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गुरू महिमा
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एक भंवरा हर रोज एक फूलो के बाग मे जाता है
और जिस जगह से वो गुजरता है,,,वहा एक गंदा नाला होता है

और उस नाले मे एक कीड़ा रहता है
वो भंवरा रोज उस नाले के ऊपर से होकर जाता है,,,

एक दिन उस भंवरे की नजर उस गंदी नाले के कीड़े पर पड़ती है और कीड़े को देखकर उस भंवरे को दया आ जाती है,,

वो भंवरा सोचता है कि ये कीड़ा कैसे इस नाले मे रहता है और भंवरा कीड़े के पास जाकर उससे पूछता है?
कि तुम कैसे यहा रहते हो इस गंदगी मे,,तो इस पर कीड़ा कहता है कि ये मेरा घर है,,भंवरा कीड़े को समझाता है कि तुम मेरे साथ चलो मै तुम्हे जन्नत की सैर करवाऊंगा,,,

तो कीड़ा कहता है मै नही जाऊँगा यही मेरी जन्नत है,,,भंवरा कहता है तुम मेरे साथ चलो तो सही,,मुझसे दोस्ती करो तो सही,,

भंवरे की बात सुनकर कीड़ा दोस्ती का हाथ आगे बढाता हे ओर चलने के लिए तैयार हो जाता है,,फिर भंवरा उसे कहता है की मै कल आऊँगा और तुम्हे अपने साथ ले जाऊँगा,,,

अगले दिन सुबह जब भंवरा फूलो के बाग मे जाने लगता है तो वो पहले उस कीड़े को लेने के लिए जाता है,,,

और उस कीड़े को भंवरा अपने कंधे पर बैठाकर फूलो के बाग मे ले जाता है,,,फिर भंवरा उस कीड़े को एक फूल पर बैठाकर खुद फूलो का रस चखने लग जाता है,,,
अब पूरे दिन के बाद भंवरे का लोटने का समय हो गया और वो उस कीड़े को वही भूल कर चला गया,,,जिस फूल पर भंवरे ने कीड़े को बैठाया था वो सांझ के समय बंद हो जाता है,,,

वो कीड़ा उसी फूल मे बंद हो गया,,,अगले दिन सुबह जब माला बनाने के लिए फूलो को तोड़ा गया तो उस फूल को भी तोड़ा गया जिसमे वो कीड़ा था,,,

उन फूलो की माला बनाकर वो माला बिहारी जी के मंदिर भेज दि गई,,,उस माला मे वो फूल भी था जिसमे वो कीड़ा था,,,और वही माला बिहारी जी के गले मे पहना दि गई,,,

फिर पूरे दिन के बाद वही माला यमुना जी मे प्रवाहित कर दि गई,,,और वो कीड़ा सब देख रहा है,,,

कीड़ा कहता है कि वाह रे भंवरे तेरी दोस्ती,,,कहा मै उस गंदी नाली का कीड़ा था,,,ओर तेरी दोस्ती ने मुझे कहा पहुँचा दिया,,,

बिहारी जी के गले से होकर कहा मै यमुना जी मे गोते खाता जा रहा हूँ,,,वो कीड़ा उस भंवरे की दोस्ती को याद करता हुआ बस यमुना जी मे गोते खाता जा रहा है,,,

#ओरअबयेभंवराकोन_है??
ये भंवरा ही है हमारे सद्गुरु,,
और वो कीड़ा है हम सभी,,

इसलिए सदगुरु का हाथ पकड़कर चलो🙏🙏
किसी के पैर पकड़ने की नौबत नही आएगी।।
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देव शर्मा

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“गुरु-तोते का संदेश”

एक गांव में एक आदमी अपने तोते के साथ रहता था, एक बार जब वह आदमी किसी काम से दूसरे गांव जा रहा था, तो उसके तोते ने उससे कहा– मालिक, जहां आप जा रहे हैं वहाँ मेरा गुरु- तोता रहता है। उसके लिए मेरा एक संदेश ले जाएंगे?
क्यों नहीं!– उस आदमी ने जवाब दिया

तोते ने कहा मेरा संदेश है – आजाद हवाओं में सांस लेने वालों के नाम एक बंदी तोते का सलाम।

वह आदमी दूसरे गांव पहुंचा और वहां उस गुरु- तोते को अपने प्रिय तोते का संदेश बताया, संदेश सुनकर गुरु- तोता तड़पा, फड़फड़ाया और मर गया . . .

जब वह आदमी अपना काम समाप्त कर वापस घर आया, तो उस तोते ने पूछा कि क्या उसका संदेश गुरु- तोते तक पहुंच गया था।
आदमी ने तोते को पूरी कहानी बताई कि कैसे उसका संदेश सुनकर
उसका गुरु तोता तत्काल मर गया था। यह बात सुनकर वह तोता भी तड़पा, फड़फड़ाया और मर गया।

उस आदमी ने बुझे मन से तोते को पिंजरे से बाहरनिकाला और उसका दाह-संस्कार करने के लिए ले जाने लगा, जैसे ही उस आदमी का ध्यान थोड़ा भंग हुआ, वह तोता तुरंत उड़ गया और जाते जाते उसने अपने मालिक को बताया– “मेरे गुरु- तोते ने मुझे संदेश भेजा था कि अगर आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो” . . .

अत: अगर वास्तव में आज़ादी की हवा में सांस लेना चाहते हो तो उसके लिए निर्भय होकर मरना सीख लो क्योंकि साहस की कमी ही हमें झूठे और आभासी लोकतंत्र के पिंजरे में कैद कर के रखती है।

संजय गुप्ता

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प्रेरक प्रसंग

भविष्य की चिन्ता

  मुस्लिम सन्त करमानी की बेटी उनसे बढ़कर थी ।  उसके सौन्दर्य और स्वभाव की कीर्ति सुनकर बादशाह ने अपने शहजादे के साथ उसके विवाह का प्रस्ताव रखा ।  यद्यपि करमानी शाही खानदान से सम्बन्धित थे, किन्तु वे नहीं चाहते थे कि बेटी का विवाह शाही खानदान में किया जाए ।  उन्होंने बादशाह के प्रस्ताव को ठुकराकर एक फकीर के साथ उसका निकाह कर दिया ‌।
  बेटी जब अपने खाविन्द के घर आयी, तो उसे एक कटोरे में पानी और एक थाली में सूखी रोटी के टुकड़े ढँके हुए दिखाई दिये ।  उसने पति से घर पहुँचाने की प्रार्थना की ।  इस पर फकीर बोला,  "मैं जानता था कि तुम सरीखी शाही खानदान की लड़की मुझ जैसे फकीर के साथ कभी बसर नहीं कर सकेगी ।  इसलिए मैंने तुम्हारे अब्बाजान से अपनी हालात का बयान कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने रजामन्दी दे दी थी ।  अगर मैं जानता कि तुम मेरी हालात से वाकिफ न हो, तो मैं कभी राजी न हुआ होता ।"
  "नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं,"  लड़की बोली,  "मैं तुम्हारी हालात के कारण घर नहीं जाना चाहती ‌।  मैं तो अब्बाजान से इस बात की शिकायत करने जाना चाहती थी कि आपने तो यह कहा था कि आप मेरा निकाह खुदादोस्त ( भक्त )  और परहेज़गार ( संयमी )  व्यक्ति के साथ करेंगे, मगर मैंने तो यह पाया कि मेरे खाविन्द का तो अल्लाह पर भरोसा नहीं ।  इसलिए उसने पहले दिन का खाना दूसरे दिन के लिए रख छोड़ा है ।  आप ही बताएंँ कि क्या यह तवक्कुल ( ख़ुदा की इच्छा ‌) के खिलाफ नहीं ?  मुझ पर यकीन किजिए, आप जो भी खाएँगे और जैसा भी खाएँगे, मैं भी वैसा ही खाऊँगी ।  मेरे लिए खाना रख छोड़ने की जरूरत न थी ।"  और फकीर को यकीन हो गया कि वे अपनी गृहस्थी में सुख पाएँगे ।

अनूप सिन्हा

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एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।
अचानक से उसे लगा की,उसकी बहन पीछे रह गयी है।
वह रुका, पीछे मुडकर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।
लडका पीछे आता है और बहन से पुछता है, “कुछ चाहिये तुम्हे ?” लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है।
बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी है।
दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ ….
अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पुछा, “सर, कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?”
दुकानदार एक शांत व्यक्ती है, उसने जीवन के कई उतार चढाव देखे होते है। उन्होने बडे प्यार और अपनत्व से बच्चे से पुछा, “बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो?”
बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोडी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर लायी थी।
दुकानदार वो सब लेकर युं गिनता है जैसे पैसे गिन रहा हो।
सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम है क्या?”
दुकानदार :-” नही नही, ये तो इस गुड़िया की कीमत से ज्यादा है, ज्यादा मै वापिस देता हूं” यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी।
बच्चा बडी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।
यह सब उस दुकान का नौकर देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पुछा, ” मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सिपों के बदले मे दे दी ?”
दुकानदार हंसते हुये बोला,
“हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है। और अब इस उम्र मे वो नही जानता की पैसे क्या होते है ?
पर जब वह बडा होगा ना…
और जब उसे याद आयेगा कि उसने सिपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी, तब ऊसे मेरी याद जरुर आयेगी, वह सोचेगा कि,,,,,,
“यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भरा हुआ है।”
यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टीकोण बढाने मे मदद करेगी और वो भी अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा

संजय गुप्ता

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🔥जैसी करनी वैसा फल, आज नहीं तो मिलेगा कल !🔥
अच्छे इन्सान बनो और सबका भला करो
पीछे जो हुआ उसे सुधार लो और आगे का भी ध्यान रखो
हमारा एक खोटा कर्म ना जाने हमारे कितने जन्म लेने का कारण बन सकता है !
एक गाँव के एक जमींदार ठाकुर बहुत वर्षों से बीमार थे इलाज करवाते हुए कोई डॉक्टर कोई वैद्य नहीं छोड़ा कोई टोने टोटके करने वाला नहीं छोड़ा
लेकिन कहीं से भी थोड़ा सा भी आराम नहीं आया !
एक संत जी गाँव में आये उनके दर्शन करने वो ज़मींदार भी वहाँ गया और उन्हें प्रणाम किया
उसने बहुत दुखी मन से कहा – महात्मा जी मैं इस गाँव का जमींदार हूँ का सैंकड़ों बीघे जमीन है इतना सब कुछ होने के बावजूद मुझे एक लाइलाज रोग है जो कहीं से भी ठीक नहीं हो रहा !
महात्मा जी ने पूछा भाई, क्या रोग है आपको?
जी मुझे मल त्याग करते समय बहुत खून आता है और इतनी जलन होती है जो बर्दाश्त नहीं होती
ऐसा लगता है मेरे प्राण ही निकल जायेंगे !
आप कुछ मेहरबानी करो महात्मा जी 😭
बाबा ने आँख बंद कर ली शांत बैठ गये थोड़ी देर बाद बोले -बुरा तो नहीं मानोगे एक बात पूछूँ ?
नहीं महाराज पूछिये !
तुमने कभी किसी का दिल इतना ज़्यादा तो नहीं दुखाया कि उसने तुम्हें जी भरके बद्दुआऐं दी हों जिसका दण्ड आज तुम भोग रहे हो ? तुम्हारे दुःख देने से वो इतना अधिक दुखी हुआ हो जिसके कारण आज तुम इतनी पीड़ा झेल रहे हो ?
नहीं बाबा !
जहाँ तक मुझे याद है, मैंने तो कभी किसी का दिल नहीं दुखाया
याद करो और सोचो कभी किसी का हक तो नहीं छीना, किसी की पीठ में छुरा तो नहीं मारा किसी की रोज़ी रोटी तो नहीं छीनी ? किसी का हिस्सा ज़बरदस्ती, तुमने खुद तो नहीं संभाला हुआ ?
महात्मा जी की बात पूरी होने पर वो ख़ामोश और शर्मसार हो कर बोला
जी मेरी एक विधवा भाभी है जो कि इस वक्त अपने मायके में रहती है वो जमीन में से अपना हिस्सा मांगती थी
यह सोचकर मैंने उसे कुछ भी नहीं दिया कि कल को ये सब कुछ अपने भाईयों को ही दे देगी इसका क्या पता ?
बाबा ने कहा -आज से ही उसे हर महीने सौ रूपए भेजने शुरू करो !
यह उस समय की बात है जब सौ रूपए में पूरा परिवार पल जाता था !
उसने कुछ रूपए भेजना शुरू कर दिया ! दो तीन हफ़्तों के बाद उसने बाबा से आकर कहा – जी मै पचहत्तर प्रतिशत ठीक हूँ !
महात्मा जी ने सोचा कि इसे तो पूरा ठीक होना चाहिये था ऐसा क्यों नहीं हुआ ?
उससे पूछा तुम कितने रूपए भेजते हो ?
जी पचहत्तर रूपए हर महीने भेजता हूँ
इसी कारण तेरा रोग पूरा ठीक नहीं हुआ !
सन्त जी ने कहा उसका पूरा हक उसे इज़्जत से बुला कर दे दो, वो अपने पैसे को जैसे मर्जी खर्च करे, अपनी ज़मीन जिसे चाहे दे दे । यह उसकी मिल्कीयत है इसमें तुम्हारा कोई दख़ल नहीं है !
जानते हो वो कितना रोती रही है, जलती रही है तभी आपको इतनी जलन हो रही है
ज़रा सोचो, मरने के बाद हमारे साथ क्या जायेगा ?
ज़मींदार को बहुत पछतावा हुआ
उसने फौरन ही अपनी विधवा भाभी और उसके भाईयों को बुलाकर, सारे गाँव के सामने, उसकी ज़मीन, उसके हक का पैसा उसे दे दिया और हाथ जोड़कर अपने ज़ुल्मों की माफी माँगी
उसकी भाभी ने उसे माफ कर दिया और उसके परिवार को खूब आशीर्वाद दिये
जमींदार का रोग शीघ्र ही पूरी तरह से ठीक हो गया !
अगर आपको भी ऐसा कोई असाध्य रोग है तो ज़रूर सोचना कहीँ मैंने किसी का हक तो नहीं छीना है ?
किसी की पीठ में छुरा तो नहीं घोंपा है ? किसी का इतना दिल तो नहीं दुखाया हुआ कि वो बेचारा इतना बेबस था कि तुम्हारे सामने कुछ कहने की हिम्मत भी ना कर सका होगा ?
लेकिन उस बेचारे के दिल से आहें निकली होंगी जो आपके अंदर रोग पैदा कर रही है जलन पैदा कर रही हैं
याद रखो, परमात्मा की लाठी बिल्कुल बेआवाज़ है

ज्योति अग्रवाल

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भारतीय सेना के शहीद कैप्टन विजयंत थापर एवम 6 वर्ष की कश्मीरी लड़की रुकसाना
यह घटना है 1999 कि जब कैप्टन विजयंत थापर 22 वर्ष के थे एवम 2 राजपूताना राइफल्स में तैनात थे। उनकी यूनिट के नजदीक 6 वर्षीया रुकसाना रहती थी जिनके पिता की आतंकियों ने हत्या कर दी थी। एक दिन कैम्प से बाहर कैप्टन थापर ड्यूटी के दैरान खाना खा रहे थे तो रुकसाना वहां आ के बैठ गयी, उसके बाद कैप्टन थापर ने उसे भी खाना खिलाया और उस से पूछा कि तुम स्कूल क्यों नहीं जाती हो? वहां आस-पास जांच करने पर पता चला कि रुकसाना के परिवार के पास पैसे नहीं हैं और उस के पिता को आतंकियों ने मार दिया है। कैप्टन थापर ने कहा कि रुकसाना की पढ़ाई का सारा खर्च वह खुद उठाएंगे।
इसके बाद कारगिल युद्ध शुरू हो गया। कैप्टन थापर ने अपने पिता रिटायर्ड कर्नल वी एन थापर को चिट्ठी लिखी और कहा कि अगर युद्ध में उसे कुछ हो जाता है तो आप स्वयं रुकसाना की पढ़ाई व उसकी देखरेख का खर्च उठाएंगे। कारगिल युद्ध में कैप्टन थापर की यूनिट को तोलोलिंग हिल पर कब्ज़ा करने की ज़िम्मेदारी दी गयी। अभियान के दैरान पहले लक्ष्य “बर्बाद बंकर” पर कैप्टन थापर व उनकी टीम ने कब्ज़ा कर लिया, जब उनकी यूनिट आगे बढ़ने लगी तो दुश्मन की एक गोली कैप्टन थापर के सिर में लगी और कैप्टन थापर शहीद हो गए।
कैप्टन थापर को शहीद हुए 19 वर्ष हो चुके हैं, पिछले 19 वर्ष से लगातार कैप्टन थापर के पिता रिटायर्ड कर्नल वी एन थापर रुकसाना की पढ़ाई व देखरेख का खर्च उठा रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले रुकसाना और उसके चाचा नोएडा में रिटायर्ड कर्नल थापर के घर भी आये थे। हर वर्ष रिटायर्ड कर्नल थापर कश्मीर जाते हैं और रुकसाना की पढ़ाई व देखरेख पर आने वाले सभी खर्च की पेमेंट करते हैं। रुकसाना ने पिछले वर्ष 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की है व अब कॉलेज में जा के आर्ट्स की पढ़ाई करना चाहती है।
ये हैं भारतीय सेना के महान संस्कार, “जान जाए लेकिन वचन न जाए”।
शहीद कैप्टन विजयंत थापर को श्रद्धांजलि व उनके पिता कर्नल थापर को सलाम🙏

निओ दीप

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🍃🍁सबसे बडा आश्चर्य🍁🍃

एक बार महापुरुष सत्संग सुना रहे थे। संगत रोज आते भजन सुनते ओर संत की तारीफ करके वापस चले जाते।
एक दिन संत ने समस्त संगत के सामने प्रश्न रख दिया —
इस संसार मे सबसे बडा आश्चर्य क्या है आपकी दृष्टि में।
संगत मे से बहुत से लोगो ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार उतर दिए ओर अंत मे एक व्यक्ति ने संत से कहा महात्मा जी आपने यह प्रश्न किया है तो जरूर विवेकशील होगा जो हम साधारण बुद्धि से नही समझ सकते अतः आप ही बता दीजिए– सबसे बडा आश्चर्य क्या हो सकता है इस जगत में❓❓
संत— तुम सभी बड़े आश्चर्य हो।
संगत में सभी हैरान हो कर देखने लगे कि एक-दूसरे को ओर सोचने लगे हम कैसे ❓
महात्मा सभी के चेहरे पढ रहे थे अंत मे बोले–
तुम सब यहाँ रोज ईश्वर चर्चा सुनने आते हो ओर मै तुम्हे कभी रामायण कभी गीता के बारे मे बताता रहता हूँ ओर आप भी सुन कर चुपचाप चले जाते हो क्या कभी किसी ने यह पूछा कि जिस ईशवर की बाते करते हो क्या उस ईशवर को दिखा सकते हो❓ईश्वर को देखकर कैसे पाए❓
यह सबसः आश्चर्य की बात है इस संसार मे जिस कार्य के लिए जन्म लिए हो उसकी बाते तो सुनते है पर उसे देखना नही चाहते। उससे भी बड़ा आश्चर्य जब हम आप को बताते है कि ईशवर देख सकते हो तो भी आप सब क्या कहते हो —
अभी उम्र नही अभी समय नही अभी बहुत कार्य है आदि आदि,,,,,,,
जिसे जीवन का उद्देश्य पता हो ओर फिर भी उसे प्राप्त ना करे अनेक योनियो में दुख भोगने को तैयार हो पर ईश्वर को पाना ही ना चाहे जो सबका रचयिता है ओर सब देने वाला है।
यही है सबसे बडा आश्चर्य आपके सामने कुछ भी स्थिर नही सब आते है जाते है पर आप तब भी नही जागते माया के पीछे दोडते हो—
सभी संगत संत शरण मे झुक गए ओर ईशवर दर्शन की याचना करने लगे ओर धन्यवाद किया जो आज हमे जगा दिया पर कुछ लोग अब भी ,,,,,,,,,,
विचार
आप स्वयं करे विचार आपके कदम आपके मंजिल आपकी जीवन का कल्याण भी आपका

🙏🚩जय श्री राम 🚩🙏

Jyoti Agravaal