Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अनूप सिन्हा

                              प्रेरक   प्रसंग

पषाण गढ़ि कै मूरति कीनी

  सन्त गाडगे महाराज जब महाराष्ट्र के एक ग्राम में पहुँचे, तो उन्हें वहाँ नदी के किनारे सैकड़ों शिवालय दिखाई दिखे और यह देख उन्हें मन ही मन हँसी आ गयी ।
  रात्रि को एक मंदिर में उनके कीर्तन का आयोजन किया गया, किन्तु उन्हें यह देख दुःख हुआ कि श्रोताओं की उपस्थिति बहुत कम है ।  दूसरे दिन सुबह जब लोग उनसे मिलने आये, तो उन्होंने कहा,  "यहाँ जितने मन्दिर हैं, उतने लोग भी कल के कीर्तन में नहीं आये थे ।"  यह सुन कुछ लोगों को हँसी आ गयी ।  तब वे बोले,  "हँसते क्यों हो, बाबा ! क्या तुम्हें नदी के किनारे जहाँ -तहाँ मन्दिर ही मन्दिर नहीं दिखायी देते ?  मगर क्या उनकी देखभाल ठीक तरीके से हो रही है ?  कहीं नंदी का पता नहीं है, तो कहीं भगवान् के दर्शन ही दुर्लभ हैं ।  ऐसे मन्दिर बाँधना न बाँधने जैसा ही है ।"
  इतने में एक व्यक्ति ने जवाब दिया,  "यह सब धर्म-श्रद्धा मिटने का परिणाम है ।"  तब बाबा बोले,  "ठीक-ठीक क्यों नहीं कहता कि भावना नहीं रही ?  संस्कृत में काहे को बोलता है ?  इन मन्दिरों का निर्माण करनेवालों को सपना ही आया होता कि मन्दिरों की यह हालत होनेवाली है, तो शायद वे मन्दिर न बाँधते ।  वह देखो, सामने एक कुत्ता मन्दिर मैं जा रहा है, क्या वह उसे अपवित्र नहीं करेगा ?"  तब एक व्यक्ति ने कुत्ते पर पत्थर फेंकना चाहा, तो बाबा ने उससे कहा,  "किसको मार रहे हो ?  कुत्ते को ? गुस्सा आ ही रहा है, तो कुत्ते पर क्यों निकाल रहे हो, मन्दिर बनानेवाले पर क्यों नहीं उतारते, जिन्होंने यहाँ इतने ढेर सारे मन्दिर बना रखे हैं ।  अच्छा तो यही होता कि एक ही मन्दिर बाँधते और मन्दिर का और देवता का ठीक से इन्तजाम करते ।  मगर ऐसा हो रहा है क्या ?  तुकोबाराया ने ठीक ही कहा है ___ तीर्थी धोंडा पाणीगा, देव रोकडा सज्जनी ( नदी के किनारे का पत्थर भी सज्जन लोगों के लिए देवता बन जाता है ) !

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