Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

राम राम जी –

( एक संत की आत्मकथा )

सच्ची घटना आपसे साझा कर रहा हूँ –

एक नवयुवक मुझे मिलने आया। जब उनसे अपना परिचय दिया, तो मुझे बीस बरस पहले घटी एक घटना याद हो आई !

एक मजदूर महिला, जो खेत में काम करने गई थी। जहां उसे एक जहरीले सांप ने काट लिया। उसे सांप का जहर उतारने वाले के पास ले जाया गया। वह ठीक तो हो गई, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद उसके शरीर पर जहर के दुश्परिणाम दिखाई देने लगे !

उसके दोनों पैरों के पिछे की, ‘जंघा’ से लेकर ‘एड़ी’ तक पूरे पैर की चमड़ी धीरे-धीरे गलने लगी थी। और दोनों पैरों का पिछला हिस्सा घाव से भर गया था, ठीक वैसा ही जैसा जलने पर घाव हो जाता है !

वह ओंधेमुंह, अपने दोनों पैरों को ओंधा कर, उस पर कपड़ा डाले लेटी हुई थी। घाव से पानी रिस रहा था और कपड़ा घाव पर चिपक रहा था !

उसका पति, जो लकवा रोग से पीड़ित था, पंखा झलकर घाव से मख्खियां उड़ा रहा था !

उसे अस्पताल ले जाना बेहद जरूरी था। जबकि गांव शहर से दूर था और उसके पास शहर के अस्पताल जाने का किराया तक नहीं था। पति अपाहिज था, और बच्चे छोटे थे। महिला की मजदूरी के पैसे से ही घर का सारा खर्च चलता था !

भयभीत करने वाली बात यह थी कि महिला गर्भवती थी। और उसके पेट में छः से सात महीने का बच्चा था। संक्रमण का खतरा बढ़ रहा था। अतः माँ और बच्चा दोनों की जान पर खतरा मंडराने लगा था !

मेरे मन में रह रह कर एक ही ख़याल घूम रहा था ‘क्या होगा…? क्या यह बच्चा जन्म लेने के पहले ही…
नहीं… नहीं… ऐसा नहीं होना चाहिए !

मैं रात को ठीक तरह से सो नहीं सका। मन में एक विचार आया कि ‘मैं संत हूँ और मेरे परिवार के लोग भी कभी-कभी जंगल में काम करने जाते हैं। यदि इसकी जगह पर, मेरी माँ, भाभी, बहन या शिष्य होते तो ?’

सुबह होते ही मैं उसके घर गया और उसकी चिकित्सा की व्यवस्था करवाई !

कुछ दिनों के इलाज से महिला ठीक हो गई और उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया !

यह वही बच्चा था, जो आज बीस बरस का हो चुका था। अपनी पहली तनख्वाह से मेरे रूपये लौटाने आया था, वही रूपये जब यह अपनी माँ के पेट में था और मैंने इसकी मां के इलाज पर खर्च किये थे !

“माँ कहती है, आप न होते तो हम न होते।” कहते हुए, उसने मेरे पैर छूकर धन्यवाद दिया !

मै यह सब देखकर सोचने लगा कि जीवन मरण तो प्रभू के हाथ है लेकिन जिसे भगवान जीवनदान देना चाहते है तो किसी न किसी को निमित्त बना देते है !

मै प्रभू को धन्यवाद दिया और प्रार्थना की – हे दयानिधि ! ऐसी कृपा बनाए रखना की किसी विपति ग्रस्त की सहायता करते समय मै तनिक भी संकोच न करूँ !!

।। ॐ नमः शिवाय ।।

गिरधारी अग्रवाल

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बेटे के जन्मदिन पर …..

रात के 1:30 बजे फोन आता है, बेटा फोन उठाता है तो माँ बोलती है….”जन्म दिन मुबारक लल्ला”

बेटा गुस्सा हो जाता है और माँ से कहता है – सुबह फोन करती। इतनी रात को नींद खराब क्यों की? कह कर फोन रख देता है।

थोडी देर बाद पिता का फोन आता है। बेटा पिता पर गुस्सा नहीं करता, बल्कि कहता है …” सुबह फोन करते “।

फिर पिता ने कहा – मैनें तुम्हे इसलिए फोन किया है कि तुम्हारी माँ पागल है, जो तुम्हे इतनी रात को फोन किया।

वो तो आज से 25 साल पहले ही पागल हो गई थी। जब उसे डॉक्टर ने ऑपरेशन करने को कहा और उसने मना किया था। वो मरने के लिए तैयार हो गई, पर ऑपरेशन नहीं करवाया।

रात के 1:30 को तुम्हारा जन्म हुआ। शाम 6 बजे से रात 1:30 तक वो प्रसव पीड़ा से परेशान थी ।

लेकिन तुम्हारा जन्म होते ही वो सारी पीड़ा भूल गय ।उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । तुम्हारे जन्म से पहले डॉक्टर ने दस्तखत करवाये थे, कि अगर कुछ हो जाये, तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे।

तुम्हे साल में एक दिन फोन किया, तो तुम्हारी नींद खराब हो गई……मुझे तो रोज रात को 25 साल से, रात के 1:30 बजे उठाती है और कहती है देखो हमारे लल्ला का जन्म इसी वक्त हुआ था।

बस यही कहने के लिए तुम्हे फोन किया था। इतना कहके पिता फोन रख देते हैं।

बेटा सुन्न हो जाता है। सुबह माँ के घर जा कर माँ के पैर पकड़कर माफी मांगता है….तब माँ कहती है, देखो जी मेरा लाल आ गया।

फिर पिता से माफी मांगता है, तब पिता कहते हैं ….. आज तक ये कहती थी, कि हमे कोई चिन्ता नहीं;हमारी चिन्ता करने वाला हमारा लाल है।

पर अब तुम चले जाओ, मैं तुम्हारी माँ से कहूंगा कि चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारा हमेशा की तरह आगे भी ध्यान रखुंगा।

तब माँ कहती है -माफ कर दो अपना बेटा है।

सब जानते हैं दुनियाँ में एक माँ ही है, जिसे जैसा चाहे कहो, फिर भी वो गाल पर प्यार से हाथ फेरेगी।

पिता अगर तमाचा न मारे तो बेटा सर पर बैठ जाये। इसलिए पिता का सख्त होना भी जरुरी है।

संजय गुप्ता

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एक शेरनी गर्भवती थी, गर्भ पूरा हो चुका था, शिकारियों से भागने के लिए टीले पर गयी, उसको एक टीले पर बच्चा हो गया। शेरनी छलांग लगाकर एक टीले से दूसरे टीले पर तो पहुंच गई लेकिन बच्चा नीचे फिसल गया……नीचे भेड़ों की एक कतार गुजरती थी, वह बच्चा उस झुंड में पहुंच गया। था तो शेर का बच्चा लेकिन फिर भी भेड़ों को दया आ गई और उसे अपने झुंड में मिला लिया….. भेड़ों ने उसे दूध पिलाया, पाला पोसा।

शेर अब जवान हो गया. शेर का बच्चा था तो शरीर से सिंह ही हुआ लेकिन भेड़ों के साथरहकर वह खुद को भेड़ मानकर ही जीने लगा। एक दिन उसके झुंड पर एक शेर ने धावा बोला. उसको देखकर भेड़ें भांगने लगीं, शेर की नजर भेड़ों के बीच चलते शेर पर पड़ी, दोनों एक दूसरे को आश्चर्य से देखते रहे……
सारी भेंड़े भाग गईं शेर अकेला रह गया, दूसरे शेर ने इस शेर को पकड़ लिया। यह शेर होकर भी रोने लगा, मिमियाया, गिड़गिड़ाया कि छोड़ दो मुझे…. मुझे जाने दो… मेरे सब संगी साथी जा रहे हैं…. मेरे परिवार से मुझे अलग न करो…..

दूसरे शेर ने फटकारा- “अरे मूर्ख! ये तेरे संगी साथी नहीं हैं, तेरा दिमाग फिर गया है, तू पागल हो गया है। परन्तु वह नहीं माना, वह तो स्वयं को भेंड मानकर भेलचाल में चलता था”।

बड़ा शेर उसे घसीटता गया नदी के किनारे ले गया। दोनों ने नदी में झांका। बूढ़ा सिंह बोला- नदी के पानी में अपना चेहरा देख और पहचान… उसने देखा तो पाया कि जिससे जीवन की भीख मांग रहा है वह तो उसके ही जैसा है। उसे बोध हुआ कि मैं तो मैं भेड़ नहीं हूं, मैं तो इस सिंह से भी ज्यादा बलशाली और तगड़ा हूं। उसका आत्म अभिमान जागा, आत्मबल से भऱकर उसने भीषण गर्जना की……
सिंहनाद था वह, ऐसी गर्जना उठी उसके भीतर से कि उससे पहाड़ कांप गए। बूढ़ा सिंह भी कांप गया।

उसने कहा- “अरे! इतने जोर से दहाड़ता है?” युवा शेर बोला- “उसने जन्म से कभी दहाड़ा ही नहीं, बड़ी कृपा तुम्हारी जो मुझे जगा दिया,” इसी दहाड़ के साथ उसका जीवन रूपांतरित हो गया।

यही बात मनुष्य के संबंध में भी हैं। अगर मनुष्य यह देख ले कि जो कृष्ण और श्रीराम में हैं वह उसमें भी है।

फिर हमारे भीतर से भी वह गर्जना फूटेगी-
अहं ब्रह्मास्मि… मैं ब्रह्मा हूँ….गूंज उठेंगे पहाड़, कांप जाएंगे मन के भीतर घर बनाए सारे विकार और महसूस होगा अपने भीतर आनंद ही आनंद….

क्षत्रिय भी मैं हूँ..
ब्राहमण भी मैं हूँ..
जाट भी मैं हूँ …
राजपुत और मराठा भी मैं हुँ..
हिला कर रख दे
जो दुष्टोँ की हस्ती..
तूफान और ज्वारभाटा भी मैँ हूँ…
बाल्मीकि भी मैं हूँ…..
विदुर नीति भी मैं हुँ..
दुष्ट सिकन्दर को हराने वाला पौरूष भी मैं हुँ…
सर्वश्रैष्ठ गुरू चाणक्य भी मैं हुँ..
महावीर कर्ण भी मैं हूँ
परशुराम भी मैं हूँ…
मुरलीधर मनोहर श्याम भी मैं हूँ..
एक वचन की खातिर वनवासी बननेवाला मर्यादा पुरूषोतम श्रीराम भी मैं हूँ..
शिवाजी और प्रताप भी मैं हुँ..

धधकती है जो जुल्म देखकर
‘हिन्दुत्व” नाम की आग भी मैं हुँ..

हाँ मैं हिन्दू हूँ…
जात पात मैं ना बाँटो मुझको…
मैं दुनिया का केन्द्र बिन्दु हुँ…

हाँ मैं हिन्दू हूँ….

संजय गुप्ता

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उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों में से एक गंगोत्री धाम की कथा
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श्रद्धालु यहां गंगा स्नान करके मां के दर्शन और पव‌ित्र भाव से केदारनाथ को अर्प‌ित करने ल‌िए जल लेते हैं। गंगोत्री समुद्र तल से ९,९८० (३,१४० मी.) फीट की ऊंचाई पर स्थित है। गंगोत् से ही भागीरथी नदी निकलती है। गंगोत्री भारत के पवित्र और आध्‍यात्मिक रूप से महत्‍वपूर्ण नदी गंगा का उद्गगम स्‍थल भी है।

गंगोत्री में गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा भागीरथ के नाम पर इस नदी का नाम भागीरथी रखा गया। कथाओं में यह भी कहा गया है कि राजा भागीरथ ने ही तपस्‍या करके गंगा को पृथ्‍वी पर लाए थे। गंगा नदी गोमुख से निकलती है।

पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि सूर्यवंशी राजा सागर ने अश्‍वमेध यज्ञ कराने का फैसला किया। इसमें इनका घोड़ा जहां-जहां गया उनके ६०,००० बेटों ने उन जगहों को अपने आधिपत्‍य में लेता गया। इससे देवताओं के राजा इंद्र चिंतित हो गए।

ऐसे में उन्‍होंने इस घोड़े को पकड़कर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा सागर के बेटों ने मुनिवर का अनादर करते हुए घोड़े को छुड़ा ले गए। इससे कपिल मुनि को काफी दुख पहुंचा। उन्‍होंने राजा सागर के सभी बेटों को शाप दे दिया जिससे वे राख में तब्‍दील हो गए।

राजा सागर के क्षमा याचना करने पर कपिल मुनि द्रवित हो गए और उन्‍होंने राजा सागर को कहा कि अगर स्‍वर्ग में प्रवाहित होने वाली नदी पृथ्‍वी पर आ जाए और उसके पावन जल का स्‍पर्श इस राख से हो जाए तो उनका पुत्र जीवित हो जाएगा। लेकिन राजा सागर गंगा को जमीन पर लाने में असफल रहे। बाद में राजा सागर के पुत्र भागीरथ ने गंगा को स्‍वर्ग से पृथ्‍वी पर लाने में सफलता प्राप्‍त की।

गंगा के तेज प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए भागीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया। फलत: भगवान शिव ने गंगा को अपने जटा में लेकर उसके प्रवाह को नियंत्रित किया। इसके उपरांत गंगा जल के स्‍पर्श से राजा सागर के पुत्र जीवित हुए।

ऐसा माना जाता है कि १८वीं शताबादि में गोरखा कैप्‍टन अमर सिंह थापा ने आदि शंकराचार्य के सम्‍मान में गंगोत्री मंदिर का निर्माण किया था। यह मंदिर भागीरथी नदी के बाएं किनारे पर स्थित सफेद पत्‍थरों से निर्मित है। इसकी ऊंचाई लगभग २० फीट है। मंदिर बनने के बाद राजा माधोसिंह ने १९३५ में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया।

फलस्‍वरूप मंदिर की बनावट में राजस्‍थानी शैली की झलक मिल जाती है। मंदिर के समीप ‘भागीरथ शिला’ है जिसपर बैठकर उन्‍होंने गंगा को पृथ्‍वी पर लाने के लिए कठोर तपस्‍या की थी। इस मंदिर में देवी गंगा के अलावा यमुना, भगवान शिव, देवी सरस्‍वती, अन्‍नपुर्णा और महादुर्गा की भी पूजा की जाती है।

हिंदू धर्म में गंगोत्री को मोक्षप्रदायनी माना गया है। यही वजह है कि हिंदू धर्म के लोग चंद्र पंचांग के अनुसार अपने पुर्वजों का श्राद्ध और पिण्‍ड दान करते हैं। मंदिर में प्रार्थना और पूजा आदि करने के बाद श्रद्धालु भगीरथी नदी के किनारे बने घाटों पर स्‍नान आदि के लिए जाते हैं।

तीर्थयात्री भागीरथी नदी के पवित्र जल को अपने साथ घर ले जाते हैं। इस जल को पवित्र माना जाता है तथा शुभ कार्यों में इसका प्रयोग किया जाता है। गंगोत्री से लिया गया गंगा जल केदारनाथ और रामेश्‍वरम के मंदिरों में भी अर्पित की जाती है।

मंदिर का समय: सुबह 6.15 से 2 बजे दोपहर तक और अपराह्न 3 से 9.30 तक (गर्मियों में)। सुबह 6.45 से 2 बजे दोपहर तक और अपराह्न 3 से 7 बजे तक (सर्दियों में)।

मंदिर अक्षय तृतीया (मई) को खुलती है और यामा द्वितीया को बंद होती है। मंदिर की गतिविधि तड़के चार बजे से शुरू हो जाती है। सबसे पहले ‘उठन’ (जागना) और ‘श्रृंगार’ की विधि होती है जो आम लोगों के लिए खुला नहीं होता है।

सुबह 6 बजे की मंगल आरती भी बंद दरवाजे में की जाती है। 9 बजे मंदिर के पट को ‘राजभोग’ के लिए 10 मिनट तक बंद रखा जाता है। सायं 6.30 बजे श्रृंगार हेतु पट को 10 मिनट के लिए एक बार फिर बंद कर दिया जाता है। इसके उपरांत शाम 8 बजे राजभोग के लिए मंदिर के द्वार को 5 मिनट तक बंद रखा जाता है।

ऐसे तो संध्‍या आरती शाम को 7.45 बजे होती है लेकिन सर्दियों में 7 बजे ही आरती करा दी जाती है। तीर्थयात्रियों के लिए राजभोग, जो मीठे चावल से बना होता है, उपलब्‍ध रहता है (उपयुक्‍त शुल्‍क अदा करने के बाद)।

तीर्थयात्री प्राय: गनगनानी के रास्‍ते गंगोत्री जाते हैं। यह वही मार्ग है जिसपर पराशर मुनि का आश्रम था जहां वे गर्म पानी के सोते में स्‍नान करते थे। गंगा के पृथ्‍वी आगमन पर (गंगा सप्‍तमी) वैसाख (अप्रैल) में विशेष श्रृंगार का आयोजन किया जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार जिस दिन भगवान शिव ने भागिरथी नदी को भागीरथ को प्र‍स्‍तुत किया था उस दिन को (ज्‍येष्‍ठ, मई) गंगा दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसके अलावा जन्‍माष्‍टमि, विजयादशमी और दिपावली को भी गंगोत्री में विशेष रूप से मनाया जाता है।
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देव शर्मा

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

गंगा दशहरा मई २४ विशेष
गंगा पूजन एवं अवतरण की कथा
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वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी इसलिये इस दिन को हिन्दू धर्म मे माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है।

स्कन्द पुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष रूप से करें। किसी भी नदी पर जाकर अर्ध्य (पू‍जादिक) एवम् तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें। ऐसा करने वाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष, दशमी को गंगावतरण का दिन मन्दिरों एवं सरोवरों में स्नान कर पवित्रता के साथ मनाया जाता है।

गंगा स्नान का महत्त्व
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भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि जो मनुष्य गंगा दशहरा के दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार ओम नमो भगवती हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा स्तोत्र को पढ़ता है, चाहे वो दरिद्र हो, असमर्थ हो वह भी गंगा की पूजा कर पूर्ण फल को पाता है। यदि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन मंगलवार हो तथा हस्त नक्षत्र तिथि हो तो यह सब पापों को हरने वाली होती है। वराह पुराण में लिखा है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी बुधवार में हस्त नक्षत्र में श्रेष्ठ नदी स्वर्ग से अवतीर्ण हुई थी। वह दस पापों को नष्ट करती है। इस कारण उस तिथि को दशहरा कहते हैं।

दशहरे के कुछ प्रमुख योग
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यह दिन संवत्सर का मुख माना गया है। इसलिए गंगा स्नान करके दूध, बताशा, जल, रोली, नारियल, धूप, दीप से पूजन करके दान देना चाहिए। इस दिन गंगा, शिव, ब्रह्मा, सूर्य देवता, भागीरथी तथा हिमालय की प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विशेष फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा आदि का स्नान, अन्न-वस्त्रादि का दान, जप-तप, उपासना और उपवास किया जाता है। इससे दस प्रकार के पापों से छुटकारा मिलता है। इस दिन नीचे दिये गये दस योग हो तो यह अपूर्व योग है और महाफलदायक होता है। यदि ज्येष्ठ अधिकमास हो तो स्नान, दान, तप, व्रतादि मलमास में करने से ही अधिक फल प्राप्त होता है। इन दस योगों में मनुष्य स्नान करके सब पापों से छूट जाता है।

दस योग
ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, बुधवार, हस्त नक्षत्र, गर करण, आनंद योग व्यतिपात, कन्या का चंद्र, वृषभ का सूर्य आदि।

गंगा दशहरा पर दान का महत्त्व एवं पूजा विधि
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आज के दिन दान देने का भी विशिष्ट महत्त्व है। यह मौसम भरपूर गर्मी का होता है, अत: छतरी, वस्त्र, जूते-चप्पल आदि दान में दिए जाते हैं।आज के दिन यदि गंगाजी अथवा अन्य किसी पवित्र नदी पर सपरिवार स्नान हेतु जाया जा सके तब तो सर्वश्रेष्ठ है, यदि संभव न हो तब घर पर ही गंगाजली को सम्मुख रखकर गंगाजी की पूजा-अराधना कर ली जाती है। इस दिन जप-तप, दान, व्रत, उपवास और गंगाजी की पूजा करने पर सभी पाप जड़ से कट जाते हैं- ऐसी मान्यता है। अनेक परिवारों में दरवाज़े पर पाँच पत्थर रखकर पाँच पीर पूजे जाते हैं। इसी प्रकार परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से सवा सेर चूरमा बनाकर साधुओं, फ़कीरों और ब्राह्मणों में बांटने का भी रिवाज है। ब्राह्मणों को बड़ी मात्रा में अनाज को दान के रूप में आज के दिन दिया जाता है। आज ही के दिन आम खाने और आम दान करने को भी विशिष्ट महत्त्व दिया जाता है। दशहरा के दिन दशाश्वमेध संभव ना हो तो किसी भी गंगा घाट में दस बार स्नान करके शिवलिंग का दस संख्या के गंध, पुष्प, दीप, नैवेद्य और फल आदि से पूजन करके रात्रि को जागरण करने से अनंत फल प्राप्त होता है। विधि-विधान से गंगाजी का पूजन करके दस सेर तिल, दस सेर जौ और दस सेर गेहूँ दस ब्राह्मणों को दान दें। परदारा और परद्रव्यादि से दूर रहें तथा ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ करके दशमी तक एकोत्तर-वृद्धि से दशहरा स्तोत्र का पाठ करें। इससे सब प्रकार के पापों का समूल नाश हो जाता है और दुर्लभ सम्पत्ति प्राप्त होती है।

गंगा दशहरे का फल
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ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं। इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।

माँ गंगा जी की आरती
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ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता।
यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।
सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥

गंगा अवतरण की कथा
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ब्रह्मा से अत्रि, अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से यति, ययाति, संयाति, आयति, वियाति और कृति नामक छः महाबली और विक्रमशाली पुत्र हुए।

अत्रि से उत्पन्न चंद्रवंशियों में पुरुरवा-ऐल के बाद सबसे चर्चित कहानी ययाति और उसने पुत्रों की है, ययाति के 5 पुत्र थे-! पुरु, यदु, तुर्वस, अनु और द्रुह्मु, उनके इन पांचों पुत्रों और उनके कुल के लोगों ने मिलकर लगभग संपूर्ण एशिया पर राज किया था, ऋग्वेद में इसका उल्लेख मिलता है।

ययाति बहुत ही भोग-विलासी राजा था, जब भी उसको यमराज लेने आते तो वह कह देता नहीं अभी तो बहुत काम बचे हैं, अभी तो कुछ देखा ही नहीं।

गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र के मध्य प्रतिष्ठा की लड़ाई चलती रहती थी, इस लड़ाई के चलते ही ५ हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के पूर्व एक और महासंग्राम हुआ था जिसे ‘दशराज युद्ध’ के नाम से जाना जाता हैं इस युद्ध की चर्चा ऋग्वेद में मिलती है, यह रामायण काल की बात है।

महाभारत युद्ध के पहले भारत के आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच दशराज युद्ध हुआ था इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान है, ऋग्वेद के ७ वें मंडल में इस युद्ध का वर्णन मिलता है।

इस युद्ध से यह पता चलता है कि आर्यों के कितने कुल या कबीले थे और उनकी सत्ता धरती पर कहां तक फैली थी, इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास हुआ था।

ब्रह्मा से भृगु, भृगु से वारिणी भृगु, वारिणी भृगु से बाधृश्य, शुनक, शुक्राचार्य (उशना या काव्या), बाधूल, सांनग और च्यवन का जन्म हुआ, शुनक से शौनक, शुक्राचार्य से त्वष्टा का जन्म हुआ, त्वष्टा से विश्वरूप और विश्‍वकर्मा, विश्वकर्मा से मनु, मय, त्वष्टा, शिल्लपी और देवज्ञ का जन्म हुआ, दशराज्ञ युद्ध के समय भृगु मौजूद थे।

इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर भगीरथ और श्रीराम के पूर्वज हैं। राजा सगर की २ रानियां थीं- केशिनी और सुमति, जब दीर्घकाल तक दोनों पत्नियों को कोई संतान नहीं हुई तो राजा अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर पुत्र कामना से तपस्या करने लगे।

तब ब्रह्मा के पुत्र महर्षि भृगु ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को ६० हजार अभिमानी पुत्र प्राप्त तथाहोगेतथा दूसरी से एक
वंशधर पुत्र होगा, वंशधर अर्थात जिससे आगे वंश चलेगा।

बाद में रानी सुमति ने तूंबी के आकार के एक गर्भ-पिंड को जन्म दिया, वह सिर्फ एक बेजान पिंड था, राजा सगर निराश होकर उसे फेंकने लगे, तभी आकाशवाणी हुई- ‘सावधान राजा! इस तूंबी में ६० हजार बीज हैं, घी से भरे एक-एक मटके में एक-एक बीज सुरक्षित रखने पर कालांतर में ६० हजार पुत्र प्राप्त होंगे।’

राजा सगर ने इस आकाशवाणी को सुनकर इसे विधाता का विधान मानकर वैसा ही सुरक्षित रख लिया, जैसा कहा गया था, समय आने पर उन मटकों से ६० हजार पुत्र उत्पन्न हुए, जब राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया तो उन्होंने अपने ६० हजार पुत्रों को उस घोड़े की सुरक्षा में नियुक्त किया।

देवराज इंद्र ने उस घोड़े को छलपूर्वक चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया, राजा सगर के ६० हजार पुत्र उस घोड़े को ढूंढते-ढूंढते जब कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें लगा कि मुनि ने ही यज्ञ का घोड़ा चुराया है।

यह सोचकर उन्होंने कपिल मुनि का अपमान कर दिया, ध्यानमग्न कपिल मुनि ने जैसे ही अपनी आंखें खोलीं, राजा सगर के ६० हजार पुत्र वहीं भस्म हो गए, भगीरथ के पूर्वज राजा सगर के ६० हजार पुत्र कपिल मुनि के तेज से भस्म हो जाने के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए थे।

अपने पूर्वजों की शांति के लिए ही भगीरथ ने घोर तप किया और गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल हुए, पूर्वजों की भस्म के गंगा के पवित्र जल में डूबते ही वे सब शांति को प्राप्त हुए।

राजा भगीरथ के कठिन प्रयासों और तपस्या से ही गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थी, इसे ही ‘गंगावतरण’ की कथा कहते हैं। सगर और भगीरथ से जुड़ी अनेक और भी कथाएं है।

संकलन
पं देवशर्मा
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देव शर्मा

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🏵🏵🏵🌿🏵HARE KRISHNA🏵🌿🏵🏵🏵
एक बार गोपियों ने श्री कृष्ण से कहा कि ‘हे कृष्ण हमे अगस्त्य ऋषि को भोग लगाने जाना है, और ये यमुना जी बीच में पड़ती है अब बताओ कैसे जाएं?

भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि जब तुम यमुना जी के पास जाओ तो कहना – हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमें रास्ता दो.

गोपियाँ हंसने लगी कि लो ये कृष्ण भी अपने आप को ब्रह्मचारी समझते है, सारा दिन तो हमारे पीछे पीछे घूमता है, कभी हमारे वस्त्र चुराता है कभी मटकिया फोड़ता है … खैर फिर भी हम बोल देंगी.

गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर कहती है, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दें, और गोपियों के कहते ही यमुना जी ने रास्ता दे दिया.

गोपियाँ तो सन्न रह गई ये क्या हुआ, कृष्ण ब्रह्मचारी!!!!

अब गोपियां अगस्त्य ऋषि को भोजन करवा कर वापस आने लगी तो अगस्त्य ऋषि से कहा कि अब हम घर कैसे जाएं, यमुनाजी बीच में है.

अगस्त्य ऋषि ने कहा कि तुम यमुना जी को कहना कि अगर अगस्त्यजी निराहार है तो हमें रास्ता दें.

गोपियाँ मन में सोचने लगी कि अभी हम इतना सारा भोजन लाई सो सब गटक गये और अब अपने आप को निराहार बता रहे हैं?

गोपियां यमुना जी के पास जाकर बोली, हे यमुना जी अगर अगस्त्य ऋषि निराहार है तो हमे रास्ता दें, और यमुना जी ने रास्ता दे दिया.

गोपियां आश्चर्य करने लगी कि जो खाता है वो निराहार कैसे हो सकता है?

और जो दिन रात हमारे पीछे पीछे फिरता है वो कृष्ण ब्रह्मचारी कैसे हो सकता है?

इसी उधेड़बुन में गोपियों ने कृष्ण के पास आकर फिर से वही प्रश्न किया.

भगवान श्री कृष्ण कहने लगे गोपियों मुझे तुमारी देह से कोई लेना देना नहीं है, मैं तो तुम्हारे प्रेम के भाव को देख कर तुम्हारे पीछे आता हूँ. मैंने कभी वासना के तहत संसार नहीं भोगा मैं तो निर्मोही हूँ इसलिए यमुना ने आप को मार्ग दिया.

तब गोपियां बोली भगवन मुनिराज ने तो हमारे सामने भोजन ग्रहण किया *फिर भी वो बोले कि अगत्स्य आजन्म उपवासी हो तो हे यमुना मैया मार्ग दें!
और बड़े आश्चर्य की बात है कि यमुना ने मार्ग दे दिया!

श्री कृष्ण हंसने लगे और बोले कि अगत्स्य आजन्म उपवासी हैं.

अगत्स्य मुनि भोजन ग्रहण करने से पहले मुझे भोग लगाते हैं.

और उनका भोजन में कोई मोह नहीं होता उनको कतई मन में नहीं होता कि में भोजन करूं या भोजन कर रहा हूँ.

वो तो अपने अंदर रह रहे मुझे भोजन करा रहे होते हैं, इसलिए वो आजन्म उपवासी हैं.

जो मुझसे प्रेम करता है, मैं उनका सच में ऋणी हूँ, मैं तुम सबका ऋणी हूँ…

ऐसे हैं श्री भगवान कृष्ण👏

संजय गुप्ता

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बेटी की चाह
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40-42 साल की परिपक्व घरेलू स्त्री थी सुधा. भरापूरा परिवार था. धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी. सुधा भी ख़ुश ही थी अपने घर-संसार में, लेकिन कभी-कभी अचानक बेचैन हो उठती. इसका कारण वह ख़ुद भी नहीं जानती थी. पति उससे हमेशा पूछते कि उसे क्या परेशानी है? पर वह इस बात का कोई उत्तर न दे पाती.
तीनों ही बच्चे बड़े हो गए थे. सबसे बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष में, मंझला पहले वर्ष में और छोटा दसवीं में था. तीनों ही किशोरावस्था में थे. अब उनके रुचि के विषय अपने पिता के विचारों से ज़्यादा मेल खाते. वे ज़्यादातर समय अपने पिता, टीवी और दोस्तों के साथ बिताते. सुधा चाहती थी कि उसके तीनों बेटे उसके साथ कुछ समय बिताएं, पर उनकी रुचियां कुछ अलग थीं. अब वे तीनों ही बच्चे नहीं रह गए थे, धीरे-धीरे वे पुरुष बनते जा रहे थे.
एक सुबह सुधा ने अपने पति से कहा, “मेरी ख़ुशी के लिए आप कुछ करेंगे?” पति ने कहा, “हां-हां क्यों नहीं? तुम कहो तो सही.” सुधा सहमते हुए बोली, “मैं एक बेटी गोद लेना चाहती हूं.” पति को आश्चर्य हुआ, पर सुधा ने कहा, “सवाल-जवाब मत करिएगा, प्लीज़.” तीनों बच्चों के सामने भी यह प्रस्ताव रखा गया, किसी ने कोई आपत्ति तो नहीं की, पर सबके मन में सवाल था “क्यों?”
जल्द ही सुधा ने डेढ़ महीने की एक प्यारी-सी बच्ची अनाथाश्रम से गोद ले ली. तीन बार मातृत्व का स्वाद चखने के बाद भी आज उसमें वात्सल्य की कोई कमी नहीं थी. बच्ची के आने की ख़ुशी में सुधा और उसके पति ने एक समारोह का आयोजन किया. सब मेहमानों को संबोधित करते हुए सुधा बोली, “मैं आज अपने परिवार और पूरे समाज के ‘क्यों’ का जवाब देना चाहती हूं. मेरे ख़याल से हर घर में एक बेटी का होना बहुत ज़रूरी है. बेटी के प्रेम और अपनेपन की आर्द्रता ही घर के सभी लोगों को एक-दूसरे से बांधे रखती है. तीन बेटे होने के बावजूद मैं संतुष्ट नहीं थी. मैं स्वयं की परछाईं इनमें से किसी में नहीं ढूंढ़ पाती. बेटी शक्ति है, सृजन का स्रोत है. मुझे दुख ही नहीं, पीड़ा भी होती है, जब मैं देखती हूं कि किसी स्त्री ने अपने भ्रूण की हत्या बेटी होने के कारण कर दी या उसे कचरे के डिब्बे में कुत्तों के भोजन के लिए छोड़ दिया. मैं समझती हूं कि मेरे पति का वंश ज़रूर मेरे ये तीनों बेटे बढ़ाएंगे, पर मेरे ‘मातृत्व’ का वंश तो एक बेटी ही बढ़ा सकती है.”

संजय गुप्ता

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आज मैं उन तीन बुजुर्गों की कहानी सुनाऊंगा, जिन्होंने ज़िंदगी के एक पड़ाव पर तय कर लिया कि वो अपना जीवन पूजा-पाठ करते हुए गुजारेंगे।
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कहानी इस तरह है। तीन बुजुर्गों ने तय किया कि वो किसी टापू पर जाकर रहेंगे और अपने ईश्वर को याद करेंगे।
तीनों बुजुर्गों ने एक नाव किया और पहुंच गए टापू पर। वहां उन्होंने नाव वाले को वापस भेज दिया और कहा कि अब वो यहीं रहेंगे और ईश्वर की उपासना करेंगे।
कई साल बीत गए। तीनों बुजुर्ग बस दिन भर ईश्वर की उपासना में व्यस्त रहते।
कई दिनों बाद पुजारियों के एक समूह को पता चला कि तीन बुजुर्ग बिना किसी गुरू के जैसे-तैसे ईश्वर की उपासना में लीन हैं। साधुओं की वो टोली एक नाव करके उस टापू तक पहुंची और उसने उन तीनों बुजुर्गों को पूजा की सही विधि और मंत्रोच्चार का सही तरीका समझाया। तीनों बुजुर्ग बहुत खुश हुए कि किसी ने उन्हें पूजा की सही विधि समझाई।
इतना करने के बाद साधुओं की वो टोली नाव से वहां से चल पड़ी। वो कुछ दूर गए होंगे कि उन्होंने देखा कि तीनों पानी पर दौड़ते हुए उनके पास आ रहे हैं। साधुओं की टोली बहुत हैरान रह गई कि ये तीनों बुजुर्ग पानी की सतह पर दौड़ रहे हैं?
तीनों बुजुर्ग नाव के पास पहुंच कर पानी की सतह पर खड़े हो गए।
साधुओं की टोली हैरान होकर उन्हें देख रही थी। फिर उन्होंने धीरे से पूछा कि आप लोगों को क्या चाहिए?
तीनों बुजुर्गों ने कहा कि आपने पूजा का जो पाठ हमें पढ़ाया था उसे हम भूल गए हैं। कृपया एक बार और बता दीजिए।
साधुओं ने उन बुजुर्गों की ओर देखा और कहा कि आपको किसी ज्ञान की ज़रूरत नहीं। आप जैसे भी ईश्वर को याद कर रहे हैं, वही सर्वश्रेष्ठ तरीका है

संजय गुप्ता

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एक बादशाह ने ख्वाब देखा के उसके सारे दांत टूट कर गिर पड़े हैं।
बादशाह ने एक मुफ़स्सिर ( ख्वाब की ताबीर बताने वाला ) को बुलवा कर उसे ख्वाब सुनाया।

मुफ़स्सिर ने बादशाह से कहा ;
इसकी ताबीर ये बनती है के आपके सारे घर वाले आपके सामने मरेंगे

बादशाह को बोहत गुस्सा आया। उसने मुफ़स्सिर को क़त्ल करवा दिया।

एक और मुफ़स्सिर को बुलवाया गया, बादशाह ने उसको अपना ख्वाब सुनाया,

मुफ़स्सिर ने कहा ; “बादशाह सलामत आपको मुबारक हो, ख्वाब की ताबीर ये बनती है के आप माशा अल्लाह अपने घर वालों में सब से लंबी उम्र पाएंगे।”

बादशाह ने खुश होकर मुफ़स्सिर को इनाम ओ इकराम देकर रुखसत किया।

क्या इस बात का यही मतलब नही बनता के अगर बादशाह अपने घर वालों में सब से लंबी उम्र पाएगा तो उसके सारे घर वाले उसके सामने ही मरेंगे ??

जी ! मतलब तो यही बनता है मगर बात बात में और अलफ़ाज़ में फ़र्क़ है।

आपका लिख्खा गया एक एक लफ्ज़ किसी दूसरे के लिए मरहम भी बन सकता है और ज़ख्म भी दे सकता है✋
अख्तियार आपके हाथ मे है ✍🏻.”

संजय गुप्ता