Posted in संस्कृत साहित्य

विष्णु अरोड़ा

बिलाड़ा का प्राचीन नाम “बलिपुर” था| इसकी स्थापना दानवीर असुर राजा बलि ने हज़ारों वर्षों पहले की| “वीणा” नामक नदी के किनारे बसे होने के कारण बिलाड़ा को “वीणातट नगर” के नाम से भी जाना जाता था। उस समय बिलाड़ा एक समृद्ध राज्य की राजधानी हुआ करता था| असुर राजा बलि, राजा विरोचन के पुत्र थे और भक्त प्रहलाद के पौत्र थे| राजा बलि को इतिहास में एक दानवीर शासक के रूप में जाना जाता हैं| प्राचीन ग्रंथों एवं कथाओं के अनुसार एक बार राजा बलि ने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को जीतने के लिए सौ यज्ञों का आयोजन करवाया| इनमें से सौ वाँ यज्ञ बलिपुर (जिसे आज बिलाड़ा के रूप में जाना जाता हैं) में आयोजित किया| सौ वाँ यज्ञ पूरा होने से पहले ही भगवान् विष्णु वामन अवतार (जिसे बामन अवतार भी कहा जाता हैं) धारण करके एक भिक्षुक की भाँति आये| उन्होंने राजा बलि से तपस्या के लिए भिक्षा में तीन चरण भूमि मांगी| राजा बलि एक दानवीर राजा थे| उन्होंने तीन चरण भूमि देने का वचन दे दिया| इतना होते ही वामन अवतार के रूप में भगवान् विष्णु ने अपना विराट रूप धारण किया| दो कदमों में ही संपूर्ण ब्रम्हांड मापने के बाद उन्होंने राजा बलि से तीसरा कदम रखने के लिए पूछा| दानवीर राजा बलि ने अपने मस्तक आगे कर दिया| भगवान् विष्णु ने राजा बलि के मस्तक पर पैर रखा और उन्हें पाताल लोक भेज दिया| राजा बलि द्वारा किये गए यज्ञों के प्रमाण आज भी बिलाड़ा में अपभ्रंश के रूप में मौजूद हैं!

बिलाड़ा श्री आईमाताजी की पवित्र नगरी के रूप में संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है| नवदुर्गा अवतार श्री आईमाता जी ने गुजरात के अम्बापुर में अवतार लिया| अम्बापुर में कई चमत्कारों के पश्चात श्री आईमाता जी देशाटन करते हुए बिलाड़ा पधारे| यहाँ पर उन्होंने भक्तों को सदैव सन्मार्ग पर चलने के सदुपदेश दिए| एक दिन उन्होंने हज़ारों भक्तों के समक्ष स्वयं को अखंड ज्योति में विलीन कर दिया| इसी अखंड ज्योति से केसर का प्रकट होना मंदिर में माताजी की उपस्थिति का साक्षात् प्रमाण है| इसीलिए राजस्थान में सदियों से बिलाड़ा की महिमा का वर्णन कुछ इस प्रकार से लिया जाता है –
बिलाड़ो बलिराज रौ, जठै आई जी रौ थान |
गंगा बहवे गौरवे, नित रा करौ सिनान ||

बिलाड़ा मारवाड़ की महत्वपूर्ण रियासत रहा हैं| जोधपुर के पूर्व महाराजा जसवंत सिंह जी ने बिलाड़ा को मारवाड़ राज्य के ढाई घरों में से एक घर कहा हैं| उनके अनुसार –

एक घर रियां सेठ रो, दूजौ देस दीवान|
आधा में मरुधर बसे, जसवंत मुख फरमान||
(अर्थात – मारवाड़ में कुल ढाई घर माने गए हैं| एक घर रियां सेठ का हैं| दूसरा बिलाड़ा के दीवान का है| तत्कालीन जोधपुर दरबार या मरुधर देश आधे घर के रूप में हैं|)
इस कथन के पीछे एक एतिहासिक तथ्य हैं| एक बार जोधपुर राज्य की माली हालत खराब हो गयी| उस समय जोधपुर राज्य की मदद करने के लिए बिलाड़ा के निकट. पीपाड़ के पास स्थित रियाँ गाँव के सेठ ने अपार धन संपत्ति जोधपुर भेजी| और बिलाड़ा के तत्कालीन दीवान साहब ने बिलाड़ा से जोधपुर तक अनाज से भरी गाड़ियों की लाइन लगा दी| उस समय के इस अदभुत नज़ारे को देखकर ही तत्कालीन जोधपुर के महाराजा ने यह दोहा कहा|

Author:

Buy, sell, exchange books