Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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एक समय की बात है एक रमणीय वन में एक आश्रम था. वहाँ महान ऋषि धौम्य अपने अनेकों शिष्यों के साथ रहते थे. एक दिन एक तंदुरूस्त एवं सुगठित बालक ,उपमन्यु, आश्रम में आया. वह देखने में शांत, मैला व अव्यस्थित था. बालक ने महान ऋषि धौम्य को नमन किया और उसे उनका शिष्य स्वीकार करने का निवेदन किया.
उन दिनों जीवन के वास्तविक आदर्शों तथा सभी में ईश्वर को देखने की शिक्षा-प्रशिक्षण देने के लिए, शिष्यों को स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय गुरु का होता था.
ऋषि धौम्य इस तगड़े बालक उपमन्यु को स्वीकार करने के लिए सहमत हो गए. हालाँकि उपमन्यु आलसी तथा मंद बुद्धि था पर उसे आश्रम के अन्य सभी शिष्यों के साथ रखा गया. वह अपने अध्ययन में ज़्यादा रूचि नहीं लेता था. वह धर्मग्रंथों को ना तो समझ पाता था और ना ही उन्हें कंठस्त कर पाता था. उपमन्यु आज्ञाकारी भी नहीं था. उसमें कई उत्तम गुणों का अभाव था.
ऋषि धौम्य एक ज्ञानसम्पन्न आत्मा थे. उपमन्यु के सभी दोषों के बावजूद वह उससे प्रेम करते थे. वे उपमन्यु को अपने अन्य उज्जवल शिष्यों से भी अधिक प्यार करते थे. उपमन्यु भी ऋषि धौम्य को अपना प्रेम लौटाने लगा. अब वह अपने गुरु के लिए कुछ भी करने को तैयार था.

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गुरु को ज्ञात था कि उपमन्यु अत्यधिक खाता है और इस कारण सुस्त और मंद था. अत्यधिक भोजन इंसान को उनींदा और अस्वस्थ महसूस कराता है और हम स्पष्ट रूप से सोच नहीं पाते. इससे ‘तमोगुण ‘ (सुस्ती) का विकास होता है. ऋषि धौम्य चाहते थे कि उनके सभी शिष्य उतना ही खायें जितना स्वस्थ शरीर के लिए अनिवार्य है तथा ४” की निरंकुश जीभ पर नियंत्रण रखें.
अतः ऋषि धौम्य ने उपमन्यु को आश्रम की गायों को चराने के लिए अति सवेरे भेजा और संध्याकाल लौटने को कहा. ऋषि की पत्नी उपमन्यु के लिए दोपहर का आहार बनाकर देतीं थीं.
पर उपमन्यु की भूख जोरावर थी. भोजन करने के पश्चात् भी वह भूखा रहता था. अतः वह गायों का दूध दोहकर दूध पी लेता था. ऋषि धौम्य ने देखा की उपमन्यु मोटा हो रहा था. ऋषि चकित थे कि गायों के साथ चारागाह तक चलने और सादा भोजन करने के बाद भी उपमन्यु का मोटापा कम नहीं हो रहा था. उपमन्यु से सवाल करने पर उसने ईमानदारी से बताया कि वह गायों का दूध पी रहा था. ऋषि धौम्य ने कहा कि उसे दूध नहीं पीना चाहिए क्योंकि वह गायें उसकी नहीं थीं. उपमन्यु अपने गुरु की आज्ञा के बिना दूध नहीं पी सकता था.
उपमन्यु सरलता से सहमत हो गया. उसने देखा कि बछड़े जब अपनी माताओं से दूध पीते थे तो दूध की कुछ बूँदें गिर जातीं थीं. वह इस दूध को अपने हाथों से एकत्रित कर पी जाता था.
ऋषि धौम्य ने देखा कि अभी भी उपमन्यु का वज़न कम नहीं हो रहा था. उन्हें बालक से ज्ञात हुआ कि वह क्या कर रहा था. ऋषि ने उपमन्यु को सप्रेम समझाया कि गाय के मुँह से गिरा हुआ दूध पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है. उपमन्यु ने कहा कि वह इस दूध का सेवन पुनः नहीं करेगा.
परन्तु उपमन्यु अभी भी अपनी भूख पर नियंत्रण नहीं कर पाया. एक दोपहर उसने पेड़ पर कुछ फल देखे और उन्हें खा लिया. ये फल जहरीले थे और उन्होनें उपमन्यु को अँधा बना दिया. उपमन्यु दहल गया और यहाँ-वहॉँ लड़खड़ाते हुए एक गहरे कुएँ में जा गिरा. जब गायें उसके बिना घर लौट गईं तो ऋषि धौम्य उपमन्यु की तलाश में निकल गए.guru4उन्होंने उसे एक कुएँ में पाया और उसे बाहर निकालकर लाये. उपमन्यु के लिए दया और करुणा से परिपूर्ण ऋषि धौम्य ने उसे एक मन्त्र सिखाया. इस मन्त्र के उच्चारण से जुड़वाँ अश्विनकुमार (देवताओं के चिकित्सक) प्रकट हुए और उन्होंने उपमन्यु की दृष्टि वापस लौटा दी.
तत्पश्चात ऋषि धौम्य ने उपमन्यु को समझाया कि लालच उसे तबाही की ओर ले गया था. लालच ने उपमन्यु को अँधा बना दिया और वह कुएँ में गिर गया. वहॉँ उसकी मृत्यु भी हो सकती थी. बालक को उसका सबक समझ में आ गया और उसने अत्यधिक खाना छोड़ दिया. जल्द ही वह दुरूस्त, स्वस्थ और बुद्धिमान व चतुर भी बन गया.
ऋषि धौम्य ने उपमन्यु के हृदय में गुरु के लिए प्रेम उत्पन्न किया अतः गुरु ने ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता, की भूमिका अदा की.
ऋषि ने अपने प्रेमपूर्ण सुझाव से अपमन्यु में प्रेम की संरक्षा की तथा उसे कुएँ में मरने से बचाया. अतः गुरु ने विष्णु, संरक्षक, की भूमिका अदा की.
अंततः गुरु ने उपमन्यु की लालच का विनाश कर महेश्वर, तमोगुणों के विनाशक, की भूमिका अदा की और उपमन्यु को सफलता की ओर अग्रसर किया.

Posted in संस्कृत साहित्य

विष्णु अरोड़ा

बिलाड़ा का प्राचीन नाम “बलिपुर” था| इसकी स्थापना दानवीर असुर राजा बलि ने हज़ारों वर्षों पहले की| “वीणा” नामक नदी के किनारे बसे होने के कारण बिलाड़ा को “वीणातट नगर” के नाम से भी जाना जाता था। उस समय बिलाड़ा एक समृद्ध राज्य की राजधानी हुआ करता था| असुर राजा बलि, राजा विरोचन के पुत्र थे और भक्त प्रहलाद के पौत्र थे| राजा बलि को इतिहास में एक दानवीर शासक के रूप में जाना जाता हैं| प्राचीन ग्रंथों एवं कथाओं के अनुसार एक बार राजा बलि ने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को जीतने के लिए सौ यज्ञों का आयोजन करवाया| इनमें से सौ वाँ यज्ञ बलिपुर (जिसे आज बिलाड़ा के रूप में जाना जाता हैं) में आयोजित किया| सौ वाँ यज्ञ पूरा होने से पहले ही भगवान् विष्णु वामन अवतार (जिसे बामन अवतार भी कहा जाता हैं) धारण करके एक भिक्षुक की भाँति आये| उन्होंने राजा बलि से तपस्या के लिए भिक्षा में तीन चरण भूमि मांगी| राजा बलि एक दानवीर राजा थे| उन्होंने तीन चरण भूमि देने का वचन दे दिया| इतना होते ही वामन अवतार के रूप में भगवान् विष्णु ने अपना विराट रूप धारण किया| दो कदमों में ही संपूर्ण ब्रम्हांड मापने के बाद उन्होंने राजा बलि से तीसरा कदम रखने के लिए पूछा| दानवीर राजा बलि ने अपने मस्तक आगे कर दिया| भगवान् विष्णु ने राजा बलि के मस्तक पर पैर रखा और उन्हें पाताल लोक भेज दिया| राजा बलि द्वारा किये गए यज्ञों के प्रमाण आज भी बिलाड़ा में अपभ्रंश के रूप में मौजूद हैं!

बिलाड़ा श्री आईमाताजी की पवित्र नगरी के रूप में संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है| नवदुर्गा अवतार श्री आईमाता जी ने गुजरात के अम्बापुर में अवतार लिया| अम्बापुर में कई चमत्कारों के पश्चात श्री आईमाता जी देशाटन करते हुए बिलाड़ा पधारे| यहाँ पर उन्होंने भक्तों को सदैव सन्मार्ग पर चलने के सदुपदेश दिए| एक दिन उन्होंने हज़ारों भक्तों के समक्ष स्वयं को अखंड ज्योति में विलीन कर दिया| इसी अखंड ज्योति से केसर का प्रकट होना मंदिर में माताजी की उपस्थिति का साक्षात् प्रमाण है| इसीलिए राजस्थान में सदियों से बिलाड़ा की महिमा का वर्णन कुछ इस प्रकार से लिया जाता है –
बिलाड़ो बलिराज रौ, जठै आई जी रौ थान |
गंगा बहवे गौरवे, नित रा करौ सिनान ||

बिलाड़ा मारवाड़ की महत्वपूर्ण रियासत रहा हैं| जोधपुर के पूर्व महाराजा जसवंत सिंह जी ने बिलाड़ा को मारवाड़ राज्य के ढाई घरों में से एक घर कहा हैं| उनके अनुसार –

एक घर रियां सेठ रो, दूजौ देस दीवान|
आधा में मरुधर बसे, जसवंत मुख फरमान||
(अर्थात – मारवाड़ में कुल ढाई घर माने गए हैं| एक घर रियां सेठ का हैं| दूसरा बिलाड़ा के दीवान का है| तत्कालीन जोधपुर दरबार या मरुधर देश आधे घर के रूप में हैं|)
इस कथन के पीछे एक एतिहासिक तथ्य हैं| एक बार जोधपुर राज्य की माली हालत खराब हो गयी| उस समय जोधपुर राज्य की मदद करने के लिए बिलाड़ा के निकट. पीपाड़ के पास स्थित रियाँ गाँव के सेठ ने अपार धन संपत्ति जोधपुर भेजी| और बिलाड़ा के तत्कालीन दीवान साहब ने बिलाड़ा से जोधपुर तक अनाज से भरी गाड़ियों की लाइन लगा दी| उस समय के इस अदभुत नज़ारे को देखकर ही तत्कालीन जोधपुर के महाराजा ने यह दोहा कहा|