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प्रेरक कहानी – तीन गुरु|

बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत (Mahant) रहते थे । उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य (Student) ने महंत से सवाल किया, ” स्वामीजी आपके गुरु कौन है ? आपने किस गुरु (Guru- Teacher) से शिक्षा प्राप्त की है ?” महंत शिष्य का सवाल (Question) सुन मुस्कुराए और बोले, ” मेरे हजारो गुरु हैं ! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो (Months) लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा ।

मेरा पहला गुरु था एक चोर।

एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने (Shop) और घर (House) बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं कोई भी आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ आज कि रात ठहर सकते हो। मै एक चोर हु और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते है।

“वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक रात कि जगह एक महीने (One Month) तक रह गया ! वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे? तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, और हमेशा मस्त रहता था। कुछ दिन बाद मैं उसको धन्यवाद करके वापस आपने घर आ गया|

जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी नहीं हो रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर (Thief) की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान (Bhagwan) ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा और इस तरह मैं हमेशा अपना ध्यान लगता और साधना में लीन रहता|

और मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था।

एक बहुत गर्मी वाले दिन मै कही जा रहा था और मैं बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि सामने से एक कुत्ता (Dog) दौड़ता हुआ आया। वह भी बहुत प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी ही परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर (Afraid) गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी (Water) के पास लौट आता। अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।”

और मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है।

मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा (Small Kid) एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी मंदिर में मोमबत्ती रखने जा रहा था। मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है ? वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई ?

” वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती (Candle) को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह ? आप ही मुझे बताइए। “

“मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए। “

मित्रो, शिष्य होने का अर्थ क्या है ? शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना।कभी किसी कि बात का बूरा नहि मानना चाहिए, किसी भी इनसान कि कही हुइ बात को ठंडे दिमाग से एकांत में बैठकर सोचना (Think)चाहिए के उसने क्य क्या कहा और क्यों कहा तब उसकी कही बातों से अपनी कि हुई गलतियों को समझे और अपनी कमियों को दूर् करे| जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए।यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है , यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं !

मुकेश अग्नि

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प्रेरक प्रसंग

लालच बुरी बलाय

 महाराष्ट्र - सन्त जोगा परमानन्द की असीम भगवद्भ़क्ति से लोग उनके प्रति आकृष्ट होते और उनमें श्रद्धाभाव जाग्रत होता ।  एक बार जब वे कीर्तन में मग्न थे, तो कुछ लोग वहाँ से चुपचाप निकल आये और बाजार जाकर एक कीमती पीतवस्त्र ( पीताम्बर ) ले आये ।  जब कीर्तन समाप्त हुआ और आरती हुई, तो उन्होंने दक्षिणा के रूप में वह पीताम्बर उन्हें भेंट किया ।  किन्तु वीतरागी सन्त भला इतना कीमती उपहार कैसे लेता ?  उन्होंने उसे लेने से इन्कार कर दिया ।  मगर लोगों ने उनकी एक न सुनी और उन्होंने सन्त के शरीर पर उसे जबरदस्ती चढ़ा दिया ।  आरती के पश्चात जब वे भजन गाने लगे, तो उनका ध्यान भगवान् की ओर से हटने लगा ।  वे सोचने लगे कि इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं होता था ।  बात उनके ध्यान में आ गयी कि यह कीमती वस्त्र का ही असर है, जो भगवद् - भक्ति में बाधक बन रहा है ।  उन्होंने उसे नीचे उतार दिया और पुनः भजन में लीन हो गये ।
  कीर्तन समाप्त होने पर वे पीताम्बर लेकर घर आये ।  वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि उनका ध्यान पीताम्बर की ओर गया और उन्हें आत्मग्लानि हुई कि उनके शरीर को पीताम्बर का मोह हुआ ही कैसे कि प्रभु की ओर से उनका ध्यान हटने लगा था ।  उन्होंने निश्चय किया कि इस लोभी देह को दण्ड दिया ही जाना चाहिए ।  फिर सोचने लगे कि क्या दण्ड दिया जाए ?  क्या इसे अग्नि की आँच दी जाए, या पानी में डुबाया जाए, अथवा  'अष्टांग योग साधन‌ ' द्वारा प्रायश्चित का सहारा लिया जाए ।  किन्तु उन्हें इनमें से कोई दण्ड पसन्द न आया ।  इसी चिन्ता में उन्हें रात भर नींद न आयी ।
  दूसरे दिन प्रातः वे फिर शरीर को दण्ड देने की सोचने लगे कि सामने से एक किसान अपने बैलों के साथ खेतों की ओर जाता दिखाई दिया ।  सन्त ने उसे बुलाकर बैलों की कीमत पूछी ।  उसके द्वारा बताने पर उन्होंने उतने रुपये दिये, साथ ही वह पीताम्बर भी सौंप दिया ।  उससे बैल लेकर उन्होंने स्वयं को हल के समान बाँधा और भगवान् का नाम लेकर बैलों को कोड़े लगाये ।  इससे बैलों ने जोर से भागना शुरू किया ।  लोगों ने जब उन्हें बैलों के साथ घिसटते देखा, तो उन्होंने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन बैल इतने तेज दौड़ रहे थे कि रूक न पाये ।  किन्तु जिस परम दयालु भगवान् ने गजेन्द्र की आर्तवाणी सुनकर उसकी रक्षा की थी, उनसे अपने इस परम भक्त का यह कष्ट कैसे देखा जाता ?  वे तत्काल प्रकट हो गये और उन्होंने बैलों को रोककर जोगा को शान्त किया ।  प्रभु के दर्शन से वे भावविभोर हो गये और आँख मूँदकर भगवान् की प्रार्थना करने लगे और इधर दीनदयालु अन्तर्धान हो गये ।

अनूप सिन्हा

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प्रेरक प्रसंग

ज्ञान को आभूषण ध्यान है

  महाराष्ट्र - सन्त रामदासजी का बचपन का नाम नारायण था ।  वे बड़े ही उदण्ड थे ।  वे दोस्तों के साथ जब जंगल की ओर खेलने निकल जाते, तो वहीं रम जाते ।  एक दिन उनके घर में कोई उत्सव था ।  माता राणूबाई को कढ़ी बनाने के लिए छाँछ की आवश्यकता हुई, तो उन्होंने बालक नारायण से कहा,  "कल छाँछ लगेगा, पड़ोसी से माँगकर ले आना ।"  मगर जब उसके निठल्लेपन की ओर माँ का ध्यान गया, तो बोलीं,  "मगर तुझे यह काम बताने से क्या फायदा ? तुझे तो खेलने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं ।"  ये शब्द सुन उन्हें गुस्सा आ गया ।  वे कुम्हार के घर गये और ग्यारह मटके माँगकर हर पड़ोसी को एक-एक देते हुए उन्होंने कहा,  "कल माँ ने सुबह इसमें छाँछ माँगा है ।"  पड़ोसियों के घर में गायें होने के कारण दूध का खूब छाँछ बनता था ।  उन्होंने सुबह आने को कहा ।  बालक नारायण तड़के ही उठा और उन सारे मटकों में छाँछ लाकर उसने रसोईघर में चुपचाप रख दिया ।
  नींद खुलने पर माता ने जब ग्यारह मटके छाँछ देखा, तो चकित रह गयीं ।  उन्होंने पति से छाँछ के बारे में पूछा, तो उन्होंने अनभिज्ञता व्यक्त की ।  बड़े पुत्र और बहू को भी कुछ मालूम न था ।  वे लोग समझ गये कि सारी करामात नारायण की है ।  माता ने नारायण को डाँटते हुए कहा, तेरी उदण्डता कब जाएगी ? यदि जिन्दगी भर ऐसा ही रहा, तो बस हो चुकी गृहस्थी !  न मालूम तुझे अक्ल कब आएगी !"
  बस, माता के ये शब्द बालक के अन्तर्मन को चुभ गये ।  वह चुपचाप कमरे में चला गया और दरवाजा बन्द कर एक कोने में आँख बन्दकर भगवान् का ध्यान करने लगा ।  बहुत देर तक बालक नारायण के न दिखाई देने पर सबको चिन्ता हुई और वे उसे खोजने में लग गये ।  इतने में किसी चीज के लिए माता जब उस कमरे में गयीं तो उन्होंने पुत्र को आँख बन्द किये ध्यान में मग्न देखा ।  उन्होंने डाँटते हुए पूछा,  "नारोबा, अँधेरे में क्या कर रहा है ?"  बालक ने उत्तर दिया,  "आई, मैं विश्व की चिन्ता कर रहा हूँ !"  माँ ने गंभीरता से वह बात पति को बतायी।  उन्होंने उससे डाँट - डपट न करने की सलाह दी और कहा कि बड़ा होने पर आप ही आप इसमें समझदारी आ जाएगी ।  लेकिन होनी को कौन टाल सकता है ?  अब तो बालक नारायण जब - तब आँख बन्द किये ध्यान करने लगा ।  और बड़ा होने पर सचमुच ही उसने विश्व की चिन्ता दूर करने में स्वयं को लगा दिया ।

अनूप सिन्हा

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🔥”कर्ज वाली लक्ष्मी” 🔥

”पापा पापा सुनीता दीदी के होने वाले ससुर आ रहे है” सुनीता की छोटी बहन ने अपने पापा को आवाज लगाते हुये कहा!

दीनदयाल जी पहले से ही उदास बैठे थे धीरे से बोले
“बेटी उनका कल ही फोन आया था बोले दहेज के बारे में आप से बात करनी है बड़ी मुश्किल से यह अच्छा लड़का मिला था कल को उनकी दहेज की मांग पूरी नही कर पाया तो??”

घर के प्रत्येक सदस्य के मन व चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी

जैसे ही लड़के के पिताजी को पानी दिया उन्होंने धीरे से अपनी कुर्सी दीनदयाल जी और खिसकाई ओर धीरे से बोले दीनदयाल जी मुझे दहेज के बारे बात करनी है!

दीनदयाल जी हाथ जोड़ते हुये बोले बताईए समधी जी

समधी जी ने धीरे से दीनदयाल जी का हाथ दबाते हुए बस इतना ही कहा…..
आप दहेज में कुछ भी देगें मुझे स्वीकार है पर कर्ज लेकर दहेज मत देना क्योकि जो बेटी अपने बाप को कर्ज में डुबो दे वैसी “कर्ज वाली लक्ष्मी” मुझे स्वीकार नही…
पं युगल किशोर पावनाचार्य
🛡️एस्ट्रो & पामिस्ट🛡️
🚩जय जय श्री राम🚩

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“मैले कपड़े”

एक शहर के निकट ही एक गांव में एक विद्वान संत रहा करते थे। एक दिन संत अपने एक अनुयायी के साथ सुबह की सैर कर रहे थे। अचानक ही एक व्यक्ति उनके निकट आया और उन्हें बुरा भला कहने लगा। उसने संत के लिए बहुत सारे अपशब्द कहे लेकिन संत फिर भी मुस्कुराते हुए चलते रहे। उस व्यक्ति ने देखा कि संत पर कोई असर नहीं हुआ तो वह व्यक्ति और भी क्रोधित हो गया और उनके पूर्वजो तक को गालियां देने लगा।

संत फिर भी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते रहे और संत पर कोई असर नहीं होते देख वो व्यक्ति निराश हो गया और उनके रास्ते से हट गया। उस व्यक्ति के जाते ही संत के अनुयायी ने उस संत से पूछा कि अपने उस दुष्ट की बातों का कोई जवाब क्यों नहीं दिया वो बोलता रहा और आप मुस्कुराते रहे क्या आपको उसकी बातों से जरा भी कष्ट नहीं हुआ।

संत कुछ नहीं बोले और अपने अनुयायी को अपने पीछे आने का इशारा किया। कुछ देर चलने के बाद वो दोनों संत के कक्ष तक पहुंच गए। उस से संत बोले तुम यही रुको मैं अंदर से अभी आया। कुछ देर बाद संत अपने कमरे से निकले तो उनके हाथों में कुछ मैले कपड़े थे उन्होंने बाहर आकर उस अनुयायी से कहा ” ये लो तुम अपने कपड़े उतारकर ये कपड़े धारण कर लों इस पर उस व्यक्ति ने देखा कि उन कपड़ों में बड़ी तेज अजीब सी दुर्गन्ध आ रही थी इस पर उसने हाथ में लेते ही उन कपड़ों को दूर फेंक दिया।”

संत बोले अब समझे जब कोई तुमसे बिना मतलब के बुरा भला कहता है तो तुम क्रोधित होकर उसके फेंके हुए अपशब्द धारण करते हो अपने साफ़ सुथरे कपड़ो की जगह। इसलिए जिस तरह तुम अपने साफ सुथरे कपड़ों की जगह ये मैले कपड़े धारण नहीं कर सकते उसी तरह मैं भी उस आदमी में फेंके हुए अपशब्दों को कैसे धारण करता यही वजह थी कि मुझे उसकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।

संतोष चतुर्वेदी

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🗼जय श्री कृष्णा🗼
🎉जनमेजय और सरमा🎉
🍁🍁एक बार जनमेजय अपने भाई श्रुतसेन, और भीमसेन के साथ यज्ञ कर रहे थे| उस बीच एक कुत्ता यज्ञशाला में घुस गया| कुत्ते को उस पवित्र यज्ञशाला में देखकर सभी बड़े क्रुद्ध हुए और जनमेजय के तीनों भाइयों ने उस कुत्ते को खूब मारा, जिससे कुत्ता रोता हुआ अपनी मां सरमा के पास पहुंचा|

🍁🍁अपने बच्चे को रोता देखकर सरमा दुखी होकर उसके रोने का कारण पूछने लगी| कुत्ते ने कहा, “हे माता ! राजा जनमेजय के भाइयों ने मुझे मारा है|”यह सुनकर तो सरमा चौंक उठी और उसने कहा, “हे पुत्र ! तूने अवश्य कोई अपराध किया होगा तभी राजा के भाइयों ने तुझे मारा है, नहीं तो राजा बड़ा न्यायशील है| वह व्यर्थ किसी जीव को नहीं सताता !”

🍁🍁कुत्ते ने कहा, “हे मां, मैं यज्ञशाला के भीतर गया था, लेकिन वहां मैंने किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया था| न तो यज्ञ के हवि की तरफ मैंने देखा और न वहां रखे किसी पदार्थ को मुंह डालकर जूठा किया, फिर मेरा क्या अपराध है?”अपने निर्दोष पुत्र की यह बात सुनकर तो सरमा को क्रोध आ गया| वह अपने रोते बच्चे को लेकर उसी यज्ञशाला में आई और जनमेजय से कहने लगी, “हे राजा ! तुम्हारे भाइयों ने मेरे निर्दोष बच्चे को मारा है| इसने न तो तुम्हारी यज्ञशाला में रखी किसी वस्तु को खाया है और न किसी वस्तु को अपवित्र किया था| फिर इसका क्या दोष है, जिसके ऊपर तुम्हारे भाइयों ने मेरे लाड़ले को रुलाया है?”

🍁🍁सरमा की बात सुनकर जनमेजय चुप बैठा रहा| और उसके भाइयों में से भी कोई कुछ नहीं बोला|जब सरमा को अपने प्रश्न का कोई उचित उत्तर नहीं मिला, तो वह और भी क्रुद्ध होकर बोली, “हे राजा, तुम्हारे भाइयों ने मेरे निरपराधी पुत्र को मारा है, इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूं कि तुमको अचानक भय पैदा होगा|”यह कहकर सरमा अपने बच्चे को लेकर चली गई| इधर, जनमेजय अपने आने वाले भय की चिंता करने लगे| जैसे-जैसे दिन निकलते गए, उनकी घबराहट बढ़ती गई| अंत में उसने शाप से छुड़ाने में समर्थ किसी पुरोहित को खोजना प्रारंभ किया|

🍁🍁एक दिन वह अपने राज्य की सीमा पर शिकार खेलने गया| वहां उसे एक सुंदर आश्रम दिखाई दिया| उस आश्रम में श्रुतश्रवा ऋषि रहते थे| उनके पुत्र का नाम सौमश्रवा था| ऋषि तपस्या कर रहे थे| जनमेजय उनके पास गया और उन्हें प्रणाम करके कहने लगा, “हे महर्षि ! मैं आपके पुत्र को अपना पुरोहित बनाना चाहता हूं|”

🍁🍁ऋषि ने कहा, “हे राजा ! मेरा यह पुत्र मेरे वीर्य से एक सर्पिणी के गर्भ से पैदा हुआ है| वह सर्पिणी मेरे वीर्य को पी गई थी| उसकी कोख से यह तेजस्वी पुत्र पैदा हुआ है| यह महापंडित है और समय-समय पर तुम्हारे चित्त की सारी शंकाओं को मिटाने में समर्थ है|”
यह सुनकर राजा ने कहा, “हे भगवन ! देवताओं की कुतिया सरमा के बच्चे को यज्ञशाला में घुस आने के कारण मेरे भाइयों ने पीट दिया था| इस पर क्रुद्ध होकर सरमा मुझे शाप दे गई है कि भविष्य में कभी मुझे कोई अचानक भय उत्पन्न होगा|”

🍁🍁इस पर ऋषि श्रुतश्रवा ने कहा, “हे राजन ! मेरा यह तेजस्वी पुत्र सौमश्रवा सभी शापों को शांत कर सकता है| हां, भगवान शिव के शाप को अवश्य यह किसी प्रकार शांत नहीं कर सकता| तुम सहर्ष इसको अपने साथ ले जा सकते हो, लेकिन इसकी एक प्रतिज्ञा है, उस पर अवश्य पूरा-पूरा ध्यान रखना| प्रतिज्ञा यह है कि जो कोई ब्राह्मण तुम्हारे द्वार पर आकर कुछ भी मांगे, उसको वही देकर उसकी इच्छा पूरी करना| यदि तुमने इस व्रत का पालन नहीं किया तो सौमश्रवा तुम्हारे पास नहीं रह सकेगा|”

🍁🍁ऋषि की बात मानकर जनमेजय सौमश्रवा को अपना पुरोहित बनाकर अपने साथ ले आया| उसने आकर उनका अपने तीनों भाइयों से परिचय कराया और उन्हें आश्वासन दिया कि पुरोहित सौमश्रवा अवश्य ही उन्हें सरमा से शाप से मुक्त कर देंगे|इसके पश्चात राजा ने तक्षशिला पर चढ़ाई की और उसको जीत लिया| ऋषि सौमश्रवा के प्रभाव से भविष्य में किसी प्रकार का भय भी उनको नहीं हुआ|
🗼जय श्री कृष्णा🗼

संजय गुप्ता

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कानपुर में पुष्पा की बारात आयीl
पुष्पा के बाबू सब बारातियों के भव्य स्वागत की गजब तैयारी किये थे .
..
कुल सत्तर बारातियों के लिये सत्तर किस्म के व्यंजन तो केवल जनवासे मे परोसे गये

साथ मे खालिस दूध की काफी और मेवे अलग से बारह तरह की शुद्ध देसी घी की मिठाइयाँ

और स्पेशल मूँग का हलवा भी ..

बारातियों के ठहरने के लिये बड़े-बड़े हॉल नूमा कमरों में सत्तर मुलायम बिस्तर लगवाये गये

हर बिस्तर के सिरहाने एक एक टेबल फैन और हर दो बिस्तर के बीच एक फर्राटेदार पाँच फुटा कूलर ..

.नहाने के लिये खुशबूदार साबुन
..
.साथ मे झक सफेद रूई जैसी कोमल एक एक तौलिया सबको ..

.सफाई इतनी की जो लोग सबके सामने आईना देखने मे संकोच कर रहे थे

वो आयें बायें करके चोरी चोरी फर्श पर ही खुद को निहार रहे थे …

.रात भर खाने पीने का फुल इंतजाम
और
सुबह कलेवा मे हर बाराती को एक एक चाँदी का सिक्का और पाँच सौ एक रुपया नगद भी दिया गया !!!!!!

इस इंतजाम पे बारातियो की प्रतिक्रिया देखिये🙄🙄🙄🙄🙄🙄🙄

1-समधी जी इत्ती घोर बेइज्जती करीन है हम लोगन का बुलाय के की पूछौ मत ..l
2-जइसे हम लोग कबहु देसी घी और मेवा न खाय होये l
3- खिलाय खिलाय पेट खराब कर दिहिन l
4-का हम लोग कबहूं खुशबू वाला साबुन नाहि लगाये हैं l
5-इत्ते मुलायम बिस्तरा पर लेटाय दिहिन की सार पिठे झुराय लागि l
6-जब पंखा लगाय दिये रहें तौ कूलरवा लगाय की का जुरुरत रही …रतिया भर खटर पटर से कनवा पक गवा l
7-खनवा उबलत उबलत परोस दिहिन हमार तो मुहे जल गवा
8-इत्ती मुलायम तौलिया से तो छोट लड़कन का बदन पुछावा जात है हम लोगन की खातिर तो तनी गरु तौलिया होये चाही l
9-अरे आपन पैसवा दिखाय रहेन हैं हम लोगन का l
10-अब चाँदी वांदी का को पूछत है देय का रहा है तो एक्को सफारी सूट दय देते l

मोरल ऑफ द स्टोरी इज

मोदी जी,
आप कितना भी अच्छा करने की कोशिश कीजिये कुछ लोगो को कमी निकालने की आदत होती ही है …हिन्दुस्तान में हर आदमी
को यही पता है कि हर चीज
यदि फ्री मिले तो ही अच्छे दिन मानता है मोदी जी भी कया करें आप ही बताये।😊

संजय गुप्ता

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सकारात्मक सोच❤

एक राजा था जिसकी केवल एक टाँग और एक आँख थी।उस राज्य में सभी लोग खुशहाल थे क्यूंकि राजा बहुत बुद्धिमान और प्रतापी था।एक बार राजा के विचार आया कि क्यों खुद की एक तस्वीर बनवायी जाये।फिर क्या था, देश विदेशों से चित्रकारों को बुलवाया गया और एक से एक बड़े चित्रकार राजा के दरबार में आये।राजा ने उन सभी से हाथ जोड़ कर आग्रह किया कि वो उसकी एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनायें जो राजमहल में लगायी जाएगी।
सारे चित्रकार सोचने लगे कि राजा तो पहले से ही विकलांग है, फिर उसकी तस्वीर को बहुत सुन्दर कैसे बनाया जा सकता है ?ये तो संभव ही नहीं है और अगर तस्वीर सुन्दर नहीं बनी तो राजा गुस्सा होकर दंड देगा।यही सोचकर सारे चित्रकारों ने राजा की तस्वीर बनाने से मना कर दिया।
तभी पीछे से एक चित्रकार ने अपना हाथ खड़ा किया और बोला कि मैं आपकी बहुत सुन्दर तस्वीर बनाऊँगा जो आपको जरूर पसंद आएगी।फिर चित्रकार जल्दी से राजा की आज्ञा लेकर तस्वीर बनाने में जुट गया।काफी देर बाद उसने एक तस्वीर तैयार की जिसे देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और सारे चित्रकारों ने अपने दातों तले उंगली दबा ली।
उस चित्रकार ने एक ऐसी तस्वीर बनायीं जिसमें राजा एक टाँग पूरी तरह से दिखाई दे ऐसे घोड़े पर बैठा है,और एक आँख रानी साहिबा के लटक रहे झुल्फो से ढकी हुई है!राजा ये देखकर बहुत प्रसन्न हुआ कि उस चित्रकार ने राजा की कमजोरियों को छिपाकर कितनी चतुराई से एक सुन्दर तस्वीर बनाई है।राजा ने उसे खूब इनाम एवं धन दौलत दी।
तो क्यों ना हम भी।दूसरों की कमियों को छुपाएँ,उन्हें नजरअंदाज करें और अच्छाइयों पर ध्यान दें।आजकल देखा जाता है कि लोग एक दूसरे की कमियाँ बहुत जल्दी ढूंढ लेते हैं चाहें हममें खुद में कितनी भी बुराइयाँ हों लेकिन हम हमेशा दूसरों की बुराइयों पर ही ध्यान देते हैं कि अमुक आदमी ऐसा है, वो वैसा है।
हमें नकारात्मक परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोचना
चाहिए और हमारी सकारात्मक सोच हमारी हर समस्यों को हल करती है 🙏

संजय गुप्ता

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एक महिला की बीच सड़क पर कार खराब हुई और शाम ढलने को आई थी,वो महिला खुद से जितना प्रयत्न कर सकती थी अपने मोटर को सही करने की उसने किए पर वो नहीं ठीक हुई,दुर एक पति पत्नी साईकल पर आते परिलक्षित हुए जो शायद बाजार से लौट रहें थे क्योंकि साईकल की हैंडल पर एक सामान से भरे थैले लटके हुए थे!

वे पत्नी पति जब उस खराब मोटर के पास पहुँचे और उस महीला को हैरान परेशान देखा तो पति ने अपनी साईकल खड़ी कर दी और मोटर के नजदीक जाकर उस महिला से कहा,,दीदी मैं देखु क्या,? वो महिला तो पहले ठोडे आश्चर्य में पड गयी की एक साईकल वाला मोटर सही करने को बोल रहा हैं पर फिर उन्होंने कहा,,रहने दो तुमसे नहीं होगे,,पर उस आदमी ने फिर कहा की दीदी रात होने को हैं और आपको शहर जाना हैं और ये मोटर चालु नही हुई तो आप क्या करोगे इस सुनसान जगह पर तो मुझे देखने दीजिए!

उस आदमी की पत्नी जो गर्भवती थी दुर खड़ी होकर ये सब देख रही थी,उस आदमी ने मोटर की बोनट में कुछ आवश्यक छेड़छाड़ की और महिला को कार स्टार्ट करने को बोला,,महिला के सेल्फ मारते ही कार भनभना कर चालु हो गयी ढेर सारे काले धुएँ के साथ!

दीदी इसके कार्बुरेटर को शहर जाकर दिखा लेना जरा सा कचरे आ गये है,अच्छा दीदी आप जाओ आपको पहले ही बहोत देर हो चुकी है और शहर के अभी और 30 किलोमीटर की दुरी पर हैं,मोटर वाली महिला भौचक्का होकर उस लड़के को देख रही थी और अपने पर्स से पांच सौ रूपये निकाल कर उस लड़के के हाथ पर रखा पर उस लड़के ने अपने कंधे पर टंगे गमछे में हाथ पोछते हुए कहा की दीदी इसके कैसे पैसे,?कुछ भी तो नही किया मैने,;नही दीदी मैं ये पैसे नही ले सकता,,थैक्यु दीदी,,!

पीछे से उस लड़के की पत्नी ने आवाज लगाई,,ओ कलुआ घर नही चलने क्या,?अब तो मोटर भी चालु हो गये और देख अंधेरे भी कितने घने होने को आए,लड़के ने मोटर वाली महिला को अच्छा दीदी अब हम जाएंगे ऐसा कहकर वहाँ से चला गया और सभी लोग अपने अपने रास्ते पर अपने गंतव्य की और बढ़ गये!

चुकि ये लड़का(कलुआ) शहर के किसी मोटर फैक्टरी में मैकेनिक के काम करता था पर मोटर कंपनी में काम नहीं होने की वजह से इसकी नौकरी जाती रहीं और ये अपने गाँव पर आ गया था,,कुछ दिनों के बाद एक रात उस लड़के की पत्नी को पेट में भयानक प्रसव पीड़ा हुई और आनन फानन में लड़के और उसके गाँव वाले ने कलुआ की पत्नी को नजदीक के शहर के अस्पताल में दाखिले करवाएँ!

कलुआ के पत्नी को आॅपरेशन की जरूरत थी और कलुआ के पास पर्याप्त पैसे भी नही थे पर क्या करें कलुआ,,?उसने ऑपरेशन के लिए नर्स को हाँ कह दिया और बाकी पैसे की जुगाड मे वापस अपने गाँव को आया और इधर उस अस्पताल की बड़ी लेडी डाॅक्टरनी ने कलुआ के पत्नी के सफल ऑपरेशन किए और कलुआ एक खुबसुरत सी बिटिया के बाप बन गया,जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ थे!

कलुआ को गाँव में पैसे जुगाड नही हो पाएँ फिर अगले दिन कलुआ अस्पताल को गया और पुछताछ काऊंटर पर अपने पत्नी के ऑपरेशन और तमाम दवाइयों के खर्च के बारे में जानना चाहा,,नर्स ने कलुआ के जमा कराए पैसे को घटा कर और दस हजार देने को बोला,कलुआ सोच मे पड़ गया की अब इतने पैसे किधर से लाऊँ तभी पीछे से किसी ने कलुआ के कंधे पर हाथ रखें और कहा,,आपको अब कोई पैसे नही जमा कराने होंगे और आप अपनी पत्नी के साथ घर भी जा सकते हो!

कलूआ ने जब आश्चर्यचकित होकर पीछे मुड कर देखा तो ये कोई और नही ये तो वही मोटर वाली दीदी थी जो कलुआ को देखकर मुस्कुरा रही थी,कलुआ ने पुछा की आप मेरे पैसे क्यो दोगी दीदी,,तो उन हेड लेडी डाॅक्टरनी जिसे कलुआ दीदी कहता था उन्होंने कहा,,तुमने उस दिन मदद की मेरी और तुमको वो काम आते थे(मोटर रेपयरिंग) बस आज मैने भी वहीं किए जो तुमने उस दिन किए और ये काम (ऑपरेशन/चिकित्सा) मेरे काम है जो मुझे आते हैं!

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संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#देनेवालाकौन?
आज हमने भंडारे में भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया। हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं। इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा है
एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था।
एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।
कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- “प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।” समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा – “ऋषिवर…!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।”
अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं।
उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।
लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया।
यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।
कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा- “ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।”
साधु ने समझाया, “तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया। इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।”
कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया! दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं, तो कहते हैं मैंने दिलाया ।
वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निमित्त मात्र बनाया हैं। ताकी उन तक उनकी जरूरते पहुचाने के लिये। तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??

दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप।।
नाथ आकर द्वार पे, दूर करें संताप।।

संजय गुप्ता