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🌹 राघव की भक्ति 🌹
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राघव एक बहुत ही निर्धन व्यक्ति था, उसके पास दो समय खाने के लिए भोजन की व्यवस्था करना भी बहुत कठिन कार्य था।
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वह भोजन की आशा में ठाकुर जी के एक बड़े मंदिर के बाहर जाकर बैठ जाता और हर आने जाने वाले से भोजन की आशा रखता था।
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मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं से उसको जो भी भोजन मिल जाता था उसको खा कर संतुष्ट रहता था।
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अधिक की उसने कभी कामना नहीं की थी, पेट भरने लायक भोजन मिल जाए बस उतने में ही संतुष्ट रहता था।
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निर्धन था किन्तु हृदय से बहुत दयालु था, उसका यही प्रयास रहता था, कि यदि किसी को उसकी आवश्यकता है तो वह उसकी सहायता करें।
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किन्तु हमारा समाज ही ऐसा है, निर्धन को तो कभी मनुष्य माना ही नहीं जाता, उसकी सहायता लेना तो दूर कोई उसको अपने पास भी नहीं आने देता था।
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किन्तु राघव अपनी धुन में मस्त रहता था, कभी उसको ज्यादा भोजन प्राप्त हो जाता था तो वह अपनी आवश्यकता के अनुसार भोजन रख कर शेष भोजन अपने जैसे ही किसी निर्धन भूखे को दे देता था।
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कई बार ऐसा भी होता था कि उसको सारे दिन थोड़ा सा भी भोजन नहीं मिल पाता था तब उस दिन वह भूखा ही रह जाता था किन्तु किसी के प्रति मन में कोई मैल नही रखता था।
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एक दिन ठाकुर जी के मंदिर में एक बहुत बड़े संत दर्शन के लिए पहुंचे।
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स्वभाववश राघव ने संत से भी भोजन की अपेक्षा रखी।
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संत समृद्ध और संम्पन्न व्यक्ति थे राघव को देख कर उनको उस पर दया आई..आती भी क्यों ना संत तो आखिर संत ही होते हैं उन्होंने करुणा वश उसकी सहायता करनी चाही किन्तु फिर उनके अंदर का संत जाग्रत हो उठा उन्होंने उसका उद्धार करने के उद्देश्य से मन में सोंचा..
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यदि मैं इसकी आज सहायता करता हूँ तो उससे इसका क्या भला होगा ज्यादा से ज्यादा आज का भोजन मिल जायेगा कल यह फिर भिक्षा मांगेगा,यदि मैं कुछ दिनों के लिए इसके भोजन की व्यवस्था करता हूँ तब भी उतने दिनों तक ही भोजन प्राप्त कर सकता है, उसके बाद फिर से भिक्षा मांगने लगेगा,ऐसे तो इसका जीवन यूं ही व्यतीत हो जायेगा, इस अभागे के लिए कुछ ऐसा किया जाए जिससे इसका जीवन ही सुधर जाए।ऐसा विचार कर उन्होंने मन ही मन ठाकुर जी का स्मरण किया और राघव को झिड़कते हुए बोले..अरे क्या भोजन भोजन की रट लगा रखी है, कभी किसी समय भजन में भी ध्यान लगाया है,ठाकुर जी के मंदिर के द्वार पर आकर भी हर किसी से भिक्षा मांगता रहता है, अरे भिक्षा मांगनी ही है तो ठाकुर जी से मांग, वही सबके दाता हैं।
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जितना प्रयास तू प्रतिदिन भोजन प्राप्त करने के लिए करता है उसका रत्ती भर भी यदि ठाकुर जी को प्राप्त करने के लिए करता तो तेरी यह दुर्दशा ना होती,मेरे पास तुझको देने के लिए कुछ नही है, जा मांगना है तो ठाकुर जी से मांग।इस प्रकार राघव को झिड़कते हुए संत वहां से चले गए।
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किन्तु संत की यह बात राघव के हृदय को लग गई , उसके मन में ठाकुर जी को प्राप्त करने की लालसा जाग उठी,उसने मन में निश्चय कर लिया की अब मैं कभी किसी व्यक्ति से भिक्षा नहीं मांगूंगा जो भी मांगूंगा ठाकुर जी से ही मांगूंगा।निर्धन था, फटे हाल था, कई दिनों से स्नान भी नहीं किया था, जिस कारण उसके वस्त्रों और शरीर से दुर्गन्ध आती थीअपनी इस बुरी स्तिथि को देख राघव ठाकुर जी के मंदिर में प्रवेश करने का साहस नही कर पाया उसने बाहर से ही ठाकुर जी को प्रणाम किया और मन ही मन उनसे बोला कि हे ठाकुर जी आज से आप ही मेरे दाता है,अब आप के सामने ही अपने हाथ फैलाऊंगा, आप दो या ना दो आपकी इच्छा किन्तु जब तक आप नही दोगे मैं किसी से कुछ नही मांगूगा।ऐसा कहकर ठाकुर जी को प्रणाम कर राघव उन संत की तलाश में निकल पड़ा।बहुत भटकने के बाद एक स्थान पर उसको वह संत दिखाई दिए, राघव उनके पास पहुंचा और दोनों हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया।संत ने सोंचा कि यह फिर कुछ मांग रहा है, तब उन्होंने कहा तू फिर आ गया, तेरी समझ में नही आया, अरे मेरे पास तुझको देने के लिए कुछ नही है। संत ने इतना कहा ही था कि राघव उनके चरणों में गिर पड़ा और बोला महात्मा जी मैं आपसे कुछ मांगने नही आया हूँ,
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आपने तो मुझको वह दे दिया जो एक राजा भी नही दे सकता था, अब तो बस आपका आशीर्वाद पाना चाहता हूँ।संत के पूंछने पर राघव ने अपना संकल्प उनको बताया संत की आँखों से आँसू बह निकले उन्होंने राघव को प्रेम पूर्वक उठाया और अपने हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद दिया, जा ठाकुर जी तेरी मनोकामना पूर्ण करें।
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राघव अपने घर लौट आया उस दिन के बाद वह प्रतिदिन ठाकुर जी के मंदिर तो जाता किन्तु भिक्षा मांगने नही बस मंदिर के बाहर बैठा रहता और ठाकुर जी का ध्यान करता रहता।इस प्रकार कई दिन बीत गए, उसको किसी से कोई भोजन प्राप्त नही हुआ, किन्तु उसने किसी से भोजन की मांग नही करी।चार पांच दिन जब भूखे रहते व्यतीत हो गए तो राघव ने सोंचा कि मेने ठाकुर जी को कभी कुछ अर्पित नहीं करा,बल्कि उनके नाम से मांगता ही रहा, शायद इसी कारण वह मुझ पर दया नहीं कर रहे हैं। किन्तु वह निर्धन जिससे पास भोजन के लिए भी कुछ नहीं था भला ठाकुर जी को क्या अर्पित करता,तब उसने विचार किया की क्यों ना ठाकुर जी को फूलों की माला ही अर्पित कर दूँ, कुछ तो दे ही दूँ।
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ऐसा विचार करके चला मंदिर की और किन्तु वह माला भी कहाँ से लाता उसके लिए भी धन की आश्यकता पड़ती, धन उसके पास था नहीं,उसने विचार किया कि फूल बेचने वाले के पास जाता हूँ, शायद वह एक माला दे ही दे। राघव फूल बेचने वाले की दुकान पर पहुंचा किन्तु तभी उसको स्मरण हुआ कि उसने किसी से कुछ ना मांगने का संकल्प लिया है,अब क्या करे सोच-विचार कर ही रहा था की उसकी दृष्टि दुकान के एक कोने पर पड़ी जहां दुकानदार ने पुरानी मुरझाई हुई मालाएं डाल रखी थीं,
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राघव को और कुछ नहीं सूझा उसने उन मुरझाई मालाओं में से एक माला उठा ली और चल दिया ठाकुर जी के मंदिर की और।आज उसके कदमो में विचित्र तेजी थी, एक विश्वास और उत्साह, किन्तु उसका उत्साह क्षण मात्र में विलीन हो गया,जैसे ही वह मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने लगा, मंदिर के सेवादारों ने उसको रोक दिया उसने बहुत मन्नतें की और कहा कि उसको ठाकुर जी के दर्शन करने दो, मैं उनको यह फूलों की माला अर्पित करने आया हूँ,माला देखकर सेवादार हंसने लगे उन्होंने उसका उपहास उड़ाया।यह सब चल ही रहा था तभी मंदिर के मुख्य पुजारी आ पहुंचे। शोर शराबा सुनकर उन्होंने सेवादारों से कारण पूंछा तो उन्होंने सब बात बता दी। मुख्य पुजारी भी राघव और उसकी माला को देखकर मुस्कराए और बोले अरे तू तो जाकर भिक्षा मांग यहाँ तेरा क्या काम,उन्होंने सेवादारों से कहा इसको यहाँ से हटाओ, आने जाने वालो को परेशानी हो रही है।
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सेवादारों ने उसको वहां से चले जाने को कहा।हताश राघव ने मन ही मन ठाकुर जी का समरण किया और कहा कि हे ठाकुर जी मैं कैसे आपके दर्शन को आऊं, अब आप ही दया कीजिए,मैं स्वयं तो आपको माला अर्पित कर नही कर पाया आप ही इसको स्वीकार कीजिये। ऐसा कहकर राघव ने वह मुरझाई माला मंदिर की सीढ़ियों पर ही रख दी और चला गया,राघव को ऐसा करते देख मुख्य पुजारी ने घृणा से सेवादारों से कहा इस माला को यहाँ से हटाओ।सेवादारों ने मुख्य पुजारी के सामने ही माला उठा कर पास की झाड़ियों में डाल दी।इस सारे घटनाक्रम के बाद जब मुख्य पुजारी ने मंदिर में ठाकुर जी के भवन में प्रवेश किया तो वहां विचित्र सा कोलाहल था, जिसे देख कर पुजारी जी ने अन्य सेवादारों से उसका कारण पूछा तो सभी ने एक साथ ठाकुर जी के श्री विग्रह की और संकेत करके कहा कि ठाकुर जी के गले में पड़ी सभी फूल मालाएँ एक क्षण में सूख गई,मुख्य पुजारी ने ठाकुर जी की और देखा तो यह सत्य था, ठाकुर जी के गले में पड़ी सभी फूल मालाएँ ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो कई दिन पुराने सूखे फूलों की हो।सभी लोग बोले की यह सभी मालाएं कुछ क्षण पूर्व एकदम ताजी थी और अपनी सुगंध फैला रहीं थी,किन्तु ना जाने क्या हुआ अचानक ही सब सूख गई।मुख्य पुजारी को बहुत ही आश्चर्य हुआ, उन्होंने सेवादारों से नई मालाएं लाने को कहा, तुरंत ही नई और ताज़ी मालाएं आ गई, पुजारी जी ने जैसे है वह मालाएं ठाकुर जी के गले में पहनाई तुरंत ही वह मालाएं भी पहले की तरह सूख गई।
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अब सब लोग बहुत चिंतित हुए। सभी के मन में एक ही विचार था कि कही ना कही किसी से कोई बड़ा अपराध हुआ है जिस कारण यह सब हो रहा है,सभी लोग विचार विमर्श कर ही रहे थे तभी मुख्य पुजारी की दृष्टि ठाकुर जी के चरणों में पड़ी एक मुरझाई हुई माला पर पड़ी थी,वह माला मुरझाई हुई अवश्य थी, किन्तु सूखी हुई नहीं थी उसमे से भीनी-भीनी सुगन्ध भी आ रही थी,उस माला को देखते ही मुख्य पुजारी के मुख से अचानक ही निकला, अरे यह क्या, यह यहाँ कैसे,उन्होंने देखा वह वही माला थी जो राघव मंदिर की सीढ़ियों पर छोड़ कर गया था।मुख्य पुजारी तुरंत ही मंदिर से बाहर की और भागे, अन्य लोग भी उनके पीछे पीछे गए किन्तु किसी को समझ नहीं आया कि पुजारी जी अचानक बाहर क्यों भागे।सीढ़ियों के पास पहुँच कर पुजारी जी ने सेवादारों से कहा जरा उस माला को देखो जो राघव यहाँ डाल कर गया था।सेवादारों ने झाड़ियों में उस माला को बहुत तलाशा किन्तु वह वहां नहीं मिली।अब मुख्य पुजारी को समझ आ गया की उनसे बड़ा अपराध हो गया है,
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उन्होंने सारी बाते अन्य लोगो को बताई और कहा कैसे भी हो राघव को ढूंढ कर लाओ।बहुत ढूंढने के बाद आखिर एक स्थान पर राघव बैठा मिला, वह ठाकुर जी के ध्यान में मग्न भजन गाने में मस्त था।जब उसने देखा की उसके चारो और बहुत से लोग एकत्रित है तो उसने पूंछा क्यों भाई क्या बात हो गई, मुझसे कोई अपराध हुआ है क्या ?सेवादारों ने कहा शीघ्र चलो मुख्य पुजारी ने तुमको बुलाया है।राघव ने सोंचा कि निश्चित ही उससे कोई अपराध हुआ है, वह डरता हुआ ठाकुर जी को याद करता हुआ सेवादारों के साथ चल दिया।जैसे ही सब लोग मंदिर पहुंचे मुख्य पुजारी दौड़ कर राघव के पास पहुंचे और उसके चरणों में गिर पड़े,
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राघव अचानक हुई इस घटना से अचकचा कर पीछे हट गया, उसकी समझ में नहीं आया कि यह क्या हो रहा हैं।तब पुजारी जी ने राघव को समस्त घटना बताई और उससे अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी और कहा कि.हम सबने तुमको पहचानने में बहुत बड़ी भूल कर दी, तुम तो ठाकुर जी के लाडले हो, ठाकुर जी रुष्ट हो गए है अब तुम्ही उनको मनाओ।यह सब सुनकर राघव को बहुत संकोच हुआ उसकी आँखों से आंसू बह निकले किन्तु वह मंदिर में प्रवेश करने का साहस नहीं कर पा रहा था।
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इस घटना की चर्चा समस्त नगर में अग्नि के सामान फैल चुकी थी, उन संत के कानो में भी इसकी भनक पड़ी, वह तुरंत ही मंदिर की और चल दिए,वहां पहुँच कर संत ने राघव से कहा राघव संकोच क्यों करते हो, ठाकुर जी ने तुमको पुकारा है,यह तुम्हारी भक्ति और निष्ठा का ही फल है जाओ और ठाकुर जी का अभिनन्दन करो।राघव संत के पैरो में गिर पड़ा उसकी आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे,
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संत ने राघव को प्रेम पूर्वक उठाया और उसको लेकर भगवान के भवन की और बढे, पीछे-पीछे सभी लोग चले।भवन में पहुँच कर संत ने राघव को फूलों की माला देते हुए कहा राघव ठाकुर जी के गले में सूखी मालाएं उचित नहीं। राघव ने कांपते हाथो से माला को पकड़ा और ठाकुर जी के चरणों में अर्पित करते हुए रुंधे गले से बोला हे ठाकुर जी, मुझ पापी पर आपने इतनी बड़ी कृपा करी, आप दया के सागर है, सत्य है कि आप ही सबके दाता है,आपने मेरी झोली में वह भिक्षा डाल दी जिसकी मेने स्वप्न में भी कभी कल्पना नहीं कि थी,हे दयानिधान मैं पापी इस योग्य नहीं कि आपके गले में माला अर्पित कर सकूँ, मुझको तो आप अपने चरणों में ही रहने दें, और इस माला को स्वीकार कीजिए।
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राघव के माला अर्पित करने के बाद सभी ने ठाकुर जी को माला अर्पित करी किन्तु अब कोई माला नहीं मुरझाई, सम्पूर्ण भवन फूलों की भीनी भीनी सुगंध से भर उठा।अब राघव पुनः उन संत के चरणों को पकड़ कर बोला, हे महात्मा मेरे जीवन को नया आधार देकर आपने मुझ पर बहुत बड़ा अनुग्रह किया है, मैं जीवन भर आपका ऋणी रहूँगा, अब यह जीवन आपका है, मुझको भी अपने साथ ले लीजिए, आपकी सेवा करूँगा और ठाकुर जी का भजन बस अब यही मेरा जीवन है।संत ने प्रेम से राघव को उठाया और उसको अपने गले लगा कर बोले राघव तुम ठाकुर जी के सच्चे भक्त हो, मैं तुमको इंकार नहीं कर सकता।राघव संत के साथ रहने लगा, मंदिर में ठाकुर जी की सेवा का कार्य भी राघव को सौंप दिया गया।
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अब उसको भिक्षा मांगने की आवश्यकता नहीं रही थी, ठाकुर जी ने उसको इतना दिया कि वह दुसरे भूखों का पेट भरने लगा। राघव अब संत राघव बन चुका था।
जय श्री राधा माधव

संजय गुप्ता

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