Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

#कृपयापुरापढ़ें

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सम्वत्- २०७५
#सुमंगलम्
#सनातनी_बंधु

#जयश्रीजगन्नाथ
#जयश्रीबलभद्रजी
#जयश्रीबहन_सुभद्राजी

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जगन्नाथ स्वामी के बारे में रोचक जानकारी जरूर पढ़ें…

माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण में रामेश्‍वरम में विश्राम करते हैं। द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।

जगन्नाथ रथयात्रा : श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र

हिन्दुओं की प्राचीन और पवित्र 7 नगरियों में पुरी उड़ीसा राज्य के समुद्री तट पर बसा है। जगन्नाथ मंदिर विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। भारत के पूर्व में बंगाल की खाड़ी के पूर्वी छोर पर बसी पवित्र नगरी पुरी उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से थोड़ी दूरी पर है। आज का उड़ीसा प्राचीनकाल में उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। यहां देश की समृद्ध बंदरगाहें थीं, जहां जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, थाईलैंड और अन्य कई देशों का इन्हीं बंदरगाह के रास्ते व्यापार होता था।

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पुराणों में इसे धरती का वैकुंठ कहा गया है। यह भगवान विष्णु के चार धामों में से एक है। इसे श्रीक्षेत्र, श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि और श्री जगन्नाथ पुरी भी कहते हैं। यहां लक्ष्मीपति विष्णु ने तरह-तरह की लीलाएं की थीं। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार यहां भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए और सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गए। सबर जनजाति के देवता होने के कारण यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है। पहले कबीले के लोग अपने देवताओं की मूर्तियों को काष्ठ से बनाते थे। जगन्नाथ मंदिर में सबर जनजाति के पुजारियों के अलावा ब्राह्मण पुजारी भी हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा से आषाढ़ पूर्णिमा तक सबर जाति के दैतापति जगन्नाथजी की सारी रीतियां करते हैं।

पुराण के अनुसार नीलगिरि में पुरुषोत्तम हरि की पूजा की जाती है। पुरुषोत्तम हरि को यहां भगवान राम का रूप माना गया है। सबसे प्राचीन मत्स्य पुराण में लिखा है कि पुरुषोत्तम क्षेत्र की देवी विमला है और यहां उनकी पूजा होती है। रामायण के उत्तराखंड के अनुसार भगवान राम ने रावण के भाई विभीषण को अपने इक्ष्वाकु वंश के कुल देवता भगवान जगन्नाथ की आराधना करने को कहा। आज भी पुरी के श्री मंदिर में विभीषण वंदापना की परंपरा कायम है।

स्कंद पुराण में पुरी धाम का भौगोलिक वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार पुरी एक दक्षिणवर्ती शंख की तरह है और यह 5 कोस यानी 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। माना जाता है कि इसका लगभग 2 कोस क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में डूब चुका है। इसका उदर है समुद्र की सुनहरी रेत जिसे महोदधी का पवित्र जल धोता रहता है। सिर वाला क्षेत्र पश्चिम दिशा में है जिसकी रक्षा महादेव करते हैं। शंख के दूसरे घेरे में शिव का दूसरा रूप ब्रह्म कपाल मोचन विराजमान है। माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा का एक सिर महादेव की हथेली से चिपक गया था और वह यहीं आकर गिरा था, तभी से यहां पर महादेव की ब्रह्म रूप में पूजा करते हैं। शंख के तीसरे वृत्त में मां विमला और नाभि स्थल में भगवान जगन्नाथ रथ सिंहासन पर विराजमान है।

अगले पन्ने पर मंदिर का इतिहास फिर पढ़ें चमत्कार…

मंदिर का इतिहास :इस मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। कहा जाता है कि सबसे पहले सबर आदिवासी विश्‍ववसु ने नीलमाधव के रूप में इनकी पूजा की थी। आज भी पुरी के मंदिरों में कई सेवक हैं जिन्हें दैतापति के नाम से जाना जाता है।

राजा इंद्रदयुम्न ने बनवाया था यहां मंदिर :राजा इंद्रदयुम्न मालवा का राजा था जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति था। राजा इंद्रदयुम्न को सपने में हुए थे जगन्नाथ के दर्शन। कई ग्रंथों में राजा इंद्रदयुम्न और उनके यज्ञ के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने यहां कई विशाल यज्ञ किए और एक सरोवर बनवाया। एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। ‍तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो। राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा। उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति। विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्‍ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है। चतुर विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया। आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंचने में सफल हो गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी। विश्‍ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गए। भगवान गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राज इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे। राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा। भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गए, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आए।

अब बारी थी लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई। लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।

जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी ‍मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

वर्तमान में जो मंदिर है वह 7वीं सदी में बनवाया था। हालांकि इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व 2 में भी हुआ था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिसा शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। मुख्‍य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं।

अगले पन्ने पर पहला चमत्कार…

हवा के विपरीत लहराता ध्वज :श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा किस कारण होता है यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं लेकिन यह निश्‍चित ही आश्चर्यजनक बात है।

यह भी आश्‍चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है।

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गुंबद की छाया नहीं बनती :यह दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है।

हमारे पूर्वज कितने बड़े इंजीनियर रहे होंगे यह इस एक मंदिर के उदाहरण से समझा जा सकता है। पुरी के मंदिर का यह भव्य रूप 7वीं सदी में निर्मित किया गया।

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चमत्कारिक सुदर्शन चक्र :पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है।

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हवा की दिशा :सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है।

अधिकतर समुद्री तटों पर आमतौर पर हवा समुद्र से जमीन की ओर आती है, लेकिन यहां हवा जमीन से समुद्र की ओर जाती है।

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गुंबद के ऊपर नहीं उड़ते पक्षी :मंदिर के ऊपर गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता। मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते नजर नहीं आते, जबकि देखा गया है कि भारत के अधिकतर मंदिरों के गुंबदों पर पक्षी बैठ जाते हैं या आसपास उड़ते हुए नजर आते हैं।

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दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर :500 रसोइए 300 सहयोगियों के साथ बनाते हैं भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद। लगभग 20 लाख भक्त कर सकते हैं यहां भोजन। कहा जाता है कि मंदिर में प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों न बनाया गया हो लेकिन इससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है। मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती।

मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है अर्थात सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है। है न चमत्कार!

अगले पन्ने पर सातवां चमत्कार…

समुद्र की ध्वनि :मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।

इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।

अगले पन्ने पर आठवां चमत्कार…

रूप बदलती मूर्ति :यहां श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं।

यहां प्रत्येक 12 साल में एक बार होता है प्रतिमा का नव कलेवर। मूर्तियां नई जरूर बनाई जाती हैं लेकिन आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि उन मूर्तियों की पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी गई हैं।

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विश्‍व की सबसे बड़ी रथयात्रा :आषाढ़ माह में भगवान रथ पर सवार होकर अपनी मौसी रानी गुंडिचा के घर जाते हैं। यह रथयात्रा 5 किलो‍मीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है। रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ के परम भक्त राजा इंद्रदयुम्न की पत्नी थी इसीलिए रानी को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है।

अपनी मौसी के घर भगवान 8 दिन रहते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी को वापसी की यात्रा होती है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष है। देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन है और भाई बलभद्र का रक्ष तल ध्वज है। पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू बुहारते हैं जिसे छेरा पैररन कहते हैं।

अगले पन्ने पर दसवां चमत्कार…

हनुमानजी करते हैं जगन्नाथ की समुद्र से रक्षा :माना जाता है कि 3 बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे।

वे प्रभु के दर्शन के लिए नगर में प्रवेश कर जाते थे, ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था। केसरीनंदन हनुमानजी की इस आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमानजी को यहां स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया। यहां जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जगड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।

अंत में जानिए मंदिर के बारे में कुछ अज्ञात बातें…

  • महान सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर, अमृतसर को दिए गए स्वर्ण से कहीं अधिक था।
  • पांच पांडव भी अज्ञातवास के दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने आए थे। श्री मंदिर के अंदर पांडवों का स्थान अब भी मौजूद है। भगवान जगन्नाथ जब चंदन यात्रा करते हैं तो पांच पांडव उनके साथ नरेन्द्र सरोवर जाते हैं।

  • कहते हैं कि ईसा मसीह सिल्क रूट से होते हुए जब कश्मीर आए थे तब पुन: बेथलेहम जाते वक्त उन्होंने भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए थे।

  • 9वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने यहां की यात्रा की थी और यहां पर उन्होंने चार मठों में से एक गोवर्धन मठ की स्थापना की थी।

  • इस मंदिर में गैर-भारतीय धर्म के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित है। माना जाता है कि ये प्रतिबंध कई विदेशियों द्वारा मंदिर और निकटवर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ और हमलों के कारण लगाए गए हैं। पूर्व में मंदिर को क्षति पहुंचाने के प्रयास किए जाते रहे हैं।

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                     प्रेम से बोलो

जय हरि बोल हरि बोल मुकुंद माधव हरि हरि बोल🙏

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|| जय श्री जगन्नाथ ||ॐ|| जय श्री माधव ||
जय सनातन धर्म,,,जय हिन्द,,,जय भवानी

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             #भारत_माता_की_जय  

#जय_सनातन #indianfestivals

                 #जय_श्री_परशुराम

#जयसनातनधर्म ,,भगवान सबको सुमति और आशीर्वाद दें,॥ 🌾🎭

शुभ दिवश/शुभ दोपहरी/शुभ संध्या/शुभ रात्री/सुप्रभात की मंगलकामनाओं के साथ,..रामराम सा,.. भाई/बहना जी,..tc.. 🙏🔔🔱🔔🙏

सुरेष रामकृष्ण कात्यायन

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कृपया मात्र 15 सेकण्ड का समय निकालकर जरूर पढें

एक अस्पताल के कमरे में दो बुजुर्ग भरती थे|

एक उठकर बैठ सकता था परंतु दूसरा उठ नहीं सकता था

जो उठ सकता था, उसके पास एक खिडकी थी वह बाहर खुलती थी

वह बुजुर्ग उठकर बैठता और दूसरे बुजुर्ग जो उठ नहीं सकता उसे बाहर के दृश्य का वर्णन करता

सडक पर दौडती हुई गाडियां काम के लिये भागते लोग

वह पास के पार्क के बारे में बताता कैसे बच्चे खेल रहे हैं कैसे युवा जोडे हाथ में हाथ डालकर बैठे हैं कैसे नौजवान कसरत कर रहे हैं आदि आदि …..

दूसरा बुजुर्ग आँखे बन्द करके अपने बिस्तर पर पडा पडा उन दृश्यों का आनन्द लेता रहता|

वह अस्पताल के सभी डॉ., नर्सो से भी बहुत अच्छी बातें करता

ऐसे ही कई माह गुजर गये

एक दिन सुबह के पाली वाली नर्स आयी तो उसने देखा कि वह बुजुर्ग तो उठा ही नहीं है ऩर्स ने उसे जगाने की कोशिश की तो पता चला वह तो नींद में ही चल बसा था

आवश्यक कार्यवाही के बाद दूसरे बुजुर्ग का पडोस खाली हो चुका था वह बहुत दु:खी हुआ

खैर, उसने इच्छा जाहिर की कि उसे पडोस के बिस्तर पर शिफ्ट कर दिया जाय

अब बुजुर्ग खिडकी के पास था उसने सोचा चलो कोशिश करके आज बाहर का दृश्य देखा जाय

काफी प्रयास कर वह कोहनी का सहारा लेकर उठा और बाहर देखा तो अरे यहां तो बाहर दीवार थी ना कोई सडक ना ही पार्क ना ही खुली हवा

उसने नर्स को बुलाकर पूछा तो नर्स ने बताया कि यह खिडकी इसी दीवार की तरफ खुलती हैं

उस बुजुर्ग ने कहा लेकिन…….. वह तो रोज मुझे नये दृश्य का वर्णन करता था

नर्स ने मुस्कराकर कहा ये उनका जीवन का नजरीया था वे तो जन्म से अंधे थे|

इसी सोच के कारण वे पिछले 2-3 सालों से कैंसर जैसी बिमारी से लड रहे थे

सारांक्ष:

जीवन नजरीये का नाम है अनगिनत खुशियां दूसरों के साथ बांटने में ही हमारी खुशियां छिपी हैं

खुशियां ज्यादा से ज्यादा शेयर करें लौटकर खुशियां ही मिलेगीं

मूल कहानी अग्रेंजी में है लेखक का नाम नहीं मालूम मैंने कहानी के भाव को हिन्दी में रूपान्तरित किया है|

आपके दिल को भा जाय तो दूसरों को भी शेयर करें|

संजय गुप्ता

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मोर पंख की कथा

एक समय गोकुल में एक मोर रहता था
वह रोज़ जब कृष्ण भगवान आतेऔर जाते तो उनके द्वार पर बैठा एक ही भजन गाता
“मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे
गोपाल सांवरिया मेरे
माँ बाप सांवरिया मेरे”
वो इस तरहा रोज़ यही गुनगुनाता रहता
एक दिन हो गया 2 दिन हो गये
इसी तरहा 1 साल व्यतीत हो गया
परन्तु कृष्ण ने एक ना सुनी
तब वहा से एक मैना उडती जा रही थी
उसने मोर को रोता हुआ देखा और अचम्भा किया
उसे मोर के रोने पर अचम्भा नही हुआ ,उसे ये देख के अचम्भा हुआ की क्रष्ण के दर पर कोई रो रहा है
वो मोर से बोली
मैना: हे मोर तू क्यों रोता हैं
तो मोर ने बताया की
मोर :पिछले एक साल से में इस छलिये को रिझा रहा हु परन्तु इसने आज तक मुझे पानी भी नही पिलाया
ये सुन मैना बोली
मैना: में बरसना से आई हु
तू भी वहा चल
और वो दोनों उड़ चले और उड़ते उड़ते बरसाने पहुच गये
जब मैना वहा पहुची तो उसने गाना शुरू किया
श्री राधे राधे राधे बरसाने वाली राधे
परन्तु मोर तो बरसाने में आकर भी यही दोहरा रहा था
मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे
गोपाल सांवरिया मेरे
माँ बाप सांवरिया मेरे”
जब राधा ने ये सुना तो वो दोड़ी चली आई और मोर को गले लगा लिया
राधा: तू कहा से आया हैं
तो मोर ने बोला
मोर: जय हो राधा रानी आज तक सुना था की तू करुणामयी हो और आज साबित हो गया
राधा: वो कैसे
मोर: में पिछले 1 साल से श्याम नाम की बिन बजा रहा हु और उसने पानी भी नही पिलाया
राधा: ठीक हैं अब तुम गोकुल जाओ और यही रटो
जय राधे राधे राधे
बरसाने वाली राधे
मोर फिर गोकुल आता हैं और
गाता हैं जय राधे राधे….
जब कृष्ण ने ये सुना तो भागते हुए आये और बोले
कृष्ण : हे मोर तू कहा से आया हैं
मोर: वाह छलिये जब एक साल से तेरे नाम की बिन बजा रहा था तो पानी भी नही पूछा और जब आज party बदली तो भागता हुआ आ गया
कृष्ण: अरे बातो में मत उलझा बात बता
मोर: में पिछले एक साल से तेरे द्वार पर यही गा रहा हु
मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे
गोपाल सांवरिया मेरे
माँ बाप सांवरिया मेरे”
कृष्ण : तूने राधा का नाम लिया ये तेरा वरदान हैं
और मेने पानी नही पूछा ये मेरे लिए श्राप हैं
इसलिए जब तक ये स्रष्टि रहेगी तेरा पंख सदेव मेरे शीश पर विराजमान होगा
और जो राधा का नाम लेगा वो भी मेरे शीश पर रहेगा
जय हो मोर मुकुट बंशी वाले की
श्री राधे राधे
Jai shri krishna

संजय गुप्ता

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पुण्य का तराजू,एक शिक्षाप्रद कथा,,,,,

कुशीनगर का राजा लोगों के पूण्य खरीदने के लिए प्रसिद्ध था । धर्मराज ने उसकी धर्मपरायणता और सत्य निष्ठा से प्रभावित होकर उसे एक पूण्य का तराजू दिया था, जिसके एक पलड़े को छूकर जो कोई भी अपने पूण्य कर्मों का स्मरण करता, दुसरे पलड़े में दैवीशक्ति से उस पूण्य कर्म के बराबर स्वर्ण मुद्राएँ प्रकट हो जाती थी।

एक दिन पड़ोसी राज्य विजयनगर पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया । दिन भर विजयनगर की सेना लड़ती रही, लेकिन पर्याप्त तैयारी नहीं होने से शत्रु राज्य की सीमा में घुस आये।

शत्रुओं ने राज्य में मारकाट मचाना शुरू कर दिया । स्थिति यह बनी कि राजा को रातोंरात रानी को लेकर जंगल में भागना पड़ा । रातभर भागते – भागते वह कुशीनगर जा पहुँचे। सुबह होते ही रानी को भूख लगने लगी, लेकिन जल्दबाजी में भागने के कारण वह कुछ भी खाने की सामग्री साथ लेकर ना आ सके । अतः उन्होंने कोई काम ढूंढ़कर उससे खाने का इंतजाम करने की सोची।

राजा जंगल गया और लकड़ियाँ काटकर शहर बेंच आया । उससे वह कुछ चावल खरीद लाया। इधर रानी भी दिन भर लोगों के घर आटा पीसकर जो थोड़ा आटा जुटा पाई थी, उसे लेकर महाराज के पास पहुँची । बड़ी मेहनत – मशक्कत के बाद दोनों भोजन बनाकर खाने बैठे ही थे कि अचानक एक भिखारी आ भटका।

भिखारी बड़ी ही दयनीय दशा में मालूम होता था । वह कह रहा था – “माई ! दो दिन से भूखा हूँ, कुछ खाने को दे दो ।” भिखारी की दशा देखकर राजा – रानी को दया आ गई । उन्होंने अपने हिस्से की रोटियाँ भिखारी को दे दी और भूखे पेट ही काम पर निकल गये ।

जाते जाते रास्ते में उन्हें दो व्यक्ति आते दिखाई दिए, जो अभी – अभी कुशीनगर के राजा के पास से आ रहे थे । इस राजा ने पूछा – “क्यों भाई ! यहाँ कहीं कोई काम मिलेगा ?”

दोनों राहगीर आपस में मुस्कुराये और बोले – “ देखो मुसाफिर ! हम खुद भी अपना पूण्य बेचकर आ रहे है । अगर तुम्हारे पास भी कोई पूण्य हो तो बेंच दो, उसके बदले पूण्य का तराजू तुम्हे स्वर्ण मुद्राएँ दे देगा ।”

पूण्य बेंचने की बात राजा को अजीब लगी लेकिन रानी कहने लगी –“ महाराज ! आपने कितना सारा पूण्य किया है । राज्य में नदी – नहरे बनवाई । सैकड़ो ब्राह्मणों को दान दिया । अगर आप अपना सारा पूण्य बेंच दो तो हम एक और नया राज्य बना सकते है ।” रानी की बात राजा को जंच गई । दोनों राजा – रानी कुशीनगर के राजा के पास पहुंचे और अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई।

उनके साथ हुए धोखे और अन्याय के बारे में सुनकर कुशीनगर का राजा बड़ा दुखी हुआ । कुशीनगर के राजा ने उनकी मदद करने का आश्वासन दिया किन्तु विजयनगर राजा बड़ा ही स्वाभिमानी था । उसने किसी भी प्रकार की कोई मदद लेने से स्पष्ट मना कर दिया । तो कुशीनगर के राजा ने कहा “ ठीक है यदि आप कोई सहायता नहीं लेना चाहते है तो ना सही किन्तु आप अपने पूण्य बेंचकर उसका मूल्य प्राप्त कर सकते है।

कुशीनगर के राजा ने पूण्य का तराजू राजा के सामने रखते हुए कहा “महाराज ! इस तराजू के एक पलड़े को छूकर आप अपने उन पुण्यों का स्मरण करे, जिन्हें आप बेंचना चाहते है । आपके उस पूण्य के अनुरूप राशी इस दुसरे पलड़े में आ जाएगी ।”

राजा ने तराजू के पलड़े पर हाथ रखा और राज्य में नदी नहरों और गुरुकुलों के बनवाने के पुण्यों का स्मरण किया । लेकिन पलड़ा बिलकुल भी भारी नहीं हुआ ना ही दुसरे पलड़े में कोई राशी आई । यह देखकर राजा रानी दोनों उस पूण्य के तराजू को झूठा बताने लगे ।

तब कुशीनगर का राजा बोला “ महाराज ! पूण्य के तराजू ने आजतक किसी के साथ कोई अन्याय नहीं किया । राज्य में नदी नहरे बनवाना एक राजा का कर्तव्य है, इसलिए उसे आपके पूण्य में नहीं गिना जा सकता । आप अपने किसी दुसरे पूण्य को रखकर देखिये ।”

राजा ने इस बार प्रतिदिन हजारो ब्राह्मणों के भोजन और दान दक्षिणा के पूण्य का स्मरण किया लेकिन इस बार भी पूण्य का तराजू ज्यों का त्यों बना हुआ था । यह देखकर रानी बोल पड़ी “ ये तो सरासर अन्याय है ।”

कुशीनगर राजा दोनों को धीरज बंधाते हुए बोला – “ पूण्य के तराजू ने आज तक किसी के साथ अन्याय नहीं किया । प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को भोजन राजा अपने अहम् को पुष्ट करने के लिए कराते थे । अहंकार पूर्वक किया हुआ कोई भी कर्म पूण्य की गिनती में नहीं आता । आप अपना कोई ऐसा पूण्य रखिये जो आपने अपनी मेहनत से किया हो ।”

तभी राजा को याद आया, अभी कल ही स्वयं भूखा रहकर एक भिखारी को भोजन कराया था । उसने उस पूण्य को तराजू में रख दिया । इस बार तराजू अचानक से भारी हो गया । यह देखकर राजा और रानी दोनों खुश हो गये लेकिन यह क्या ? तराजू के दुसरे पलड़े में कोई राशी नहीं आई थी ! तभी विजयनगर का मंत्री राजा को ढूंढता हुआ वहाँ आ पहुँचा।

उसने बताया कि “उनकी सेना ने शत्रुओं को मारकर भगा दिया और राज्य अब पूर्णत सुरक्षित है और सभी आपकी प्रतीक्षा कर रहे है ।” यही राजा के उस पूण्य का फल था जो पूण्य के तराजू ने उसे भिखारी को भोजन कराने के बदले दिया था।

वास्तव में निष्काम भाव से स्वयं कष्ट सहकर दुसरे के भले के लिए किया गया कर्म ही पूण्य होता है। कर्तव्य कर्म पूण्य की श्रेणी में नहीं आता लेकिन कर्तव्य कर्म का पालन नहीं करना पाप है।

अहंकार पूर्वक किया गया दान या पूण्य कर्म भी कर्ता को इच्छित फल नहीं देता। अतः विद्वान मनुष्य को चाहिए कि विवेक पूर्वक पूण्य कर्मों का संचय करें ।

ॐ नमो नारायणाय !
शुभ दिन !

संजय गुप्ता

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रावण-कुम्भकर्ण-विभीषण पूर्वजन्म कथा !!!!!

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस कथा का वर्णन किया है-प्रतापभानु, अरिमर्दन और धर्मरुचि की कथा,,,

सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥

मित्रो! वह पवित्र और प्राचीन कथा सुनो, जो शिवजी ने पार्वती से कही थी। संसार में प्रसिद्ध एक कैकय देश है। वहाँ सत्यकेतु नाम का राजा रहता (राज्य करता) था॥ इस राजा के दो पुत्र थे। प्रतापभानु और अरिमर्दन। राजा ने जेठे पुत्र प्रतापभानु को राज्य दे दिया और आप भगवान के भजन के लिए वन को चल दिए।

जब प्रतापभानु राजा हुआ, देश में उसकी दुहाई फिर गई। वह वेद में बताई हुई विधि के अनुसार उत्तम रीति से प्रजा का पालन करने लगा। उसके राज्य में पाप का कहीं लेश भी नहीं रह गया। अपनी भुजाओं के बल से उसने सातों द्वीपों (भूमिखण्डों) को वश में कर लिया और राजाओं से दंड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। सम्पूर्ण पृथ्वी मंडल का उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र (चक्रवर्ती) राजा था।

राजा प्रतापभानु का बल पाकर भूमि सुंदर कामधेनु (मनचाही वस्तु देने वाली) हो गई। (उनके राज्य में) प्रजा सब (प्रकार के) दुःखों से रहित और सुखी थी और सभी स्त्री-पुरुष सुंदर और धर्मात्मा थे।

इनके मंत्री थे धर्मरुचि। यह राजा गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण- इन सबकी सदा सेवा करता रहता था और राजा को नीति की बात बताया करता था जो वैद पुराणों में लिखी हुई हैं। जीवन में सब कुछ सम्पन्नता थी।

एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर, शिकार का सब सामान सजाकर विंध्याचल के घने जंगल में गया और वहाँ उसने बहुत से उत्तम-उत्तम हिरन मारे। राजा ने वन में फिरते हुए एक सूअर को देखा। नील पर्वत के शिखर के समान विशाल (शरीर वाले) उस सूअर को देखकर राजा घोड़े को चाबुक लगाकर तेजी से चला और उसने सूअर को ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता।

राजा ने बाण को धनुष पर चढ़ाया। सूअर बाण को देखते ही धरती में दुबक गया। राजा भी उसके पीछे-पीछे चला जा रहा हैं। सूअर भागकर पहाड़ की एक गहरी गुफा में जा घुसा। उसमें जाना कठिन देखकर राजा को बहुत पछताकर लौटना पड़ा। लेकिन बहुत देर हो गई थी राजा रास्ता भटक गया।

वन में फिरते-फिरते उसने एक आश्रम देखा, वहाँ कपट से मुनि का वेष बनाए एक राजा रहता था, जिसका देश राजा प्रतापभानु ने छीन लिया था और जो सेना को छोड़कर युद्ध से भाग गया था। दरिद्र की भाँति मन ही में क्रोध को मारकर वह राजा तपस्वी के वेष में वन में रहता था। जब राजा प्रतापभानु इसके पास गया तो इसने तुरंत पहचान लिया कि यह प्रतापभानु है। प्रतापभानु प्यास से बहुत व्याकुल था और इस कपटी मुनि को पहचान नही पाया।

जब कपटी मुनि ने राजा से पूछा की तुम कौन हो? तब राजा ने झूठ बोल दिया की राजा ने कहा-हे मुनीश्वर! सुनिए, प्रतापभानु नाम का एक राजा है, मैं उसका मंत्री हूँ। शिकार के लिए फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्य से यहाँ आकर मैंने आपके चरणों के दर्शन पाए हैं।

सुंदर वेष देखकर राजा ने उसे महामुनि समझा और घोड़े से उतरकर उसे प्रणाम किया, फिर घोड़े सहित एक सरोवर में स्नान और जलपान किया।

उस कपटी मुनि ने कहा-सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सबेरा होते ही चले जाना।राजा ने उस कपटी मुनि की बात मान ली।

तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥

–व्यक्ति के जीवन में जो घटना जहाँ घटनी होती हैं उसको कोई रोक नही सकता हैं।

अब रात्रि में राजा उस कपटी मुनि से पूछते हैं-हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम (धाम) विस्तार से बतलाइए की आप कौन हैं?

राजा ने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजा को पहचान गया था। राजा तो शुद्ध हृदय था और वह कपट करने में चतुर था। एक तो वैरी, फिर जाति का क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-बल से अपना काम बनाना चाहता था।

राजा को अपने वश में करके, अधिक स्नेह दिखाता हुआ वह (कपट-तपस्वी) ने झूठ बोलना शुरू कर दिया हे राजन्‌! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे यहाँ रहते बहुत समय बीत गया। श्री हरि को छोड़कर किसी से कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता। प्रभु तो बिना जनाए ही सब जानते हैं। फिर कहो संसार को रिझाने से क्या सिद्धि मिलेगी।

(कपटी मुनि ने कहा) जब सबसे पहले सृष्टि उत्पन्न हुई थी, तभी मेरी उत्पत्ति हुई थी। तबसे मैंने फिर दूसरी देह नहीं धारण की, इसी से मेरा नाम एकतनु है। हे पुत्र! मन में आश्चर्य मत करो, तप से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तप के बल से ब्रह्मा जगत को रचते हैं।

राजा सब सुनकर उस तपस्वी के वश में हो गया और तब वह उसे अपना नाम बताने लगा। तपस्वी ने कहा- राजन ! मैं तुमको जानता हूँ। तुमने कपट किया, वह मुझे अच्छा लगा। कपटी तपस्वी बोला- तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे।

राजा को लगा की ये सच में कोई महान तपस्वी हैं। और इनके चरण राजा ने पकड़ लिए। अब राजा इनसे एक प्रार्थना करता हैं की मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःख से रहित हो जाए, मुझे युद्ध में कोई जीत न सके और पृथ्वी पर मेरा सौ कल्पतक एकछत्र अकण्टक राज्य हो॥

कपटी मुनि ने ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर वह कुटिल कपटी मुनि फिर बोला- (किन्तु) तुम मेरे मिलने तथा अपने राह भूल जाने की बात किसी से (कहना नहीं, यदि) कह दोगे, तो हमारा दोष नहीं। क्योंकि अगर ब्राह्मण लोग को इस बात का पता चलेगा वो तुम्हे शाप दे देंगे।

प्रतापभानु कहते हैं यदि मैं आपके कथन के अनुसार नहीं चलूँगा, तो (भले ही) मेरा नाश हो जाए। मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मेरा मन तो हे प्रभो! (केवल) एक ही डर से डर रहा है कि ब्राह्मणों का शाप बड़ा भयानक होता है। वे ब्राह्मण किस प्रकार से वश में हो सकते हैं, कृपा करके वह भी बताइए।

तपस्वी ने कहा-) हे राजन्‌ !सुनो,एक उपाय बहुत सहज है, परन्तु उसमें भी एक कठिनता है। दिक्कत इस बात की हैं जो मैं कहने जा रहा हूँ वो किसी गाँव या नगर से नही हो सकता हैं। हे राजन्‌! वह युक्ति तो मेरे हाथ है, पर मेरा जाना तुम्हारे नगर में हो नहीं सकता। जब से पैदा हुआ हूँ, तब से आज तक मैं किसी के घर अथवा गाँव नहीं गया।

अब राजा ने मुनि के चरण पकड़ लिए। (अतः) हे प्रभो! मेरे लिए इतना कष्ट (अवश्य) सहिए

कपटी मुनि कहता हैं मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा, (क्योंकि) तुम, मन, वाणी और शरीर (तीनों) से मेरे भक्त हो। हे राजा! मैं यदि रसोई बनाऊँ और तुम उसे परोसो और मुझे कोई जानने न पावे, तो उस अन्न को जो-जो खाएगा, सो-सो तुम्हारा आज्ञाकारी बन जाएगा। तुम नित्य नए एक लाख ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रित करना।

मैं तुम्हारे सकंल्प (के काल अर्थात एक वर्ष) तक प्रतिदिन भोजन बना दिया करूँगा। हे राजन! मैं तप के बल से तुम्हारे सब काम सिद्ध करूँगा। रात बहुत बीत गई, अब सो जाओ। आज से तीसरे दिन मुझसे तुम्हारी भेंट होगी। तप के बल से मैं घोड़े सहित तुमको सोते ही में घर पहुँचा दूँगा। मैं वही (पुरोहित का) वेश धरकर आऊँगा। जब एकांत में तुमको बुलाकर सब कथा सुनाऊँगा, तब तुम मुझे पहचान लेना।

राजा ने कपटी मुनि की आज्ञा मानकर शयन किया क्योंकि बहुत थका हुआ था। (उसी समय) वहाँ कालकेतु राक्षस आया, जिसने सूअर बनकर राजा को भटकाया था। वह तपस्वी राजा का बड़ा मित्र था और खूब छल-प्रपंच जानता था।

तपस्वी राजा अपने मित्र को देख प्रसन्न हो उठकर मिला और सुखी हुआ। उसने मित्र को सब कथा कह सुनाई, तब राक्षस आनंदित होकर बोला। सुनो, जब तुमने मेरे कहने के अनुसार (इतना) काम कर लिया, तो अब मैंने शत्रु को काबू में कर ही लिया (समझो)। तुम अब चिन्ता त्याग सो रहो। विधाता ने बिना ही दवा के रोग दूर कर दिया। कुल सहित शत्रु को जड़-मूल से उखाड़-बहाकर, (आज से) चौथे दिन मैं तुमसे आ मिलूँगा। उसने प्रतापभानु राजा को घोड़े सहित क्षणभर में घर पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास सुलाकर घोड़े को अच्छी तरह से घुड़साल में बाँध दिया। फिर वह राजा के पुरोहित को उठा ले गयाऔर उसे पहाड़ की खोह में रख दिया। और खुद पुरोहित का रूप बनाकर उसकी सुंदर सेज पर जा लेटा।

राजा सबेरा होने से पहले ही जागा और अपना घर देखकर उसने बड़ा ही आश्चर्य माना। अब राजा के 3 दिन 3 युग के सामान बीते। उसने तुरंत एक लाख उत्तम ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रण दे दिया।

पुरोहित ने मायामयी रसोई तैयार की और इतने व्यंजन बनाए, जिन्हें कोई गिन नहीं सकता। अनेक प्रकार के पशुओं का मांस पकाया और उसमें उस दुष्ट ने ब्राह्मणों का मांस मिला दिया। सब ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलाया और चरण धोकर आदर सहित बैठाया।

ज्यों ही राजा परोसने लगा, उसी काल (कालकेतुकृत) आकाशवाणी हुई- हे ब्राह्मणों! उठ-उठकर अपने घर जाओ, यह अन्न मत खाओ। इस (के खाने) में बड़ी हानि है। रसोई में ब्राह्मणों का मांस बना है। (आकाशवाणी का) विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। तब ब्राह्मण क्रोध सहित बोल उठे- उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया- अरे मूर्ख राजा! तू जाकर परिवार सहित राक्षस हो। एक वर्ष के भीतर तेरा नाश हो जाए, तेरे कुल में कोई पानी देने वाला तक न रहेगा।

शाप सुनकर राजा भय के मारे अत्यन्त व्याकुल हो गया। फिर सुंदर आकाशवाणी हुई। हे ब्राह्मणों! तुमने विचार कर शाप नहीं दिया। राजा ने कुछ भी अपराध नहीं किया। आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गए।

तब राजा वहाँ गया, जहाँ भोजन बना था। (देखा तो) वहाँ न भोजन था, न रसोइया ब्राह्मण ही था। तब राजा मन में अपार चिन्ता करता हुआ लौटा। उसने ब्राह्मणों को सब वृत्तान्त सुनाया और (बड़ा ही) भयभीत और व्याकुल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।

सभी ब्राह्मण बोले की हे राजन! माना की इसमें तुम्हारा कोई दोष नही हैं लेकिन ब्राह्मणों का शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता। ऐसा कहकर सब ब्राह्मण चले गए।

पुरोहित को उसके घर पहुँचाकर असुर (कालकेतु) ने (कपटी) तपस्वी को खबर दी। उस दुष्ट ने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे, जिससे सब (बैरी) राजा सेना सजा-सजाकर (चढ़) दौड़े। और उन्होंने डंका बजाकर नगर को घेर लिया।

नित्य प्रति अनेक प्रकार से लड़ाई होने लगी। (प्रताप भानु के) सब योद्धा (शूरवीरों की) करनी करके रण में जूझ मरे। राजा भी भाई सहित खेत रहा। सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचा। ब्राह्मणों का शाप सच हो गया।

समय पाकर वही राजा प्रतापभानु परिवार सहित रावण नामक राक्षस हुआ। इसका भाई अरिमर्दन ही कुम्भकर्ण बना हैं। इसका मंत्री धर्मरुचि वह रावण का सौतेला छोटा भाई हुआ। जिसका नाम विभीषण था।

संजय गुप्ता

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महाभारत के पांच मामाओं के ‘कारनामे’ जानकर चौंक जाएंगे !!!!!!!

महाभारत में मामाओं के बड़े जलवे रहे हैं। एक ओर मामाओं ने लुटिया डुबोई है तो दूसरी ओर पार लगाया है। महाभारत में जब मामाश्री की बात होती है तो सबसे पहले शकुनी का नाम ही सामने आता है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की शकुनी के अलावा भी ऐसे कई मामा थे जिनकी महाभारत में चर्चा होती है।

तो आओ जानते हैं उन्हीं में से पांच मामाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी।

1.कंस मामा : – महाभारत और पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा होती है। वह उस काल के सबसे शक्तिशाली जनपद मगध का सम्राट था। जरासंध का दामाद था कंस जो भगवान श्रीकृष्ण के मामा था। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को राजपद से हटाकर जेल में डाल दिया था और स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था।

शूरसेन जनपद के अंतर्गत ही मथुरा आता है। कंस के काका शूरसेन का मथुरा पर राज था। कंस ने मथुरा को भी अपने शासन के अधीन कर लिया था और वह प्रजा को अनेक प्रकार से पीड़ित करने लगा था। श्रीकृष्ण की बुआ के बेटे शिशुपाल का झुकाव भी कंस की ओर था।

कंस अपने पूर्व जन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। कंस के बारे में यह भविष्यवाणी कही गई थी कि उनकी बहन देवकी एक पुत्र ही उसे मारेगा। बस इसी भविष्यवाणी के कारण वह दहशत में रहने लाग था। कंस ने अपनी बहन देवकी और जीजा वसुदेव को जेल में डाल दिया था।

जेल में देवकी और वसुदेव के जो भी पुत्र होते कंस उनको मार देता था। आठवें पुत्र भगवान श्रीकृष्ण जब रात में हुए तो जेल के सभी सैनिक सो गए और दरवाजे किसी चमत्कार से खुल गए। वसुदेव अपने पुत्र श्रीकृष्ण को रातोरात ही अपने नंद के घर छोड़कर आ गए।

जहां माता यशोदा ने उन्हें पाल-पोसकर बढ़ा किया। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए कई राक्षसों को भेजा लेकिन उसके सभी उपाय असफल सिद्ध हुए। तब उसने एक बार मल्ल युद्ध का आयोजन रखा और उसमें सभी योद्धाओं के साथ श्रीकृष्ण और बलराम को भी आमंत्रित किया।

कंस चाहता था कि वह दोनों को यहां बुलवाकर अपने योद्धाओं द्वारा दोनों का वध करवा दे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उस आयोजन में श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम ने मिलकर योद्धाओं सहित अपने मामा कंस का वध भी कर दिया और अपने माता-मिता को जेल से मुक्त भी कराया था।

2.शकुनी मामा : – गांधारी के भाई और दुर्योधन के मामा शकुनि को कौन नहीं जानता? कौरवों को छल व कपट की राह सिखाने वाले शकुनि उन्हें पांडवों का विनाश करने में पग-पग पर मदद करते थे, लेकिन कहते हैं कि उनके मन में कौरवों के लिए केवल बदले की भावना थी। कहते हैं कि भीष्म ने शकुनी की बहन गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से जबरन करवाया था। बाद में धृतराष्ट्र ने गांधारी के पिता और दोनों पुत्र को आजीवन जेल में डाल दिया था।

कारागार में उन्हें खाने के लिए केवल एक व्यक्ति का भोजन दिया जाता था। केवल एक व्यक्ति के भोजन से भला सभी का पेट कैसे भरता? यह पूरे परिवार को भूखे मार देने की साजिश थी। राजा सुबाल ने यह निर्णय लिया कि वह यह भोजन केवल उनके सबसे छोटे पुत्र को ही दिया जाए ताकि उनके परिवार में से कोई तो जीवित बच सके।

यह भोजन शकुनी को मिलता था। एक-एक कर सभी मरने लगे। मृत्यु से पहले सुबाल ने धृतराष्ट्र से शकुनि को छोड़ने की विनती की, जो धृतराष्ट्र ने मान ली थी। शकुनी के सामने ही उसके माता, पिता और भाई भूख से मारे गए। शकुनी के दिमाग में यह बात घर कर गई थी।

जेल से बाहर आने के बाद शकुनी के पास दो विकल्प थे। अपने देश वापस लौट जाए या फिर हस्तिनापुर में ही रहकर अपना राज देखे। शकुनी ने हस्तिनापुर में ही रहना तय किया। धीरे-धीरे शकुनि ने हस्तिनापुर मैं सबका विश्वास जीत लिया और 100 कौरवों का अभिवावक बन बैठा।

अपने विश्‍वासपूर्ण कार्यों के चलते दुर्योधन ने शकुनि को अपना मंत्री नियुक्त कर लिया। फिर धीरे-धीरे शकुनि ने दुर्योधन को अपनी बुद्धि के मोहपाश में बांध लिया। शकुनि ने न केवल दुर्योधन को युधिष्ठिर के खिलाफ भड़काया बल्कि महाभारत के युद्ध की नींव भी रखी।

शकुनी की युक्ति के ही चलते जुआ खेला गया था और उसके छलपूर्ण पासे के चलते ही पांडव अपना सबकुछ हार बैठे थे। शकुनी ने ही पांडवों को मरवाने के लिए लक्ष्यागृह की योजना बनाई थी। शकुनी के एक नहीं कई कारनामे हैं।

शकुनि जितनी नफरत कौरवों से करता था उतनी ही पांडवों से, क्योंकि उसे दोनों की ओर से दुख मिला था। पांडवों को शकुनि ने अनेक कष्ट दिए। भीम ने इसे अनेक अवसरों पर परेशान किया। महाभारत युद्ध में सहदेव ने शकुनि का इसके पुत्र सहित वध कर दिया था।

3.शल्य मामा : – रघुवंश के शल्य पांडवों के मामाश्री थे। लेकिन कौरव भी उन्हें मामा मानकर आदर और सम्मान देते थे। पांडु पत्नी माद्री के भाई अर्थात नकुल और सहदेव के सगे मामा शल्य के पास विशाल सेना थी। जब युद्ध की घोषणा हुई तो नकुल और सहदेव को तो यह सौ प्रतिशत विश्वास ही था कि मामाश्री हमारी ओर से ही लड़ाई लड़ेंगे।

एक दिन शल्य अपने भांजों से मिलने के लिए अपनी सेना सहित हस्तिनापुर के लिए निकले। रास्ते में जहां भी उन्होंने और उनकी सेना ने पड़ाव डाला वहां पर उनके रहने, पीने और खाने की उन्हें भरपूर व्यवस्‍था मिली। यह व्यवस्था देखकर वे प्रसन्न हुए। वे मन ही मन युद्धिष्‍ठिर को धन्यवाद देने लगे।

हस्तिनापुर के पास पहुंचने पर उन्होंने वृहद विश्राम स्थल देखे और सेना के लिए भोजन की उत्तम व्यवस्था देखी। यह देखकर शल्य ने पूछा, ‘युधिष्ठिर के किन कर्मचारियों ने यह उत्मम व्यवस्था की है। उन्हें सामने ले आओ में मैं उन्हें पुरस्कार देना चाहता हूं।’ यह सुनकर छुपा हुआ दुर्योधन सामने प्रकट हुआ और हाथ जोड़कर कहने लगा, मामाश्री यह सभी व्यवस्था मैंने आपके लिए ही की है, ताकि आपको किसी भी प्रकार का कष्ट न हो।’

यह सुनकर शल्य के मन में दुर्योधन के लिए प्रेम उमड़ आया और भावना में बहकर कहा, ‘मांगों आज तुम मुझसे कुछ भी मांग सकते तो। मैं तुम्हारी इस सेवा से अतिप्रसन्न हुआ हूं।’… यह सुनकर दुर्योधन के कहा, ‘आप सेना के साथ युद्ध में मेरा साथ दें और मेरी सेना का संचालन करें।

‘ यह सुनकर शल्य कुछ देर के लिए चुप रहा गए। चूंकि वे वचन से बंधे हुए थे अत: उनको दुर्योधन का यह प्रस्ताव स्वीकार करना पड़ा। लेकिन शर्त यह रखी कि युद्ध में पूरा साथ दूंगा, जो बोलोगे वह करूंगा, परन्तु मेरी जुबान पर मेरा ही अधिकार होगा।

दुर्योधन को इस शर्त में कोई खास बात नजर नहीं आई। शल्य बहुत बड़े रथी थे। रथी अर्थात रथ चलाने वाले। उन्हें कर्ण का सारथी बनाया गया था। वे अपनी जुबान से कर्ण को हतोत्साहित करते रहते थे। यही नहीं प्रतिदिन के युद्ध समाप्ति के बार वे जब शिविर में होते थे तब भी कौरवों को हतोत्साहित करने का कार्य करते रहते थे।

4.कृपाचार्य : – कृपाचार्य चिरंजीवी है। अर्थात वे अभी भी जीवित है। गौतम ऋषि के पुत्र शरद्वान और शरद्वान के पुत्र कृपाचार्य महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे और वह जिंदा बच गए 18 महायोद्धाओं में से एक थे। कृपाचार्य की माता का नाम था नामपदी था जो एक देवकन्या थी। कृपाचार्य की बहन कृपी का विवाह गुरु द्रोण के साथ हुआ था। कृपि का पुत्र का नाम था- अश्वत्थामा। अर्थात अश्वत्थामा के वे मामाश्री थे। मामा और भांजे की जोड़ी ने युद्ध में कोहराम मचा रखा था।

कृप भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत हुए। भीष्म ने इन्हीं कृप को पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिए नियुक्त किया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुए। कुरुक्षेत्र के युद्ध में ये कौरवों के साथ थे और कौरवों के नष्ट हो जाने पर ये पांडवों के पास आ गए। बाद में इन्होंने परीक्षित को अस्त्रविद्या सिखाई।

युद्ध में कर्ण के वधोपरांत उन्होंने दुर्योधन को बहुत समझाया कि उसे पांडवों से संधि कर लेनी चाहिए किंतु दुर्योधन ने अपने किए हुए अन्यायों को याद कर कहा कि न पांडव इन बातों को भूल सकते हैं और न उसे क्षमा कर सकते हैं। युद्ध में मारे जाने के सिवा अब कोई भी चारा उसके लिए शेष नहीं है। युद्ध में द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और अश्वत्थामा तीनों ही भयंकर योद्धा था। तीनों ही ही अपने युद्ध कौशल के बल पर पांडवों की सेना का संहार कर दिया था।

महाभारत के युद्ध में अर्जुन और कृपाचार्य के बीच भयानक युद्ध हुआ। जब अश्वत्‍थामा द्रौपदी के सोते हुए पांचों पुत्रों का वध कर देते हैं तब गांधारी कृपाचार्य से कहती है कि अश्वत्थामा ने जो पाप किया है उस पाप के भागीदार आप भी हैं। आप चाहते तो उसे ऐसा करने से रोक सकते थे। आपने अश्वत्‍थामा का साथ दिया। आप हमारे कुलगुरु हैं। आप धर्म और अधर्म को अच्‍छी तरह समझते हैं। आपने यह पाप क्यों होने दिया? कृपाचार्य को इस बात का पछतावा भी हुआ था।

5.श्रीकृष्ण मामा : – भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के मामा थे। वे सबकुछ जानते थे फिर भी उन्होंने अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोड़ने के लिए क्यूं भेजा? अभिमन्यु के चक्रव्यूह में जाने के बाद उन्हें चारों ओर से घेर लिया गया। घेरकर उनकी जयद्रथ सहित 7 योद्धाओं द्वारा निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई, जो कि युद्ध के नियमों के विरुद्ध था। कहते हैं कि श्रीकृष्ण यही चाहते थे। जब नियम एक बार एक पक्ष तोड़ देता है, तो दूसरे पक्ष को भी इसे तोड़ने का मौका मिलता है।

भगवान श्रीकृष्ण ही थे जिनके कारण दुर्योधन की जंघा कमजोर रह गई। कर्ण का कवच कुंडल नहीं रहा। बर्बरीक का शीश कट गया। कर्ण का एकमात्र अमोघ अस्त्री उन्हीं की चाल से घटोत्चक पर चला दिया गया। उन्हीं की चाल के चलते ही भीष्म, द्रोण और जयद्रथ का वध हुआ। महाभारत के युद्ध में जो कुछ भी हुआ वह श्रीकृष्‍ण की इच्छा से ही हुआ।

इस तरह हमने देखा कि उपरोक्त पांच मामाओं के कारनामे के कारण ही महाभारत का संपूर्ण कथाक्रम रचा गया। हां एक ओर मामा थे जिनका नाम धृष्टद्युम्न था। यह द्रोपदी के भाई और द्रोपदी के पुत्रों के मामा थे। द्रोण के हाथों द्रुपद अपने तीन पौत्रों तथा विराट सहित मारे गए।

तब भीम ने आकर धृष्टद्युम्न को युद्ध के लिए प्रोत्साहित किया तथा दोनों द्रोण की सेना में घुस गए। श्रीकृष्ण की प्रेरणा से पांडवों ने द्रोण तक यह झूठा समाचार पहुंचाया कि अश्वत्थामा मारा गया है।

फलस्वरूप द्रोण ने अस्त्र शस्त्र त्याग दिए। अवसर का लाभ उठाकर धृष्टद्युम्न ने द्रोण के बाल पकड़कर उनका सिर काट डाला था। लेकिन यह धृष्टद्युम्न अंत में अपने भांजे को नहीं बचा पाया था क्योंकि अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न का वध कर दिया था।

संजय गुप्ता

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【【【विदाई】】】

ज्यों ज्यों शादी के दिन नजदीक आ रहे थे। मीठी गुमसुम होती जा रही थी। अब सिर्फ सात दिन रह गए थे। सारे घर वाले शादी की तैयारियों में बिजी थे। घर मे खुशी और उल्लास का माहौल था।
मग़र मीठी के दिल का हाल कोई नही जानना चाहता। उस पर क्या गुजर रही है किसी को खबर नही। वो घर के जिस कमरे में जाती उसकी दीवारों को टकटकी लगाकर देखने लगती।
जी भरकर देखने की लालसा में सुन्न सी पड़ जाती।

बाहर बरामदे में बारिश को इतनी टकटकी लगाकर देखने लगती जैसे हर एक बूंद को आंखों में समा लेना चाहती हो।
बाबुल के घर के इस अद्वित्य नजारे को जीवन भर के लिए हृदय में संजो लेना चाहती हो।
सब कुछ छूट जाएगा यहीं। अपना घर, अपनी गलियाँ, उसकी जरा सी आह पर उसके लिए फिक्र करने वाला परिवार, भाई, बहिन, मम्मी-पापा सब!!
लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी है। इकलौता है। “मीठी राज करेगी” सब यही कहते हैं।
मग़र मीठी को उसके लिए यह घर छोडना होगा?
क्यूँ??
क्या इतना आसान है अपना घर छोड़ना?
मीठी का दिल विद्रोह सा करने लगता।
वह बारिश की फुंहारो में खोई थी कि छोटा भाई आकर बोला
“दीदी”
मीठी बेखर थी।
उसने बांह पकड़ कर हिलाया” दीदी”
मीठी की तन्द्रा टूटी बोली ” हाँ क्या चाहिए”
“दीदी तेरे पेन मैं ले लूँ क्या?? तू तो ससुराल चली जाएगी। पेन तो खराब हो जाएंगे”
“”जा ले ले”” पेन को हाथ तक नही लगाने देने वाली मीठी के मुंह से इतना सुनकर भाई सरपट उसके कमरे में दौड़ गया कि कहीं दीदी अपना निर्णय न बदल दे।
मीठी भी उसके पीछे गई।
भाई सैंकड़ो की संख्या में इकठ्ठे किए गए पैनो पर हाथ साफ कर रहा था।
मीठी बोल पड़ी “सुन, वो लाल वाला मुझे देदे, पापा ने जन्म दिन पर गिफ्ट दिया था”।
“ये टूटा हुआ है दीदी”
“टूटा हुआ ही दे दे” पापा की याद तो दिलाएगा”
कहते कहते मीठी का गला भर आया।
इतने में छोटी बहन भी आ गई। भाई को इतने सारे पेन पर हाथ साफ करते देख कर वह भी झपटा मारने लगी।
फिर दोनों लड़ने लगे।
मीठी ने दोनो को अलग किया फिर बहन से बोली।
“”पेन इसे ले लेने दे। तू ये सब ले ले”
“”ये रबड़, ये घड़ी, ये कड़ा, ये जीन्स भी ले ले। देख कितनी प्यारी गुड़िया है ये भी आज से तेरी हो गई” ये स्कूल कॉलेज में मीले सारे गिफ्ट -ट्रॉफियां, सारे कपड़े, सब आज से तेरे हुए।”
फिर मीठी अपने आंसुओं को दबा कर फिर बाहर खुले आसमान के नीचे बैठ गई। बारिश अब थम चुकी थी। मगर मीठी के दिल के भीतर एक बाढ़ सी आई हुई थी। जो किसी को भी नही दिख रही थी।
अगले छः दिन भी रस्मो और खयालो में गुजर गए। इन छः दिनों में मीठी ने बस इतना जाना कि हर कोई उसको विदा करने में लगा है। हर कोई उसे घर से निकाल देना चाहता है
उसके दिल का हाल कोई नही जानता।
हां अब घर की निर्जीव चीजें बोलने लगी थी। कमरे की दीवारें, ऊपर घूमता पंखा, कुर्सी, बेड, सोफा सब एक ही बात कहते ” जा रही हो मीठी?”
और मीठी उन को छू कर बस इतना ही कहती “हां, इन रस्मो-रिवाजों की भेंट हर लड़की चढ़ती है। मैं भी चढ़ रही हूं। वरना कौन अपना आशियाना छोड़ना चाहता है।
फेरों वाले दिन मीठी पर संवेग इतने हावी थे कि वो सुन्न सी पड़ गई। एक मशीन की तरह।
फेरे पूरे हुए।
दूल्हा दुल्हन का हाथ थामे बैठा था। कि अचानक मीठी लुढ़क गई। अचानक हाहाकार मच गया। नब्ज देखी गई। सब कुछ बन्द। मीठी दुनिया छोड़ गई।
धड़कन ठहर गई उसकी। पिया से ज्यादा घर में मोह था।ले डूबा। दिल इतना बड़ा नहीं था उसका कि डोली में विदा होने की जुर्रत कर पाता। इस लिए उसकी विदाई बाबुल के घर से अर्थी में ही हुई।

ज्योति अग्रवाल

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1 bar jarur pade.🙏

“एक सुनार था, उसकी दुकान से मिली हुई एक लोहार की दुकान थी।
सुनार जब काम करता तो उसकी दुकान से बहुत धीमी आवाज़ आती, किन्तु जब लोहार काम करता तो उसकी दुकान से कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ सुनाई देती।
एक दिन एक सोने का कण छिटक कर लोहार की दुकान में आ गिरा। वहाँ उसकी भेंट लोहार के एक कण के साथ हुई।
सोने के कण ने लोहे के कण से पूछा- भाई हम दोनों का दुख एक समान है, हम दोनों को ही एक समान आग में तपाया जाता है और समान रूप ये हथौड़े की चोट सहनी पड़ती है।
मैं ये सब यातना चुपचाप सहता हूँ, पर तुम बहुत चिल्लाते हो, क्यों?
लोहे के कण ने मन भारी करते हुऐ कहा-
तुम्हारा कहना सही है, किन्तु तुम पर चोट करने वाला हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है।
मुझ पर चोट करने वाला लोहे का हथौड़ा मेरा सगा भाई है।
परायों की अपेक्षा अपनों द्वारा दी गई चोट अधिक पीड़ा पहुचाँती है”
😿

  • दिल को छू जाने वाली कहानी – 🙏🏻

ज्योति अग्रवाल

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श्री जगन्नाथ रथयात्रा महात्मय
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(((((((( श्रीजगन्नाथ जी कथा ))))))))
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एक बार भगवान श्री कृष्ण सो रहे थे और निद्रावस्था में उनके मुख से राधा जी का नाम निकला. पटरानियों को लगा कि वह प्रभु की इतनी सेवा करती है परंतु प्रभु सबसे ज्यादा राधा जी का ही स्मरण रहता है।
रुक्मिणी जी एवं अन्य रानियों ने रोहिणी जी से राधा रानी व श्री कृष्ण के प्रेम व ब्रज-लीलाओं का वर्णन करने की प्रार्थना की। माता ने कथा सुनाने की हामी तो भर दी लेकिन यह भी कहा कि श्री कृष्ण व बलराम को इसकी भनक न मिले। तय हुआ कि सभी रानियों को रोहिणी जी एक गुप्त स्थान पर कथा सुनाएंगी। वहां कोई और न आए इसके लिए सुभद्रा जी को पहरा देने के लिए मना लिया गया।
सुभद्रा जी को आदेश हुआ कि स्वयं श्री कृष्ण या बलराम भी आएं तो उन्हें भी अंदर न आने देना। माता ने कथा सुनानी आरम्भ की, सुभद्रा द्वार पर तैनात थी, थोड़ी देर में श्री कृष्ण एवं बलराम वहां आ पहुंचे, सुभद्रा ने अन्दर जाने से रोक लिया।
इससे भगवान श्री कृष्ण को कुछ संदेह हुआ। वह बाहर से ही अपनी सूक्ष्म शक्ति द्वारा अन्दर की माता द्वारा वर्णित ब्रज लीलाओं को आनंद लेकर सुनने लगे। बलराम जी भी कथा का आनंद लेने लगे।कथा सुनते-सुनते श्री कृष्ण, बलराम व सुभद्रा के हृदय में ब्रज के प्रति अद्भुत प्रेम भाव उत्पन्न हुआ, उस भाव में उनके पैर-हाथ सिकुड़ने लगे जैसे बाल्य काल में थे। तीनों राधा जी की कथा में ऐसे विभोर हुए कि मूर्ति के समान जड़ प्रतीत होने लगे।
बड़े ध्यान पूर्वक देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे।सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया. उसी समय देवमुनि नारद वहां आ पहुंचे।भगवान के इस रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो गए और निहारते रहे।कुछ समय बाद जब तंद्रा भंग हुई तो नारद जी ने प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण से कहा- हे प्रभु ! मेरी इच्छा है कि मैंने आज जो रूप देखा है, वह रूप आपके भक्त जनों को पृथ्वी लोक पर चिर काल तक देखने को मिले, आप इस रूप में पृथ्वी पर वास करें। भगवान श्री कृष्ण नारद जी की बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा। कलिकाल में मैं इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र में अपना स्वरूप प्रकट करुंगा।

कलियुग आगमन के उपरांत प्रभु की प्रेरणा से मालव राज इन्द्रद्युम्न ने भगवान श्री कृष्ण, बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी की ऐसी ही प्रतिमा जगन्नाथ मंदिर में स्थापित कराई।
राजा इन्द्रद्युम्न श्रेष्ठ प्रजा पालक राजा थे। प्रजा उन्हें बहुत प्रेम करती थी। प्रजा सुखी और संतुष्ट थी। राजा के मन में इच्छा थी कि वह कुछ ऐसा करे जिससे सभी उन्हें स्मरण रखें। दैवयोग से इंद्रद्युम्न के मन में एक अज्ञात कामना प्रगट हुई कि वह ऐसा मंदिर का निर्माण कराएं जैसा दुनिया में कहीं और न हो।इंद्रद्युम्न विचारने लगे कि आखिर उनके मंदिर में किस देवता की मूर्ति स्थापित करें। राजा के मन में यही इच्छा और चिंतन चलने लगा। एक रात इसी पर गंभीर चिंतन करते सो गए। नीद में राजा ने एक सपना देखा, सपने में उन्हें एक देव वाणी सुनाई पड़ी।
इंद्रद्युम्न ने सुना- राजा तुम पहले नए मंदिर का निर्माण आरंभ करो। मूर्ति विग्रह की चिंता छोड़ दो। उचित समय आने पर तुम्हें स्वयं राह दिखाई पड़ेगी। राजा नीद से जाग उठे, सुबह होते ही उन्होंने अपने मंत्रियों को सपने की बात बताई।
राज पुरोहित के सुझाव पर शुभ मुहूर्त में पूर्वी समुद्र तट पर एक विशाल मंदिर के निर्माण का निश्चय हुआ। वैदिक-मंत्रोचार के साथ मंदिर निर्माण का श्रीगणेश हुआ।
राजा इंद्रद्युम्न के मंदिर बनवाने की सूचना शिल्पियों और कारीगरों को हुई, सभी इसमें योगदान देने पहुंचे। दिन रात मंदिर के निर्माण में जुट गए, कुछ ही वर्षों में मंदिर बनकर तैयार हुआ।
सागर तट पर एक विशाल मंदिर का निर्माण तो हो गया परंतु मंदिर के भीतर भगवान की मूर्ति की समस्या जस की तस थी।राजा फिर से चिंतित होने लगे। एक दिन मंदिर के गर्भगृह में बैठकर इसी चिंतन में बैठे राजा की आंखों से आंसू निकल आए।राजा ने भगवान से विनती की- प्रभु आपके किस स्वरूप को इस मंदिर में स्थापित करूं इसकी चिंता से व्यग्र हूं, मार्ग दिखाइए। आपने स्वप्न में जो संकेत दिया था उसे पूरा होने का समय कब आएगा ? देव विग्रह विहीन मंदिर देख सभी मुझ पर हंसेंगे।
राजा की आंखों से आंसू झर रहे थे और वह प्रभु से प्रार्थना करते जा रहे थे- प्रभु आपके आशीर्वाद से मेरा बड़ा सम्मान है, प्रजा समझेगी कि मैंने झूठ-मूठ में स्वप्न में आपके आदेश की बात कहकर इतना बड़ा श्रम कराया, हे प्रभु मार्ग दिखाइए।
राजा दुखी मन से अपने महल में चले गए। उस रात को राजा ने फिर एक सपना देखा। सपने में उसे देव वाणी सुनाई दी- राजन ! यहां निकट में ही भगवान श्री कृष्ण का विग्रह रूप है, तुम उन्हें खोजने का प्रयास करो, तुम्हें दर्शन मिलेंगे। इन्द्रद्युम्न ने स्वप्न की बात पुनः पुरोहित और मंत्रियों को बताई, सभी यह निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रभु की कृपा सहज प्राप्त नहीं होगी, उसके लिए हमें निर्मल मन से परिश्रम आरंभ करना होगा।
भगवान के विग्रह का पता लगाने की जिम्मेदारी राजा इंद्रद्युम्न ने चार विद्वान पंडितों को सौंप दिया। प्रभु इच्छा से प्रेरित होकर चारों विद्वान चार दिशाओं में निकले। उन चारों में एक विद्वान थे विद्यापति, वह चारों में सबसे कम उम्र के थे। प्रभु के विग्रह की खोज के दौरान उनके साथ बहुत से अलौकिक घटनाएं हुई, प्रभु का विग्रह किसे मिला ? यह प्रसंग आगे पढ़ें

पंडित विद्यापति पूर्व दिशा की ओर चले, कुछ आगे चलने के बाद विद्यापति उत्तर की ओर मुडे तो उन्हें एक जंगल दिखाई दिया, वन भयावह था, विद्यापति श्री कृष्ण के उपासक थे। उन्होंने श्री कृष्ण का स्मरण किया और राह दिखाने की प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन्हें राह दिखने लगी, प्रभु का नाम लेते वह वन में चले जा रहे थे, जंगल के मध्य उन्हें एक पर्वत दिखाई दिया। पर्वत के वृक्षों से संगीत की ध्वनि सा सुरम्य गीत सुनाई पड़ रहा था। विद्यापति संगीत के जान कार थे, उन्हें वहां मृदंग, बंसी और करताल की मिश्रित ध्वनि सुनाई दे रही थी, यह संगीत उन्हें दिव्य लगा।संगीत की लहरियों को खोजते विद्यापति आगे बढ़ चले। वह जल्दी ही पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए। पहाड़ के दूसरी ओर उन्हें एक सुंदर घाटी दिखी जहां भील नृत्य कर रहे थे। विद्यापति उस दृश्य को देखकर मंत्र मुग्ध थे, सफर के कारण थके थे पर संगीत से थकान मिट गयी और उन्हें नींद आने लगी। अचानक एक बाघ की गर्जना सुनकर विद्यापति घबरा उठे। बाघ उनकी और दौड़ता आ रहा था, बाघ को देखकर विद्यापति घबरा गए और बेहोश होकर वहीं गिर पडे।
बाघ विद्यापति पर आक्रमण करने ही वाला था कि तभी एक स्त्री ने बाघ को पुकारा- बाघा..!! उस आवाज को सुनकर बाघ मौन खडा हो गया। स्त्री ने उसे लौटने का आदेश दिया तो बाघ लौट पड़ा। बाघ उस स्त्री के पैरों के पास ऐसे लोटने लगा जैसे कोई बिल्ली पुचकार सुनकर खेलने लगती है, युवती बाघ की पीठ को प्यार से थपथपाने लगी और बाघ स्नेह से लोटता रहा। वह स्त्री वहां मौजूद स्त्रियों में सर्वाधिक सुंदर थी। वह भीलों के राजा विश्वावसु की इकलौती पुत्री ललिता थी। ललिता ने अपनी सेविकाओं को अचेत विद्यापति की देखभाल के लिए भेजा।
सेविकाओं ने झरने से जल लेकर विद्यापति पर छिड़का, कुछ देर बाद विद्यापति की चेतना लौटी। उन्हें जल पिलाया गया, विद्यापति यह सब देख कर कुछ आश्चर्य में थे।
ललिता विद्यापति के पास आई और पूछा- आप कौन हैं और भयानक जानवरों से भरे इस वन में आप कैसे पहुंचे. आपके आने का प्रयोजन बताइए ताकि मैं आपकी सहायता कर सकूं।
विद्यापति के मन से बाघ का भय पूरी तरह गया नहीं था। ललिता ने यह बात भांप ली और उन्हें सांत्वना देते हुए कहा- विप्रवर आप मेरे साथ चलें। जब आप स्वस्थ हों तब अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान करें।
विद्यापति ललिता के पीछे-पीछे उनकी बस्ती की तरफ चल दिए।विद्यापति भीलों के पाजा विश्वावसु से मिले और उन्हें अपना परिचय दिया, विश्वावसु विद्यापति जैसे विद्वान से मिलकर बड़े प्रसन्नता हुए।
विश्वावसु के अनुरोध पर विद्यापति कुछ दिन वहां अतिथि बनकर रूके। वह भीलों को धर्म और ज्ञान का उपदेश देने लगे, उनके उपदेशों को विश्वावसु तथा ललिता बड़ी रूचि के साथ सुनते थे, ललिता के मन में विद्यापति के लिए अनुराग पैदा हो गया। विद्यापति ने भी भांप लिया कि ललिता जैसी सुंदरी को उनसे प्रेम हो गया है किंतु विद्यापति एक बड़े कार्य के लिए निकले थे। अचानक एक दिन विद्यापति बीमार हो गए, ललिता ने उसकी सेवा सुश्रुषा की। इससे विद्यापति के मन में भी ललिता के प्रति प्रेम भाव पैदा हो गया, विश्वावसु ने प्रस्ताव रखा की विद्यापति ललिता से विवाह कर ले, विद्यापति ने इसे स्वीकार कर लिया।
कुछ दिन दोनों के सुखमय बीते, ललिता से विवाह करके विद्यापति प्रसन्न तो था पर जिस महत्व पूर्ण कार्य के लिए वह आए थे, वह अधूरा था।यही चिंता उन्हें बार बार सताती थी। इस बीच विद्यापति को एक विशेष बात पता चली, विश्वावसु हर रोज सवेरे उठ कर कहीं चला जाता था और सूर्योदय के बाद ही लौटता था। कितनी भी विकट स्थिति हो उसका यह नियम कभी नहीं टूटता था। विश्वावसु के इस व्रत पर विद्यापति को आश्चर्य हुआ। उनके मन में इस रहस्य को जानने की इच्छा हुई, आखिर विश्वावसु जाता कहां है। एक दिन विद्यापति ने ललिता से इस सम्बन्ध में पूछा, ललिता यह सुनकर सहम गई।
आखिर वह क्या रहस्य था ? क्या वह रहस्य विद्यापति के कार्य में सहयोगी था या विद्यापति पत्नी के प्रेम में मार्ग भटक गए?

विद्यापति ने ललिता से उसके पिता द्वारा प्रतिदिन सुबह किसी अज्ञात स्थान पर जाने और सूर्योदय के पूर्व लौट आने का रहस्य पूछा। विश्ववासु का नियम किसी हाल में नहीं टूटता था चाहे कितनी भी विकट परिस्थिति हो। ललिता के सामने धर्म संकट आ गया, वह पति की बात को ठुकरा नहीं सकती थी लेकिन पति जो पूछ रहा था वह उसके वंश की गोपनीय परंपरा से जुड़ी बात थी जिसे खोलना संभव नहीं था।
ललिता ने कहा- स्वामी ! यह हमारे कुल का रहस्य है जिसे किसी के सामने खोला नहीं जा सकता परंतु आप मेरे पति हैं और मैं आपको कुल का पुरुष मानते हुए जितना संभव है उतना बताती हूं।
यहां से कुछ दूरी पर एक गुफा है जिसके अन्दर हमारे कुल देवता हैं, उनकी पूजा हमारे सभी पूर्वज करते आए हैं, यह पूजा निर्बाध चलनी चाहिए। उसी पूजा के लिए पिता जी रोज सुबह नियमित रूप से जाते हैं।
विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह भी उनके कुल देवता के दर्शन करना चाहते हैं। ललिता बोली- यह संभव नहीं, हमारे कुल देवता के बारे में किसी को जानने की इच्छा है, यह सुनकर मेरे पिता क्रोधित हो जाएंगे।
विद्यापति की उत्सुक्ता बढ़ रही थी, वह तरह-तरह से ललिता के अपने प्रेम की शपथ देकर उसे मनाने लगे। आखिर कार ललिता ने कहा कि वह अपने पिता जी से विनती करेगी कि वह आपको देवता के दर्शन करा दें।
ललिता ने पिता से सारी बात कही,वह क्रोधित हो गए। ललिता ने जब यह कहा कि मैं आपकी अकेली संतान हूं, आपके बाद देवता के पूजा का दायित्व मेरा होगा, इसलिए मेरे पति का यह अधिकार बनता है क्योंकि आगे उसे ही पूजना होगा। विश्वावसु इस तर्क के आगे झुक गए। वह बोले- गुफा के दर्शन किसी को तभी कराए जा सकते हैं जब वह भगवान की पूजा का दायित्व अपने हाथ में ले ले। विद्यापति ने दायित्व स्वीकार किया तो विश्वावसु देवता के दर्शन कराने को राजी हुए।
दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांधकर विश्वावसु उनका दाहिना हाथ पकड़ कर गुफा की तरफ निकले, विद्यापति ने मुट्ठी में सरसों रख लिया था जिसे रास्ते में छोड़ते हुए गए। गुफा के पास पहुंचकर विश्वावसु रुके और गुफा के पास पहुंच गए। विश्वावसु ने विद्यापति के आँखों की काली पट्टी खोल दी, उस गुफा में नीले रंग का प्रकाश चमक उठा। हाथों में मुरली लिए भगवान श्री कृष्ण का रूप विद्यापति को दिखाई दिया। विद्यापति आनंद मग्न हो गए, उन्होंने भगवान के दर्शन किए। दर्शन के बाद तो जैसे विद्यापति जाना ही नहीं चाहते थे परंतु विश्वावसु ने लौटने का आदेश दिया। फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधी और दोनों लौट पड़े।
लौटने पर ललिता ने विद्यापति से पूछा। विद्यापति ने गुफा में दिखे अलौकिक दृश्य के बारे में पत्नी को बताना भी उसने उचित नहीं समझा, वह टाल गए। यह तो जानकारी हो चुकी थी कि विश्वावसु श्री कृष्ण की मूर्ति की पूजा करते हैं।
विद्यापति को आभास हो गया कि महाराज ने स्वप्न में जिस प्रभु विग्रह के बारे में देव वाणी सुनी थी, वह इसी मूर्ति के बारे में थी। विद्यापति विचार करने लगे कि किसी तरह इसी मूर्ति को लेकर राजधानी पहुंचना होगा।
वह एक तरफ तो गुफा से मूर्ति को लेकर जाने की सोच रहे थे दूसरी तरफ भील राज और पत्नी के साथ विश्वासघात के विचार से उनका मन व्यथित हो रहा था। विद्यापति धर्म-अधर्म के बारे में सोचता रहे। फिर विचार आया कि यदि विश्वावसु ने सचमुच उसपर विश्वास किया होता तो आंखों पर पट्टी बांधकर गुफा तक नहीं ले जाता। इसलिए उसके साथ विश्वास घात का प्रश्न नहीं उठता, उसने गुफा से मूर्ति चुराने का मन बना लिया।
विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह अपने माता-पिता के दर्शन करने के लिए जाना चाहता है, वे उसे लेकर परेशान होंग। ललिता भी साथ चलने को तैयार हुई तो विद्यापति ने यह कह कर समझा लिया कि वह शीघ्र ही लौटेगा तो उसे लेकर जाएगा। ललिता मान गई, विश्वावसु ने उसके लिए घोड़े का प्रबंध किया। अब तक सरसों के दाने से पौधे निकल आए थे, उनको देखता विद्यापति गुफा तक पहुंच गया। उसने भगवान की स्तुति की और क्षमा प्रार्थना के बाद उनकी मूर्ति उठाकर झोले में रख ली। शाम तक वह राजधानी पहुंच गया और सीधा राजा के पास गया। उसने दिव्य प्रतिमा राजा को सौंप दी और पूरी कहानी सुनायी।
राजा ने बताया कि उसने कल एक सपना देखा कि सुबह सागर में एक कुन्दा बहकर आएगा। उस कुंदे की नक्काशी करवाकर भगवान की मूर्ति बनवा लेना जिसका अंश तुम्हें प्राप्त होने वाला है, वह भगवान श्री विष्णु का स्वरूप होगा। तुम जिस मूर्ति को लाए हो वह भी भगवान विष्णु का अंश है, दोनों आश्वस्त थे कि उनकी तलाश पूरी हो गई है।
राजा ने कहा कि जब भगवान द्वारा भेजी लकड़ी से हम इस प्रतिमा का वड़ा स्वरूप बनवा लेंगे तब तुम अपने ससुर से मिलकर उन्हें मूर्ति वापस कर देना, उनके कुल देवता का इतना बड़ा विग्रह एक भव्य मंदिर में स्थापित देखकर उन्हें खुशी ही होगी।
दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व राजा विद्यापति तथा मंत्रियों को लेकर सागर तट पर पहुंचा। स्वप्न के अनुसार एक बड़ा कुंदा पानी में बहकर आ रहा था। सभी उसे देखकर प्रसन्न हुए। दस नावों पर बैठकर राजा के सेवक उस कुंदे को खींचने पहुंचे। मोटी-मोटी रस्सियों से कुंदे को बांधकर खींचा जाने लगा लेकिन कुंदा टस से मस नहीं हुआ। और लोग भेजे गए लेकिन सैकड़ों लोग और नावों का प्रयोग करके भी कुंदे को हिलाया तक नहीं जा सका।
राजा का मन उदास हो गया। सेनापति ने एक लंबी सेना कुंदे को खींचने के लिए भेज दी, सारे सागर में सैनिक ही सैनिक नजर आने लगे लेकिन सभी मिल कर कुंदे को अपने स्थान से हिला तक न सके, सुबह से रात हो गई।
अचानक राजा ने काम रोकने का आदेश दिया। उसने विद्यापति को अकेले में ले जाकर कहा कि वह समस्या का कारण जान गया है, राजा के चेहरे पर संतोष के भाव थे। राजा ने विद्यापति को गोपनीय रूप से कहीं चलने की बात कही।
राजा इंद्रद्युम्न ने कहा कि अब भगवान का विग्रह बन जाएगा। बस एक काम करना होगा। भगवान श्री कृष्ण ने राजा को ऐसा क्या संकेत दे दिया था कि उसकी सारी परेशानी समाप्त हो गयी?

राजा इंद्रध्युम्न को भगवान की प्रेरणा से समझ में आने लगा कि आखिर प्रभु के विग्रह के लिए जो लकड़ी का कुंदा पानी में बह कर आया है वह हिल-डुल भी क्यों नहीं रहा।
राजा ने विद्यापति को बुलाया और कहा- तुम जिस दिव्य मूर्ति को अपने साथ लाए हो उसकी अब तक जो पूजा करता आया था उससे तुरंत भेंट करके क्षमा मांगनी होगी। बिना उसके स्पर्श किए यह कुंदा आगे नहीं बढ सकेगा।
राजा इंद्रद्युम्न और विद्यापति विश्वावसु से मिलने पहुंचे। राजा ने पर्वत की चोटी से जंगल को देखा तो उसकी सुंदरता को देखता ही रह गया, दोनों भीलों की बस्ती की ओर चुपचाप चलते रहे। इधर विश्वावसु अपने नियमित दिनचर्या के हिसाब से गुफा में अपने कुल देवता की पूजा के लिए चले, वहां प्रभु की मूर्ति गायब देखी तो वह समझ गए कि उनके दामाद ने ही यह छल किया है। विश्वावसु लौटे और ललिता को सारी बात सुना दी, विश्वावसु पीड़ा से भरा घर के आंगन में पछाड़ खाकर गिर गए। ललिता अपने पति द्वारा किए विश्वास घात से दुखी थी और स्वयं को इसका कारण मान रही थी। पिता-पुत्री दिन भर विलाप करते रहे। उन दोनों ने अन्न का एक दाना भी न छुआ। अगली सुबह विश्वावसु उठे और सदा की तरह अपनी दिनचर्या का पालन करते हुए गुफा की तरफ बढ़ निकले। वह जानते थे कि प्रभु का विग्रह वहां नहीं है फिर भी उनके पैर गुफा की ओर खींचे चले जाते थे।
विश्वावसु के पीछे ललिता और रिश्तेदार भी चले। विश्वावसु गुफा के भीतर पहुंचे, जहां भगवान की मूर्ति होती थी उस चट्टान के पास खड़े होकर हाथ जोड़ कर खडे रहे, फिर उस ऊंची चट्टान पर गिर गए और बिलख–बिलख कर रोने लगे, उनके पीछे प्रजा भी रो रही थी। उसी समय एक भील युवक भागता हुआ गुफा के पास आया और बताया कि उसने महाराज और उनके साथ विद्यापति को बस्ती की ओर से आते देखा है। यह सुन कर सब चौंक उठे, विश्वावसु राजा के स्वागत में गुफा से बाहर आए लेकिन उनकी आंखों में आंसू थे।
राजा इंद्रद्युमन विश्वावसु के पास आए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। राजा बोले- भीलराज, तुम्हारे कुल देवता की प्रतिमा का चोर तुम्हारा दामाद नहीं मैं हूं, उसने तो अपने महाराज के आदेश का पालन किया, यह सुन कर सब चौंक उठे।
विश्वावसु ने राजा को आसन दिया। राजा ने उस विश्वावसु को शुरू से अंत तक पूरी बात बता कर कहा कि आखिर क्यों यह सब करना पड़ा। फिर राजा ने उनसे अपने स्वप्न और फिर जगन्नाथ पुरी में सागर तट पर मंदिर निर्माण की बात कह सुनाई।
राजा ने विश्वावसु से प्रार्थना की- भील सरदार विश्वावसु, कई पीढ़ियों से आपके वंश के लोग भगवान की मूर्ति को पूजते आए हैं। भगवान के उस विग्रह के दर्शन सभी को मिले इसके लिए आपकी सहायता चाहिए।
ईश्वर द्वारा भेजे गए लकड़ी के कुंदे से बनी मूर्ति के भीतर हम इस दिव्य मूर्ति को सुरछित रखना चाहते हैं। अपने कुल की प्रतिमा को पुरी के मंदिर में स्थापित करने की अनुमति दो। उस कुंदे को तुम स्पर्श करोगे तभी वह हिलेगा।
विश्वावसु राजी हो गए। राजा सपरिवार विश्वावसु को लेकर सागर तट पर पहुंचे। विश्वावसु ने कुंदे को छुआ, छूते ही कुंदा अपने आप तैरता हुआ किनारे पर आ लगा, राजा के सेवकों ने उस कुंदे को राज महल में पहुंचा दिया।
अगले दिन मूर्तिकारों और शिल्पियों को राजा ने बुलाकर मंत्रणा की कि आखिर इस कुंदे से कौन सी देवमूर्ति बनाना शुभ दायक होगा। मूर्तिकारों ने कह दिया कि वे पत्थर की मूर्तियां बनाना तो जानते हैं लेकिन लकड़ी की मूर्ति बनाने का उन्हें ज्ञान नहीं।
एक नए विघ्न के पैदा होने से राजा फिर चिंतित हो गए। उसी समय वहां एक बूढा आया, उसने राजा से कहा- इस मंदिर में आप भगवान श्री कृष्ण को उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ विराज मान करें। इस दैवयोग का यही संकेत है।
राजा को उस बूढ़े व्यक्ति की बात से सांत्वना तो मिली लेकिन समस्या यह थी कि आखिर मूर्ति बने कैसे ? उस बूढ़े ने कहा कि मैं इस कला में कुशल हूं। मैं इस पवित्र कार्य को पूरा करूंगा और मूर्तियां बनाउंगा, पर मेरी एक शर्त है। राजा प्रसन्न हो गए और उनकी शर्त पूछी।
बूढ़े शिल्पी ने कहा- मैं भगवान की मूर्ति निर्माण का काम एकांत में करूंगा और मैं यह काम बंद कमरे में करुंगा। कार्य पूरा करने के बाद मैं स्वयं दरवाजा खोल कर बाहर आऊंगा, इस बीच कोई मुझे नहीं बुलाए।
राजा सहमत तो थे लेकिन उन्हें एक चिंता हुई और बोले- यदि कोई आपके पास नहीं आएगा तो ऐसी हालत में आपके खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी ? शिल्पी ने कहा- जब तक मेरा काम पूर्ण नहीं होता मैं कुछ खाता-पीता नहीं हूं।
राज मंदिर के एक विशाल कक्ष में उस बूढ़े शिल्पी ने स्वयं को 21 दिनों के लिए बंद कर लिया और काम शुरू कर दिया। भीतर से आवाजें आती थीं। महारानी गुंडीचा देवी दरवाजे से कान लगाकर अक्सर छेनी-हथौड़े के चलने की आवाजें सुना करती थीं। महारानी रोज की तरह कमरे के दरवाजे से कान लगाए खड़ी थीं। 15 दिन बीते थे कि उन्हें कमरे से आवाज सुनायी पडनी बंद हो गई, जब मूर्ति कार के काम करने की कोई आवाज न मिली तो रानी चिंतित हो गईं। उन्हें लगा कि वृद्ध आदमी है, खाता-पीता भी नहीं कहीं उसके साथ कुछ अनिष्ट न हो गया हो। व्याकुल होकर रानी ने दरवाजे को धक्का देकर खोला और भीतर झांककर देखा।
महारानी गुंडीचा देवी ने इस तरह मूर्ति कार को दिया हुआ वचन भंग कर दिया था। मूर्ति कार अभी मूर्तियां बना रहा था, परंतु रानी को देखते ही वह अदृश्य हो गए। मूर्ति निर्माण का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ था, हाथ-पैर का निर्माण पूर्ण नहीं हुआ था।
वृद्ध शिल्प कार के रूप में स्वयं देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा आए थे। उनके अदृश्य होते ही मूर्तियां अधूरी ही रह गईं। इसी कारण आज भी यह मूर्तियां वैसी ही हैं, उन प्रतिमाओं को ही मंदिर में स्थापित कराया गया।
कहते हैं विश्वावसु संभवतः उस जरा बहेलिए का वंशज था जिसने अंजाने में भगवान कृष्ण की ह्त्या कर दी थी। विश्वावसु शायद कृष्ण के पवित्र अवशेषों की पूजा करता था। ये अवशेष मूर्तियों में छिपाकर रखे गए थ।विद्यापति और ललिता के वंशज जिन्हें दैत्य्पति कहते हैं उनका परिवार ही यहां अब तक पूजा करते है।

रथ यात्रा का रहस्य
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द्वारिका में सुभुद्राजी ने अपने भाई भगवान कृष्ण और बलदाऊजी से नगर भ्रमण कराने का अनुरोध किया। तब वह दोनों अपने बीच में अलग रथ में सुभुद्राजी को बैठा कर नगर भ्रमण को ले गए। इसी स्मृति स्वरूप यह रथयात्रा निकाली जाती है।

जगन्नाथ तीर्थ क्षेत्रः पुरी
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आज भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा महोत्सव की आप सबको हार्दिक बधाई। आपको संभवत जानकारी न हो तो बताते चलें कि भगवान कृष्ण की बाल्य लीलाओं का क्षेत्र वृन्दावन, किशोरावस्था का क्षेत्र मथुरा और युवावस्था से अंत तक का कर्म क्षेत्र द्वारिका में रहा और उनके देह परित्याग के पश्चात् का स्वरुप भगवान जगन्नाथ है। पुरूषोत्तम क्षेत्र के पुरी के विशाल और भव्य मंदिर के मूल गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ अपने अग्रज बलदाऊजी एवं बहिन सुभुद्रा के साथ विराजमान है। विशालकाय परिसर में बने मंदिर का भव्य प्रवेश द्वार है फिर ऊंचाई पर मंदिर है। भोगशाला, अर्द्ध मण्डप, मण्डपम के उपरांत गर्भगृह में आदमकद भगवान के काष्ठ से बने दिव्य विग्रह विराजमान है।परिसर में श्री गणेशजी, बलदाऊजी की पत्नी, श्री दुर्गा, श्री लक्षमीजी, सूर्य और चंद्रमा की प्रतिमाऐं आसीन है। मंदिर के प्रथम तल पर श्री नृसिंह भगवान आसीन है। भगवान जगन्नाथ की नित्य पूजा अर्चना के साथ कई बार भोग लगता है। इसके लिए आधे नगर के बराबर रसोई है जिसमें तरह तरह के पकवान बनते रहते है और रोज हजारों परिवार और तीर्थयात्री यही प्रसाद ग्रहण करते है। रसोई में रोज मिटटी के नए बर्तन और एक कूप का पानी ही उपयोग में लाया जाता। यह रसोई अपने आप में अजूबा है। भगवान जगन्नाथ को विशेष मुहूर्त में नहलाया जाता है। स्नान के बाद बह बीमार न हो जाए इसके पट बंद कर दिए जाते है। कुछ समय के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते है।
तब भगवान अलारनाथ के मंदिर में स्थित श्री विग्रह के दर्शन की मान्यता है। प्रति वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा का उत्सव मनाया जाता है। विशालकाय रथ में सवार भगवान अपनी बहिन और भाई के साथ तीन किमी दूर स्थित अपनी मांसी के घर गुलीचा मंदिर में रहने जाते है।

पुरी में आचार्य शंकर द्वारा स्थापित गोवर्धन पीठ है। पुरी सुंदर शहर है। समुद्र का सुंदर बीच यहां है। शंकराचार्य पीठ द्वारा नित्य सांय समुद्र की आरती की जाती है। कहा जाता है कि हजारो वर्षो मे सुनामी आंधी तूफानों में यहां समुद्र ने कभी अपनी सीमा या मर्यादा नहीं तोडी।
आज रथयात्रा महोत्सव के अवसर पर भगवान जगन्नाथ के चरणों में श्रद्धा सुमन समर्पित और आप सबको बधाई।

  #आर_जी_पी_भारद्वाज

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प्रताप राज

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प्रेरक प्रसंग

जिय हिंसा जग में बुरी

  प्रसिद्ध जैन मुनि नेमिकुमार जब युवा थे, तो उनका विवाह हो रहा था ।  जब बारात का जुलूस ठाटबाट से निकल रहा था, तो दुल्हे महाशय अपनी जीवन-संगिनी राजुल की कल्पना के सुख-स्वप्नों में तन्मय थे । तभी पशुओं की करुण चीत्कार ने उनके स्वप्न को भंग कर दिया ।  उन्होंने सारथी से पूछा,  "खुशी के अवसर पर यह आर्तनाद कैसा ?"  सारथी ने बताया,  "कुमार !  यह उन निरीह पशुओं की चीत्कार है, जिनका आपके विवाह में आये हुए म्लेच्छ राजाओं के भोज के लिए बध किया जाएगा ।"
  कुमार ने सुना तो उनके मुख से आह निकल गयी ।  उन्होंने सारथी को रथ रोकने का आदेश दिया ।  दूसरे ही क्षण बारातियों ने देखा कि नेमिकुमार स्वयं ही पशुओं के बन्धन खोल रहे हैं ।  उन्होंने अपने हाथ का कंगन भी खोल डाला और वहाँ से निकल पड़े ।  अब वे बाहर-भीतर की सारी गाँठें खोलकर परम-निर्ग्रन्थ हो गये  --  भोग से योग की ओर उन्मुख हो गये ।  उनकी देखा-देखी राजुल ने भी दुल्हन का श्रृंगार उतार दिया और श्वेत वस्त्र पहने, जीवन के चरम फल की प्राप्ति के लिए गिरनार पर्वत की ओर बढ़ चली ।

अनूप सिन्हा