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बहुत ही सुंदर कथन, अवश्य पढ़ें 🙏🙏


🙏 जय श्री कृष्ण👏 जय श्री कृष्ण

एक बार की बात है महाभारत के युद्ध के बाद भगवान
श्री कृष्ण और अर्जुन द्वारिका गये पर इस बार रथ
अर्जुन चलाकर के ले गये। द्वारिका पहुँचकर अर्जुन बहुत
थक गये इसलिए विश्राम करने के लिए अतिथि भवन में
चले गये।शाम के समय रूक्मनी जी ने कृष्ण को भोजन
परोसा तो कृष्ण बोले घर में अतिथि आये हुए है हम उनके
बिना भोजन कैसे कर ले।रूक्मनी जी ने कहा भगवन आप
आरंभ करिये मैं अर्जुन को बुलाकर लाती हूँ ।
जैसे ही रूक्मनी जी वहाँ पहुँची तो उन्होंने देखा कि अर्जुन
सोये हुए हैं और उनके रोम रोम से कृष्ण नाम की ध्वनि
प्रस्फुटित हो रही है तो ये जगाना तो भूल गयीं और मन्द मन्द
स्वर में ताली बजाने लगी । इधर नारद जी ने कृष्ण से कहा
भगवान भोग ठण्डा हो रहा है कृष्ण बोले अतिथि के बिना
हम नहीं करेंगे। नारद जी बोले मैं बुलाकर लाता हूँ नारद जी
ने वहां का नजारा देखा तो ये भी जगाना भूल गये और इन्होंने
वीणा बजाना शुरू कर दिया । इधर सत्यभामा जी बोली प्रभु
भोग ठण्डा हो रहा है आप प्रारंभ तो करिये । भगवान बोले
हम अतिथि के बिना नहीं कर सकते । सत्यभामा जी बोलीं मैं
बुलाकर लाती हूँ । ये वहाँ पहुँची तो इन्होंने देखा कि अर्जुन
सोये हुए हैं और उनका रोम रोम कृष्ण नाम का कीर्तन कर
रहा है और रूक्मनी जी ताली बजा रही हैं नारद जी वीणा
बजा रहे हैं तो ये भी जगाना भूल गयीं और इन्होंने नाचना
शुरू कर दिया । इधर भगवान बोले सब बोल के जाते हैं
भोग ठण्डा हो रहा है पर हमारी चिन्ता किसी को नहीं है
चलकर देखता हूँ वहाँ ऐसा क्या हो रहा है जो सब हमको
ही भूल गये। प्रभु ने वहाँ जाकर के देखा तो वहाँ तो स्वर
लहरी चल रही है । अर्जुन सोते सोते कीर्तन कर रहे हैं,
रूक्मनी जी ताली बजा रही हैं, नारद जी वीणा बजा रहे हैं,
और सत्यभामा जी नृत्य कर रही हैं । ये देखकर भगवान के
नेत्र सजल हो गये और मेरे प्रभु ने अर्जुन के चरण दबाना
शुरू कर दिया । जैसे ही प्रभु के नेत्रों से प्रेमा श्रुओ की बूँदें
अर्जुन के चरणों पर पड़ी तो अर्जून छटपटा के उठे और बोले प्रभु ये क्या हो रहा है । भगवान बोले, अर्जुन तुमने मुझे रोम
रोम में बसा रखा है इसीलिए तो तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय
हो और गोविन्द ने अर्जून को गले से लगा लिया।।।
लीलाधारी तेरी लीला
भक्त भी तू
भगवान भी तू
करने वाला भी तू
कराने वाला भी तू
बोलिये भक्त और भगवान की जय।। प्यार से बोलो जय श्री कृष्ण
🙏 जय श्री कृष्ण👏 जय श्री कृष्ण
🙏 जय श्री कृष्ण👏 जय श्री कृष्ण
👣👏चरण उनके ही पूजे जाते हैं, जिनके आचरण पूजने योग्य होते हैं।👣👏

समीर शर्मा

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वो सज़दे का वक़्त

एक बुजुर्ग दरिया के किनारे पर जा रहे थे। एक जगह देखा कि दरिया की सतह से एक कछुआ निकला और पानी के किनारे पर आ गया। उसी किनारे से एक बड़े ही जहरीले बिच्छु ने दरिया के अन्दर छलांग लगाई और कछुए की पीठ पर सवार हो गया। कछुए ने तैरना शुरू कर दिया। वह बुजुर्ग बड़े हैरान हुए।

उन्होंने उस कछुए का पीछा करने की ठान ली। इसलिए दरिया में तैर कर उस कछुए का पीछा किया। वह कछुआ दरिया के दूसरे किनारे पर जाकर रूक गया। और बिच्छू उसकी पीठ से छलांग लगाकर दूसरे किनारे पर चढ़ गया और आगे चलना शरू कर दिया। वह बुजुर्ग भी उसके पीछे चलते रहे। आगे जाकर देखा कि जिस तरफ बिच्छू जा रहा था उसके रास्ते में एक मालिक का बन्दा बड़े ध्यान में आँखे बन्द कर मालिक की याद में सज़दे में लगा हुआ था।

उस बुजुर्ग ने सोचा कि अगर यह बिच्छू उस नौजवान को काटना चाहेगा तो मैं करीब पहुंचने से पहले ही उसे अपनी लाठी से मार डालूंगा। लेकिन वह चंद कदम आगे बढे ही थे कि उन्होंने देखा दूसरी तरफ से एक काला जहरीला साँप तेजी से उस नौजवान को डसने के लिए आगे बढ़ रहा था। इतने में बिच्छू भी वहां पहुंच गया।

उस बिच्छू ने ऐन उसी हालत में सांप को डंक के ऊपर डंक मार कर उसे बेसुध कर दिया ,जिसकी वजह से बिच्छू का जहर सांप के जिस्म में दाखिल हो गया और वह सांप वहीं अचेत हो कर गिर पड़ा था। इसके बाद वह बिच्छू अपने रास्ते पर वापस चला गया।

थोड़ी देर बाद जब मालिक का बन्दा उठा, तब उस बुजुर्ग ने उसे बताया कि मालिक ने तेरी हिफाजत के लिए कैसे उस कछुवे को दरिया के किनारे लाया , फिर कैसे उस बिच्छु को कछुए की पीठ पर बैठा कर साँप से तेरी रक्षा के लिए भेजा ।

वह मलिक का प्यारा उस अचेत पड़े सांप को देखकर हैरान रह गया। उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

और वह आँखें बन्द कर अपने मालिक को याद कर शुक्र अदा करने लगा, तभी मालिक☝ ने उस बन्दे से कहा – जब वो बुजुर्ग जो तुम्हे जानता तक नही था वो तेरी जान बचाने के लिए लाठी उठा सकता है । और फिर तू तो मेरे काम में लगा हुआ था तो फिर तुझे बचाने के लिये मेरी लाठी तो हमेशा से ही तैयार रहती है।

वाह रे मालिक तेरी☝ मौज
शुकर है , शुकर है , शुकर ही शुकर है मेरे दाता👏

जी🙏

ज्योति अग्रवाल

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🍁🍁श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारि है नाथ नारायण वासुदेवायः🍁🍁🙏
एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके कर्म और भाग्य अलग अलग क्यों?

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया कि- “ मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना , किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ? इसका क्या कारण है ?

राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये ..क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं ?

सब सोच में पड़ गये कि अचानक एक वृद्ध खड़े हुये और बोले – महाराज की जय हो ! आपके प्रश्न का उत्तर यहां भला कौन दे सकता है ?

आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में यदि जाएँ तो वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है ।

राजा की जिज्ञासा बढ़ी और घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं , सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा “तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है ,मैं भूख से पीड़ित हूँ ।

तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया, दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे ।

राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है , आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है ”

सुन कर राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न, उत्सुकता प्रबल थी। कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ ,वहाँ भी जाकर देखता हूँ ,क्या होता है ।

राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा, गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और *शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया ।

राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुन लो –तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले के चारों भाई व राजकुमार थे । एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।

अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली ।जैसे-तैसे हमने चार बाटी सेंकी और
अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये ।

अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –
“बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो , जिससे मेरा भी जीवन बच जाय , इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी ।”

इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा ?

चलो भागो यहां से ….।
वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?

भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये , मुझसे भी बाटी मांगी… तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि ” चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?”।

बालक बोला “अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !आपके पास भी आये,दया की याचना की, सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी ।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा । ”

बालक ने कहा “इस प्रकार हे राजन ! उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं ,धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं,किन्तु सबके फल रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद में भिन्न होते हैं।”

इतना कहकर वह बालक मर गया ।

राजा अपने महल में पहुंचा और माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के हॆ-ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र । एक ही मुहूर्त में अनेकों जातक जन्मते हैं किन्तु सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं ।

जैसा भोग भोगना होगा वैसे ही योग बनेंगे , जैसा योग होगा वैसा ही भोग भोगना पड़ेगा यही है जीवन।
🌺🙏जय जय श्री राधे कृष्णा जी 🙏🌹

नेहा श्रीवासत्सव

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(((( मानवता का धर्म ))))
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एक धर्मसभा का कहीं आयोजन हुआ था. शहर से दूर के इलाके में. वहां विभिन्न धर्मों और धर्मों के विभिन्न पंथों और संप्रदायों के प्रचारक अपने शिष्यों के साथ आए थे.
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व्याख्यान चल रहे थे. सभी अपने-अपने पंथ को श्रेष्ठ बताते और यह दावा करते कि केवल उनके संप्रदाय में दीक्षित होकर ही मानवमात्र का कल्याण हो सकता है. उनका मार्ग ही कल्याण का मार्ग है और सर्वश्रेष्ठ है.
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सभास्थल के समीप ही एक दलदल थी. कोई व्यक्ति धोखे से उसमें गिर गया. दलदल में धंसने लगा तो उसने सहायता के लिए पुकारा. पुकार सनकर विभिन्न धर्मों और पंथों के प्रचारक आदि पहुंचे.
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वह आदमी संकट में था लेकिन कोई सहायता को नहीं जा रहा था. कोई उपदेश देने लगता कि संसार भी ऐसा ही दलदल है अगर सही राह दिखाने वाले गुरू न हुआ तो इंसान ऐसे ही तड़पता रहता है.
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कोई दर्शन बघारने लगा तो कोई लोक-परलोक पर भाषण करने लगा. कुछ लोग आयोजकों को भी कोसने लगे कि उन्हें दलदल के पास बाड़े लगवाने चाहिए थे.
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एक आदमी के प्राण संकट में थे और चारों तरफ से ज्ञान की वर्षा हो रही थी. वहां से लकड़ियों का बड़ा सा गठ्ठर सिर पर लादे दो लकड़हारे गुजर रहे थे. शोर सुनकर वे भी पहुंचे.
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उन्होंने झटपट अपना गठ्ठर जमीन पर पटका उसकी रस्सियां खोलकर मजबूती से बांध दी. एक ने रस्सी का सिर पेड़ से बांधा और दलदल में उतरा. दूसरे साथी ने धीरे-धीरे रस्सी खींचीं और उस व्यक्ति की जान बचा ली.
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सभी धर्मप्रचारक लकड़हारों के पास पहुंचे और उनके हिम्मत की प्रशंसा करने लगे. फिर उन्होंने पूछा– भाई आप दोनों किस धर्म या पंथ से हैं. आपके गुरू कौन हैं ?
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लकड़हारे ने कहा- हम मानवता के धर्म से हैं. हमें दया जैसे गुण सीखने के लिए किसी गुरू के ज्ञान की आवश्यकता नहीं. जिसके मन में दया का भाव है वह इंसान है. यह बात समझने के लिए कोई मंत्र लेना जरूरी नहीं.
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धर्मप्रचारकों के पास कहने को कुछ न था. मानवता के गुणों पर अमल करना ही सबसे बड़ी भक्ति है. धर्मग्रंथों का यही सार है. यदि यह सामान्य सी बात किसी को स्वयं समझ में नहीं आती तो किसी भी गुरू द्वारा दिया मंत्र भी इसे नहीं सिखा सकता.
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अपने गुरू स्वयं बनिए. हर व्यक्ति में राम और रावण दोनों होते हैं. आत्म मूल्यांकन करते रहिए कि क्या आपके अंदर के राम ज्यादा प्रभावी हैं या रावण हावी हो रहा है. इसका संतुलन स्वतः बना सकें तो किसी गुरू की आवश्यकता नहीं.

ज्योति अग्रवाल

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((((((( सर्वनाश का द्वार )))))))
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एक ब्राह्मण दरिद्रता से बहुत दुखी होकर राजा के यहां धन याचना करने के लिए चल पड़ा. कई दिन की यात्रा करके राजधानी पहुंचा और राजमहल में प्रवेश करने की चेष्टा करने लगा.
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उस नगर का राजा बहुत चतुर था. वह सिर्फ सुपात्रों को दान देता था. याचक सुपात्र है या कुपात्र इसकी परीक्षा होती थी. परीक्षा के लिए राजमहल के चारों दरवाजों पर उसने समुचित व्यवस्था कर रखी थी.
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ब्राह्मण ने महल के पहले दरवाजे में प्रवेश किया ही था कि एक वेश्या निकल कर सामने आई. उसने राजमहल में प्रवेश करने का कारण ब्राह्मण से पूछा.
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ब्राह्मण ने उत्तर दिया कि मैं राजा से धन याचना के लिए आया हूं. इसलिए मुझे राजा से मिलना आवश्यक है ताकि कुछ धन प्राप्तकर अपने परिवार का गुजारा कर लूं.
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वेश्या ने कहा- महोदय आप राजा के पास धन मांगने जरूर जाएं पर इस दरवाजे पर तो मेरा अधिकार है. मैं अभी कामपीड़ित हूं. आप यहां से अन्दर तभी जा सकते हैं जब मुझसे रमण कर लें. अन्यथा दूसरे दरवाजे से जाइए.
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ब्राह्मण को वेश्या की शर्त स्वीकार न हुई. अधर्म का आचरण करने की अपेक्षा दूसरे द्वार से जाना उन्हें पसंद आया. वहां से लौट आये और दूसरे दरवाजे पर जाकर प्रवेश करने लगे.
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दो ही कदम भीतर पड़े होंगे कि एक प्रहरी सामने आया. उसने कहा इस दरवाजे पर महल के मुख्य रक्षक का अधिकार है. यहां वही प्रवेश कर सकता है जो हमारे स्वामी से मित्रता कर ले.
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हमारे स्वामी को मांसाहार अतिप्रिय है. भोजन का समय भी हो गया है इसलिए पहले आप भोजन कर लें फिर प्रसन्नता पूर्वक भीतर जा सकते हैं. आज भोजन में हिरण का मांस बना है.
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ब्राह्मण ने कहा कि मैं मांसाहार नहीं कर सकता. यह अनुचित है. प्रहरी ने साफ-साफ बता दिया कि फिर आपको इस दरवाजे से जाने की अनुमति नहीं मिल सकती. किसी और दरवाजे से होकर महल में जाने का प्रयास कीजिए.
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तीसरे दरवाजे में प्रवेश करने की तैयारी कर ही रहा था कि वहां कुछ लोग मदिरा और प्याले लिए बैठे मदिरा पी रहे थे. ब्राह्मण उन्हें अनदेखा करके घुसने लगा तो एक प्रहरी आया और कहा थोड़ा हमारे साथ मद्य पीयो तभी भीतर जा सकते हो.
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यह दरवाजे सिर्फ उनके लिए है जो मदिरापान करते हैं. ब्राह्मण ने मद्यपान नहीं किया और उलटे पांव चौथे दरवाजे की ओर चल दिया.
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चौथे दरवाजे पर पहुंचकर ब्राह्मण ने देखा कि वहां जुआ हो रहा है. जो लोग जुआ खेलते हैं वे ही भीतर घुस पाते हैं. जुआ खेलना भी धर्म विरुद्ध है.
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ब्राह्मण बड़े सोच-विचार में पड़ा. अब किस तरह भीतर प्रवेश हो, चारों दरवाजों पर धर्म विरोधी शर्तें हैं. पैसे की मुझे बहुत जरूरत है इसलिए भीतर प्रवेश करना भी जरूरी है.
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एक ओर धर्म था तो दूसरी ओर धन. दोनों के बीच घमासान युद्ध उसके मस्तिष्क में होने लगा. ब्राह्मण जरा सा फिसला.
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उसने सोचा जुआ छोटा पाप है. इसको थोड़ा सा कर लें तो तनिक सा पाप होगा. मेरे पास एक रुपया बचा है. क्यों न इस रुपये से जुआ खेल लूं और भीतर प्रवेश पाने का अधिकारी हो जाऊं.
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विचारों को विश्वास रूप में बदलते देर न लगी. ब्राह्मण जुआ खेलने लगा. एक रुपये के दो हुए, दो के चार, चार के आठ, जीत पर जीत होने लगी. ब्राह्मण राजा के पास जाना भूल गया और अब जुआ खेलने लगा. जीत पर जीत होने लगी.
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शाम तक हजारों रुपयों का ढेर जमा हो गया. जुआ बन्द हुआ. ब्राह्मण ने रुपयों की गठरी बांध ली. दिन भर से खाया कुछ न था. भूख जोर से लग रही थी. पास में कोई भोजन की दुकान न थी.
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ब्राह्मण ने सोचा रात का समय है कौन देखता है चलकर दूसरे दरवाजे पर मांस का भोजन मिलता है वही क्यों न खा लिया जाए ?
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स्वादिष्ट भोजन मिलता है और पैसा भी खर्च नहीं होता, दोहरा लाभ है.
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जरा सा पाप करने में कुछ हर्ज नहीं. मैं तो लोगों के पाप के प्रायश्चित कराता हूं. फिर अपनी क्या चिंता है, कर लेंगे कुछ न कुछ. ब्राह्मण ने मांस मिश्रित स्वादिष्ट भोजन को छककर खाया.
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अस्वाभाविक भोजन को पचाने के लिए अस्वाभाविक पाचक पदार्थों की जरूरत पड़ती है. तामसी, विकृत भोजन करने वाले अक्सर पान, बीड़ी, शराब की शरण लिया करते हैं. कभी मांस खाया न था. इसलिए पेट में जाकर मांस अपना करतब दिखाने लगा.
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अब उन्हें मद्यपान की आवश्यकता महसूस हुई. आगे के दरवाजे की ओर चले और मदिरा की कई प्यालियां चढ़ाई. अब वह तीन प्रकार के नशे में थे. धन काफी था साथ में सो धन का नशा, मांसाहार का नशा और मदिरा भी आ गई थी.
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कंचन के बाद कुछ का, सुरा के बाद सुन्दरी का, ध्यान आना स्वाभाविक है. पहले दरवाजे पर पहुंचे और वेश्या के यहां जा विराजे. वेश्या ने उन्हें संतुष्ट किया और पुरस्कार स्वरूप जुए में जीता हुआ सारा धन ले लिया.
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एक पूरा दिन चारों द्वारों पर व्यतीत करके दूसरे दिन प्रातःकाल ब्राह्मण महोदय उठे. वेश्या ने उन्हें घृणा के साथ देखा और शीघ्र घर से निकाल देने के लिए अपने नौकरों को आदेश दिया. उन्हें घसीटकर घर से बाहर कर दिया गया.
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राजा को सारी सूचना पहुंच चुकी थी. ब्राह्मण फिर चारों दरवाजों पर गया और सब जगह खुद ही कहा कि वह शर्तें पूरी करने के लिए तैयार है प्रवेश करने दो पर आज वहां शर्तों के साथ भी कोई अंदर जाने देने को राजी न हुआ.
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सब जगह से उन्हें दुत्कार दिया गया. ब्राह्मण को न माया मिली न राम. “जरा सा” पाप करने में कोई बड़ी हानि नहीं है, यही समझने की भूल में उसने धर्म और धन दोनों गंवा दिए.
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अपने ऊपर विचार करें कहीं ऐसी ही गलतियां हम भी तो नहीं कर रहे हैं. किसी पाप को छोटा समझकर उसमें एक बार फंस जाने से फिर छुटकारा पाना कठिन होता है.
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जैसे ही हम बस एक कदम नीचे की ओर गिरने के लिए बढ़ा देते हैं फिर पतन का प्रवाह तीव्र होता जाता है और अन्त में बड़े से बड़े पापों के करने में भी हिचक नहीं होती.
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हर पाप के लिए हम खोखले तर्क भी तैयार कर लेते हैं पर याद रखें जो खोखला है वह खोखला है.
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छोटे पापों से भी वैसे ही बचना चाहिए जैसे अग्नि की छोटी चिंगारी से सावधान रहते है. सम्राटों के सम्राट परमात्मा के दरबार में पहुंचकर अनन्त रूपी धन की याचना करने के लिए जीव रूपी ब्राह्मण जाता है.
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प्रवेश द्वार काम, क्रोध लोभ, मोह के चार पहरेदार बैठे हुए हैं. वे जीव को तरह-तरह से बहकाते हैं और अपनी ओर आकर्षित करते हैं. यदि जीव उनमें फंस गया तो पूर्व पुण्यों रूपी गांठ की कमाई भी उसी तरह दे बैठता है जैसे कि ब्राह्मण अपने घर का एक रुपया भी दे बैठा था.
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जीवन इन्हीं पाप जंजालों में व्यतीत हो जाता है और अन्त में वेश्या रूपी ममता के द्वार से दुत्कारा जाकर रोता पीटता इस संसार से विदा होता है. रखना कही आप भी उस ब्राह्मण की नकल तो नहीं कर रहे हैं.
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कोई भी व्यक्ति दो के समक्ष कुछ नहीं छुपा सकता. एक तो वह स्वयं और दूसरा ईश्वर. आपकी अंतरात्मा आपको कई बार हल्का सा ही सही एक संकेत देती जाती है कि आप जो कर रहे हैं वह उचित नहीं है.
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परंतु लालच में फंसे हम अंतरात्मा की उस आवाज को दबाते जाते हैं. अंतरात्मा की आवाज धीरे-धीरे धीमी होती जाती है और एक दिन ऐसा भी होता है कि आपकी अंतरात्मा आपको टोकना भी बंद कर देती है. बस समझ लीजिए कि उस दिन से आप पूर्णरूप से पापी बन चुके हैं.
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जैसे ही आपको सही और गलत का फर्क दिखाने वाली ईश्वरीय शक्ति आपकी अंतरात्मा ने आपका साथ छोड़ दिया है. अब आपको गर्त में जाने से कोई रोक नहीं सकता. बहुत से लोग कहते हैं कि इस संसार में पापी ही फूलते हैं. यह उनका वहम है.
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उन पापियों के पूर्वजन्म के कुछ ऐसे पुण्य होते हैं जिनके प्रताप से उन्हें छोटी-छोटी सफलता मिलती रहती है.
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आप ऐसे समझ लें कि वे अपने बैंक बैलेंस में से खा रहे हैं. अगर उन्होंने अपने कर्म अच्छे रखे होते तो उस बैंक बैंलेस में वृद्धि करके वह संसार के स्वामी बन सकते थे पर वह तो उसे नष्ट करते जा रहे हैं.
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हर जीव अपने कर्म के लिए उत्तरदायी होता है. उसे अपना कर्म अच्छा रखना है. आपको चारों द्वारों पर बैठे चार मायावी तो बहकाने आएंगे ही. आपने उनकी माया को जीत लिया तो अनंत कोष आपके लिए खुला है, अन्यथा संसार से विदा नहीं होंगे, दुत्कार कर भगाए जाएंगे.

ज्योती अग्रवाल

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संस्कृत कवियों के चमत्कार

सभी भाषाओं की जननी, प्राचीनतम देवभाषा संस्कृत पर हम जितना भी मान करें, वह कम ही है। संस्कृत वर्णमाला में कुल 33 व्यञ्जन हैं। निम्न श्लोक में सभी व्यञ्जनों को अपने क्रमानुसार यथावत प्रयुक्त किया गया है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह श्लोक अर्थपूर्ण प्रस्तुति कर रहा है-
क: खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषाम्।।
अर्थात् पक्षियों के प्रति प्रेम, शुद्ध बुद्धि वाला, दूसरे का बल को हरने में निपुण, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल, निडर और महासागर का सर्जक कौन है? जिसे शत्रुओं से भी आशीर्वाद मिले हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस श्लोक में क्रमबद्ध व्यञ्जन मात्र सुन्दरता का प्रदर्शन ही नहीं कर रहे अपितु सार्थक अर्थ की अभिव्यक्ति भी करते हैं। ये सूत्रबद्ध व्यञ्जन काव्य की सुन्दरता में चार चाँद लगा रहे हैं, जो वास्तव में कवि का प्रशंसनीय प्रयास है।
एक मित्र ने फ़ेसबुक पर यह श्लोक अंग्रेजी भाषा की वर्णमाला की तुलना करते हुए लिखा था कि अंग्रेजी के सारे वर्णों को क्रमबद्ध लिखने से कोई अर्थयुक्त शब्द नहीं बनता। मुझे खेद है कि उनका नाम मैं नोट नहीं कर पाई। मैं उनका धन्यवाद करती हूँ।
अब हम महाकवि भरवि विरचित एक अन्य श्लोक को देखते हैं। ‘किरातार्जुनीयम्’ महाकाव्य में महाकवि भारवि ने अपने पाठकों को चमत्कृत किया है। केवल एक ‘न’ व्यञ्जन को लेकर एक अद्भुत श्लोक की रचना की है। उनका काव्यकौशल सराहनीय है, इसमें कवि ने एक अर्थपूर्ण श्लोक हमारे लिए लिखा है-
न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।
अर्थात् जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हो गया है, वह सच्चा मनुष्य नहीं है। इसी प्रकार अपने से दुर्बल को घायल करने वाला भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल नहीं हुआ, तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते। जो घायल मनुष्य को घायल करे, वह भी मनुष्य नहीं है।
महाकवि माघ ने ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य में केवल दो वर्णों यानी ‘भ’ और ‘र’ को लेकर एक नवीन श्लोक की रचना की है, यह प्रयास अपने आप में अद्भुत व सराहनीय है-
भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।
भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।
अर्थात् धरा को भी वजन लगे ऐसे वजनदार, वाद्य यन्त्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया।
केवल ‘भ’ और ‘र’ इन दोनों व्यञ्जनों का प्रयोग करके रचना करना वास्तव में बहुत ही कठिन कार्य है। कवि ने अपनी रचनाधर्मिता को बखूबी निभाया है। कवि का बुद्धिकौशल वाकई प्रशंसनीय हैं।
इन दोनों कवियों की प्रशस्ति में किसी कवि का लिखा हुआ यह श्लोक निश्चित ही द्रष्टव्य है-
उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्।
दण्डिन: पदललित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणा:।।
अर्थात महाकवि कालिदास की उपमा, महाकवि भारवि का अर्थ गौरव और महाकवि दण्डी का पद ललित्य बहुत प्रसिद्ध है। पर महाकवि माघ में ये तीनों गुण विद्यमान हैं।
इन महाकवियों द्वारा प्रयोग किए गए ये अनूठे काव्य शायद ही किसी अन्य भाषा में देखने को मिलें। धन्य हैं ऐसे महाकवि और धन्य है उनकी लेखनी। इन महाकवियों को शत शत नमन। ऐसे महान कवियों की स्तुति करते हुए निम्न श्लोक में कहा गया है-
जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः।
नास्ति येषां यशः काये जरामरणजं भयम्।।
अर्थात सत्कर्म करने वाले, काव्यशास्त्र में कुशल और कवियों में श्रेष्ठ व्यक्ति ही सही जीवन जीते हैं और विजयी होते हैं क्योंकि उन्हें अपने यश तथा शरीर की चिन्ता नहीं होती है और न ही वृद्धावस्था और मृत्यु का भय होता है।
माघ और भारवि जैसे महाकवि अपनी ऐसी अमूल्य रचनाओं के लिए सदा स्मरण किए जाते रहेंगे। इतिहास के पृष्ठों में इन दोनों का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। बस उन पन्नों को पलटो और एक झलक देख लो। अपने उत्कृष्ट काव्य रचना के कारण लोगों के हृदयों में इनका स्थान सदैव बना रहेगा। शब्दों के जादूगर अपने इन महान काव्यशास्त्रियों पर हमें गर्व है।
चन्द्र प्रभा सूद
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Posted in ज्योतिष - Astrology

किस तरह के गणेश जी कहां स्थापित करने से वे प्रसन्न होते हैं हम आपको बताते हैं

कहां किस तरह के गणेश स्थापित करना चाहिए और गणेश जी कैसे आपके घर का वास्तु सुधार सकते हैं….
– सुख, शांति, समृद्धि की चाह रखने वालों को सफेद रंग के विनायक की मूर्ति लाना चाहिए।साथ ही, घर में इनका एक स्थाई चित्र भी लगाना चाहिए।
– सर्व मंगल की कामना करने वालों के लिए सिंदूरी रंग के गणपति की आराधना अनुकूल रहती है। – घर में पूजा के लिए गणेश जी की शयन या बैठी मुद्रा में हो तो अधिक शुभ होती है। यदि कला या अन्य शिक्षा के प्रयोजन से पूजन करना हो तो नृत्य गणेश की प्रतिमा या तस्वीर का पूजन लाभकारी है।
– घर में बैठे हुए और बाएं हाथ के गणेश जी विराजित करना चाहिए। दाएं हाथ की ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी हठी होते हैं और उनकी साधना-आराधना कठीन होती है। वे देर से भक्तों पर प्रसन्न होते हैं।
– कार्यस्थल पर गणेश जी की मूर्ति विराजित कर रहे हों तो खड़े हुए गणेश जी की मूर्ति लगाएं। इससे कार्यस्थल पर स्फूर्ति और काम करने की उमंग हमेशा बनी रहती है।
– वर्किंग प्लेस पर किसी भी भाग में वक्रतुण्ड की प्रतिमा या चित्र लगाए जा सकते हैं, लेकिन यह ध्यान जरूर रखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में इनका मुंह दक्षिण दिशा या नैऋय कोण में नहीं होना चाहिए।
– मंगल मूर्ति को मोदक और उनका वाहन मूषक अतिप्रिय है। इसलिए मूर्ति स्थापित करने से पहले ध्यान रखें कि मूर्ति या चित्र में मोदक या लड्डू और चूहा जरूर होना चाहिए।
– गणेश जी की मूर्ति स्थापना भवन या वर्किंग प्लेस के ब्रह्म स्थान यानी केंद्र में करें। ईशान कोण और पूर्व दिशा में सुखकर्ता की मूर्ति या चित्र लगाना शुभ रहता है।
– यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया गया हो तो उसके दूसरी तरफ ठीक उसी जगह पर दोनों गणेशजी की पीठ मिली रहे इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा या चित्र लगाने से वास्तु दोषों का शमन होता है।
– यदि भवन में द्वारवेध हो यानी दरवाजे से जुड़ा किसी भी तरह का वास्तुदोष हो(भवन के द्वार के सामने वृक्ष, मंदिर, स्तंभ आदि के होने पर द्वारवेध माना जाता है)। ऐसे में घर के मुख्य द्वार पर गणेश जी की बैठी हुई प्रतिमा लगानी चाहिए लेकिन उसका आकार 11 अंगुल से अधिक नहीं होना चाहिए।
– भवन के जिस भाग में वास्तु दोष हो उस स्थान पर घी मिश्रित सिन्दूर से स्वस्तिक दीवार पर बनाने से वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है।
– स्वस्तिक को गणेश जी का रूप माना जाता है। वास्तु शास्त्र भी दोष निवारण के लिए स्वास्तिक को उपयोगी मानता है। स्वास्तिक वास्तु दोष दूर करने का महामंत्र है। यह ग्रह शान्ति में लाभदायक है। इसलिए घर में किसी भी तरह का वास्तुदोष होने पर अष्टधातु से बना पिरामिड यंत्र पूर्व की तरफ वाली दीवार पर लगाना चाहिए।
– रविवार को पुष्य नक्षत्र पड़े, तब श्वेतार्क या सफेद मंदार की जड़ के गणेश की स्थापना करनी चाहिए। इसे सर्वार्थ सिद्धिकारक कहा गया है। इससे पूर्व ही गणेश को अपने यहां रिद्धि-सिद्धि सहित पदार्पण के लिए निमंत्रण दे आना चाहिए और दूसरे दिन, रवि-पुष्य योग में लाकर घर के ईशान कोण में स्थापना करनी चाहिए।
– श्वेतार्क गणेश की प्रतिमा का मुख नैऋत्य में हो तो इष्टलाभ देती है। वायव्य मुखी होने पर संपदा का क्षरण, ईशान मुखी हो तो ध्यान भंग और आग्नेय मुखी होने पर आहार का संकट खड़ा कर सकती है।
– पूजा के लिए गणेश जी की एक ही प्रतिमा हो। गणेश प्रतिमा के पास अन्य कोई गणेश प्रतिमा नहीं रखें। एक साथ दो गणेश जी रखने पर रिद्धि और सिद्धि नाराज हो जाती हैं।
– गणेश को रोजाना दूर्वा दल अर्पित करने से इष्टलाभ की प्राप्ति होती है। दूर्वा चढ़ाकर समृद्धि की कामना से ऊं गं गणपतये नम: का पाठ लाभकारी माना जाता है। वैसे भी गणपति विघ्ननाशक तो माने ही गए हैं।

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

शुभ सन्ध्या
।एक साहब किसी छोटे से कस्बे में तांगे पर सफर कर रहे थे। इतने में आंधी के आसार नजर आने लगे।तांगे वाले ने बताया “इस इलाके में बड़ी खतरनाक किस्म की आंधी आती है.. वह इतनी तेज होती है कि बड़ी-बड़ी चीजों को उड़ाकर ले जाती है और आसार बता रहे हैं कि इस वक्त इसी किस्म की आंधी आ रही है। इसलिए आप तांगे से उतर कर अपने बचाव की कोशिश करें।”
जब आंधी आई तो वे एक दरख्त की तरफ बढ़े ताकि उसकी आड़ में पनाह ले सकें। तांगे वाले ने उन्हें दरख्त के तरफ जाते हुए देखा तो चीख पड़ा.. इस आंधी में बड़े दरख्त गिर जाते हैं, इसलिए इस मौके पर दरख्त की पनाह लेना बहुत खतरनाक है। इस आंधी से बचाव का एक ही सूरत है कि आप खुली जमीन पर औंधे होकर लेट जाएं।
तांगे वाले के कहने पर वे जमीन पर मुंह नीचे कर के लेट गए। आंधी आई और वाकई कई दरख्तों को उड़ा ले गई। लेकिन यह सारा तूफान उनके ऊपर से गुजरता रहा और जमीन की सतह पर वे महफूज़ पड़े रहे।
आँधियों में खड़े दरख्त तो उखड़ जाते हैं लेकिन जमीन पर पसरी हुई घास बदस्तूर कायम रहती है।
जिंदगी के तूफानों से बचने का तरीका भी यही है कि ऐसे मुसीबतों के दौर में कुछ समय के लिए अपने आप को झुका लिया जाए। जो अपनी अकड़ रखेंगे तो उखड़ जाएंगे। बचाव बस नत रहने में ही है।

संजय गुप्ता

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मित्रो एकबार पंचवटी आश्रम में प्रभुश्रीराम और लक्ष्मण शांतिपूर्वक बैठे हुए थे,उस समय लक्ष्मण जी प्रभुश्रीराम से कुछ प्रश्न पूछते, है,आगे पढ़े,,,,,,

* ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥

भावार्थ:-हे प्रभो! ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जाएँ॥

* थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥

भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे तात! मैं थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो! मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है॥

* गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥

भावार्थ:-इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो-॥

* एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥

भावार्थ:-एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यंत दुःखरूप है, जिसके वश होकर जीव संसार रूपी कुएँ में पड़ा हुआ है और एक (विद्या) जिसके वश में गुण है और जो जगत्‌ की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नही है॥

* ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥

भावार्थ:-ज्ञान वह है, जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी (दोष) नहीं है और जो सबसे समान रूप से ब्रह्म को देखता है। हे तात! उसी को परम वैराग्यवान्‌ कहना चाहिए, जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो॥

(जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्य सेवा का अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मन का निगृहीत न होना, इंद्रियों के विषय में आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिमय जगत्‌ में सुख-बुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदि में आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में हर्ष-शोक, भक्ति का अभाव, एकान्त में मन न लगना, विषयी मनुष्यों के संग में प्रेम- ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म (आत्मा) में स्थिति तथा तत्त्व ज्ञान के अर्थ (तत्त्वज्ञान के द्वारा जानने योग्य) परमात्मा का नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है। देखिए गीता अध्याय 13/ 7 से 11)

* माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥

भावार्थ:-जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिए। जो (कर्मानुसार) बंधन और मोक्ष देने वाला, सबसे परे और माया का प्रेरक है, वह ईश्वर है॥

* धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥

भावार्थ:-धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देने वाला है- ऐसा वेदों ने वर्णन किया है। और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देने वाली है॥

* सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥

भावार्थ:-वह भक्ति स्वतंत्र है, उसको (ज्ञान-विज्ञान आदि किसी) दूसरे साधन का सहारा (अपेक्षा) नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है और वह तभी मिलती है, जब संत अनुकूल (प्रसन्न) होते हैं॥

* भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥

भावार्थ:-अब मैं भक्ति के साधन विस्तार से कहता हूँ- यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणों के चरणों में अत्यंत प्रीति हो और वेद की रीति के अनुसार अपने-अपने (वर्णाश्रम के) कर्मों में लगा रहे॥

* एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥

भावार्थ:-इसका फल, फिर विषयों से वैराग्य होगा। तब (वैराग्य होने पर) मेरे धर्म (भागवत धर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मन में मेरी लीलाओं के प्रति अत्यंत प्रेम होगा॥

* संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥

भावार्थ:-जिसका संतों के चरणकमलों में अत्यंत प्रेम हो, मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो,॥

* मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥
काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥

भावार्थ:-मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ॥

* बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥

भावार्थ:-जिनको कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ॥

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जब एक शख्स लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी।

पुत्र जब वयस्क हुआ तो पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। स्वयं कभी अपने तो कभी दोस्तों के आॅफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे।

पुत्र की शादी के बाद वह ओर अधिक निश्चित हो गये। पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया।

पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दोहपर में खाना खा रहे थे, पुत्र भी लंच करने ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था।

उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही उपलब्ध नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये।

थोडी देर बाद पुत्र अपनी पत्नी के साथ खाना खाने बैठा। खाने में प्याला भरा हुआ दही भी था। पुत्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और खाना खाकर स्वयं भी ऑफिस चला गया।

कुछ दिन बाद पुत्र ने अपने पिताजी से कहा- ‘‘पापा आज आपको कोर्ट चलना है, आज आपका विवाह होने जा रहा है।’’

पिता ने आश्चर्य से पुत्र की तरफ देखा और कहा-‘‘बेटा मुझे पत्नी की आवश्यकता नही है और मैं तुझे इतना स्नेह देता हूँ कि शायद तुझे भी माँ की जरूरत नहीं है, फिर दूसरा विवाह क्यों?’’

पुत्र ने कहा ‘‘ पिता जी, न तो मै अपने लिए माँ ला रहा हूँ न आपके लिए पत्नी,
मैं तो केवल आपके लिये दही का इन्तजाम कर रहा हूँ।

कल से मै किराए के मकान मे आपकी बहू के साथ रहूँगा तथा आपके ऑफिस मे एक कर्मचारी की तरह वेतन लूँगा ताकि आपकी बहू को दही की कीमत का पता चले।’’
👌Best message👌

-माँ-बाप हमारे लिये
ATM कार्ड बन सकते है,

तो ,हम उनके लिए
*Aadhar Card तो बन ही सकते है...

संजय गुप्ता