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शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और कच की कथा,,,,

राजा जनमेजय ने पुछा… “ब्राह्मण ! हमारे पूर्वज राजा ययाती प्रजापति से दसवें पुरुष* थे। उन्होंने शुक्राचर्य की पुत्री देवयानी, जो की ब्राह्मणी थी, उनसे विवाह किया था। यह अनहोनी बात कैसे हुई? आप कृपया करके हमें इसकी कहानी सुनाएँ।”

वैशम्पायन जी कहतें हैं… जनमेजय आपके पूर्वज राजा ययाति ने शुक्राचार्य और वृषपर्वा* की पुत्रियों से कैसे विवाह किया था, इसका वृतांत मैं अब तुम्हे सुनाता हूँ। सुनिए….

उस समय देवताओं और दानवों में त्रिलोक पे अधिकार के लिए युद्ध चल रहा था। देवताओं के गुरु थे आङ्गिरस बृहस्पति और असुरों ने भार्गव शुक्राचर्य को अपना गुरु बनाया था। ये दोनों ब्राह्मण आपस में बड़ी होड़ रखते थे।

जब युद्ध में देवताओं ने असुरों को मार दिया, तो, शुक्राचार्य ने जो संजीवनी विद्या जानते थे, उन्होंने, उसका उपयोग कर युद्ध में मृत असुरों को जीवित कर दिया। बृहस्पति को संजीवनी विद्या नहीं आती थी। इस कारण असुरों ने जिन देवताओं को युद्ध में मारा था, उन्हें बृहस्पति जीवित नहीं कर पाये।

इस समस्या के समाधान के लिए देवता, कच, जो की बृहस्पति के पुत्र थे, उनके पास गए और उनसे आग्रह किया…

“भगवन! आप शुक्राचार्य के पास जाकर उनसे संजीवनी विद्या सीख लीजिये। वो आजकल वृषपर्वा के साथ रहते हैं। हम इसके लिए आपको यज्ञ में भागीदार बना लेंगे।”

देवताओं की बात सुनकर कच शुक्राचार्य के पास गए और उनसे कहा… “महाराज! मैं महर्षि अङ्गिरा का पौत्र और देवगुरु बृहस्पति का पुत्र कच हूँ। मैं आपकी शरण में रहकर, एक हज़ार वर्षों तक, आपकी सेवा करना चाहता हूँ। आप कृपया मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिये…”

इस पर शुक्राचार्य ने कहा… “मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ। तुम बृहस्पति के पुत्र हो, तुम्हारा सत्कार करना मैं समझता हूँ, बृहस्पति के सत्कार करने के सामान है….”

इसके बाद कच ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए, वहीं रह कर, शुक्राचार्य की सेवा करने लगे। वो गुरु शुक्राचार्य को तो प्रसन्न रखते हीं, साथ में, गुरुपुत्री देवयानी को भी अपनी सेवा से प्रसन्न रखते। इस तरह 500 वर्ष बीत गए।

फिर असुरों को कच के वहां रहने के कारण पता चल गया। बृहस्पति से द्वेष में और संजीवनी विद्या की रक्षा के लिए, एक दिन, चिढ़ कर, असुरों ने कच को, जब वो गायों को चराने के लिए जंगल गया था, मारकर उसके मृत शरीर के टुकड़े टुकड़े कर भेड़ियों को खिला दिया।

संध्या में जब गायें बिना कच के वापस आ गयी तब देवयानी को अनिष्ठ की आशंका हुई। उसने घबड़ाकर शुक्राचार्य से कहा ….

“पिताजी। आपने अग्निहोत्र कर लिया, सूर्यास्त हो गया, देखिये किन्तु गायें बिना अपने रक्षक के हीं लौट आयीं। कहीं कच के साथ कुछ अनिष्ठ तो नहीं हो गया!! पिताजी!! मैं सौगंध खा कर कहती हूँ मैं कच के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकती हूँ।”

शुक्राचार्य ने कहा… “तू घबराती क्यों है। मैं अभी उसे जीवित किये देता हूँ।”

शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग कर के कच को पुकारा…. “आओ बेटा !!”

कच का एक एक अंग भेड़ियों को छेदते हुए बाहर निकल आया और इस तरह कच दुबारा जीवित होकर वापस शुक्राचार्य की सेवा में उपस्थित हो गया।

देवयानी के पूछने पर उसने सारा वृतान्त उसे सुना दिया। एक-दो बार और असुरों ने उसे मार डाला। पर हर बार शुक्राचार्य उसे जीवित कर देतें।

अगली बार असुरों ने कच को मारकर उसके टुकड़े टुकड़े कर उसे जला दिया, और, राख को वारुणी में मिलाकर शुक्राचार्य को पीला दिया।

जब कच नहीं लौटा तो फिर देवयानी फिर शुक्राचार्य के पास गयी और कहा…

“पिताजी कच फूल लेने गया था, मगर अब तक नहीं लौटा। कहीं वो फिर मर तो नहीं गया। मैं सच बोलती हूँ, उसके बिना, मैं एक पल भी, जीवित नहीं रह सकती!!”

शुक्राचार्य ने कहा… “बेटी मैं क्या करूँ। ये असुर उसे बार बार मार देते हैं!!!”

देवयानी के हठ करने पर शुक्राचार्य ने पुनः संजीवनी विद्या का प्रयोग कर उसे आवाज दी।

इस पर कच ने डरते-डरते पेट के अंदर से हीं धीमी आवाज़ में अपनी स्थिति बतायी।

शुक्राचार्य ने उसकी आवाज़ सुनकर कहा… बेटा! तुम सिद्ध हो, तभी, अब तक, मेरे पेट के अंदर जीवित हो। अगर तुम इंद्र नहीं हो, तो, लो! मैं तुम्हे अपनी संजीवनी विद्या सीखाता हूँ। निष्चित रूप से तुम इंद्र नहीं, ब्राह्मण हो तभी तुम इतनी देर तक मेरे पेट के अंदर जीवित हो!! तुम ये विद्या मुझसे सीख कर मेरा पेट फाड़कर बाहर निकल आओ, और, फिर संजीवनी विद्या से तुम मुझे जीवित कर देना।

कच ने कहा…. “मैं आपके पेट में रहा हूँ और अब आपके पुत्र के सामान हूँ। निश्चित रूप से मैं आपसे कृतघ्नता नहीं करूँगा। जो वेदगामि गुरु का आदर नहीं करता, वो नरक का भागी होता है।”

शुक्राचार्य को यह जानकार बड़ा क्रोध हुआ कि धोखे में शराब पीने के कारण उनका विवेक इतना मर गया कि वो ब्राह्मणकुमार कच को हीं पी गए। इस दिन के बाद से शुक्राचार्य ने ब्राह्मणों के लिए यह मर्यादा बनाई कि अगर आज के बाद कोई भी ब्राह्मण शराब पियेगा, तो उसका धर्म-भ्रस्ट हो जाएगा। उसे ब्रह्महत्या का पाप लगेगा और इस लोक में तो वो कलंकित होगा हीं, उसका परलोक भी बिगड़ जाएगा।

इसके बाद कच ने फिर एक हजार वर्ष तक शुक्राचार्य की सेवा की। इसके बाद वो वापस लौटने लगे। तब देवयानी ने उनसे कहा…

“अब तुम स्नातक हो गए। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, अब तुम मेरे पिता से कहकर विधिपूर्वक मेरा पाणिग्रहण करो।”

इस पर कच ने कहा… “तुम्हारे पिता मेरे गुरु हैं, वो मेरे पिता सामान हैं, हम दोनों उनके अंदर रह चुके हैं, मैं तुम्हारे साथ बहुत वात्सल्य के साथ गुरु के घर में रहा हूँ, तुम मेरी बहन के सामान हो। तुम मुझे पवित्र भाव से, जब चाहो, याद कर लो, मैं आ जाऊँगा और अब तुम मुझे वापस लौटने का आशीर्वाद दो और यहाँ रहकर सावधानी से मेरे गुरु और अपने पिता की सेवा करो।”

देवयानी ने कहा… मैंने तुमसे प्रेम निवेदन किया था, यदि तुम धर्म और काम की खातिर मेरा त्याग करते हो, तो जाओ, तुम्हारी संजीवनी विद्या कभी सफल नहीं होगी।

इस पर कच ने कहा… मैंने तुम्हे गुरुपुत्री होने के कारण स्वीकार नहीं किया था, कोई दोष देखकर नहीं। मेरे गुरु ने भी मुझे ऐसी कोई आज्ञा नहीं दी थी। तुम्हारी जो इच्छा हो श्राप दे दो, मगर, मैंने तो सिर्फ ऋषि धर्म का पालन किया है। मैं श्राप के योग्य नहीं था, फिर भी काम के वश में होकर तुमने मुझे श्राप दिया है, जाओ अब तुम्हे कोई ब्राह्मण पुत्र स्वीकार नहीं करेगा। मेरी विद्या भले सफल न हो, पर जिसे मैं सिखाऊंगा उसकी विद्या तो सफल होगी!!!”

इतना कहकर कच वापस स्वर्गलोग आ गएँ। वहां उनका बहुत सत्कार हुआ। उन्हें देवताओं ने यज्ञ का भागिदार बनाया और यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया।

संजय गुप्ता

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