Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

आज वैदेही बहुत खुश थी, उसका मन उमंग और उत्साह से भरा हुआ था. वो सुबह से ही तैयारी कर रही थी, कभी अपनी किताबें बैग में डालती तो कभी खुद आईने के सामने खड़ी हो जाती और खुद में आत्मविश्वाश भरती, उसके मन में जितनी ख़ुशी थी उतनी घबराहट भी आखिर इतने समय के बाद उसका सपना सच हुआ था वो आज आई.पी.एस की ट्रेनिंग पर जा रही थी उसने बड़ी मेहनत से ये परीक्षा पास की थी.

जबकि उसकी पढाई काफी पहले छुड़वा दी गयी थी जब 18 की उम्र में उसकी मर्ज़ी के खिलाफ उसकी शादी कर दी गयी. वो पढ़ना चाहती थी खुले आसमान में उड़ना चाहती थी पर मानो उड़ने से पहले उसके पर क़तर दिए गए.और नए घर में तो उसे ना कभी मान सम्मान मिला और ना ही प्यार. मिला तो सिर्फ ताने, बेइज़्ज़ती, और जानवरों से बद्द्तर ज़िन्दगी. उसका पति प्रमोद तो उसे आये दिन मारता पीटता भी था. वो अपना दर्द कभी अपने मायके वालों को सुनाती तो उसे और वो समझा देते थे की अब जैसा भी है उसका ससुराल ही उसका घर है और अब उसको वही रहना है.

जैसे तैसे 2 साल बीत गए और वैदेही ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया. बेटी पैदा करने की वजह से वैदेही के साथ अब तो और भी बुरा बर्ताव होने लगा, और प्रमोद की दूसरी शादी करवा देने की धमकी मिलने लगी.उसकी हालत और ख़राब होती जा रही थी और ये सब देख विजय बहुत विचलित हो उठा. विजय उसका पडोसी था जो नया नया पड़ोस में रहने आया था . उसे वैदेही से हमदर्दी होने लगी …… इधर वैदेही को भी एक हमदर्द मिल गया था जिस से वो अपनी तक़लीफ़ बाँट सके . विजय उसमे हिम्मत भरने की कोशिश करता ताकि वो दलदल से निकल अपनी और अपनी बच्ची की ज़िन्दगी सवार सके पर वैदेही ये सोच कर अपने कदम रोक लेती की वो ज़्यादा पढ़ी लिखी तो है नहीं अपनी बच्ची की परवरिश कैसे करेगी.पर जब वैदेही ने देखा की उसके घर में उसकी बच्ची की भी उतनी ही कद्र है जितनी की उसकी,उस नन्ही सी जान की परवाह किसी को भी ना थी तो उस से रहा ना गया और उसने प्रमोद से अलग होने की ठानी, जिसमे विजय ने उसकी पूरी पूरी मदद की.तलाक के लिए वकील से लेकर घर और पार्ट टाइम नौकरी के लिए एन.जी.ओ तक सब का इंतज़ाम विजय ने ही किया.

आखिर एक दिन कोर्ट में उसे प्रमोद से छुटकारा मिल ही गया. और वैदेही ने अपनी पढाई फिर से शुरू की और एक हॉस्पिटल में पार्ट टाइम जॉब भी. पर अचानक उसके मन में एक सवाल आया की विजय उसकी इतनी मदद क्यों कर रहा …..इसमें उसका क्या फायदा.. क्या विजय उसका दिल जीतना चाहता था.. या बस इस्तेमाल करना चाहता था… क्या विजय बाकी मर्दों की तरह ही अपने मतलब के लिए कर रहा था…… इन सवालो से वैदेही का मन बेचैन हो उठा. उसे समझ नहीं आ रहा था की वो कैसे अपनी दुविधा दूर करे. तभी उसने विजय को फ़ोन पर किसी से बात करते हुए सुना,” मेरी परी को तो आज मना के रहूंगा आज उसे मेरी बात माननी पड़ेगी,तुम आज हरी चूड़ियां लेते आना अपनी जान को मैं अपने हाथों से पहनाऊँगा तब वो मेरी बात मान जाएगी”. अब तो वैदेही को अपने शक पर यकीन हो गया… उस से रहा ना गया उन विजय से जाके पूछ ही लिया की उसके मदद के पीछे उसका क्या स्वार्थ है..

विजय ने आहत होकर वैदेही से कहा की तुम जानना चाहती हो ना की मैं तुम्हारी मदद क्यों कर रहा हूँ तो चलो मेरे साथ… वैदेही ज्यों ही विजय के घर जाती है उसकी नज़र दीवार पे टंगे तस्वीर पर पड़ती है.. विजय बोलता है,”देखो वैदेही ये मेरी बहन है गीता इसको इसके ससुराल वालों ने जला कर मार डाला,इसने मुझे और मेरे घरवालों को बार बार अपना दुःख सुनाया पर हमने ध्यान नहीं दिया…सोचा की झगडे हर घर में होते हैं किसी बात पर नाराज़ होकर इसके पति ने युहीं हाथ उठा दिया होगा कोई बड़ी बात नहीं है पर उसे हमेशा के लिए खोने के बाद ये समझ आयी की जिस दिन उसके पति ने उसे पहला थप्पड़ मारा उस दिन ही अगर हमने आवाज़ उठाई होती… अपनी बहन का साथ दिया होता तो आज वो हमारे बीच होती. पत्नी पर हाथ उठाने वाला पति ही सिर्फ दोषी नहीं है.. इसको सहन करने वाली हर लड़की भी दोषी है और उस लड़की का परिवार जो उसका साथ नहीं देता वो भी उतना भी दोषी है. हमेशा से हमारे देश की लड़कियों को शहनशीलता का पाठ पढ़ाया जाता है पर आज ज़रूरत विपरीत है किसी भी लड़की को शहनशील नहीं,साहसी बनने की ज़रूरत है. पत्नी पर हाथ उठाना या बुरा बर्ताव करना किसी भी स्थिति में आम बात नहीं हो सकती. और वैदेही जब तुम्हे देखता हूँ तो मुझे अपनी गीता की याद आती है इसीलिए मैं तुम्हारी मदद कर रहा हूँ ताकि किसी एक गीता को बचा कर अपने अंदर का अपराधबोध कम कर सकूँ. वैदेही अपनी सोच पर शर्मिंदा महसूस करती है. फिर वो पूछती है की विजय ने फिर हरी चूड़ियां किसके लिए मंगवाई.

तभी एक छोटी सी बच्ची अंदर आती है और विजय से गुस्से में पूछती है,”मेले लिए हली चूलीयां नहीं लाये ना मामू” और विजय मुस्कुरा कर उसे गोद में उठा लेता है और बोलता है,”मेरी परी की चूड़ियां रास्ते में है अभी आ जाएँगी” और वैदेही की तरफ रुख़ करके बोलता है,”ये है मेरी छोटी गीता””मेरी जान”अब तो मेरी ज़िन्दगी बस यही है पर तुम अपनी और अपनी बच्ची के भविष्य पर ध्यान दो. और हाँ,कभी किसी गीता पर अत्याचार होते देखो तो उसके लिए ज़रूर लड़ना. अब मैं चलता हूँ…. अलविदा. वैदेही ने तब ही ठान लिया था की वो एक साहसी पुलिस अफसर बनेगी ताकि कभी कोई गीता अपनी जान न गवां बैठे.

संजय गुप्ता

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