Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जयश्री राधेकृष्ण जयश्री लक्ष्मीनारायण


मिथिला के राजा जनक ने एकबार विचित्र स्वप्न देखा. राजा जनक को सपना आया कि उनके राज्य में विद्रोह हो गया है. प्रजा ने राजा से गद्दी छीन ली है और उन्हें नगर से खदेड़ दिया है।भूख-प्यास से बेहाल जनक मारे-मारे फिर रहे हैं. तभी राजा ने देखा कि एक सेठ के भवन के बाहर खिचड़ी का प्रसाद बांट जा रहा है. भूख से तड़पते जनक भी वहां गए और थोड़ी खिचड़ी मांग लाए।
वह खिचड़ी खाने बैठे ही थे कि दो सांड लड़ते हुई वहां आ चले आए. लोगों में अफरा तफरी मच गई. किसी का हाथ लगा और राजा के हाथ से खिचड़ी का बर्तन गिर गया. सारी खिचड़ी मिटटी में मिल गयी।
जनक निराश हो गए और दुःख से रोने-बिलखने लगे. रोने से उनकी आंख खुल गई. राजा का भयंकर स्वप्न टूट चुका था. सेवक अपने राजा को जगाने के लिए मंगलकान कर रहे थे।
जनक आश्चर्य में पड़ गए कि आखिर सत्य क्या है- सपने की बात या उनके लिए गाया जाने वाला जयगीत? उनके खिचड़ी जैसे आहार के लिए परेशान होने का क्या संकेत है?
जनक ने ज्योतिषियों और पंडितों से अपने सपने का मर्म पूछा. कोई राजा को संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया.
जनक दरबार में परमज्ञानी अष्टावक्र पधारे. राजा ने अष्टावक्र को भी अपनी उलझन बताई और इसका विश्लेषण करने को कहा।
अष्टावक्र ने उत्तर दिया- महाराज, न तो वह सच था और न ही यह सच है. सपना एक भ्रमजाल है और संसार एक मायाजाल. न तो स्वप्न शाश्वत था और न ही यह संसार और इसके भोग व वैभव शाश्वत हैं.
आप दो मिथ्याओं का शाश्वत उत्तर खोज रहे हैं. यही तृष्णा है क्योंकि जो झूठा है उसका उत्तर सच कैसे हो सकता है. महाराज! आप प्राणियों के शासक नहीं उनने पालक हैं।
आज ईश्वर ने यह कार्य आपको सौंपा है, कल किसी और को सौंप देंगे. यदि कुछ शाश्वत है तो वह है आपका कर्म.
यदि राजा के रूप में आपके कर्म उत्तम होंगे तो किसी अन्य जन्म में आप राजा नहीं भी हुए तो भी आपको प्रजापालकर राजा मिलेगा जिसके प्रभाव से आपके हाथ की खिचड़ी नहीं गिरेगी, अर्थात भूखे नहीं रहेंगे.
जनक अष्टाव्रक के संकेत को समझ गए. उनका खूब सत्कार कर विदा किया और स्वयं कृषि कार्य करने लगे. हल चलाते हुए ही जनक को खेतों में जगज्जननी मां सीता मिली थीं।

संजय गुप्ता

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🔸 योग और भोग 🔸
😊एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया कि “मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना , किन्तु उसी घड़ी
मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ?
इसका क्या कारण है ? राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर होगये क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी
सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं?
सभी विद्वजन इस प्रश्न का उत्तर सोच ही रहे थे कि, अचानक एक वृद्ध खड़े हुये और बोले, “महाराज की जय हो ! आपके प्रश्न का उत्तर भला कौन दे सकता है , आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में यदि जाएँ तो वहां पर आपको एक
महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है।”
राजा की जिज्ञासा बढ़ी।
घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार (गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं।
सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा
“तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है मैं भूख से पीड़ित हूँ ।तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं,वे दे सकते हैं।”
राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या
महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का🤔🤔🤔 रह गया, दृश्य ही कुछ ऐसा था
महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे
राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है , आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है।”
सुन कर राजा बड़ा बेचैन🙁🙁🙁 हुआ बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न, उत्सुकता प्रबल थी।
कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ वहाँ भी जाकर देखता हूँ क्या होता है?
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा, गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा,
“राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुनो लो तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई व राजकुमार थे। एकबार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे
भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली जैसे तैसे हमने चार बाटी सेकीं और अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा आ गये । अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –
बेटा मैं दस दिन से भूखा हूँ अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो, मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाए, इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी ” इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले “तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा ? चलो भागो यहां से।
वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही किन्तु उन भइया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?”
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये , मुझे से भी बाटी मांगी… तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि ” चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?”
बालक बोला “अंतिम आशा लिये वो महात्मा हे राजन ! आपके पास आये, आपसे भी दया की याचना की।
सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा।
बालक ने कहा “इस प्रकार हे राजन ! उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं ,धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं, किन्तु सबके फल रूप, गुण, आकार-प्रकार, स्वाद में भिन्न होते हैं।
इतना कहकर वह बालक मर गया।
राजा अपने महल में पहुंचा और सोचने लगा……🤔🤔🤔🤔🤔
एक ही मुहूर्त में अनेकों जातक जन्मते हैं किन्तु सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं।
जैसे कर्म करेंगें वैसे ही योग बनेंगे।*यही *जीवनचक्र है।
देखा आपने! चार राजकुमार भाई सबका भाग्य अलग अलग।
लेकिन क्यों
कारण स्पष्ट अपना कर्म

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संजय गुप्ता

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ससुराल कैसे बदलते हैं सीख लो ……………….👌

एक लड़का एक लड़की एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे .लड़का का नाम अमित था और लड़की का नाम किरन .. दोनों शादी भी करना चाहते थे . दोनों ने अपने घर में बात की घर वाले तैयार हो गए शादी भी हो गई दोनों ही बहुत खुश थे उनके घर वाले भी बहुत खुश थे
लेकिन किरन और उसकी सास में बिल्कुल भी नहीं बनती रोज कुछ ना कुछ झगड़ा या कोई बात हो ही जाती पहले तो इन बातों को किरन इग्नोर करते रही . लेकिन अमित बहुत परेशान होता रोज रोज झगड़ा देख कर वह और भी परेशानियां था ऑफिस जाता काम में उसका मन नहीं लगता वह अपनी पत्नी और अपनी मां के बारे में ही सोचता रहता कि किसी तरह झगड़ा बंद हो लेकिन ऐसा नहीं होता रोज झगड़ा होता तभी उसने फैसला किया कि मैं अपनी फैमिली से अलग रहने का उसकी पत्नी यह जानकर पहले तो बहुत खुश हुई . ,,,, लेकिन बाद में ….
सोचने लगी क्या यह ठीक रहेगा हम अलग रहेंगे …पहले अपना घर छोड़ आर्इ और अब ससुराल भी छोड़ दु . लेकिन उसका पति भी मन ही मन अपनी फैमिली को नहीं छोड़ना चाहता था लेकिन अपनी पत्नी को खुश देखने के लिए अपनी फैमिली से अलग रहना चाहता था .., फिर भी अपनी पत्नी से बोला आज सामान पैक करो शाम को हम अलग रूम में रहेंगे . दिन में उसकी पत्नी सामान पैक करने लगी तभी उसने सोचा जब वह अपना परिवार छोड़ कर आई थी तो उसे कितनी तकलीफ हुई थी बहुत रोई थी वह आज जब उसका पति अपनी फैमिली से अलग होगा . वही तकलीफ उसे भी होगी उसने सामान पैक नहीं किया और घर के काम में लग गई शाम को उसका पति आया तो बोला तुमने सामान क्यों नहीं पैक किया .
किरन बोली की मैं इस घर को छोड़कर नहीं जाऊंगी अपनी फैमिली से दूर नहीं रहूंगी एक बार अपनी फैमिली को छोड़ कर आई पर दोबारा नहीं छोड़ सकती लदाइ झगड़े तो हर घर में होती हैं तो क्या सब घर छोड़ देते हैं … किरन बोली अमित से की तुम खुद बताओ अपनी माँ से दूर हो कर क्या खुश रहोगे या तुम्हारी माँ खुश रहेगी जो तुमको जन्म दिया हैं बचपन से तुमको खिला पिला कर आज इतना बड़ा किया . क्या उसे तकलीफ़ नही होगी .
यह सब सुनकर उसके पति की आंखों में आंसू आ गए तभी उसकी पत्नी बोली मुझे पता है मां से अलग होने का दर्द क्या होता है आज मैं एक पत्नी हु कल मैं भी मां बनूँगी मेरा भी लड़का होगा अगर वह अलग होगा मुझे भी दर्द होगा मेरा भी दिल रोएगा तभी किरन की सास ये सब सुनकर उसे गले से लगा लिया और बोली बहू आज से सारे झगड़े खत्म तुमने मेरी आंखे खोल दी अब हम कभी झगड़े नही करेंगे आपस में मिल कर रहेंगे एक मां बेटी की तरह सब बहुत खुश हो गये ,,,,,,?

अगर औरत चाहें तो किसी को भी बदल देगी कोई इन्सान हो या ससुराल हो ……

संजय गुप्ता

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पराया_घर _
एक बार पढ़ कर देखो आंखों में आंसू आ जाएंगे

शादी के तीसरे दिन ही बीएड का इम्तेहान देने जाना था उसे। रात भर ठीक से सो भी नहीं पायी थी। किताब के पन्नों को पलटते हुए कब भोर हुई पता भी नहीं चला। हल्का उजाला हुआ तो रितु जगाने के लिए आ गयी। बहुत मेहमान थे, तो सबके जागने से पहले ही दुल्हन नहा ले। नहीं तो फिर आंगन में भीड़ बढ़ जाएगी। सबके सामने सब गीले बाल, सिर पर पल्लू लिए बिना थोड़े निकलेगी। नहा कर रूम मे बैठ कर फिर किताब में खो गयी। मुँह-दिखाई के लिए दो-चार औरतें आयी थी। सब मुँह देख कर हाथों में मुड़े-तुड़े कुछ पचास के नोट और सिक्के दे कर बैठ गयी ओसारा पर।
घड़ी में देखा तो साढ़े आठ बज़ रहे थे।

नौ बजे निकलना था। तैयार होने के लिए आईने के सामने साड़ी ले कर खड़ी हो गयी। चार-पाँच बार बांधने की कोशिश की मगर ऊपर-नीचे होते हुए वो बंध न पाया। साड़ी पकड़ कर रुआंसी सी हो कर बैठ गयी। “अम्मा को बोला था शादी नहीं करो मेरी अभी। इम्तेहान दे देने दो। मेरा साल बर्बाद हो जायेगा मगर मेरी एक न सुनी। नौकरी वाला दूल्हा मिला नहीं की बोझ समझ कर मुझे भेज दिया। ” आंसू पोछतें हुए बुदबुदा रही थी।

“तैयार नहीं हुई। बाहर गाड़ी आ गयी है। जल्दी करो न।” दूल्हे मियां कमरे में आते हुए बोले। वो चुप-चाप बिना कुछ बोले साड़ी लपेटने लगी। इतने में पीछे से सासु माँ कमरे में कुछ लेने आयी। दुल्हिन को यूँ साड़ी लिए खड़ी देख कर माज़रा समझ में आ गया।

वो कमरे से बाहर आ कर रितु को आवाज़ लगा कर कुछ लाने को बोली।
“सुनो बेटा ये पहन कर जावो परीक्षा देने
माथे पर ओढनी रख लेना
आज हमें कोई कुछ बोलेगा तो कल को तुम मास्टरनी बन जावोगी तो सब का मुह बन्द हो जाएगा ।” अपनी बेटी वाला सूट-सलवार बहु को देते हुए बोली। उसने भीगी नज़रों से सास को देखा।

सासु माँ सिर पर हाथ फेरते हुए कमरे से निकल गयी। पीछे से आईने में मुस्कुराते हुए दूल्हे मियाँ अपनी दुल्हन को देखने लगे।

ऐसी रित-रिवाज ही क्या जो हमारे बेटी-बहुऊ को आगे न बढ़ने दे…

संजय गुप्ता

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(((( राधारानी से ब्रजदास का नाता ))))
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बरसाना मे एक भक्त थे ब्रजदास। उनके एक पुत्री थी, नाम था रतिया। यही ब्रजदास का परिवार था।
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ब्रजदास दिन मे अपना काम क़रतै और शाम को श्री जी के मन्दिर मे जाते दर्शन करते और जो भी संत आये हुवे हो तै उनके साथ सत्संग करते। यह उनका नियम था।
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एक बार एक संत ने कहा भइया हमें नन्दगांव जाना है। सामान ज्यादा है पैसे है नही नही तो सेवक क़र लेते। तुम हम को नन्दगाँव पहुँचा सकते हो क्या ? ब्रजदास ने हां भर ली ।
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ब्रजदास ने कहा गर्मी का समय है सुबह जल्दी चलना ठीक रहेगा जिससे मै 10 बजे तक वापिस आ जाऊ। संत ने भी कहा ठीक है मै 4 बजे तैयार मिलूँगा।
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ब्रज दास ने अपनी बेटी से कहा मुझे एक संत को नन्दगाँव पहुचाना है। समय पर आ जाऊँगा प्रतीक्षा मत करना।
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ब्रजदास सुबह चार बजे राधे राधे करतै नंगे पांव संत के पास गये। सन्त ने सामान ब्रजदास को दिया और ठाकुर जी की पैटी और बर्तन स्वयं ने लाई लिये।
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रवाना तो समय पर हुवे लैकिन संत को स्वास् रोग था कुछ दूर चलते फिर बैठ जाते। इस प्रकार नन्दगाँव पहुँचने मे ही 11 बज गये।
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ब्रजदास ने सामान रख कर जाने की आज्ञा मांगी। संत ने कहा जून का महीना है 11 बजे है जल पी लो। कुछ जलपान कर लो, फिर जाना।
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ब्रजदास ने कहा बरसाने की वृषभानु नंदनी नन्दगाँव मे ब्याही हुई है अतः मै यहाँ जल नही पी सकता।
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संत की आँखो से अश्रुपात होने लगा। कितने वर्ष पुरानी बात है ,कितना गरीब आदमी है पर दिल कितना ऊँचा है।
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ब्रजदास वापिस राधे राधे करते रवाना हुवे। ऊपर से सूरज की गर्मी नीचे तपती रेत। भगवान को दया आ गयी वे भक्त ब्रजदास के पीछै पीछै चलने लगे।
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एक पेड़ की छाया में ब्रजदास रुके और वही मूर्छित हो कर गिर पड़ै। भगवान ने मूर्छा दूर क़रने के प्रयास किये पर मूर्छा दूर नही हुई।
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भगवान ने विचार किया कि मेने अजामिल, गीध, गजराज को तारा, द्रोपदी को संकट से बचाया पर इस भक्त के प्राण संकट मे है कोई उपाय नही लग रहा है।
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ब्रजदास राधारानी का भक्त है वे ही इस के प्राणों की रक्षा कर सकती है । उनको ही बुलाया जावे।
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भगवान भरी दुपहरी मे राधारानी के पास महल मे गये। राधा रानी ने इस गर्मी मे आने का कारण पूछा।
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भगवान भी पूरे मसखरे है। उन्होंने कहा तुम्हारे पिता जी बरसाना और नन्दगाँव की डगर मे पड़ै है तुम चलकर संभालो।
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राधा जी ने कहा कौन पिता जी ? भगवान ने सारी बात समझाई और चलने को कहा। यह भी कहा की तुमको ब्रजदास की बेटी की रूप मे भोजन जल लेकर चलना है।
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राधा जी तैयार होकर पहुँची। पिता जी.. पिता जी.. आवाज लगाई।
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ब्रजदास जागे। बेटी के चरणों मे गिर पड़े आज तू न आती तो प्राण चले जाते। बेटी से कहा आज तुझे बार बार देखने का मन कर रहा है।
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राधा जी ने कहा माँ बाप को संतान अच्छी लगती ही है। आप भोजन लीजिये।
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ब्रजदास भोजन लेंने लगे तो राधा जी ने कहा घर पर कुछ मेहमान आये है मैं उनको संभालू आप आ जाना। कुछ दूरी के बाद राधारानी अदृश्य हो गयी। ब्रजदास ने ऐसा भोजन कभी नही पाया।
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शाम को घर आकर ब्रजदास बेटी के चरणों मे गिर पड़े। बेटी ने कहा आप ये क्या कर ऱहै है ?
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ब्रजदास ने कहा आज तुमने भोजन, जल ला कर मेरे प्राण बचा लिये।
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बेटी ने कहा मै तो कही नही गयी। ब्रजदास ने कहा अच्छा बता मेहमान कहॉ है ? बेटी ने कहा कोई मेहमान नही आया।
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अब ब्रजदास के समझ में सारी बात आई। उसनै बेटी से कहा कि आज तुम्हारे ही रूप मे राधा रानी के दर्शन हुवे।
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बाँसुरी बना लो कान्हा,
होठों से लगा लो…
काजल बना कर मुझको
आँखों में बसा लो..
कुंडल बना कर मोहन,
कानो से लगा लो…
हार बना कर मुझको,
गले से लगा लो…
मैं हूँ दास तुम्हारा,
प्यारे कन्हैया…
पायल बना कर मुझको,
चरणों से लगा लो…

संजय गुप्ता

Posted in संस्कृत साहित्य

धरती पर मृतक के समान हैं ये चौदह प्रकार के लोग !!!!!

गोस्वामी तुलसीदास कृत महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में बालि पुत्र अंगद रावण की सभा में रावण को सीख देते हुए बताते हैं कि कौन-से ऐसे 14 दुर्गुण है जिसके होने से मनुष्य मृतक के समान माना जाता है। हो सकता है कि आप भी इन 14 प्रकार के लोगों में से कोई एक हों।

आओ जानते हैं कि इस चौपाई में ऐसे कौन-से 14 दुर्गुण बताए गए हैं जिसमें से एक भी व्यक्ति के भीतर होने पर वह मृतक के समान माना जाता है।

कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥
तनु पोषक निंदक अघ खानी जीवत सव सम चौदह प्रानी॥

पहला मृतक व्यक्ति वाममार्गी ( कौल) :- इसे उस दौर में कौल कहा जाता था। कौल मार्ग अर्थात तांत्रिकों का मार्ग। कापालिक संप्रदाय के लोग भी इससे जुड़े हैं। जादू, तंत्र, मंत्र और टोने टोटको में विश्वास करने वाले भी कौल हो सकते हैं। हालांकि इसके अर्थ को और भी विस्तृत किया जा सकता है। आजकल वामपंथी विचारधारा के लोग जो कर रहे हैं वह कौल ही है।

कौल या वाम का अर्थ यह कि जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले। जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोज ले और जो नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार का घोर विरोधी हो, वह वाममार्गी है। ऐसा काम करने वाले लोग समाज को दूषित ही करते हैं। यह लोग उस मुर्दे के समान है जिसके संपर्क में आने पर कोई भी मुर्दा बन जाता है। वामपंथ देश, समाज और धर्म के लिए घातक है।

दूसरा मृतक व्यक्ति : – कामुक:-चौपाई में कामबश लिखा है। काम का अर्थ भोग और संभोग दोनों ही होता है। बहुत से लोगों के लिए उनकी जिंदगी में सेक्स ही महत्वपूर्ण होता है। कहते हैं अत्यंत भोगी, विलासी और कामवासना में ही लिप्त रहने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे मौत के मुंह में स्वत: ही चला जाता है।

ऐसे व्यक्ति वक्त के पहले ही वह बूढ़ा हो जाता है। उसे हर तरह के रोग या शोक घेर लेते हैं। ऐसे व्यक्ति के मन की इच्छाएं कभी पूर्ण नहीं होती। वह कुतर्की भी होता है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है।

तीसरा मृतक व्यक्ति कृपण : – चौपाई में कृपिन शब्द का उपयोग किया गया है जिसे हिन्दी में कृपण कहते हैं। कृपण को प्रचलित शब्द में कंजूस कह सकते हैं, लेकिन कृपण तो महाकंजूस होता है। चमड़ी चली जाए लेकिन दमड़ी नहीं देगा वाली कहावत को वह चरितार्थ करता है। ऐसे व्यक्ति द्वारा अर्जित धन का उपयोग न तो वह कर पाता है और न ही उसका परिवार।

अति कंजूस व्यक्ति को मृतक समान माना गया है। ऐसा व्यक्ति धर्म-कर्म के कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याण कार्य के लिए दान देने या उसमें हिस्सा लेने से बचता है।

चौथे तरह का मृतक व्यक्ति विमूढ़ : – चौपाई में विमूढ़ा लिखा है। विमूढ़ को अंग्रेजी में कन्फ्यूज़्ड व्यक्ति कहते हैं। इसे भ्रमित बुद्धि का व्यक्ति भी कह सकते हैं। इसे गफलत में जीने वाला और अपने विचारों पर दृढ़ नहीं रहने वाला व्यक्ति भी कह सकते हैं।

कुल मिलकार ऐसा व्यक्ति मूढ़ और मूर्ख होता है। ऐसा व्यक्ति खुद कभी निर्णय नहीं लेता। उसकी जिंदगी के हर फैसले कोई दूसरा ही करता है। अब सोचीए हर काम को समझने या निर्णय को लेने में किसी अन्य पर आश्रित रहने वाले व्यक्ति को मृतक समान ही तो मानेंगे। ऐसे ही लोग ईश्वर को छोड़कर कथित बाबाओं, ज्योतिषियों और चमत्कार दिखाने वाले ढोंगी लोगों के यहां शरण लिए हुए होते हैं।

पांचवां मृतक व्यक्ति अति दरिद्र :- इस दरिद्र शब्द का अर्थ गरीब या निर्धन नहीं होता है। यदि आपके घर में कचरा फैला, सामान अस्त-व्यस्त बिखरा हुआ है तो लोग कहते हैं कि क्या दरिद्रता फैला रखी है। दरिद्रता का संबंध गंदगी से भी हैं। स्वच्छता से दरिद्रता का नाश होता है। आप कितने ही गरीब हों, लेकिन स्वच्‍छ रहेंगे तो धनवान बनने के रास्ते खुलते जाएंगे।

दरिद्रता एक रोग के समान है। महात्मा गांधी ने दरिद्रों को नारायण कहकर सम्मानित किया और इस रोग को और बढ़ावा दिया। यदि हम जिस पर ध्यान देंगे, वही चीज ज्यादा विकसित होगी। दरिद्रा का सम्मान करने से दरिद्रता पोषित होती है।

गरीबों की गरीबी दूर करने के हर उपाय उस व्यक्ति, उसके समाज और उसकी सरकार को करना चाहिए। यदि समाज में कोई व्यक्ति दीनहीन, दुखी या दरिद्र है तो उसकी जिम्मेदारी सभी की बनती है। गरीबों को अमीर बनाने का लक्ष्य होना चाहिए और यह तभी होगा जबकि हम दरिद्रा से घृणा करने लगेंगे। दरिद्र से नहीं दरिद्रता से घृणा करना जरूरी है। बहुत से शायर या साहित्यकार या भक्त लोग फकीरी जीवन को सम्मान देते हैं। यही कारण रहा की हमारा देश अमीर होने के बावजूद दीनहीन बन गया।

दरिद्रता कई प्रकार की होती है, कोई धन से, कोई आत्मविश्‍वास से, कोई साहस से, कोई सम्मान से और कोई ज्ञान से दरिद्र होता है, लेकिन जिस व्यक्ति में यह सभी दुर्गुण विद्यमान है वह अति दरिद्र व्यक्ति माना गया है। ऐसा व्यक्ति मृतक समान है। ऐसे व्यक्ति की सहायता करने वाला पुण्य प्राप्त करता है।

छठा मृतक व्यक्ति अजसि :- ब्रज मंडल में यश को जस कहा जाता है यह अजसि शब्द इसी से बना है। इस अपयश कहते हैं। अर्थात जिसके पास यश नहीं अपयश है वही। इसे उर्दू में बदनामी कह सकते हैं।

समाज में ऐसे कई व्यक्ति हैं जिनका घर, परिवार, कुटुंब, समाज, नगर और राष्ट्र आदि किसी भी क्षेत्र में कोई सम्मान नहीं होता है या जिसने कभी सम्मान अर्जित ही नहीं किया, लेकिन यह बात अधूरी है। दरअसल ऐसे व्यक्ति जो विख्यात तो नहीं लेकिन कुख्यात जरूर है। किसी भी कारणवश वह बदनाम हो गया है।

बुराई से भी बुरी होती है बदनामी। समझदार व्यक्ति हर प्रकार का नुकसान उठाने के लिए तैयार रहता है बदनामी से बचने के लिए। बदनामी से सबकुछ नष्ट हो जाता है। बदनाम व्यक्ति भी मृतक व्यक्ति के समान होता है।

सातवां मृतक व्यक्ति अति बूढ़ा :- अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। यदि आपका शरीर और बुद्धि दोनों ने ही काम करना बंद कर दिया है और फिर भी आप जिंदा हैं तो ऐसे जीने का क्या मतलब।

ऐसे अति बूढ़े व्यक्ति के बारे में उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं। उनमें से कुछ कहते हैं कि हम चाहते हैं कि उनको कष्टों से छुटकारा मिल जाए इसीलिए हम ऐसी कामना करते हैं। हालांकि कुछ लोगों के अनुसार वे खुद ही इस तरह के बूढे व्यक्ति से छुटकारा पाना चाहते हैं जिसकी सेवा में वे दिनरात लगे हुए हैं। हो सकता है कि घर के कुछ सदस्य ऐसा नहीं सोचते हों। लेकिन क्या यह जिंदगी सही है?

आठवां मृतक व्यक्ति सदा रोगवश :- घर में कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो किस न किसी रोग से हमेशा ग्रस्त ही रहता हो। गोलियों का ही सहारा हो। निरंतर रोगग्रस्त रहने वाले व्यक्ति को भी मृतक समान ही माना गया है।
ऐसे व्यक्ति का मन हमेशा विचलित रहता है।

नकारात्मकता उस पर हावी रहती है। हमेशा नकारात्मक सोचते रहने से भी उसके स्वस्थ होने में रुकावट पैदा हो जाती है। ऐसा व्यक्ति खुद ही मरने की सोचने लगता है जो कि गलत है।

इस तरह की सोच से वह जीवित होते हुए भी स्वस्थ्य जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है। ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने आहर में बदलाव करें, नियमित योग करें और नियमित ध्यान करें, तो निश्‍चि ही वह एक वर्ष में पूर्ण स्वस्थ हो सकता है।

नौवां मृतक व्यक्ति संतत क्रोधी : – निरंतर क्रोध में रहने वाले व्यक्ति को तुलसीदासजी ने संतत क्रोधी कहा है। हर छोटी-बड़ी बात पर जिसे क्रोध आ जाए ऐसा व्यक्ति भी मृतक के समान ही है।

क्रोधी व्यक्ति के अपने मन और बुद्धि, दोनों ही पर नियंत्रण नहीं रहता है। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता है। ऐसा व्यक्ति न खुद का भला कर पाता है और न परिवार का। उसका परिवार उससे हमेश त्रस्त ही रहता है। सभी उससे दूर रहना पसंद करते हैं।

दसवां मृतक व्यक्ति बिष्णु विमुख : – इसका अर्थ है भगवान विष्णु के प्रति प्रीति नहीं रखने वाला, अस्नेही या विरोधी। इसे ईश्‍वर विरोधी भी कहा गया है। ऐसे परमात्मा विरोधी व्यक्ति मृतक के समान है।

ऐसे अज्ञानी लोग मानते हैं कि कोई परमतत्व है ही नहीं। जब परमतत्व है ही नहीं तो यह संसार स्वयं ही चलायमान है। हम ही हमारे भाग्य के निर्माता है। हम ही संचार चला रहे हैं। हम जो करते हैं, वही होता है। अविद्या से ग्रस्त ऐसे ईश्‍वर विरोधी लोग मृतक के समान है जो बगैर किसी आधार और तर्क के ईश्‍वर को नहीं मानते हैं। उन्होंने ईश्‍वर के नहीं होने के कई कुतर्क एकत्रित कर लिए हैं।

ग्यारहवां मृतक व्यक्ति : – श्रु‍ति और संत विरोधी:-वेदों को श्रुति कहा गया है और स्मृतियां, रामायण, पुराण आदि स्मृति कहा गया है। श्रुति ही हिन्दु धर्म का एकमात्र धर्मग्रंथ है। यहां तुलसीदासजी कह रहे हैं कि श्रुति विरोधी अर्थात वेद विरोधी इस धरती पर मृतक के समान है।

वेद का अर्थ होता है ज्ञान। इस वेद शब्द से ही वेदना शब्द बना है जिसे ज्ञान की पीड़ा माना जाता है। वेद का अर्थ जांचा परखा और जाना गया ज्ञान। वेद का अर्थ देखा और प्रत्यक्ष सुना गया ज्ञान। परमात्मा ने चार ऋषियों को यह ज्ञान सुनाया। ये चार ऋषि हैं:-अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य।

संत विरोधी :बहुत से संत आजकल स्वयंभू संत है। हिन्दू संत धारा में संत तो 13 अखाड़े और दसनामी संप्रदाय में दीक्षित होकर ही संत बनते हैं। ऐसे में संत की परिभाषा को समझना जरूरी है। संत का विरोधी भी इस धरती पर मृतक समान है।

स्वयंभू भी संत हो सकता है और दीक्षित व्यक्ति भी। जिसने वैदिक यम-नियमों का पालन किया, ध्यान, क्रिया और प्रणायाम का तप किया वही संत होता है। इसके अलावा ज्ञान और भक्ति में डूबे हुए लोग भी संत होते हैं।

बारहवां मृतक व्यक्ति : – तनु पोषक:तनु पोषक का अर्थ खुद के तन और मन को ही पोषित करने वाला। खुद के स्वार्थ और आत्म संतुष्टि के लिए ही जिने वाला व्यक्ति। ऐसे व्यक्ति के मन में किसी भी अन्य के लिए कोई भाव या संवेदना नहीं होती। ऐसा व्यक्ति भी मृतक के समान ही होता है।

आपने देखे होंगे ऐसे बहुत से लोग जो खाने-पीने में, पहने-ओढ़ने में, घुमने-फिरने में हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले मुझे मिलें, बाकि किसी अन्य को मिले न मिले। ऐसे लोगों के मन में अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए कोई भावना नहीं होती है। यह सभी के लिए अनुपयोगी और मृतक समान हैं। ये खुद की कमाई को खुद भी ही खर्च तो करेंगे ही दूसरे की कामाई का भी खाने की आस रखेंगे।

तेरहवां मृतक व्यक्ति निंदक :- हालांकि कबीरदासजी ने कहा है कि निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।। लेकिन तुलसीदासजी यहां जिस निंदक व्यक्ति की बात कर रहे हैं वह जरा अलग किस्म का है।

कई ऐसे लोग होते हैं जिनका काम ही निंदा करना होता है। उन्हें इससे मतलब नहीं रहता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। उन्हें तो दूसरों में कमियां ही नजर आती है। कटु आलोचना करना ही उनका धर्म होता है। ऐसे लोग किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकते हैं। ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे। ऐसे लोगों से बचकर ही रहें।

चौदहवां मृतक व्यक्ति अघ खानी : – समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो पाककर्म के द्वारा धन या संपत्ति अर्जित करके अपना और परिवार का पालन-पोषण करते हैं। ऐसे व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। पाप की कमाई पाप में ही जाती है।

संजय गुप्ता

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शर्मिंदा
फ़ोन की घंटी तो सुनी मगर आलस की वजह से रजाई में ही लेटी रही। उसके पति राहुल को आखिर उठना ही पड़ा। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी।इतनी सुबह कौन हो सकता है जो सोने भी नहीं देता, इसी चिड़चिड़ाहट में उसने फ़ोन उठाया। “हेल्लो, कौन” तभी दूसरी तरफ से आवाज सुन सारी नींद खुल गयी।
“नमस्ते पापा।” “बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों ११ बजे की गाड़ी से आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम ४ बजे की गाड़ी वापिस लौट जायेंगे। ठीक है।” “हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।”
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फ़ोन रख कर वापिस कमरे में आ कर उसने रचना को बताया कि मम्मी पापा ११ बजे की गाड़ी से आरहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे।
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रजाई में घुसी रचना का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। “कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है।” गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। राहुल हक्का बक्का हो उसे देखता ही रह गया।
जब वो बाहर आयी तो राहुल ने पूछा “क्या बनाओगी।” गुस्से से भरी रचना ने तुनक के जवाब दिया “अपने को तल के खिला दूँगी।” राहुल चुप रहा और मुस्कराता हुआ तैयार होने में लग गया, स्टेशन जो जाना था।
थोड़ी देर बाद ग़ुस्सैल रचना को बोल कर वो मम्मी पापा को लेने स्टेशन जा रहा है वो घर से निकल गया।
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रचना गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी।
दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं की परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे तलने लगी तो कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ ख़तम किया, नहाने चली गयी।
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नहा के निकली और तैयार हो सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी।उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा संडे खराब कर दिया। बस अब तो आएँ , खाएँ और वापिस जाएँ ।
थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।
सामने राहुल के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें राहुल स्टेशन से लाया था।
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मम्मी ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा “अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है। क्या राहुल ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं।” जैसे मानो रचना के नींद टूटी हो “नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…. रर… रर। चलो आप अंदर तो आओ।” राहुल तो अपनी मुसकराहट रोक नहीं पा रहा था।
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कुछ देर इधर उधर की बातें करने में बीत गया। थोड़ी देर बाद पापा ने कहाँ “रचना, गप्पे ही मारती रहोगी या कुछ खिलाओगी भी।” यह सुन रचना को मानो साँप सूँघ गया हो। क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। मम्मी पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है।
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रचना बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। खाना ख़तम कर सब ड्राइंग रूम में आ बैठे। राहुल कुछ काम है अभी आता हुँ कह कर थोड़ी देर के लिए बाहर निकल गया। राहुल के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या राहुल ने बताया नहीं था की हम आ रहे हैं।”
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तो अचानक रचना के मुँह से निकल गया “उसने सिर्फ यह कहाँ था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।”
फिर क्या था रचना की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि ये मामला है। बहुत दुखी मन से उन्होंने रचना को समझाया “बेटी, हम हों या उसके मम्मी पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी। जैसे राहुल हमारी इज़्ज़त करता है उसी तरह तुम्हे भी उसके माता पिता और सम्बन्धियों की इज़्ज़त करनी चाहिए। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना।”
रचना की आँखों में ऑंसू आ गए और अपने को शर्मिंदा महसूस कर उसने मम्मी को वचन दिया कि आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा..!
संजय गुप्ता

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((((( जगन्नाथ प्रभु जी के हाथ माँ को अर्पित )))))
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लगभग एक हजार वर्ष पूर्व झांसी उत्तर प्रदेश में श्री रामशाह प्रतिष्ठित तेल व्यापारी थे| वे एक समाज सुधारक, दयालु, धर्मात्मा एवं परोपकारी व्यक्ति थे|
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उनकी पत्नी को शुभ नक्षत्र, मे चैत्र माह के क्रष्ण-पक्ष की एकादशी को संवत 1073 विक्रम में एक कन्या का जन्म हुआ| विद्धान पण्डितो दूारा कन्या की जन्मपत्री बनाई गई|
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पण्डितो ने ग्रह, नक्षत्र का शोधन करके कहा- राम शाह तुम बहुत ही भाग्यवान हो जो ऐसी गुणवान कन्या ने तुम्हारे यहां जन्म लिया है| वह भगवान् की उपासक बनेगी|
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शास्त्रानुसार पुत्री का नाम कर्माबाई रखा गया| बाल्यावस्था से ही कर्मा जी को धार्मिक कहानिया सुनने की अधिक रुचि हो गई थी| यह भक्ति भाव मन्द-मन्द गति से बढता गया|
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कर्मा जी के विवाह योग्य हो जाने पर उसका सम्बंध नरवर ग्राम के प्रतिष्ठित व्यापारी के पुत्र के साथ कर दिया गया|
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पति सेवा के पश्चात कर्माबाई को जितना भी समय मिलता था वह समय भगवान् श्री कृष्ण के भजन-पूजन ध्यान आदि में लगाती थी| उनके पति पूजा, पाठ, आदि को केवल धार्मिक अंधविश्वास ही कहते थे|
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एक दिन संध्या को भगवान कृष्ण जी की मूर्ति के पास बैठी कर्माबाई भजन गा रही थी और भगवान के ध्यान में मुग्ध थी| एकाएक उनके पति ने आकर भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति सिंहासन पर से उठाकर छिपा दी|
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कर्मा ने जब नेत्र खोले तो भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति को अपने स्थान पर ना देख कर एकदम आश्चर्यचकित होकर चारों तरफ देखने लगी और घबड़ाकर गिर पडी| गिरते ही वह मूर्छित हो गई,
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उनके पति ने तुरंत अपनी गोद में उठा लिया और भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति देकर कहने लगे कि इनकी भक्ति करते करते इतना समय व्यतीत हो चुका है| कभी साक्षात प्रभु के दर्शन भी हुए हैं|
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कर्मा ने उत्तर दिया मैं विश्वास रखती हूं कि एक न एक दिन मुझे वंशीधारी के दर्शन अवश्य ही होगे|
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सामाजिक और धार्मिक कार्यो में तन, मन, और धन से लगनपूर्वक लगे रहना उनमें अत्यधिक रुचि रखना, दीन-दुखियो के प्रति दया भावना रखना | इन सभी कारणों से कर्माबाई का यशगान नरवर ग्राम (ससुराल) में बडी तेजी से फेलने लगा |
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उसी समय नरवर ग्राम के राजा के हाथी को खुजली रोग हो गया था | जिसे राज्य के श्रेष्ठ वैधों के उपचार से भी ठीक नही किया जा सका | हाथी की खुजली ठीक करने हेतु उसे तेल से भरे कुन्ड में नहलाने का सुझाव किसी ने राजा को दिया |
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राज्य के समस्त तेलकारों को राजा के द्वारा आदेश दिया गया कि वे अपना समस्त तेल बिना मूल्य एक कुण्ड में डालें जिससे कि वह कुण्ड भर जावें |
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राजा के अन्याय के कारण अधिकांश तेलकार भूखों मरने लगें एक माह के पश्चात भी अन्यायी राजा का कुण्ड तेल से ना भरा जा सका |
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इस अन्याय से दुखी होकर कर्माबाई श्री कृष्ण भगवान् के चरणों में गिर पडी और रोकर कहने लगी हे दयामय मुरलीधारी निर्धनों, निर्बलों की रक्षा कीजिये | चमत्कार दिखाईये प्रभु…!!
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दूसरे दिन प्रातः राजा ने कुण्ड को तेल से भरा पाया | तब भगवान के चमत्कार को समझ कर राजा ने कर्मा जी से क्षमा मांगी |
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एक बार कर्मा जी के पति बहुत बीमार हो गये थे बहुत उपचार के उपरान्त भी उन्हें नहीं बचाया जा सका | पति के स्वर्गवास हो जाने पर कर्मा पागल की भांति श्री कृष्ण के चरणों में जाकर फूट-फूटकर रोने लगी और कहा-
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हे दीनानाथ भगवान तूने मुझे विधवा बना दिया व मेरा सुहाग छीनकर मुझे असहाय कर दिया है | तुम्हें अपने भक्तों पर दया दृष्टि रखना चाहिऐ |
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पति के स्वर्गवास होने के तीन माह उपरान्त कर्मा जी के दूसरे पुत्र का जन्म हुआ | उसका प्रतिदिन का समय दोनों बालको के लालन-पालन और भगवान की भक्ति में व्यतीत हो जाता था |
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तीन वर्ष के पश्चात कर्मा को भगवान के दर्शन करने की प्रबल इच्छा हुई तब एक दिन सुध-बुध भूलकर आधी रात के समय अपने वृध्द माता पिता और दोनो बच्चों को सोता छोड़ कर प्रभु के ध्यान में लीन घर से निकल गई |
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घोर अंधकार को चीरती हुई भगवान जगन्नाथ पुरी के मार्ग की और चली गई | उसे यह भी ज्ञात नहीं हुआ कि वह कितनी दूरी चल चुकी है |
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लगातार कई दिनो तक चलते रहने के कारण से अब कर्मा जी को अत्यन्त पीड़ा होने लगी थी, वह वृक्षों की पत्तियां खाकर आगे बढ़ी, राह में कर्मा भजन गाती हुई जगन्नाथ जी के विशाल मन्दिर के प्रमुख द्वार पर पहुची |
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एक थाली में खिचड़ी सजाकर पुजारी जी के समक्ष भगवान् को भोग लगाने हेतु रख दी | पुजारियों ने इस दक्षिणा विहीन जजमान को धक्के मारकर बाहर कर दिया |
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बेचारी उस खिचड़ी की थाली को उठा कर समुद्र तट की और चल दी और समुद्र के किनारे बैठकर भगवान् की आराधना करने लगी कि घट-घट व्यापी भगवान् अवश्य ही आवेंगे और इस विश्वास में आंख बन्द करके भगवान् से अनुनय-विनय करने लगी कि जब तक आप आकर भोग नही लगावेंगे तब तक मै अन्न ग्रहण नही करूंगी |
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यह तो भोग प्रभु के निमित्त बना है | सुबह से शाम तक भगवान की प्रतीक्षा करती रही | धीरे धीरे रात ढलती गई और प्रभु के ध्यान में मग्न हो गई |
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एकाएक भगवान की आवाज आई कि “मां,, तू कहां है ? मुझे भूख लगी है ” इतने अंधकार में भी उसे प्रभु की मोहनी सूरत के दर्शन हुए और प्रभु को अपनी गोद में बैठाकर खिचड़ी खिलाने लगी |
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इसके बाद कर्मा मां ने प्रभु की छोड़ी हुई खिचड़ी ग्रहण की और आन्नद विभोर होकर सो गई |
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सुबह के प्रथम दर्शन में पुजारी ने देखा कि भगवान के ओंठ एवं गालों पर खिचड़ी छपी हुई है तभी पुजारी लोग बोखला उठे और कहने लगे कि यह करतूत उसी कर्मा की है जो चोरी से आकर प्रभु के मुंह पर खिचड़ी लगा कर भाग गई है |
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राज दरबार में शिकायत हुई कि कर्मा बाई नाम की ओरत ने भगवान के विग्रह को अपवित्र कर दिया | सभी लोग ढूढते हुऐ कर्मा के पास समुद्र तट पहुँचे और पकड़ कर राजा के पास ले गये |
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राजा ने कर्मा को भगवान् के विग्रह को अपवित्र करने के बदले उसके हाथ फरसा से काटने की आज्ञा सुना दी गई |
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परन्तु प्रभु का कोतुक देखिए | कि ज्यों ही उस पर फरसे से वार किया गया तो दो गोरवर्ण हाथ कटकर सामने गिरे, परन्तु कर्माबाई ज्यो की त्यों खडी रही.
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राज दरबारियों ने फिर से वार किया, परन्तु इस बार दो गोरवर्ण हाथ कंगन पहने हुए गिरे | तभी राज दरबारियों ने देखा की वह तो अपनी पूर्वस्थिती में खड़ी है|
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अन्यायियों ने फिर से बार किया तो इस बार दो श्यामवर्ण हाथ एक में चक्र, और दूसरे में कमल लियें हुये गिरे |
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जब दरबारियों को इस पर भी ज्ञान नहीं हुआ और पागलो की तरह कर्मा पर वार करने लगें,
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तब आकाशवाणी हुई “कि अरे दुष्टों | तुम सब भाग जाओ नही तो सर्वनाश हो जाएगा” और जिन्होंने हाथ काटे थे उन के हाथ गल गए | कुछ लोग भाग खड़े हुयें और कहने लगे यह जादूगरनी हैं |
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यह खबर राज दरबार में पहुची तो राजा भी व्याकुल होकर तथ्य को मालूम करने के लिये जगन्नाथ जी के मन्दिर में गये |
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वहाँ राजा ने देखा कि बलदेव जी, सुभद्रा जी एवं भगवान जगन्नाथ जी के हाथ कटे हैं |
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तब वहाँ के सारे पुजारियों एवं परिवारो में हाहाकार मच गया और कहने लगे कि अनर्थ हो गया |
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राजा को स्वप्न में प्रभु नें आज्ञा दी कि हाथ तो माँ को अर्पित हो गये अब हम बगैर हाथ के ही रहेगे तथा प्रति वर्ष कर्मा के नाम की ही खिचड़ी का भोग पाते रहेगे |
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उस दिन से आज तक इसी पुण्यतिथि चैत्र क्रष्ण पक्ष की ग्यारस, जिस दिन की यह घटना हैं, उसी तिथि से भगवान जगन्नाथ स्वामी के मन्दिरों में भक्त कर्माबाई की खिचड़ी को ही सर्वप्रथम भगवान् को भोग लगाया जाता हैं एवं प्रसाद के रूप में खिचड़ी बांटी ददजाती हैं |
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तभी से यह कहावत है कि…
‘जगन्नाथ का भात जगत पसारे हाथ’
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((( जय जय श्री राधे )))

संजय गुप्ता

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#दिलकोछूजानेवाली_कहानी……#पगला

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ऑफिस से निकल कर शर्मा जी ने
स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया,
पत्नी ने कहा था 1 किलो जामुन लेते आना।
तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा जामुन बेचते हुए
एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी।
वैसे तो वह फल हमेशा “राम आसरे फ्रूट भण्डार” से
ही लेते थे,
पर आज उन्हें लगा कि क्यों न
बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?
उन्होंने बुढ़िया से पूछा, “माई, जामुन कैसे दिए”
बुढ़िया बोली, बाबूजी 40 रूपये किलो,
शर्माजी बोले, माई 30 रूपये दूंगा।
बुढ़िया ने कहा, 35 रूपये दे देना,
दो पैसे मै भी कमा लूंगी।
शर्मा जी बोले, 30 रूपये लेने हैं तो बोल,
बुझे चेहरे से बुढ़िया ने,”न” मे गर्दन हिला दी।
शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े
और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर
जामुन का भाव पूछा तो वह बोला 50 रूपये किलो हैं
बाबूजी, कितने दूँ ?
शर्माजी बोले, 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ,
ठीक भाव लगाओ।
तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया।
बोर्ड पर लिखा था- “मोल भाव करने वाले माफ़ करें”
शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा,
उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापस
ऑफिस की ओर मोड़ दिया।
.सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए।
बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली,
“बाबूजी जामुन दे दूँ, पर भाव 35 रूपये से कम नही लगाउंगी।
शर्माजी ने मुस्कराकर कहा,
माई एक नही दो किलो दे दो और भाव की चिंता मत करो।
बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा।
जामुन देते हुए बोली। बाबूजी मेरे पास थैली नही है ।
फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था
तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी।
सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर।
आदमी की बीमारी मे दुकान चली गयी,
आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं।
किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है
जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।
इतना कहते कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी,
और उसकी आंखों मे आंसू आ गए ।
शर्माजी ने 100 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो
वो बोली “बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं।
शर्माजी बोले “माई चिंता मत करो, रख लो,
अब मै तुमसे ही फल खरीदूंगा,
और कल मै तुम्हें 1000 रूपये दूंगा।
धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए
मंडी से दूसरे फल भी ले आना।
बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही
शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए।
घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा,
न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से
पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से
मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर
मुंह मांगे पैसे दे आते हैं।
शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है।
गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर
अधिक ध्यान देने लगे हैं।
अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को 500 रूपये देते हुए कहा,
माई लौटाने की चिंता मत करना।
जो फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे।
जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो
सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया।
तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से
बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया।
बुढ़िया अब बहुत खुश है।
उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी
पहले से बहुत अच्छा है ।
हर दिन शर्माजी और ऑफिस के
दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती।
.शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और
एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है..!
@”जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो यारों,
अपनी पूरी जिंदगी मे किये गए सभी कार्यों से
ज्यादा संतोष मिलेगा…

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक संतजी पेड़ों की झुरमट तले बैठे थे । उनके पास की एक शाखा पर एक पिंजरा टंगा था, जिस में एक मैना फुदक रही थी ।

बड़ी अनूठी थी, वह मैना खूब गिटरपिटर मनुष्यों की सी बोली बोल रही थी सन्त जी भी उससे बातें लड़ा रहे थे !

इतने में, नगर सेठ अपनी पत्नी के साथ सन्त जी के क़दमों में हाज़िर हुआ मन की भावना रखी – ‘महाराज, मेरे सिर के बाल पक चले हैं ! घर-गृहस्थी के दायित्व भी पूरे हो गए हैं ! सोच रहा हूँ, हमारी सनातन परम्परा के चार आश्रमों में से तीसरी पौड़ी ‘वानप्रस्थ’ की और बढ चलूँ । एकांत में सुमिरन-भजन करूँ !

सन्त बिना किसी लाग-लपेट के, एकदम खरा बोले- ‘सेठ जी,यूँ वन में इत-उत डोलने से हरि नहीं मिलता !’

सेठ – फिर कैसे मिलता है,हरि ? आप बता दें महाराज !

सन्त फिर मैना से बतियाने लगे – ‘मैना रानी, बोल राम…राम… !’

मैना ने दोहराया – ‘राम…राम !

सन्त उससे ढेरों बातें करने लगे । सेठ-सेठानी मैना को इतना साफ बोलते देखकर खुश हो रहे थे !

तभी सन्त उनकी और मुड़े और बोले – जानते हो सेठ जी, मैना को मनुष्यी बोली कैसे सिखाई जाती है ? आप उसके सामने खड़े होकर उसे कुछ बोलना सिखाओगे, तो वह कभी नहीं सीखेगी !

इसलिए मैंने एक दर्पण लिया और उसकी आड़ में छिपकर बैठ गया दर्पण के सामने पिंजरा था ! मैं दर्पण के पीछे से बोला – ‘राम ! राम !’

मैना ने दर्पण के में अपनी छवि देखी । उसे लगा उसका कोई भाई-बंधु कह रहा है – ‘राम ! राम !’ इसलिए वह भी झट सीख़ और समझ गई !

इसी तरह दर्पण की आड़ में मैंने उसे पूरी मनुष्यी बोली सिखाई और अब देखो, यह कितना फटाफट बोलती है !

इतना कहकर सन्त ताली बजाकर हँस दिए फिर इसी मौज मैं, सेठ-सेठानी से सहजता से बोल गए – ‘ऐसे ही सेठ जी भगवान कैसे मिलता है, यह तो खुद भगवान ही बता सकता है !

लेकिन अगर वह यूँ ही सीधा बताएगा, तो तुम्हारी बुद्धि को समझ नहीं पड़ेगी । इसलिए वह मानव चोले की आड़ में आता है और ब्रह्मज्ञान का सबक सिखाता है !

ब्रह्म बोले काया के ओले ।
काया बिन ब्रह्म कैसे बोले ।।

वह मानव बनकर आता है, मानव को अपनी बात समझाने । उस महामानव को, मनुष्य देह में अवतरित ब्रह्म को ही हम ‘सतगुरू’ सच्चा गुरु या साधू’ कहते हैं !

निराकार की आरसी,साधों ही की देहि ।
लखा जो चाहै अलख को, इनही में लखि लेहि ।।

अर्थात सदगुरू की साकार देह निराकार ब्रह्म का दर्पण है । वो अलख (न दिखाई देने वाला ) प्रभु सच्चे गुरू की देह में प्रत्यक्ष हो आता है !

इस लिए सेठ जी, अगर भगवान को पाना है, तो ‘वानप्रस्थ’ नहीं, ‘गुरूप्रस्थ’ बनो !

सन्त जी के इतने गहरे वह भावपूर्ण वचन सुनकर सेठ जी गदगद हो गए और उसी क्षण सन्त जी के पांव पकड़कर बोले – गुरूप्रस्थ हुआ !!

                    ।। ॐ नमः शिवाय ।।

संजय गुप्ता