती, उससे पहले श्वेता की सास दमयंतीजी आ गईं. उन्होंने श्वेता से अपने कुंदनवाले सेट को आलमारी से निकालने को कहा. बड़े अधिकार से गुच्छे को संभालती श्वेता आलमारी से कुंदन का सेट निकालकर लाई, तो मां उसे हाथों में उठाकर तौलती-सी श्वेता से बोलीं, “नंदिनी बहुत दिनों से कुंदनवाले सेट की तारीफ़ कर रही है. मुझे लगता है उसे पसंद है. सोच रही हूं, ऐसे ही हल्के में बनवाकर उसे दे दूं.”
“मम्मी, आप दीदी को यही सेट क्यों नहीं दे देतीं.” बोलती श्वेता की नज़र सहसा निकिता से मिली. वह जलती नज़रों से उसे घूर रही थी, तो उसने अचकचाकर आंखें फेर लीं.
दमयंतीजी ने कुछ नहीं कहा. बस, मुस्कुराकर सेट लेकर चली गईं. निकिता श्वेता की बेव़कूफ़ी पर कुछ कहती, उससे पहले श्वेता ने वहां से निकलने में अपनी भलाई समझी.
दूसरे दिन श्वेता की शादी की पहली सालगिरह थी. निकिता उसके कमरे में गिफ्ट लेकर पहुंची तो देखा, वह अपनी ननद नंदिनी से फोन पर बतिया रही थी, “दीदी, आप नहीं आएंगी, तो मज़ा आधा रह जाएगा, पर कोई बात नहीं. आप बच्चों के इम्तहान दिलाइए. पलक से कहना ख़ूब अच्छे नंबर लेकर आए. उसकी मामी ने उसके अच्छे रिज़ल्ट के लिए गिफ़्ट अभी से ख़रीद लिया है.” श्वेता ने फोन रखा ही था कि निकिता फिर शुरू हो गई थी. “श्वेता, गिफ्ट लेने का अधिकार तेरा बनता है.”
“ओहो दीदी! बेटी होने के नाते नंदिनी दीदी की ख़ुशी इस घर से जुड़ी है. वो ख़ुश, तो सब ख़ुश… रिश्तों में इन छोटी-मोटी भेंटों के बड़े मायने होते हैं. ये सब रिश्तों का इन्वेस्टमेंट हैं, जिसमें मेरी निकिता दीदी कभी विश्वास नहीं करती हैं.” उसने हंसते हुए कहा, “उ़फ्! तू और तेरा इन्वेस्टमेंट… गंवा देगी एक दिन अपनी सारी कमाई. विश्वास नहीं होता कि तू मेरी बहन है और ये क्या बात हुई कि मुझे रिश्तों में विश्वास नहीं है, ऐसा होता तो तेरे कहने से मैं छुट्टी लेकर तेरी मैरिज एनिवर्सरी मनाने ना चली आती.” निकिता की बात पर श्वेता ने प्यार से उनके हाथों को पकड़कर कहा, “उसके लिए मेरी प्यारी दीदी को बहुत-बहुत थैंक्स. पर एक बात बोलूं, बुरा मत मानना. मायके से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान है, क्योंकि वो बचपन से जुड़े हैं, हमें आदत है उनकी, लेकिन ससुराल से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान नहीं है. उसके लिए आपसी समझ, विश्वास और समर्पण ज़रूरी है और उसी में हम चूक कर जाते हैं.” आज के दिन निकिता छोटी बहन से बहस नहीं करना चाहती थी, सो वो चुपचाप उसे गिफ्ट देकर चली गई.
शाम तक घर सबकी हंसी से गुलज़ार था. पर निकिता का मन दरक रहा था. पिछले हफ़्ते उसकी शादी की सालगिरह तो यूं ही निकल गई.
चाहती तो अमोल के साथ कुछ सार्थक पल बिता लेती, लेकिन वो व्यावहारिक थी. जानती थी इन भावनात्मक पहलुओं से जुड़कर जीवन नहीं चलता. अमोल आनेवाली एनिवर्सरी को लेकर पसोपेश में थे. ऐसे में निकिता ने उन्हें दुविधा से उबारते हुए कहा, “तुम्हारा टूर पर जाना बहुत ज़रूरी है. टारगेट पूरा नहीं किया, तो फाइनेंशियली प्रॉब्लम हो जाएगी. घर का पज़ेशन लेना है.”
“घर नहीं, मकान.”
“हां-हां वही…” अमोल के व्यंग्यबाण को नज़रअंदाज़ कर, मन ही मन मुस्कुराते हुए बोली, “कितनी भी कोशिश कर लो, भावनाओं में बहकर, अपनी सैलेरी में हाथ नहीं लगाने दूंगी.” अपनी सेविंग्स में बरती गोपनीयता निकिता की मंशा जता देती थी. शादी के तीन साल बाद भी निकिता अमोल के परिवारवालों को अपना नहीं पाई थी. निकिता का कुछ था, तो अमोल का बनवाया मकान, उसके दिए ज़ेवर और पूरी तनख़्वाह, जिसका हिसाब-क़िताब वो समय-समय पर करती थी. उसका हमेशा से मानना रहा है कि स्त्री को अपने पैसों और अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई परेशानी ना हो. निकिता की ज़िद पर अमोल ने मकान के लिए लोन लिया, पर लोन चुकाने के चक्कर में उसे ओवरटाइम तक करना पड़ा, जिससे उसकी सेहत तक बिगड़ी. बढ़ती सेविंग्स निकिता के भविष्य को सिक्योर करती गई, पर वर्तमान उसके हाथ से कब फिसला, वह जान ही नहीं पाई.
पति और परिवार के साथ बिताए हल्के-फुल्के पलों की क़ीमत उसने नहीं आंकी थी. घर के पज़ेशन के समय भुगतान की चिंता में डूबे अमोल की हालत उसके पिता से देखी नहीं गई, उन्होंने अपनी जमापूंजी बेटे के हवाले की, तो निकिता को अपनी चतुराई पर मान हो आया. डर था कि कहीं अमोल उससे रुपए ना मांग ले, पर यहां तो सब आसानी से हल हो गया. निकिता विचारों में खोई बैठक की ओर आई, तो वहां बैठी दमयंतीजी अपने पति से बोल रही थीं, “सुनो… कुंदन का सेट मैं इस बार श्वेता को दे रही हूं. अपनी श्वेता आगे बढ़कर तो मांगेगी नहीं, सोच रही हूं गिफ्ट के बहाने दे दूंगी.” “ऊंह! बेव़कूफ़ श्वेता, सब कुछ तो इनके हवाले कर देती है. सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को कोई हलाल करता है भला.” बुदबुदाती हुई निकिता उनके पास ही चली आई, मन की कसमसाहट और बढ़ गई थी.
उदित और श्वेता भी वहां आ गए. दोनों झुककर दमयंतीजी और उमाकांतजी का आशीर्वाद लेने लगे. वो गदगद हो उठे, आशीर्वाद की झड़ी के साथ दमयंतीजी ने साधिकार बैठने का आदेश दिया और
मुस्कुराकर यह कहते हुए कुंदन का सेट श्वेता के हाथ में रख दिया, “आज इसे पहनकर डिनर पर जाना.”
“ओ मम्मी, लव यू…” श्वेता सास के गले लगी हुई थी, तभी उमाकांतजी की आवाज़ आई, “बिटिया, इसे पकड़ो और तुम लोग संभालो. पांच-पांच लाख की एफडी तुम्हारे और उदित के नाम है.”
“पर क्यों पापा?”
“क्यों की क्या बात है? सैलेरी तो तुम लोगों से संभलती नहीं, सो हमें दे देते हो. अब थोड़ी ज़िम्मेदारी तुम भी संभालो.” ससुर की आवाज़ में उलाहने का स्नेहभरा स्वांग था, जबकि आंखों में बेटे-बहू के प्रति गर्व झलक रहा था. वो बोल रहे थे.
“अब तुम लोगों को अपने बारे में सोचना नहीं आता, तो ये काम हमें करना पड़ेगा. उदित, तुम्हारी पुरानी एफडी मैच्योर हो रही है, उसे अब घर में लगा दो.”
“पापा, हम आपको इस घर में अच्छे नहीं लगते हैं क्या?” उदित की बात पर वो बोले, “आगे तुम लोग कहां रहते हो, वो बाद की बात है, फ़िलहाल एक घर तुम लोगों का अपना भी होना चाहिए. और ज़रूरी बात, नए घर की बुकिंग बहू के नाम से होगी…” ‘नए घर की बुकिंग’. ये अनुगूंज देर तक निकिता के कानों में गूंजती रही. प्रत्युत्तर में उसे अमोल की मम्मी के शब्द सुनाई दिए- ‘अमोल, घर अपने नाम से लेना.’ क्यों? का प्रश्न अमोल की तरफ़ से नहीं आया था. अमोल की मम्मी बोल रही थीं- ‘तेरी पत्नी बड़ी तेज़ है. अभी से इतना अपना-पराया है, तो बाद में क्या होगा.’ उफ़्! उस दिन आग लग गई थी निकिता के तन-बदन में. कितना सुनाया था अमोल को. पर वो चुपचाप सुनते रहे. शायद आईना दिखाकर ख़ुद को और उसे नीचे नहीं गिराना चाहते थे. अपने प्रति अविश्वास पर आश्चर्य व्यक्त करती निकिता आज चुप थी. वो देख पा रही थी, जो विश्वास श्वेता पर उसके सास-ससुर ने किया था, उसके पीछे श्वेता के छोटे-बड़े कई प्रयास थे, जिनका बड़ा प्रतिफल उसे मिला था. दमयंतीजी बोल रही थीं, “एक बार इनका घर बन जाए, तो चिंता दूर हो…”
‘घर नहीं, मकान…’ वहीं बैठी निकिता बोलना चाहती थी, पर सबके उल्लासित चेहरे देखकर चुप रही. जहां इतना उमंग-उत्साह, समर्पण-स्नेह और आदर हो, वहां मकान अपने आप ही घर बन जाता है.
एक बार फिर उसने श्वेता से ख़ुद की तुलना की तो दंग रह गई. श्वेता के गंवाने के बावजूद कई गुना हो, सब वापस कैसे मिला? जबकि उसके पास उतना ही रहा, जितना उसका हिस्सा था. वो भी सहसा हल्का हो गया. इतना हल्का कि पलड़ा हवा में लटक रहा था. जबकि श्वेता की संपदा में घरवालों का प्यार, संरक्षण और विश्वास था, तभी शायद उसका पलड़ा धरती को छू रहा था. निकिता ने बिना जांचे-परखे ही ससुराल और अमोल पर अविश्वास व्यक्त किया था. अमोल ने तो फिर भी जांच-परखकर निकिता के प्रति अविश्वास और स्वकेंद्रित नारी की छवि बनाई थी. शिकायत की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सच तो है… कितनी ऐसी ज़रूरतें आईं, जिसे वो सहज बांट सकती थी… पर ज़िम्मेदारियां और ज़रूरतें तो जीवनभर लगी रहेंगी, उसे पूरा करना पुरुष के अधिकार क्षेत्र में आता है, कहकर वह सदा अमोल को कुंठित करती रही. ख़ुद को चतुर समझनेवाली निकिता श्वेता की चतुराई पर हैरान थी. वो तो अपने हिस्से पर अपना डेरा डाले उसे सुरक्षित रखने की जद्दोज़ेहद में पड़ी रही. इधर श्वेता ने कितनी आसानी से अपने हिस्से पर सबको जगह देकर उनके दिलों पर अपना स्थान सुनिश्चित करा लिया था सदा के लिए…

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संजय गुप्ता

“नयी पड़ोसन और नीला दुपट्टा !!”

मोहल्ले में नयी बहुत ही खूबसूरत और जवान पड़ोसन आकर आबाद हुई, उसके दो छोटे बच्चे थे, उसका शौहर शक्ल से ही खुर्रांट और बदमिज़ाज लगता था, पड़ोसन की ख़ूबसूरती देखकर ही मोहल्ले के तमाम मर्दों की हमदर्दियां उसके साथ हो गयीं !

पड़ोसन ने धीरे धीरे मोहल्ले के घरों में आना जाना शुरू किया, मिर्ज़ा साहब और शेख साहब को अपनी अपनी बेगमों से पता चला कि उस खूबसूरत पड़ोसन का शौहर बहुत ही शक्की और खब्ती था ! वो पड़ोसन अपने शौहर से बहुत खौफ खाती थी, ये सुन कर दोनों मर्द हज़रात की निगाहें आसमान की ओर उठ गयीं, दिल ही दिल में शिकवा कर डाला कि या अल्लाह कैसे कैसे हीरे नाक़द्रों को दे दिए हैं !

एक दिन वो खूबसूरत पड़ोसन सब्ज़ी वाले की दुकान पर शेख साहब को मिली, उसने खुद आगे बढ़कर शेख साहब को सलाम किया, शेख साहब को अपनी क़िस्मत पर नाज़ हुआ, पड़ोसन बोली शेख साहब बुरा न माने तो आपसे कुछ मश्वरा करना था. शेख साहब ख़ुशी से बावले हो गए, वजह ये भी थी कि उस पड़ोसन ने आम अनजान औरतों की तरह भाई नहीं कहा था, बल्कि शेख साहब कहा था !

शेख साहब ने बड़ी मुश्किल से अपनी ख़ुशी छुपाते हुए मोतबर अंदाज़ में जवाब दिया ” जी फरमाइए !”
पड़ोसन ने कहा कि मेरे शौहर अक्सर काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं, मैं इतनी पढ़ी लिखी नहीं हूँ, बच्चों के एडमिशन के लिए आपकी रहनुमाई की ज़रुरत थी !
वो आगे बोली, कि यूं सड़क पर खड़े होकर बातें करना ठीक नहीं है, आपके पास वक़्त हो, तो मेरे घर चल कर कुछ मिनट मुझे समझा दें, ताकि मैं कल ही बच्चों का एडमिशन करा दूँ ! ख़ुशी से बावले हुए शेख साहब चंद मिनट तो क्या सदियां बिताने को तैयार थे, उन्होंने फ़ौरन कहा कि जी ज़रूर चलिए !

शेख साहब पड़ोसन के साथ घर में दाखिल हुए, अभी सोफे पर बैठे ही थे कि बाहर स्कूटर के रुकने की आवाज़ सी आयी, पड़ोसन ने घबराकर कहा कि या अल्लाह लगता है मेरे शौहर आ गए, उन्होंने यहाँ आपको देख लिया तो वो मेरा और आपका दोनों का क़त्ल ही कर डालेंगे, कुछ भी नहीं सुनेंगे, आप एक काम कीजिये वो सामने कपड़ों का ढेर है, आप ये नीला दुपट्टा सर पर डाल लें और उन कपड़ों पर इस्त्री करना शुरू कर दें, मैं उनसे कह दूँगी कि इस्त्री वाली मौसी काम कर रही है !

शेख साहब ने जल्दी से नीला दुपट्टा ओढ़कर शानदार घूंघट निकाला और उस कपडे के ढेर से कपडे लेकर इस्त्री करने लगे, तीन घंटे तक शेख साहब ने ढेर लगे सभी कपड़ों पर इस्त्री कर डाली थी, आखरी कपडे पर इस्त्री पूरी हुई तब तक पड़ोसन का खुर्रांट शौहर भी वापस चला गया !

पसीने से लथपथ और थकान से निढाल शेख साहब दुपट्टा फेंक कर घर से निकले, जैसे ही वो निकल कर चार क़दम चले सामने से उनके पडोसी मिर्ज़ा साहब आते दिखाई दिए, शेख साहब की हालत देख कर मिर्ज़ा साहब ने पूछा “कितनी देर से अंदर थे ?” शेख साहब ने कहा “तीन घंटों से, क्योंकि उसका शौहर आ गया था, इसलिए तीन घंटों से कपड़ों पर इस्त्री कर रहा था !”

मिर्ज़ा साहब ने आह भर कर कहा “जिन कपड़ों पर तुमने तीन घंटे घूंघट निकाल कर इस्त्री की है, उस कपड़ों के ढेर को कल मैंने चार घंटे बैठ कर धोया है, क्या तुमने भी नीला दुपट्टा ओढ़ा था ?” 🤣😂😛 * 🙂 🙂 🙂

(उर्दू से अनुवादित)

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संजय गुप्ता

✍ एक समय मोची का काम करने वाले व्यक्ति को रात में भगवान ने सपना दिया और कहा कि कल सुबह मैं तुझसे मिलने तेरी दुकान पर आऊंगा।

मोची की दुकान काफी छोटी थी और उसकी आमदनी भी काफी सीमित थी। खाना खाने के बर्तन भी थोड़े से थे। इसके बावजूद वो अपनी जिंदगी से खुश रहता था।

एक सच्चा, ईमानदार और परोपकार करने वाला इंसान था। इसलिए ईश्वर ने उसकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया।

मोची ने सुबह उठते ही तैयारी शुरू कर दी। भगवान को चाय पिलाने के लिए दूध, चायपत्ती और नाश्ते के लिए मिठाई ले आया। दुकान को साफ कर वह भगवान का इंतजार करने लगा। उस दिन सुबह से भारी बारिश हो रही थी। थोड़ी देर में उसने देखा कि एक सफाई करने वाली बारिश के पानी में भीगकर ठिठुर रही है।
मोची को उसके ऊपर बड़ी दया आई और भगवान के लिए लाए गये दूध से उसको चाय बनाकर पिलाई।

दिन गुजरने लगा। दोपहर बारह बजे एक महिला बच्चे को लेकर आई और कहा कि मेरा बच्चा भूखा है इसलिए पीने के लिए दूध चाहिए। मोची ने सारा दूध उस बच्चे को पीने के लिए दे दिया। इस तरह से शाम के चार बज गए। मोची दिनभर बड़ी बेसब्री से भगवान का इंतजार करता रहा।

तभी एक बूढ़ा आदमी जो चलने से लाचार था आया और कहा कि मै भूखा हूं और अगर कुछ खाने को मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी। मोची ने उसकी बेबसी को समझते हुए मिठाई उसको दे दी। इस तरह से दिन बीत गया और रात हो गई।
रात होते ही मोची के सब्र का बांध टूट गया और वह भगवान को उलाहना देते हुए बोला कि “वाह रे भगवान सुबह से रात कर दी मैंने तेरे इंतजार में लेकिन तू वादा करने के बाद भी नहीं आया। क्या मैं गरीब ही तुझे बेवकूफ बनाने के लिए मिला था।”

तभी आकाशवाणी हुई और भगवान ने कहा कि ” मैं आज तेरे पास एक बार नहीं, तीन बार आया और तीनों बार तेरी सेवाओं से बहुत खुश हुआ। और तू मेरी परीक्षा में भी पास हुआ है, क्योंकि तेरे मन में परोपकार और त्याग का भाव सामान्य मानव की सीमाओं से परे हैं।”

इस कहानी से हमको यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी मजबूर या ऐसा व्यक्ति जिसको आपकी मदद की जरूरत है उसकी मदद जरूर करना चाहिए। क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है कि ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है’। और मदद की उम्मीद रखने वाले, जरूरतमंद और लाचार लोग धरती पर भगवान की तरह होते हैं। जिनकी सेवा से सुकून के साथ एक अलग संतुष्टी का एहसास होता है।

🍁💘🌷#जय #श्री #कृष्णा🍁💘🌷

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”श्वेता, दो दिनों से देख रही हूं, जिसे देखो बस तेरे गुणगान गाता है… तू है बड़ी लकी… तेरी फ़िक़्र तो ऐसे करते हैं, जैसे तू बहू नहीं, इस घर की बेटी हो.” निकिता के मुंह से अनायास निकले शब्दों पर श्वेता मुस्कुराकर बोली, “सच दीदी, शादी के पहले डर लगता था, ना जाने कैसा परिवार मिले, एडजस्टमेंट हो पाएगा या नहीं? पर अब ऐसा लगता है, जैसे ये परिवार मेरे लिए ही बना था. बस, मैंने यहां रहना शुरू नहीं किया था. सब कुछ कितना सहज, कितना प्यारा है. सब अपने लगते हैं.”
“ओके-ओके, अब इतना भी मत डूब जा अपनी ससुराल में कि तेरा अपना अलग वजूद ही ना रहे. सच बताऊं, तो लकी तू नहीं, तेरे ससुरालवाले हैं, जिन्हें तेरी जैसी नौकरीपेशा और बेवकूफ़ बहू मिली है.” अपनी बड़ी बहन निकिता की विरोधाभासी बात पर सन्न श्वेता उसका चेहरा ताकती रह गई. कुछ पल को लगा शायद यह मज़ाक था या सुनने में कुछ ग़लती हुई थी.
पहली बार छोटी बहन की ससुराल आई निकिता दीदी के तीन दिन के प्रवास को जीवंत बनाने में श्वेता के सास-ससुर और पति उदित ने कोेई कसर नहीं छोड़ी थी. श्वेता साफ़ देख रही थी कि उसके वजूद को हाथोंहाथ लिए उसकी हर इच्छा को सम्मान देनेवाले इस नए भरे-पूरे परिवार को देखकर निकिता अभिभूत है. ऐसे में इस तरह की टिप्पणी… यथार्थ से नितांत परे थी.
“क्या हुआ श्वेता? बुरा मान गई क्या? मैं तो बस इतना चाहती हूं कि दूसरों को ख़ुश करने और वाहवाही लूटने के चक्कर में तू अपना मटियामेट ना कर ले. यूं ही पूरी तनख़्वाह लाकर उदित के हाथ में दे देती है और उदित अपनी मम्मी को, और तो और, आए दिन सबके लिए गिफ्ट लाती रहती है. ये सब क्या है? जब से आई हूं, तेरी सास के मुंह से सुन रही हूं, श्वेता ने ये दिया, श्वेता ने वो दिया. कुछ उन्होंने भी दिया है या नहीं.”
“दीदी, उन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया है. उदित जैसा प्यार करनेवाला पति और अपना संरक्षण, जिसके तले हम अपना जीवन सुकून से बिता रहे हैं. लाइफ में और क्या चाहिए? रही मम्मी-पापा की बात, तो उनको अपनी पेंशन मिलती है. हम क्या दे सकते हैं उन्हें? दे तो वो रहे हैं हमें, एक स्ट्रेसफ्री लाइफ…”
“फिर भी श्वेता किसी के हाथ में अपनी सारी सैलेरी रख देना, अ़क्लमंदी नहीं है. आज ये प्यार लुटा रहे हैं, कल क्या हालात हों, कौन जानता है. ये तो ख़ुदकुशी करने जैसा है.
मुझे देख, अपनी और अमोल दोनों की सैलेरी को मुट्ठी में रखती हूं.”
“दीदी, थोड़ा समर्पण और उनका विश्वास भी अपनी मुट्ठी में करना सीखो, वरना ये तो निरी रेत है, फिसल गई, तो हाथ खाली रह जाएंगे.”
“रहने दे श्वेता, समर्पण और विश्वास निरी क़िताबी बातें हैं. यही रिश्ते कल क्या रूप धरें, कौन जानता है?”
“कल के हालात से डरकर हम आज रिश्तों में दरारें डालें, उन्हें खाद-पानी से वंचित, स़िर्फ इसलिए सूखने दें कि कल इसमें फल कहीं कड़वे ना लग जाएं. आप जिसे बेव़कूफ़ी कह रही हैं, मैं उसे इन्वेस्टमेंट कहती हूं. रिश्तों का इन्वेस्टमेंट…
मेरी मानिए, तो आप भी अपनी ससुराल में यह इन्वेस्टमेंट करके जीवनभर मुनाफ़ा कमाइए.”
“तू और तेरी बड़ी-बड़ी बातें… कल जब ये लोग सब कुछ तेरी ननद को उठाकर दे देंगे, तब देखती हूं, तेरा ये इन्वेस्टमेंट कहां काम आता है?” श्वेता चुप थी. शायद दीदी को बदलना उसके हाथ में नहीं था. पर निकिता ख़ुश थी… आख़िर आज उसे श्वेता को नीचा दिखाने का मौक़ा मिल ही गया. याद आया, किस तरह से उससे तीन साल छोटी बहन ने अमोल के सामने उसे निरुत्तर कर दिया था. एक बार निकिता ने श्वेता को बताया कि अमोल ने उससे घर के पज़ेशन के वक़्त थोड़ी-सी फाइनेंशियल हेल्प मांगी थी, पर निकिता ने अमोल को साफ़ मना कर दिया था कि घर के बारे में सोचना उसका काम है. अगर वह हाउसवाइफ होती, तो क्या वह इंतज़ाम नहीं करते. यह बात अमोल को चुभी थी. उस दिन के बाद निकिता से कभी कुछ नहीं मांगा. निकिता की इस बात पर श्वेता ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे दिन दीपावली की रात अमोल ने निकिता को सोने के झुमके दिए, तो निकिता ने इतराते हुए कहा था, “दुनिया का दस्तूर है, पति की कमाई पर पत्नी का पूरा अधिकार और पत्नी की कमाई सौ टका पत्नी की. उसमें कोई हाथ नहीं लगा सकता है.” उस वक़्त श्वेता ने अपने जीजाजी का पक्ष लेते हुए हंसकर कहा था. “दीदी, ये ग़लतफ़हमी मत रखना कि हाउसवाइफ मिलने पर जीजू के हाथ खाली रह जाते. सुबह से लेकर रात को सोने तक जीजू जिस तरह से तुम्हारा हाथ बंटाते हैं, वह क़ाबिले-तारीफ़ है. आप जॉब नहीं कर रही होतीं, तो सुबह-सुबह बस स्टॉप छोड़ने की चिंता छोड़ जीजू आराम से सो रहे होते. जीजू को गर्म खाना, सुबह-शाम की चाय तो मिलती. तुम्हारे पीछे आनेवाली नौकरों की फौज संभालने का झंझट नहीं रहता.”
“अरे, बस कर, तू मेरी बहन है या दुश्मन.” निकिता ने श्वेता को टोका था. तीन साल पहले घटी इस बात को श्वेता मज़ाक समझकर भूल गई थी, पर निकिता इस सच को अमोल के सामने उजागर करने के अपराध से श्वेता को मुक्त नहीं कर पाई थी. आज हाथ आया मौक़ा वो कैसे
गंवाती, तभी शायद श्वेता को उसकी तल्ख़ बातों का सामना करना पड़ा था.
निकिता कुछ और कहती, उससे पहले श्वेता की सास दमयंतीजी आ गईं. उन्होंने श्वेता से अपने कुंदनवाले सेट को आलमारी से निकालने को कहा. बड़े अधिकार से गुच्छे को संभालती श्वेता आलमारी से कुंदन का सेट निकालकर लाई, तो मां उसे हाथों में उठाकर तौलती-सी श्वेता से बोलीं, “नंदिनी बहुत दिनों से कुंदनवाले सेट की तारीफ़ कर रही है. मुझे लगता है उसे पसंद है. सोच रही हूं, ऐसे ही हल्के में बनवाकर उसे दे दूं.”
“मम्मी, आप दीदी को यही सेट क्यों नहीं दे देतीं.” बोलती श्वेता की नज़र सहसा निकिता से मिली. वह जलती नज़रों से उसे घूर रही थी, तो उसने अचकचाकर आंखें फेर लीं.
दमयंतीजी ने कुछ नहीं कहा. बस, मुस्कुराकर सेट लेकर चली गईं. निकिता श्वेता की बेव़कूफ़ी पर कुछ कहती, उससे पहले श्वेता ने वहां से निकलने में अपनी भलाई समझी.
दूसरे दिन श्वेता की शादी की पहली सालगिरह थी. निकिता उसके कमरे में गिफ्ट लेकर पहुंची तो देखा, वह अपनी ननद नंदिनी से फोन पर बतिया रही थी, “दीदी, आप नहीं आएंगी, तो मज़ा आधा रह जाएगा, पर कोई बात नहीं. आप बच्चों के इम्तहान दिलाइए. पलक से कहना ख़ूब अच्छे नंबर लेकर आए. उसकी मामी ने उसके अच्छे रिज़ल्ट के लिए गिफ़्ट अभी से ख़रीद लिया है.” श्वेता ने फोन रखा ही था कि निकिता फिर शुरू हो गई थी. “श्वेता, गिफ्ट लेने का अधिकार तेरा बनता है.”
“ओहो दीदी! बेटी होने के नाते नंदिनी दीदी की ख़ुशी इस घर से जुड़ी है. वो ख़ुश, तो सब ख़ुश… रिश्तों में इन छोटी-मोटी भेंटों के बड़े मायने होते हैं. ये सब रिश्तों का इन्वेस्टमेंट हैं, जिसमें मेरी निकिता दीदी कभी विश्वास नहीं करती हैं.” उसने हंसते हुए कहा, “उ़फ्! तू और तेरा इन्वेस्टमेंट… गंवा देगी एक दिन अपनी सारी कमाई. विश्वास नहीं होता कि तू मेरी बहन है और ये क्या बात हुई कि मुझे रिश्तों में विश्वास नहीं है, ऐसा होता तो तेरे कहने से मैं छुट्टी लेकर तेरी मैरिज एनिवर्सरी मनाने ना चली आती.” निकिता की बात पर श्वेता ने प्यार से उनके हाथों को पकड़कर कहा, “उसके लिए मेरी प्यारी दीदी को बहुत-बहुत थैंक्स. पर एक बात बोलूं, बुरा मत मानना. मायके से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान है, क्योंकि वो बचपन से जुड़े हैं, हमें आदत है उनकी, लेकिन ससुराल से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान नहीं है. उसके लिए आपसी समझ, विश्वास और समर्पण ज़रूरी है और उसी में हम चूक कर जाते हैं.” आज के दिन निकिता छोटी बहन से बहस नहीं करना चाहती थी, सो वो चुपचाप उसे गिफ्ट देकर चली गई.
शाम तक घर सबकी हंसी से गुलज़ार था. पर निकिता का मन दरक रहा था. पिछले हफ़्ते उसकी शादी की सालगिरह तो यूं ही निकल गई.
चाहती तो अमोल के साथ कुछ सार्थक पल बिता लेती, लेकिन वो व्यावहारिक थी. जानती थी इन भावनात्मक पहलुओं से जुड़कर जीवन नहीं चलता. अमोल आनेवाली एनिवर्सरी को लेकर पसोपेश में थे. ऐसे में निकिता ने उन्हें दुविधा से उबारते हुए कहा, “तुम्हारा टूर पर जाना बहुत ज़रूरी है. टारगेट पूरा नहीं किया, तो फाइनेंशियली प्रॉब्लम हो जाएगी. घर का पज़ेशन लेना है.”
“घर नहीं, मकान.”
“हां-हां वही…” अमोल के व्यंग्यबाण को नज़रअंदाज़ कर, मन ही मन मुस्कुराते हुए बोली, “कितनी भी कोशिश कर लो, भावनाओं में बहकर, अपनी सैलेरी में हाथ नहीं लगाने दूंगी.” अपनी सेविंग्स में बरती गोपनीयता निकिता की मंशा जता देती थी. शादी के तीन साल बाद भी निकिता अमोल के परिवारवालों को अपना नहीं पाई थी. निकिता का कुछ था, तो अमोल का बनवाया मकान, उसके दिए ज़ेवर और पूरी तनख़्वाह, जिसका हिसाब-क़िताब वो समय-समय पर करती थी. उसका हमेशा से मानना रहा है कि स्त्री को अपने पैसों और अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई परेशानी ना हो. निकिता की ज़िद पर अमोल ने मकान के लिए लोन लिया, पर लोन चुकाने के चक्कर में उसे ओवरटाइम तक करना पड़ा, जिससे उसकी सेहत तक बिगड़ी. बढ़ती सेविंग्स निकिता के भविष्य को सिक्योर करती गई, पर वर्तमान उसके हाथ से कब फिसला, वह जान ही नहीं पाई.
पति और परिवार के साथ बिताए हल्के-फुल्के पलों की क़ीमत उसने नहीं आंकी थी. घर के पज़ेशन के समय भुगतान की चिंता में डूबे अमोल की हालत उसके पिता से देखी नहीं गई, उन्होंने अपनी जमापूंजी बेटे के हवाले की, तो निकिता को अपनी चतुराई पर मान हो आया. डर था कि कहीं अमोल उससे रुपए ना मांग ले, पर यहां तो सब आसानी से हल हो गया. निकिता विचारों में खोई बैठक की ओर आई, तो वहां बैठी दमयंतीजी अपने पति से बोल रही थीं, “सुनो… कुंदन का सेट मैं इस बार श्वेता को दे रही हूं. अपनी श्वेता आगे बढ़कर तो मांगेगी नहीं, सोच रही हूं गिफ्ट के बहाने दे दूंगी.” “ऊंह! बेव़कूफ़ श्वेता, सब कुछ तो इनके हवाले कर देती है. सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को कोई हलाल करता है भला.” बुदबुदाती हुई निकिता उनके पास ही चली आई, मन की कसमसाहट और बढ़ गई थी.
उदित और श्वेता भी वहां आ गए. दोनों झुककर दमयंतीजी और उमाकांतजी का आशीर्वाद लेने लगे. वो गदगद हो उठे, आशीर्वाद की झड़ी के साथ दमयंतीजी ने साधिकार बैठने का आदेश दिया और
मुस्कुराकर यह कहते हुए कुंदन का सेट श्वेता के हाथ में रख दिया, “आज इसे पहनकर डिनर पर जाना.”
“ओ मम्मी, लव यू…” श्वेता सास के गले लगी हुई थी, तभी उमाकांतजी की आवाज़ आई, “बिटिया, इसे पकड़ो और तुम लोग संभालो. पांच-पांच लाख की एफडी तुम्हारे और उदित के नाम है.”
“पर क्यों पापा?”
“क्यों की क्या बात है? सैलेरी तो तुम लोगों से संभलती नहीं, सो हमें दे देते हो. अब थोड़ी ज़िम्मेदारी तुम भी संभालो.” ससुर की आवाज़ में उलाहने का स्नेहभरा स्वांग था, जबकि आंखों में बेटे-बहू के प्रति गर्व झलक रहा था. वो बोल रहे थे.
“अब तुम लोगों को अपने बारे में सोचना नहीं आता, तो ये काम हमें करना पड़ेगा. उदित, तुम्हारी पुरानी एफडी मैच्योर हो रही है, उसे अब घर में लगा दो.”
“पापा, हम आपको इस घर में अच्छे नहीं लगते हैं क्या?” उदित की बात पर वो बोले, “आगे तुम लोग कहां रहते हो, वो बाद की बात है, फ़िलहाल एक घर तुम लोगों का अपना भी होना चाहिए. और ज़रूरी बात, नए घर की बुकिंग बहू के नाम से होगी…” ‘नए घर की बुकिंग’. ये अनुगूंज देर तक निकिता के कानों में गूंजती रही. प्रत्युत्तर में उसे अमोल की मम्मी के शब्द सुनाई दिए- ‘अमोल, घर अपने नाम से लेना.’ क्यों? का प्रश्न अमोल की तरफ़ से नहीं आया था. अमोल की मम्मी बोल रही थीं- ‘तेरी पत्नी बड़ी तेज़ है. अभी से इतना अपना-पराया है, तो बाद में क्या होगा.’ उफ़्! उस दिन आग लग गई थी निकिता के तन-बदन में. कितना सुनाया था अमोल को. पर वो चुपचाप सुनते रहे. शायद आईना दिखाकर ख़ुद को और उसे नीचे नहीं गिराना चाहते थे. अपने प्रति अविश्वास पर आश्चर्य व्यक्त करती निकिता आज चुप थी. वो देख पा रही थी, जो विश्वास श्वेता पर उसके सास-ससुर ने किया था, उसके पीछे श्वेता के छोटे-बड़े कई प्रयास थे, जिनका बड़ा प्रतिफल उसे मिला था. दमयंतीजी बोल रही थीं, “एक बार इनका घर बन जाए, तो चिंता दूर हो…”
‘घर नहीं, मकान…’ वहीं बैठी निकिता बोलना चाहती थी, पर सबके उल्लासित चेहरे देखकर चुप रही. जहां इतना उमंग-उत्साह, समर्पण-स्नेह और आदर हो, वहां मकान अपने आप ही घर बन जाता है.
एक बार फिर उसने श्वेता से ख़ुद की तुलना की तो दंग रह गई. श्वेता के गंवाने के बावजूद कई गुना हो, सब वापस कैसे मिला? जबकि उसके पास उतना ही रहा, जितना उसका हिस्सा था. वो भी सहसा हल्का हो गया. इतना हल्का कि पलड़ा हवा में लटक रहा था. जबकि श्वेता की संपदा में घरवालों का प्यार, संरक्षण और विश्वास था, तभी शायद उसका पलड़ा धरती को छू रहा था. निकिता ने बिना जांचे-परखे ही ससुराल और अमोल पर अविश्वास व्यक्त किया था. अमोल ने तो फिर भी जांच-परखकर निकिता के प्रति अविश्वास और स्वकेंद्रित नारी की छवि बनाई थी. शिकायत की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सच तो है… कितनी ऐसी ज़रूरतें आईं, जिसे वो सहज बांट सकती थी… पर ज़िम्मेदारियां और ज़रूरतें तो जीवनभर लगी रहेंगी, उसे पूरा करना पुरुष के अधिकार क्षेत्र में आता है, कहकर वह सदा अमोल को कुंठित करती रही. ख़ुद को चतुर समझनेवाली निकिता श्वेता की चतुराई पर हैरान थी. वो तो अपने हिस्से पर अपना डेरा डाले उसे सुरक्षित रखने की जद्दोज़ेहद में पड़ी रही. इधर श्वेता ने कितनी आसानी से अपने हिस्से पर सबको जगह देकर उनके दिलों पर अपना स्थान सुनिश्चित करा लिया था सदा के लिए…
मीनू त्रिपाठी

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श्रेष्ठतम कहानी” ……………..
एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही रोचक प्रयोग किया..
उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..
जैसा की अनुमान था, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..
पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..
पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..
बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..
पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..
अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..
और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..
एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए…
थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..
बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..
अब वैज्ञानिकों ने एक और मजेदार चीज़ की..
अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..
नया बन्दर वहां के नियम क्या जाने..
वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..
पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..
उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर खुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..
कुछ समय बाद उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..
इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..
इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!
प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..
पर उनका व्यवहार भी पुराने बंदरों की तरह ही था..
वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..
दोस्तों, हमारे समाज में भी ये व्यव्हार देखा जा सकता है..
जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, बिज़नेस, राजनीति, समाजसेवा या किसी और फील्ड से रिलेटेड हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..
उसे असफलता का डर दिखाया जाता है..
और मजेदार बात ये है कि उसे रोकने वाले अधिकांश वो होते हैं जिन्होंने जीवन में उस फील्ड में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..
इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों का अपोजिशन फेस करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये..
अपने ज्ञान और काबलियत की सुनिए..
और अपने लक्ष्य पर ध्यान करके आगे बढिए…
और बढ़ते रहिये..
कुछ बंदरों के व्यवहार के आगे आप भी बन्दर मत बन जाइए..😊🙏🙏

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

अपने बच्चों को आज गीता पढ़ाइये, ताकि कल को किसी कोर्ट में गीता पर हाथ ना रखना पड़े…
अच्छे संस्कार ही अपराध रोक सकते हैं…🙏

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संजय गुप्ता

गुरु पूर्णिमा 2018: जानिए क्या है गुरु पूर्णिमा का महत्व और कैसे करें गुरु की पूजा?

आज 27 जुलाई को आषाढ़ मास की पूर्णिमा है, इसको ही गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। इस दिन सभी को अपने गुरुओं को आसन प्रदान कर के अपनी श्रद्धानुसार उनका पूजन अर्चन करके उनसे आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए।

इस दिन ही वर्ष का सबसे लंबा चंद्रग्रहण भी पड़ रहा है. जो रात्रि 11:54 से प्रारंभ होगा और रात्रि 3:49 तक रहेगा। जिसका सूतक 9 घंटे पूर्व दोपहर 2:54 से प्रारंभ हो जाएगा।

इस दिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा है, इसको ही गुरु पूर्णिमा कहते हैं. इस दिन गुरु पूजा का विधान है. गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है. इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं. ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं. न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं. जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता और फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरु चरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

गुरु पूर्णिमा का यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी. इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है. उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है।

भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।

‘राम कृष्ण सबसे बड़ा उनहूं तो गुरु कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी गुरु आज्ञा आधीन॥’

गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रों ने की है. ईश्वर के अस्तित्व में मतभेद हो सकता है, किंतु गुरु के लिए कोई मतभेद आज तक उत्पन्न नहीं हो सका है। गुरु की महत्ता को सभी धर्मों और संप्रदायों ने माना है. प्रत्येक गुरु ने दूसरे गुरुओं को आदर-प्रशंसा और पूजा सहित पूर्ण सम्मान दिया है. भारत के बहुत से संप्रदाय तो केवल गुरुवाणी के आधार पर ही कायम हैं।

क्या है गुरु का अर्थ?

भारतीय संस्कृति के वाहक शास्त्रों गुरु का अर्थ बताया गया है. गुरु में गु का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का अर्थ है- उसका निरोधक. गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है. अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु और देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी है. बल्कि सद्गुरुकी कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

आषाढ़ की पूर्णिमा ही क्यों है गुरु पूर्णिमा????

आषाढ़ की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के पीछे गहरा अर्थ है। अर्थ है कि गुरु तो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह हैं जो पूर्ण प्रकाशमान हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह, आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे बादलरूपी शिष्यों से गुरु घिरे हों। शिष्य सब तरह के हो सकते हैं, जन्मों के अंधेरे को लेकर आ छाए हैं।

वे अंधेरे बादल की तरह ही हैं. उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सके, तो ही गुरु पद की श्रेष्ठता है. इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का महत्व है, इसमें गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी यह इशारा तो है ही कि दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है.

गुरु पूर्णिमा पर्व का महत्व : – जीवन में गुरु और शिक्षक के महत्व को आने वाली पीढ़ी को बताने के लिए यह पर्व आदर्श है। व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा अंधविश्वास के आधार पर नहीं बल्कि श्रद्धाभाव से मनाना चाहिए।

गुरु का आशीर्वाद सबके लिए कल्याणकारी और ज्ञानवर्द्धक होता है, इसलिए इस दिन गुरु पूजन के उपरांत गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। सिख धर्म में इस पर्व का महत्व अधिक इस कारण है क्योंकि सिख इतिहास में उनके दस गुरुओं का बेहद महत्व रहा है।

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डॉ घनश्याम गर्ग

🌸गुरु पूर्णिमा क्यों मनायी जाती हैं ?
(Guru purnima kyo manayi jati hai ?)

हरि ॐ,
गुरु पूर्णिमा क्यो मनायी जाती हैं ?
गुरु पूर्णिमा का महत्व क्या है ?
आज यहाँ इस पोस्ट के माध्यम से सविस्तार जानिए…

  1. गुरु पूर्णिमा कब आती हैं ?

➖गुरु पूर्णिमा वर्षाऋतु के आरंभ में अषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा आती हैं |

  1. क्या है गुरु पूर्णिमा ?

➖गुरु पूर्णिमा यह एक गुरु और शिष्य का पर्व हैं यह एक ऐसा पर्व है जिस दिन हम अपने गुरुजनो , महा पुरुषों , माता-पिता तथा श्रेष्ठ जनो
के लिए कृतग्नता व्यक्त करते हैं | पूरे विश्व में अषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन गुरु
की पूजा करने का विधान है | उस दिन हर शिष्य अपने गुरु की पूजा करता है |

  1. क्यों चूना यही दिन ?

➖गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर जो ओर तिथि हो ही नहीं सकती | क्योंकि गुरु और पूर्णत्व दोनो एकदूसरे के समानार्थी हैं |जिस तरह चन्द्रमा पूर्णिमा की रात सर्व कलाओं से परिपूर्ण होता हैं और अपनी शीतल रश्मियां समभाव से सभी को वितरित करता है उसी तरह संपूर्ण ग्यान से गुरु अपने शिष्यों को अपने ज्ञान से आप्लावित करता है |
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण दृैपायन व्यास का जन्मदिन है |वे संस्कृत के बहुत ही बड़े विद्वान थे |उन्होने वेदो का विस्तार किया और कृष्ण द्वैपायन से ‘वेद व्यास’ कहलाये | यही कारण से इस गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा ‘ भी कहते हैं | 18 पूराणों और 16 शास्त्रो के रचयिता वेद व्यास जी ने गुरु के सम्मान मे विशेष पर्व मनाने के लिए अषाढ़ मास की पूर्णिमा को चूना | कहा जाता है कि वेद व्यास जी ने अपने शिष्यों एवं मुनियो को सबसे पहले श्री भागवत पूराण का ज्ञान इसी दिन दिया था | वेद व्यास जी के अनेक शिष्यों में से पांच शिष्यों ने गुरु पूजा की परंपरा डाली | पुष्प मंडप में उच्चा आसन पर व्यास जी को बिठाकर पुष्पमाला अर्पित की और आरती की एवं अपने ग्रंथ किए | तब से इस पर्व को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है |

  1. क्यों मनाते हैं गुरु पूर्णिमा ?

➖शास्त्रो में ‘गुरु’ शब्द का अर्थ बताया गया है कि ‘गु ‘ का अर्थ है अंधकार या मूल अज्ञान और ‘र’ का अर्थ है कि निरोधक | अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जानेवाले को गुरु कहते हैं | देवता एवं गुरु में समानता के लिए एक श्लोक मे बताया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही भक्ति गुरु के लिए भी है | सद् गुरु की कृपा से जीवन में इश्वर का भी
साक्षातकार करना संभव है | सद्गुरु के बिना या अभाव में कुछ भी संभव नहीं है

🙏🏻ॐ🙏🏻🚩

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देव शर्मा

गुरुपूर्णिमा विशेष
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आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

इस वर्ष गुरू पूर्णिमा आज 27 जुलाई 2018, को मनाई जाएगी. गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है. हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर. इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है.

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा.

ज्ञान का मार्ग गुरू पूर्णिमा
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शास्त्रों में गुरू के अर्थ के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है. गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं. गुरु की भक्ति में कई श्लोक रचे गए हैं जो गुरू की सार्थकता को व्यक्त करने में सहायक होते हैं. गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता.

भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की.

गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है.

गुरू आत्मा – परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है , गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय.

गुरु पूर्णिमा पौराणिक महत्व
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गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.

गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.

वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ‘गुरु पूर्णिमा’ अथवा ‘व्यास पूर्णिमा’ है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा है।

शास्त्रोक्त श्री गुरु पूजन विधि
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इस साधना के लिए प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर, स्नानादि करके, पीले या सफ़ेद आसन पर पूर्वाभिमुखी होकर बैठें बाजोट पर पीला कपड़ा बिछा कर उसपर केसर से “ॐ” लिखी ताम्बे या स्टील की प्लेट रखें। उस पर पंचामृत से स्नान कराके “गुरु यन्त्र” व “कुण्डलिनी जागरण यन्त्र” रखें। सामने गुरु चित्र भी रख लें। अब पूजन प्रारंभ करें।

पवित्रीकरण
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बायें हाथ में जल लेकर दायें हाथ की उंगलियों से स्वतः पर छिड़कें।

ॐ अपवित्रः पवित्रो व सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।

आचमन
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निम्न मंत्रों को पढ़ आचमनी से तीन बार जल पियें।

ॐ आत्म तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।
ॐ ज्ञान तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।
ॐ विद्या तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।

१ माला जाप करे अनुभव करे हमरे पाप दोस समाप्त हो रहे है। .

ॐ ह्रौं मम समस्त दोषान निवारय ह्रौं फट
संकल्प ले फिर पूजन आरम्भ करे ।

सूर्य पूजन
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कुंकुम और पुष्प से सूर्य पूजन करें।

ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्येन सविता रथेन याति भुनानि पश्यन ।।

ॐ पश्येन शरदः शतं श्रृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतं। जीवेम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात।।

ध्यान
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अचिन्त्य नादा मम देह दासं, मम पूर्ण आशं देहस्वरूपं।न जानामि पूजां न जानामि ध्यानं, गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

ममोत्थवातं तव वत्सरूपं, आवाहयामि गुरुरूप नित्यं। स्थायेद सदा पूर्ण जीवं सदैव, गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं ।।

आवाहन
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ॐ स्वरुप निरूपण हेतवे श्री निखिलेश्वरानन्दाय गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

ॐ स्वच्छ प्रकाश विमर्श हेतवे श्री सच्चिदानंद परम गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

ॐ स्वात्माराम पिंजर विलीन तेजसे श्री ब्रह्मणे पारमेष्ठि गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

स्थापन
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गुरुदेव को अपने षट्चक्रों में स्थापित करें।

श्री शिवानन्दनाथ पराशक्त्यम्बा मूलाधार चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री सदाशिवानन्दनाथ चिच्छक्त्यम्बा स्वाधिष्ठान चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री ईश्वरानन्दनाथ आनंद शक्त्यम्बा मणिपुर चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री रुद्रदेवानन्दनाथ इच्छा शक्त्यम्बा अनाहत चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री विष्णुदेवानन्दनाथ क्रिया शक्त्यम्बा सहस्त्रार चक्रे स्थापयामि नमः।

पाद्य
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मम प्राण स्वरूपं, देह स्वरूपं समस्त रूप रूपं गुरुम् आवाहयामि पाद्यं समर्पयामि नमः।

अर्घ्य
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ॐ देवो तवा वई सर्वां प्रणतवं परी संयुक्त्वाः सकृत्वं सहेवाः। अर्घ्यं समर्पयामि नमः।

गन्ध
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ॐ श्री उन्मनाकाशानन्दनाथ – जलं समर्पयामि।

ॐ श्री समनाकाशानन्दनाथ – स्नानं समर्पयामि।

ॐ श्री व्यापकानन्दनाथ – सिद्धयोगा जलं समर्पयामि।

ॐ श्री शक्त्याकाशानन्दनाथ – चन्दनं समर्पयामि।

ॐ श्री ध्वन्याकाशानन्दनाथ – कुंकुमं समर्पयामि।

ॐ श्री ध्वनिमात्रकाशानन्दनाथ – केशरं समर्पयामि।

ॐ श्री अनाहताकाशानन्दनाथ – अष्टगंधं समर्पयामि।

ॐ श्री विन्द्वाकाशानन्दनाथ – अक्षतां समर्पयामि।

ॐ श्री द्वन्द्वाकाशानन्दनाथ – सर्वोपचारां समर्पयामि।

पुष्प, बिल्व पत्र
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तमो स पूर्वां एतोस्मानं सकृते कल्याण त्वां कमलया सशुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध स चिन्त्य अचिन्त्य वैराग्यं नमितांपूर्ण त्वां गुरुपाद पूजनार्थंबिल्व पत्रं पुष्पहारं च समर्पयामि नमः।

दीप
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श्री महादर्पनाम्बा सिद्ध ज्योतिं समर्पयामि।

श्री सुन्दर्यम्बा सिद्ध प्रकाशम् समर्पयामि।

श्री करालाम्बिका सिद्ध दीपं समर्पयामि।

श्री त्रिबाणाम्बा सिद्ध ज्ञान दीपं समर्पयामि।

श्री भीमाम्बा सिद्ध ह्रदय दीपं समर्पयामि।

श्री कराल्याम्बा सिद्ध सिद्ध दीपं समर्पयामि।

श्री खराननाम्बा सिद्ध तिमिरनाश दीपं समर्पयामि।

श्री विधीशालीनाम्बा पूर्ण दीपं समर्पयामि।

नीराजन
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ताम्रपात्र में जल, कुंकुम, अक्षत अवं पुष्प लेकर यंत्रों पर समर्पित करें।

श्री सोममण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री सूर्यमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री अग्निमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री ज्ञानमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री ब्रह्ममण्डल नीराजनं समर्पयामि।

पञ्च पंचिका
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अपने दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न पञ्च पंचिकाओं का उच्चारण करते हुए इन दिव्य महाविद्याओं की प्राप्ति हेतु गुरुदेव से निवेदन करें।

पञ्चलक्ष्मी
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श्री विद्या लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री एकाकार लक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री महालक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्रिशक्तिलक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री सर्वसाम्राज्यलक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकोश
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श्री विद्या कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री परज्योति कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री परिनिष्कल शाम्भवी कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री अजपा कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री मातृका कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकल्पलता
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श्री विद्या कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्वरिता कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री पारिजातेश्वरी कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्रिपुटा कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री पञ्च बाणेश्वरी कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकामदुघा
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श्री विद्या कामदुघाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री अमृत पीठेश्वरी कामदुघाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

तदोपरांत गुरुदेव की आरती करें

आरती
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आरती करूँ आरती सद्गुरु की
प्यारे गुरुवर की आरती, आरती करूँ गुरुवर की।

जय गुरुदेव अमल अविनाशी, ज्ञानरूप अन्तर के वासी,
पग पग पर देते प्रकाश, जैसे किरणें दिनकर कीं।
आरती करूँ गुरुवर की॥

जब से शरण तुम्हारी आए, अमृत से मीठे फल पाए,
शरण तुम्हारी क्या है छाया,
कल्पवृक्ष तरुवर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

ब्रह्मज्ञान के पूर्ण प्रकाशक, योगज्ञान के अटल प्रवर्तक।
जय गुरु चरण-सरोज मिटा दी, व्यथा हमारे उर की। आरती करूँ गुरुवर की।

अंधकार से हमें निकाला, दिखलाया है अमर उजाला,
कब से जाने छान रहे थे, खाक सुनो दर-दर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

संशय मिटा विवेक कराया, भवसागर से पार लंघाया,
अमर प्रदीप जलाकर कर दी, निशा दूर इस तन की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

भेदों बीच अभेद बताया,… आवागमन विमुक्त कराया,
धन्य हुए हम पाकर धारा, ब्रह्मज्ञान निर्झर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

करो कृपा सद्गुरु जग-तारन,
सत्पथ-दर्शक भ्रान्ति-निवारन,
जय हो नित्य ज्योति दिखलाने वाले लीलाधर की।
आरती करूँ आरती सद्गुरु की
प्यारे गुरुवर की आरती, आरती करूँ गुरुवर की।
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Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

नीरज वर्मा

सद्गुरु – “मनगढ़ंत” और “प्रतिस्पर्धा” (Competition) से जन्मा शब्द !!!
गुरु – “संपूर्ण” शब्द !!!

आप शास्त्र में और किसी भी शब्दकोष में शब्द “सद्गुरु” नहीं पाएँगे। गुरू का विलोम शब्द है – शिष्य। यदि आप सद्गुरु का विलोम शब्द ढुँढने का प्रयास करें तो कुछ भी समझ नहीं आएगा क्योंकि शब्द “सद्गुरु” तो प्रचार, प्रसार और व्यवहार में आ गया किंतु, उसके विलोम शब्द की किसी को आवश्यकता नहीं है। यदि सद्गुरु है तो असद्गुरु भी अवश्य होना चाहिए। असद्गुरु का क्या अर्थ होगा – स्वयं विचार करें।

वर्तमान में तथाकथित गुरुओं की बाढ़ सी आ गई है। उन गुरुओं में उत्कृष्ट गुरु चयन करने की प्रक्रिया या स्वयं को उत्कृष्ट घोषित करने के क्रम में ही यानी प्रतिस्पर्धा (Competition) के फलस्वरूप ही शब्द “सद्गुरु” स्थापित हो गया। वास्तव में, गुरु उत्कृष्ट और निकृष्ट होता ही नहीं है। जो हमें मोक्ष/कैवल्य प्राप्त करने में सहयोग कर सकता है केवल उसी का नाम गुरु है !

कहते हैं, “कृष्णं वंदे जगद्गुरुं” – भगवान् श्रीकृष्ण के लिए भी “गुरु” शब्द ही कहा जाता है, सद्गुरु नहीं!

शास्त्र के अनुसार, “गु” का अर्थ है – अंधकार या मूल अज्ञान/अविद्या और “रु” का अर्थ है उसका निरोधक। अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले का नाम “गुरु” है।सत् बुद्धि से युक्त और गुणातीत (सत्व, रज और तम के परे) जो निरंतर भगवान् में मन वाले और जिन्होंने भगवान् में ही प्राणों को अर्पण कर दिया है। जिनके द्वारा चेतनतत्त्व सिद्ध है। जिनका भगवान् पर विश्वास नहीं है बल्कि, जिनके द्वारा भगवान् सिद्ध है। अनन्यदर्शी (न अन्य) तथा जो अपने लिए योगक्षेम (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है) सम्बन्धी चेष्टा भी नहीं करते क्योंकि वे जीने और मरने में भी अपनी वासना नहीं रखते, केवल भगवान् ही जिनके अवलम्बन हैं तथा जो भगवान् के प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित भगवान् का कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट रहते हैं और वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं। जो संपूर्ण भक्ति और ज्ञान दोनों से युक्त हैं। इस लोक में रमण करनेवाले केवल ऐसे व्यक्तित्व का नाम “गुरु” है।

“आषाढ़ मास” की “पूर्णिमा” का नाम “गुरु पूर्णिमा” है, “सद्गुरु पूर्णिमा” नहीं है। इस दिन से चार महीने तक साधु संत ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।

क्या वर्तमान काल के ये तथाकथित धर्म गुरु ऐसा करते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं बल्कि वे तो बड़े-बड़े और महंगे मंच पर कीमती वस्त्रों में सुसज्जित होकर अपने तथाकथित शिष्यों से गुरु पूजा के बहाने स्वयं की पूजा करवाने में भी तनिक भी नहीं हिचकिचाते हैं। उन्हें तो संभवतः उपरोक्त चार महीने के महत्व का ज्ञान भी न हो।

इसी दिन “महाभारत” के रचयिता “कृष्ण द्वापायन व्यास” का जन्मदिन है। कृष्ण द्वापायन व्यास जी भी गुरु के रूप में जाने जाते हैं, सद्गुरु के रूप में नहीं!

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जय श्री कृष्ण !!