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सत्य कड़वा होता है, परन्तु जब उसे लिखा या पढ़ा जाए तो यह भंयकर होता है।
24 घंटे से ज्यादा अगर कुत्ते को बंद रखो या बाहर घुमाने न लेकर जाओ तो वो भी भौंकने लगता है ।

इसके विपरीत कई दिनों तक यदि किसी को अँधेरे कमरे में बंद रखो तो वो प्रकाश में जाने से भी डरता है ।

और इस हिन्दू जनमानस को तो सदियाँ हो गईं… क़ैद कर के रखा हुआ है ।

अज्ञानता की जंजीरों में ……
McCauleyवादी नीतियों ने ।

इस हिन्दू जनमानस को भी सदियों से सनातन वैदिक ग्रन्थों की पवित्र वायु में श्वास-प्रश्वास का अवसर ही कहाँ मिला… मिला भी तो अवसर चूक गये ।

अब यदि इस हिन्दू जनमानस को कोई खुली वायु का आभास करवाने का भी प्रयास करे… तो भयभीत होकर ही भौंकने लगते हैं ।

चीन में कभी भारत की एक अलग ही परिभाषा थी…
भा = प्रकाश
रत = लीन रहने वाला, चलायमान, गतिमान ।

भारत = ज्ञान के प्रकाश में सदा लीन, गतिमान रहने वाला ।

ज्ञान की धारा में अविरल बहने की भारत की इस महान परम्परा के यम, नियम और गुण भी महान ही थे ।

यदि कोई गुरु कोई बात कहे या विचार दे या शिक्षा दे … तो परस्पर कुतर्क नहीं किया जाता था …हाँ …प्रश्न करने का अधिकार सबको था …परन्तु कुतर्क नही ।

उत्तर देने पर फिर प्रश्न पूछा जा सकता है … प्रश्न चलते रहें परन्तु मर्यादा में ।

ऋषि याज्ञवल्क्य से लेकर आदि गुरु शंकराचार्य जी तक हमने शास्त्रों के न जाने कितने ही उदाहरण और सन्दर्भ सुने और पढ़े हैं …आर्य समाज के ऋषि दयानन्द सस्वती जी ने भी अनेकों शास्त्रार्थ किये ।

नाथ सम्प्रदाय के गुरु गेहणीनाथ जी ने तो इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद को शास्त्रार्थ में पराजित किया ।

परन्तु उन सन्दर्भों के भी कुछ यम-नियम आदि निश्चित एवं निर्धारित होते थे ।

दोनों और के शास्त्रार्थ करने वाले अपने अपने संदर्भो हेतु तथ्यों और प्रमाणों हेतु समस्त ग्रन्थ अपने साथ रखते थे …
एक प्रश्न का उत्तर संतोषजनक देने के उपरान्त दूसरा व्यक्ति प्रश्न करता है … फिर उसका उत्तर।

जो परास्त होता था उसे विजयी विद्वान की सभी नियमो तथा शर्तों का पालन करना होता था ।

आदि शन्कराचार्य और मंडन मिश्र जी का साक्षात्कार कई महीनो तक निरंतर चला … अंत में मंडन मिश्र ने आदि गुरु शंकराचार्य जी को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया ।

बोद्ध सम्प्रदाय के प्रपंचों के कारण हिन्दू जनमानस वेद विरुद्ध होकर बोद्ध सम्प्रदाय में दीक्षित होने लगा था… परिस्थितियाँ लगभग वही थीं जो इस्लाम और इसाइयत के आतंकवाद में दिखाई देती है…
मन्दिरों का विध्वंस भी किया गया…
वैदिक धर्म की स्त्रियों पर अत्याचार…
धर्मग्रंथो में मिलावट और उनको जलाया जाना…
गुरुकुलों पर प्रतिबन्ध लगाये गये…
चन्द्रगुप्त से लेकर अशोक तक तो वैदिक गुरुकुलों को बोद्ध रूप देने के ही कार्य चले …
नालंदा और तक्षशिला भी बोद्द वर्चस्व का शिकार ही चुके थे …

अशोक ने तो यज्ञों पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया था … सभी प्रकार के कर्मकाण्डो पर रोक लग चुकी थी ।

ऐसे कठिन समय में आदि गुरु शन्कराचार्य ने बोद्ध आचार्यों के साथ शास्त्रार्थ में पराजित किया और लाखों की संख्या में वैदिक से बोद्ध तथा जैनियों बने जनमानस को पुन: वैदिक धर्म में दीक्षित किया ।

इस कार्य में कुमारिल भट्ट जी का योगदान भी उल्लेखनीय रहा जिन्होंने बोद्ध मठ में रहकर बोद्ध शास्त्रों का भी अध्ययन किया ताकी उनकी कमजोरियां ढूंढ कर उन्हें पराजित किया जा सके ।

दोनों और के विद्वान अपने अपने वैदिक और वेद विरोधी ग्रन्थ आदि साथ लेकर बैठते थे… उनके बीच कोई नही बोलता था ।

सभी प्रश्नों के उत्तर हेतु उपलब्ध ग्रंथो के प्रमाण उपस्थित किये जाते थे ।

बोद्ध यदि हारे तो वैदिक धर्म स्वीकार करते थे … और वैदिक यदि हारे तो बोद्ध विद्वान से हारने पर उसके सम्प्रदाय को स्वीकार करते थे ।

आदि शंकराचार्य जीवन में कभी किसी भी शास्त्रार्थ में पराजित नही हुए ।

वैदिक ज्ञान से ऋषि भूमि को पुन: प्रकाशित किया …

बोद्ध प्रपंचों के कारण लुप्त होने लगी श्रीमदभगवदगीता को पुन: ऋषि भूमि के कोने कोने तक सुलभ करवाया ।

शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को व्यवस्थित करने का भरपूर प्रयास किया, उन्होंने हिंदुओं की सभी जातियों को इकट्ठा किया ।

भविष्य में पुन: वैदिक धर्म पर कोई आघात न हो इस हेतु उन्होंने करके ‘दसनामी संप्रदाय’ बनाया और साधु समाज की अनादिकाल से चली आ रही धारा को पुनर्जीवित कर चार धाम की चार पीठ का गठन किया जिस पर चार शंकराचार्यों की परम्परा की शुरुआत हुई।

ब्रह्मलीन होने से पूर्व मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने भारतभर का भ्रमण कर हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों ही स्थापना की।

चार मठ के शंकराचार्य ही हिंदुओं के केंद्रिय आचार्य माने जाते हैं, इन्हीं के अधिन अन्य कई मठ हैं।
चार प्रमुख मठ निम्न हैं:-
1. वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)।
2. गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
3. शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
4. ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)

शंकराचार्य के चार शिष्य: 1. पद्मपाद (सनन्दन), 2। हस्तामलक 3. मंडन मिश्र 4. तोटक (तोटकाचार्य)।
उनके ये शिष्य चारों वर्णों से थे।

ग्रंथ: शंकराचार्य ने सुप्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र भाष्य के अतिरिक्त ग्यारह उपनिषदों पर तथा गीता पर भाष्यों की रचनाएँ की एवं अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों स्तोत्र-साहित्य का निर्माण कर वैदिक धर्म एवं दर्शन को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए अनेक श्रमण, बौद्ध तथा हिंदू विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया।

दसनामी सम्प्रदाय:
शंकराचार्य से सन्यासियों के दसनामी सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ।

इनके चार प्रमुख शिष्य थे और उन चारों के कुल मिलाकर दस शिष्य हए।
इन दसों के नाम से सन्यासियों की दस पद्धतियाँ विकसित हुई।
शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किए थे।

दसनामी सम्प्रदाय के साधु प्रायः गेरुआ वस्त्र पहनते, एक भुजवाली लाठी रखते और गले में चौवन रुद्राक्षों की माला पहनते। कठिन योग साधना और धर्मप्रचार में ही उनका सारा जीवन बीतता है।

दसनामी संप्रदाय में शैव और वैष्णव दोनों ही तरह के साधु होते हैं।

यह दस संप्रदाय निम्न हैं:
1.गिरि, 2.पर्वत और 3.सागर।
इनके ऋषि हैं भ्रगु।

4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती।
इनके ऋषि हैं शांडिल्य।

7.वन और 8.अरण्य
इनके ऋषि हैं कश्यप।

9.तीर्थ और 10. आश्रम
इनके ऋषि अवगत हैं।

इन दशनामी गुरुकुलों में किसी भी जाती या वर्ण का बालक पढने जा सकता है… शिक्षा प्राप्ति के उसका नाम स्वयं बदल दिया जाता है ।

द्सनामी सम्प्रदाय से दीक्षित हिन्दू साधुओं के नाम के आगे स्वामी और अंत में उसने जिस संप्रदाय में दीक्षा ली है उस संप्रदाय का नाम लगाया जाता है, जैसे- स्वामी अवधेशानंद गिरि,
स्वामी जयेंद्र सरस्वती,
स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ ।

इस प्रकार वर्ण व्यवस्था का भी संरक्षण होने लगा ।

शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत का दर्शन कहा जाता है।

शंकराचार्य के गुरु दो थे।
गौडपादाचार्य के वे प्रशिष्य और गोविंदपादाचार्य के शिष्य कहलाते थे।

शकराचार्य का स्थान विश्व के महान दार्शनिकों में सर्वोच्च माना जाता है। उन्होंने ही इस ब्रह्म वाक्य को प्रचारित किया था कि ‘ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया।’ आत्मा की गति मोक्ष में
है।

अद्वैत वेदांत अर्थात उपनिषदों के ही प्रमुख सूत्रों के आधार पर स्वयं विद्वानों ने उपदेश दिए थे। उन्हीं का विस्तार आगे चलकर माध्यमिका एवं विज्ञानवाद में हुआ।
इस उपनिषद अद्वैत दर्शन को गौडपादाचार्य ने अपने तरीके से व्यवस्थित रूप दिया जिसका विस्तार शंकराचार्य ने किया।

वेद और वेदों के अंतिम भाग अर्थात वेदांत या उपनिषद में वह सभी कुछ है जिससे दुनिया के तमाम तरह का धर्म, विज्ञान और दर्शन निकलता है।

नागा साधुओं की सेना तैयार की गई जिसने आगे चलकर पृथ्वीराज चौहान को भी सहायता की और श्रीराम जन्मभूमि हेतु हुए संघर्ष में औरंगजेब को लगातार 30 युद्धों में पराजित किया जो कि औरंगजेब की खुद की जीवनी में भी उल्लेखित है ।

बहुत से राजा भी वैदिक धर्म को प्रचारित करने हेतु पुन: प्रेरित हुए जिनमे पुष्यमित्र शुङ्ग तथा शशांक शेखर का योगदान अतुलनीय है ।

इतिहासकारों के प्रपंचों के कारण सबके काल समय में अनियमितता पाई जाती है ।

जहाँ एक और पुष्यमित्र शुङ्ग ने अशोक के आखिरी वंशज बृहद्रथ का वध करके मगध पर बोद्ध शासन समाप्त करके पुन: वैदिक धर्म को प्रचारित किया …

वहीं दूसरी और गौड़ प्रदेश बंगाल के राजा शशांक शेखर ने एक दिन यह घोषणा कर दी कि कल का सूर्यास्त वो देखेगा जो … हिन्दू होगा ।

अगले दिन जितने बोद्ध काटे गये… उससे दुगुने बोद्धों ने पुन: वैदिक धर्म स्वीकार किया… इनमे वे भी थे जो भय या मजबूरी के कारण बोद्ध मत में चले गये थे ।

कुछ बोद्ध सिंध, अफगानिस्तान और बलोचिस्तान की और भाग गये ।

तथा कुछ थाईलेंड, चीन आदि की और भाग गये ।

जो चीन, थाईलेंड आदि देशों की और गये उनका प्रतिशोध तो समय के साथ ठंडा पड़ गया …

परन्तु अफगानिस्तान, मंगोलिया, सिंध और बलोचिस्तान के बोद्धों में प्रतिशोध की अग्नि जलती जलती रही… पुन: वैदिक धर्म को क्षीण करके बोद्ध सत्ता का वर्चस्व स्थापित करना ।

ऐसा तब संभव हुआ जब 712 ईस्वी में सीरिया के दमिश्क से मुहम्मद बिन कासिम आया … जो तीन बार ईरान के रास्ते आया पर परास्त हुआ ।

परन्तु चौथी बार जब अरब के समुद्री मार्ग से आया… तो तटीय क्षेत्रों पर उसका स्वागत किया ।

कई दिन की मेहमाननवाजी में शान्ति के सम्प्रदाय कहे जाने वाले बोद्ध अनुयायियों ने 32 लाख गायों की हत्या करवा कर खान पान करवाया मुहम्मद बिन कासिम और उसकी सेना का ।

बोद्धों ने मुहम्मद बिन कासिम को सिंध के राजा दाहिर सेन के विरुद्ध अपने अनुभवी नाविक और जासूस दिए जिन्होंने उफनती नदियों से बचाकर सिंध के राजा तक पहुँचाया और जासूसी करके कमियाँ भी पता करके दीं …

अंतत: बोद्धों की गद्दारी के कारण दाहिर सेन परास्त हुए ।

अगले कुछ वर्षों में इस्लाम की क्रूरता ने गद्दार बोद्धों को भी नही बक्शा और सभी बोद्धों को भी इस्लाम में धर्मान्तरित किया ।

इतना सब कुछ हुआ…
और उसके बाद के 1100 वर्षों का इस्लामिक-ब्रिटिश अत्याचार और नरसंहारों का इतिहास भी आपके समक्ष उपलब्ध है ।

परन्तु हिन्दुओं को अक्कल न आई…

आज जब ऐसे ही एक शंकराचार्य ने वेद-विरुद्ध न जाने की शिक्षा दी …

तो वर्षों से सनातन वैदिक ग्रंथो की ज्ञान की वायु से दूर अन्धकार और अज्ञान में रखे गये हिन्दू आज… ज्ञान की रौशनी। पाने के नाम पर भी भौंकने लगते हैं ।

जबकि वे भूल जाते हैं कि शंकराचार्य सनातन वैदिक धर्म के समस्त शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त ही उस पदवी को प्राप्त करने हेतु योग्यता प्राप्त करते हैं ।

शास्र्त्रों का ज्ञान नही और शंकराचार्यों को कहते हैं कि उसे कुछ ज्ञात नही … यह कौन से हिन्दू हैं … ???

आशा हैं कि हिन्दू अज्ञानता के गुलाम बन कर ज्ञान पर भौंकना बंद करेंगे शीघ्र ही ।

कई दिनों तक अन्धकार में रहने के उपरान्त प्रकाश में जाने से भी भयभीत न होकर पुन: सनातन वैदिक ग्रंथो के ज्ञान से प्रकाशित होगा ।

परन्तु यह इतना सरल नही था… न होगा ।

पराजित राष्ट्र तब तक पराजित नही होते जब तक वे अपनी संस्कृति, मूल्यों, धरोहरों एवं परम्पराओं की रक्षा करते हैं ।

समय के साथ अनेक परिवर्तन होते हैं, पोशाकों में बदलाव आयेगा,
घरों की रचना में बदलाव आयेगा,
खानपान के तरीके भी बदलेंगे…..

परन्तु जीवन मूल्य तथा आदर्श जब तक कायम रहेंगे तब तक संस्कृति भी कायम कहेगी l

यही संस्कृति राष्ट्रीयता का आधार होती है ….राष्ट्रीयता का पोषण यानि संस्कृति का पोषण होता है …. इसे ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा जाता है l

सीमाएं उसी राष्ट्र की विकसित और सुरक्षित रहेंगी …..
…जो सदैव संघर्षरत रहेंगे l

जो लड़ना ही भूल जाएँ वो न स्वयं सुरक्षित रहेंगे न ही अपने राष्ट्र को सुरक्षित बना पाएंगे l

………..✍🏻विकास खुराना ( अध्यक्ष, हिन्दू समूह ) 🚩

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