Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

।। शनि शिंगणापुर से जुडी कथा ।।

भारत में सूर्यपुत्र शनिदेव के कई मंदिर हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर का शनि मंदिर। विश्व प्रसिध्द इस शनि मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ स्थित यहां पर शनि महाराज की कोई मूर्ति नहीं है बल्कि एक बड़ा सा काला पत्थर है जिसे शनि का विग्रह माना जाता है और वह बगैर किसी छत्र या गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजित है।

शनि के प्रकोप से मुक्ति पाने के लिए देश विदेश से लोग यहां आते हैं और शनि विग्रह की पूजा करके शनि के कुप्रभाव से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माना जाता है कि यहां पर शनि महाराज का तैलाभिषेक करने वाले को शनि कभी कष्ट नहीं देते।

शनि मराहाज के शिंगणापुर पहुंचने की बड़ी ही रोचक है। सदियों पहले शिंगणापुर में खूब वर्षा हुई। वर्षा के कारण यहां बाढ़ की स्थिति आ गई। लोगों को वर्षा प्रलय के समान लगने लग रही थी। इसी बीच एक रात शनि महाराज एक गांववासी के सपने में आए,शनि महाराज ने कहा कि मैं पानस नाले में विग्रह रूप में मौजूद हूं। मेरे विग्रह को उठाकर गांव में लाकर स्थापित करो। सुबह इस व्यक्ति ने गांव वालों को यह बात बताई। सभी लोग पानस नाले पर गए और वहां मौजूद शनि का विग्रह देखकर सभी हैरान रह गये।

गांव वाले मिलकर उस विग्रह का उठाने लगे लेकिन विग्रह हिला तक नहीं, सभी हारकर वापस लौट आए। शनि महाराज फिर उस रात उसी व्यक्ति के सपने में आये और बताया कि कोई मामा भांजा मिलकर मुझे उठाएं तो ही मैं उस स्थान से उठूंगा। मुझे उस बैलगाड़ी में बैठाकर लाना जिसमें लगे बैल भी मामा-भांजा हो

अगले दिन उस व्यक्ति ने जब यह बात बताई तब एक मामा भांजे ने मिलकर विग्रह को उठाया। बैलगाड़ी पर बिठाकर शनि महाराज को गांव में लाया गया और उस स्थान पर स्थापित किया जहां वर्तमान में शनि विग्रह मौजूद है। इस विग्रह की स्थापना के बाद गांव की समृद्घि और खुशहाली बढ़ने लगी

शिंगणापुर के इस चमत्कारी शनि मंदिर में स्थित शनिदेव का विग्रह लगभग पाँच फीट नौ इंच ऊँचा व लगभग एक फीट छह इंच चौड़ा है। देश-विदेश से श्रध्दालु यहाँ आकर शनिदेव के इस दुर्लभ विग्रह का दर्शन लाभ लेते हैं।

सुबह हो या शाम, सर्दी हो या गर्मी यहाँ स्थित शनि विग्रह के समीप जाने के लिए पुरुषों का स्नान कर पीताम्बर धोती धारण करना अत्यावश्क है। ऐसा किए बगैर पुरुष शनि विग्रह का स्पर्श नहीं पर सकते हैं। । प्रत्येक शनिवार, शनि जयंती व शनैश्चरी अमावस्या आदि अवसरों पर यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

इस हेतु यहाँ पर स्नान और वस्त्रादि की बेहतर व्यवस्थाएँ हैंखुले मैदान में एक टंकी में कई सारे नल लगे हुए हैं, जिनके जल से स्नान करके पुरुष शनिदेव के दर्शनों का लाभ ले सकते हैं। पूजनादि की सामग्री के लिए भी यहाँ आसपास बहुत सारी दुकानें हैं, जहाँ से पूजन सामग्री लेकर शनिदेव को अर्पित कर सकते है

मंगलकारी हैं शनिदेव : आमतौर पर शनिदेव को लेकर हमारे मन में कई भ्रामक धारणाएँ हैं। जैसे कि शनिदेव बहुत अधिक कष्ट देने वाले देवता हैं वगैरह-वगैरह, लेकिन वास्तविक रूप मे ऐसा नहीं है। यदि शनि की आराधना ध्यानपूर्वक की जाए तो शनिदेव से उत्तम कोई देवता ही नहीं है। शनि की जिस पर कृपा होती है उस व्यक्ति के लिए सफलता के सारे द्वार खुल जाते हैं।

शिंगणापुर की विशेषता : गौरतलब है कि कि शिंगणापुर के अधिकांश घरों में खिड़की, दरवाजे और तिजोरी नहीं है। दरवाजों की जगह यदि लगे हैं तो केवल पर्दे। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ चोरी नहीं होती। कहा जाता है कि जो भी चोरी करता है उसे शनि महाराज उसकी सजा स्वयं दे देते हैं। गाँव वालों पर शनिदेव की कृपा है व चोरी का भय ही नहीं है शायद इसीलिये दरवाजे, खिड़की, अलमारी व शिंगणापु मे नहीं है ।।

मंजू शर्मा

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एक बार एक साधू फटी हुई सी धोती पहनकर श्री राधा-रमण मंदिर आया और कहने लगा -हे प्रभु आप बड़े दयालु है करुणामयी है जो आपने मुझे इतना कुछ दिया आपका शुक्रिया है !

एक नास्तिक वहा बैठा हुआ यह सब देख रहा था !
कहने लगा -अरे पागल तेरे पास तो सिर्फ एक फटी पुरानी धोती है !

जिसमे भी कई छेद हैं और तू कह रहा है कि तुमने मुझे इतना कुछ दिया है आपका शुक्रिया है ?

साधू ने मुस्करा कर बहुत ही सुंदर उत्तर दिया ;कहा -पागल मैं नहीं तू है अरे मैं जब पैदा हुआ था तो यह धोती भी नहीं थी !

परमात्मा के प्रति उस साधू की कृतज्ञता देखकर वह नास्तिक अवाक रह गया !!

ये तो उस दीनदयाल की कृपा है कि वायु जल प्रकाश आकाश और भूमि सब बिना कोई मूल्य के दे रखा है !

उस महान कृपालु को कोटि – कोटि धन्यावाद करना चाहिए !

🌹।। जय जय श्रीराधे ।।🌹

मंजू शर्मा

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देने वाला कौन ?
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आज हमने भंडारे में भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया…
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हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं। इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा सुनिए…
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एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था।
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एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।
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कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला।
लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- “प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।”
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समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा—
“ऋषिवर…!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।”
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अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया।
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लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं।
उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।
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लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया।
यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।
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कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा—“ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।”
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साधु ने समझाया, “तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया।
इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।”
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कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया!
दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं, तो कहते हैं मैंने दिलाया ।
वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निमित्त मात्र बनाया हैं। ताकी उन तक उनकी जरूरते पहुचाने के लिये। तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??
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दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप।।
गुरू आकर द्वार पे, दूर करें संताप।।
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मंजू शर्मा

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🐿एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी❗

गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी❗

क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था❗

गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी , कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा❗
गिलहरी फिर काम पर लग जाती❗
गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो उसकी
भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता, और वो फिर काम पर लग जाती❗

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था❗

ऐसे ही समय बीतता रहा ….
एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया❗

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के❓

पूरी जिन्दगी काम करते – करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे❗

यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है❗

इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है,
पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है❗

60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है❗

तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है,
परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है❗

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : –

कितनी इच्छायें मरी होंगी❓
कितनी तकलीफें मिली होंगी❓
कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे❓

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका
भोग खुद न कर सके❗

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके❗

इस लिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो,
पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो❗

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मंजू शर्मा

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(((( सबसे बड़ा दानी ))))
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एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे ।
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रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु, एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?
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श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो ।
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तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ?
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यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा ।
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श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया ।
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इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो ।
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अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया ।
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उसने सभी गाँव वालों को बुलाया । उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया ।
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गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी ।
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अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए ।
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लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे । उनमे अब तक अहंकार आ चुका था ।
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गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे । इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे ।
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जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी ।
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उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा । मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए ।
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प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया ।
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उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो ।
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कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये ।
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उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा, यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये । ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए ।
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यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया ?
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इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है ।
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उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे । तुम में दाता होने का भाव आ गया था ।
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दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया । वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए ।
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वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे ।
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उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता ।
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यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है।
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इस तरह श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया, अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था ।


दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है ।
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यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमे यह बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए । ताकि यह हमारा सत्कर्म हो, न कि हमारा अहंकार।

((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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मंजू शर्मा

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रुला देने वाली लाइन


एक बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए एक अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर
गया।
खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया।
रेस्टॉरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे
लेकिन वृद्ध का बेटा शांत था।
खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को वॉश रूम ले गया। उनके
कपड़े साफ़ किये, उनका चेहरा साफ़ किया, उनके बालों में कंघी की,चश्मा
पहनाया और फिर बाहर लाया।
सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे।बेटे ने बिल पे किया और वृद्ध के
साथ
बाहर जाने लगा।
तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी और उससे पूछा ” क्या
तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ
अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ?? ”
बेटे ने जवाब दिया” नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर
नहीं जा रहा। ”
वृद्ध ने कहा ” बेटे, तुम यहाँ
छोड़ कर जा रहे हो,
प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा (सबक) और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद
(आशा)। ”
आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता पिता को अपने साथ बाहर ले जाना
पसंद नहीँ करते
और कहते हैं क्या करोगे आप से चला तो जाता
नहीं ठीक से खाया भी नहीं जाता आप तो घर पर ही रहो वही अच्छा
होगा.
क्या आप भूल गये जब आप छोटे थे और आप के माता पिता आप को अपनी
गोद मे उठा कर ले जाया
करते थे,
आप जब ठीक से खा नही
पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी और खाना गिर
जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी
फिर वही माँ बाप बुढापे मे बोझ क्यो लगने लगते हैं???
माँ बाप भगवान का रूप होते है उनकी सेवा कीजिये और प्यार दीजिये…
क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होगें।

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मंजू शर्मा

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बहुत सुंदर प्रसंग….✍
जो अंतर्मन को झकझोर कर रख देता है
#प्रयाग_दास💕💚💕
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प्राचीन काल की बात है प्रयाग दास नाम का एक छोटा सा छह सात वर्ष का बालक था जो अपने माता पिता की इकलौती संतान थी।
प्रयाग दास अपने मित्रों के साथ खेल रहा था तभी एक मित्र ने कहा कि जो रक्षाबंधन पर अपनी बहन से राखी बंधवा कर आएगा हम उसी को अपनी टोली में शामिल करेंगे और वही हमारे साथ खेलेगा ।
बालक प्रयाग दास यह सुनकर विह्ल हो उठा ।
अपनी मां से जाकर प्रयाग दास यह पूछता है कि मां मेरी बहन कहां है मुझे उससे राखी बंधवानी है। नहीं तो मेरे मित्र लोग मुझे अपने साथ नहीं खिलाएंगे।
माँ अपनी गृहस्थी के कार्य में लगी थी। बालक के बार-बार परेशान करने पर मां उससे झुंझलाकर कर बोलती है। की तेरी बहन जानकी है और बहनोई राम है और यह दोनों अवध में रहते हैं। अब यहां से जाओ हमें अपना काम करने दो ।
इतना सुनकर बालक प्रयाग दास प्रसन्न हो उठता है और कहता है अब तो हम अपनी बहन जानकी से मिलने जरूर जाएंगे और राखी बंधवा कर आएंगे।
और बालक प्रयाग दास यह संकल्प लेता है कि जब तक बहन को नहीं देख लेता तब तक पानी भी नहीं पियूंगा और मस्ती में आकर अवध की ओर प्रस्थान करता है और रास्ते भर प्रसन्न होते हुए जाता है।
कई दिन चलते चलते हो जाते हैं किंतु अवध नगर नहीं दिखाई देता है परंतु प्रयाग दास हताश नहीं होता वह चलता जाता है और एक समय वह अयोध्या जी पहुंच जाता है और नगर के कोने कोने में जाकर जानकी बहन को ढूंढता है किंतु वह नहीं मिलती तब भूख और प्यास से बेहाल मूर्छा खाकर वह गिर पड़ता है। तब एक संत की दृष्टि उस पर पड़ती है जोकि राम जानकी मंदिर से प्रसादी लेकर आ रहे थे संत उस बालक से कहते हैं कि बेटा लगता है तुमने बहुत दिनों से कुछ नहीं खाया लो यह जल पी लो यह प्रसादी खा लो तो बालक ने अन्न जल ग्रहण करने से इनकार कर दिया और कहा कि जब तक मेरी बहन जानकी नहीं मिल जाती जब तक मैं पानी भी नहीं पियूंगा। तब संत यह बताते हैं कि यह राम जानकी की ही प्रसादी है बालक उनसे पता पूछता है तो संत उन्हें राम जानकी मंदिर का पता बता देते हैं बालक प्रयाग दास ज्यौही मंदिर पहुंचता है। कि मंदिर के कपाट बंद हो चुके होते हैं।
प्रयाग दास चिल्ला चिल्ला कर बहन जानकी को बुलाता है तो मंदिर के पण्डे आकर बोलते हैं क्यों शोर मचा रहा है।
तब प्रयाग दास बोलता है कि मेरी बहन जानकी अंदर है उन्हें बुला दो तो पंडे बोलते हैं कि वह सो रही है प्रयाग दास बोलता है मैं जाकर जगा देता हूं प्रयाग दास की बार-बार हठ करने पर पंडित अंदर जाने का बहाना बनाते हैं। और आकर बोलते हैं कि वह 3 दिन के लिए बाहर गई है।
प्रयाग दास उदास हो जाता है और वहां से चल देता है मन में यह सोचता है कि यदि खाली हाथ लौटूंगा तो मेरे मित्र लोग मेरा मजाक उड़ाएंगे इससे तो अच्छा है यही अवध में सरयू तट पर अपने प्राण त्याग दूं ऐसा कहकर वह एक पीपल के पेड़ पर फंदा बनाकर लटकने की तैयारी करने लगता है ।
वहां मंदिर में यही सपना जानकी जी देखती हैं और प्रभु श्रीराम से बोलती है कि हे नाथ मुझे आज्ञा दीजिए मेरा छोटा भईया मुझसे राखी बंधवाने आया है तो मैं उसे राखी बांधने जाती हूं इतना कहकर जानकी जी राखी की थाली सजाकर आरती और मिष्ठान्न मेवा लेकर चल पड़ती है प्रयाग दास फांसी पर लटकने वाला ही था कि जानकीदेवी बोलती हैं कि भइया रुको मैं ही तुम्हारी बहन जानती हूं और तुम्हें राखी बांधने आई हूं और फिर प्रयाग दास उनसे मिलता है जानकी मैया अपने मायके मां बाबा के बारे में पूछती है और फिर कहती है कि भइया अब जाकर मेरी याद आई इतने दिनों से कहां थे तुम्हारी याद में तुम्हारी बहन जानकी विहल होती रहती थी और इस प्रकार सभी समाचार लेने के पश्चात प्रयाग दास को तिलक करके जानकीजी राखी बांधती है आरती उतारती है और मिठाई खिलाती है और कहती है कि भइया अब हमें भूल ना जाना और कुछ बड़े हो जाओ तो फिर आना और हमें अपने साथ लिवा ले जाना।
बालक प्रयागदस हाथ में राखी बंधवा कर वापस घर लौटता है और अपनी मां को सारी बात बताता है। और अति प्रसन्न होता है।।

यह प्रसंग इतना भवुक है कि सहज और सरल हृदय पर गहरे भाव छोड़ जाता है।
और भगवान हमसे क्या चाहते हैं पूजा पाठ भोग प्रसादी सब व्यर्थ है जब मन में भाव् ही ना हो।
बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी महान तपस्या करके जिन्हें नहीं प्राप्त कर पाते वे भगवान भाव और प्रेम मैं बंधकर अपने आप ही साधारण जीव पर भी अपनी कृपादृष्टि बरसा देते हैं।

ऐसा ही प्रेम श्री जी के चरणों में हमेशा बना रहे।

राधे राधे बोलना पडेगा।🙋🏻‍♂🙋🏻‍♂
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

राजिंदर गिरी

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🔛🔛भगवान का पेट कब भरता है?🔛🔛
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भाव का भूखा हूँ मैं और भाव ही एक सार है।
भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है।।
भाव बिन सब कुछ भी दे डालो तो मैं लेता नहीं।
भाव से एक फूल भी दे तो मुझे स्वीकार है।।
भाव जिस जन में नहीं उसकी मुझे चिन्ता नहीं।
भाव पूर्ण टेर ही करती मुझे लाचार है।।
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दुखियों की पीड़ा को दूर करना ही भगवान की वास्तविक सेवा…..
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प्रत्येक जीव में भगवान बस रहे हैं, ऐसा मानकर सभी प्राणियों को सम्मान देना और सुख पहुंचाना चाहिए। जो दूसरों को दु:ख देकर भगवान की पूजा करता है, भगवान उस पूजा को स्वीकार नहीं करते हैं। भगवान की असली सेवा-पूजा वही व्यक्ति करता है जो दूसरों के दु:ख से दु:खी और दूसरों के सुख से सुखी होता है—
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केवल अपने सुख के लिए जो वस्तुओं का संग्रह करता है उसे सदैव सुख की कमी रहती है। जो त्याग करके दूसरों को सुखी करता है उसको कभी सुख की कमी रहती ही नहीं है; क्योंकि भगवान भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर उसको सुखी बनाते हैं।
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भगवान का पेट कब भरता है ?
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तीनि लोक नवखंड में सदा होत जेवनार।
कै सबरी कै बिदुर घर तृप्त हुए दुइ बार।।

अर्थात्—यद्यपि संसार में सदैव ही भगवान के निमित्त भंडारे, ब्रह्मभोज आदि चलते रहते हैं परन्तु भगवान केवल दो बार ही शबरी और विदुरजी के घर कंद-मूल खाकर पूर्ण तृप्त हुए थे।
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प्राचीनकाल में एक परम शिवभक्त राजा था। एक दिन उसके मन में इच्छा हुई कि सोमवार के दिन अपने आराध्य भगवान शिव का हौद (वह भाग जहां जलहरी सहित पिण्डी स्थित होती है) दूध से लबालब भर दिया जाए। जलहरी का हौद काफी चौड़ा और गहरा था। राजा की आज्ञा से पूरे नगर में डुग्गी पिटवा दी गयी कि—
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‘सोमवार के दिन सारे ग्वाले शहर का पूरा दूध लेकर शंकरजी के मन्दिर आ जाएं, भगवान का हौद भरना है; जो इसका उल्लंघन करेगा, वह कठोर दण्ड का भागी होगा।’
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राजा की आज्ञा सुनकर सारे ग्वाले बहुत परेशान हुए। किसी ने भी अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाया और न ही गाय के बछड़ों को दूध पीने दिया। दुधमुंहे बच्चे भूख से व्याकुल होने लगे। सभी ग्वाले सारा दूध इकट्ठा कर मन्दिर पहुंचे और भगवान शंकर के हौद में दूध छोड़ दिया। किन्तु आश्चर्य! इतने दूध से भी हौद पूरा न भर सका। यह देखकर राजा बड़ी चिन्ता में पड़ गया।
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तभी एक बुढ़िया एक लुटिया भर दूध लेकर आयी और बड़े भक्तिभाव से भगवान पर दूध चढ़ाते हुए बोली—‘शहर भर के दूध के आगे मेरे लुटिया भर दूध की क्या बिसात! फिर भी भगवन्, मुझ बुढ़िया की श्रद्धा भरी ये दो बूंदें स्वीकार करो।’

जैसे ही बुढ़िया दूध चढ़ाकर मन्दिर से निकली, भगवान का हौद एकाएक दूध से भर गया। वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्य में पड़ गए। राजा के पास खबर पहुंची तो उसके भी आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
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अगले सोमवार को राजा ने फिर भगवान शिव का हौद दूध से भरने की आज्ञा दी। पूरे नगर का दूध भगवान शंकर के हौद में छोड़ा गया; परन्तु फिर से हौद खाली रह गया। पहले की तरह बुढ़िया आई और उसने अपनी लुटिया का दूध हौद में छोड़ा और हौद भर गया। राजकर्मचारियों ने जाकर राजा को सारा वृतान्त सुनाया। राजा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने स्वयं वहां उपस्थित रहकर इस घटना के रहस्य का पता लगाने का निश्चय किया।
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तीसरे सोमवार को राजा की उपस्थिति में नगर भर का दूध भगवान के हौद में डाला गया, पर हौद खाली रहा। इसी बीच वह बुढ़िया आयी और उसके लुटिया भर दूध चढ़ाते ही हौद दूध से भर गया। पूजा करके बुढ़िया अपने घर को चल दी। राजा उसका पीछा करने लगा। कुछ दूर जाने पर राजा ने बुढ़िया का हाथ पकड़ लिया। बुढ़िया भय से थर-थर कांपने लगीं। राजा ने उसे अभय देते हुए कहा—‘माई! मेरी एक जिज्ञासा शान्त करो। तुम्हारे पास ऐसा कौन-सा जादू-टोना या मन्त्र है जिससे तुम्हारे लुटिया भर दूध चढ़ाते ही शंकरजी का हौद एकाएक भर जाता है।’
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बुढ़िया ने कहा—‘मैं जादू-टोना, मन्त्र-तन्त्र कुछ भी नहीं जानती, न ही करती हूँ। घर के बाल-बच्चों, ग्वालबालों सभी को दूध पिलाकर तृप्त कर बचे दूध में से एक लुटिया दूध लेकर आती हूँ, भगवान को चढ़ाते ही वे प्रसन्न हो जाते हैं। भाव से उन्हें अर्पण करते ही वे उसे ग्रहण करते हैं और हौद भर जाता है। किन्तु तुम दण्ड का भय दिखाकर जबरन नगर के सारे बाल बच्चों, बूढ़ों व ग्वालबालों का पेट काटकर उन्हें भूख से तड़पता छोड़कर सारा दूध अपने कब्जे में करते हो और फिर उसे भगवान को चढ़ाते हो तो उनकी आह से भगवान उसे ग्रहण नहीं करते और उतने सारे दूध से भी भगवान का पेट नहीं भरता और हौद खाली रह जाता है।’
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राजा को अपनी भूल समझ में आ गई और आगे से उसने किसी को भी कष्ट पहुंचाने वाली हरकतें न करने की कसम खाली।

🔛🔛🔛पूजनकर्म करते समय रखें इस बात का ध्यान….🔛🔛🔛….

‘मेरे पास जो कुछ है, वह सब उस परमात्मा का ही है, मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्ति से उनका पूजन करना है’—इस भाव से जो कुछ किया जाए वह सब-का-सब परमात्मा का पूजन हो जाता है। इसके विपरीत मनुष्य जिन वस्तुओं को अपना मानकर भगवान का पूजन करता है, वे (अपवित्र भावना के कारण) पूजन से वंचित रह जाती हैं।’
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सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्तिद् दु:खभाग्भवेत्।।
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सब सुखी हो जाएं, सबके जीवन में आनन्द-मंगल हो, कभी किसी को कोई कष्ट न हो—जब इस तरह का भाव हो, वही मनुष्य कहलाने का हकदार है।
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🔛हरे कृष्णा 🔛
🔛 जय जय श्रीराधे🔛
🔛 🔜🔛 जय श्री राम 🔛🔛
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राजिंदर गिरी

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🏤 बुजुर्गौं का महत्व 🏤

एक बार किसी लड़के की शादी तय हुई पर लड़की वालों ने शर्त रख दी की बारात में कोई भी वृद्ध नहीं होना चाहिए

लड़के वाले भी अकड़ गए की यह कैसे हो, सकता है कि कोई बुजुर्ग साथ ना,हो पर बीच में कुछ लोग पड़ कर कहने लगे की ठीक है

बात पक्की हुई समय आया बारात की जब त्यारी हुई चलने की सब नौजवान त्यार हो गए बारात में तब लड़के का दादा अकड़ गया की ऐसा कैसे हो सकता है कि मेरे पोते की शादी और मैं बारात में ना जाऊँ

फिर एक बात पर सहमति बनी की सीधा तो ले नहीं जा सकते पर ढोल में डाल कर लें जाते हैं बारात लड़की वालों के यहां जब पहुंची

बारात तो सब नौजवानौं की है यही सोच कर लड़की के पिता ने शर्त रख दी की फेरे तब लगेंगे जब बारात गाँव की नदी को दूध से भर कर बहाए

बारात फिर वापस जाने लगी की यह काम हो नहीं सकता और शादी अब होगी नहीं इस लिए वापस चलो तब लड़के ने कहा दादा जी ढोल में है

अब तो उन्हें निकाल कर कह देते हैं जब दादा से बात हुई तब दादा कहने लगे वापस क्यों जाना तुम जाकर कह दो की दूध का प्रबन्ध हमने कर लिया है तुम नदी को खाली करवा लो तब लड़की वाले कहने लगे की जरूर कोई बुजुर्ग साथ आया है तब शादी हुई

बोलने का भावार्थ,,, “”” नौजवान चाहे कितनी ताकत रूतवा धन का बल दिखा ले पर परिवार के कार्य की सिद्धि या सम्पूर्णता के लिए माता पिता या घर के बुजुर्गौं का मार्ग दर्शन जरूरी है

🆒जय श्री राम जय श्री कृष्णा 🆓

राजिंदर गिरी

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

कल उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री योगी आदित्यनाथ जी ने महाराणा प्रताप की प्रशंसा की तो अनेक लोग बुरा मान गए.मुस्लिम पत्रिका ने इसे घटिया बात कहा. कारण यह है कि वामपंथी इतिहासकारों ने झूठ का मकडजाल बन कर सच को छुपाया है.
क्या अकबर महान था?

भारत में प्रचलित इतिहास के लेखक मुग़ल सल्तनत के सभी शासकों के मध्य अकबर को विशिष्ट स्थान देते हुए अकबर “महान” के नाम से सम्बोधित करते हैं। किसी भी हस्ती को “महान” बताने के लिए उसका जीवन, उसका आचरण महान लोगों के जैसा होना चाहिए। अकबर के जीवन के एक आध पहलु जैसे दीन-ए-इलाही मत चलाना, हिन्दुओं से कर आदि हटाना को ये लेखक बढ़ा चढ़ाकर बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते मगर अकबर के जीवन के अनेक ऐसे पहलु है जिनसे भारतीय जनमानस का परिचय नहीं हैं। इस लेख के माध्यम से हम अकबर के महान होने की समीक्षा करेंगे।

व्यक्तिगत जीवन में महान अकबर

अबुल फज़ल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है- “अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थी और हर एक का अपना अलग घर था।” ये पांच हजार औरतें उसकी 36 पत्नियों से अलग थी।

नेक दिल अकबर ग़ाजी का आगाज़

6 नवम्बर 1556 को 14 साल की आयु में अकबर ने पानीपत की लड़ाई में भाग लिया था। हिंदू राजा हेमू की सेना मुग़ल सेना को खदेड़ रही थी कि अचानक हेमू को आँख में तीर लगा और वह बेहोश हो गया। उसे मरा सोचकर उसकी सेना में भगदड़ मच गयी। तब हेमू को बेहोशी की हालत में अकबर के सामने लाया गया और इसने बहादुरी से बेहोश हेमू का सिर काट लिया। एक गैर मुस्लिम को मौत के घाट उतारने के कारण अकबर को गाजी के खिताब से नवाजा गया। हेमू के सिर को काबुल भिजा दिया गया एवं उसके धड़ को दिल्ली के दरवाजे से लटका दिया गया। जिससे नए बादशाह की रहमदिली सब को पता चल सके। अकबर की सेना दिल्ली में मारकाट कर अपने पूर्वजों की विरासत का पालन करते हुए काफिरों के सिरों से मीनार बनाकर जीत का जश्न बनाया गया। अकबर ने हेमू के बूढ़े पिता को भी कटवा डाला और औरतों को शाही हरम में भिजवा दिया। अपने आपको गाज़ी सिद्ध कर अकबर ने अपनी “महानता” का परिचय दिया था[i]।

अकबर और बैरम खान

हुमायूँ की बहन की बेटी सलीमा जो अकबर की रिश्ते में बहन थी का निकाह अकबर के पालनहार और हुमायूँ के विश्वस्त बैरम खान के साथ हुआ था। इसी बैरम खान ने अकबर को युद्ध पर युद्ध जीतकर भारत का शासक बनाया था। एक बार बैरम खान से अकबर किसी कारण से रुष्ट हो गया। अकबर ने अपने पिता तुल्य बैरम खान को देश निकाला दे दिया। निर्वासित जीवन में बैरम खान की हत्या हो गई। पाठक इस हत्या के कारण पर विचार कर सकते है। अकबर यहाँ तक भी नहीं रुका। उसने बैरम खान की विधवा, हुमायूँ की बहन और बाबर की पोती सलीमा के साथ निकाह कर अपनी “महानता” को सिद्ध किया[ii]।

स्त्रियों के संग व्यवहार

बुंदेलखंड की रानी दुर्गावती की छोटी सी रियासत थी। न्यायप्रिय रानी के राज्य में प्रजा सुखी थी। अकबर की टेढ़ी नज़र से रानी की छोटी सी रियासत भी बच न सकी। अकबर अपनी बड़ी से फौज लेकर रानी के राज्य पर चढ़ आया। रानी के अनेक सैनिक अकबर की फौज देखकर उसका साथ छोड़ भाग खड़े हुए। पर फिर हिम्मत न हारी। युद्ध क्षेत्र में लड़ते हुए रानी तीर लगने से घायल हो गई। घायल रानी ने अपवित्र होने से अच्छा वीरगति को प्राप्त होना स्वीकार किया। अपने हृदय में खंजर मारकर रानी ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अकबर का रानी की रियासत पर अधिकार तो हो गया। मगर रानी की वीरता और साहस से उसके कठोर हृदय नहीं पिघला। अपने से कहीं कमजोर पर अत्याचार कर अकबर ने अपनी “महानता” को सिद्ध किया था[iii]।

न्यायकारी अकबर

थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था। दोनों ने अकबर के समक्ष विवाद सुलझाने का निवेदन किया। अकबर ने आदेश दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले। उन मूर्ख आत्मघाती लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी। जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनिकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया। और अंत में इसने दोनों तरफ के लोगों को ही अपने सैनिकों से मरवा डाला। फिर अकबर महान जोर से हंसा। अकबर के जीवनी लेखक के अनुसार अकबर ने इस संघर्ष में खूब आनंद लिया। इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ अकबर के इस कुकृत्य की आलोचना करते हुए उसकी इस “महानता” की भर्तसना करते है[iv]।

चित्तौड़गढ़ का कत्लेआम

अकबर ने इतिहास के सबसे बड़े कत्लेआम में से एक चित्तौड़गढ़ का कत्लेआम अपने हाथों से अंजाम दिया था। चित्तोड़ के किले में 8000 वीर राजपूत योद्धा के साथ 40000 सहायक रुके हुए थे। लगातार संघर्ष के पश्चात भी अकबर को सफलता नहीं मिली। एक दिन अकबर ने किले की दीवार का निरिक्षण करते हुए एक प्रभावशाली पुरुष को देखा। अपनी बन्दुक का निशाना लगाकर अकबर ने गोली चला दी। वह वीर योद्धा जयमल थे। अकबर की गोली लगने से उनकी अकाल मृत्यु हो गई। राजपूतों ने केसरिया बाना पहना। चित्तोड़ की किले से धुँए की लपटे दूर दूर तक उठने लगी। यह वीर क्षत्राणीयों के जौहर की लपटे थी। अकबर के जीवनी लेखक अबुल फ़ज़ल के अनुसार करीब 300 राजपूत औरतों ने आग में कूद कर अपने सतीत्व की रक्षा करी थी। राजपूतों की रक्षा पंक्ति को तोड़ पाने में असफल रहने पर अकबर ने पागल हाथी राजपूतों को कुचलने के लिए छोड़ दिए। तब कहीं वीर राजपूत झुंके थे। राजपूत सेना के संहार के पश्चात भी अकबर का दिल नहीं भरा और उसने अपनी दरियादिली का प्रदर्शन करते हुए किले के सहायकों के कत्लेआम का हुकुम दे दिया। इतिहासकार उस दिन मरने वालों की संख्या 30,000 लिखते हैं। बचे हुए लोगों को बंदी बना लिया गया। कत्लेआम के पश्चात वीर राजपूतों के शरीर से उतारे गए जनेऊ का भार 74 मन निकला था। इस कत्लेआम से अकबर ने अपने आपको “महान” सिद्ध किया था[v]।

शराब का शौक़ीन अकबर

सूरत की एक घटना का अबुल फजल ने अपने लेखों में वर्णन किया हैं। एक रात अकबर ने जम कर शराब पी। शराब के नशे में उसे शरारत सूझी और उसने दो राजपूतों को विपरीत दिशा से भाग कर वापिस आएंगे और मध्य में हथियार लेकर खड़े हुए व्यक्ति को स्पर्श करेंगे। जब अकबर की बारी आई तो नशे में वह एक तलवार को अपने शरीर में घोंपने ही वाला था तभी अपनी स्वामी भक्ति का प्रदर्शन करते हुए राजा मान सिंह ने अपने पैर से तलवार को लात मार कर सरका दिया। अन्यथा बाबर के कुल के दीपक का वही अस्त हो गया होता। नशे में धूत अकबर ने इसे बदतमीजी समझ मान सिंह पर हमला बोल दिया और उसकी गर्दन पकड़ ली। मान सिंह के उस दिन प्राण निकल गए होते अगर मुजफ्फर ने अकबर की ऊँगली को मरोड़ कर उसे चोटिल न कर दिया होता। हालांकि कुछ दिनों में अकबर की ऊँगली पर लगी चोट ठीक हो गई। मजे अपने पूर्वजों की मर्यादा का पालन करते हुए “महान” अकबर ने यह सिद्ध कर दिया की वह तब तक पीता था जब तक उससे न संभला जाता था[vi]।

खूंखार अकबर

एक युद्ध से अकबर ने लौटकर हुसैन कुली खान द्वारा लाये गए युद्ध बंधकों को सजा सुनाई। मसूद हुसैन मिर्जा जिसकी आँखेँ सील दी गई थी की आँखें खोलने का आदेश देकर अकबर साक्षात पिशाच के समान बंधकों पर टूट पड़ा। उन्हें घोड़े,गधे और कुत्तों की खाल में लपेट कर घुमाना, उन पर मरते तक अत्याचार करना, हाथियों से कुचलवाना आदि अकबर के प्रिय दंड थे। निस्संदेह उसके इन विभित्स अत्याचारों में कहीं न कहीं उसके तातार पूर्वजों का खूंखार लहू बोलता था। जो उससे निश्चित रूप “महान” सिद्ध करता था[vii]।

अब भी अगर कोई अकबर को महान कहना चाहेगा तो उसे संतुष्ट करने के लिए महान की परिभाषा को ही बदलना पड़ेगा।

डॉ विवेक आर्य

[i] Akbar the Great Mogul- Vincent Smith page No 38-40

[ii] Ibid p.40

[iii] Ibid p.71

[iv] Ibid p.78,79

[v] Ibid p.89-91

[vi] Ibid p.89-91

[vii] Ibid p.116 source facebook.com/arya.samaj