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संजय गुप्ता

बहुत सुंदर भाव है एक भक्त का ठाकुर जी के प्रति अवश्य पढे श्री राधे 🙏जय हो राधे कृष्णा 🙏

(((((( मदन टेर के अन्धेबाबा ))))))
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आज से लगभग 70 वर्ष पूर्व वृन्दावन में मदनमोहन जी मंदिर के निकट किसी कुटिया में अन्धे बाबा रहते थे !
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उनका नाम कोई नहीं जानता था , सब लोग उन्हें मदन टेर के अन्धेबाबा के नाम से पुकारते थे , क्योंकि वे मदन टेर परही अधिक रहते थे !
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दिनभर राधा कृष्ण की लीलायों का स्मरण कर हुए आँसू बहाते ! संध्या समय गोविन्द देव जी के मन्दिर में जाकर रो-रो कर उनसे कुछ निवेदन करते हुए चले आते ,
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लोटते समय 2-4 घरो से मधुकरी मांग लेते और खाकर सो जाते ! पर आते-जाते , खाते-पीते हर समय उनके आँसू बहते रहते …
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आँसू बहने के कारण वे अपनी दृष्टि खो बेठे थे…. पर इस कारण वे तनिक भी घबराये नहीं ,
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घबराना तो तब होता जब वे इस जगत से कोई सरोकार रखते , जिसका नेत्रों को दर्शन करते थे… उनके नेत्रों की सार्थकता थी केवल प्रभु दर्शन में..
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जो नेत्र प्रभु का दर्शन नहीं करा सके थे , उनका ना रहना ही अच्छा था उनके लिए…
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पर अब दिन-रात रोते-रोते 40 साल बीत चुके थे.. जीवन की संध्या आ पहुँची थी .. अब उनसे रहा ना जाता… विरह वेदना असहय हो चली थी..
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वे कभी-कभी उस वेदना के कारण मुर्छित हो घंटो मदन टेर की झाड़ियो के बीच अचेत पड़े रहते थे…
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उनसे सहानुभूति करने वाला वह कोई ना था , केवल वहां के पक्षी मोर , कोकिल आदि अपने कलरव से उनकी चेतना जगाने की चेष्टा किया करते….
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एक दिन जब वे मदन टेर पर बेठे रो रहे थे , तो राधा कृष्ण टहलते हुए उधर आ निकले….
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बाबा को रोते देख राधाजी ने श्री कृष्ण को कहा….. ” प्यारे या बाबा बड़ो रोये है जाकर हँसा दो….
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“श्री कृष्ण ने बाबा के पास जाकर कहा…. “बाबा क्यों रो रहे हो.. आप को किसने मारा है…..कोई आपसे कुछ छीन के ले गया है….? ”
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बाबा ने कहा…. ” ना , तू जा यहाँ से
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“श्री कृष्ण ने कहा.. ” बाबा आप के लिए कुछ ला दूँ , रोटी ला दूँ और कुछ कहे सो ला दूँ , तू पर रो मत”
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बाबा ने कहा… ” तू जा ना जाके अपनी गईया चरा , तुझे काहे मतलब मुझसे ”
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कृष्ण ने राधाजी से जा कर कहा…. “बाबा तो नहीं मान रहे मुझसे , और बहुत रो रहे है…….
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“राधे ने कहा…….” प्यारे तुम नहीं हँसा सके उनको…. अब मैं हंसाती हूँ उनको..
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“श्री राधे ने बाबा के पास जाकर कहा…. “बाबा तू क्यों रो रहा है ? तेरा कोई मर गया है क्या…. ? ”
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बाबा हँस दिए और बोले… ” लाली मेरा कोई नहीं है……
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“तो राधे बोली….. ” अच्छा तो , जब तेरा कोई नहीं है तो तू क्यों रो रहा है..?
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“बाबा बोले…… ” लाली मैं इसलिए रो रहा हूँ , क्योंकि जो मेरा है वो मुझे भूल गया है..
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“श्री राधे बोली….. “कौन है तेरा बाबा..?
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बाबा बोले…. ” तू ना जाने ब्रज के छलिया के भजन करते- करते मैं बुडा हो गया. और उसने एक झलक भी नही दिखाई….
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और लाली क्या कहूँ…. . उसके संग से लाली……. राधे भी निष्ठुर हो गयी है… ”
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राधे चौंक पड़ी और बोली……. ” मैं-मैं निष्ठुर…. “दूसरे ही पल अपने को छिपाते बोली… “मेरो नाम भी राधे है , तू बता तू का चाहे…
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“बाबा बोले.. ” भोरी तो तू है….. जिस समय वे अपने कर-कमलों से स्पर्श करेंगे…… आँख में ज्योति ना आ जाएगी……
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“भोरी लाली से और रहा ना गया….. उसने अपने कर-कमलों से बाबा की एक आँख स्पर्श कर दी…
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उसी समय कान्हा ने भी बाबा की दूसरी आँख स्पर्श कर दी..
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स्पर्ष करते ही बाबा की आँखों की में ज्योति आ गयी. सामने खड़े राधा कृष्ण के दर्शन कर वे आनंद के कारण मुर्छित हो गए.
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मुर्छित अवस्था में वे सारी रात वही पड़े रहे.. प्रातः काल वृन्दावन परिक्रमा में निकले कुछ लोगो ने उन्हें पहचान लिया.
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वे उन्हें उसी अवस्था में मदनमोहन जी के मंदिर ले गए…
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मंदिर के गोस्वामी समझ गए की उनके ऊपर मदनमोहन जी की विशेष कृपा हुई है.
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उन्होंने उन्हें घेर कर सब के साथ कीर्तन किया……. कीर्तन की ध्वनि कान में पड़ते ही उन्हें धीरे-धीरे चेतना हो आई..
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तब गोस्वामी जी उन्हें एकांत में लेकर गए.. उनकी सेवा के बाद जब उन्होंने उनसे मूर्छा का कारण पूछा तो..
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उन्होंने रो-रो कर सारी घटना बता दी.. बाबा ने जिस वस्तु की कामना की थी….. वह उन्हें मिल गयी….. फिर भी उनका रोना बंद नहीं हुआ…
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रोना तो पहले से और भी ज्यादा हो गया…
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राधाकृष्ण से मिल कर बिछुड़ जाने का दुख उनके ना मिलने से भी कही ज्यादा तकलीफ वाला था..
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इस दुःख में रोते-रोते वे कुछ दिन के बाद जड़ देवत्याग कर सिद्ध देह से उनसे जा मिले..

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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))🙏हे मेरे कन्हैया
” अरमान तो बहुत मचलते हैं दिल में ”
” कि तुमसे मिलेंगे तो ये करेंगे ”
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” मगर जब दीदार होता हैं तुम्हारा ”
,,,,,,तो ,,,,,,
” हर बंधन से हम खुल जाते हैं ”
” तुम्हारी छवि में कुछ युँ खो जाते हैं ”
” कि बाकी सब भूल जाते हैं “

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संजय गुप्ता

नमस्कार दोस्तों
आज मेरी कहानी का नाम है

((( संत का तर्क ))))
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एक अत्यंत निर्दयी और क्रूर राजा था। दूसरों को पीड़ा देने में उसे आनंद आता था।
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उसका आदेश था कि उसके राज्य में एक अथवा दो आदमियों को फांसी लगनी ही चाहिए। उसके इस व्यवहार से प्रजा बहुत दुखी हो गई थी।
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एक दिन उस राजा के राज्य के कुछ वरिष्ठजन इस समस्या को लेकर एक प्रसिद्ध संत के पास पहुंचे और बोले-
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महाराज ! हमारी रक्षा कीजिए। यदि राजा का यह क्रम जारी रहा तो नगर खाली हो जाएगा।
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संत भी काफी दिनों से यह देख-सुन रहे थे। वे अगले ही दिन दरबार में जा पहुंचे।
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राजा ने उनका स्वागत किया और आने का प्रयोजन पूछा। तब संत बोले- मैं आपसे एक प्रश्न करने आया हूं।
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यदि आप शिकार खेलने जंगल में जाएं और मार्ग भूलकर भटकने लगें और प्यास के मारे आपके प्राण निकलने लगें,
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ऐसे में कोई व्यक्ति सड़ा-गला पानी लाकर आपको इस शर्त पर पिलाए कि तुम आधा राज्य उसे दोगे तो क्या तुम ऐसा करोगे ?
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राजा ने कहा- प्राण बचाने के लिए आधा राज्य देना ही होगा।
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संत पुन: बोले- अगर वह गंदा पानी पीकर तुम बीमार हो जाओ और तुम्हारे प्राणों पर संकट आ जाए, तब कोई वैद्य तुम्हारे प्राण बचाने के लिए शेष आधा राज्य मांग ले तो क्या करोगे ?
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राजा ने तत्क्षण कहा- प्राण बचाने के लिए वह आधा राज्य भी दे दूंगा। जीवन ही नहीं तो राज्य कैसा ?
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तब संत बोले- अपने प्राणों की रक्षार्थ आप राज्य लुटा सकते हैं, तो दूसरों के प्राण क्यों लेते हैं ?
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संत का यह तर्क सुनकर राजा को चेतना आई और वह सुधर गया।
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सार यह है कि अपने अधिकारों का उपयोग लोकहित में और विवेक सम्मत ढंग से किया जाना चाहिए।

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देव शर्मा

✍ प्रेरणादायी कहानी ✍
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एक बार यात्रियों से भरी एक बस कहीं जा रही‌ थी।
अचानक मौसम बदला और धूलभरी आंधी के बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं। बारिश तेज होकर तूफान में बदल चुकी थी। घनघोर अंधेरा छा गया और भयंकर बिजली चमकने लगी। बिजली कड़ककर बस की तरफ आती और वापस चली जाती। ऐसा कई बार हुआ।
सबकी सांसे ऊपर की ऊपर‌ और नीचे की नीचे हो रही थीं।

ड्राईवर ने आखिरकार बस को एक बड़े से पेड़ से करीब पचास कदम की दूरी पर रोक दिया, और यात्रियों से कहा- इस बस में कोई ऐसा यात्री बैठा है, जिसकी मौत आज निश्चित है। और उसके साथ-साथ कहीं हमें भी अपनी जिन्दगी से हाथ ना धोना पड़े, इसलिए सभी यात्री एक-एक करके जाओ, और उस पेड़ को हाथ लगाकर आओ। जो भी बदकिस्मत‌ होगा उस पर बिजली गिर जाएगी और बाकी सब बच जाएंगे।

सबसे पहले जिसकी बारी थी, उसको दो-तीन यात्रियों ने जबरदस्ती धक्का देकर बस से नीचे उतारा। वह धीरे-धीरे पेड़ तक गया और डरते-डरते पेड़ को हाथ लगाया, और फिर भागकर आकर बस में बैठ गया।

ऐसे ही एक-एक करके सब जाते और भागकर आकर के बस में बैठकर चैन की सांस लेते।

अब अंत मे केवल एक आदमी बच गया।
उसने सोचा कि मेरी मौत तो आज निश्चित ही है।
सब‌ यात्री उसे किसी अपराधी की तरह देख रहे थे,
जो आज उन्हें अपने साथ ले मरता।
उसे भी जबरदस्ती बस से नीचे उतारा गया।

वो भारी मन से पेड़ के पास पहुँचा। और जैसे ही उसने पेड़ को हाथ लगाया, तेज आवाज के साथ बिजली कड़की और सीधे जाकर बस पर गिर गयी।
बस धू-धू करके जल उठी।

सब यात्री मारे गये सिर्फ उस एक को छोड़कर,
जिसे सब बदकिस्मत मान रहे थे।
पर वे नहीं जानते थे कि आखिर उसकी वजह से ही सबकी जान बची हुई थी।

ईस काहानी का तात्पर्य यह हे की हम सब अपनी सफलता का श्रेय खुद लेना चाहते हैं।
जबकि हमें क्या पता है कि हमारे साथ रहने वाले की वजह से ही हमें यह हासिल हो पायी हो।

इसलिए हमें कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए।
और हर वक्त हमें उस मालिक (भगवान/सत्गुरु/गुरु) का शुक्रिया अदा करते रहना चाहिए। कहां और किस वक्त उनकी कृपा हमें प्राप्त हो जाए ll
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संतोष चतुर्वेदी

जो चाहोगे सो पाओगे!

• एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।” बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।

• एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”, और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा- “महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मै जो चाहता हूँ?”

• साधु उसकी बात को सुनकर बोला– “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मै उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या?” युवक बोला- ”मेरी एक ही ख्वाहिश है मै हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ।“

• साधू बोला,” कोई बात नही मै तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा,” पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।

• युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला,” पुत्र, इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।

• युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।

• मित्रों ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।

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नाम का आसरा
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एक गांव में की एक ग्वालन रोज दूध दही बेचने शहर जाती थी,एक दिन व्रज में एक संत आये,गोपी भी कथा सुनने गई,संत कथा में कह रहे थे,भगवान के नाम की बड़ी महिमा है,नाम से बड़े बड़े संकट भी टल जाते है.नाम तो भव सागर से तारने वाला है,यदि भव सागर से पार होना है तो भगवान का नाम कभी मत छोडना।

“कथा समाप्त हुई ग्वालन अगले दिन फिर दूध दही बेचने चली, बीच में यमुना जी थी. गोपी को संत की बात याद आई,संत ने कहा था भगवान का नाम तो भवसागर से पार लगाने वाला है,जिस भगवान का नाम भवसागर से पार लगा सकता है तो क्या उन्ही भगवान का नाम मुझे इस साधारण सी नदी से पार नहीं लगा सकता? ऐसा सोचकर ग्वालन ने मन में भगवान के नाम का आश्रय लिया भोली भाली ग्वालन यमुना जी की ओर आगे बढ़ गई.

अब जैसे ही यमुना जी में पैर रखा तो लगा मानो जमीन पर चल रही है और ऐसे ही सारी नदी पार कर गई,पार पहुँचकर बड़ी प्रसन्न हुई,और मन में सोचने लगी कि संत ने तो ये तो बड़ा अच्छा तरीका बताया पार जाने का,रोज-रोज नाविक को भी पैसे नहीं देने पड़ेगे.

एक दिन ग्वालन ने सोचा कि संत ने मेरा इतना भला किया मुझे उन्हें खाने पर बुलाना चाहिये,अगले दिन ग्वालन जब दही बेचने गई,तब संत से घर में भोजन करने को कहा संत तैयार हो गए,अब बीच में फिर यमुना नदी आई.संत नाविक को बुलाने लगा तो ग्वालन बोली बाबा नाविक को क्यों बुला रहे है.हम ऐसे ही यमुना जी में चलेगे.

संत बोले -ग्वालन! कैसी बात करती हो,यमुना जी को ऐसे ही कैसे पार करेगे ?

ग्वालन बोली-बाबा! आप ने ही तो रास्ता बताया था,आपने कथा में कहा था कि भगवान के नाम का आश्रय लेकर भवसागर से पार हो सकते है. तो मैंने सोचा जब भव सागर से पार हो सकते है तो यमुना जी से पार क्यों नहीं हो सकते? और मै ऐसा ही करने लगी,इसलिए मुझे अब नाव की जरुरत नहीं पड़ती.

संत को विश्वास नहीं हुआ बोले ग्वालन तू ही पहले चल! मै तुम्हारे पीछे पीछे आता हूँ,ग्वालन ने भगवान के नाम का आश्रय लिया और जिस प्रकार रोज जाती थी वैसे ही यमुना जी को पार कर गई.

अब जैसे ही संत ने यमुना जी में पैर रखा तो झपाक से पानी में गिर गए,संत को बड़ा आश्चर्य,अब ग्वालन ने जब देखा तो कि संत तो पानी में गिर गए है तब ग्वालन वापस आई है और संत का हाथ पकड़कर जब चलि है तो संत भी ग्वालन की भांति ही ऐसे चले जैसे जमीन पर चल रहे हो.

संत तो ग्वालन के चरणों में गिर पड़े,और बोले – कि गोपी तू धन्य है! वास्तव में तो सही अर्थो में नाम का आश्रय तो तुमने लिया है और मै जिसने नाम की महिमा बताई तो सही पर स्वयं नाम का आश्रय नहीं लिया !!
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पर

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संतोष चतुर्वेदी

जो चाहोगे सो पाओगे!

• एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।” बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।

• एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”, और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा- “महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मै जो चाहता हूँ?”

• साधु उसकी बात को सुनकर बोला– “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मै उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या?” युवक बोला- ”मेरी एक ही ख्वाहिश है मै हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ।“

• साधू बोला,” कोई बात नही मै तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा,” पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।

• युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला,” पुत्र, इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।

• युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।

• मित्रों ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।

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संजय गुप्ता

(((( एक माँ की प्रार्थना ))))
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75 साल की उस बुढ़िया माँ का वजन लगभग 40 किलो होगा !! आज जब तबियत बिगड़ने पर वो डॉक्टर को दिखाने गयी,
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डॉक्टर ने कहा, माता जी आप हेल्थ का ख्याल रखिये, आप का वजन जरूरत से ज्यादा कम है !
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आप खाने में जूस, सलाद, दूध, फल, घी, मेवा और हेल्थी फ़ूड लिजियें, नहीं तो आपकी सेहत दिनों दिन गिरती जायेगी और हालत नाजुक हो जायेंगे !!
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उसने भारी मन से डॉक्टर की बात को सुना और बाहर निकल कर सोचने लगी, इतनी महंगाई में ये सब कहाँ से आएगा….???
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और पिछले पचास सालों में, फ्रूट, घी, मेवा घर में लाया कौन है…???
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बहुत ही मामूली पेंशन से जो थोडा बहुत पैसा मिलता है उससे घर के जरुरी सामान तो पति ले आतें है,
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लेकिन फल, जूस, हरी सब्जी, ये सब पति ने कभी ला कर नहीं दिया,.. और खुद भी कभी ये सब खरीदने की हिम्मत नहीं कर सकी…
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क्यूंकि जब भी मन करता कुछ खाने का, खाली पर्स हमेशा मुंह चिढाने लगता….
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नागपुर (विदर्भ) जैसे शहर में मामूली सी नौकरी में और जिंदगी की गहमागहमी में सारी जमा पूंजी, पति का PF, घर की सारी अमानत, संपदा, गहने जेवर सब एक बेटे और दो बेटियों की परवरिश, पढाई लिखाई शादी में सब कुछ खत्म हो गया…
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दूर दिल्ली में रह रहा एक बहुत बड़ी कंपनी में मैनेजर और मोटी तनख्वाह उठा रहा बेटा भी तो खर्चे के नाम पर सिर्फ पांच सौ रुपये देता है…वो भी महीने के…..
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बेटियों से अपने दुःख माँ ने सदा छुपाये हैँ… उन्हें कभी अपने गमो में शामिल नहीं किया… आखिर ससुराल वाले क्या सोचेंगे…..???
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अब बेटे के भेजे इन पांच सौं रुपये में बूढ़े माँ बाप तन ढके या मन की करें ?????
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उसने सोचा चलो एक बार बेटे को डॉक्टर की रिपोर्ट बता दी जाए…..!
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उसने बेटे को फ़ोन किया और कहा, बेटा डॉक्टर ने बताया है कि विटामिन, खून की कमी , कमजोरी से चक्कर आये थे….
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इसी लिए खाने में सलाद, जूस, फ्रूट, दूध, फल, घी, मेवा लेना शुरू करो !!
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बेटा – माँ आप को जो खाना है खाओ, डॉक्टर की बात ना मानों…. !!
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माँ ने कहा – बेटा, थोड़े पैसे अगर भेज देता तो ठीक रहता….!
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बेटा – माँ इस माह मेरा बहुत खर्चा हो रहा है, कल ही तेरी पोती को मैंने फिटनेस जिम जोईन कराया है,
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तुझे तो पता ही है, वो कितनी मोटी हो रही है, इसी लिए जिम जोईन कराया है…
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उसके महीने के सात हजार रुपये लगेंगे…. जिसमे उसका वजन, चार किलो हर माह कम कराया जाएगा….
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और कम से कम पांच माह तो उसे भेजना ही होगा…. पैंतीस हजार का ये खर्चा बैठे बिठाये आ गया….
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अब जरुरी भी तो है ये खर्चा…!! आखिर दो तीन साल में इसकी शादी करनी है और आज कल मोटी लड़कियां, पसंद कोई करता नहीं…..!!
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माँ ने कहा – हाँ बेटा ये तो जरुरी था….. कोई बात नहीं वैसे भी डॉक्टर लोग तो ऐसे ही कुछ भी कहतें रहते है…..
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चक्कर तो गर्मी की वजह से आ गयें होंगे, वरना इतने सालों में तो कभी ऐसा नहीं हुआ….. खाना तो हमेशा से यही खा रही हूँ मैं…!!!
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बेटा – हाँ माँ….. अच्छा माँ अभी मैं फोन रखता हूँ… बेटी के लिए डाइट चार्ट ले जाना है और कुछ जूस, फ्रूट और डायट फ़ूड भी…. आप अपना ख्याल रखना !! फोन कट गया….
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माँ ने एक ग्लास पानी पिया… और साड़ी पर फोल लगाने मे लग गयी….
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एक साड़ी में फोल लगाने के माँ को पन्द्रह रुपये मिलेंगे…. इन रुपयों से माँ आज गणेश पूजा के लिए बाजार से लड्डू खरीदेंगी…. आज गणेशचतुर्थी जो है !!
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माँ के पास आज साड़ी में फोल लगाने के तीन आर्डर है…
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माँ ने मन ही मन श्री गणेश का शुक्रिया अदा किया क्यूंकि आज वो आधा किलो लड्डू खरीद ही लेंगी गणेश जी की पूजा के लिए इन पैसो से…
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और मन ही मन अपने बेटे की सुखी और समृद्ध जिंदगी के लिए प्रभु श्री गणेश से प्रार्थना

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अनूप सिन्हा

                              प्रेरक   प्रसंग

मन की शुद्धि

  एक युवक संसार से विरक्त हो फिलीस्तीन के सन्त मरटिनियस के पास आया और बोला,  "भगवन् !  मैं आपकी सेवा में आ गया हूँ ।  कृपया मुझे आश्रय दें ।"
  सन्त बोले,  "जाओ, पहले शुद्ध होकर आओ ।"  युवक स्नान करने गया ।  सन्त ने एक भंगिन कोई बुलाकर युवक के आने पर इस प्रकार झाड़ू लगाने को कहा, जिससे धूल युवक के शरीर पर उड़े ।  भंगिन ने वैसा ही किया ।  इस पर युवक उसे मारने दौड़ा, तो वह भाग गयी ।  सन्त ने युवक को फिर से शुद्ध होकर आने को कहा ।  युवक के जाने पर सन्त ने भंगिन को युवक को छूने के लिए कहा ।
  युवक स्नान करके आया, तो भंगिन ने झाड़ते झाड़ते उसे छू दिया ।  युवक को गुस्सा आया ।  मगर उसने मारा तो नहीं, भंगिन को खूब गालियाँ दीं ।  सन्त ने फिर शुद्ध होकर आनेवाले को कहा ।  इस बार सन्त ने भंगिन को युवक पर कूड़ा डालने के लिए कहा ।
  युवक जब नहाकर आया, तो भंगिन ने उसपर कूड़े की पूरी टोकरी उलट दी ।  किन्तु इस बार युवक बिलकुल शान्त रहा, बल्कि वह भंगिन कोई प्रणाम करके बोला,  "देवी !  तुम मेरी गुरु हो ।  यह तुम्हारी कृपा थी कि मुझे अपने अहंकार और क्रोध का भान हो गया और मैं उन्हें अपने वश में कर सका ।"
  तब मरटिनियस युवक से बोले,  "अब स्नान करके आओ, क्योंकि तब तुम पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाओगे ।  अब तुम मेरे साथ रह सकते हो।"
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निओ दिप

“नेहरू बहादुर” और चीन


~Sushobhit Saktawat

1947-49 में जब आज़ाद हिंदुस्तान का संविधान बनाया जा रहा था, तभी चीन में 1949 की क्रांति हो गई और हुक़ूमत को माओत्से तुंग की “पीपुल्स रिवोल्यूशन” ने उखाड़ फेंका।

नेहरू हमेशा से चीन से बेहतर ताल्लुक़ चाहते थे और च्यांग काई शेक से उनकी अच्छी पटरी बैठती थी, लेकिन इस माओत्से तुंग का क्या करें! कौन है यह माओत्से तुंग और कैसा है इसका मिजाज़, यह जानना नेहरू के लिए ज़रूरी था। लिहाज़ा, उन्होंने अपने राजदूत को माओ से मिलने भेजा।

ये राजदूत वास्तव में एक इतिहासकार थे। प्रख्यात इतिहासविद् केएम पणिक्कर। वे इस भावना के साथ माओ से मिलने पहुंचे कि प्रधानमंत्री चीन के साथ अच्छे रिश्ते बरक़रार रखने के लिए बेताब हैं। लिहाज़ा, उन्होंने माओ से मिलने के बाद जो रिपोर्ट नेहरू को सौंपी, वो कुछ इस तरह से थी :

“मिस्टर चेयरमैन का चेहरा बहुत कृपालु है और उनकी आंखों से तो जैसे उदारता टपकती है। उनके हावभाव कोमलतापूर्ण हैं। उनका नज़रिया फ़िलॉस्फ़रों वाला है और उनकी छोटी-छोटी आंखें स्वप्न‍िल-सी जान पड़ती हैं। चीन का यह लीडर जाने कितने संघर्षों में तपकर यहां तक पहुंचा है, फिर भी उनके भीतर किसी तरह का रूखापन नहीं है। प्रधानमंत्री महोदय, मुझे तो उनको देखकर आपकी याद आई! वे भी आप ही की तरह गहरे अर्थों में “मानवतावादी” हैं!”

मनुष्यता के इतिहास के सबसे दुर्दान्त तानाशाहों में से माओत्से तुंग के बारे में यह निहायत ही हास्यास्पद और झूठी रिपोर्ट पणिक्कर महोदय द्वारा नेहरू बहादुर को सौंपी जा रही थी!

नेहरू बहादुर मुतमुईन हो गए!

महज़ एक साल बाद चीन ने तिब्बत पर चढ़ाई कर दी और उस पर बलात कब्ज़ा कर लिया।

तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के ग़ुस्से का कोई ठिकाना नहीं था और उन्होंने प्रधानमंत्री को जाकर बताया कि चीन ने आपके राजदूत को बहुत अच्छी तरह से मूर्ख बनाया है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन अब पहले से ज़्यादा मज़बूत हो गया है और उससे सावधान रहने की ज़रूरत है। नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा और कहा, “तिब्बत के साथ चीन ने जो किया, वह ग़लत था, लेकिन हमें डरने की ज़रूरत नहीं। आख़िर हिमालय पर्वत स्वयं हमारी रक्षा कर रहा है। चीन कहां हिमालय की वादियों में भटकने के लिए आएगा!”

यह अक्तूबर 1950 की बात है। दिसंबर आते-आते सरदार पटेल चल बसे। अब नेहरू को मनमानी करने से रोकने वाला कोई नहीं था।

भारत और चीन की मीलों लंबी सीमाएं अभी तक अनिर्धारित थीं और किसी भी समय टकराव का कारण बन सकती थीं, ख़ासतौर पर चीन के मिजाज़ को देखते हुए। 1952 की गर्मियों में भारत सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल बीजिंग पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कौन कर रहा था? प्रधानमंत्री नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित!

अब विजयलक्ष्मी पंडित ने नेहरू को चिट्ठी लिखकर माओ के गुण गाए। उन्होंने कहा, “मिस्टर चेयरमैन का हास्यबोध कमाल का है और उनकी लोकप्रियता देखकर तो मुझे महात्मा गांधी की याद आई!” उन्होंने चाऊ एन लाई की भी तारीफ़ों के पुल बांधे।

नेहरू बहादुर फिर मुतमईन हुए!

1954 में भारत ने अधिकृत रूप से मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है और चीन के सा‍थ “पंचशील” समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए।

लेकिन नेहरू के आत्मघाती तरक़श में केएम पणिक्कर और विजयलक्ष्मी पंडित ही नहीं थे। नेहरू के तरक़श में वी कृष्णा मेनन भी थे। भारत के रक्षामंत्री, जिनका अंतरराष्ट्रीय समुदाय में ख़ूब मज़ाक़ उड़ाया जाता था और जो एक बार “टाइम” मैग्ज़ीन के कवर पर संपेरे के रूप में भी चित्र‍ित किए जा चुके थे। भारत में भी उन्हें कोई पसंद नहीं करता था। लेकिन, जैसा कि स्वीडन के तत्कालीन राजदूत अल्वा मिर्डल ने चुटकी लेते हुए कहा था, “वीके कृष्णा मेनन केवल इसीलिए प्रधानमंत्री नेहरू के चहेते थे, क्योंकि एक वे ही थे, जिनसे प्रधानमंत्री कार्ल मार्क्स और चार्ल्स डिकेंस के बारे में बतिया सकते थे!”

रामचंद्र गुहा ने आधुनिक भारत का जो इतिहास लिखा है, उसमें उन्होंने तफ़सील से बताया है कि तब “साउथ ब्लॉक” में एक सर गिरिजा शंकर वाजपेयी हुआ करते थे, जो प्रधानमंत्री को लगातार आगाह करते रहे कि चीन से चौकस रहने की ज़रूरत है, लेकिन प्रधानमंत्री को लगता था कि सब ठीक है। वो “हिंदी चीनी भाई भाई” के नारे बुलंद करने के दिन थे।

1956 में चीन ने “अक्साई चीन” में सड़कें बनवाना शुरू कर दीं, नेहरू के कान पर जूं नहीं रेंगी। भारत-चीन के बीच जो “मैकमोहन” रेखा थी, उसे अंग्रेज़ इसलिए खींच गए थे ताकि असम के बाग़ानों को चीन ना हड़प ले, लेकिन “अक्साई चीन” को लेकर वैसी कोई सतर्कता भारत ने नहीं दिखाई। 1958 में चीन ने अपना जो नक़्शा जारी किया, उसमें “अक्साई चीन” में जहां-जहां उसने सड़कें बनवाई थीं, उस हिस्से को अपना बता दिया। 1959 में भारत ने दलाई लामा को अपने यहां शरण दी तो माओत्से तुंग ग़ुस्से से तमतमा उठा और उसने भारत की हरकतों पर कड़ी निगरानी रखने का हुक्म दे दिया।

1960 में चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई हिंदुस्तान आए और नेहरू से ऐसे गर्मजोशी से मिले, जैसे कोई बात ही ना हो। आज इंटरनेट पर चाऊ की यात्रा के फ़ुटेज उपलब्ध हैं, जिनमें हम इस यात्रा के विरोध में प्रदर्शन करने वालों को हाथों में यह तख़्‍ति‍यां लिख देख सकते हैं कि “चीन से ख़बरदार!” ऐसा लग रहा था कि जो बात अवाम को मालूम थी, उससे मुल्क के वज़ीरे-आज़म ही बेख़बर थे!

1961 में भारत की फ़ौज ने कुछ इस अंदाज़ में “फ़ॉरवर्ड पॉलिसी” अपनाई, मानो रक्षामंत्री मेनन को हालात की संजीदगी का रत्तीभर भी अंदाज़ा ना हो। लगभग ख़ुशफ़हमी के आलम में “मैकमोहन रेखा” पार कर चीनी क्षेत्र में भारत ने 43 चौकियां तैनात कर दीं। चीन तो जैसे मौक़े की ही तलाश में था। उसने इसे उकसावे की नीति माना और हिंदुस्तान पर ज़ोरदार हमला बोला। नेहरू बहादुर हक्के बक्के रह गए। “हिंदी चीनी भाई भाई” के शगूफ़े की हवा निकल गई। पंचशील “पंक्चर” हो गया। भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। चीन ने अक्साई चीन में अपना झंडा गाड़ दिया।

कहते हैं 1962 के इस सदमे से नेहरू आख़िर तक उबर नहीं पाए थे।

पणिक्कर, विजयलक्ष्मी पंडित और वी कृष्णा मेनन : नेहरू की चीन नीति के ये तीन पिटे हुए मोहरे थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री को चीन के बारे में भ्रामक सूचनाएं दीं, क्योंकि प्रधानमंत्री हक़ीक़त सुनने के लिए तैयार नहीं थे। और जो लोग उन्हें हक़ीक़त बताना चाहते थे, उनकी अनसुनी की जा रही थी।

नेहरू बहादुर की पोलिटिकल, कल्चरल और डिप्लोमैटिक लेगसी में जितने भी छेद हैं, यह उनकी एक तस्वीर है। ऐसे ही छेद कश्मीर, पाकिस्तान, सुरक्षा परिषद, कॉमन सिविल कोड, महालनोबिस मॉडल, फ़ेबियन समाजवाद, रूस से दोस्ती और अमरीका से दूरी, आदि अनेक मामलों से संबंधित नेहरू नीतियों में आपको मिलेंगे।

मेरा स्पष्ट मत है कि नेहरू बहादुर को हिंदुस्तान की पहली हुक़ूमत में “एचआरडी मिनिस्टर” होना चाहिए था। उनका इतिहासबोध आला दर्जे का था, लेकिन वर्तमान पर नज़र उतनी ही कमज़ोर। हुक़ूमत चलाना उनके बूते का रोग नहीं था। और हिंदुस्तान की पहली हुक़ूमत में जो जनाब “एचआरडी मिनिस्टर” थे, उन्हें होना चाहिए था अल्पसंख्यक मामलों का मंत्री, ताकि स्कूली किताबों में “अकबर क्यों महान था” और “हिंदू धर्म की पांच बुराइयां बताइए”, ऐसी चीज़ें नहीं पढ़ाई जातीं। और देश का प्रधानमंत्री आप राजगोपालाचारी या वल्लभभाई पटेल में से किसी एक को चुन सकते थे। राजाजी इसलिए कि उनकी नज़र बहुत “मार्केट फ्रेंडली” थी और “लाइसेंस राज” की जो समाजवादी विरासत नेहरू बहादुर चालीस सालों के लिए अपने पीछे छोड़ गए, उससे वे बहुत शुरुआत में ही मुक्त‍ि दिला सकते थे। और सरदार पटेल इसलिए कि हर लिहाज़ से वे नेहरू की तुलना में बेहतर प्रशासक थे!

ये तमाम बातें मौजूदा हालात में फिर याद हो आईं। चीन के साथ फिर से सीमाओं पर तनाव है और किसी भी तरह की ख़ुशफ़हमी नुक़सानदेह है। चीन आपसे गर्मजोशी से हाथ मिलाने के फ़ौरन बाद आप पर हमला बोल सकता है, ये उसकी फ़ितरत रही है। इतिहास गवाह है और वो इतिहासबोध किस काम का, जिससे हम सबक़ नहीं सीख सकते।

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आपने देखा है कौन बड़ा है कौन छोटा❓

एक बार कही से स्वामी विवेकानंद जी जा रहे थे की रास्ते मे दो सम्प्रदाय के लोगो को झगड़ा करते देख कर रूक कर पूछने लगे !
क्या बात हो गई जो आप इस तरह से झगड़ा कर रहे हो ❓
पर सब झगड़ने मे लगे थे कोई जब नही बता रहा था तब स्वामी दोनो गुटो के बीच मे आकर खड़े हो गए जिससे किसी का हाथ उन पर भी उठ गया तो सभी रूके ओर कहने लगे आप बीच मे ना ही आए !
स्वामी विवेकानन्द जी- आप झगड़ा कर क्यो रहे हो❓
तब वो कहने लगे देखो हम शैव सम्प्रदाय से है ओर शिव को मानते है यह वैष्णव सम्प्रदाय से है यह कहते है हमारा विष्णु बडे है ओर हम कहते है शिव से बड कोई नही है पर यह मान ही नही रहे।
स्वामी विवेकानन्द जी मुस्कराए ओर बोले
आपने शिवजी को देखा है ?
शैव समुदाय- नही‼
यही विष्णु समुदाय से पुछा आपने विष्णु जी को देखा है❓
विष्णु समुदाय– नही‼
स्वामी विवेकानन्द जी- जब आपने देखा ही नही तो झगड़ा क्यों❓
कैसे पता की कौन बड़े है❓
कैसे सिद्ध करोगे कौन बड़े है❓
ऐसा करो आप विष्णु जी से जाकर पुछो और आप शिव जी से जाकर पुछो लो कौन बड़े है।
शिव सम्प्रदाय ओर विष्णु सम्प्रदाएँ वाले दोनों एक-दूसरे की तरफ देखने लगे और दोनों ने कहा- हमने तो शिव-विष्णु को देखा ही नही।
स्वामी विवेकानन्द जी- जिन्हें देखे नही है तो फिर बिना देखे बड़ा-छोटा कैसे मान सकते है❓ पहले देख लो तब स्वयं विश्वास हो जाएगा कि कौन छोटे है और कौन बड़े।
दोनों सम्पदाएँ वाले- लेकिन हम् कैसे देखे❓
फिर स्वामी विवेकानन्द जी ने उन दोनों सम्प्रदाएँ वाले को ब्रह्मज्ञान/आत्मज्ञान/दिव्यज्ञान दिए जिससे उन सभी ने अपने भीतर उस शक्ति का दर्शन किए जो शिव है और वही विष्णु है। फिर दोनों आपस मे शर्मिदा हुए की आपस मे व्यर्थ ही लड़ाई लड़ रहे थे।
यही हाल उन अज्ञानी मानव का है जो धर्म के नाम पर बड़ा-छोटा कहकर हमेशा झगड़े करते है करवाते है जिससे मानव सत्य का मार्ग ही भूल जाता है अपने जीवन का लक्ष्य ही भूल जाता है लेकिन जब जीवन मे एक तत्वदर्शी सन्त का पदार्पण होता है तो वो केवल कहानी या धर्म को बांटने का कार्य नही करते है बल्कि उस वास्तविक शक्ति का 🌺दर्शन करवा देते है तत्क्षण🌺 जो एक है और सभी प्राणी के भीतर है।
आप भी उन तत्वदर्शी के शरण मे जाए और वास्तविक धर्म को जाने वास्तविक रूप का दर्शन करें।सत्य की राह पर चले और ओरो को भी चलाएं🙏🏻
🍃ॐ श्री आशुतोषाय नमः🍃

Jyoti Agravaal