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~ उर्वशी-पुरुरवा ~

उर्वशी थक जाती है इंद्र के सामने नाचते—नाचते और प्रार्थना करती है कि कुछ दिन की छुट्टी मिल जाए।
मैं पृथ्वी पर जाना चाहती हूं। मैं किसी मिट्टी के बेटे से प्रेम करना चाहती हूं।

देवताओं से प्रेम बहुत सुखद हो भी नहीं सकता। हवा हवा होंगे। मिट्टी तो है नहीं, ठोस तो कुछ है नहीं। ऐसे हाथ घुमा दो देवता के भीतर से, तो कुछ अटकेगा ही नहीं। कोरे खयाल समझो, सपने समझो। कितने ही सुंदर ही सुंदर लगते हों, मगर इंद्रधनुषों जैसे।

स्वभावत: उर्वशी थक गयी होगी।

स्त्रियां पार्थिव होती हैं। उन्हें कुछ ठोस चाहिए।

नाचते—नाचते इंद्रधनुषों के पास उर्वशी थक गयी होगी, यह मेरी समझ में आता है। उर्वशी ने कहा कि मुझे जाने दो। मुझे कुछ दिन पृथ्वी पर जाने दो। मैं पृथ्वी की सौंधी सुगंध लेना चाहती हूं। मैं पृथ्वी पर खिलनेवाले गुलाब और चंपा के फूलों को देखना चाहती हूं। फिर से एक बार मैं पृथ्वी के किसी बेटे को प्रेम करना चाहती हूं।

चोट तो इंद्र को बहुत लगी,

क्योंकि अपमानजनक थी यह बात। लेकिन उसने कहा : ‘ अच्छा जा, लेकिन एक शर्त है। यह राज किसी को पता न चले कि तू अप्सरा है। और जिस दिन यह राज तूने बताया उसी दिन तुझे वापिस आ जाना पड़ेगा।’

उर्वशी उतरी और पुरुरवा के प्रेम में पड़ गयी। बड़ी प्यारी कथा है उर्वशी और पुरुरवा की! पुरुरवा—पृथ्वी का बेटा; धूप आए तो पसीना निकले और सर्दी हो तो ठंड लगे। देवताओं को न ठंड लगे, न पसीना निकले।

मुर्दा ही समझो।

मुर्दों को पसीना नहीं आता, कितनी ही गर्मी होती रहे, और न ठंड लगती।

तुमने मुर्दों के दांत किटकिटाते देखे?

क्या खाक दांत किटकिटाके! और मुर्दा दांत किटकिटाए तो तुम ऐसे भागोगे कि फिर लौटकर नहीं देखोगे।

पुरुरवा के प्रेम में पड़ गयी। ऐसी सुंदर थी उर्वशी कि पुरुरवा को स्वभावत: जिज्ञासा होती थी—जिज्ञासा मनुष्य का गुण
है—कि पुरुरवा उससे बार—बार पूछता था : ‘तू कोन है? हे अप्सरा जैसी दिखाई पड़नेवाली उर्वशी, तू कोन है? तू आयी कहां से? ऐसा सौंदर्य, ऐसा अलौकिक सौंदर्य, यहां पृथ्वी पर तो नहीं होता!’

और कुछ चीजों से वह चिंतित भी होता था। उर्वशी को धूप पड़े तो पसीना न आए। उर्वशी वायवीय थी, हल्की—फुल्की थी, ठोस नहीं थी। प्रीतिकर थी, मगर गुड़िया जैसी, खिलौने जैसी। न नाराज हो, न लड़े—झगड़े।

जिज्ञासाएं उठनी शुरू हो गयीं पुरुरवा को।

आखिर एक दिन पुरुरवा जिद ही कर बैठा। रात दोनों बिस्तर पर सोए हैं, पुरुरवा ने कहा कि आज तो मैं जानकर ही रहूंगा कि तू है कौन? तू आयी कहां से? नहीं तू हमारे बीच से मालूम होती। अजनबी है, अपरिचित है। नहीं तू बताएगी तो यह प्रेम समाप्त हुआ। यह तो धमकी थी, मगर उर्वशी घबड़ा गई और उसने कहा कि फिर एक बात समझ लो। मैं बताती तो हूं, लेकिन बता देते ही मैं तिरोहित हो जाऊंगी।

क्योंकि यह शर्त है।

पुरुरवा ने कहा : ‘कुछ भी शर्त हो…।’ उसने समझा कि यह सब चालबाजी है। औरतों की चालबाजिया! क्या—क्या बातें निकाल रही है! तिरोहित कहां हो जाएगी! तो उसने बता दिया कि मैं उर्वशी हूं _ थक गयी थी देवताओं से। पृथ्वी की सौंधी सुगंध बुलाने लगी थी। चाहती थी वर्षा की बूंदों की टपटप छप्पर पर, सूरज की किरणें, चांद का निकलना, रात तारों से भर जाना, किसी ठोस हड्डी—मांस—मज्जा के मनुष्य की छाती से लगकर आलिंगन। लेकिन अब रुक न सकूंगी।

पुरुरवा उस रात सोया, लेकिन उर्वशी की साड़ी को पकड़े रहा रात नींद में भी। सुबह जब उठा तो साड़ी ही हाथ में थी, उर्वशी जा चुकी थी।

तब से कहते हैं _ पुरुरवा घूमता रहता है, भटकता रहता है, पूछता फिरता है : ‘उर्वशी कहां है?’ खोज रहा है।

शायद यह हम सब मनुष्यों की कथा है। प्रत्येक आदमी उर्वशी को खोज रहा है। कभी—कभी किसी स्त्री में धोखा होता है कि यह रही उर्वशी, फिर जल्दी ही धोखा टूट जाता है।

“उर्वशी” शब्द भी बड़ा प्यारा है—

हृदय में बसी, उर्वशी।

कहीं कोई हृदय में एक प्रतिमा छिपी हुई है, जिसकी तलाश चल रही है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं : ‘प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्त्री की एक प्रतिमा है, प्रत्येक स्त्री के भीतर पुरुष की एक प्रतिमा है, जिसको वह तलाश रहा है, तलाश रही है। मिलती नहीं है प्रतिमा कहीं। कभी—कभी झलक मिलती है कि हां यह स्त्री लगती है उस प्रतिमा जैसी; बस लेकिन जल्दी ही पता चल जाता है कि बहुत फासला है। कभी कोई पुरुष लगता है उस जैसा; फिर जल्दी ही पता चल जाता है कि बहुत फासला है। और तभी दूरियां शुरू हो जाती हैं। पास आते, आते, आते, सब दूर हो जाता है

|| ओशो ||

मेरा स्वर्णिम भारत

गिरधारी अग्रवाल

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एक बार अवश्य पढ़े….
श्री कृष्ण और सुदामा से जुड़ी सच्ची कहानी.

मेरे मन में सुदामा के सम्बन्ध में एक बड़ी शंका थी कि एक विद्वान् ब्राह्मण अपने बाल सखा कृष्ण से छुपाकर चने कैसे खा सकता है ???

आज भागवत पर चर्चा करते हुए एक व्याख्याकार ने इस शंका का निराकरण किया। इस चर्चा को आपसे साझा करना जरुरी समझता हूँ ताकि आप भी समाज में फैली इस भ्रान्ति को दूर कर सकें।

सुदामा की दरिद्रता, और चने की चोरी के पीछे एक बहुत ही रोचक और त्याग-पूर्ण कथा है- एक अत्यंत गरीब निर्धन बुढ़िया भिक्षा माँग कर जीवन यापन करती थी। एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिक्षा नही मिली वह प्रति दिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी। छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चने मिले। कुटिया पे पहुँचते-पहुँचते उसे रात हो गयी। बुढ़िया ने सोंचा अब ये चने रात मे नही, प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाकर खाऊँगी ।

यह सोंचकर उसने चनों को कपडे में बाँधकर रख दिए और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी। बुढ़िया के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आ गये।

चोरों ने चनों की पोटली देख कर समझा इसमे सोने के सिक्के हैं अतः उसे उठा लिया। चोरो की आहट सुनकर बुढ़िया जाग गयी और शोर मचाने लगी ।शोर-शराबा सुनकर गाँव के सारे लोग चोरों को पकडने के लिए दौडे। चने की पोटली लेकर भागे चोर पकडे जाने के डर से संदीपन मुनि के आश्रम में छिप गये। इसी संदीपन मुनि के आश्रम में भगवान श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। चोरों की आहट सुनकर गुरुमाता को लगा की कोई आश्रम के अन्दर आया है गुरुमाता ने पुकारा- कौन है ?? गुरुमाता को अपनी ओर आता देख चोर चने की पोटली छोड़कर वहां से भाग गये।

इधर भूख से व्याकुल बुढ़िया ने जब जाना ! कि उसकी चने की पोटली चोर उठा ले गए हैं तो उसने श्राप दे दिया- ” मुझ दीनहीन असहाय के चने जो भी खायेगा वह दरिद्र हो जायेगा ” ।

उधर प्रात:काल आश्रम में झाडू लगाते समय गुरुमाता को वही चने की पोटली मिली। गुरु माता ने पोटली खोल के देखी तो उसमे चने थे। उसी समय सुदामा जी और श्री कृष्ण जंगल से लकड़ी लाने जा रहे थे।

गुरुमाता ने वह चने की पोटली सुदामा को देते हुए कहा बेटा ! जब भूख लगे तो दोनो यह चने खा लेना ।
सुदामा जन्मजात ब्रह्मज्ञानी थे। उन्होंने ज्यों ही चने की पोटली हाथ मे ली, सारा रहस्य जान गए।

सुदामा ने सोचा- गुरुमाता ने कहा है यह चने दोनो लोग बराबर बाँट के खाना, लेकिन ये चने अगर मैने त्रिभुवनपति श्री कृष्ण को खिला दिये तो मेरे प्रभु के साथ साथ तीनो लोक दरिद्र हो जाएंगे। नही-नही मै ऐसा नही होने दूँगा। मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जायें मै ऐसा कदापि नही करुँगा।
मै ये चने स्वयं खा लूँगा लेकिन कृष्ण को नही खाने दूँगा और सुदामा ने कृष्ण से छुपाकर सारे चने खुद खा लिए। अभिशापित चने खाकर सुदामा ने स्वयं दरिद्रता ओढ़ ली लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को बचा लिया।

अद्वतीय त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करने वाले सुदामा, चोरी-छुपे चने खाने का अपयश भी झेले ।
जय श्रीकृष्णा

गिरधारी अग्रवाल

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महर्षि शरभंग
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तपोभूमि दण्कारण्य क्षेत्र में अनेकानेक ऊर्ध्वरेता ब्रह्मवादी ऋषियों ने घोर तपस्याएँ की हैं ।कठिन योगाभ्यास एवं प्राणायाम आदि द्वारा संसार के समस्त पदार्थों से आसक्ति, ममता, स्पृहा एवं कामना का समूह नाश करके अपनी उग्र तपस्या द्वारा समस्त इन्द्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने वाले अनेकानेक ऋषियों में से शरभंग जी भी एक थे।

अपनी उत्कट तपस्या द्वारा इन्होंने ब्रह्मलोक पर विजय प्राप्त कर ली थी ।देवराज इन्द्र इन्हें सत्कारपूर्वक ब्रह्मलोक तक पहुँचाने के निमित्त आये।इन्होंने देखा कि पृथ्वी से कुछ ऊपर आकाश में देवराज का रथ खड़ा है ।बहुत से देवताओं से घिरे वे उसमें विराजमान हैं ।सूर्य एवं अग्नि के समान उनकी शोभा है ।देवांगनाएँ उनकी स्वर्ण-दण्डिकायुक्त चमरों से सेवा कर रही हैं ।

उनके मस्तक पर श्वेत छत्र शोभायमान है ।गन्धर्व, सिद्ध एवं अनेक ब्रह्मर्षि उनकी अनेक उत्तमोत्तम वचनों द्वारा स्तुति कर रहे हैं ।ये इनके साथ ब्रह्मलोक की यात्रा के लिए तैयार ही थे कि इन्हें पता चला कि राजीवलोचन कोशलकिशोर श्री राघवेन्द्र रामभद्र भ्राता लक्ष्मण एवं भगवती श्री सीता जी सहित इनके आश्रम की ओर पधार रहे हैं।

ज्यों ही भगवान श्री राम के आगमन का शुभ समाचार इनके कानों में पहुँचा, त्यों ही तपःभूत अन्तःकरण में भक्ति का संचार हो गया ।वे मन ही मन सोचने लगे — ‘अहो ! लौकिक और वैदिक समस्त धर्मों का पालन जिन भगवान के चरण कमलों की प्राप्ति के लिए ही किया जाता है – वे ही भगवान स्वयं जब मेरे आश्रम की ओर पधार रहे हैं, तब उन्हें छोड़ कर ब्रह्मलोक को जाना तो सर्वथा मूर्खता है।

ब्रह्मलोक के प्रधान देवता तो मेरे यहाँ ही आ रहे हैं – तब वहाँ जाना निष्प्रयोजनीय ही है ।अतः मन ही मन यह निश्चय कर कि ‘तपस्या के प्रभाव से मैंने जिन जिन अक्षय लोकों पर अधिकार प्राप्त किया है,
वे सब मैं भगवान के चरणों में समर्पित करता हूँ ‘ इन्होंने देवराज इन्द्र को विदा कर दिया ।
ऋषि शरभंग जी के अन्तःकरण में प्रेमजनित विरह का भाव उदय हो गया –

‘चितवत पंथ रहेउँ दिन राती।’

वे भगवान श्री राम की अल्पकाल की प्रतीक्षा को भी युग युग के समान समझने लगे । ‘भगवान श्री राम के सम्मुख ही मैं इस नश्वर शरीर का त्याग करूँगा ‘ — इस दृढ़ संकल्प से वे भगवान राम की क्षण-क्षण प्रतीक्षा करने लगे ।

कमल-दल-लोचन श्यामसुंदर भगवान श्री राम इनके आश्रम पर पधारे ही।सीता – लक्ष्मण सहित रघुनन्दन को मुनिवर ने देखा ।उनका कण्ठ गद्गद हो गया ।वे कहने लगे –

चितवत पंथ रहेउँ दिन राती।
अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।
नाथ सकल साधन मैं हीना।
कीन्ही कृपा जानि जनु दीना।।

भगवान श्री राम को देखते ही प्रेमवश इनके लोचन भगवान के रूप-सुधा-मकरन्द का साग्रह पान करने लगे ।इनके नेत्रों के सम्मुख तो वे थे ही — अपने प्रेम से इन्होंने इन्हें अपने अन्तःकरण में भी बैठा लिया —

सीता अनुज समेत प्रभु
नील जलद तनु श्याम ।
मम हियँ बसहु निरंतर
सगुन रूप श्रीराम।।

भगवान को अपने अन्तःकरण में बैठाकर मुनि योगाग्नि से अपने शरीर को जलाने के लिए तत्पर हो गये।
महर्षि ने विधिवत अग्नि की स्थापना करके उसे योगाग्नि प्रज्वलित किया और घी की आहुति देकर मंत्रोच्चार करते हुये स्वयं अपने शरीर को योग अग्नि को समर्पित कर दिया।
योगाग्नि ने इनके रोम, केश, चमड़ी, हड्डी, मांस और रक्त -सभी को जलाकर भस्म कर डाला। अपने नश्वर शरीर को नष्ट कर वे अग्नि के समान तेजोमय शरीर से उत्पन्न हुए। परम तेजस्वी कुमार रूप में वे अग्नियों, महात्मा ऋषियों और देवताओं के भी लोकों को लाँघकर भगवान राम के दिव्य धाम को चले गये ।

।। राम सिया राम सिया राम जय जय राम ।।

गिरधारी अग्रवाल

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एक प्रेत ने बताया था तुलसीदासजी को हनुमानजी का पता।
तब हुए उन्हें हुए श्रीरामजी के दर्शन।

तुलसीदास जब पैदा हुए तो रोते हुए पैदा नही हुए और पैदा होने के साथ ही उनके मुंह में पुरे के पुरे बत्तीस दांत भी थे, पहला ही शब्द उनके मुख से निकला था राम इस कारण नामकरण हुआ रामबोला. उनके पिता का नाम था आत्मा राम माता का नाम हुलसी, पत्नी का नाम था रत्नावली(बुद्धिमती) और पुत्र का नाम था तारक।
रामबोला का जब विवाह हुआ तो वह अपनी पत्नी के आकर्षण में इतना खो गए थे की वह बाहर की दुनिया ही भूल गए. इस पर एक दिन रामबोला की पत्नी परेशान होकर उन्हें छोड़ अपने मायके चले गयी.

लेकिन वो रात में वंहा भी पहुँच गए और तब उनकी पत्नी ने गुरु के जैसे ऐसे वचन कहे की उनका वैराग्य जाग गया और वे तुरंत श्रीराम की खोज में निकल गए.

रामबोला तुलसीदास बन गए, उसी समय घर छोड़ दिया और चौदह वर्षो तक तीर्थ यात्रा की. इस पर भी उन्हें सत्य का ज्ञान नहीं हुआ तो खीज के अपने यात्राओ के दौरान इकट्ठा किये जल का कमंडल एक सूखे पेड़ की जड़ो में फेंक दिया।

उस पेड़ पर एक आत्मा रहती थी, वो तुलसीदास से प्रसन्न हुई( क्योंकि उसे मुक्ति मिल गई थी) और उसने वर मांगने कहा. इस पर तुलसी दास ने रामदर्शन की लालसा जताई, आत्मा ने कहा की तुम हनुमान मंदिर जाओ वंहा रामायण का पाठ होता है.

जिसे सुनने हनुमान स्वयं कोढ़ी के वेश में आते है जो की शुरू से लेके अंत तक रामायण का पाठ सुनते है. तुम उनके पैरो में गिर जाना वो तुम्हारी जरूर मदद करेंगे.

तुलसीदास ने वैसा ही किया तथा अगले दिन वह हनुमान मंदिर जाकर रामायण का पाठ सुनने लगे तभी उन्हें रामायण की कथा सुनने आये लोगो में एक कोढ़ी दिखा जो रामायण की कथा सुनने में मग्न था.

तुलसीदास समझ गए की यही कोढ़ी के रूप में हनुमान जी है. जैसे ही रामायण की कथा समाप्त हुई तुलसी दास ने हनुमान जी के पैर पकड़ लिए तथा उनकी स्तुति करने लगे.

तब हनुमान जी ने उन्हें अपने वास्तविक रूप में दर्शन दिए तथा तुलसीदास को यह वरदान देते हुए अंतर्ध्यान हो गए की जल्द ही उनकी भेट श्री राम जी से होगी।

एक दिन जब चित्रकूट के घाट पर तुलसीदास भगवान श्री राम की प्रतिमा के तिलक के लिए चन्दन कूट रहे थे तब स्वयं श्री राम ने उन्हें दर्शन दिए तथा अपने हाथो से तुलसीदास का तिलक किया. भगवान श्री राम के दर्शन पाकर तुलसी दास प्रसन्न हो गये थे.

भगवान श्री के आशीर्वाद से तुलसीदास को ज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने रामायण समेत 12 पुस्तकें लिख डाली. एक समय की बात है, जब तुलसी दास नदी किनारे स्नान करने को गए तब कुछ चोरो ने उनकी लिखी पुस्तकें चुरा ली.

परन्तु वे चोर तुलसी के आश्रम से कुछ दुरी पर ही गए होंगे तभी उन्होंने देखा की एक सवाल रंग का व्यक्ति हाथ में धनुष बाण पकडे उनका पीछा कर रहा है. उन चोरो ने डर से सभी पुस्तकें तुलसीदास को वापस कर दी।

।। राम सिया राम सिया राम जय जय राम।।

गिरधारी अग्रवाल

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(((( क्रोध का ज़हर ))))
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एक बार एक राजा घने जंगल में भटक रहा था । राजा को बहुत जोर से प्यास लगी थी।
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इधर-उधरहरजगह तलाश करने पर भी उसे कहीं पानी दिखाई नहीं दे पा रहा था ।
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प्यास से उसका गला सुखा जा रहा था ।
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तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी, जहाँ एक डाली से टप-टप करती थोड़ी-थोड़ी पानी की बूंदें गिर रहीं थीं।
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राजा ने उस वृक्ष के पास जाकर नीचे पड़े पत्तों का दोना बनाया और उन बूंदों से दोने को भरने लगा ।
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काफी समय लगने पर वह दोना भर गया । राजा ने प्रसन्न होते हुए जैसे ही उस पानी को पीने के लिए दोने को मुँह के पास ऊँचा किया,
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तभी वहाँ सामने बैठा हुआ एक तोता टेंटें की आवाज करता हुआ आया और उस दोने को झपट्टा मारकर वापिस सामने की ओर बैठ गया ।
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उस दोने का पूरा पानी नीचे गिर गया ।
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राजा निराश हुआ कि बड़ी मुश्किल से पानी नसीब हुआ था और वो भी इस पक्षी ने गिरा दिया । लेकिन अब क्या हो सकता है ।
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ऐसा सोचकर वह फिर से उस खाली दोने को भरने लगा । काफी मशक्कत के बाद वह दोना फिर भर गया ।
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राजा ने पुनः हर्षचित्त होकर जैसे ही उस पानी को पीने के लिए दोने को उठाया तो वही सामने बैठा तोता टेंटें करता हुआ आया और दोने को झपट्टा मारकर नीचे गिरा के वापिस सामने बैठ गया ।
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अब राजा हताशा के वशीभूत हो क्रोधित हो उठा – मुझे जोर से प्यास लगी है । मैं इतनी मेहनत से पानी इकट्ठा कर रहा हूँ और यह
दुष्ट पक्षी मेरी सारी मेहनत को आकर गिरा देता है ।
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मैं इसे नहीं छोड़ूंगा । अब की बार जब यह वापिस आएगा तो इसे खत्म कर दूँगा ।
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इस प्रकार वह राजा अपने हाथ में चाबुक लेकर वापिस उस दोने को भरने लगा ।
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काफी समय बाद उस दोने में पानी भर गया।
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राजा ने पीने के लिए जैसे ही उस दोने को ऊँचा किया तो वह तोता पुनः टेंटें करता हुआ उस दोने को झपट्टा मारने पास आया,
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वैसे ही राजा ने अपने चाबुक को तोते के ऊपर दे मारा और उस तोते के वहीं प्राण पखेरु उड़ गए ।
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राजा ने सोचा – इस तोते से तो पीछा छूट गया । लेकिन ऐसे बूंद-बूंद से कब तक दोना भरुँगा और कब अपनी प्यास बुझा पाऊँगा,
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इसलिए जहाँ से यह पानी टपक रहा है, क्यों ना वहीं जाकर झट से पानी भर लूँ ।
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ऐसा सोचकर वह राजाउस डाली के पास पहुँच गया, जहाँ से पानी टपक रहा था ।
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वहाँ जाकर जब राजा ने देखा तो उसके पाँवों के नीचे की जमीन खिसक गयी ।
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क्योंकि उस डाली पर एक भयंकर अजगर सोया हुआ था और उस अजगर के मुँह से लार टपक रही थी ।
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राजा जिसको पानी समझ रहा था, वह अजगर की ज़हरीली लार थी ।
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राजा के मन में पश्चाताप का समन्द्र उठने लगा ।
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हे प्रभु ! मैंने यह क्या कर दिया ? जो पक्षी बार-बार मुझे ज़हर पीने से बचा रहा था, क्रोध के वशीभूत होकर मैंने उसे ही मार दिया ।
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काश ! मैंने सन्तों के बताये उत्तम ‘क्षमा मार्ग’ को धारण किया होता।
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अपने क्रोध पर नियन्त्रण किया होता तो यह मेरा हितैषी निर्दोष पक्षी इसकी जान नहीं जाती ।
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हे भगवान ! मैंने अज्ञानता में कितना बड़ा पाप कर दिया ? हाय ! यह मेरे द्वारा क्या हो गया ?
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ऐसे घोर पाश्चाताप से प्रेरित हो वह राजा दु:खी हो उठा ।
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सन्त कहते हैं कि क्षमा और दया धारण करने वाला सच्चा वीर होता है ।
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क्रोध में व्यक्ति दुसरों के साथ-साथ अपना खुद का भी बहुत नुकसान कर लेता है ।
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क्रोध वह ज़हर है, जिसकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है और अन्त पाश्चाताप से होता है ।
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इसलिए जितना भी हो सके हमेशा क्रोध पर नियन्त्रण रखना चाहिये और क्रोध में आकर कभी कोई फैसला नहीं लेना चाहिये ।

(((((((( जय जय श्री राधे ))))))))

कृष्णा शर्मा

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👦🏻एक बेटे ने पिता से पूछा-
पापा.. ये ‘सफल जीवन’ क्या होता है ??🤔

👴🏼पिता, बेटे को पतंग 🔶🔷 उड़ाने ले गए।
बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था…🤔

थोड़ी देर बाद बेटा बोला-
पापा.. 😌ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !! ये और ऊपर चली जाएगी….🙂

👴🏼😌😮पिता ने धागा तोड़ दिया ..

पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई…💢♨

तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया…😎

बेटा..
‘जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं
जैसे :
-घर-⛪
-परिवार-👨‍👨‍👧‍👦
-अनुशासन-🏃🏼
-माता-पिता-👪
-गुरू-और-👵🏻
-समाज-
और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं…😏

वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..😮

‘इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो बिन धागे की पतंग का हुआ…’🙂

“अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना..”😀

“धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही ‘सफल जीवन’ कहते हैं..”
💐🙏🏻

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प्रेम और भक्ति में हिसाब….!!!!!

   जय श्री राधे राधे जी सभी को...!!!!

एक पहुंचे हुए सन्यासी का एक शिष्य था, जब भी किसी मंत्र का जाप करने बैठता तो संख्या को खडिया से दीवार पर लिखता जाता। किसी दिन वह लाख तक की संख्या छू लेता किसी दिन हजारों में सीमित हो जाता। उसके गुरु उसका यह कर्म नित्य देखते और मुस्कुरा देते।

एक दिन वे उसे पास के शहर में भिक्षा मांगने ले गये। जब वे थक गये तो लौटते में एक बरगद की छांह बैठे, उसके सामने एक युवा दूधवाली दूध बेच रही थी, जो आता उसे बर्तन में नाप कर देती और गिनकर पैसे रखवाती। वे दोनों ध्यान से उसे देख रहे थे। तभी एक आकर्षक युवक आया और दूधवाली के सामने अपना बर्तन फैला दिया, दूधवाली मुस्कुराई और बिना मापे बहुत सारा दूध उस युवक के बर्तन में डाल दिया, पैसे भी नहीं लिये। गुरु मुस्कुरा दिये, शिष्य हतप्रभ!

उन दोनों के जाने के बाद, वे दोनों भी उठे और अपनी राह चल पडे। चलते चलते शिष्य ने दूधवाली के व्यवहार पर अपनी जिज्ञासा प्रकट की तो गुरु ने उत्तर दिया,

” प्रेम वत्स, प्रेम! यह प्रेम है, और प्रेम में हिसाब कैसा? उसी प्रकार भक्ति भी प्रेम है, जिससे आप अनन्य प्रेम करते हो, उसके स्मरण में या उसकी पूजा में हिसाब किताब कैसा?” और गुरु वैसे ही मुस्कुराये व्यंग्य से।

” समझ गया गुरुवर। मैं समझ गया प्रेम और भक्ति के इस दर्शन को।

संजय गुप्ता

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प्रेरक प्रसंग

देनहार कोई और है

  एक बार सन्त तुलसीदासजी के पास एक निर्धन व्यक्ति आया और उसने अपनी कन्या के विवाह के लिए कुछ मदद करने की विनती की ।  तुलसीदासजी ने कहा,  "मैं तो ठहरा पक्का साधु !  भला तेरी क्या मदद कर सकता हूँ मैं ?  हाँ, मेरा एक मित्र है ___ अब्दुर्रहीम खानखाना, जो बादशाह के दरबार में ऊँचे पद पर है और बड़ा दानी पुरुष है ।  मगर दानी लोगों से सीधे माँगना उचित नहीं है, इसलिए तेरे लिए सांकेतिक रुप से माँग कर देखूँगा ।"  और उन्होंने एक कागज के टुकड़े पर निम्न पंक्ति लिखी ___ "सुरतिय नरतिय नागतिय, यह चाहत सब कोय ।"
  ब्राह्मण जब वह कागज लेकर खानखाना के पास गया, तो उन्होंने लिखित पंक्ति का आशय समझकर पूछा,  "कितना धन चाहिए ।"  ब्राह्मण के कन्या के विवाह का प्रयोजन बताया ।  तब उन्होंने कहा,  "विवाह से पहले मुझे सूचित कर देना ।  मैं आकर सारी व्यवस्था कर दूँगा ।  कुछ समयोपरान्त ब्राह्मण से सूचना मिलने पर उन्होंने सचमुच विवाह का सारा खर्च वहन किया ।  लेकिन जाते समय वही कागज का टुकड़ा ब्राह्मण को देते हुए कहा,  "इसमें मैंने तुलसीदासजी को जवाब दे दिया है ।  उन्हें वह दिखा देना ।"  ब्राह्मण ने पढ़ा तो उसमें यह लिखा पाया __ "गोद लिये हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय ।"
  तुलसीदासजी ने जब यह पंक्ति पढ़ी, तो ब्राह्मण से पूछा,  "उन्होंने तेरी आर्थिक मदद की थी न ?  मगर तुझसे कोई खास बात भी तो की होगी ?"  ब्राह्मण ने जवाब दिया,  "मदद तो खूब की, मगर कहा कुछ नहीं ।  हाँ, वे पहले अपना हाथ उपर उठाते थे और फिर नीचे की ओर देखकर सब धन दे देते थे ।"  तुलसीदासजी ने सुना, तो कागज पर लिख दिया,  "सीखी कहाँ खानानजू ऐसी देनी देन, ज्यों-ज्यों कर ऊँची करी, त्यों-त्यों नीचे नैन ।"  ( ___ खानखाना, आपने इस प्रकार से दान देना कहाँ से सीखा ? क्योंकि देते समय जितना हाथ आप उपर उठाते थे, उतनी ही नजर नीची करते थे । )  और उन्होंने ब्राह्मण से वह कागज खानखाना को देने के लिए कहा ।
  खानखाना ने जब यह दोहा पढ़ा, तो उन्होंने निम्न दोहा उसके नीचे जोड़ दिया ___ "देनहार कोई और है, भेजत जो दिन रैन ।  लोग भरम मुझपे करें, याते नीचे नैन ।"  ( ___ देनेवाला तो कोई और अर्थात् जगत्पालक ईश्वर है, लेकिन लोगों को भ्रम है कि मैं देता हूँ ।  इससे मुझे ग्लानि होती है, इस कारण अपनी नज़र नीची कर लेता हूँ । )  तुलसीदासजी ने पढ़ा, तो गद्ग़द् हो गये ।

अनूप सिन्हा

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😎 आज के सभ्य समाज में एक नारी निशा तिवारी ने अपनी मेहनत से सफलता के लिए संघर्ष किया……………

🙂 मेरी कहानीः मैं न विधवा हूं न शादीशुदा, मैं एक अकेली मां हूं
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मेरी दो साल के अंतराल में दो शादियां हुईं. 22 साल की उम्र में पहली शादी हुई थी लेकिन पति का देहांत हो गया. दूसरी शादी 24 साल की उम्र में हुई लेकिन वो भी नाकाम रही. दूसरे पति के साथ बिगड़े रिश्ते के कारण मैं अवसाद में चली गई. हर रोज़ नशे की गोलियां खाने लगी. मेरे मन में आत्महत्या का विचार आता. एक दिन परेशान होकर मैंने अपनी जान देने का फ़ैसला ले ही लिया. मैंने नदी में छलांग लगाने का प्रयास किया. लेकिन वहां खड़े लोगों ने मुझे बचा लिया और पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस ने मुझे नारी सुधार गृह भेज दिया.
मैं गोरखपुर के पास देवरिया की रहने वाली हूं. मैं एक ऐसी औरत हूं जिसे न ही आप विधवा कह सकते हैं और न ही शादीशुदा.
मेरे पिता काम की तलाश में असम में बस गए थे. मेरा जन्म वहीं हुआ. बचपन में ही मैंने अपनी मां को खो दिया.
मेरी पहली शादी असम में ही हुई थी. एक साल बाद ही मेरा एक बेटा भी हो गया लेकिन मेरे पति की अचानक मौत हो गई.
इसी बीच मेरे पिता देवरिया में हमारे पुश्तैनी मकान में रहने लगे. बहुत कम उम्र में विधवा होने के कारण पिता ने मुझे अपने साथ रहने के लिए बुला लिया. वो मेरी दूसरी शादी कराना चाहते थे. ये मेरे पिता का एक सही फ़ैसला था.
लेकिन उनका ये सही फ़ैसला मेरे लिए बहुत ग़लत साबित हुआ. जिस सुखद वैवाहिक जीवन की तलाश में मैंने शादी की थी वो और दूभर हो गया.
मुझे अपने दूसरे पति से भी अलग होना पड़ा. आत्महत्या के प्रयास के बाद नारी सुधार गृह भेजे जाने से मेरे सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया.
मेरे पिता बूढ़े हो चले थे. अपना पेट पालने के लिए मैंने एक दुकान पर नौकरी कर ली.
मेरे सामने अपने बेटे का ख़र्च उठाने की चुनौती भी थी. वो असम में अपनी दादी के पास रह रहा था लेकिन बीच-बीच में मैं उसे अपने पास देवरिया भी ले आती.
बढ़े होते बेटे के खर्चे भी बढ़ रहे थे. मेरी कमाई खर्च पूरा नहीं कर पा रही थी.
मैं आमदनी बढ़ाने के प्रयास करने लगी. मेरे एक परिचित भैया अख़बार बांटने का काम करते हैं. मैंने उनसे कहा कि मैं भी अख़बार बाटूंगी. ये ऐसा काम था जिसे पुरुष ही करते हैं.
उन भैया की मदद से मैं हॉकर बन गई. काम के पहले दिन सुबह चार बजे साइकिल पर अख़बार की गड्डियां लेकर जब मैं निकली तो मन में अजीब सी झिझक थी. मैं उस काम पर निकली थी जिसे आमतौर पर पुरुष ही करते हैं.
शुरू में मुझे दिक्कतें आईं लेकिन मैं जानती थी कि ये काम बुरा नहीं है. कुछ लोगों ने मज़ाक बनाया तो कुछ ने हिम्मत बढ़ाई.
आज मैं सुबह चार बजे उठकर करीब ढाई सौ घरों में अख़बार पहुंचाती हूं. मुझे कई किलोमीटर साइकिल चलानी पड़ती है. इसके बाद पूरे दिन एक कपड़े की दुकान पर काम करती हूं.
इस तरह मैं सुबह चार बजे से रात आठ बजे तक काम करती हूं.
मैं रोज़ाना सौलह घंटे काम ख़ुशी-ख़ुशी करती हूं क्योंकि मैं एक मां हूं.
अख़बार बांटने से होने वाली अतिरिक्त कमाई से मैं अपने बेटे को पढ़ा लिखा रही हूं. मुझे विश्वास है एक दिन मेरा बेटा पढ़ लिखकर अच्छा जीवन जिएगा.
(अमर उजाला में प्रकाशित निशा तिवारी की कहानी)

संजय गुप्ता

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OM NAMO NARAYAN

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🍁🍁🍁

भगवान विष्णु ने धर्म की पत्नी रुचि के माध्यम से नर और नारायण नाम के दो ऋषियों के रूप में अवतार लिया। वे जन्म से तपोमूर्ति थे अत: जन्म लेते ही बदरी वन में तपस्या करने के लिए चले गये। उनकी तपस्या से ही संसार में सुख और शान्ति का विस्तार होता है। बहुत से ऋषि-मुनियों ने उनसे उपदेश ग्रहण करके अपने जीवन को धन्य बनाया। आज भी भगवान नर-नारायण निरन्तर तपस्या में रत रहते हैं। इन्होंने ही द्वापर में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रुप में अवतार लेकर पृथ्वी का भार हरण किया था।

एक बार इनकी उग्र तपस्या को देखकर देवराज इन्द्र ने सोचा कि ये तप के द्वारा मेरे इन्द्रासन को लेना चाहते हैं, अत: उन्होंने इनकी तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव, वसन्त तथा अपसराओं को भेजा। उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या से अलग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उनके सहयोगियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कामदेव, वसन्त तथा अप्सराएँ शाप के भय से थर-थर काँपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर-नारायण ने कहा – “तुम लोग जरा भी मत डरो, हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।”

भगवान नर-नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा – “प्रभो! आप निर्विकार परम तत्त्व हैं। बड़े-बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण-कमलों की सेवा के प्रभाव से काम विजयी हो जाते हैं। देवताओं का तो स्वभाव ही है कि जब कोई तपस्या करके ऊपर उठना चाहता है तब वे उसके तप में विघ्न उपस्थित करते हैं। काम पर विजय प्राप्त करके भी जिन्हें क्रोध आ जाता है, उनकी तपस्या नष्ट हो जाती है। परंतु आप तो देवाधिदेव नारायण हैं। आपके सामने भला ये काम-क्रोधादि विकार कैसे फटक सकते हैं? हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है।”

कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर-नारायण पर प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि साक्षात लक्ष्मी के समान सुन्दर-सुन्दर नारियाँ नर-नारायण की सेवा कर रही हैं। नर-नारायण ने कहा – ‘तुम इन स्त्रियों में से किसी एक को माँगकर स्वर्ग में ले जा सकते हो, वह स्वर्ग के लिए भूषण स्वरुप होगी।’ उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया।

उसने देव सभा में जाकर भगवान नर-नारायण की अतुलित महिमा से सबको परिचित कराया, जिसे सुनकर देवराज इन्द्र चकित और भयभीत हो गये। उन्हें भगवान नर-नारायण के प्रति अपनी दुर्भावना और दुष्कृति पर विशेष पश्चाताप हुआ। भगवान नर-नारायण के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। इससे उनके तप के प्रभाव की अतुलित महिमा का परिचय मिलता है। उन्होंने अपने चरित्र के द्वारा काम पर विजय प्राप्त करके क्रोध के अधीन होने वाले और क्रोध पर विजय प्राप्त करके अभिमान से फूल जाने वाले तपस्वी महात्माओं के कल्याण के लिये अनुपम आदर्श स्थापित किया
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संजय गुप्त