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“ ॐ तत्सत् ……….. श्री सदानन्दाय नमः “
योग ….वास्तविक स्वरुप … भाग..१
योग शब्द युक्ति अर्थात मेल तथा ‘ यूज् समाधौ ‘ धातु के अनुसार समाधि के अर्थ में प्रयुक्त होता है |
योग की प्राचीनता के विषय में पतंजलि मुनि कहते हैं..
‘ अथ योगानुशासनम् ‘…….. शासन शब्द का प्रयोग उपदेश या शिक्षा के लिए होता है | अनुशासन = अनु+शासन … अर्थात जिस विषय का शासन पहले से ही विद्यमान हो |
अतः योग प्राचीन काल से ही विद्यमान है.. |
इसके प्रथम वक्ता के विषय में महाभारत का वचन है …
“सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते |
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ||
सांख्य के वक्ता कपिलाचार्य परमर्षि कहलाते हैं. और योग के वक्ता हिरण्यगर्भ हैं , इनसे पुराना और कोई वक्ता नहीं है|
योग के वक्ता हिरण्यगर्भ के बारे में ऋग वेद का प्रमाण है..
हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् |
स दाधार पृथिवी` द्या मुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ||
हिरण्यगर्भ ही सर्वप्रथम हुए | जो समस्त भूतों के अधिपति थे | उन्होंने ही इस पृथिवी और स्वर्ग को धारण किया | उस सुख रूप देव की हम पूजा करते हैं.|
महाभारत के अनुसार ..
हिरण्यगर्भो द्युतिमान य एषच्छन्दशि स्तुतः |
योगै: सम्पुज्यते नित्यं स च लोके विभु: स्मृतः ||
अर्थात:- यह द्युतिमान हिरण्यगर्भ वही है ..जिसकी वेदों में स्तुति की गयी है… जिनकी योगी लोग नित्य पूजा किया करते हैं ..और संसार में जिन्हें “ विभु ” कहते हैं |
श्वेताश्वतर उपनिषद् का आदेश है…
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदिन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य |
ब्रहमोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ||
शरीर के तीनो अंगों (छाती, गर्दन तथा सिर ) को सीधा रख कर, इन्द्रियों को मन के साथ ह्रदय में प्रवेश करके .. ॐकार की नौका पर सवार हो कर भय के लाने वाले सारे प्रवाहों से पार उतर जाय |
कठोपनिषद का प्रमाण है…
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम् |
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययो ||
जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं और वुद्धि भी चेष्टा रहित हो जाती है… उसे ही योग मानना चाहिए | जो इन्द्रियों की निश्चल धारणा है | उस समय वह योगी प्रमाद रहित होता है क्योकि योग प्रभव ( निरोध के संस्कार के प्रादुर्भाव वाला ) और अप्यय ( व्युत्थान के संस्कारों के अभिभव अर्थात दबने का स्थान वाला) है |
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं ..
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव |
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ||
भक्ति युक्त पुरुष अंत काल में योग बल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार से स्थित करके फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस हिरण्यगर्भ पुरुष को ही प्राप्त होता है |
सर्वद्वाराणि संयम्य मनोहृदि निरुध्य च |
मूर्ध्न्याधायात्मन: प्राणः प्राणमास्थितो योग धारणाम् ||
ॐइत्येकाक्षर ब्रह्म ब्याहरन्मामनुस्मरन् | यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||
अर्थात :- सब ईन्द्रियों के द्वारों को रोक कर तथा मन को ह्रदय प्रदेश में स्थिर कर के प्राण को मूर्धा में स्थापित करके आत्म ( मै ) की योग साधना में स्थित होकर जो पुरुष “ ॐ “ इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चरित करता हुआ साथ ही उसके तत्त्वरूप “ मै “ को ( मुझे ) स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है | (अर्थात “ मै “ को प्राप्त होता है…| )
तपस्विभ्यो.धिको योगी ज्ञानिभ्यो.पि मतो.धिकः |
कर्मिभ्यचाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ||
हे अर्जुन योगी तपस्वियों में श्रेष्ठ है और शास्त्र ज्ञानियों में भी ..साथ ही कर्कारने वालों में भी श्रेष्ठ है | अतः तुम योगी हो | ……. क्रमशः
भगवत्कृपा हि केवलम् …… स्वामी सत्यानन्द

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