Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

हमेशा सच बोलने, धर्म के अनुसार आचरण करने और सज्जनों की संगति करने से मृत्यु को भी जीता जा सकता है। एक बार धनंजय नामक राजकुमार आखेट के लिए वन में गया। कुछ दूरी पर उसने एक मृग के शरीर का कुछ भाग देखा और बाण छोड़ दिया। करीब जाने पर पता चला कि मृग के धोखे में उसने मृगचर्म ओढ़े हुए एक युवा मुनि को मार डाला है। इससे उसे बड़ा पश्चाताप हुआ। नगर लौटकर राजकुमार धनंजय ने अपने पिता को सारी बात बता दी। यह सुनकर राजा राजकुमार धनंजय के साथ वन में गए। वहां एक युवा मुनि का शव देखकर वे बहुत चिंतित हुए। उन्होंने पता लगाने का प्रयत्न किया कि वे मुनि किसके पुत्र या शिष्य हैं। यह बात मालूम करने के लिए राजा वन में स्थित एक ऋषि के आश्रम में पहुंचे। जब ऋषि उनका सत्कार आदि करने लगे, तब राजा ने कहा, “हमारे द्वारा ब्रह्महत्या हुई है, अतः हम आपसे सत्कार पाने के योग्य नहीं हैं।” ऋषि ने पूछा, “आप लोगों ने किस प्रकार ब्रह्महत्या कि ? उस मृत ब्राह्मण का शव कहां है ?”
राजा ने ब्रह्महत्या की घटना सुनाई और मृत ब्राह्मण का शव लेने वन में गए, किंतु उन्हें वहां शव नहीं मिला। इससे राजा और राजकुमार दुखी हो गए। उन दोनों को दुखी देखकर ऋषि ने अपने पुत्र को कुटिया से बाहर बुलाया और बोले, “तुमने जिसे मार डाला था, वह यही ब्राह्मण है। यह मेरा पुत्र है।” राजा आश्चर्य से बोले, “भगवन! यह मुनि जीवित कैसे हो गए ?” ऋषि ने बताया, “राजन! मृत्यु हमारा स्पर्श भी नहीं कर सकती, क्योंकि हम सदा सत्य का पालन करते हैं, धर्म के अनुसार आचरण करते हैं तथा अतिथियों का स्वागत-सत्कार करते हैं।” यह कहकर ऋषि ने राजा को आश्वासन देकर विदा किया।

के ल कक्कड़

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श्रीमद्भागवत पुराण का महत्व !!!!!!!!

निम्नगानां यथा गग्डा देवानामच्युतो यथा।
वैष्णवानां यथा शम्भुः पुराणानामिदं तथा।।

बहने वाली नदीयों में जैसे गंगा श्रेष्ठ है, देवताओं में अच्युत श्रीकृष्ण श्रेष्ठ हैं, वैष्णवों में भगवान् शंकरजी श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में श्रीमद्भागवत सबसे श्रेष्ठ है, श्रीमद्भागवत् भगवान् श्रीकृष्ण का साक्षात विग्रह स्वरूप है, जब तक हमारे शरीर में प्राण रहें तब तक हमें भागवत रस का श्रवण करते रहना चाहियें।

क्षेत्राणां चैव सर्वेषां यथा काशी ह्रानुत्तमाः।
तथा पुराणब्रातानां श्रीमद्भागवत द्विजाः।।

क्षेत्रों में जैसे काशी श्रेष्ट है, वैसे भागवत् पुराणों का तिलक है, वैष्णवों का परम धन है, परमहंसों की संहिता है, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की इसमें त्रिवेणी बहती है, ऐसी भागवत् रूपी त्रिवेणी में जो अवगाहन करें उन्हें गोविन्द मिल जाते हैं, आज के युग में सिमरण मात्र से ही प्रभु की प्राप्ति संभव है, भगवान् जीव के हर गुण को पहचानते हैं।

नाम संकीर्तनं यस्य सर्व पापप्रणाशनम्।
प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हर्रि परम्।।

अंत में जिनका नाम-संकीर्तन सभी पापों का नाश करता है, और जिनको किये गये प्रणाम सभी दुःखों को शांत करते हैं उन परमात्मा को, श्री हरि को प्रणाम करते हैं, बार-बार वंदन करते हैं, कलयुग में कृष्ण भक्ति एक ऐसी औषधि है, जो हर तरह की व्याधि को समाप्त कर मुक्ति प्रदान करती है।

भाई-बहनों जीवन पथ पर चलना तो पड़ेगा, लोग चल भी रहे हैं, कई लोगों को तो अपने गन्तव्य स्थान का भी पता नहीं कि आखिर हमारी मंजील कहाँ है? कई बार यह भी होता है कि बीच चौराहे पर पहुंच गयें पर अब भटकने का पूरा डर है, क्योंकि, वहाँ रास्ता बताने वाला कोई नहीं है, एक बात है कई लोग अपनी यात्रा में समय पास करने के लिये एक साथी को साथ ले लेते हैं।

जिससे यात्रा भी आनन्द से हो और परेशानी भी हो तो एक से भले दो, पर संसार की यात्रा में तो आप हम सफर ले लेते हैं पर मैं जिस यात्रा की बात कर रहा हूंँ उस मुक्ति की यात्रा में और कोई सांसारिक व्यक्ति साथ नहीं चल सकते, इस संसार का साथ तो यहीं रह जायेगा, तो फिर हमें कौन रास्ता बतायेगा और कौन साथ चलेगा?

उस मुक्ति की यात्रा में श्रीमद्भागवत ग्रंथ ही रास्ता बतायेंगे कि जिस रास्ते पर ध्रुवजी चले, जिस रास्ते पर परीक्षितजी चले, उस रास्ते पर आपको चलना है, सज्जनों! परमात्मा के लिये न उम्र देखी जाती है न धन देखा जाता है और न विद्या देखी जाती है, वहाँ तो सिर्फ मन का भाव देखा जाता है, इसलिये ध्रुवजी को भगवान् साढ़े पाँच साल की उम्र में ही प्राप्त हो गये, यह भाव कहाँ से जाग्रत हुआ? शास्त्रों से, पुराणों से।

जब यह भाव जागेगा तब ही पता चलेगा कि वास्तव में हमारा कौन है? क्या परिवार हमारा है? नहीं, तो धन दौलत? नहीं, इस भौतिक जगत में हमारा कोई भी नहीं है, अगर कोई हमारा है तो वह है परमात्मा, यह ज्ञान इन ग्रंथों से ही होगा, मैं कौन हूंँ? मैं आया कहाँ से और मैं जाऊँगा कहाँ? मैं किसका हूंँ? मेरा कौन है? इन प्रश्नों का उत्तर हमें भागवत् शास्त्र ही दे सकते हैं, मैं समझता हूंँ कि आप सभी ने मेरी भागवतजी की सभी प्रस्तुतियां पढ़ी होगी।

क्योंकि, श्रीमद् भागवत कथा पढेंगे तभी पता चलेगा कि मेरे साथ न धन चलेगा न पद चलेगा न प्रतिष्ठा चलेगी, अगर मेरे साथ चलने वाला कोई है तो वह है धर्म, प्रभु का नाम, शरीर से की गई सेवा और यही जीवन का मर्म है, जीवन तो सबको मिला है, लेकिन जीवन को जीने की कला तो शास्त्र बताते है।

इस ग्रन्थ में कथा के साथ आज के मानव के जीवन की व्यथा को भी दर्शाने की मैंने भरपूर कोशिश की है, आज आदमी दुःखी क्यों है? दुष्प्रवृतियां मानव के जीवन में आ गई, उससे आदमी का तन, मन और धन तीनों ही दूषित हो गयें है और तीनों ही जा रहे हैं पर मानव चेत नहीं रहा है, जीवन का नाश करने के लिये नशा कर रहे हैं, पर्यावरण के प्रति आदमी लापरवाह हो गया, वृक्षों की अंधाधुं कटाई हो रही है, अरे शुद्ध ऑक्सीजन नहीं मिलेगा तो बिमारियाँ ही तो होगी।

परिवार टूट रहे हैं, आपसी प्रेम नहीं है, जीवन जी रहे हैं पर रो-रो कर जी रहे हैं, जीवन तो प्रभु का प्रसाद है, हँसते-हँसते ग्रहण करो, चाहे सुख हो या चाहे दुःख हो आनन्द से जीयो, संत व सतगुरू तो हमेशा आपके साथ नहीं रहते पर सतगुरु के सदुपदेश तो हमेशा आपके साथ रहते हैं और पढ़ोगे तो रास्ता भी मिल जायेगा।

संजय गुप्ता

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(((( परमभक्त तुलसीदास ))))
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कहते हैं कि प्रत्येक सफल पुरुष की सफलता के पीछे किसी स्त्री का बहुत योगदान रहता है।
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जिस समय राष्ट्र भारत पर कई प्रकार के सकट गहरा रहे थे हिन्दुत्व खतरे में था चहुं ओर अधार्मिक गतिविधियां पैर फैला रही थीं और किसी को कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था उस समय समस्त हिन्दू समाज किसी ऐसे मार्गदर्शक की प्रतीक्षा में था जो हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति की रक्षा कर सके।
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तभी बांदा जिले के राजापुर नामक ग्राम में आत्माराम दुबे नाम के सरयूपारीण ब्राह्मण की पत्नी हुलसी के गर्भ से तुलसी का जन्म हुआ जिन्होंने हिन्दू जाति के भविष्य में एक आशापूर्ण प्रकाश को आलोकित कर दिया। संवत् 1554 (सन् 1497) श्रावण मास की शुक्ल सप्तमी को तुलसीदास का जन्म हुआ।
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जन्म से ही नहीं गर्भ से भी तुलसी एक असाधारण, आत्मा थे। जीवनचक्र के नियमानुसार नर तन पाने के लिए जीव को नौ मास तक माता के गर्भ मेंरहना पड़ता है परंतु तुलसी बारह माह तक माता के गर्भ में रहे। यह एक अद्वितीय और अविश्वसनीय घटना थी।
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जन्म के समय भी तुलसीदास कम विचित्र कौतुक वाले नहीं थे। नवजात शिशु की भांति वह तनिक भी न रोए। उनका नवजात शरीर पांच वर्ष के बालक के जैसा था। उनके मुंह में पूरे दांत थे। सारा गांव ऐसे बालक के जन्म से अचम्भित था।
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जब उनके पिता ने सुना कि उनकी पत्नी के गर्भ से ऐसा बालक जन्मा है तो वह किसी अनिष्ट की आशंका से भयभीत हो उठे। माता हुलसी भी घबरा गईं और तीसरे दिन ही तुलसी को अपनी दासी मुनियां के साथ अन्यत्र भेज दिया।
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उधर मुनियां ने बालक का नाम ‘रामबोला’ रख दिया था। कारण भी था। जन्मते ही बालक के मुख से ‘राम’ निकला था। साढ़े पाच वर्ष तक मुनियां रामबोला को अपने बच्चे की तरह पालती रही और अंतत: काल की क्रूर दृष्टि मुनियां पर पड़ गई। रामबोला को अनाथ करके मुनियां अपने मूल से जा मिली।
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अब रामबोला पूरी तरह अनाथ हो गए थे और वह इधर-उधर भटकने लगे थे। किसी तरह वह अपना जीवन-यापन कर रहे थे।
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भगवान शंकर और माता पार्वती ने जबउज्जल भविष्य को वर्तमान में इस दीन अवस्था में देखा तो भगवान शंकर की आज्ञा से पार्वती जी एक ब्राह्मणी का वेष बनाकर तुलसीदास को नित्यप्रति भोजन देने आने लगीं।
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परंतु यह न तो सटीक समाधान था और न अनवरत चल सकता था। तब भगवान भोलेनाथ ने अयोध्या के परमसंत श्री नरहर्यानंद जी को स्वप्न में तुलसीदासजी के बारे में निर्देश दिए।
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और श्री नरहर्यानंद जी रामबोला को ढूंढकर उन्हें अपने साथ अयोध्या ले गए और संवत् 1561 (सन् 1504) माघ मास की शुक्ल पंचमी को रामबोला का यज्ञोपवीत संस्कार करके उनका नाम तुलसीदास रख दिया।
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तुलसीदास की ज्ञान शक्ति से स्वयं नरहर्यानंद जी भी उस समय चकित रह गए जब तुलसीदास ने बिना सिखाए ही गायत्री महामंत्र का शुद्ध उच्चारण किया।
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तत्पश्चात नरहर्यानंदजी ने पांचों वैष्णव संस्कार करके तुलसीदास को राममंत्र से दीक्षित किया। फिर तो तुलसीदास ने गुरु की सिखाई प्रत्येक बात को सीख लिया।
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प्रखर ग्रास्य शक्ति के शिष्य पर प्रत्येक गुरु को गर्व होता है। गुरुजी अपने शिष्य को लेकर सोरों पहुंचे और वहा उन्हें रामकथा का सुंदर श्रवण कराया। फिर उन्होंने अपने पारंगत शिष्य को स्वतत्र छोड़कर स्वय काशी प्रस्थान किया।
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संवत् 1573 (सन् 1516) ज्येष्ठ मास की शुक्ल त्रयोदशी को तुलसीदास का विवाह हुआ। उनकी पत्नी रत्नावली अत्यत रूपवान और धार्मिक महिला थीं। सुंदर जीवन संगिनी पाकर तुलसीदास अपने लक्ष्य को भूलकर पत्नी के सौंदर्य आकर्षण में फंस गए।
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रत्नावली से क्षण-भर का विछोह भी उन्हें असहनीय था। एक बार रत्नावली अपने पीहर चली गई। तुलसी दास उस समय घर पर नहीं थे। उन्हें जब पता चला कि उनकी पत्नी पीहर चली गई है तो वह भी उसके पीछे ससुराल पहुँच गए। रत्नावली को अपने पति का इस प्रकार पीछे-पीछे आना बड़ा ही लज्जा जनक लगा।
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जब तुलसीदास रत्नावली के सामने आए तो वह उन पर बड़ी क्रोधित हुईं। ”तुमने मेरे पीछे-पीछे आकर उचित नहीं किया। एक पुरुष को यह शोभा नहीं देता कि ऐसा अशोभनीय व्यवहार करे। मानव जीवन को मात्र सुख भोग विलास में व्यतीत करना उचित नहीं है।
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जैसी प्रीति तुमने चर्म से की है वैसी प्रति धर्म से करो तो उद्धार हो जाए। जैसी इच्छा ‘काम’ की है वैसी ‘राम’ की होती तो जन्म सफल हो जाता। धिक्कार है तुम्हारे पुरुषार्थ को ! रत्नावली ने कहा। तुलसीदास का सिर लज्जा से झुका ही था।
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पत्नी के तिरस्कार भरे वचन सुनकर उनके अंदर का पुरुष जाग उठा। अंतर में ऐसी विरक्ति उत्पन्न हुई कि अंतर्पट खुलते गए और ज्ञानचक्षु खुल गए। उसी क्षण भगवान श्रीराम के चरणों में लौ लगा ली और सांसारिक सम्बंधों को त्यागकर काशी चल पड़े।
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काशी में भगवान की आज्ञा से वीर हनुमान ने उन्हें भगवान श्रीराम से मिलाने का स्थान चित्रकूट बता दिया । तुलसीदास चित्रकूट आ गए। चित्रकूट में रामघाट पर निवास किया और भिक्षा मांगकर उदरपूर्ति करने लगे।
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एक दिन प्रदक्षिणा करने लगे तो मार्ग में दो सुंदर कुमार सुसज्जित घोड़ों पर सवार मिले। इनका हनुमानजी से साक्षात्कार था। हनुमानजी ने इन्हें बताया कि मार्ग में मिले दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण थे।
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तुलसीदास को बड़ा पश्चात्ताप हुआ। हनुमानजी ने सात्वना दी कि प्रातःकाल फिर दर्शन होंगे। संवत् 1607 सन् (1550) मौनी अमावस बुधवार को तुलसीदास घाट पर चंदन घिस रहे थे कि दो सुकुमार बालक उनके सामने आए।
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बाबा, थोड़ा-सा चंदन हमें भी दो। बालको ने कहा। वहीं समीप एक वृक्ष पर हनुमान भी तोता रूप में बैठे थे। उन्होंने तुलसीदासजी को सांकेतिक भाषा में बताया कि उनके समक्ष श्री भगवान हैं। तुलसीदासजी उस अद्भुत छवि पर मोहित हो गए।
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भगवान ने अपने हाथों से अपने और तुलसीदास के मस्तक पर चंदन लगाया और फिर अंतर्धान हो गए।
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संवत् 1627 (सन् 1507) को तुलसीदास आयोध्या आए। वहा उन्हें अपने अंदर कवित्व का आभास हुआ और वह संस्कृत वहन्-लिखने लगे। परतु वे दिन में जो भी लिखते वह रात्रि में लुप्त हो जाता। एक दिन हनुमानजी से आदेश मिला कि अपनी भाषा में पद लिखें।
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तब संवत् 1631 (सन् 1574) में रामनवमी के दिन उन्हीने ‘श्री रामचरितमानस’ की रचना प्रारम्भ कर दी। दो वर्ष सात माह पच्चास दिन में ग्रंथ को उन्होंने पूर्ण किया।
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काशी जाकर उन्होंने भगवान विश्वनाथ के समक्ष अपने स्वलिखित ग्रंथ का पाठ किया। और यह रामचरितमानस हिन्दू और हिन्दुत्व का अटूट जैसे रामबाण ही बन गया। जिस पर भगवान ने अपने हस्ताक्षर करके अपने भक्त को अद्भुत पुरस्कार दिया।
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आज रामचरितमानस प्रत्येक हिन्दू के लिए एक परम धर्म ग्रंथ है। संसार भर के साहित्य में इसका स्थान अग्रणी है। जिस हिन्दू घर रामचरितमानस की प्रति नहीं है वह हिन्दू ही नहीं है।
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तुलसीदास ने हिन्दू धर्म को एक अद्भुत पुस्तक भेंट की। फिर सवत् 1680 सन् (1623) को अस्सीघाट पर गंगा किनारे इस महाकवि ने राम नाम कहते हुए अपने श्वास को राम में मिला दिया।

  ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

प्रताप राज

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अयोध्या के महल में चोरी करता पकड़ा गया था मेघनाद?
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संतजन अपनी कथाओं में एक प्रसंग सुनाते हैं मेघनाथ के अयोध्या आने की और श्रीलक्ष्मणजी द्वारा उसे बंदी बना लेने की। तुलसीबाबा एक चौपाई लिखते हैं उसके आधार पर ही संभवतः यह प्रसंग बनता है. आज आपके सामने वही प्रसंग रखने का प्रयास करते हैं।

जब लंका युद्ध में मेघनाद ने लक्ष्मणजी को शक्ति मार दी और लक्ष्मणजी अचेत पड़ गए तो भगवान श्रीराम भाई का कष्ट देखकर विलाप करने लगे. विलाप करते हुए वह अपने बचपन की एक घटना स्मरण करते हैं जब लक्ष्मणजी ने मेघनाथ को बंदी बना लिया था।

भगवान श्रीराम भावुक होकर विलाप करते हुए कहते हैं कि अगर उस दिन पिता के वचन न माना होता तो आज यह दशा न आती. प्रभु की वेदना का वर्णन करते हुए तुलसीदासजी ने एक चौपाई लिखी है-

जो जनतेउ वन बंधु बिछोहू।
पिता बचन मनतेउ नहिं ओहू॥

पिता के वचन की लाज रखने के लिए वनवास में चले आए भगवान श्रीराम पिताजी के किस वचन के मानने पर दुख प्रकट कर रहे हैं. इसकी एक कथा है, उसका आप आनंद लीजिए।

एक बार रावण को समुद्र किनारे शिव-आराधना के समय एक कमलपुष्प की पंखुडी कहीं से बहकर आती दिखाई दी. पंखुडी अद्वितीय सुन्दर थी. रावण ने ऐसा सुंदर कमलदल नहीं देखा था।

उसे देखकर विचार करने लगा कि पंखुडी जिस कमल पुष्प का हिस्सा है वह पुष्प कितना सुन्दर होगा? काश पूरा कमलपुष्प पा जाऊँ तो अपने आराध्य भगवान भोलनाथ को अर्पित करके उन्हें प्रसन्न करता।

रावण बस यही विचार करते हुए वहीं बैठा रहा. रावण पूजा के बाद समय से वापस नहीं आया तो मंदोदरी को चिंता हुई. पुत्र मेघनाद को पिता की खोज-खबर हेतु भेजा।

मेघनाद ने देखा कि पिताजी एकटक जल में लहराती एक पंखुडी निहार रहे हैं. उनका मन अविचल स्थिति में शांत तो है किंतु कुछ चिंतित भी है. उसने पिता से इस स्थिति का कारण पूछा तो सारी स्थिति व रावण की अभिलाषा का पता चला।

मेघनाद ने पिता को प्रसन्न करने के लिए कहा- पिताजी आप चिंता न करें. तीनों लोकों में जहां भी इस पंखुडी के पुष्प लगे होंगे, मैं वहां से अभी इसे खोजकर लिए आता हूं. आप भोलेनाथ को इसे अवश्य अर्पित करेंगे।

रावण को प्रणाम कर मेघनाद मायावी छद्मभेष धारण कर तुरंत ही आकाश,पाताल समेत सभी लोकों का चक्कर लगाकर पृथ्वी पर पुष्प तलाशने लगा. तभी उसे सरयू की धारा में उसी प्रकार की पंखुडियां बहती दिखीं।

उनको खोजता मेघनाद अयोध्या के उपवन के उस तालाब में पहुंच गया जो उन अद्भुत, अद्वितीय कमल-पुष्पों का पूरा श्रोत था. तालाब को उन कमल पुष्पों से भरा देखकर मेघनाद की प्रसन्नता की सीमा न रही।

बिना विलंब किए उसने पुष्प तोडना शुरू किया. अचानक किसी अजनबी को महाराज दशरथ के बगीचे में पुष्प तोड़ते देखकर रखवालों ने पास ही खेल रहे श्रीराम-लखन आदि को खबर कर दी. वे तुरंत आए और मेघनाद को पकड लिया।

लक्ष्मणजी तो तो वाटिका में घुसकर चोरी कर रहे मेघनाद को वहीं मार देना चाहते थे पर श्रीरामजी ने कहा- दंड निर्धारण का अधिकार राजा का होता है. इसे पिताजी महाराज के पास लिए चलते हैं. वह जो दंड निर्धारित करेंगे वह दंड दिया जाएगा।

मेघनाद को बांधकर वे महाराज दशरथ के पास ले गए. दशरथजी ने उसका परिचय आदि के बाद पूरा वृतांत व पुष्प चोरी करने का कारण जाना।

फिर वह बोले- निःसंदेह इसने बिना अनुमति वाटिका में प्रवेशकर अपराध किया है परंतु यह पितृ-भक्ति के भाव में था इसलिए इससे यह घृष्टता हो गई. अपने पिता की सेवा में निकले इसके प्राण मत लो. इसे पुष्प देकर छोड दो।

जब मेघनाद ने लंकायुद्ध में लक्ष्मणजी पर शक्ति का प्रहारकर विकट स्थिति पैदा कर दी, तब रामजी भाई के शोक में विलाप करते हुए स्मरण करने लगे।

दुखी हृदय से पिताजी की आज्ञा का स्मरण करते हुए श्रीराम ने कहा कि यदि मैं जानता कि यह मेघनाद मेरे भाई लखन के प्राणों के संकट का कारण बनेगा तो मैं उस समय पिताजी के बचन न मानता और लक्ष्मण को इसके प्राण लेने देता।
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देव शर्मा

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तिरुपति बालाजी
कैसे बने भगवान विष्णु तिरुपति बालाजी
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एक बार समस्त देवताओं ने मिलकर एक यज्ञ करने का निश्चय किया । यज्ञ की तैयारी पूर्ण हो गयी । तभी वेद ने एक प्रश्न किया तो एक व्यवहारिक समस्या आ खड़ी हुई । ऋषि-मुनियों द्वारा किए जाने वाले यज्ञ की हविष्य तो देवगण ग्रहण करते थे । लेकिन देवों द्वारा किए गए यज्ञ की पहली आहूति किसकी होगी ? यानी सर्वश्रेष्ठ देव का निर्धारण जरुरी था, जो फिर अन्य सभी देवों को यज्ञ भाग प्रदान करे ।

ब्रह्मा-विष्णु-महेश परम् अात्मा हैं । इनमें से श्रेष्ठ कौन है ? इसका निर्णय आखिर हो तो कैसे ? भृगु ने इसका दायित्व सम्भाला । वह देवों की परीक्षा लेने चले । ऋषियों से विदा लेकर वह सर्व प्रथम अपने पिता ब्रह्मदेव के पास पहुँचे ।

ब्रह्मा जी की परीक्षा लेने के लिए भृगु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया । इससे ब्रह्मा जी अत्यन्त कुपित हुए और उन्हें शिष्टता सिखाने का प्रयत्न किया । भृगु को गर्व था कि वह तो परीक्षक हैं, परीक्षा लेने आए हैं । पिता-पुत्र का आज क्या रिश्ता ? भृगु ने ब्रह्म देव से अशिष्टता कर दी । ब्रह्मा जी का क्रोध बढ़ गया और अपना कमण्डल लेकर पुत्र को मारने भागे । भृगु किसी तरह वहाँ से जान बचाकर भाग चले आए ।

इसके बाद वह शिव जी के लोक कैलाश गए । भृगु ने फिर से धृष्टता की । बिना कोई सूचना का शिष्टाचार दिखाए या शिव गणों से आज्ञा लिए सीधे वहाँ पहुँच गए, जहाँ शिव जी माता पार्वती के साथ विश्राम कर रहे थे । आए तो आए, साथ ही अशिष्टता का आचरण भी किया । शिव जी शांत रहे, पर भृगु न समझे । शिव जी को क्रोध आया तो उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया । भृगु वहाँ से भागे ।

अन्त में वह भगवान विष्णु के पास क्षीर सागर पहुंचे । श्री हरि शेष शय्या पर लेटे निद्रा में थे और देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं । महर्षि भृगु दो स्थानों से अपमानित करके भगाए गए थे । उनका मन बहुत दुखी था । विष्णु जी को सोता देख । उन्हें न जाने क्या हो गया और उन्होंने विष्णु जी को जगाने के लिए उनकी छाती पर एक लात जमा दी ।

विष्णु जी जाग उठे और भृगु से बोले “हे ब्राह्मण देवता ! मेरी छाती वज्र समान कठोर है और आपका शरीर तप के कारण दुर्बल है, कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं आयी ? आपने मुझे सावधान करके कृपा की है । आपका चरण चिह्न मेरे वक्ष पर सदा अंकित रहेगा ।”

भृगु को बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने तो भगवान की परीक्षा लेने के लिए यह अपराध किया था । परन्तु भगवान तो दण्ड देने के बदले मुस्करा रहे थे । उन्होंने निश्चय किया कि श्रीहरि जैसी विनम्रता किसी में नहीं । वास्तव में विष्णु ही सबसे बड़े देवता हैं । लौट करके उन्होंने सभी ऋषियों को पूरी घटना सुनायी । सभी ने एक मत से यह निर्णय किया कि भगवान विष्णु को ही यज्ञ का प्रधान देवता समझकर मुख्य भाग दिया जाएगा ।

लेकिन लक्ष्मी जी ने भृगु को अपने पति की छाती पर लात मारते देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया । परन्तु उन्हें इस बात पर क्षोभ था कि श्रीहरि ने उद्दण्ड को दण्ड देने के स्थान पर उसके चरण पकड़ लिए और उल्टे क्षमा मांगने लगे ! क्रोध से तमतमाई महालक्ष्मी को लगा कि वह जिस पति को संसार का सबसे शक्तिशाली समझती है, वह तो निर्बल हैं । यह धर्म की रक्षा करने के लिए अधर्मियों एवं दुष्टों का नाश कैसे करते होंगे ?

महालक्ष्मी ग्लानि में भर गई और मन श्रीहरि से उचाटन हो गया । उन्होंने श्रीहरि और बैकुण्ठ लोक दोनों के त्याग का निश्चय कर लिया । स्त्री का स्वाभिमान उसके स्वामी के साथ बंधा होता है । उनके समक्ष कोई स्वामी पर प्रहार कर गया और स्वामी ने प्रतिकार भी न किया, यह बात मन में कौंधती रही । यह स्थान वास के योग्य नहीं । पर, त्याग कैसे करें ? श्रीहरि से ओझल होकर रहना कैसे होगा ? वह उचित समय की प्रतीक्षा करने लगीं ।

श्रीहरि ने हिरण्याक्ष के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए वराह अवतार लिया और दुष्टों का संहार करने लगे । महालक्ष्मी के लिए यह समय उचित लगा । उन्होंने बैकुण्ठ का त्याग कर दिया और पृथ्वी पर एक वन में तपस्या करने लगीं ।
तप करते-करते उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया । विष्णु जी वराह अवतार का अपना कार्य पूर्ण कर वैकुण्ठ लौटे तो महालक्ष्मी नहीं मिलीं । वह उन्हें खोजने लगे ।

श्रीहरि ने उन्हें तीनों लोकों में खोजा किन्तु तप करके माता लक्ष्मी ने भ्रमित करने की अनुपम शक्ति प्राप्त कर ली थी । उसी शक्ति से उन्होंने श्री हरि को भ्रमित रखा । आख़िर श्रीहरि को पता लग ही गया । लेकिन तब तक वह शरीर छोड़ चुकीं थीं । दिव्य दृष्टि से उन्होंने देखा कि लक्ष्मी जी ने चोलराज के घर में जन्म लिया है । श्रीहरि ने सोचा कि उनकी पत्नी ने उनका त्याग सामर्थ्यहीन समझने के भ्रम में किया है, इसलिए वह उन्हें पुनः प्राप्त करने के लिए अलौकिक शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे ।

महालक्ष्मी ने मानव रुप धरा है तो अपनी प्रिय पत्नी को प्राप्त करने के लिए वह भी साधारण मानवों के समान व्यवहार करेंगे और महालक्ष्मी जी का हृदय और विश्वास जीतेंगे । भगवान ने श्रीनिवास का रुप धरा और पृथ्वी लोक पर चोलनरेश के राज्य में निवास करते हुए महालक्ष्मी से मिलन के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे ।

राजा आकाशराज निःसंतान थे । उन्होंने शुकदेव जी की आज्ञा से सन्तान प्राप्ति यज्ञ किया । यज्ञ के बाद यज्ञशाला में ऋषियों ने राजा को हल जोतने को कहा गया । राजा ने हल जोता तो हल का फल किसी वस्तु से टकराया । राजा ने उस स्थान को खोदा तो एक पेटी के अन्दर सहस्रदल कमल पर एक छोटी-सी कन्या विराजमान थी । वह महालक्ष्मी ही थीं । राजा के मन की मुराद पूरी हो गई थी । चूंकि कन्या कमल के फूल में मिली थी, इसलिए उसका नाम रखा गया “पदमावती” ।

पदमावती नाम के अनुरुप ही रुपवती और गुणवती थी । साक्षात लक्ष्मी का अवतार । पद्मावती विवाह के योग्य हुई । एक दिन वह बाग में फूल चुन रही थी । उस वन में श्रीनिवास (बालाजी) आखेट के लिए गए थे । उन्होंने देखा कि एक हाथी एक युवती के पीछे पड़ा है और डरा रहा है । राजकुमारी के सेवक भाग खड़े हुए । श्रीनिवास ने तीर चलाकर हाथी को रोका और पदमावती की रक्षा की । श्रीनिवास और पदमावती ने एक-दूसरे को देखा और रीझ गए । दोनों के मन में परस्पर अनुराग पैदा हुआ । लेकिन दोनों बिना कुछ कहे अपने-अपने घर लौट गए ।

श्रीनिवास घर तो लौट आए, लेकिन मन पदमावती में ही बस गया । वह पदमावती का पता लगाने के लिए उपाय सोचने लगे । उन्होंने ज्योतिषी का रुप धरा और भविष्य बांचने के बहाने पदमावती को ढूंढने निकल पड़े । धीरे-धीरे ज्योतिषी श्रीनिवास की ख्याति पूरे चोल राज में फैल गयी ।

पदमावती के मन में श्रीनिवास के लिए प्रेम जागृत हुआ । वह भी उनसे मिलने को व्याकुल थीं । किन्तु कोई पता-ठिकाना न होने के कारण उनका मन चिंतित था । इस चिन्ता और प्रेम विरह में उन्होंने भोजन-श्रृंगार आदि का त्याग कर दिया । इसके कारण उसका शरीर कृशकाय होता चला गया । राजा से पुत्री की यह दशा देखी नहीं जा रही थी, वह चिंतित थे । ज्योतिषी की प्रसिद्धि की सूचना राजा को हुई ।

राजा ने ज्योतिषी श्रीनिवास को बुलाया और सारी बात बताकर अपनी कन्या की दशा का कारण बताने को कहा । श्रीनिवास राजकुमारी का हाल समझने पहुंचे तो पदमावती को देखकर प्रसन्न हो गए । उनका उपक्रम सफल हुआ । उन्होंने परदमावती का हाथ अपने हाथ में लिया । कुछ देर तक पढने का स्वांग करने के बाद बोले – “महाराज ! आपकी पुत्री प्रेम के विरह में जल रही है । आप इनका शीघ्र विवाह कर दें तो ये स्वस्थ हो जायेंगी ।”

पदमावती ने अब श्रीनिवास की ओर देखा । देखते ही पहचान लिया । उनके मुख पर प्रसन्नता के भाव आए और वह हँसीं । काफी दिनों बाद पुत्री को प्रसन्न देख राजा को लगा कि ज्योतिषी का अनुमान सही है । राजा ने श्रीनिवास से पूछा – “ज्योतिषी महाराज ! यदि आपको यह पता है कि मेरी पुत्री प्रेम के विरह में पीड़ित है तो आपको यह भी सूचना होगी कि मेरी पुत्री को किससे प्रेम है ? उसका विवाह करने को तैयार हूँ, आप उसका परिचय दें ?

श्रीनिवास ने कहा – “महाराज ! आपकी पुत्री एक दिन वन में फूल चुनने गई थी । एक हाथी ने उन पर हमला किया तो आपके सैनिक और दासियां भाग खड़ी हुईं । राजकुमारी के प्राण एक धनुर्धर ने बचाए थे ।”

राजा ने कहा – “हाँ, मेरे सैनिकों ने बताया था कि एक दिन ऐसी घटना हुई थी । एक वीर पुरुष ने उसके प्राण बचाए थे । लेकिन मेरी पुत्री के प्रेम से उस घटना का क्या तात्पर्य है ?”

श्रीनिवास ने बताया – “महाराज ! आपकी पुत्री को अपनी जान बचाने वाले उसी युवक से प्रेम हुआ है ।” राजा के पूछने पर श्रीनिवास ने कहा – “वह कोई साधारण युवक नहीं, बल्कि शंख चक्रधारी स्वयं भगवान विष्णु ही हैं । इस समय बैकुण्ठ को छोड़कर मानव रुप में श्रीनिवास के नाम से पृथ्वी पर वास कर रहे हैं । आप अपनी पुत्री का विवाह उनसे करें । मैं इसकी सारी व्यवस्था करा दूंगा ।” यह बात सुनकर राजा प्रसन्न हो गए कि स्वयं विष्णु उनके जमाई बनेंगे ।

श्रीनिवास और पदमावती का विवाह तय हो गया । श्रीनिवास रुप में श्रीहरि ने शुकदेव के माध्यम से समस्त देवी-देवताओं को अपने विवाह की सूचना भिजवा दी । शुकदेव की सूचना से सभी देवी-देवता अत्यंत प्रसन्न हुए । देवी-देवता श्रीनिवास जी से मिलने औऱ बधाई देने पृथ्वी पर पहुंचे ।

परन्तु श्रीनिवास जी को खुशी के बीच एक चिंता भी होने लगी । देवताओं ने पूछा – “भगवन ! संसार की चिंता हरने वाले आप इस उत्सव के मौके पर इतने चिंतातुर क्यों हैं ?”

श्रीनिवास जी ने कहा – “चिंता की बात तो है ही, धन का अभाव । महालक्ष्मी ने मुझे त्याग दिया, इस कारण धनहीन हो चुका हूँ । स्वयं महालक्ष्मी ने तप से शरीर त्याग मानव रुप लिया है और पिछली स्मृतियों को गुप्त कर लिया है । इस कारण उन्हें यह सूचना नहीं है कि वह महालक्ष्मी का स्वरुप हैं । वह तो स्वयं को राजकुमारी पदमावती ही मानती हैं । मैंने निर्णय किया है कि जब तक उनका प्रेम पुनः प्राप्त नहीं करता, अपनी माया का उन्हें आभास नहीं कराउंगा । इस कारण मैं एक साधारण मनुष्य का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। और वह हैं, राजकुमारी । राजा की पुत्री से शादी करने और घर बसाने के लिए धन, वैभव और ऐश्वर्य की जरुरत है । वह मैं कहां से लाऊं ?”

स्वयं नारायण को धन की कमी सताने लगी । मानव रुप में आए प्रभु को भी विवाह के लिए धन की आवश्यकता हुई । यही तो ईश्वर की लीला है । जिस रुप में रहते हैं, उस योनि के जीवों के सभी कष्ट सहते हैं । श्रीहरि विवाह के लिए धन का प्रबंध कैसे हो ? इस बात से चिंतित हैं । देवताओं ने जब यह सुना तो उन्हें आश्चर्य हुआ । देवताओं ने कहा – “कुबेर, आवश्यकता के बराबर धन की व्यवस्था कर देंगे ।”

देवताओं ने कुबेर का आह्वान किया तो कुबेर प्रकट हुए । कुबेर ने कहा – “यह तो मेरे लिए प्रसन्नता की बात है कि आपके लिए कुछ कर सकूं । प्रभु ! आपके लिए धन का तत्काल प्रबंध करता हूँ । कुबेर का कोष आपकी कृपा से ही रक्षित है ।”

श्रीहरि ने कुबेर से कहा – “यक्षराज कुबेर ! आपको भगवान भोलेनाथ ने जगत और देवताओं के धन की रक्षा का दायित्व सौंपा है । उसमें से धन मैं अपनी आवश्यकता के हिसाब से लूंगा अवश्य, पर मेरी एक शर्त भी होगी ।”

श्रीहरि कुबेर से धन प्राप्ति की शर्त रख रहे हैं, यह सुनकर सभी देवता आश्चर्य में पड़ गए । श्रीहरि ने कहा – “ब्रह्मा जी और शिव जी साक्षी रहें । कुबेर से धन ऋण के रुप में लूंगा, जिसे भविष्य में ब्याज सहित चुकाऊंगा ।”

श्रीहरि की बात से कुबेर समेत सभी देवता विस्मय में एक-दूसरे को देखने लगे । कुबेर बोले – “भगवन ! मुझसे कोई अपराध हुआ तो उसके लिए क्षमा कर दें । पर, ऐसी बात न कहें । आपकी कृपा से विहीन होकर मेरा सारा कोष नष्ट हो जाएगा ।”

श्रीहरि ने कुबेर को निश्चिंत करते हुए कहा – “आपसे कोई अपराध नहीं हुआ । मैं मानव की कठिनाई का अनुभव करना चाहता हूँ । मानव रुप में उन कठिनाइयों का सामना करुँगा, जो मानव को आती हैं । धन की कमी और ऋण का बोझ सबसे बड़ा होता है ।”

कुबेर ने कहा – “प्रभु ! यदि आप मानव की तरह ऋण पर धन लेने की बात कर रहे हैं तो फिर आपको मानव की तरह यह भी बताना होगा कि ऋण चुकाएंगे कैसे ? मानव को ऋण प्राप्त करने के लिए कई शर्तें झेलनी पड़ती हैं ।”

श्रीनिवास ने कहा – “कुबेर ! यह ऋण मैं नहीं, मेरे भक्त चुकाएंगे । लेकिन मैं उनसे भी कोई उपकार नहीं लूंगा । मैं अपनी कृपा से उन्हें धनवान बनाऊंगा । कलियुग में पृथ्वी पर मेरी पूजा धन, ऐश्वर्य और वैभव से परिपूर्ण देवता के रुप में होगी । मेरे भक्त मुझसे धन, वैभव और ऐश्वर्य की मांग करने आएंगे । मेरी कृपा से उन्हें यह प्राप्त होगा, बदले में भक्तों से मैं दान प्राप्त करूंगा जो चढ़ावे के रुप में होगा । मैं इस तरह आपका ऋण चुकाता रहूंगा ।”

कुबेर ने कहा – “भगवन ! कलियुग में मानव जाति धन के विषय में बहुत विश्वास के योग्य नहीं रहेगी । उन पर आवश्यकता से अधिक विश्वास करना क्या उचित होगा ?”

श्रीनिवास जी बोले – “शरीर त्यागने के बाद तिरुपति के तिरुमाला पर्वत पर बाला जी के नाम से लोग मेरी पूजा करेंगे । मेरे भक्तों की अटूट श्रद्धा होगी । वह मेरे आशीर्वाद से प्राप्त धन में मेरा हिस्सा रखेंगे । इस रिश्ते में न कोई दाता है और न कोई याचक । हे कुबेर ! कलियुग के आखिरी तक भगवान बाला जी धन, ऐश्वर्य और वैभव के देवता बने रहेंगे । मैं अपने भक्तों को धन से परिपूर्ण करूंगा तो मेरे भक्त दान से न केवल मेरे प्रति अपना ऋण उतारेंगे, बल्कि मेरा ऋण उतारने में भी मदद करेंगे । इस तरह कलियुग की समाप्ति के बाद मैं आपका मूलधन लौटा दूंगा ।”

कुबेर ने श्रीहरि द्वारा भक्त और भगवान के बीच एक ऐसे रिश्ते की बात सुनकर उन्हें प्रणाम किया और धन का प्रबंध कर दिया । भगवान श्रीनिवास और कुबेर के बीच हुए समझौते के साक्षी स्वयं ब्रह्मा और शिव जी हैं । दोनों वृक्ष रुप में साक्षी बन गए । आज भी पुष्करणी तीर्थ के किनारे ब्रह्मा और शिव जी बरगद के पेड़ के रुप में साक्षी बनकर खड़े हैं ।

ऐसा कहा जाता है कि निर्माण कार्य के लिए स्थान बनाने के लिए इन दोनों पेड़ों को जब काटा जाने लगा तो उनमें से खून की धारा फूट पड़ी । पेड़ काटना बन्द करके उसकी देवता की तरह पूजा होने लगी ।

इस तरह भगवान श्रीनिवास (बाला जी) और पदमावती (महालक्ष्मी) का विवाह पूरे धूमधाम से हुआ । जिसमें सभी देवगण पधारे । भक्त मन्दिर में दान देकर भगवान पर चढ़ा ऋण उतार रहे हैं, जो कलियुग के अन्त तक जारी रहेगा ।
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S N Vyas

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✨अपने भीतर छिपी शक्तियों को पहचानिये✨

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी, चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये। सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं। दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा नहीं- नहीं हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे। उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा , “न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।”

सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक बुद्धिमान देवता ने कहा क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव -मन की गहराइयों में छिपा दें। चूँकि बचपन से ही उसका मन इधर -उधर दौड़ता रहता है, मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियां उसके भीतर छिपी हो सकती हैं । और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे। बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए। और ऐसा ही किया गया , मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया, इसलिए कहा जाता है मानव मन में अद्भुत शक्तियां निहित हैं।

दोस्तों इस कहानी का सार यह है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर इतनी शक्तियां विद्यमान हैं। अपने अंदर की शक्तियों को पहचानिये, उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंढिए बल्कि अपने अंदर खोजिए और अपनी शक्तियों को निखारिए। हथेलियों से अपनी आँखों को ढंककर अंधकार होने का शिकायत मत कीजिये। आँखें खोलिए ,

S N Vyas

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दीप जल उठे..सास बहु की कहानी
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दफ्तर से आतेआते रात के 8 बज गए थे. घर में घुसते ही प्रतिमा के बिगड़ते तेवर देख श्रवण भांप गया कि जरूर आज घर में कुछ हुआ है वरना मुसकरा कर स्वागत करने वाली का चेहरा उतरा न होता.
सारे दिन महल्ले में होने वाली गतिविधियों की रिपोर्ट जब तक मुझे सुना न देती उसे चैन नहीं मिलता था. जलपान के साथसाथ बतरस पान भी करना पड़ता था. अखबार पढ़े बिना पासपड़ोस के सुखदुख के समाचार मिल जाते थे. शायद देरी से आने के कारण ही प्रतिमा का मूड बिगड़ा हुआ है.
प्रतिमा से माफी मांगते हुए बोला, ‘‘सौरी, मैं तुम्हें फोन नहीं कर पाया. महीने का अंतिम दिन होने के कारण बैंक में ज्यादा काम था.’’
‘‘तुम्हारी देरी का कारण मैं समझ सकती हूं, पर मैं इस कारण दुखी नहीं हूं,’’ प्रतिमा बोली.
‘‘फिर हमें भी तो बताओ इस चांद से मुखड़े पर चिंता की कालिमा क्यों?’’ श्रवण ने पूछा.
‘‘दोपहर को अमेरिका से बड़ी भाभी का फोन आया था कि कल माताजी हमारे पास पहुंच रही हैं,’’ प्रतिमा चिंतित होते हुए बोली.
‘‘इस में इतना उदास व चिंतित होने कि क्या बात है? उन का अपना घर है वे जब चाहें आ सकती हैं.’’ श्रवण हैरानी से बोला.
‘‘आप नहीं समझ रहे. अमेरिका में मांजी का मन नहीं लगा. अब वे हमारे ही साथ रहना चाहती हैं.’’ प्रतिमा ने कहा.
‘‘अरे मेरी चंद्रमुखी, अच्छा है न, घर में रौनक बढ़ेगी, बरतनों की उठापटक रहेगी, एकता कपूर के सीरियलों की चर्चा तुम मुझ से न कर के मां से कर सकोगी. सासबहू मिल कर महल्ले की चर्चाओं में बढ़चढ़ कर भाग लेना,’’ श्रवण चटखारे लेते हुए बोला.
‘‘तुम्हें मजाक सूझ रहा है और मेरी जान सूख रही है,’’ प्रतिमा बोली.
‘‘चिंता तो मुझे होनी चाहिए, तुम सासबहू के शीतयुद्ध में मुझे शहीद होना पड़ता है. मेरी स्थिति चक्की के 2 पाटों के बीच में पिसने वाली हो जाती है. न मां को कुछ कह सकता हूं, न तुम्हें.’’
कुछ सोचते हुए श्रवण फिर बोला, ‘‘मैं तुम्हें कुछ टिप्स देना चाहता हूं. यदि तुम उन्हें अपनाओगी तो तुम्हारी सारी परेशानियां एक झटके में उड़नछू हो जाएंगी.’’
‘‘यदि ऐसा है तो आप जो कहेंगे मैं करूंगी. मैं चाहती हूं मांजी खुश रहें. आप को याद है पिछली बार छोटी सी बात से मांजी नाराज हो गई थीं.’’
‘‘देखो प्रतिमा, जब तक पिताजी जीवित थे तब तक हमें उन की कोई चिंता नहीं
थी. जब से वे अकेली हो गई हैं उन का स्वभाव बदल गया है. उन में असुरक्षा की भावना ने घर कर लिया है. अब तुम ही बताओ, जिस घर में उन का एकछत्र राज था वो अब नहीं रहा. बेटों को तो बहुओं ने छीन लिया. जिस घर को तिनकातिनका जोड़ कर मां ने अपने हाथों से संवारा, उसे पिताजी के जाने के बाद बंद करना पड़ा.
‘‘उन्हें कभी अमेरिका तो कभी यहां हमारे पास आ कर रहना पड़ता है. वे खुद को बंधन में महसूस करती हैं. इसलिए हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जिस में उन्हें अपनापन लगे. उन को हम से पैसा नहीं चाहिए. उन के लिए तो पिताजी की पैंशन ही बहुत है. उन्हें खुश रखने के लिए तुम्हें थोड़ी सी समझदारी दिखानी होगी, चाहे नाटकीयता से ही सही,’’ श्रवण प्रतिमा को समझाते हुए बोला. ‘‘आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करने को तैयार हूं,’’ प्रतिमा ने आश्वासन दिया.
‘‘तो सुनो प्रतिमा, हमारे बुजुर्गों में एक ‘अहं’ नाम का प्राणी होता है. यदि किसी वजह से उसे चोट पहुंचती है, तो पारिवारिक वातावरण प्रदूषित हो जाता है यानी परिवार में तनाव अपना स्थान ले लेता है. इसलिए हमें ध्यान रखना होगा कि मां के अहं को चोट न लगे बस… फिर देखो…’’ श्रवण बोला.
‘‘इस का उपाय भी बता दीजिए आप,’’ प्रतिमा ने उत्सुकता से पूछा.
‘‘हां… हां… क्यों नहीं, सब से पहले तो जब मां आए तो सिर पर पल्लू रख कर चरणस्पर्श कर लेना. रात को सोते समय कुछ देर उन के पास बैठ कर हाथपांव दबा देना. सुबह उठ कर चरणस्पर्श के साथ प्रणाम कर देना,’’ श्रवण ने समझाया.
‘‘यदि मांजी इस तरह से खुश होती हैं, तो यह कोई कठिन काम नहीं है,’’ प्रतिमा ने कहा.
‘‘एक बात और, कोई भी काम करने से पहले मां से एक बार पूछ लेना. होगा तो वही जो मैं चाहूंगा. जो बात मनवानी हो उस बात के विपरीत कहना, क्योंकि घर के बुजुर्ग लोग अपना महत्त्व जताने के लिए अपनी बात मनवाना चाहते हैं. हर बात में ‘जी मांजी’ का मंत्र जपती रहना. फिर देखना मां की चहेती बहू बनते देर नहीं लगेगी,’’ श्रवण ने अपने तर्कों से प्रतिमा को समझाया.
‘‘आप देखना, इस बार मैं मां को शिकायत का कोई मौका नहीं दूंगी.’’
‘‘बस… बस… उन को ऐसा लगे जैसे घर में उन की ही चलती है. तुम मेरा इशारा समझ जाना. आखिर मां तो मेरी ही है. मैं जानता हूं उन्हें क्या चाहिए,’’ कहते हुए श्रवण सोने के लिए चला गया.
प्रतिमा ने सुबह जल्दी उठ कर मांजी के कमरे की अच्छी तरह सफाई करवा दी. साथ ही उन की जरूरत की सभी चीजें भी वहां रख दीं.
हम दोनों समय पर एयरपोर्ट पहुंच गए. हमें देखते ही मांजी की आंखें खुशी से चमक उठीं. सिर ढक कर प्रतिमा ने मां के पैर छुए तो मां ने सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया.
पोते को न देख कर मां ने पूछा, ‘‘अरे तुम मेरे गुड्डू को नहीं लाए?’’
‘‘मांजी वह सो रहा था.’’ प्रतिमा बोली.
‘‘बहू… आजकल बच्चों को नौकरों के भरोसे छोड़ने का समय नहीं है. आएदिन अखबारों में छपता रहता है,’’ मांजी ने समझाते हुए कहा.
‘‘जी मांजी, आगे से ध्यान रखूंगी,’’ प्रतिमा ने मांजी को आश्वासन दिया.
रास्ते भर भैयाभाभी व बच्चों की बातें होती रहीं.
घर पहुंच कर मां ने देखा जिस कमरे में उन का सामान रखा गया है उस में उन की
जरूरत का सारा सामान कायदे से रखा था. 4 वर्षीय पोता गुड्डू दौड़ता हुआ आया और दादी के पांव छू कर गले लग गया.
‘‘मांजी, आप पहले फ्रैश हो लीजिए, तब तक मैं चाय बनाती हूं,’’ कहते हुए प्रतिमा किचन की ओर चली गई.
रात के खाने में सब्जी मां से पूछ कर बनाई गई.
खाना खातेखाते श्रवण बोला, ‘‘प्रतिमा कल आलू के परांठे बनाना, पर मां से सीख लेना तुम बहुत मोटे बनाती हो,’’ प्रतिमा की आंखों में आंखें डाल कर श्रवण बोला.
‘‘ठीक है, मांजी से पूछ कर ही बनाऊंगी.’’ प्रतिमा बोली.
मांजी के कमरे की सफाई भी प्रतिमा कामवाली से न करवा कर खुद करती थी, क्योंकि पिछली बार कामवाली से कोई चीज छू गई थी, तो मांजी ने पूरा घर सिर पर उठा लिया था.
अगले दिन औफिस जाते समय श्रवण को एक फाइल न मिलने के कारण वह बारबार प्रतिमा को आवाज लगा रहा था. प्रतिमा थी कि सुन कर भी अनसुना कर मां के कमरे में काम करती रही. तभी मांजी बोलीं, ‘‘बहू तू जा, श्रवण क्या कह रहा सुन ले.’’
‘‘जी मांजी.’’
दोपहर के समय मांजी ने तेल मालिश के लिए शीशी खोली तो प्रतिमा ने शीशी हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘लाओ मांजी मैं लगाती हूं.’’
‘‘बहू रहने दे. तुझे घर के और भी बहुत काम हैं, थक जाएगी.’’
‘‘नहीं मांजी, काम तो बाद में भी होते रहेंगे. तेल लगातेलगाते प्रतिमा बोली, ‘‘मांजी, आप अपने समय में कितनी सुंदर दिखती होंगी और आप के बाल तो और भी सुंदर दिखते होंगे, जो अब भी कितने सुंदर और मुलायम हैं.’’
‘‘अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, हां तुम्हारे बाबूजी जरूर कभीकभी छेड़ दिया करते थे. कहते थे कि यदि मैं तुम्हारे कालेज में होता तो तुम्हें भगा ले जाता.’’ बात करतेकरते उन के मुख की लालिमा बता रही थी जैसे वे अपने अतीत में पहुंच गई हैं.
प्रतिमा ने चुटकी लेते हुए मांजी को फिर छेड़ा, ‘‘मांजी गुड्डू के पापा बताते हैं कि आप नानाजी के घर भी कभीकभी ही जाती थीं, बाबूजी का मन आप के बिना लगता ही नहीं था. क्या ऐसा ही था मांजी?’’
‘‘चल हट… शरारती कहीं की… कैसी बातें करती है… देख गुड्डू स्कूल से आता होगा,’’ बनावटी गुस्सा दिखाते हुए मांजी नवयौवना की तरह शरमा गईं. शाम को प्रतिमा को सब्जी काटते देख मांजी बोलीं, ‘‘बहू तुम कुछ और काम कर लो, सब्जी मैं काट देती हूं.’’
मांजी रसोईघर में गईं तो प्रतिमा ने मनुहार करते हुए कहा, ‘‘मांजी, मुझे भरवां शिमलामिर्च की सब्जी बनानी नहीं आती, आप सिखा देंगी? ये कहते हैं, जो स्वाद मां के हाथ के बने खाने में है, वह तुम्हारे में नहीं.’’
‘‘हां… हां… क्यों नहीं, मुझे मसाले दे मैं बना देती हूं. धीरेधीरे रसोई की जिम्मेदारी मां ने अपने ऊपर ले ली थी. और तो और गुड्डू की मालिश करना, उसे नहलाना, उसे खिलानापिलाना सब मांजी ने संभाल लिया. अब प्रतिमा को गुड्डू को पढ़ाने के लिए बहुत समय मिलने लगा. इस तरह प्रतिमा के सिर से काम का भार कम हो गया था.’’
साथसाथ घर का वातावरण भी खुशनुमा रहने लगा. श्रवण को प्रतिमा के साथ कहीं घूमने जाना होता तो वह यही कहती कि मां से पूछ लो, मैं उन के बिना नहीं जाऊंगी.
एक दिन पिक्चर देखने का मूड बना. औफिस से आते हुए श्रवण 2 पास ले आया. जब प्रतिमा को चलने के लिए कहा तो वह झट से ऊंचे स्वर में बोल पड़ी, ‘‘मांजी चलेंगी तो मैं चलूंगी अन्यथा नहीं.’’
वह जानती थी कि मां को पिक्चर देखने में कोई रुचि नहीं है.
उन की तूतू, मैंमैं सुन कर मांजी बोलीं, ‘‘बहू, क्यों जिद कर रही हो? श्रवण का मन है तो चली जा. गुड्डू को मैं देख लूंगी.’’ मांजी ने शांत स्वर में कहा.
‘अंधा क्या चाहे दो आंखें’ वे दोनों पिक्चर देख कर वापस आए तो उन्हें खाना तैयार मिला. मांजी को पता था श्रवण को कटहल पसंद है, इसलिए फ्रिज से कटहल निकाल कर बना दिया. चपातियां बनाने के लिए प्रतिमा ने गैस जलाई तो मांजी बोलीं, ‘‘प्रतिमा तुम खाना लगा लो रोटियां मैं सेंकती हूं.’’
‘‘नहीं मांजी, आप थक गई होंगी, आप बैठिए, मैं गरमगरम रोटियां बना कर लाती हूं.’’ प्रतिमा बोली.
‘‘सभी एकसाथ बैठ कर खाएंगे, तुम बना लो प्रतिमा,’’ श्रवण बोला.
एकसाथ सभी को खाना खाते देख मांजी की आंखें नम हो गईं.
श्रवण ने पूछा तो मां बोलीं, ‘‘आज तुम्हारे बाबूजी की याद आ गई. आज वे होते तो तुम सब को देख कर बहुत खुश होते.’’
‘‘मां मन दुखी मत करो,’’ श्रवण बोला.
प्रतिमा की ओर देख कर श्रवण बोला, ‘‘कटहल की सब्जी ऐसे बनती है. सच में मां… बहुत दिनों बाद इतनी स्वादिष्ठ सब्जी खाई है. मां से कुछ सीख लो प्रतिमा…’’
‘‘मांजी सच में सब्जी बहुत स्वादिष्ठ है… मुझे भी सिखाना…’’
‘‘बहू… खाना तो तुम भी स्वादिष्ठ बनाती हो.’’
‘‘नहीं मांजी, जो स्वाद आप के हाथ के बनाए खाने में है वह मेरे में कहां?’’ प्रतिमा बोली.
श्रवण को दीवाली पर बोनस के पैसे मिले तो देने के लिए उस ने प्रतिमा को
आवाज लगाई. प्रतिमा ने आ कर कहा, ‘‘मांजी को ही दीजिए न…’’ श्रवण ने लिफाफा मां के हाथ में रख दिया. मांजी लिफाफे को उलटपलट कर देखते हुए रोमांचित हो उठीं. आज वे खुद को घर की बुजुर्ग व सम्मानित सदस्य अनुभव कर रही थीं. श्रवण व प्रतिमा जानते थे कि मां को पैसों से कुछ लेनादेना नहीं है. न ही उन की कोई विशेष जरूरतें थीं. बस उन्हें तो अपना मानसम्मान चाहिए था.
अब घर में कोई भी खर्चा होता या कहीं जाना होता तो प्रतिमा मां से जरूर पूछती. मांजी भी उसे कहीं घूमने जाने के लिए मना नहीं करतीं. अब हर समय मां के मुख से प्रतिमा की प्रशंसा के फूल ही झरते. दीवाली पर घर की सफाई करतेकरते प्रतिमा स्टूल से जैसे ही नीचे गिरी तो उस के पांव में मोच आ गई. मां ने उसे उठाया और पकड़ कर पलंग पर बैठा कर पांव में मरहम लगाया और गरम पट्टी बांध कर उसे आराम करने को कहा.
यह सब देख कर श्रवण बोला, ‘‘मां मैं ने तो सुना था बहू सेवा करती है सास की, पर यहां तो उलटी गंगा बह रही है.’’
‘‘चुप कर, ज्यादा बकबक मत कर, प्रतिमा मेरी बेटी जैसी है. क्या मैं इस का ध्यान नहीं रख सकती,’’ प्यार से डांटते हुए मां बोली.
‘‘मांजी, बेटी जैसी नहीं, बल्कि बेटी कहो. मैं आप की बेटी ही तो हूं.’’ प्रतिमा की बात सुनते ही मांजी ने उस के सिर पर हाथ रखा और बोलीं, ‘‘तुम सही कह रही हो बहू, तुम ने बेटी की कमी पूरी कर दी.’’
घर में होता वही जो श्रवण चाहता, पर एक बार मां की अनुमति जरूर ली जाती. बेटा चाहे कुछ भी कह दे, पर बहू की छोटी सी भूल भी सास को सहन नहीं होती. इस से सास को अपना अपमान लगता है. यह हमारी परंपरा सी बन चुकी है. जो धीरेधीरे खत्म भी हो रही है.
मांजी को थोड़ा सा मानसम्मान देने के बदले में उसे अच्छी बहू का दर्जा व बेटी का स्नेह मिलेगा, इस की तो उस ने कल्पना ही नहीं की थी. प्रतिमा के घर में हर समय प्यार का, खुशी का वातावरण रहने लगा. दीवाली नजदीक आ गई थी. मां व प्रतिमा ने मिल कर पकवान बनाए.
लगता है इस बार की दीवाली एक विशेष दीवाली रहेगी, सोचतेसोचते श्रवण बिस्तर पर लेटा ही था कि अमेरिका से भैया का फोन आ गया. उन्होंने मां के स्वास्थ्य के बारे में पूछा और बताया कि इस बार मां उन के पास से नाराज हो कर गई हैं. तब से मन बहुत विचलित है.
यह तो हम सभी जानते हैं कि नंदिनी भाभी और मां के विचार कभी नहीं मिले, पर अमेरिका में भी उन का झगड़ा होगा, इस की तो कल्पना भी नहीं की थी. भैया ने बताया कि वे माफी मांग कर प्रायश्चित करना चाहते हैं अन्यथा हमेशा उन के मन में एक ज्वाला सी दहकती रहेगी. आगे उन्होंने जो बताया वह सुन कर तो मैं खुशी से उछल ही पड़ा. बस अब 2 दिन का इंतजार था, क्योंकि 2 दिन बाद दीवाली थी.
इस बार दीवाली पर प्रतिमा ने घर कुछ विशेष प्रकार से सजाया था. मुझे उत्साहित देख कर प्रतिमा ने पूछा, ‘‘क्या बात है, आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं?’’
अपनी खुशी को छिपाते हुए मैं ने कहा, ‘‘तुम सासबहू का प्यार हमेशा ऐसे ही बना रहे बस… इसलिए खुश हूं.’’
‘‘नजर मत लगा देना हमारे प्यार को,’’ प्रतिमा खुश होते हुए बोली.
दीवाली वाले दिन मां ने अपने बक्से की चाबी देते हुए कहा, ‘‘बहू लाल रंग का एक डब्बा है उसे ले आ.’’ प्रतिमा ने जी मांजी कह कर डब्बा ला कर दे दिया. मां ने डब्बा खोला और उस में से खानदानी हार निकाला.
हार प्रतिमा को देते हुए बोलीं, ‘‘लो बहू,
ये हमारा खानदानी हार है, इसे संभालो. दीवाली इसे पहन कर मनाओ, तुम्हारे पिताजी की यही इच्छा थी.’’ हार देते हुए मां की आंखें खुशी से नम हो गईं.
प्रतिमा ने हार ले कर माथे से लगाया और मां के पैर छू कर आशीर्वाद लिया. मुझे बारबार घड़ी की ओर देखते हुए प्रतिमा ने पूछा तो मैं ने टाल दिया. दीप जलाने की तैयारी हो रही थी तभी मां ने आवाज लगा कर कहा, ‘‘श्रवण जल्दी आओ, गुड्डू के साथ फुलझडि़यां भी तो चलानी हैं. मैं साढ़े सात बजने का इंतजार कर रहा था, तभी बाहर टैक्सी रुकने की आवाज आई. मैं समझ गया मेरे इंतजार की घडि़यां खत्म हो गईं.
मैं ने अनजान बनते हुए कहा, ‘‘चलो मां सैलिब्रेशन शुरू करें.’’
‘‘हां… हां… चलो, प्रतिमा… आवाज लगाते हुए कुरसी से उठने लगीं तो नंदिनी भाभी ने मां के चरणस्पर्श किए… आदत के अनुसार मां के मुख से आशीर्वाद की झड़ी लग गई, सिर पर हाथ रखे बोले ही जा रही थीं… खुश रहो, आनंद करो… आदिआदि.’’
भाभी जैसे ही पांव छू कर उठीं तो मां आश्चर्य से देखती रह गईं. आश्चर्य के कारण पलक झपकाना ही भूल गईं. हैरानी से मां ने एक बार भैया की ओर एक बार मेरी ओर देखा. तभी भैया ने मां के पैर छुए तो खुश हो कर भाभी के साथसाथ मुझे व प्रतिमा को भी गले लगा लिया. मां ने भैयाभाभी की आंखों को पढ़ लिया था. पुन: आशीर्वचन देते हुए दीवाली की शुभकामनाएं दीं.
मां की आंखों में खुशी की चमक देख कर लग रहा था दीवाली के शुभ अवसर पर अन्य दीपों के साथ मां के हृदयरूपी दीप भी जल उठे. जिन की ज्योति ने सारे घर को जगमग कर दिया।
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देव शर्मा

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कथा अक्षयवट की
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संगमु सिंहासनु सुठि सोहा।
छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥

गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियों के भी मन को मोहित कर लेता है।

प्रयाग में अक्षयवट की महिमा बहुत प्राचीन होने के साथ-साथ सर्वविदित है। यह यमुना के किनारे किले की चहारदीवारी के अन्दर स्थित है। अग्निपुराण में कहा गया है कि वटवृक्ष के निकट मरने वाला सीधे विष्णु लोक जाता है।

सम्पूर्ण संसार के प्रलय हो जाने पर या भस्म हो जाने पर भी वटवृक्ष नहीं नष्ट होता।

अक्षयवट से किले की चहारदीवारी १५ फीट दूरी पर है। इसकी शाखाएं चहारदीवारी से भूमि पर बाहर भी यमुना नदी में लटकती है। सन १९९२ में अक्षयवट के चारों ओर संगमरमर लगा दिया गया है। १९९९ में अक्षयवट के पास ही एक छॊटा सा मन्दिर बनाया गया है जिसमें राम, लक्ष्मण व सीता की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।

अक्षयवट के मूल भाग पर चारों तरफ वस्ञ लपेटने पर लगभग २२ मीटर कपड़ा लगता है। इस अक्षयवट के पत्तों का अग्रभाग अन्य बरगद के पत्तों की तुलना में नुकीला न होकर गोलापन लिए होता है। पत्ते औसत रूप में छॊटे होते हैं। औरंगजेब ने इस वटवृक्ष को जलाने का प्रयास किया था किन्तु वह सफल नहीं हुआ।

अक्षयवट तीर्थराज प्रयाग का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। पुराण कथाओं के अनुसार यह सृष्टि और प्रलय का साक्ष्य है। नाम से ही जाहिर है कि इसका कभी नाश नहीं होता।

प्रलयकाल में जब सारी धरती जल में डूब जाती है तब भी अक्षयवट हरा-भरा रहता है। बाल मुकुंद का रूप धारण करके भगवान विष्णु इस बरगद के पत्ते पर शयन करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह पवित्र वृक्ष सृष्टि का परिचायक है।

करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दं विनिवशयन्तम्‌।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥

शूलपाणि महेश्वर इस वृक्ष की रक्षा करते हैं, तव वटं रक्षति सदा शूलपाणि महेश्वरः। पद्‌म पुराण में अक्षयवट को तीर्थराज प्रयाग का छत्र कहा गया है-

छत्तेऽमितश्चामर चारुपाणी सितासिते यत्र सरिद्वरेण्ये।
अद्योवटश्छत्रमिवाति भाति स तीर्थ राजो जयति प्रयागः॥

अक्षयवट का धार्मिक महत्व सभी शास्त्र-पुराणों में कहा गया है। चीनी यात्री ह्वेनसांग प्रयागराज के संगम तट पर आया था। उसने अक्षयवट के बारे में लिखा है- नगर में एक देव मंदिर (पातालपुरी मंदिर) है। यह अपनी सजावट और विलक्षण चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है।

कहा जाता है कि जो श्रद्धालु इस स्थान पर एक पैसा चढ़ाता है, उसे एक हजार स्वर्ण मुद्रा चढ़ाने का फल मिलता है। मंदिर के आंगन में एक विशाल वृक्ष (अक्षयवट) है, जिसकी शाखाएं और पत्तियां दूर-दूर तक फैली हैं।

पौराणिक और ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार मुक्ति की इच्छा से श्रद्धालु इस बरगद की ऊंची डालों पर चढ़कर कूद जाते थे।

मुगल शासकों ने यह प्रथा खत्म कर दी। उन्होंने अक्षयवट को भी आम तीर्थयात्रियों के लिए प्रतिबंधित कर दिया। इस वृक्ष को कालान्तर में नुकसान पहुंचाने का विवरण भी मिलता है।

आज का अक्षयवट पातालपुरी मंदिर में स्थित है। यहां एक विशाल तहखाने में अनेक देवताओं के साथ बरगद की शाखा रखी हुई है। इसे तीर्थयात्री अक्षयवट के रूप में पूजते हैं।

अक्षयवट का पहला उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। भारद्वाज ऋषि ने भगवान राम से कहा था- नर श्रेष्ठ तुम दोनों भाई गंगा और यमुना के संगम पर जाना, वहां से पार उतरने के लिए उपयोगी घाट में अच्छी तरह देखभाल कर यमुना के पार उतर जाना।

आगे बढ़ने पर तुम्हें बहुत बड़ा वट वृक्ष मिलेगा। उसके पत्ते हरे रंग के हैं। वह चारों ओर से दूसरे वृक्षों से घिरा हुआ है। उसका नाम श्यामवट है। उसकी छाया में बहुत से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहां पहुंचकर सीता को उस वृक्ष से आशीर्वाद की याचना करनी चाहिए। यात्री की इच्छा हो तो यहां कुछ देर तक रुके या वहां से आगे चला जाए।

अक्षयवट को वृक्षराज और ब्रह्मा, विष्णु, शिव का रूप कहा गया है-

नमस्ते वृक्ष राजाय ब्रह्ममं, विष्णु शिवात्मक।
सप्त पाताल संस्थाम विचित्र फल दायिने॥
नमो भेषज रूपाय मायायाः पतये नमः।
माधवस्य जलक्रीड़ा लोल पल्लव कारिणे॥
प्रपंच बीज भूताय विचित्र फलदाय च।
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नमः॥

         !!  हरि ॐ  !!

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देव शर्मा

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शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और कच की कथा,,,,

राजा जनमेजय ने पुछा… “ब्राह्मण ! हमारे पूर्वज राजा ययाती प्रजापति से दसवें पुरुष* थे। उन्होंने शुक्राचर्य की पुत्री देवयानी, जो की ब्राह्मणी थी, उनसे विवाह किया था। यह अनहोनी बात कैसे हुई? आप कृपया करके हमें इसकी कहानी सुनाएँ।”

वैशम्पायन जी कहतें हैं… जनमेजय आपके पूर्वज राजा ययाति ने शुक्राचार्य और वृषपर्वा* की पुत्रियों से कैसे विवाह किया था, इसका वृतांत मैं अब तुम्हे सुनाता हूँ। सुनिए….

उस समय देवताओं और दानवों में त्रिलोक पे अधिकार के लिए युद्ध चल रहा था। देवताओं के गुरु थे आङ्गिरस बृहस्पति और असुरों ने भार्गव शुक्राचर्य को अपना गुरु बनाया था। ये दोनों ब्राह्मण आपस में बड़ी होड़ रखते थे।

जब युद्ध में देवताओं ने असुरों को मार दिया, तो, शुक्राचार्य ने जो संजीवनी विद्या जानते थे, उन्होंने, उसका उपयोग कर युद्ध में मृत असुरों को जीवित कर दिया। बृहस्पति को संजीवनी विद्या नहीं आती थी। इस कारण असुरों ने जिन देवताओं को युद्ध में मारा था, उन्हें बृहस्पति जीवित नहीं कर पाये।

इस समस्या के समाधान के लिए देवता, कच, जो की बृहस्पति के पुत्र थे, उनके पास गए और उनसे आग्रह किया…

“भगवन! आप शुक्राचार्य के पास जाकर उनसे संजीवनी विद्या सीख लीजिये। वो आजकल वृषपर्वा के साथ रहते हैं। हम इसके लिए आपको यज्ञ में भागीदार बना लेंगे।”

देवताओं की बात सुनकर कच शुक्राचार्य के पास गए और उनसे कहा… “महाराज! मैं महर्षि अङ्गिरा का पौत्र और देवगुरु बृहस्पति का पुत्र कच हूँ। मैं आपकी शरण में रहकर, एक हज़ार वर्षों तक, आपकी सेवा करना चाहता हूँ। आप कृपया मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिये…”

इस पर शुक्राचार्य ने कहा… “मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ। तुम बृहस्पति के पुत्र हो, तुम्हारा सत्कार करना मैं समझता हूँ, बृहस्पति के सत्कार करने के सामान है….”

इसके बाद कच ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए, वहीं रह कर, शुक्राचार्य की सेवा करने लगे। वो गुरु शुक्राचार्य को तो प्रसन्न रखते हीं, साथ में, गुरुपुत्री देवयानी को भी अपनी सेवा से प्रसन्न रखते। इस तरह 500 वर्ष बीत गए।

फिर असुरों को कच के वहां रहने के कारण पता चल गया। बृहस्पति से द्वेष में और संजीवनी विद्या की रक्षा के लिए, एक दिन, चिढ़ कर, असुरों ने कच को, जब वो गायों को चराने के लिए जंगल गया था, मारकर उसके मृत शरीर के टुकड़े टुकड़े कर भेड़ियों को खिला दिया।

संध्या में जब गायें बिना कच के वापस आ गयी तब देवयानी को अनिष्ठ की आशंका हुई। उसने घबड़ाकर शुक्राचार्य से कहा ….

“पिताजी। आपने अग्निहोत्र कर लिया, सूर्यास्त हो गया, देखिये किन्तु गायें बिना अपने रक्षक के हीं लौट आयीं। कहीं कच के साथ कुछ अनिष्ठ तो नहीं हो गया!! पिताजी!! मैं सौगंध खा कर कहती हूँ मैं कच के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकती हूँ।”

शुक्राचार्य ने कहा… “तू घबराती क्यों है। मैं अभी उसे जीवित किये देता हूँ।”

शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग कर के कच को पुकारा…. “आओ बेटा !!”

कच का एक एक अंग भेड़ियों को छेदते हुए बाहर निकल आया और इस तरह कच दुबारा जीवित होकर वापस शुक्राचार्य की सेवा में उपस्थित हो गया।

देवयानी के पूछने पर उसने सारा वृतान्त उसे सुना दिया। एक-दो बार और असुरों ने उसे मार डाला। पर हर बार शुक्राचार्य उसे जीवित कर देतें।

अगली बार असुरों ने कच को मारकर उसके टुकड़े टुकड़े कर उसे जला दिया, और, राख को वारुणी में मिलाकर शुक्राचार्य को पीला दिया।

जब कच नहीं लौटा तो फिर देवयानी फिर शुक्राचार्य के पास गयी और कहा…

“पिताजी कच फूल लेने गया था, मगर अब तक नहीं लौटा। कहीं वो फिर मर तो नहीं गया। मैं सच बोलती हूँ, उसके बिना, मैं एक पल भी, जीवित नहीं रह सकती!!”

शुक्राचार्य ने कहा… “बेटी मैं क्या करूँ। ये असुर उसे बार बार मार देते हैं!!!”

देवयानी के हठ करने पर शुक्राचार्य ने पुनः संजीवनी विद्या का प्रयोग कर उसे आवाज दी।

इस पर कच ने डरते-डरते पेट के अंदर से हीं धीमी आवाज़ में अपनी स्थिति बतायी।

शुक्राचार्य ने उसकी आवाज़ सुनकर कहा… बेटा! तुम सिद्ध हो, तभी, अब तक, मेरे पेट के अंदर जीवित हो। अगर तुम इंद्र नहीं हो, तो, लो! मैं तुम्हे अपनी संजीवनी विद्या सीखाता हूँ। निष्चित रूप से तुम इंद्र नहीं, ब्राह्मण हो तभी तुम इतनी देर तक मेरे पेट के अंदर जीवित हो!! तुम ये विद्या मुझसे सीख कर मेरा पेट फाड़कर बाहर निकल आओ, और, फिर संजीवनी विद्या से तुम मुझे जीवित कर देना।

कच ने कहा…. “मैं आपके पेट में रहा हूँ और अब आपके पुत्र के सामान हूँ। निश्चित रूप से मैं आपसे कृतघ्नता नहीं करूँगा। जो वेदगामि गुरु का आदर नहीं करता, वो नरक का भागी होता है।”

शुक्राचार्य को यह जानकार बड़ा क्रोध हुआ कि धोखे में शराब पीने के कारण उनका विवेक इतना मर गया कि वो ब्राह्मणकुमार कच को हीं पी गए। इस दिन के बाद से शुक्राचार्य ने ब्राह्मणों के लिए यह मर्यादा बनाई कि अगर आज के बाद कोई भी ब्राह्मण शराब पियेगा, तो उसका धर्म-भ्रस्ट हो जाएगा। उसे ब्रह्महत्या का पाप लगेगा और इस लोक में तो वो कलंकित होगा हीं, उसका परलोक भी बिगड़ जाएगा।

इसके बाद कच ने फिर एक हजार वर्ष तक शुक्राचार्य की सेवा की। इसके बाद वो वापस लौटने लगे। तब देवयानी ने उनसे कहा…

“अब तुम स्नातक हो गए। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, अब तुम मेरे पिता से कहकर विधिपूर्वक मेरा पाणिग्रहण करो।”

इस पर कच ने कहा… “तुम्हारे पिता मेरे गुरु हैं, वो मेरे पिता सामान हैं, हम दोनों उनके अंदर रह चुके हैं, मैं तुम्हारे साथ बहुत वात्सल्य के साथ गुरु के घर में रहा हूँ, तुम मेरी बहन के सामान हो। तुम मुझे पवित्र भाव से, जब चाहो, याद कर लो, मैं आ जाऊँगा और अब तुम मुझे वापस लौटने का आशीर्वाद दो और यहाँ रहकर सावधानी से मेरे गुरु और अपने पिता की सेवा करो।”

देवयानी ने कहा… मैंने तुमसे प्रेम निवेदन किया था, यदि तुम धर्म और काम की खातिर मेरा त्याग करते हो, तो जाओ, तुम्हारी संजीवनी विद्या कभी सफल नहीं होगी।

इस पर कच ने कहा… मैंने तुम्हे गुरुपुत्री होने के कारण स्वीकार नहीं किया था, कोई दोष देखकर नहीं। मेरे गुरु ने भी मुझे ऐसी कोई आज्ञा नहीं दी थी। तुम्हारी जो इच्छा हो श्राप दे दो, मगर, मैंने तो सिर्फ ऋषि धर्म का पालन किया है। मैं श्राप के योग्य नहीं था, फिर भी काम के वश में होकर तुमने मुझे श्राप दिया है, जाओ अब तुम्हे कोई ब्राह्मण पुत्र स्वीकार नहीं करेगा। मेरी विद्या भले सफल न हो, पर जिसे मैं सिखाऊंगा उसकी विद्या तो सफल होगी!!!”

इतना कहकर कच वापस स्वर्गलोग आ गएँ। वहां उनका बहुत सत्कार हुआ। उन्हें देवताओं ने यज्ञ का भागिदार बनाया और यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया।

संजय गुप्ता

Posted in ज्योतिष - Astrology

पीपल की पूजा क्यों की जाती है?????

हमारे देश में प्रत्‍येक मन्दिर में पीपल की पूजा होती है। पीपल की पूजा क्‍यों होती है? यह प्रश्न ऐसा है जिसका उत्तर सभी जानना चाहते हैं।

आज इस बात की चर्चा करेंगे जिससे कि आप यह जान सकें कि पीपल की पूजा क्यों होती है। एक कथा लोक चर्चित हैं जो इस प्रश्न का उत्तर स्वतः बता देती है।

अगस्त्य ऋषि तीर्थयात्रा के उद्देश्य से दक्षिण दिशा में अपने शिष्यों के साथ गोमती नदी के तट पर पहुंचे और सत्रयाग की दीक्षा लेकर एक वर्ष तक यज्ञ करते रहे।

उस समय स्वर्ग पर राक्षसों का राज था। कैटभ नामक राक्षस अश्वत्थ और पीपल वृक्ष का रूप धारण करके ब्राह्मणों द्वारा आयोजित यज्ञ को नष्ट कर देता था।

जब कोई ब्राह्मण इन वृक्षों की समिधा के लिए टहनियां तोड़ने वृक्षों के पास जाता तो यह राक्षस उसे खा जाता और ऋषियों का पता भी नहीं चलता।

धीरे-धीरे ऋषि कुमारों की संख्या कम होने लगी। तब दक्षिण तीर पर तपस्या रत मुनिगण सूर्य पुत्र शनि के पास गए और उन्हें अपनी समस्या बतायी।

शनि ने विप्र का रूप धारण किया और पीपल के वृक्ष की प्रदक्षिणा करने लगा। अश्वत्थ राक्षस उसे साधारण विप्र समझकर निगल गया।

शनि अश्वत्थ राक्षस के पेट में घूमकर उसकी आंतों को फाड़कर बाहर निकल आया।
शनि ने यही हाल पीपल नामक राक्षस का किया। दोनों राक्षस नष्ट हो गए। ऋषियों ने शनि का स्तवन कर उसे खूब आशीर्वाद दिया।

तब शनि ने प्रसन्न होकर कहा-अब आप निर्भय हो जाओ। मेरा वरदान है कि जो भी व्यक्ति शनिवार के दिन पीपल के समीप आकर स्नान, ध्यान व हवन व पूजा करेगा और प्रदिक्षणा कर जल से सींचेगा। साथ में सरसों के तेल का दीपक जलाएगा तो वह ग्रहजन्य पीडा से मुक्त हो जाएगा।

अश्वत्थ अर्थात्‌ पीप के वृक्ष में भगवान्‌ विष्णु का निवास माना जाता है।

गीता में भगवान्‌ कृष्ण ने कहा कि वृक्षों मे मैं अश्वत्थ वृक्ष हूँ।

शनि के उक्त वरदान के बाद भारत में पीपल की पूजा-अर्चना होने लगी।

अमावस के शनिवार को उस पीपल पर जिसके नीचे हनुमान स्थापित हों पर जाकर दर्शन व पूजा करने से शनि जन्य दोषों से मुक्ति मिलती है।

सामान्यतः बिना नागा प्रतिदिन पीपल के वृक्ष की जड़ पर जल चढ़ाने से या उसकी सेवा करने से बृहस्पति देव प्रसन्न होते हैं और मनोकांक्षा पूर्ण करते हैं।

एक कथा और प्रचलित है। पिप्पलाद मुनि के पिता का बालयावस्था में ही देहान्त हो गया था।
यमुना नदी के तट पर पीपल की छाया में तपस्या रत पिता की अकाल मृत्यु का कारण शनिजन्य पीड़ा थी।

उनकी माता ने उसे अपने पति की मृत्यु का एकमात्र कारण शनि का प्रकोप बताया।
मुनि पिप्पलाद जब वयस्क हुए। उनकी तपस्या पूर्ण हो गई तब माता से सारे तथ्य जानकर पितृहन्ता शनि के प्रति पिप्पलाद का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने तीनों लोकों में शनि को ढूंढना प्रारम्भ कर दिया।

एक दिन अकस्मात पीपल वृक्ष पर शनि के दर्शन हो गए। मुनि ने तुरन्त ब्रह्मदण्ड उठाया और उसका प्रहार शनि पर कर दिया।
शनि यह भीषण प्रहार सहन करने में असमर्थ थे। वे भागने लगे। ब्रह्मदण्ड ने उनका तीनों लोकों में पीछा किया और अन्ततः भागते हुए शनि के दोनों पैर तोड़ डाले। शनि विकलांग हो गए।

उन्होंने शिव जी से प्रार्थना की। शिवजी प्रकट हुए और पिप्पलाद मुनि से बोले- शनि ने सृष्टि के नियमों का पालन किया है। उन्होंने श्रेष्ठ न्यायाधीश सदृश दण्ड दिया है। तुम्हारे पिता की मृत्यु पूर्वजन्म कृत पापों के परिणाम स्वरूप हुई है। इसमें शनि का कोई दोष नहीं है। शिवजी से जानकर पिप्पलाद मुनि ने शनि को क्षमा कर दिया।

तब पिप्लाद मुनि ने कहा-जो व्यक्ति इस कथा का ध्यान करते हुए पीपल के नीचे शनि देव की पूजा करेगा। उसके शनि जन्य कष्ट दूर हो जाएंगे। पिप्पलेश्वर महादेव की अर्चना शनि जनित कष्टों से मुक्ति दिलाती है।

पीपल की उपासना शनिजन्य कष्टों से मुक्ति पाने के लिए की जाती है। यह सत्य है और अनुभूत है। आप शनि पीड़ा से पीड़ित हैं तो सात शनिश्चरी अमावस को या सात शनिवार पीपल की उपासना कर उसके नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएंगे तो आप कष्ट मुक्त हो जाएंगे।

संजय गुप्त