Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

प्रेरक प्रसंग

हीन कौन ?

  एक बार ईरानी सन्त शेख सादी मक्का की ओर पैदल जा रहे थे ।  गर्मी के दिन थे और उनके पैर तप्त बालुका से जले जा रहे थे; जबकि अन्य यात्री घोड़ों, खच्चरों और ऊँटों पर यात्रा कर रहे थे ।  यह देख उनके मन में विचार उठा कि अल्लाह भी सबको समान दृष्टि से नहीं देखता, तभी तो प्रत्येक यात्री वाहनों पर चढ़कर जा रहा है जबकि उन्हें पैदल ही जाना पड़ रहा है ।
  इतने में उन्हें एक फकीर, जिसके दोनों पैर कटे हुए थे, हाथ और जाँघ के बल चलता हुआ दिखाई दिया ।  उन्हें यह देख बड़ी ही करुणा हुई; साथ ही पश्चाताप भी हुआ कि थोड़ी ही देर पूर्व वे व्यर्थ में ही अल्लाह को कोस रहे थे ।  वे मन ही मन बोले,  "या खुदा !  तूने मुझे सहस्त्रों में हीन बनाया, किन्तु एक पंगु फकीर से तो निश्चित ही तो तूने भला बनाया ।  मुझे माफ कर, जो तेरी करनी के बाबत मेरे मन में कुविचार उत्पन्न हुए थे ।"

अनूप सिन्हा

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🌹 श्री राधे राधे जी 👏

दुश्मन का स्वार्थ

एक पर्वत के समीप बिल में मंदविष नामक एक बूढा सांप रहता था। अपनी जवानी में वह बडा रौबीला सांप था। जब वह लहराकर चलता तो बिजली-सी कौंध जाती थी पर बुढापा तो बडे-बडों का तेज हर लेता हैं।बुढापे की मार से मंदविष का शरीर कमजोर पड गया था। उसके विषदंत हिलने लगेथे और फुफकारते हुए दम फूल जाता था। जो चूहे उसके साए से भी दूर भागते थे, वे अब उसके शरीर को फांदकर उसे चिढाते हुए निकल जाते। पेट भरने के लिए चूहों के भी लाले पड गए थे। मंदविष इसी उधेडबुन में लगा रहता कि किस प्रकार आराम से भोजन का स्थाई प्रबंध किया जाए। एक दिन उसे एक उपाय सूझा और उसे आजमाने के लिए वह दादुर सरोवर के किनारे जा पहुंचा। दादुर सरोवर में मेढकों की भरमार थी। वहां उन्हीं का राज था। मंदविष वहां इधर-उधर घूमने लगा। तभी उसे एक पत्थर पर मेढकों का राजा बैठा नजर आया। मंदविष ने उसे नमस्कार किया “महाराज की जय हो।”

मेढकराज चौंका “तुम! तुम तो हमारे बैरी हो। मेरी जय का नारा क्यों लगा रहे हो?”

मंदविष विनम्र स्वर में बोला “राजन, वे पुरानी बातें हैं। अब तो मैं आप मेढकों की सेवा करके पापों को धोना चाहता हूं। श्राप से मुक्ति चाहता हूं। ऐसा ही मेरे नागगुरु का आदेश हैं।”

मेढकराज ने पूछा “उन्होंने ऐसा विचित्र आदेश क्यों दिया?”

मंदविष ने मनगढंत कहानी सुनाई “राजन्, एक दिन मैं एक उद्यान में घूम रहा था। वहां कुछ मानव बच्चे खेल रहे थे। गलती से एक बच्चे का पैर मुझ पर पड गया और बचाव स्वाभववश मैंने उसे काटा और वह बच्चा मर गया। मुझे सपने में भगवान श्रीकॄष्ण नजर आए और श्राप दिया कि मैं वर्ष समाप्त होते ही पत्थर का हो जाऊंगा। मेरे गुरुदेव ने कहा कि बालक की मॄत्यु का कारण बन मैंने कॄष्णजी को रुष्ट कर दिया हैं,क्योंकि बालक कॄष्ण का ही रुप होते हैं। बहुत गिडगिडाने पर गुरुजी ने श्राप मुक्ति का उपाय बताया। उपाय यह हैं कि मैं वर्ष के अंत तक मेढकों को पीठ पर बैठाकर सैर कराऊं।”

मंदविष कि बात सुनकर मेढकराज चकित रह गया। सांप की पीठ पर सवारी करने का आज तक किस मेढक को श्रैय प्राप्त हुआ? उसने सोचा कि यह तो एक अनोखा काम होगा। मेढकराज सरोवर में कूद गया और सारे मेढकों को इकट्ठा कर मंदविष की बात सुनाई। सभी मेढक भौंचक्के रह गए।

एक बूढा मेढक बोला “मेढक एक सर्प की सवारे करें। यह एक अदभुत बात होगी। हम लोग संसार में सबसे श्रेष्ठ मेढक माने जाएंगे।”

एक सांप की पीठ पर बैठकर सैर करने के लालच ने सभी मेढकों की अक्ल पर पर्दा डाल दिया था। सभी ने ‘हां’ में ‘हां’ मिलाई। मेढकराज ने बाहर आकर मंदविष से कहा “सर्प, हम तुम्हारी सहायता करने के लिए तैयार हैं।”

बस फिर क्या था। आठ-दस मेढक मंदविष की पीठ पर सवार हो गए और निकली सवारी। सबसे आगे राजा बैठा था। मंदविष ने इधर-उधर सैर कराकर उन्हेण् सरोवर तट पर उतार दिया। मेढक मंदविष के कहने पर उसके सिर पर से होते हुए आगे उतरे। मंदविष सबसे पीछे वाले मेढक को गप्प खा गया। अब तो रोज यही क्रम चलने लगा। रोज मंदविष की पीठ पर मेढकों की सवारी निकलती और सबसे पीछे उतरने वाले को वह खा जाता।

एक दिन एक दूसरे सर्प ने मंदविष को मेढकों को ढोते द्ख लिया। बाद में उसने मंदविष को बहुत धिक्कारा “अरे!क्यों सर्प जाति की नाक कटवा रहा हैं?”

मंदविष ने उत्तर दिया “समय पडने पर नीति से काम लेना पडता हैं। अच्छे-बुरे का मेरे सामने सवाल नहीं हैं। कहते हैं कि मुसीबत के समय गधे को भी बाप बनाना पडे तो बनाओ।”

मंदविष के दिन मजे से कटने लगे। वह पीछे वाले वाले मेढक को इस सफाईसे खा जाता कि किसी को पता न लगता। मेढक अपनी गिनती करना तो जानते नहीं थे, जो गिनती द्वारा माजरा समझ लेते।

एक दिन मेढकराज बोला “मुझे ऐसा लग र्हा हैं कि सरोवर में मेढक पहले से कम हो गए हैं। पता नहीं क्या बात हैं?”

मंदविष ने कहा “हे राजन, सर्प की सवारी करने वाले महान मेढक राजा के रुप में आपकी ख्याति दूर-दूर तक पहुंच रही हैं। यहां के बहुत से मेढक आपका यश फैलाने दूसरे सरोवरों, तलों व झीलों में जा रहे हैं।”

मेढकराज की गर्व से छाती फूल गई। अब उसे सरोवर में मेढकों के कम होने का भी गम नहीं था। जितने मेढक कम होते जाते, वह यह सोचकर उतना ही प्रसन्न होता कि सारे संसार में उसका झंडा गड रहा हैं।

आखिर वह दिन भी आया, जब सारे मेढक समाप्त हो गए। केवल मेढकराज अकेला रह गया। उसने स्वयं को अकेले मंदविष की पीठ पर बैठा पाया तो उसने मंदविष से पूछा “लगता हैं सरोवर में मैं अकेला रह गया हूं। मैं अकेला कैसे रहूंगा?”

मंदविष मुस्कुराया “राजन, आप चिन्ता न करें। मैं आपका अकेलापन भी दूर कर दूंगा।”

ऐसा कहते हुए मंदविष ने मेढकराज को भी गप्प से निगल लिया और वहीं भेजा जहां सरोवर के सारे मेढक पहुंचा दिए गए थे।

सीखः शत्रु की बातों पर विश्वास करना अपनी मौत को दावत देना हैं।

श्री हरी आपका दिन मंगलमय् करें – 🌅👏

🌹 श्री हरे कृष्णा जी 👏

ज्योति अग्रवाल

Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

#DeviLakshmi

Lakshmi Beej Mantra |
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ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥
Om Hreem Shreem Lakshmibhayo Namah॥

Mahalakshmi Mantra |
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ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥
Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseed Praseed
Om Shreem Hreem Shreem Mahalakshmaye Namah॥

Lakshmi Gayatri Mantra |
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ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥
Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe Vishnu Patnyai Cha Dheemahi
Tanno Lakshmi Prachodayat Om॥
🌹 🙏 🌹
।। जय माँ देवी महालक्ष्मी ।।

Posted in ज्योतिष - Astrology

वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। प्राचीन काल में वास्तुकला सभी कलाओं की जननी कही जाती थी। आज भी जितने भवन और बिल्डिंग आदि बन रही है अधिकांश में वास्तु के हिसाब से बनाया जा रहा है ,
आइये जानते है वास्तु के कुछ नियम :-वास्तु तीन प्रकार के होते हैं-
आवासीय – मकान एवं फ्लैट त्र व्यावसायिक -व्यापारिक एवं औद्योगिक त्र धार्मिक- धर्मशाला, जलाशय एवं धार्मिक संस्थान। वास्तु में भूमि का विशेष महत्व है। भूमि चयन करते समय भूमि या मिट्टी की गुणवत्ता का विचार कर लेना चाहिए। भूमि परीक्षण के लिये भूखंड के मध्य में भूस्वामी के हाथ के बराबर एक हाथ गहरा, एक हाथ लंबा एवं एक हाथ चौड़ा गड्ढा खोदकर उसमें से मिट्टी निकालने के पश्चात् उसी मिट्टी को पुनः उस गड्ढे में भर देना चाहिए। ऐसा करने से यदि मिट्टी शेष रहे तो भूमि उत्तम, यदि पूरा भर जाये तो मध्यम और यदि कम पड़ जाये तो अधम अर्थात् हानिप्रद है। अधम भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार पहले के अनुसार नाप से गड्ढा खोद कर उसमें जल भरते हैं, यदि जल उसमें तत्काल शोषित न हो तो उत्तम और यदि तत्काल शोषित हो जाए तो समझें कि भूमि अधम है।
भूमि के खुदाई में यदि हड्डी, कोयला इत्यादि मिले तो ऐसे भूमि पर भवन नहीं बनाना चाहिए।
यदि खुदाई में ईंट पत्थर निकले तो ऐसा भूमि लाभ देने वाला होता है।

भूमि का परीक्षण बीज बोकर भी किया जाता है। जिस भूमि पर वनस्पति समय पर उगता हो और बीज समय पर अंकुरित होता हो तो वैसा भूमि उत्तम है। जिस भूखंड पर थके होकर व्यक्ति को बैठने से शांति मिलती हो तो वह भूमि भवन निर्माण करने योग्य है। वास्तु शास्त्र में भूमि के आकार पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है
वर्गाकार भूमि सर्वोत्तम, आयताकार भी शुभ होता है। इसके अतिरिक्त सिंह मुखी एवं गोमुखि भूखंड भी ठीक होता है। सिंह मुखी व्यावसायिक एवं गोमुखी आवासीय दृष्टि उपयोग के लिए ठीक होता है।
किसी भी भवन में प्राकृतिक शक्तियों का प्रवाह दिशा के अनुसार होता है अतः यदि भवन सही दिशा में बना हो तो उस भवन में रहने वाला व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों का सही लाभ उठा सकेगा, किसकी भाग्य वृद्धि होगी।
किसी भी भवन में कक्षों का दिशाओं के अनुसार स्थान इस प्रकार होता है जैसे :-

पूजा कक्ष – ईशान कोण,
स्नान घर- पूर्व
रसोई घर-आग्नेय,
मुखिया का शयन कक्ष- दक्षिण,
युवा दम्पति का शयन कक्ष वायव्य कोण एवं उत्तर के बीच,
बच्चों का कक्ष वायव्य एवं पश्चिम,
अतिरिक्त कक्ष- वायव्य,
भोजन कक्ष-पश्चिम
अध्ययन कक्ष- पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच,
कोषागार- उत्तर एवं स्टोर- र्नैत्य कोण
जल कूप या बोरिंग-उत्तर दिशा या ईशान कोण,
सीढ़ी घर – र्नैत्य कोण, जल कूप या बोरिंग – उत्तर दिशा या ईशान कोण,
सीढ़ी घर- नै र्त्य कोण,
शौचालय- पश्चिम या उत्तर पश्चिम (वायव्य)
अविवाहित कन्याओं के लिये शयन कक्ष-वायव्य।

भवन में सबसे आवश्यक कक्ष पूजा घर है।
ईशान कोण पूर्व एवं उत्तर से प्राप्त होने वाली उर्जा का क्षेत्र है। इस कोण के अधिपति शिव हैं, जो व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्रदान करते हैं।
प्रातः कालीन सूर्य की किरणें सर्वप्रथम ईशान कोण पर पड़ती है। इन किरणों में निहित अल्ट्रॉवायलेट किरणों में इतनी शक्ति होती है कि वे स्थान को कीटाणुमुक्त कर पवित्र बनाते हैं। पवित्र स्थान पर पूजा करने से व्यक्ति का ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित होता है जिससे शरीर में स्फूर्ति, शक्ति का संचार होता है साथ ही भाग्य बली होता है।

आग्नेय कोण में अग्नि के देवता के स्थित होने से भोजन को तैयार करने में सहायता मिलती है एवं भोजन स्वादिष्ट होता है। भोजन बनाते समय गृहणी का मुख पूर्व दिशा में होना चाहिये इसका कारण यह है कि पूर्व दिशा से आने वाली सकारात्मक ऊर्जा गृहणी को शक्ति प्रदान करती है।

ईशान कोण में रसोई नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह जल के क्षेत्र हैं। जल तथा अग्नि में परस्पर शत्रुता है। र्नैत्य कोण में रसोई बनाने से परस्पर शत्रुता पारिवारिक कष्ट एवं अग्नि से दुर्घटनाओं का भय तथा जन-धन की हानि होती है। दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं तथा ग्रह मंगल हैं। यम का स्वभाव आलस्य एवं निद्रा को उत्तन्न करता है। सोने से पहले मनुष्य के शरीर से आलस्य एवं निद्रा की उत्पत्ति होने से मनुष्य को अच्छी नींद आती है। भरपूर नींद के बाद शरीर फिर से तरोताजा हो जाता है। इसीलिए परिवार के मुखिया का शयन कक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए।

अतिथि गृह का वायव्य कोण में होना लाभप्रद है। इस दिशा के स्वामी वायु होते हैं तथा ग्रह चंद्रमा। वायु एक जगह नहीं रह सकते तथा चंद्रमा का प्रभाव मन पर पड़ता है। अतः वायव्य कोण में अतिथि गृह होने पर अतिथि कुछ ही समय तक रहता है तथा पूर्व आदर-सत्कार पाकर लौट जाता है, जिससे परिवारिक मतभेद पैदा नहीं होते।

वास्तु शास्त्र के आर्षग्रन्थों में बृहत्संहिता के बाद वशिष्ठसंहिता की भी बड़ी मान्यता है तथा दक्षिण भारत के वास्तु शास्त्री इसे ही प्रमुख मानते हैं। इस संहिता ग्रंथ के अनुसार विशेष वशिष्ठ संहिता के अनुसार अध्ययन कक्ष निवृत्ति से वरुण के मध्य होना चाहिए। वास्तु मंडल में निऋति एवं वरुण के मध्य दौवारिक एवं सुग्रीव के पद होते हैं। दौवारिक का अर्थ होता है पहरेदार तथा सुग्रीव का अर्थ है सुंदर कंठ वाला। दौवारिक की प्रकृति चुस्त एवं चौकन्नी होती है। उसमें आलस्य नहीं होती है। अतः दौवारिक पद पर अध्ययन कक्ष के निर्माण से विद्यार्थी चुस्त एवं चौकन्ना रहकर अध्ययन कर सकता है तथा क्षेत्र विशेष में सफलता प्राप्त कर सकता है।

पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच अध्ययन कक्ष के प्रशस्त मानने के पीछे एक कारण यह भी है कि यह क्षेत्र गुरु, बुध एवं चंद्र के प्रभाव क्षेत्र में आता है। बुध बुद्धि प्रदान करने वाला, गुरु ज्ञान पिपासा को बढ़ाकर विद्या प्रदान करने वाला ग्रह है।चंद्र मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है। अतः इस स्थान पर विद्याभ्यास करने से निश्चित रूप से सफलता मिलती है। टोडरमल ने अपने ‘वास्तु सौखयम्’ नामक ग्रंथ में वर्णन किया है कि उत्तर में जलाशय जलकूप या बोरिंग करने से धन वृद्धि कारक तथा ईशान कोण में हो तो संतान वृद्धि कारक होता है। राजा भोज के समयंत्रण सूत्रधार में जल की स्थापना का वर्णन इस प्रकार किया-‘पर्जन्यनामा यश्चाय् वृष्टिमानम्बुदाधिप’। पर्जन्य के स्थान पर कूप का निर्माण उत्तम होता है, क्योंकि पर्जन्य भी जल के स्वामी हैं।

विश्वकर्मा भगवान ने कहा है कि र्नैत्य, दक्षिण, अग्नि और वायव्य कोण को छोड़कर शेष सभी दिशाओं में जलाशय बनाना चाहिये। तिजोरी हमेशा उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त आग्नेय दक्षिणा, र्नैत्य पश्चिम एवं वायव्य कोण में धन का तिजोरी रखने से हानि होता है। ड्राईंग रूम को हमेशा भवन के उत्तर दिशा की ओर रखना श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उत्तर दिशा के स्वामी ग्रह बुध एवं देवता कुबेर हैं। वाणी को प्रिय, मधुर एवं संतुलित बनाने में बुध हमारी सहायता करता है। वाणी यदि मीठी और संतुलित हो तो वह व्यक्ति पर प्रभाव डालती है और दो व्यक्तियों के बीच जुड़ाव पैदा करती है।
र्नैत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में वास्तु पुरुष के पैर होते हैं। अतः इस दिशा में भारी निर्माण कर भवन को मजबूती प्रदान किया जा सकता है, जिससे भवन को नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से बचाकर सकारात्मक शक्तियों का प्रवेश कराया जा सकता है। अतः गोदाम (स्टोर) एवं गैरेज का निर्माण र्नैत्य कोण में करते हैं।
जिस भूखंड का ईशान कोण बढ़ा हुआ हो तो वैसे भूखंड में कार्यालय बनाना शुभ होता है। वर्गाकार, आयताकार, सिंह मुखी, षट्कोणीय भूखंड पर कार्यालय बनाना शुभ होता है। कार्यालय का द्वार उत्तर दिशा में होने पर अति उत्तम होता है। पूर्वोत्तर दिशा में अस्पताल बनाना शुभ होता है।
रोगियों का प्रतीक्षालय दक्षिण दिशा में होना चाहिए। रोगियों को देखने के लिए डॉक्टर का कमरा उत्तर दिशा में होना चाहिए। डॉक्टर मरीजों की जांच पूर्व या उत्तर दिशा में बैठकर करना चाहिए। आपातकाल कक्ष की व्यवस्था वायव्य कोण में होना चाहिए। यदि कोई भूखंड आयताकार या वर्गाकार न हो तो भवन का निर्माण आयताकार या वर्गाकार जमीन में करके बाकी जमीन को खाली छोड़ दें या फिर उसमें पार्क आदि बना दें। भवन को वास्तु के नियम से बनाने के साथ-साथ भाग्यवृद्धि एवं सफलता के लिए व्यक्ति को ज्योतिषीय उपचार भी करना चाहिए।
सर्वप्रथम किसी भी घर में श्री यंत्र एवं वास्तु यंत्र का होना अति आवश्यक है। श्री यंत्र के पूजन से लक्ष्मी का आगमन होता रहता है तथा वास्तु यंत्र के दर्शन एवं पूजन से घर में वास्तु दोष का निवारण होता है। इसके अतिरिक्त गणपति यंत्र के दर्शन एवं पूजन से सभी प्रकार के विघ्न-बाधा दूर हो जाते हैं। ज्योतिष एवं वास्तु एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना प्रारंभिक ज्योतिषीय ज्ञान के वास्तु शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता और बिना ‘कर्म’ के इन दोनों के आत्मसात ही नहीं किया जा सकता। इन दोनों के ज्ञान के बिना भाग्य वृद्धि हेतु किसी भी प्रकार के कोई भी उपाय नहीं किए जा सकते।
…….✍🏻 विकास खुराना 👳‍♂🔱🚩

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मैंने एक कहानी सुनी है। एक आदमी को शिव की पूजा करते करते और रोज शिव का सिर खाते खाते…क्योंकि पूजा और क्या है, सिवाय सिर खाने के। एक ही धुन, एक ही रट हे प्रभु, कुछ ऐसी चीजें दे दो कि जिंदगी में मजा आ जाए। एक ही बार मांगता हूं। मगर देना कुछ ऐसा कि फिर मांगने को ही न रह जाए। परेशानी में, हैरान होकर, क्योंकि सुबह देखे न सांझ यह आदमी, न देखे रात, जब उठे तभी, आधी रात शिव के पीछे पड़ जाए। आखिर इसे वरदान में एक शंख शिव ने उठाकर दे दिया जो उन्हीं के पूजा स्थल में इसने रख छोड़ा था। और इसको कहा इस शंख की आज से यह खूबी है कि तुम इससे जो मांगोगे, तुम्हें देगा। अब तुम्हें कुछ और परेशान होने की जरूरत नहीं और पूजा प्रार्थना की जरूरत नहीं।

अब मुझे छुट्टी दो। जो तुम्हें चाहिए,वह इससे ही मांग लेना। यह तत्क्षण देगा। तुमने मांगा और मौजूद हुआ। उसने मांगकर देखा, सोने के रुपए और सोने के रुपए बरस गए। धन्यभाग हो गया। शिव न भी कहते तो भूल जाता। भूल—भाल गया शिव कहां गए, क्या हुआ, उन बेचारों पर क्या गुजरी, इस सब की कोई फिकर भी न रही। फिर न कोई पूजा थी, न कोई पाठ। फिर तो यह शंख था और जो चाहिए।

लेकिन एक मुसीबत हो गई। एक महात्मा इसके महल में मेहमान हुए। महात्मा के पास भी एक शंख था। इसके पास जो शंख था बिलकुल वैसा, लेकिन दो गुना बड़ा। और महात्मा उसे बड़े संभाल कर रखते था। उनके पास कुछ और न था। उनकी झोली में बस एक बड़ा शंख था। इसने पूछा कि आप इस शंख को इतना सम्हाल कर क्यों रखते हैं? उन्होंने कहा, यह कोई साधारण शंख नहीं, महाशंख, है। मांगों एक, देता है दो। कहो, बना दो एक महल—दो महल बताता है। एक की तो बात ही नहीं। हमेशा।

उस आदमी को लालच उठा। उसने कहा यह तो बड़े गजब की बात है। उसने कहा एक शंख तो मेरे पास भी है मगर छोटा मोटा। आपने नाहक मुझे दीन—दुखी बना दिया। मैं गरीब आदमी हो गया। जरा देखूं चमत्कार।

उन्होंने कहा, इसका चमत्कार देखना बड़ा मुश्किल है। रात के सन्नाटे में जब सब सो जाते हैं, तब निश्चित महूर्त में, अर्धरात्रि के सन्नाटों में इससे कुछ मांगने का नियम है। तुम जागते रहना और सुन लेना।

महात्मा शंख से ठीक अर्धरात्रि में कहा, दे दे कोहिनूर। उसने कहा, एक नहीं दूंगा, दो दूंगा। महात्मा ने कहा, भला सही दो दे दे। उसने कहा, दो नहीं चार। किससे बात कर रहा है, कुछ होश से बात करो! महात्मा ने कहा, भई चार ही दे दे। वह महाशंख बोला, अब आठ दूंगा। उस आदमी ने सुना, उसने कहा, हद हो गई, हम भी कहां का गरीब शंख लिए बैठे हैं! महात्मा के पैर पकड़ लिए। कहा आप तो महात्मा हैं, त्यागी व्रती हैं। इस गरीब का शंख आप ले लो, यह महाशंख मुझे दे दो।

महात्मा ने कहा, जैसी तुम्हारी मर्जी। हम तो इससे छुटकारा पाना ही चाहते थे। क्योंकि इस बेईमान ने हमें परेशान कर रखा है। मांगो कुछ, बकवास इतनी होती है, रात—रात गुजर जाती है। फिर भी वह न समझा कि मामला क्या है कि वह सिर्फ महाशंख था, कि वह सिर्फ बातचीत करता था, देता—वेता कुछ भी नहीं था। हमेशा संख्या दोहरी कर देता था। तुम कहो चार तो वह कहे आठ, तुम कहो आठ तो वह कहे सोलह। तुम कहो सोलह सही, वह कहे बत्तीस। तुम बोले संख्या कि उसने दो का गुणा किया। बस उसको दो का गुणा करना ही आता था। और उसको कुछ नहीं आता था।

महात्मा तो सुबह चले गए। जब इसने उस शंख से दूसरी रात्रि ठीक मुहूर्त में कुछ मांगा तो उसने कहा,अरे नालायक! क्या मांगता है एक? दूंगा दो। उसने कहा, भई दो दे दो। उसने कहा, दूंगा चार। चार ही दे दो। उसने कहा, दूंगा आठ। सुबह होने लगी। संख्या लंबी होने लगी। मोहल्ले के लोग इकट्ठे हो गए कि यह हो क्या रहा है? सारा मोहल्ला जग गया कि मामला क्या है संख्या बढ़ती जाती है, लेना देना कुछ भी नहीं। आखिर उस आदमी ने पूछा, भई दोगे भी कुछ कि बातचीत ही बातचीत।

उसने कहा, हम तो महाशंख हैं। हम तो गणित जानते हैं। तुम मांगकर देखो। तुम जो भी मांगो, हम दो गुना कर देंगे। इसने कहा, मारे गए। वह महात्मा कहां है?

उसने कहा, वह महात्मा हमसे छुटकारा पाना चाहता था बहुत दिन से। मगर वह इस तलाश में था कि कोई असली चीज मिल जाए। वह ले गया असली चीज। अब ढूंढ़ने से न मिलेगा। हम मिला दे सकते हैं। पैर तो नहीं शंख के। मगर फिर भी पैरों को पकड़कर सिर रखकर कहा कि किसी भी तरह महात्मा से मिला दो। कहा, दो से मिलाएंगे। कहा कि हद हो गई। नालायक से पाला पड़ गया। चार से मिलाएंगे। फिर वही बकवास। दो चार दिन में उस आदमी को पागल कर दिया। शंख ने उससे पूछा कि अरे कुछ मांग। वह आदमी इधर उधर देखे कि कुछ बोले कि यह दुष्ट फंसाया अपने चक्कर में। बोले कि फंसे। फिर उससे छूटना मुश्किल। फिर पीछा करता आएगा बत्तीस लेगा? चौंसठ लेगा? लेना देना बिलकुल कुछ होता ही नहीं।

ध्यान और अहंकार के बीच वही संबंध है। अहंकार महाशंख है। कितना ही मिल जाए और चाहिए। संख्या बढ़ती जाती है। दौड़ बढ़ती जाती है। और आदमी कभी उस जगह नहीं पहुंचा, जहां वह कह सके आ गई मंजिल। मंजिल हमेशा मृग मरीचिका बनी रहती है। दूर ही दूर। यात्रा बहुत, पहुंचता कहीं भी नहीं। मगर दौड़ धाप बहुत होती है। और चूंकि सारी दुनिया दौड़ धाप कर रही है, इसलिए संघर्ष भी बहुत है। और यह भी मानने का मन नहीं होता कि इतने सारे लोग गलत होंगे।

प्रताप राज

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तिरुपति बालाजी दर्शन:
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एक बार भृगु ऋषि ने जानना चाहा कि ब्रह्मा ,विष्णु और महेश में कौन सबसे श्रेष्ठ है ? वह बारी-बारी से सबके पास गये | ब्रह्मा और महेश ने भृगु को पहचाना तक नही , न ही आदर किया | इसके बाद भृगु विष्णु के यहा गये | विष्णु भगवान विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी | भृगु ने पहुचते ही न कुछ कहा , न सुना और भगवान विष्णु की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया | लक्ष्मी जी यह सब देखकर चकित रह गयी किन्तु विष्णु भगवान ने भृगु का पैर पकडकर विनीत भाव से कहा ” मुनिवर ! आपके कोमल पैर में चोट लगी होगी | इसके लिए क्षमा करे “|

लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु की इस विन्रमता पर बड़ा क्रोध आया | वह भगवान विष्णु से नाराज होकर भू-लोक में आ गयी तथा कोल्हापुर में रहने लगी | लक्ष्मी जी के चले जाने से विष्णु भगवान को लगा कि उनका श्री और वैभव ही नष्ट हो गया और उनका मन बड़ा अशांत रहने लगा | लक्ष्मी जी को ढूढने के लिए वह श्रीनिवास के नाम से भू-लोक आये | घूमते घुमाते वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में बकुलामाई के आश्रम में पहुचे | बकुलामाई ने उनकी बड़ी आवाभगत की | उन्हें आश्रम में ही रहने को कहा |

एक दिन जंगल में एक मतवाला हाथी आ गया | आश्रमवासी डरकर इधर उधर भागने लगे |श्री निवास ने यह देखा तो धनुष बाण लेकर हाथी का पीछा किया | हाथी डरकर भागा और घने जंगल में अदृश्य हो गया | श्री निवास उसका पीछा करते करते थक गये थे | वह एक सरोवर के किनारे वृक्ष की छाया में लेट गये और उन्हें हल्की सी झपकी आ गयी | थोड़ी देर में शोर सुनकर वह जागे तो देखा कि चार -छ युवतिया उन्हें घेरे खडी है | श्रीनिवास को जागा हुआ देखकर वे डपटकर बोली “यह हमारी राजकुमारी पद्मावती का सुरक्षित उपवन है और यहा पुरुषो का आना मना है | तुम यहा कैसे और क्यों आये हो ?

श्रीनिवास कुछ जवाब दे इससे पहले ही उनकी दृष्टी वृक्ष की ओट से झांकती राजकुमारी की ओर गयी | श्रीनिवास पद्मावती को एकटक देखते रह गये | थोडा संयत होकर कहा “देवियों ! मुझे पता नही था , मै शिकार का पीछा करता हुआ यहाँ आया था | थक जाने पर मुझे नींद आ गयी इसलिए क्षमा करे “| श्रीनिवास आश्रम में तो लौट आये किन्तु बड़े उदास रहने लगे | एक दिन बकुलामाई ने बड़े प्यार से उनकी उदासी का कारण पूछा तो श्रीनिवास ने पद्मावती से भेंट होने की सारी कहानी कह सुनाई फिर कहा “उसके बिना मै नही रह सकता “|
बकुलामाई बोली “ऐसा सपना मत देखो | कहा वह प्रतापी चोल नरेश आकाशराज की बेटी और कहा तुम आश्रम में पलने वाले एक कुल गोत्रहीन युवक |” श्रीनिवास बोले “माँ ! एक उपाय है तुम मेरा साथ दो तो सब सम्भव है “| बकुलामाई ने श्रीनिवास का सच्चा प्यार देखकर हा कर दी | श्रीनिवास ज्योतिष जानने वाली औरत का वेश बनाकर राजा आकाश की राजधानी नारायणपुर पहुचे | उसकी चर्चा सुन पद्मावती ने भी उस औरत को महल बुलाकर अपना हाथ दिखाया|
राजकुमारी के हस्त रेखा देखकर वह बोली “राजकुमारी ! कुछ दिन पहले तुम्हारी भेंट तुम्हारे सुरक्षित उद्यान में किसी युवक से हुयी थी | तुम दोनों की दृष्टि मिली थी | उसी युवक से तुम्हारी शादी का योग बनता है |”
पद्मावती की माँ धरणा देवी ने पूछा “यह कैसे हो सकता है ?”
ज्योतिषी औरत बोली “ऐसा ही योग है | ग्रह कहते है कोई औरत अपने बेटे के लिए आपकी बेटी मांगने स्वयं आयेगी ।
दो दिन बाद सचमुच ही बकुलामाई एक तपस्विनी के वेश में राजमहल आयी | उसने अपने युवा बेटे के साथ पद्मावती के विवाह की चर्चा की | राजा आकाश में बकुलामाई को पहचान लिया | उन्होंने पूछा “वह युवक है कौन ? ”
बकुलामाई बोली “उसका नाम श्री निवास है | वह चन्द्र वंश में पैदा हुआ है | मेरे आश्रम में रह रहा है | मुझे माँ की तरह मानता है ।
राजा आकाश ने कुछ सोचकर उत्तर देने के लिए कहा | बकुलामाई के चले जाने पर आकाश ने राज पुरोहित को बुलाकर सारी बात बताई | राज पुरोहित ने गणना की | फिर सहमति देते हुए कहा ” महाराज ! श्रीनिवास में विष्णु जैसा देवगुण है लक्ष्मी जैसी आपकी बेटी के लिए यह बड़ा सुयोग्य है ।
राजा आकाश ने तुरंत बकुलामाई के यहा अपनी स्वीकृति के साथ विवाह की लग्न पत्रिका भेज दी | बकुलामाई ने सुना तो वह चिंतित हो उठी | श्री निवास से बोली “बेटा ! अब तक तो विवाह की ही चिंता थी | अब पैसे न होने की चिंता है | मै वराहस्वामी के पास जाती हु | उनसे पूछती हु कि क्या किया जाए ?”
बकुलामाई श्रीनिवास को लेकर वराह्स्वमी के पास गयी और श्रीनिवास के विवाह के लिए धन की समस्या बताई तो वराह स्वामी ने आठो दिग्पालो ,इंद्र ,कुबेर ,ब्रह्मा , शंकर आदि देवताओ को अपने आश्रम में बुलवाया और फिर श्रीनिवास को बुलाकर कहा “तुम स्वयम इन्हे अपनी समस्या बताओ |”

श्रीनिवास ने देवताओ से कहा “मै चोल नरेश राजा आकाश की बेटी पद्मावती से विवाह करना चाहता हु |मेरी हैसियत राजा के अनुरूप नही है मेरे पास धन नही है , मै क्या करू ?”

इंद्र ने कुबेर से कहा “कुबेर ! इस काम के लिए तुम श्रीनिवासन को ऋण दे दो ”

कुबेर ने कहा “ऋण तो दे दूंगा पर उसे यह वापस कब और कैसे करेंगे , इसका निर्णय होना चाहिये ?”

श्रीनिवास बोले “इसकी चिंता मत कीजिये | कलियुग के अंत तक मै सब ऋण चूका दूंगा ”

कुबेर ने स्वीकार कर लिया | सब देवताओ की साक्षी में श्रीनिवास के ऋण पत्र लिख दिया | उस धन से श्री निवास और पद्मावती का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ | तभी नारद ने कोल्हापुर जाकर लक्ष्मी को बताया “विष्णु ने श्रीनिवास के रूप में पद्मावती से विवाह कर लिया है |दोनों वेंकटाचलम् पर्वत पर रह रहे है |”

यह सुनकर लक्ष्मी जी को बड़ा दुःख हुआ | वह सीधे वेंकटाचलम पहुची | विष्णु जी की सेवाम एम् लगी पद्मावती को भला बुरा कहने लगी “श्रीनिवास ! विष्णु रूप मेरे पति है |तूने इनके साथ विवाह क्यों किया ?”

दोनों ने वाक् युद्ध होने लगा तो श्री निवास को बड़ा दुःख हुआ | वे पीछे हटे और पत्थर की मूर्ति के रूप में बदल गये | जब दोनों देवियों ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीनिवास तो अब किसी के न रहे |

इतने में शिला विग्रह से आवाज आयी “देवियों मै इस स्थान पर वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से , अपने भक्तो का अभीष्ट पूरा करता रहूँगा | उनसे प्राप्त चढावे के धन द्वारा कुबेर के कर्ज का ब्याज चुकाता रहूँगा इसलिए तुम दोनों मेरे लिए आपस में झगड़ा मत करो ”
यह वाणी सुनते ही लक्ष्मी जी और पद्मावती दोनों ने सिर झुका लिया | लक्ष्मी कोल्हापुर आकर महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्टित हो गयी और पद्मावती तिरुनाचुर में शिला विग्रह हो गयी | आज भी तिरुपति क्षेत्र में तिरुमला पहाडी पर भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन हेतु भक्तगणों से इसी भाव से शुल्क लिया जाता है | उनकी पूजा पुष्प मिष्टान आदि से न होकर धन द्रव्य से होती है | इसी धन से भगवान श्री कृष्ण वेंकटेश्वर स्वामी कुबेर का कर्ज चूका रहे है |
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प्रताप राज

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🌿🌹आज श्री जगन्नाथ जी के स्नान यात्रा (प्राकट्य) महोत्सव पर विशेष :

ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा जिसे देव स्नान पूर्णिमा के नाम से भी जाना है, आज ही के दिन भगवान श्रीजगन्नाथ अपने गर्भगृह से स्नान करने के लिए बाहर आते हैं। कल से १५ दिन तक ठाकुर जी के दर्शन बंद रहेंगे एवं रथयात्रा के दिन श्री जगन्नाथ जी सभी को दर्शन देने फिर से श्रीमंदिर के बाहर पधारेंगे।
भाव यह है कि ज्वर आने पर ठाकुर जी के दर्शन कल से अब 15 दिन नही हो पाएंगे क्यों कि भक्तों के लाडले जगन्नाथ जी कल अपनी मौसी के यहाँ चले जाएंगे। इनकी नित्य सेवा (इनको लाड से श्रृंगार करना……भोग राग सेवा ) सब होगी तो नित्य की भांति ही ….पर पट के भीतर ही भीतर । श्री जगन्नाथ जी अधिक स्नान के कारण हुए ज़वर आने से भक्तों को दर्शन नहीं देंगे। रथयात्रा के दिन ( 14 जुलाई ) को फिर से ठाकुर अपने विरही भक्तों को दर्शन देने पधारेगें।
भगवान श्रीकृष्ण जब द्वारिका में थे तो अक्सर ब्रजवासियों को याद करते थे। ये बात उनकी रानियों ने जान ली थी। उनको बहुत इच्छा थी यह जानने की कि भगवान ब्रजवासियों को क्यों इतना याद करते हैं, क्या रानियों की सेवा में किसी प्रकार की कमी है?
एक दिन सभी ने मिल कर रोहिणी मैया को घेर लिया व कहा कि हमें ब्रज और ब्रज लीलाओं के बारे में सुनाइये। माता ने कहा कि कृष्ण ने मना किया है। रानियों ने कहा कि अभी तो वे यहाँ नहीं हैं, फिर भी द्वार पर सुभद्रा जी को बिठा देती हैं, अगर वे आते दिखेंगे तो वे हमें इशारे से बता देगीं और हम सब कुछ और विषय पर बातें करने लग जायेंगीं ।
बहुत अनुनय-विनय करने पर माता रोहिणी मान गईं।
कक्ष के द्वार पर सुभद्रा जी को बिठा दिया और सब अन्दर रोहिणी माता से ब्रज-लीलायें सुनने लगीं। सुभद्रा जी भी कान लगा कर सुनने लगीं, और लीला सुनने में ही मस्त हो गईं।उनको पता ही नहीं चला कि कब भगवान श्रीकृष्ण और दाऊ बलराम उनके दोनों ओर आकर बैठ गये हैं और वे भी लीला-श्रवण का रसास्वादन कर रहे हैं।
{भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी जब श्रीकृष्ण-प्रेम में मग्न, श्रीकृष्ण लीलाओं का रसास्वादन करते थे तो आपने कई बार प्रेम के अष्ट-सात्विक विकार प्रकट करने की लीला भी की, यह बताने के लिये कि कृष्ण-प्रेम की ऊंचाई पर ऐसे विकार भी शरीर में आ सकते हैं। जैसे बाहें शरीर के भीतर चली जाती हैं, आंखें फैल जाती हैं, आंखों में आँसुओं की धारायें बहती हैं, सारा शरीर पुलकायमान हो जाता है इत्यादि।}
ऐसी ही लीला भगवान श्रीकृष्ण, श्रीबलराम व श्रीसुभद्रा जी ने भी की। आपके दिव्य शरीर में लीलाओं के श्रवण से अद्भुत विकार आने लगे। आपकी आँखें फैल गयीं, बाहें / चरण अन्दर चले गये इत्यादि।
भगवान की इच्छा से श्री नारद जी उस समय द्वारिका के इस महल के आगे से निकले। उन्होंने भगवान का ऐसा दिव्य रूप देखा।कुछ आगे जाकर सोचा कि यह मैंने क्या देखा। अद्भुत दृश्य !! फिर वापिस आये।
उधर रोहिणी माता को पता चल गया कि कोई बाहर है । उन्होंने लीला सुनाना बन्द कर दिया। भगवान वापिस अपने रूप में आ गये। नारद जी ने प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण से कहा- हे प्रभु ! मेरी इच्छा है कि मैंने आज जो रूप देखा है, वह रूप आपके भक्त जनों को पृथ्वी लोक पर चिरकाल तक देखने को मिले। आप इस रूप में पृथ्वी पर वास करें।
श्री कृष्ण नारद जी की बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा।
भगवान श्रीकृष्ण, श्रीबलराम, श्रीसुभद्रा जी का वही भावमय रूप ही श्रीजगन्नाथ पुरी धाम में श्रीजगन्नाथ, श्रीबलदेव व श्री सुभद्रा जी के रूप में प्रकट है।
पुरी धाम में श्रीजगन्नाथ भगवान स्वयं पुरुषोत्तम हैं। आपने दारु-ब्रह्म रूप से नीलाचल (जगन्नाथपुरी धाम) में कृपा-पूर्वक आविर्भूत होकर जगत-वासियों पर कृपा की।
स्नान यात्रा अर्थात आज ही के दिन भगवान श्रीजगन्नाथ जी का प्राकट्य हुआ था। अर्थात् भगवान जगन्नाथ जी स्नान यात्रा के दिन ही इस धरातल पर प्रकट हुए थे।

Sn Vyas

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दो घंटे युद्ध और चलता ! तो भारत की सेना ने लाहोर तक कब्जा कर लिया होता !!
लेकिन तभी पाकिस्तान को लगा कि जिस रफ्तार से भारत की सेना आगे बढ़ रही
हमारा तो पूरा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा !

( भारत और पाकिस्तान के बीच १९६५ का युद्ध
भारत पाक युद्ध का भाग
तिथि – अगस्त – सितम्बर 23, 1965
स्थान -भारतीय उपमहाद्वीप
परिणाम-संयुक्त राष्ट्र के घोषनापत्र के द्वारा युद्धविराम .)

तभी पाकिस्तान ने अमेरिका से कहा कि वो किसी तरह से युद्ध रुकवा दे !!
अमेरिका जानता था कि शास्त्री जी इतनी जल्दी नहीं मानने वाले !! क्यूँ कि वो
पहले भी दो -तीन बार भारत को धमका चुका था !!

धमका कैसे चुका था ??

अमेरिका से गेहूं आता था भारत के लिए PL 48 स्कीम के अंडर ! ! PL मतलब
public law 48 ! जैसे भारत मे सविधान मे धराए होती है ऐसे अमेरिका मे PL
होता है ! तो बिलकुल लाल रंग का सड़ा हुआ गेंहू अमेरिका से भारत मे आता था !
और ये समझोता पंडित नेहरू ने किया था !!

जिस गेंहू को अमेरिका मे जानवर भी नहीं खाते थे उसे भारत के लोगो के लिए
आयात करवाया जाता था ! आपके घर मे कोई बुजुर्ग हो आप उनसे पूछ सकते हैं
कितना घटिया गेहूं होता था वो !!तो अमेरिका ने भारत को धमकी दी कि हम भारत को गेहूं देना बंद कर देंगे !
तो शास्त्री जी ने कहा हाँ कर दो ! फिर कुछ दिन बाद अमेरिका का ब्यान आया
कि अगर भारत को हमने गेंहू देना बंद कर दिया ! तो भारत के लोग भूखे मर जाएँगे !!

शास्त्री जी ने कहा हम बिना गेंहू के भूखे मारे या बहुत अधिक खा के मरे !
तुम्हें क्या तकलीफ है !???
हमे भूखे मारना पसंद होगा बेशर्ते तुम्हारे देश का सड़ा हुआ गेंहू खाके !! एक तो हम
पैसे भी पूरे दे ऊपर से सड़ा हुआ गेहूं खाये ! नहीं चाहीये तुम्हारा गेंहू !!

फिर शास्त्री ने दिल्ली मे एक रामलीला मैदान मे लाखो लोगो से निवेदन किया कि
एक तरफ पाकिस्तान से युद्ध चल रहा है ! ऐसे हालातो मे देश को पैसे कि बहुत जरूरत
पड़ती है ! सब लोग अपने फालतू खर्चे बंद करे ! ताकि वो domestic saving से देश
के काम आए ! या आप सीधे सेना के लिए दान दे ! और हर व्यति सप्ताह से एक दिन
सोमवार का वर्त जरूर रखे !!

तो शास्त्री जी के कहने पर देश के लाखो लोगो ने सोमवार को व्रत रखना शुरू कर दिया !
हुआ ये कि हमारे देश मे ही गेहु बढ्ने लगा ! और शास्त्री जी भी खुद सोमवार का व्रत
रखा रखते थे !!शास्त्री जी ने जो लोगो से कहा पहले उसका पालन खुद किया ! उनके घर मे बाई
आती थी !! जो साफ सफाई और कपड़े धोती थी ! तो शास्त्री जी उसको हटा दिया और
बोला ! देश हित के लिए मैं इतना खर्चा नहीं कर सकता ! मैं खुद ही घर कि सारी सफाई
करूंगा !क्यूंकि पत्नी ललिता देवी बीमार रहा करती थी !
और शास्त्री अपने कपड़े भी खुद धोते थे ! उनके पास सिर्फ दो जोड़ी धोती कुरता ही थी !!

उनके घर मे एक ट्यूटर भी आया करता था जो उनके बच्चो को अँग्रेजी पढ़ाया करता
था ! तो शास्त्री जी ने उसे भी हटा दिया ! तो उसने शास्त्री जी ने कहा कि आपका अँग्रेजी
मे फेल हो जाएगा ! तब शास्त्री जी ने कहा होने दो ! देश के हजारो बच्चे अँग्रेजी मे ही
फेल होते है तो इसी भी होने दो ! अगर अंग्रेज़ हिन्दी मे फेल हो सकते है तो भारतीय
अँग्रेजी मे फेल हो सकते हैं ! ये तो स्व्भविक है क्यूंकि अपनी भाषा ही नहीं है ये !!

एक दिन शास्त्री जी पत्नी ने कहा कि आपकी धोती फट गई है ! आप नहीं धोती ले
आईये ! शास्त्री जी ने कहा बेहतर होगा ! कि सोई धागा लेकर तुम इसको सिल दो !
मैं नई धोती लाने की कल्पना भी नहीं कर सकता ! मैंने सब कुछ छोड़ दिया है पगार
लेना भी बंद कर दिया है !! और जितना हो सके कम से कम खर्चे मे घर का खर्च चलाओ !!अंत मे शास्त्री जी युद्ध के बाद समझोता करने ताशकंद गए ! और फिर जिंदा कभी वापिस
नहीं लौट पाये !! पूरे देश को बताया गया की उनकी मृत्यु हो गई ! जब कि उनकी ह्त्या
कि गई थी !!

भारत मे शास्त्री जी जैसा सिर्फ एक मात्र प्रधानमंत्री हुआ ! जिसने अपना पूरा जीवन
आम आदमी की तरह व्तीत किया ! और पूरी ईमानदारी से देश के लिए अपना फर्ज
अदा किया !!
जिसने जय जवान और जय किसान का नारा दिया !!

क्यूंकि उनका मानना था देश के लिए अनाज पैदा करने वाला किसान और सीमा कि
रक्षा करने वाला जवान बहुत दोनों देश ले लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है !!

स्वदेशी की राह पर उन्होने देश को आगे बढ़ाया ! विदेशी कंपनियो को देश मे घुसने
नहीं दिया ! अमेरिका का सड़ा गेंहू बंद करवाया !!

ऐसा प्रधानमंत्री भारत को शायद ही कभी मिले ! अंत मे जब उनकी paas book
चेक की गई तो सिर्फ 365 रुपए 35 पैसे थे उनके बैंक आकौंट मे ! !

शायद आज कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसा नेता भारत मे हुआ !!

मेरे आदर्श लालबहादुर शास्त्री ।।

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बहुत समय पहले कि बात है बिहारी जी का एक परम प्रिय भक्त था
वह नित्य प्रति बिहारी जी का भजन-कीर्तन करता था
उसके ह्रदय का ऐसा भाव था कि बिहारी जी नित्य उसके भजन-कीर्तन को सुनने आते थे
एक दिन स्वप्न में बिहारी जी ने उससे शिकायत करते हुए कहा- ” तुम नित्य प्रति भजन-कीर्तन करते हो और मैं नित्य उसे सुनने आता भी हूं लेकिन आसन ना होने के कारण मुझे कीर्तन में खड़े रहना पड़ता है जिस कारण मेरे पांव दुख जाते है, अब तू ही मुझे मेरे योग्य कोई आसन दे जिस पर बैठ मैं तेरा भजन-कीर्तन सुन सकू ”
तब भक्त ने कहा-” प्रभु ! स्वर्ण सिंहासन पर मैं आपको बैठा सकूं इतना मुझमें सार्मथ्य नहीं और भूमि पर आपको बैठने के लिए कह नहीं सकता यदि कोई ऐसा आसन है जो आपके योग्य है तो वो है मेरे ह्रदय का आसन आप वहीं बैठा किजिये प्रभु ”
बिहारी जी ने हंसते हुए कहा-” वाह ! मान गया तेरी बुद्धिमत्ता को मैं तुझे ये वचन देता हूं जो भी प्रेम भाव से मेरा भजन-कीर्तन करेगा मैं उसके ह्रदय में विराजित हो जाऊंगा ”
ये सत्य भी है और बिहारी जी का कथन भी वह ना बैकुंठ में रहते है ना योगियों के योग में और ना ध्यानियों के ध्यान में वह तो प्रेम भाव से भजन-कीर्तन करने वाले के ह्रदय में रहते है ।।
बोलिए श्री बांके बिहारी लाल की जय

ज्योति अग्रवाल

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एक जैन मंदिर की बगल मे एक नाई की दुकान थी। जहां वह रहता भी था।

जैन मंदिर पुजारी और नाई दोनों मित्र बन गये थे |
नाई हमेशा ही जैन मंदिर पुजारी से कहता,

ईश्वर ऐसा क्यों करता है,
वैसा क्यों करता है ?
यहाँ बाढ़ आ गई,
वहाँ सूखा हो गया,
यहाँ एक्सीडेंट हुआ,
यहाँ भुखमरी चल रही है
नौकरी नहीं मिल रहीं हमेशा लोगों को ऐसी बहुत सारी परेशानियां देता रहता है |

एक दिन उस जैन मंदिर पुजारी ने मित्र नाई को सामने सडक पर बैठै एक इंसान से मिलाया,
जो भिखारी था,
बाल बहुत बढ़े थे,
दाढ़ी भी बहुत बढ़ी थी।

मित्र नाई को कहा:-
देखो इस इंसान को जिसके बाल बढ़े हुए हैं, दाढ़ी भी बहुत बढ़ी हुई है |
तुम्हारे होतें हुए ऐसा क्यों है ?
नाई बोला:- अरे! उसने मेरे से कभी संपर्क ही नहीं किया

जैन मंदिर पुजारी ने तब समझाया यही तो सारी बात है |

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जो लोग ईश्वर से संपर्क करते रहते हैं उनका दुःख स्वत:ही खत्म हो जाता है

जो लोग संपर्क ही नहीं करतें और कहतें हैं हम दुःखी है
वो सब अपने अपने कर्म काट रहै होते हैं। |
💐 !!जयजिनेन्द्र🙏🙏