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प्रेरक प्रसंग

जिय हिंसा जग में बुरी

  प्रसिद्ध जैन मुनि नेमिकुमार जब युवा थे, तो उनका विवाह हो रहा था ।  जब बारात का जुलूस ठाटबाट से निकल रहा था, तो दुल्हे महाशय अपनी जीवन-संगिनी राजुल की कल्पना के सुख-स्वप्नों में तन्मय थे । तभी पशुओं की करुण चीत्कार ने उनके स्वप्न को भंग कर दिया ।  उन्होंने सारथी से पूछा,  "खुशी के अवसर पर यह आर्तनाद कैसा ?"  सारथी ने बताया,  "कुमार !  यह उन निरीह पशुओं की चीत्कार है, जिनका आपके विवाह में आये हुए म्लेच्छ राजाओं के भोज के लिए बध किया जाएगा ।"
  कुमार ने सुना तो उनके मुख से आह निकल गयी ।  उन्होंने सारथी को रथ रोकने का आदेश दिया ।  दूसरे ही क्षण बारातियों ने देखा कि नेमिकुमार स्वयं ही पशुओं के बन्धन खोल रहे हैं ।  उन्होंने अपने हाथ का कंगन भी खोल डाला और वहाँ से निकल पड़े ।  अब वे बाहर-भीतर की सारी गाँठें खोलकर परम-निर्ग्रन्थ हो गये  --  भोग से योग की ओर उन्मुख हो गये ।  उनकी देखा-देखी राजुल ने भी दुल्हन का श्रृंगार उतार दिया और श्वेत वस्त्र पहने, जीवन के चरम फल की प्राप्ति के लिए गिरनार पर्वत की ओर बढ़ चली ।

अनूप सिन्हा

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