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अ मृ त वा णी

                          माया  ---  अहंकार

सिद्ध पुरुषों का अहंकार

  • एक भक्त — क्या नारदादि केवल भक्त थे या ज्ञानी भी थे ?
    श्रीरामकृष्ण — नारदादि आदि को ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ था, किन्तु फिर भी वे कलनादिनी निर्झरिणी की तरह भगवन्महिमा का गुणगान करते हुए विचरण करते रहते थे । लोकशिक्षा और धर्मशिक्षा के लिए उन्होंने ‘विद्या का मैं’ रख छोड़ा था, ब्रह्म में पूर्ण विलीन न होकर अपने अलग अस्तित्व का मानो थोड़ा चिन्ह रख छोड़ा था ।
  • एक बार श्रीरामकृष्णदेव ने अपने एक शिष्य से विनोद में पूछा, “क्यों, क्या तुम्हें मुझमें कोई अभिमान नजर आता है ? क्या मुझमें अभिमान है ?”
    शिष्य ने कहा, “जी महाराज, थोड़ासा है, पर आपमें उतना अभिमान इन कारणों से रखा गया है — पहला, देहधारण के लिए; दूसरा, भगवद्भ़क्ति के उपयोग के लिए; तीसरा, भक्तों के साथ सत्संग करने के लिए; और चौथा, लोगों को उपदेश देने के लिए । फिर यह भी तो है कि इस ‘अहं’ को रखने के लिए आपने काफी प्रार्थना की है । वैसे देखा जाए तो आपके मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति समाधि की ओर है। इसी से मैं कह रहा हूँ कि आपमें जो ‘अहं’ या अभिमान बचा है वह आपकी प्रार्थना का ही फल है ।”
    तब श्रीरामकृष्णदेव बोले, “ठीक है, लेकिन इस ‘मैं’ को बनाए रखने वाला मैं नहीं, जगदम्बा हैं । प्रार्थना को स्वीकार करना जगदम्बा के ही हाथ में है ।”

Anup sinha

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