Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ऊं नमः शिवाय हरीहराय ऊं शिवनारायणय अर्धनारेश्वराय नमः
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(((((( नरहरि सुनार की करधनी ))))))
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नरहरि सुनार रहते तो पंढरपुर में थे, किंतु इनका हृदय काशी के भोले बाबा ने चुरा लिया था।
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शिव की भक्ति में ये इतने मगन रहते थे कि पंढरपुर में रहकर भी विट्ठल भगवान् को न तो इन्होंने कभी देखा और न ही देखने को उत्सुक थे।
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नरहरि सुनारी का काम करते थे। इस लिए जब सोने के आभूषण बनाते, तो उस समय भी शिव, शिव, शिव, शिव का नाम सतत इनके होंठों पर रहता। इस लिए इनके बनाए आभूषणों में भी दिव्य सौंदर्य झलकने लगता था।
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पंढरपुर में ही रहता था एक साहूकार, जो कि विट्ठल भगवान् का भक्त था। उसके कोई पुत्र न था। उसने एक बार विट्ठल भगवान् से मनौती की कि यदि उसे पुत्र हुआ, तो वह विट्ठल भगवान् को सोने की करधनी (कमरबंद या कमर पट्टा) पहनाएगा।
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विट्ठल भगवान् की कृपा से उसके पुत्र उत्पन्न हुआ। वह खुशी से फूला न समाया और भागा-भागा नरहरि सुनार के पास सोना लेकर पहुँचा और बोला,
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नरहरि जी ! विट्ठल भगवान् ने प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान किया है। अतः मनौती के अनुसार आज मैं विट्ठल भगवान् को रत्नजड़ित सोने की करधनी पहनाना चाहता हूँ।
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पंढरपुर में आपके अलावा इस प्रकार की करधनी और कोई नहीं गढ़ सकता। इस लिए आप यह सोना ले लीजिए और पांडुरंग मंदिर में चलकर विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले आइए और जल्दी से करधनी तैयार कर दीजिए।
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विट्ठल भगवान् का नाम सुनकर नरहरि जी बोले, “भैया ! मैं शिवजी के अलावा किसी अन्य देवता के मंदिर में प्रवेश नहीं करता। इसलिए आप किसी दूसरे सुनार से करधनी तैयार करा लें।
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लेकिन साहूकार बोला, नरहरि जी ! आपके जैसा श्रेष्ठ सुनार तो पंढरपुर में और कोई नहीं है, इसलिए मैं करधनी तो आपसे ही बनवाऊँगा। यदि आप मंदिर नहीं जाना चाहते हैं, तो ठीक है। मैं स्वयं विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ला देता हूँ। नरहरि जी ने मजबूरी में इसे स्वीकार कर लिया।
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साहूकार विट्ठल भगवान् की कमर का नाप लेकर आ गया और नरहरि जी ने उस नाप की रत्नजड़ित सोने की करधनी बना दी।
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साहूकार आनंद पूर्वक उस करधनी को लेकर अपने आराध्य देव विट्ठल भगवान् को पहनाने मंदिर गया। जब पुजारी जी वह करधनी विट्ठल भगवान् को पहनाने लगे, तो वह करधनी कमर से चार अंगुल बड़ी हो गई।
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साहूकार करधनी लेकर वापिस नरहरि जी के पास लौटा और उस करधनी को छोटा करवा लिया। जब वह पुनः करधनी लेकर मंदिर पहुँचा और पुजारी ने वह करधनी विट्ठल भगवान् को पहनानी चाही, तो अबकी बार वह चार अंगुल छोटी निकली।
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नरहरि जी ने करधनी फिर बड़ी की, तो वह चार अंगुल बढ़ गई। फिर छोटी की, तो वह चार अंगुल कम हो गई। ऐसा चार बार हुआ। पुजारी जी व अन्य श्रद्धालुओं ने साहूकार को सलाह दी कि नरहरि जी स्वयं ही विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले लें।
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साहूकार के अत्यधिक अनुनय-विनय करने पर नरहरि जी बड़ी मुश्किल से विट्ठल भगवान् के मंदिर में जाकर स्वयं नाप लेने को तैयार हुए।
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किंतु कहीं उन्हें विट्ठल भगवान् के दर्शन न हो जाएँ, यह सोचकर उन्होंने साहूकार के सामने यह शर्त रखी कि मंदिर में घुसने से पहले मैं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लूँगा और हाथों से टटोल कर ही आपके विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले सकूँगा।
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साहूकार ने नरहरि जी की यह शर्त मान ली। अनेक शिवालयों से घिरे पांडुरंग मंदिर की ओर कदम बढ़ाने से पहले नरहरि जी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। साहूकार इन्हें मंदिर के अंदर ले आया और विट्ठल भगवान् के सामने खड़ा कर दिया।
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जब नरहरिजी ने नाप लेने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए और मूर्ति को टटोलना शुरू किया, तो उन्हें लगा कि वे पाँच मुख, दस हाथ वाले, साँपों के आभूषण पहने हुए, मस्तक पर जटा और उसमें से प्रवाहित हो रही गंगा वाले शंकर भगवान् की मूर्ति का स्पर्श कर रहे हैं।
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नरहरि जी ने सोचा, ‘कहीं साहूकार मुझ से ठिठोली करने के लिए विट्ठल भगवान् के मंदिर की जगह किसी शिवालय में तो नहीं ले आए हैं। यह सोचकर ये अपने आराध्य देव के दर्शन के लोभ से बच नहीं पाए और प्रसन्न होकर इन्होंने अपनी आँखों से पट्टी खोल दी।
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किंतु आँखें खोलकर देखा तो ठगे से रह गए। देखा सामने उनके आराध्य शिव भगवान् नहीं विट्ठल ही खड़े हैं। झट इन्होंने फिर से अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी और पुनः नाप लेने लगे।
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लेकिन जैसे ही इन्होंने पुनः मूर्ति के दोनों ओर अपने हाथ ले जाकर कमर की नाप लेने का प्रयास किया, तो इन्हें पुन: ऐसा आभास हुआ कि मानो ये अपने इष्टदेव बाघाम्बर धारी भगवान् शिवजी का ही आलिंगन कर रहे हों।
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जैसे ही आँखों से पट्टी खोलकर देखा, तो पुनः विट्ठल भगवान् की मुस्कराती हुई छवि दिखलाई पड़ी। हड़बड़ाते हुए इन्होंने तुरंत अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और फिर से मूर्ति की कमर का नाप लेने लगे। लेकिन आँखें बंद करने पर पुनः मूर्ति में शंकर भगवान् का आभास हुआ।
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जब ऐसा तीन बार हुआ, तो नरहरि जी असमंजस में पड़ गए। इन्हें समझ में आ गया कि शिव और विट्ठल भगवान् अलग-अलग नहीं हैं। जो शंकर हैं, वे ही विट्ठल (विष्णु) हैं और जो विट्ठल (विष्णु) हैं, वे ही शंकर हैं।
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अब तो इन्होंने झट अपनी आँखों पर बँधी अज्ञान की पट्टी उतारकर फेंकी और क्षमा माँगते हुए विट्ठल भगवान् के चरणों में गिर पड़े और सुबक-सुबककर रोते हुए कहने लगे,
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हे विश्व के जीवनदाता ! मैं आपकी शरण में आया हूँ। मैं शिवजी में और आपमें अंतर करता था। इसीलिए मुझ नराधम ने आज तक आपके दर्शन तक न किए। आज आपने मेरे मन का अज्ञान और अंधकार दूर कर दिया। कृपया अपने इस अपराधी को क्षमा कर दीजिए।
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नरहरि जी की इस सरलता पर विट्ठल भगवान् रीझ गए और उन्होंने प्रसन्न होकर नरहरि के इष्टदेव शिवजी को सम्मान देते हुए अपने शीश पर शिवलिंग धारण कर लिया। विट्ठल भगवान् को सिर पर शिवलिंग धारण किए देखकर नरहरि जी और भी अधिक रोमांचित हो गए और अश्रुपात करते हुए गद्गद स्वर से उनकी स्तुति करने लगे।
।।राधे राधे ।।जी।।

Atul Sony

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