Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

【【【विदाई】】】

ज्यों ज्यों शादी के दिन नजदीक आ रहे थे। मीठी गुमसुम होती जा रही थी। अब सिर्फ सात दिन रह गए थे। सारे घर वाले शादी की तैयारियों में बिजी थे। घर मे खुशी और उल्लास का माहौल था।
मग़र मीठी के दिल का हाल कोई नही जानना चाहता। उस पर क्या गुजर रही है किसी को खबर नही। वो घर के जिस कमरे में जाती उसकी दीवारों को टकटकी लगाकर देखने लगती।
जी भरकर देखने की लालसा में सुन्न सी पड़ जाती।

बाहर बरामदे में बारिश को इतनी टकटकी लगाकर देखने लगती जैसे हर एक बूंद को आंखों में समा लेना चाहती हो।
बाबुल के घर के इस अद्वित्य नजारे को जीवन भर के लिए हृदय में संजो लेना चाहती हो।
सब कुछ छूट जाएगा यहीं। अपना घर, अपनी गलियाँ, उसकी जरा सी आह पर उसके लिए फिक्र करने वाला परिवार, भाई, बहिन, मम्मी-पापा सब!!
लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी है। इकलौता है। “मीठी राज करेगी” सब यही कहते हैं।
मग़र मीठी को उसके लिए यह घर छोडना होगा?
क्यूँ??
क्या इतना आसान है अपना घर छोड़ना?
मीठी का दिल विद्रोह सा करने लगता।
वह बारिश की फुंहारो में खोई थी कि छोटा भाई आकर बोला
“दीदी”
मीठी बेखर थी।
उसने बांह पकड़ कर हिलाया” दीदी”
मीठी की तन्द्रा टूटी बोली ” हाँ क्या चाहिए”
“दीदी तेरे पेन मैं ले लूँ क्या?? तू तो ससुराल चली जाएगी। पेन तो खराब हो जाएंगे”
“”जा ले ले”” पेन को हाथ तक नही लगाने देने वाली मीठी के मुंह से इतना सुनकर भाई सरपट उसके कमरे में दौड़ गया कि कहीं दीदी अपना निर्णय न बदल दे।
मीठी भी उसके पीछे गई।
भाई सैंकड़ो की संख्या में इकठ्ठे किए गए पैनो पर हाथ साफ कर रहा था।
मीठी बोल पड़ी “सुन, वो लाल वाला मुझे देदे, पापा ने जन्म दिन पर गिफ्ट दिया था”।
“ये टूटा हुआ है दीदी”
“टूटा हुआ ही दे दे” पापा की याद तो दिलाएगा”
कहते कहते मीठी का गला भर आया।
इतने में छोटी बहन भी आ गई। भाई को इतने सारे पेन पर हाथ साफ करते देख कर वह भी झपटा मारने लगी।
फिर दोनों लड़ने लगे।
मीठी ने दोनो को अलग किया फिर बहन से बोली।
“”पेन इसे ले लेने दे। तू ये सब ले ले”
“”ये रबड़, ये घड़ी, ये कड़ा, ये जीन्स भी ले ले। देख कितनी प्यारी गुड़िया है ये भी आज से तेरी हो गई” ये स्कूल कॉलेज में मीले सारे गिफ्ट -ट्रॉफियां, सारे कपड़े, सब आज से तेरे हुए।”
फिर मीठी अपने आंसुओं को दबा कर फिर बाहर खुले आसमान के नीचे बैठ गई। बारिश अब थम चुकी थी। मगर मीठी के दिल के भीतर एक बाढ़ सी आई हुई थी। जो किसी को भी नही दिख रही थी।
अगले छः दिन भी रस्मो और खयालो में गुजर गए। इन छः दिनों में मीठी ने बस इतना जाना कि हर कोई उसको विदा करने में लगा है। हर कोई उसे घर से निकाल देना चाहता है
उसके दिल का हाल कोई नही जानता।
हां अब घर की निर्जीव चीजें बोलने लगी थी। कमरे की दीवारें, ऊपर घूमता पंखा, कुर्सी, बेड, सोफा सब एक ही बात कहते ” जा रही हो मीठी?”
और मीठी उन को छू कर बस इतना ही कहती “हां, इन रस्मो-रिवाजों की भेंट हर लड़की चढ़ती है। मैं भी चढ़ रही हूं। वरना कौन अपना आशियाना छोड़ना चाहता है।
फेरों वाले दिन मीठी पर संवेग इतने हावी थे कि वो सुन्न सी पड़ गई। एक मशीन की तरह।
फेरे पूरे हुए।
दूल्हा दुल्हन का हाथ थामे बैठा था। कि अचानक मीठी लुढ़क गई। अचानक हाहाकार मच गया। नब्ज देखी गई। सब कुछ बन्द। मीठी दुनिया छोड़ गई।
धड़कन ठहर गई उसकी। पिया से ज्यादा घर में मोह था।ले डूबा। दिल इतना बड़ा नहीं था उसका कि डोली में विदा होने की जुर्रत कर पाता। इस लिए उसकी विदाई बाबुल के घर से अर्थी में ही हुई।

ज्योति अग्रवाल

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