Posted in गौ माता - Gau maata

” उरुग्वे ” एक ऐसा देश है , जिसमे औसतन हर एक आदमी के पास 4 गायें हैं … और
पूरे विश्व में वो खेती के मामले में नम्बर वन की पोजीशन में है …
सिर्फ 33 लाख लोगों का देश है और 1 करोड़ 20 लाख 🐄 गायें है …
हर एक 🐄 गाय के कान पर इलेक्ट्रॉनिक 📼 चिप लगा रखी है …
जिससे कौन सी 🐄 गाय कहाँ पर है , वो देखते – रहते हैं …
एक किसान मशीन के अन्दर बैठा , फसल कटाई कर रहा है , तो दूसरा उसे स्क्रीन पर जोड़ता है , कि फसल का डाटा क्या है … ???
इकठ्ठा किये हुये डाटा के जरिए , किसान प्रति वर्ग मीटर की पैदावार का स्वयं विश्लेषण करता हैं …
2005 में 33 लाख लोगों का देश , 90 लाख लोगों के लिए अनाज पैदा करता था … और …
आज की तारीख में 2 करोड़ 80 लाख लोगों के लिये अनाज पैदा करता है …
” उरुग्वे ” के सफल प्रदर्शन के पीछे देश , किसानों और पशुपालकों का दशकों का अध्ययन शामिल है …
पूरी खेती को देखने के लिए 500 कृषि इंजीनियर लगाए गए हैं और ये लोग ड्रोन और सैटेलाइट से किसानों पर नजर रखते हैं , कि खेती का वही तरीका अपनाएँ जो निर्धारित है …
यानि ” दूध , दही , घी , मक्खन ” के साथ आबादी से कई गुना ज्यादा अनाज उत्पादन …
” सब अनाज , दूध , दही , घी , मक्खन , आराम से निर्यात होते हैं और हर किसान लाखों में कमाता है … ”
एक आदमी की कम से कम आय 1,25,000/= महीने की है , यानि 19,000 डॉलर सालाना …
” इस देश का राष्ट्रीय चिन्ह सूर्य 🌞 व राष्ट्रीय प्रगति चिन्ह गाय 🐄 व घोड़ा 🐎 हैं … ”
” उरूग्वे में गाय 🐄 की हत्या पर तत्काल फाँसी का कानून है … ”
🐄🐎🌞 🐄🐎🌞 🐄🐎🌞
” धन्यवाद है , इस गौ – प्रेमी देश को … ”
मुख्य बात यह है , ” कि ये सभी गो – धन भारतीय हैं … ”
जिसे वहाँ ” इण्डियन काउ ” के तौर पर जानते हैं …
” दु:ख इस बात का है , कि भारत में गो – हत्या होती है और वहाँ उरुग्वे में गो – हत्या पर मृत्युदण्ड का प्रावधान है … ”
” क्या हम इस कृषक राष्ट्र उरुग्वे से कुछ सीख सकते हैं … ??? ”
👏🙏🙏 👏🙏🙏 👏🙏🙏
” _ Forwarded as received … _ ”

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

गौरी रोटी बनाते बनाते “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर रही थी, अलग से पूजा का समय कहाँ निकाल पाती थी बेचारी, तो बस काम करते करते ही…।

एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ मे दर्दनाक चीख। कलेजा धक से रह गया जब आंगन में दौड़ कर झांकी। आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था खून से लथपथ। मन हुआ दहाड़ मार कर रोये। परंतु घर मे उसके अलावा कोई था नही, रोकर भी किसे बुलाती, फिर चुन्नू को संभालना भी तो था। दौड़ कर नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में माँ माँ की रट लगाए हुए है।

अंदर की ममता ने आंखों से निकल कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया। फिर 10 दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी कि चुन्नू को गोद मे उठा कर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी।

रास्ते भर भगवान को कोसती रही, जी भर कर, बड़बड़ाती रही, हे भोलेनाथ क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को..।

खैर डॉक्टर मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया। चोटें गहरी नही थी, ऊपरी थीं तो कोई खास परेशानी नही हुई। रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे तब गौरी का मन बेचैन था। भगवान से विरक्ति होने लगी थी। एक मां की ममता प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही थी। उसके दिमाग मे दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी। कैसे चुन्नू आंगन में गिरा की एकाएक उसकी आत्मा सिहर उठी, कल ही तो पुराने चापाकल का पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया है, ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो..?

उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया जहां टांके अभी हरे ही थे, ऑपरेशन के। आश्चर्य हुआ कि उसने 20-22 किलो के चुन्नू को उठाया कैसे, कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी? फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू। वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नही ले जा पाती।

फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रहते हैं और जब वो पहुंची तो साढ़े 3 बज रहे थे, उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा था।

उसका सर प्रभु चरणों मे श्रद्धा से झुक गया। अब वो सारा खेल समझ चुकी थी। मन ही मन प्रभु से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी। टीवी पर प्रवचन आ रहा था; प्रभु कहते हैं..

“मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हे इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको, तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।”

गौरी ने घर के मंदिर में झांक कर देखा,

शिव मुस्कुरा रहे थे
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देव शर्मा

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ऋंगी ऋषि ने सोचा कि यदि यह राजा जीवित रहेगा तो इसी प्रकार ब्राह्मणों का अपमान करता रहेगा। इस प्रकार विचार करके उस ऋषिकुमार ने कमण्डल से अपनी अंजुली में जल ले कर तथा उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके राजा परीक्षित को यह श्राप दे दिया कि जा तुझे आज से सातवें दिन तक्षक सर्प डसेगा।
परीक्षित को श्रृंगी ऋषि का श्राप
डारि नाग ऋषि कंठ में, नृप ने कीन्हों पाप।
होनहार हो कर हुतो, ऋंगी दीन्हों शाप॥
जब शमीक ऋषि समाधि से उठे तो उनके पुत्र श्रृंगी ने सभी बातें अपने पिता को बताई। ऋषि बोले की बेटा तूने यह अच्छा नही किया। वो एक राजा है। और राजा में रजो गुण आ सकता है पर तू एक संत का बेटा है। तेरे अंदर क्रोध क्यू आया जो तूने श्राप दे दिया। कलयुग के प्रभाव के कारण उस राजा को क्रोध आ गया और उसने सर्प डाल दिया। राजा ने जान बूझ कर नहीं किया है। संत बोले बेटा अब तो श्राप वापिस हो नही सकता। तुम राजा के पास जाओ और इस बात की खबर दो की सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।
ऋषि शमीक को अपने पुत्र के इस अपराध के कारण अत्यन्त पश्चाताप होने लगा।
जब परीक्षित महाराज अपने महल में पहुंचे और वो सोने का मुकुट उतारा तो कलयुग का प्रभाव समाप्त हो गया। अब परीक्षित जी महाराज सोच रहे है ये मैंने क्या कर दिया। एक संत के ब्राह्मण के, ऋषि के गले में सर्प डाल दिया। मैंने तो महापाप कर दिया। बहुत दुखी हो रहे है।
उसी समय ऋषि शमीक का भेजा हुआ एक गौरमुख नाम के शिष्य ने आकर उन्हें बताया कि ऋषिकुमार ने आपको श्राप दिया है कि आज से सातवें दिन तक्षक सर्प आपको डस लेगा। राजा परीक्षित ने शिष्य को प्रसन्नतापूर्वक आसन दिया और बोले – “ऋषिकुमार ने श्राप देकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। मेरी भी यही इच्छा है कि मुझ जैसे पापी को मेरे पाप के लिय दण्ड मिलना ही चाहिये। आप ऋषिकुमार को मेरा यह संदेश पहुँचा दीजिये कि मैं उनके इस कृपा के लिये उनका अत्यंत आभारी हूँ।” उस शिष्य का यथोचित सम्मान कर के और क्षमायाचना कर के राजा परीक्षित ने विदा किया।
अब परीक्षित जी महाराज ने तुरंत अपने पुत्रो जनमेजय आदि को बुलाया और राज काज का भार उनको सौंप दिया। और खुद सब कुछ छोड़ कर केवल एक लंगोटी में निकल गए है। और संकल्प ले लिया की अब ये जीवन भगवान की भक्ति में ही बीतेगा। अब तक मैंने भगवान को याद नही किया लेकिन अब और इस संसार में नही रहना है। वैराग्य हो गया।
परीक्षित का वैराग्य
परीक्षित जी महाराज गंगा नदी के तट पर पहुंचे है। जहाँ पर अत्रि, वशिष्ठ, च्यवन, अरिष्टनेमि, शारद्वान, पाराशर, अंगिरा, भृगु, परशुराम, विश्वामित्र, इन्द्रमद, उतथ्य, मेधातिथि, देवल, मैत्रेय, पिप्पलाद, गौतम, भारद्वाज, और्व, कण्डव, अगस्त्य, नारद, वेदव्यास आदि ऋषि, महर्षि और देवर्षि अपने अपने शिष्यों के साथ पहले से ही बैठे है।
राजा परीक्षित ने उन सभी का यथोचित समयानुकूल सत्कार करके उन्हें आसन दिया, उनके चरणों की वन्दना की और कहा – “यह मेरा परम सौभाग्य है कि आप जैस देवता तुल्य ऋषियों के दर्शन प्राप्त हुये। मैंने सत्ता के मद में चूर होकर परम तेजस्वी ब्राह्मण के प्रति अपराध किया है फिर भी आप लोगों ने मुझे दर्शन देने के लिये यहाँ तक आने का कष्ट किया यह आप लोगों की महानता है। मेरी इच्छा है कि मैं अपने जीवन के शेष सात दिनों का सदुपयोग ज्ञान प्राप्ति और भगवत्भक्ति में करूँ। अतः आप सब लोगों से मेरा निवेदन है कि आप लोग वह सुगम मार्ग बताइये जिस पर चल कर मैं भगवान को प्राप्त कर सकूँ?” परीक्षित जी महाराज पूछते है जिसकी मृत्यु निकट है ऐसे जीव को क्या करना चाहिए?
उसी समय वहाँ पर व्यास ऋषि के पुत्र, जन्म मृत्यु से रहित परमज्ञानी श्री शुकदेव जी पधारे। समस्त ऋषियों सहित राजा परीक्षित उनके सम्मान में उठ कर खड़े हो गये और उन्हें प्रणाम किया। उसके बाद अर्ध्य, पाद्य तथा माला आदि से सूर्य के समान प्रकाशमान श्री शुकदेव जी की पूजा की और बैठने के लिये उच्चासन प्रदान किया। उनके बैठने के बाद अन्य ऋषि भी अपने अपने आसन पर बैठ गये। सभी के आसन ग्रहण करने के पश्चात् राजा परीक्षित ने मधुर वाणी मे कहा – “हे ब्रह्मरूप योगेश्वर! हे महाभाग! भगवान नारायण के सम्मुख आने से जिस प्रकार दैत्य भाग जाते हैं उसी प्रकार आपके पधारने से महान पाप भी अविलंब भाग खड़े होते हैं। आप जैसे योगेश्वर के दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है पर आपने स्वयं मेरी मृत्यु के समय पधार कर मुझ पापी को दर्शन देकर मुझे मेरे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दिया है। आप योगियों के भी गुरु हैं, आपने परम सिद्धि प्राप्त की है। अतः कृपा करके यह बताइये कि मरणासन्न प्राणी के लिये क्या कर्तव्य है? उसे किस कथा का श्रवण, किस देवता का जप, अनुष्ठान, स्मरण तथा भजन करना चाहिये और किन किन बातों का त्याग कर देना चाहिये?
शुकदेव कहते है की ये प्रश्न केवल परीक्षित का नही है प्रत्येक जीव का है। क्योंकि हम सब मृत्य के निकट है। हमारी मृत्यु कभी ही हो सकती है। राजा को तो 7 दिन का समय भी मिल गया लेकिन हमें तो ये भी नही पता की हम किस दिन मरेंगे।
तो जवाब में शुकदेव कहते है जीवन के सात ही दिन है भैया! सोमवार से लेकर रविवार तक। और इन्ही सात दिनों में एक दिन हमारा दिन भी निश्चित है। इसलिए प्रत्येक दिन भगवान का स्मरण, कीर्तन और भजन करो।
परीक्षित की मुक्ति
इस प्रकार शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को श्रीमद् भागवत कथा का रस पान करवाया और इन्हे मुक्ति मिली। भगवान का लोक मिला है।

संजय गुप्ता

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कर्म का भोग मनुष्य को अवश्य ही भोगना है
🌾 कर्म भोग 🌾

एक गाँव मे एक किसान रहता था उसके परिवार
मे उसकी पत्नी और एक लड़का था।कुछ सालो के बाद पत्नी मृत्यु हो गई उस समय लड़के की उम्र दस साल थी किसान ने दुसरी शादी कर ली।

उस दुसरी पत्नी से भी किसान को एक पुत्र प्राप्त हुआ।किसान की दुसरी पत्नी की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई।

किसान का बड़ा बेटा जो पहली पत्नी से प्राप्त हुआ था जब शादी के योग्य हुआ तब किसान ने बड़े बेटे की शादी कर दी।फिर किसान की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई।

किसान का छोटा बेटा जो दुसरी पत्नी से प्राप्त हुआ था और पहली पत्नी से प्राप्त बड़ा बेटा दोनो साथ साथ रहते थे।
कुछ टाईम बाद किसान के छोटे लड़के की तबयीत खराब रहने लगी।

बड़े भाई ने कुछ आस पास के वैदो से ईलाज करवाया पर कोई राहत ना मिली।छोटे भाई की दिनभर तबीयत बिगड़ी जा रही थी और बहुत खर्च भी हो रहा था।

एक दिन बड़े भाई ने अपनी पत्नी से सलाह की यदि ये छोटा भाई मर जाऐ तो हमे इसके ईलाज के लिऐ पैसा खर्च ना करना पड़ेगा।

तब उसकी पत्नी ने कहाँ की क्यो न किसी वैद से बात करके इसे जहर दे दिया जाऐ किसी को पता भी ना चलेगा कोई रिस्तेदारी मे भी कोई शक ना करेगा कि बिमार था बिमारी से मृत्यु हो गई।

बड़े भाई ने ऐसे ही किया एक वैद से बात की आप अपनी फिस बताऔ ऐसा करना मेरे छोटे भाई को जहर देना है !

वैद ने बात मान ली और लड़के को जहर दे दिया और लड़के की मृत्यु हो गई।उसके भाई भाभी ने खुशी मनाई की रास्ते का काँटा निकल गया अब सारी सम्पति अपनी हो गई।

उसका अतिँम संस्कार कर दिया।कुछ महीनो पश्चात उस किसान के बड़े लड़के की पत्नी को लड़का हुआ !

उन पति पत्नी ने खुब खुशी मनाई,बड़े ही लाड प्यार से लड़के की परवरिश की गिने दिनो मे लड़का जवान हो गया।उन्होने अपने लड़के की शादी कर दी!

शादी के कुछ समय बाद अचानक लड़का बीमार रहने लगा।माँ बाप ने उसके ईलाज के लिऐ बहुत वैदो से ईलाज करवाया।जिसने जितना पैसा माँगा दिया सब दिया की लड़का ठीक हो जाऐ।

अपने लड़के के ईलाज मे अपनी आधी सम्पति तक बेच दी पर लड़का बिमारी के कारण मरने की कागार पर आ गया। शरीर इतना ज्यादा कमजोर हो गया की अस्थि पिजंर शेष रह गया था।

एक दिन लड़के को चारपाई पर लेटा रखा था और उसका पिता साथ मे बैठा अपने पुत्र की ये दयनीय हालत देख कर दुःखी होकर उसकी और देख रहा था!

तभी लड़का अपने पिता से बोला की भाई अपना सब हिसाब हो गया बस अब कफन और लकड़ी का हिसाब बाकी है उसकी तैयारी कर लो।

ये सुनकर उसके पिता ने सोचा की लड़के का दिमाग भी काम ना कर रहा बीमारी के कारण और बोला बेटा मै तेरा बाप हुँ भाई नही।

तब लड़का बोला मै आपका वही भाई हुँ जो आप ने जहर खिलाकर मरवाया था जिस सम्पति के लिऐ आप ने मरवाया था मुझे अब वो मेरे ईलाज के लिऐ आधी बिक चुकी है आपकी की शेष है हमारा हिसाब हो गया !

तब उसका पिता फुट-फुट कर रोते हुवे बोला की मेरा तो कुल नाश हो गया जो किया मेरे आगे आ गया पर तेरी पत्नी का क्या दोष है जो इस बेचारी को जिन्दा जलाया जाऐगा(उस समय सतीप्रथा थी जिसमे पति के मरने के बाद पत्नी को पति की चिता के साथ जला दिया जाता था)।

तब वो लड़का बोला की वो वैद कहा जिसने मुझे जहर खिलाया था तब उसके पिता ने कहा की आप की मृत्यु के तीन साल बाद वो मर गया था।

तब लड़के ने कहा की ये वही दुष्ट वैद आज मेरी पत्नी रुप मे है मेरे मरने पर इसे जिन्दा जलाया जाऐगा।

बन्दी छोड़ परमेश्वर कहते है कि
तुमने उस दरगाह का ,
महल ना देखा धर्मराय लेगा ,
तील तील का लेखा।।
एक लेवा एक देवा दुतम ,
कोई किसी का पिता ना पुतम ।
ऋण सबंध जुड़ा है ठाडा ,
अंत समय सब बारह बाटा ।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

संजय गुप्ता

Posted in रामायण - Ramayan

रामराज्य का वर्णन,,,,हम सभी जानते तो हैं की भगवान श्री राम ने अयोध्या पर राज्य किया था लेकिन वो रामराज्य कैसा था?

चौदह वर्ष वनवास काटकर माता सीता और लक्ष्मण भाई के साथ अयोध्या लौटे थे। एक बार जरा उनके राज्य का दर्शन कीजिये। जिसका वर्णन श्री तुलसीदास जी ने किया है।

कथा के अनुसार इस राम राज्य का वर्णन काकभुशुण्डी जी महाराज गरुड़ जी को कर रहे हैं। सभी मर्यादा में रहते है, राम भगवान और इंसान की तो बात ही क्या करे जनाब यहाँ तो पशु पक्षी और समुद्र भी मर्यादा में रहते हैं।

श्री राम राज्य में किसी भी व्यक्ति को कोई भी दुःख नहीं था। हर जगह सुख ही सुख था। न कोई बीमार था न किसी को कोई पीड़ा।

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

‘रामराज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं॥

कितनी सुंदर बात है की सभी आपस में प्रेम करते थे और धर्म का पालन करते थे। राम के राज्य में तो स्वप्न में भी कोई पाप नही करता था फिर हकीकत की तो बात ही क्या।

धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्‌ में परिपूर्ण हो रहा है, स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परम गति (मोक्ष) के अधिकारी हैं॥

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥

किसी की भी छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुःखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन ही है॥ कलयुग में किसी का कोई भरोसा नहीं। और अब तो यहाँ तक देखने में आता है की छोटी अवस्था में ही ज्यादा मृत्यु हो रही है।

सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान्‌ हैं। सभी गुणों का आदर करने वाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरे के किए हुए उपकार को मानने वाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसी में नहीं है॥

और आज के समय चालाकी के बिना कुछ होता ही नही है। शरीफ और भोले आदमी को तो लोग मुर्ख कहते है। और चालाकी भी ऐसी की अपना फायदा होना चाहिए बदले में किसी का भी , कितना भी नुकसान क्यों न हो।

श्री राम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत्‌ में काल, कर्म स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते (अर्थात्‌ इनके बंधन में कोई नहीं है)

अयोध्या में श्री रघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वी के एक मात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्मांड हैं, उनके लिए सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है॥

रामराज्य की सुख सम्पत्ति का वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते॥

सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और ब्राह्मणों के चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुष मात्र एक पत्नीव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्म से पति का हित करने वाली हैं॥

और आज कल आप देख रहे हैं न पति एक पत्नी का नियम धारण करके रहता है और न ही पत्नी। पति-पत्नी को केवल अपने ही सुख से मतलब है। एक दूसरे के सुख से नहीं। लेकिन हाँ केवल कुछ एक पति-पत्नी आज भी है जो नियम से और संयम से और सेवा से रहते है। मेरा ये मानना है यदि आज के समय भी पति पत्नी प्रेम से रह रहे हैं। पत्नी पति की सेवा करती है और पति अपना कर्तव्य अच्छे से निभा रहा है तो ये राम राज्य ही है।

श्री रामचंद्रजी के राज्य में दण्ड केवल संन्यासियों के हाथों में है और भेद नाचने वालों के नृत्य समाज में है और ‘जीतो’ शब्द केवल मन के जीतने के लिए ही सुनाई पड़ता है (अर्थात्‌ राजनीति में शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदि को दमन करने के लिए साम, दान, दण्ड और भेद ये चार उपाय किए जाते हैं।

रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिए ‘जीतो’ शब्द केवल मन के जीतने के लिए कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिए दण्ड किसी को नहीं होता, दण्ड शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहने वाले दण्ड के लिए ही रह गया है तथा सभी अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गई। भेद, शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिए ही कामों में आता है।)॥

वनों में वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह (वैर भूलकर) एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है॥

पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँति के पशुओं के समूह वन में निर्भय विचरते और आनंद करते हैं। शीतल, मन्द, सुगंधित पवन चलता रहता है। भौंरे पुष्पों का रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं॥

बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गायें मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुग की करनी (स्थिति) हो गई॥

समस्त जगत्‌ के आत्मा भगवान्‌ को जगत्‌ का राजा जानकर पर्वतों ने अनेक प्रकार की मणियों की खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहाने लगीं॥

समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। वे लहरों द्वारा किनारों पर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलों से परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओं के विभाग (अर्थात्‌ सभी प्रदेश) अत्यंत प्रसन्न हैं॥

श्री रामचंद्रजी के राज्य में चंद्रमा अपनी (अमृतमयी) किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं, जितने की आवश्यकता होती है और मेघ माँगने से (जब जहाँ जितना चाहिए उतना ही) जल देते हैं॥

प्रभु श्री रामजी ने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों को अनेकों दान दिए। श्री रामचंद्रजी वेदमार्ग के पालने वाले, धर्म की धुरी को धारण करने वाले, (प्रकृतिजन्य सत्व, रज और तम) तीनों गुणों से अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्र के समान हैं॥

शोभा की खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पति के अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्री रामजी की प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं॥

यद्यपि घर में बहुत से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधि में कुशल हैं, तथापि (स्वामी की सेवा का महत्व जानने वाली) श्री सीताजी घर की सब सेवा अपने ही हाथों से करती हैं और श्री रामचंद्रजी की आज्ञा का अनुसरण करती हैं॥

कृपासागर श्री रामचंद्रजी जिस प्रकार से सुख मानते हैं, श्री जी वही करती हैं, क्योंकि वे सेवा की विधि को जानने वाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है॥

उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता॥

शिवजी कहते हैं-) हे उमा जगज्जननी रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओं से वंदित और सदा अनिंदित (सर्वगुण संपन्न) हैं॥

देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परंतु वे उनकी ओर देखती भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी (जानकीजी) अपने (महामहिम) स्वभाव को छोड़कर श्री रामचंद्रजी के चरणारविन्द में प्रीति करती हैं॥

सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्री रामजी के चरणों में उनकी अत्यंत अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभु का मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्री रामजी कभी हमें कुछ सेवा करने को कहें॥

श्री रामचंद्रजी भी भाइयों पर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकार की नीतियाँ सिखलाते हैं। नगर के लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकार के देवदुर्लभ (देवताओं को भी कठिनता से प्राप्त होने योग्य) भोग भोगते हैं॥

वे दिन-रात ब्रह्माजी को मनाते रहते हैं और (उनसे) श्री रघुवीर के चरणों में प्रीति चाहते हैं।

प्रातःकाल सरयूजी में स्नान करके ब्राह्मणों और सज्जनों के साथ सभा में बैठते हैं। वशिष्ठजी वेद और पुराणों की कथाएँ वर्णन करते हैं और श्री रामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं॥

वे भाइयों को साथ लेकर भोजन करते हैं। उन्हें देखकर सभी माताएँ आनंद से भर जाती हैं। भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमान्‌जी सहित उपवनों में जाकर, हाँ बैठकर श्री रामजी के गुणों की कथाएँ पूछते हैं और हनुमान्‌जी अपनी सुंदर बुद्धि से उन गुणों में गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्री रामचंद्रजी के निर्मल गुणों को सुनकर दोनों भाई अत्यंत सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं॥

सबके यहाँ घर-घर में पुराणों और अनेक प्रकार के पवित्र रामचरित्रों की कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्री रामचंद्रजी का गुणगान करते हैं और इस आनंद में दिन-रात का बीतना भी नहीं जान पाते॥

अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज। सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥

जहाँ भगवान्‌ श्री रामचंद्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरी के निवासियों के सुख-संपत्ति के समुदाय का वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते॥

नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर सब कोसलराज श्री रामजी के दर्शन के लिए प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस (दिव्य) नगर को देखकर वैराग्य भुला देते हैं॥

दिव्य) स्वर्ण और रत्नों से बनी हुई अटारियाँ हैं। उनमें (मणि-रत्नों की) अनेक रंगों की सुंदर ढली हुई फर्शें हैं। नगर के चारों ओर अत्यंत सुंदर परकोटा बना है, जिस पर सुंदर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं॥

मानो नवग्रहों ने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावती को आकर घेर लिया हो। पृथ्वी (सड़कों) पर अनेकों रंगों के (दिव्य) काँचों (रत्नों) की गच बनाई (ढाली) गई है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियों के भी मन नाच उठते हैं॥

उज्ज्वल महल ऊपर आकाश को चूम (छू) रहे हैं। महलों पर के कलश (अपने दिव्य प्रकाश से) मानो सूर्य, चंद्रमा के प्रकाश की भी निंदा (तिरस्कार) करते हैं। (महलों में) बहुत सी मणियों से रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घर में मणियों के दीपक शोभा पा रहे हैं॥

घरों में मणियों के दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगों की बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों (रत्नों) के खम्भे हैं। मरकतमणियों (पन्नों) से जड़ी हुई सोने की दीवारें ऐसी सुंदर हैं मानो ब्रह्मा ने खास तौर से बनाई हों। महल सुंदर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुंदर स्फटिक के आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वार पर बहुत से खरादे हुए हीरों से जड़े हुए सोने के किंवाड़ हैं॥

घर-घर में सुंदर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें श्री रामचंद्रजी के चरित्र बड़ी सुंदरता के साथ सँवारकर अंकित किए हुए हैं। जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्त को चुरा लेते हैं॥

सभी लोगों ने भिन्न-भिन्न प्रकार की पुष्पों की वाटिकाएँ यत्न करके लगा रखी हैं, जिनमें बहुत जातियों की सुंदर और ललित लताएँ सदा वसंत की तरह फूलती रहती हैं॥

भौंरे मनोहर स्वर से गुंजार करते हैं। सदा तीनों प्रकार की सुंदर वायु बहती रहती है। बालकों ने बहुत से पक्षी पाल रखे हैं, जो मधुर बोली बोलते हैं और उड़ने में सुंदर लगते हैं॥

मोर, हंस, सारस और कबूतर घरों के ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं। वे पक्षी (मणियों की दीवारों में और छत में) जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर (वहाँ दूसरे पक्षी समझकर) बहुत प्रकार से मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं॥

बालक तोता-मैना को पढ़ाते हैं कि कहो- ‘राम’ ‘रघुपति’ ‘जनपालक’। राजद्वार सब प्रकार से सुंदर है। गलियाँ, चौराहे और बाजार सभी सुंदर हैं॥

सुंदर बाजार है, जो वर्णन करते नहीं बनता, वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँ की संपत्ति का वर्णन कैसे किया जाए? बजाज (कपड़े का व्यापार करने वाले), सराफ (रुपए-पैसे का लेन-देन करने वाले) आदि वणिक्‌ (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे जान प़ड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों, स्त्री, पुरुष बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुंदर हैं॥

नगर के उत्तर दिशा में सरयूजी बह रही हैं, जिनका जल निर्मल और गहरा है। मनोहर घाट बँधे हुए हैं, किनारे पर जरा भी कीचड़ नहीं है॥

अलग कुछ दूरी पर वह सुंदर घाट है, जहाँ घोड़ों और हाथियों के ठट्ट के ठट्ट जल पिया करते हैं। पानी भरने के लिए बहुत से (जनाने) घाट हैं, जो बड़े ही मनोहर हैं। वहाँ पुरुष स्नान नहीं करते॥

राजघाट सब प्रकार से सुंदर और श्रेष्ठ है, जहाँ चारों वर्णों के पुरुष स्नान करते हैं। सरयूजी के किनारे-किनारे देवताओं के मंदिर हैं, जिनके चारों ओर सुंदर उपवन (बगीचे) हैं॥

नदी के किनारे कहीं-कहीं विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते हैं। सरयूजी के किनारे-किनारे सुंदर तुलसीजी के झुंड के झुंड बहुत से पेड़ मुनियों ने लगा रखे हैं॥

नगर की शोभा तो कुछ कही नहीं जाती। नगर के बाहर भी परम सुंदरता है। श्री अयोध्यापुरी के दर्शन करते ही संपूर्ण पाप भाग जाते हैं। (वहाँ) वन, उपवन, बावलिया और तालाब सुशोभित हैं॥

अनुपम बावलियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुंदर (रत्नों की) सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनि तक मोहित हो जाते हैं। (तालाबों में) अनेक रंगों के कमल खिल रहे हैं, अनेकों पक्षी कूज रहे हैं और भौंरे गुंजार कर रहे हैं। (परम) रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियों की (सुंदर बोली से) मानो राह चलने वालों को बुला रहे हैं।

स्वयं लक्ष्मीपति भगवान्‌ जहाँ राजा हों, उस नगर का कहीं वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ और समस्त सुख-संपत्तियाँ अयोध्या में छा रही हैं।

लोग जहाँ-तहाँ श्री रघुनाथजी के गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरे को यही सीख देते हैं कि शरणागत का पालन करने वाले श्री रामजी को भजो, शोभा, शील, रूप और गुणों के धाम श्री रघुनाथजी को भजो॥

कमलनयन और साँवले शरीर वाले को भजो। पलक जिस प्रकार नेत्रों की रक्षा करती हैं उसी प्रकार अपने सेवकों की रक्षा करने वाले को भजो। सुंदर बाण, धनुष और तरकस धारण करने वाले को भजो। संत रूपी कमलवन के (खिलाने के) सूर्य रूप रणधीर श्री रामजी को भजो।

कालरूपी भयानक सर्प के भक्षण करने वाले श्री राम रूप गरुड़जी को भजो। निष्कामभाव से प्रणाम करते ही ममता का नाश कर देने वाले श्री रामजी को भजो। लोभ-मोह रूपी हरिनों के समूह के नाश करने वाले श्री राम किरात को भजो। कामदेव रूपी हाथी के लिए सिंह रूप तथा सेवकों को सुख देने वाले श्री राम को भजो॥

संशय और शोक रूपी घने अंधकार का नाश करने वाले श्री राम रूप सूर्य को भजो। राक्षस रूपी घने वन को जलाने वाले श्री राम रूप अग्नि को भजो। जन्म-मृत्यु के भय को नाश करने वाले श्री जानकी समेत श्री रघुवीर को क्यों नहीं भजते?

बहुत सी वासनाओं रूपी मच्छरों को नाश करने वाले श्री राम रूप हिमराशि (बर्फ के ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्री रघुनाथजी को भजो। मुनियों को आनंद देने वाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले और तुलसीदास के उदार (दयालु) स्वामी श्री रामजी को भजो॥

इस प्रकार नगर के स्त्री-पुरुष श्री रामजी का गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्री रामजी सदा सब पर अत्यंत प्रसन्न रहते हैं॥

जब से रामप्रताप रूपी अत्यंत प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तब से तीनों लोकों में पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतों को सुख और बहुतों के मन में शोक हुआ॥

सर्वत्र प्रकाश छा जाने से) पहले तो अविद्या रूपी रात्रि नष्ट हो गई। पाप रूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गए और काम-क्रोध रूपी कुमुद मुँद गए॥

भाँति-भाँति के (बंधनकारक) कर्म, गुण, काल और स्वभाव- ये चकोर हैं, जो (रामप्रताप रूपी सूर्य के प्रकाश में) कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह), मान, मोह और मद रूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चल पाता॥

धर्म रूपी तालाब में ज्ञान, विज्ञान- ये अनेकों प्रकार के कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक- ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गए॥

यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।
पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥

यह श्री रामप्रताप रूपी सूर्य जिसके हृदय में जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछे से किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाश को प्राप्त होते (नष्ट हो जाते) हैं॥

Sanjay Gupta

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

प्रेरक प्रसंग

इन्द्रिय – दमन

  स्वामी रामतीर्थ पहले लाहौर में प्रोफेसर थे और तब उनका नाम तीरथराम था ।  एक बार वे कालेज से घर आ रहे थे कि रास्ते में उन्होंने एक व्यक्ति को पीले - पीले बड़े नींबू बेचते पाया ।  यह देख उनके मुँह में पानी भर आया ।  उनकी जिह्वा ने कहा,  "खरीद लो, क्या हर्ज है ?"  तीरथराम ने सोचा, जो चीसुन्दर दिखाई दे अथवा पसन्द आये, क्या उसे खरीदना ही चाहिए ?  वे आगे बढ़ गये, मगर जिह्वा फिर बोली,  "नींबू उत्तम दिख रहे थे, लेने में क्या हानि थी ?  उसे खाओगे, तो तुम्हारा दिल प्रसन्न हो जायेगा ।"
  तीरथराम तुरन्त लौट आये, नींबूओं को हाथ लगाकर देखा, तो रसदार मालूम हुए ।  अकस्मात् सोचने लगे,  'यह जिह्वा क्यों पीछे पड़ी है, समझ में नहीं आता ।  इसका कहना मैं क्यों मानूँ ?'  और वे आगे बढ़ गये ।  किन्तु जिह्वा हार माननेवाली थी ?  वह फिर बोली,  "बड़े अजीब आदमी हो तुम !  तुमने जब नींबूओं को रसदार पाया, तो उनका स्वाद लेने में क्या तुम्हें पाप लगता था ?  एक खरीद लेना था ।"  और वे लौट आये ।  नींबूवाला भी हैरान था कि यह बाबू बड़ा विचित्र दिखाई देता है, जो आता है, फिर जाता है; फिर आता है, फिर जाता है ।  बोला,  "साहब !  लेना है तो लिजिए, बार - बार क्यों आ - जा रहे हैं ?"  और इस बार उन्होंने दो नींबू खरीद ही लिये ।
  घर आते ही उन्होंने पत्नी से चाकू माँगा ।  उन्होंने एक नींबू को काटा और ज्योंहि वे एक फाँक को चूसने के लिए मुँह तक लाये ही थे कि अन्दर से आवाज आयी,  "वाह तीरथराम !  मानना पड़ेगा, तू भी इस जिह्वा का दास हो गया ।  वह तुझे आदेश दे रही है और तू उसका पालन करता जा रहा है ।  अरे, जिह्वा तेरी है या तू जिह्वा का है ?"
  तब तक पत्नी भी वहाँ पहुँच चुकी थी ।  उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बाजार से आते ही पति ने चाकू माँगा, नींबू काटा और वह ज्यों का त्यों पड़ा है ।  बोली,  "नींबू खाते - खाते रूक कैसे गयें ?"  जिह्वा भला चुप कैसे रह सकती थी ।  वह भी बोली,  "बड़े मूरख हो तुम भी !  काटकर भी चखते नहीं हो !"
  तीरथराम तुरन्त उठे और उन्होंने कटे और साबूत दोनों नीबूओं को उठाकर फेंक दिया ।  फिर प्रसन्नता से चिल्ला उठे,  "मैं जीत गया ।  इन्द्रियों को मैं भी वश में कर सकता हूँ !"

अनूप सिन्हा

Posted in हिन्दू पतन

एक बार शनीस आर्य के लिए सेयर कर दो-

“ये क्रिप्टो-क्रिस्चियन क्या है?
ग्रीक भाषा मे क्रिप्टो शब्द का अर्थ हुआ छुपा हुआ या गुप्त; क्रिप्टो-क्रिस्चियन का अर्थ हुआ गुप्त-ईसाई। इसमें महत्वपूर्ण बात ये है कि क्रिप्टो-क्रिस्चियन कोई गाली या नकारात्मक शब्द नहीं हैं। क्रिप्टो-क्रिस्चियानिटी ईसाई धर्म की एक संस्थागत प्रैक्टिस है। क्रिप्टो-क्रिस्चियनिटी के मूल सिद्धांत के अंर्तगत क्रिस्चियन जिस देश मे रहतें है वहाँ वे दिखावे के तौर पर तो उस देश के ईश्वर की पूजा करते है, वहाँ का धर्म मानतें हैं जो कि उनका छद्मावरण होता है, पर वास्तव में अंदर से वे ईसाई होते हैं और निरंतर ईसाई धर्म का प्रचार करते रहतें है।
क्रिप्टो-क्रिस्चियन का सबसे पहला उदाहरण रोमन सामाज्य में मिलता है जब ईसाईयत ने शुरुवाती दौर में रोम में अपने पैर रखे थे। तत्काल महान रोमन सम्राट ट्रॉजन ने ईसाईयत को रोमन संस्कृति के लिए खतरा समझा और जितने रोमन ईसाई बने थे उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो वे ईसाईयत छोड़ें या मृत्यु-दंड भुगतें। रोमन ईसाईयों ने मृत्यु-दंड से बचने के लिए ईसाई धर्म छोड़ने का नाटक किया और उसके बाद ऊपर से वे रोमन देवी देवताओं की पूजा करते रहे, पर अंदर से ईसाईयत को मानते थे। जिस तरह मुसलमान 5-10 प्रतिशत होते हैं होतें है तब उस देश के कानून को मनातें है पर जब 20-30 प्रतिशत होतें हैं तब शरीअत की मांग शुरू होती है, दंगे होतें है। आबादी और अधिके बढ़ने पर गैर-मुसलमानों की ethnic cleansing शुरू हो जाती है।
पर, क्रिप्टो-क्रिस्चियन, मुसलमानों जैसी हिंसा नहीं करते। जब क्रिप्टो-क्रिस्चियन 1 प्रतिशत से कम होते है तब वह उस देश के ईश्वर को अपना कर अपना काम करते रहतें है जैसा कि और जब अधिक संख्या में हो जातें तो उन्ही देवी-देवताओं का अपमान करने लगतें हैं। Hollywood की मशहूर फिल्म Agora(2009) हर हिन्दू को देखनी चाहिए। इसमें दिखाया है कि जब क्रिप्टो-क्रिस्चियन रोम में संख्या में अधिक हुए तब उन्होंने रोमन देवी-देवताओं का अपमान करना शुरू कर दिया। वर्तमान में भारत मे भी क्रिप्टो-क्रिस्चियन ने पकड़ बनानी शुरू की तो यहाँ भी हिन्दू देवी-देवताओं, ब्राह्मणों को गाली देने का काम शुरू कर दिया। मतलब, जो काम यूरोप में 2000 साल पहले हुआ वह भारत मे आज हो रहा है। हाल में प्रोफेसर केदार मंडल द्वारा देवी दुर्गा को वेश्या कहा जो कि दूसरी सदी के रोम की याद दिलाता है।
क्रिप्टो-क्रिस्चियन के बहुत से उदाहरण हैं पर सबसे रोचक उदाहरण जापान से है। मिशनिरियों का तथाकथित-संत ज़ेवियर जो भारत आया था वह 1550 में धर्मान्तरण के लिए जापान गया और उसने कई बौद्धों को ईसाई बनाया। 1643 में जापान के राष्ट्रवादी राजा शोगुन(Shogun) ने ईसाई धर्म का प्रचार जापान की सामाजिक एकता के लिए खतरा समझा। शोगुन ने बल का प्रयोग किया और कई चर्चो को तोड़ा गया; जीसस-मैरी की मूर्तियां जब्त करके तोड़ दी गईं; बाईबल समेत ईसाई धर्म की कई किताबें खुलेआम जलायीं गईं। जितने जापानियों ने ईसाई धर्म अपना लिया था उनको प्रताड़ित किया गया, उनकी बलपूर्वक बुद्ध धर्म मे घर वापसी कराई गई। जिन्होंने मना किया, उनके सर काट दिए गए। कई ईसाईयों ने बौद्ध धर्म मे घर वापसी का नाटक किया और क्रिप्टो-क्रिस्चियन बने रहे। जापान में इन क्रिप्टो-क्रिस्चियन को “काकूरे-क्रिस्चियन” कहा गया।
काकूरे-क्रिस्चियन ने बौद्धों के डर से ईसाई धर्म से संबधित कोई भी किताब रखनी बन्द कर दी। जीसस और मैरी की पूजा करने के लिए इन्होंने प्रार्थना बनायी जो सुनने में बौद्ध मंत्र लगती पर इसमें बाइबल के शब्द होते थे। ये ईसाई प्रार्थनाएँ काकूरे-क्रिस्चियनों ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित करनी शुरू कर दी। 1550 से ले कर अगले 400 सालों तक काकूरे-क्रिस्चियन बुद्ध धर्म के छद्मावरण में रहे। 20वी शताब्दी में जब जापान औद्योगिकीकरण की तरफ बढ़ा और बौद्धों के धार्मिक कट्टरवाद में कमी आई तो इन काकूरे-क्रिस्चियन बौद्ध धर्म के मुखौटे से बाहर निकल अपनी ईसाई पहचान उजागर की।
भारत मे ऐसे बहुत से काकूरे-क्रिस्चियन हैं जो सेक्युलरवाद, वामपंथ और बौद्ध धर्म का मुखौटा पहन कर हमारे बीच हैं। भारत मे ईसाई आबादी आधिकारिक रूप से 2 करोड़ है और अचंभे की बात नहीं होगी अगर भारत मे 10 करोड़ ईसाई निकलें। अकेले पंजाब में अनुमानित ईसाई आबादी 10 प्रतिशत से ऊपर है। पंजाब के कई ईसाई, सिख धर्म के छद्मावरण में है, पगड़ी पहनतें है, दाड़ी, कृपाण, कड़ा भी पहनतें हैं पर सिख धर्म को मानते हैं पर ये सभी गुप्त-ईसाई हैं।
बहुत से क्रिप्टो-क्रिस्चियन आरक्षण लेने के लिए हिन्दू नाम रखे हैं। इनमें कइयों के नाम राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि भगवानों पर होतें है जिन्हें संघ के लोग भी सपने में गैर-हिन्दू नहीं समझ सकते जैसे कि पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन जिंदगी भर दलित बन के मलाई खाता रहा और जब मरने पर ईसाई धर्म के अनुसार दफनाने की प्रक्रिया देखी तो समझ मे आया कि ये क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।
देश मे ऐसे बहुत से क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं जो हिन्दू नामों में हिन्दू धर्म पर हमला करके सिर्फ वेटिकन का एजेंडा बढ़ा रहें हैं।
हम रोजमर्रा की ज़िंदगी मे हर दिन क्रिप्टो-क्रिस्चियनों को देखते हैं पर उन्हें समझ नहीं पाते क्योंकि वे हिन्दू नामों के छद्मावरण में छुपे रहतें हैं। जैसे कि…
राम को काल्पनिक बताने वाली कांग्रेसी नेता अम्बिका सोनी क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।
NDTV का अधिकतर स्टाफ क्रिप्टो-क्रिस्चियन है।
हिन्दू नामों वाले नक्सली जिन्होंने स्वामी लक्ष्मणानन्द को मारा, वे क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
गौरी लंकेश, जो ब्राह्मणों को केरला से बाहर उठा कर फेंकने का चित्र अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लगाये थी, क्रिप्टो-क्रिस्चियन थी।
JNU में भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले और फिर उनके ऊपर भारत सरकार द्वारा कार्यवाही को ब्राह्मणवादी अत्याचार बताने वाले वामी नहीं, क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
फेसबुक पर ब्राह्मणों को गाली देने वाले, हनुमान को बंदर, गणेश को हाथी बताने वाले खालिस्तानी सिख, क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
तमिलनाडु में द्रविड़ियन पहचान में छुप कर उत्तर भारतीयों पर हमला करने वाले क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
जिस राज्य ने सबसे अधिक हिंदी गायक दिए उस राज्य बंगाल में हिंदी का विरोध करने वाले क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
अंधश्रद्धा के नाम हिन्दू त्योहारों के खिलाफ एजेंडे चलाने वाला और बकरीद पर निर्दोष जानवरों की बलि और ईस्टर के दिन मरा हुआ आदमी जीसस जिंदा होने को अंधश्रध्दा न बोलने वाला दाभोलकर, क्रिप्टो-क्रिस्चियन था।
देवी दुर्गा के वेश्या बोलने वाला केदार मंडल और रात दिन फेसबुक पर ब्राह्मणों के खिलाफ बोलने वाले दिलीप मंडल, वामन मेश्राम क्रिप्टो-क्रिस्चियन।
महिषासुर को अपना पूर्वज बताने वाले जितेंद्र यादव और सुनील जनार्दन यादव जैसे कई यादव सरनेम में छुपे क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।
जब किसी के लिवर में समस्या होती है तो उसकी त्वचा में खुजली, जी मचलाना और आंखों पीलापन आ जाता है पर ये सब सिर्फ symptoms हैं इनकी दवा करने से मूल समस्या हल नहीं होगी। अगर लिवर की समस्या को हल कर लिया तो ये symptoms अपने आप गायब हो जाएंगे।
बिना विश्लेषण के देखेंगे तो हिंदुओं के लिए तमाम समस्याएं दिखेंगी वामी, कांग्रेस, खालिस्तानी, नक्सली, दलित आंदोलन, JNU इत्यादि है, पर ये सब समस्याएं symptoms मात्र हैं जिसका मूल है क्रिप्टो-क्रिस्चियन।
(फोटो में बौद्ध रूप में मदर मेरी, काकूरे क्रिस्चियन बौद्धों को इस प्रकार मूर्ख बनाते रहे)

हर वक्त दिल में एक टीस सी रहती है …..

निओ दिप

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

स्थान दिल्ली के निजामुद्दी रेलवे स्टेशन का टिकट काउनटर#

“अरे भाई मै पेहले आया हु..आप मेरे बाद आये है आप मेरे पीछे खड़े रहीये..”

व्यक्ती-“जी मै पीछे ही रहुन्गा..ये माँजी काफ़ी देर से खड़ी है कृपया इनको आगे कर दिजीये बड़ी महेरबानी होगी”

पेहला व्यक्ती-“क्यु भाई??क्यु??मै भी एक घंटे से टिकट के लिये खड़ा हु..मै अपनी जगेह क्यु छोड़ु??”

व्यक्ती-“इंसानियत के नाते ही कर दिजिये..”

पेहला व्यक्ती-“अरे सारी इंसानियत मै दिखाउ..??आप भी कुछ दिखाओ..लाईन मे लगो और अपने साथ-साथ इनका भी टिकट निकालो..हा”

व्यक्ती-“जी अच्छी बात है…माँ जी आप बेंच पे बैठीये..मै आपका टिकट निकाल देता हु आप कहा का टिकट चाहिये?”

बुढ़ी औरत-“बेटा उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का..भगवान तुम्हारा भला करे बेटा..”

एक के बाद एक सब लोग टिकट लेते गये फिर उस व्यक्ती का नो.आया…

व्यक्ती-“दो टिकट देना एक अहमदाबाद एक UP के बुलंदशहर का”

जैसे ही टिकट बाबु ने उस व्यक्ती को देखा…”अरे पहलाद भाई..आप दिल्ली मे..कैसे आना हुआ??मोटा भाई से मिलने आये थे??”

व्यक्ती-“हा..हा..मिला अब लौट रहा हु..निमेश भाई टिकट”

टिकट बाबु-“अरे पहलाद भाई आपको लाईन मे लगने की क्या जरुरत थी..आप वेटिन्ग रुम मे बैठते बस मुझे एक खबर दिला देते किसी कर्मचारी से..मै टिकट वही पोहोचवा देता”

व्यक्ती-“अरे नही निमेश भाई..मै भी तो एक आम शेहरी हु..मुझे भी लाईन मे लगना चाहिये..आप बस टिकट दे दिजिये..”

टिकट बाबु ने टिकट काटके दे दिये व्यक्ती ने पैसे चुकाए और उस बुढ़ी औरत की तरह बढ़ने लगा..

“माँजी ये लिजिये आपका टिकट गाड़ी 1 नो.पे आयेगी”

बुढ़ी औरत-“बेटा आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..पैसे कितने हुए??”

व्यक्ती-“अरे नही मांजी..पैसो की जरुरत नही देना ही है तो आशिर्वाद ही दे दिजिये…”

बुढ़िया-“जुग-जुग जियो बेटा”

आपलोग जानते है वोह व्यक्ती कौन था??वोह व्यक्ती था इस देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का छोटा भाई पहलाद मोदी जो इसी तरह ट्रेन से यात्रा करता है इसी तरह साधारन जीवन जीता है कोई अनुचित सरकारी सुख सुविधा नही लेता…और दुसरी तरफ़ हमने तो यहा तक सुना है की कही कोई आयोजक केहता है “अरे सब लोग हट जाओ..सोनिया गाँधीजी के दामाद जी आ रहे है”😭🙂

निओ दीप

Posted in रामायण - Ramayan

अयोध्या की कहानी

जिसे समय निकालकर पढे केवल भाजपा या काग्रेस की दृष्टि से ना पढें हिन्दुओ का इतिहास के आधार पर पढ़ें
कृपया इस
लेख को पढ़ें, तथा प्रत्येक
हिन्दूँ मिञों को अधिक से
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जब बाबर
दिल्ली की गद्दी पर
आसीन हुआ उस समय
जन्मभूमि सिद्ध महात्मा श्यामनन्द जी महाराज के
अधिकार क्षेत्र में थी। महात्मा श्यामनन्द
की ख्याति सुनकर ख्वाजा कजल अब्बास
मूसा आशिकान
अयोध्या आये । महात्मा जी के शिष्य बनकर
ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने योग और सिद्धियाँ प्राप्त
कर ली और उनका नाम
भी महात्मा श्यामनन्द के
ख्यातिप्राप्त शिष्यों में लिया जाने लगा।

ये सुनकर
जलालशाह नाम का एक फकीर भी
महात्मा श्यामनन्द के पास आया और उनका शिष्य बनकर
सिद्धियाँ प्राप्त करने लगा।
जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था, और उसको एक
ही सनक थी,
हर जगह इस्लाम का आधिपत्य साबित करना । अत:
जलालशाह ने अपने काफिर गुरू की पीठ
में छुरा घोंपकर
ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर ये विचार
किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिद
बनवा दी जाये तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में
स्थायी हो जायेगा। धीरे धीरे
जलालशाह और
ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने
की तैयारियों में जुट गए ।

सर्वप्रथम जलालशाह और ख्वाजा बाबर के
विश्वासपात्र बने और दोनों ने अयोध्या को खुर्द
मक्का बनाने के लिए जन्मभूमि के आसपास
की जमीनों में
बलपूर्वक मृत मुसलमानों को दफन करना शुरू किया॥ और
मीरबाँकी खां के माध्यम से बाबर
को उकसाकर मंदिर के
विध्वंस का कार्यक्रम बनाया। बाबा श्यामनन्द
जी अपने मुस्लिम शिष्यों की करतूत देख
के बहुत दुखी हुए
और अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ।

दुखी मन से
बाबा श्यामनन्द जी ने
रामलला की मूर्तियाँ सरयू में
प्रवाहित किया और खुद हिमालय की और
तपस्या करने
चले गए। मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामान
आदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पर
रामलला की रक्षा के लिए खड़े हो गए। जलालशाह
की आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सर काट
लिए गए. जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने
की घोषणा हुई उस समय
भीटी के राजा महताब सिंह
बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए
निकले
थे,अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें ये खबर
मिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर
दी और
अपनी छोटी सेना में रामभक्तों को शामिल
कर १ लाख
चौहत्तर हजार लोगो के साथ बाबर की सेना के ४
लाख
५० हजार सैनिकों से लोहा लेने निकल पड़े।

रामभक्तों ने सौगंध ले रक्खी थी रक्त
की आखिरी बूंद तक
लड़ेंगे जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने
देंगे।
रामभक्त वीरता के साथ लड़े ७० दिनों तक घोर संग्राम
होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेत
सभी १
लाख ७४ हजार रामभक्त मारे गए। श्रीराम
जन्मभूमि रामभक्तों के रक्त से लाल हो गयी। इस
भीषण
कत्ले आम के बाद मीरबांकी ने
तोप लगा के मंदिर गिरवा दिया । मंदिर के मसाले से
ही मस्जिद का निर्माण हुआ
पानी की जगह मरे हुए
हिन्दुओं का रक्त इस्तेमाल किया गया नीव में
लखौरी इंटों के साथ ।

इतिहासकार कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के
पृष्ठ 3 पर लिखता है की एक लाख चौहतर हजार
हिंदुओं
की लाशें गिर जाने के पश्चात
मीरबाँकी अपने मंदिर
ध्वस्त करने के अभियान मे सफल हुआ और उसके बाद
जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर
दिया गया..
इसी प्रकार हैमिल्टन नाम का एक अंग्रेज
बाराबंकी गजेटियर में लिखता है की ”
जलालशाह ने
हिन्दुओं के खून का गारा बना के
लखौरी ईटों की नीव
मस्जिद बनवाने के लिए
दी गयी थी।
उस समय अयोध्या से ६ मील
की दूरी पर सनेथू नाम
का एक गाँव के पंडित देवीदीन पाण्डेय ने
वहां के आस
पास के गांवों सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय
क्षत्रियों को एकत्रित किया॥ देवीदीन
पाण्डेय ने
सूर्यवंशीय क्षत्रियों से कहा भाइयों आप लोग मुझे
अपना राजपुरोहित मानते हैं ..अप के पूर्वज
श्री राम थे
और हमारे पूर्वज महर्षि भरद्वाज जी। आज
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम
की जन्मभूमि को मुसलमान
आक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं और खोद रहे हैं इस
परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने
की बजाय जन्मभूमि की रक्षार्थ युद्ध
करते करते
वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा॥

देवीदीन पाण्डेय
की आज्ञा से दो दिन के भीतर ९०
हजार क्षत्रिय इकठ्ठा हो गए दूर दूर के गांवों से लोग
समूहों में इकठ्ठा हो कर देवीदीन
पाण्डेय के नेतृत्व में
जन्मभूमि पर
जबरदस्त धावा बोल दिया । शाही सेना से लगातार ५
दिनों तक युद्ध हुआ । छठे दिन
मीरबाँकी का सामना देवीदीन
पाण्डेय से हुआ उसी समय
धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक
लखौरी ईंट से पाण्डेय
जी की खोपड़ी पर वार कर
दिया। देवीदीन पाण्डेय का सर
बुरी तरह फट
गया मगर उस वीर ने अपने पगड़ी से
खोपड़ी से बाँधा और
तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया।
इसी बीच
मीरबाँकी ने छिपकर
गोली चलायी जो पहले
ही से घायल देवीदीन पाण्डेय
जी को लगी और
वो जन्मभूमि की रक्षा में वीर
गति को प्राप्त
हुए..जन्मभूमि फिर से 90 हजार हिन्दुओं के रक्त से लाल
हो गयी। देवीदीन पाण्डेय के
वंशज सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का पुरवा नामक
जगह
पर अब भी मौजूद हैं॥
पाण्डेय जी की मृत्यु के १५ दिन बाद
हंसवर के महाराज
रणविजय सिंह ने सिर्फ २५ हजार सैनिकों के साथ
मीरबाँकी की विशाल और
शस्त्रों से सुसज्जित सेना से
रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया । 10
दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ
वीरगति को प्राप्त हो गए। जन्मभूमि में 25 हजार
हिन्दुओं का रक्त फिर बहा।
रानी जयराज कुमारी हंसवर के
स्वर्गीय महाराज
रणविजय सिंह की पत्नी थी।

जन्मभूमि की रक्षा में
महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद
महारानी ने
उनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और
तीन
हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर
हमला बोल
दिया और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध
जारी रखा। रानी के गुरु
स्वामी महेश्वरानंद जी ने
रामभक्तों को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराज
कुमारी की सहायता की। साथ
ही स्वामी महेश्वरानंद
जी ने
सन्यासियों की सेना बनायीं इसमें उन्होंने
२४
हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराज
कुमारी के साथ , हुमायूँ के समय में कुल १० हमले
जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये। १०वें हमले में
शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और
जन्मभूमि पर
रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया।

लेकिन लगभग एक महीने बाद हुमायूँ ने
पूरी ताकत से
शाही सेना फिर भेजी ,इस युद्ध में
स्वामी महेश्वरानंद
और रानी कुमारी जयराज
कुमारी लड़ते हुए
अपनी बची हुई
सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर
पुनः मुगलों का अधिकार हो गया। श्रीराम
जन्मभूमि एक बार फिर कुल 24 हजार सन्यासियों और 3
हजार वीर नारियों के रक्त से लाल
हो गयी।
रानी जयराज कुमारी और
स्वामी महेश्वरानंद जी के
बाद यद्ध का नेतृत्व
स्वामी बलरामचारी जी ने
अपने
हाथ में ले लिया।
स्वामी बलरामचारी जी ने गांव
गांव
में घूम कर
रामभक्त हिन्दू युवकों और सन्यासियों की एक
मजबूत
सेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि के
उद्धारार्थ २० बार आक्रमण किये. इन २० हमलों में काम
से
काम १५ बार स्वामी बलरामचारी ने
जन्मभूमि पर
अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के
लिए रहता था थोड़े दिन बाद
बड़ी शाही फ़ौज
आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के
अधीन
हो जाती थी..जन्मभूमि में लाखों हिन्दू
बलिदान होते
रहे।
उस समय का मुग़ल शासक अकबर था।

शाही सेना हर दिन
के इन युद्धों से कमजोर हो रही थी..
अतः अकबर ने
बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस
की टाट से उस
चबूतरे पर ३ फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया.
लगातार युद्ध करते रहने के कारण
स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य
गिरता चला गया था और प्रयाग कुम्भ के अवसर पर
त्रिवेणी तट पर
स्वामी बलरामचारी की मृत्यु
हो गयी ..
इस प्रकार बार-बार के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के
रोष एवं हिन्दुस्थान पर
मुगलों की ढीली होती पकड़
से
बचने का एक राजनैतिक प्रयास की अकबर
की इस
कूटनीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में रक्त
नहीं बहा।

यही क्रम शाहजहाँ के समय
भी चलता रहा। फिर
औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था और
उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये
का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे
मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के
सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़
डाला।

औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था और
उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये
का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे
मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के
सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़
डाला।
औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु श्री रामदास
जी महाराज
जी के शिष्य श्री वैष्णवदास
जी ने जन्मभूमि के
उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये। इन आक्रमणों मे
अयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशीय
क्षत्रियों ने
पूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदार
गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह
तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे। ये सारे
वीर ये जानते हुए
भी की उनकी सेना और
हथियार
बादशाही सेना के सामने कुछ
भी नहीं है अपने जीवन के
आखिरी समय तक शाही सेना से
लोहा लेते रहे। लम्बे समय
तक चले इन युद्धों में रामलला को मुक्त कराने के लिए
हजारों हिन्दू वीरों ने अपना बलिदान दिया और
अयोध्या की धरती पर उनका रक्त
बहता रहा।
ठाकुर गजराज सिंह और उनके साथी क्षत्रियों के
वंशज
आज भी सराय मे मौजूद हैं। आज
भी फैजाबाद जिले के आस पास के
सूर्यवंशीय क्षत्रिय
सिर पर
पगड़ी नहीं बांधते,जूता नहीं पहनते,
छता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये
प्रतिज्ञा ली थी की जब
तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार
नहीं कर लेंगे तब तक
जूता नहीं पहनेंगे,छाता नहीं लगाएंगे,
पगड़ी नहीं पहनेंगे। 1640
ईस्वी में औरंगजेब ने मन्दिर
को ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व में एक
जबरजस्त सेना भेज दी थी, बाबा वैष्णव
दास के साथ
साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे
निपुण थी इसे
चिमटाधारी साधुओं
की सेना भी कहते थे । जब
जन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के
साथ चिमटाधारी साधुओं
की सेना की सेना मिल
गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर
जाबाज़
खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध
किया ।
चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार से
मुगलों की सेना भाग खड़ी हुई। इस
प्रकार चबूतरे पर
स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी । जाबाज़
खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत
क्रोधित
हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्य
सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार
सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ
अयोध्या की ओर
भेजा और साथ मे ये आदेश
दिया की अबकी बार
जन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है ,यह समय सन्
1680 का था । बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के
गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के
माध्यम संदेश भेजा । पत्र पाकर गुरु गुरुगोविंद सिंह
सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर
अपना डेरा डाला । ब्रहमकुंड वही जगह
जहां आजकल
गुरुगोविंद सिंह की स्मृति मे
सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास
एवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु
एकसाथ रणभूमि में कूद पड़े ।इन वीरों कें सुनियोजित
हमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद
हसन
अली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेब
हिंदुओं की इस
प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद
4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने
की हिम्मत
नहीं की। औरंगजेब ने सन् 1664 मे
एक बार फिर
श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया । इस
भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग
10 हजार से
ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर
दी नागरिकों तक
को नहीं छोड़ा। जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल
हो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प
कूप नाम
का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं
की लाशें मुगलों ने उसमे
फेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर
उसे घेर दिया।
आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के
नाम से प्रसिद्ध है,और
जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है।
शाही सेना ने
जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वह
चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूर
अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस
गड्ढे पर
ही श्री रामनवमी के दिन
भक्तिभाव से अक्षत,पुष्प और
जल चढाती रहती थी. नबाब
सहादत अली के समय 1763
ईस्वी में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी के
राजा गुरुदत्त
सिंह और पिपरपुर के
राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच
आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं
की लाशें
अयोध्या में गिरती रहीं। लखनऊ गजेटियर
मे कर्नल हंट
लिखता है की
“ लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और
मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने
की इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमान
होने के नाते उसने
काफिरों को जमीन नहीं सौंपी।
“लखनऊ गजेटियर पृष्ठ
62” नासिरुद्दीन हैदर के समय मे
मकरही के राजा के
नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए
हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें
बड़ी संख्या में हिन्दू
मारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर
नबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओं
की शक्ति क्षीण होने
लगी ,जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओं
और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । इस संग्राम
मे भीती,हंसवर,,मकर
ही,खजुरहट,दीयरा
अमेठी के
राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। हारती हुई
हिन्दू
सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं
की सेना आ
मिली और इस युद्ध मे शाही सेना के
चिथड़े उड गये और उसे
रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया।
मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशाल
शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर
लिया और
हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया। जन्मभूमि में
हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा। नावाब
वाजिदअली शाह के समय के समय मे पुनः हिंदुओं ने
जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया । फैजाबाद
गजेटियर में कनिंघम ने लिखा
“इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ
।दो दिन
और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं के
मारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्मभूमि पर
कब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़
ने कब्रें तोड़
फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमार करने
लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार कर
अयोध्या से खदेड़ना शुरू किया।मगर हिन्दू भीड़ ने
मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई
हानि नहीं पहुचाई।
अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था ।
इतिहासकार कनिंघम लिखता है की ये
अयोध्या का सबसे
बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था।
हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब
द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस
बनाया । चबूतरे पर तीन फीट
ऊँची खस की टाट से एक
छोटा सा मंदिर बनवा लिया ॥जिसमे
पुनः रामलला की स्थापना की गयी।
कुछ
जेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकार
नहीं हुई और
कालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकल
गयी। सन 1857 की क्रांति मे बहादुर
शाह जफर के समय
में बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिर
अली के साथ
जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन
1858 को कुबेर टीला स्थित एक
इमली के पेड़ मे
दोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटका दिया ।
जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवं
रामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसित
हो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इस
आखिरी निशानी को भी मिटा दिया…
इस प्रकार अंग्रेज़ो की कुटिल नीति के
कारण
रामजन्मभूमि के उद्धार का यह एकमात्र प्रयास विफल
हो गया … अन्तिम बलिदान …
३० अक्टूबर १९९० को हजारों रामभक्तों ने वोट-बैंक के
लालची मुलायम सिंह यादव के
द्वारा खड़ी की गईं अनेक
बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और
विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। लेकिन
२ नवम्बर १९९० को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव
ने
कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें
सैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवन
की आहुतियां दीं।
सरकार ने
मृतकों की असली संख्या छिपायी परन्तु
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सरयू तट
रामभक्तों की लाशों से पट गया था। ४ अप्रैल १९९१
को कारसेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन
मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने
इस्तीफा दिया।
लाखों राम भक्त ६ दिसम्बर को कारसेवा हेतु
अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के
सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीक
मस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया। परन्तु हिन्दू
समाज के अन्दर व्याप्त घोर संगठनहीनता एवं
नपुंसकता के कारण आज भी हिन्दुओं के सबसे बड़े
आराध्य
भगवान श्रीराम एक फटे हुए तम्बू में विराजमान हैं।
जिस जन्मभूमि के उद्धार के लिए हमारे पूर्वजों ने
अपना रक्त पानी की तरह बहाया। आज
वही हिन्दू
बेशर्मी से इसे “एक विवादित स्थल” कहता है।
सदियों से हिन्दुओं के साथ रहने वाले मुसलमानों ने आज
भी जन्मभूमि पर
अपना दावा नहीं छोड़ा है।
वो यहाँ किसी भी हाल में मन्दिर
नहीं बनने देना चाहते
हैं ताकि हिन्दू हमेशा कुढ़ता रहे और उन्हें
नीचा दिखाया जा सके।
जिस कौम ने अपने
ही भाईयों की भावना को नहीं समझा वो सोचते
हैं
हिन्दू उनकी भावनाओं को समझे। आज तक
किसी भी मुस्लिम संगठन ने जन्मभूमि के
उद्धार के लिए
आवाज नहीं उठायी, प्रदर्शन
नहीं किया और सरकार
पर दबाव नहीं बनाया आज भी वे
बाबरी-विध्वंस
की तारीख 6 दिसम्बर को काला दिन मानते
हैं। और
मूर्ख हिन्दू समझता है कि राम
जन्मभूमि राजनीतिज्ञों और मुकदमों के कारण
उलझा हुआ
है।
ये लेख पढ़कर जिन हिन्दुओं को शर्म
नहीं आयी वो कृपया अपने घरों में राम
का नाम
ना लें…अपने रिश्तेदारों से कह दें कि उनके मरने के बाद
कोई “राम नाम” का नारा भी नहीं लगाएं।
विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता एक दिन श्रीराम
जन्मभूमि का उद्धार कर वहाँ मन्दिर अवश्य बनाएंगे।इस भारत को अखण्ड बनाकर एक बार फिर से रामराज्य लाएंगे
चाहे अभी और कितना ही बलिदान
क्यों ना देना पडे।

कृपया आगे फॉरवर्ड करे
आपका बहुत आभारी रहूँगा

जय श्री राम जय जय श्री राम
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

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