Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

राम राम जी —

       ( एक संत की आत्मकथा )

सच्ची घटना आपसे साझा कर रहा हूँ –

एक नवयुवक मुझे मिलने आया। जब उनसे अपना परिचय दिया, तो मुझे बीस बरस पहले घटी एक घटना याद हो आई !

एक मजदूर महिला, जो खेत में काम करने गई थी। जहां उसे एक जहरीले सांप ने काट लिया। उसे सांप का जहर उतारने वाले के पास ले जाया गया। वह ठीक तो हो गई, लेकिन कुछ ही दिनों के बाद उसके शरीर पर जहर के दुश्परिणाम दिखाई देने लगे !

उसके दोनों पैरों के पिछे की, ‘जंघा’ से लेकर ‘एड़ी’ तक पूरे पैर की चमड़ी धीरे-धीरे गलने लगी थी। और दोनों पैरों का पिछला हिस्सा घाव से भर गया था, ठीक वैसा ही जैसा जलने पर घाव हो जाता है !

वह ओंधेमुंह, अपने दोनों पैरों को ओंधा कर, उस पर कपड़ा डाले लेटी हुई थी। घाव से पानी रिस रहा था और कपड़ा घाव पर चिपक रहा था !

उसका पति, जो लकवा रोग से पीड़ित था, पंखा झलकर घाव से मख्खियां उड़ा रहा था !

उसे अस्पताल ले जाना बेहद जरूरी था। जबकि गांव शहर से दूर था और उसके पास शहर के अस्पताल जाने का किराया तक नहीं था। पति अपाहिज था, और बच्चे छोटे थे। महिला की मजदूरी के पैसे से ही घर का सारा खर्च चलता था !

भयभीत करने वाली बात यह थी कि महिला गर्भवती थी। और उसके पेट में छः से सात महीने का बच्चा था। संक्रमण का खतरा बढ़ रहा था। अतः माँ और बच्चा दोनों की जान पर खतरा मंडराने लगा था !

मेरे मन में रह रह कर एक ही ख़याल घूम रहा था ‘क्या होगा…? क्या यह बच्चा जन्म लेने के पहले ही…
नहीं… नहीं… ऐसा नहीं होना चाहिए !

मैं रात को ठीक तरह से सो नहीं सका। मन में एक विचार आया कि ‘मैं संत हूँ और मेरे परिवार के लोग भी कभी-कभी जंगल में काम करने जाते हैं। यदि इसकी जगह पर, मेरी माँ, भाभी, बहन या शिष्य होते तो ?’

सुबह होते ही मैं उसके घर गया और उसकी चिकित्सा की व्यवस्था करवाई !

कुछ दिनों के इलाज से महिला ठीक हो गई और उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया !

यह वही बच्चा था, जो आज बीस बरस का हो चुका था। अपनी पहली तनख्वाह से मेरे रूपये लौटाने आया था, वही रूपये जब यह अपनी माँ के पेट में था और मैंने इसकी मां के इलाज पर खर्च किये थे !

“माँ कहती है, आप न होते तो हम न होते।” कहते हुए, उसने मेरे पैर छूकर धन्यवाद दिया !

मै यह सब देखकर सोचने लगा कि जीवन मरण तो प्रभू के हाथ है लेकिन जिसे भगवान जीवनदान देना चाहते है तो किसी न किसी को निमित्त बना देते है !

मै प्रभू को धन्यवाद दिया और प्रार्थना की – हे दयानिधि ! ऐसी कृपा बनाए रखना की किसी विपति ग्रस्त की सहायता करते समय मै तनिक भी संकोच न करूँ !!

                ।। ॐ नमः शिवाय ।।

संजय गुप्ता

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🍁🍁🍁ईश्वर का घर 🍁🍁🍁

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए, लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यवहारिक मुश्किलें आ रही थीं । कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता । उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता । भगवान इससे दु:खी हो गए थे ।

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले –

“देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं । कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं ।

आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके ।“

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए ।

गणेश जी बोले – “आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं ।“

भगवान ने कहा – “यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं । उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा ।“

इंद्रदेव ने सलाह दी कि “वह किसी महासागर में चले जाएं ।

वरुण देव बोले -“आप अंतरिक्ष में चले जाइए ।“

भगवान ने कहा – “एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा ।“ भगवान निराश होने लगे थे । वह मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए

कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं ।“

अंत में सूर्य देव बोले- “ प्रभू ! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं । मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा ।“

ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई ।

उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए ।

उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को ऊपर, नीचे, दाएं, बाएं, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें ।

*मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पा रहा हैं ll
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संजय गुप्ता

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🙏🏻🌹इस ड्रामे से होगा क्या! सोचिए-विचारिए

एक बुजुर्ग दर्जी था. बीमार पडा, ऐसा लगा, अब गया कि तब गया. डॉक्टरों ने भी बहुत आशा न दी तो वह अपनी आखिरी घड़ियां गिनता बिस्तर पर पड़ा था.
एक रात उसने सपना देखा कि वह मर गया और यमदूत उसे अपने साथ एक बड़ी रस्सी में बांधे लिए जा रहा है. रस्सी को देखकर उसे बड़ी हैरानी हुई. उस मोटी रस्सी में रंग-बिरंगी बहुत सी झंडियां लगी हुई थीं.
एक से एक सुंदर झंडियां जो रस्सी को बड़ा खूबसूरत बना रही थीं. उसने तो सुन रखा था कि यमदूत बहुत बुरी तरह घसीटते लिए जाते हैं काली मोटी रस्सी में जिसमें खून लगा होता है, मवाद रिस रही होती है पर ये तो बड़ी सुंदर रस्सी थी.
उसे लगा कि शायद वह बड़ा पुण्यात्मा है इसलिए उसके लिए परमात्मा ने विशेष रस्सी भेजी है फिर ध्याना आया कि कहीं पढ़ा है कि पुण्यात्माओं के लिए भगवान विमान भेजते हैं उन्हें रस्सियों में नहीं घसीटा जाता. वह तय नहीं कर पा रहा था कि पुण्यात्मा है कि पापी तो सोचा कि क्यों न इस यमदूत से ही पूछ लूं.
दर्जी ने यमदूत से पूछा- भाई रस्से में ये झंडियां यहाँ क्‍यों लगी हैं? कोई विशेष कारण.
यमदूत ने बताया- विशेष तो कुछ नहीं है पर जिन-जिनके कपड़े तुमने इतने सालों में चुराए हैं, उनके प्रतीक के रूप में ये झंडियां लगी हैं. इन्हें देखकर महाराज तुम्हारा हिसाब करेंगे. ये तुम्‍हारी चोरी का रहस्‍य खोल देंगी. यही समझो कि ये झंडियां ही अब तुम्‍हारे कर्मों का बही-खाता हैं.
दर्जी को तो सांप सूंघ गया. उसने अब ध्यान से देखा तो वे झंडियां अंतहीन थीं. न जाने कहां तक जाती थीं. वह जहां तक देख भी नहीं सकता था वहां तक. उसे अपने कर्मों का दर्पण दिखा तो वह घबरा गया और क्षमा मांगने के लिए जोर-जोर से रोने-गिड़गिडाने लगा.
घबराहट में उसकी नींद खुल गई. उसने समझ लिया कि यह सपना था. वह यही सोचता कि अब तो कुछ हो ही नहीं सकता. मरेगा तो उसे कर्मों का हिसाब देना पड़ेगा और नरक की यतना मिलनी तो तय है. काश ये सपना पहले देख लिया होता तो कुछ पाप चोरी कम की होती पर अब हो ही क्या सकता है!
ईश्वर की माया देखिए कहां वह मरने वाला था, कुछ दिनों बाद वह स्वस्थ हो गया. वह फिर से दुकान पर आने लगा. उसके दो चेले थे जो उसके साथ काम करते थे. वह उन्‍हें काम सिखाता भी था.
उसने दोनों चेलों को बुलाकर सपने की बात संक्षेप में बताई और चेताया- एक बात का ध्‍यान रखना. मुझे अपने पर भरोसा नहीं है. अगर कोई कपड़ा कीमती आ जाए तो आदत से परेशान मैं उसे चुराऊंगा जरूर. इस बुढ़ापे में आदत तो बदलनी मुश्किल है. तुम जब भी देखो कि मैं कोई कपड़ा चुरा रहा हूं तो तुम इतना ही कह देना- झंडी में ये कपड़ा है. ताकि में सम्‍हल जाऊँ.
ऐसे तीन दिन बीते. दिन में कई बार शिष्‍यों ने को कहना पड़ा- मालिक, झंडी में यह कपड़ा है. झंडी में यह कपड़ा है. यह सुनकर वह रूक जाता. तीन दिन तो काट लिए पर चौथे दिन बड़ी मुश्‍किल हो गई.
शहर के सबसे बड़े सेठ का कपड़ा बनने आया. कपड़ा बाहर से मंगाया गया था, ऐसा सुंदर और कीमती कपड़ा तो दर्जी ने इससे पहले कभी देखा न था. उसके दिमाग में ड्राइंग बनने लगी कि इधर से चुराऊंगा तो क्या बनेगा, उधर से चुराऊंगा तो क्या बनेगा.
उसने कैंची उठाई और खेल शुरू किया तो चेले चिल्ला पड़े. झंडी में ये कपड़ा है, झंडी में ये कपड़ा है.
दर्जी तेजी से कैंची चलाता जा रहा था और चेले चिल्लाते जाते झंडी में यह कपड़ा है. दर्जी ने कान में रूई डाल ली और लगा कपड़ा चुराने. एक चेला नजदीक आया और बिल्कुल कान में बोला- उस्‍तादजी झंडी में यह कपड़ा है.
दर्जी ने इसे अनसुना कर दिया पर शिष्‍य फिर चिल्‍लाया. दर्जी से बर्दाश्त न हुआ. उसने कहा- बंद करो नालायकों! इस रंग के कपड़े की झंडी वहां पर थी ही नहीं. क्‍या झंडी-झंडी लगा रखी है और फिर हो भी तो क्‍या फर्क पड़ता है जहां पर इतनी झंडी लगी है वहां एक और सही.
यही हाल हमारे संकल्पों का है. जब परेशानी में पड़ते हैं तो ईश्वर विशेष रूप से याद आने लगते हैं. गरीबों के प्रति दया-करूणा जाग जाती है. विनीत हो जाते हैं पर वह सब बनावटी ही होता है. समय फिरते ही नजरें फिर जाती हैं. होता है या नहीं होता!
ज्यादातर लोग इसी तरह की जिंदगी जी रहे हैं. दुख पड़े तो अलग तरह के व्यक्ति हो जाते हैं, दुख बीते तो बिल्कुल अलग. दोहरी जिंदगी जी रहे हैं तो फल दोहरा ही मिलना है. अपनी मां, अपने पिता तो बड़े प्रिय, पत्नी या पति के माता-पिता को देखकर चिढ़ आती है. बहू के साथ जो व्यवहार करते हैं वह बेटी के साथ उसकी ससुराल में हो तो अन्याय लगता है. सास के साथ जैसा रुखापन है वही बात उनकी मां के साथ हो तो हाय-तौबा. झंडी में यह कपड़ा है जी.
हर जगह यही हाल है. एक बड़े धर्मात्मा टाइप के सेठजी की किराने की बड़ी दुकान है. खूब भंडारे कराते हैं, भंडारे की तस्वीरें लगाते हैं. पहले घर में फ्रेम कराकर लगती थीं फोटो अब फेसबुक आदि पर भी आती हैं. बड़ी-बड़ी माला, तगड़ा सा तिलक माथे पर. देखने वाला कहे ये व्यापारी नहीं महात्मा हैं.
नमक की किल्लत होने वाली है ऐसी अफवाह उड़ी. सेठजी के पास नमक का स्टॉक था. ग्राहक आय़ा तो उन्होंने तत्काल एक थैली के लिए सौ रूपए मांग लिए. मजबूर इंसान था उसके घर में नमक बिल्कुल नहीं था सो सेठजी इसे भांप गए और इसका लाभ कैसे न उठाएं. कुछ देर पहले 15 रुपए बिकने वाला नमक सौ का हो गया. विशाल भंडारे में यही पैसा जाएगा. सेठजी धर्मात्मा कहलाएंगे. झंडी में यह कपड़ा है जी.
जो मैंने देखा है वह आपने भी देखा होगा. क्या पता कोई ऐसे ही सेठजी यह पढ़ भी रहे हों. किसे धोखा दे रहे हो महाराज! आपके चकमे से ईश्वर की आंख नहीं चौंधिआएगी, बस धरती के इंसान ही नहीं बूझ पाएंगे. धर्म का दिखावा और पाखंड क्यों कर रहे हो. निःस्वार्थ सेवा न हुई तो उसका कुछ नहीं मिलने वाला. धर्मशालाओं के पंखे और बल्ब पर बाप-दादाओं का नाम लिख रहे हो जाने उसका क्या होगा. झंडी में यह कपड़ा है जी.
सपनों में सीखी बातें या विवशता में आया धर्मबोध स्थाई हो ही नहीं सकता. भय के कारण कितनी देर सम्‍हलकर चलोगे और लोभ कैसे पुण्‍य बन सकता है? विचारना जी

🙏🏻🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🏻

संजय गुप्ता

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संत महिमा……

एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे।
एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था।

एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ,

आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं .?
संत बोले – श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे।

किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ?

मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ?
मैं पकड़ के लाऊंगा उसको।

संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया….
कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है।

किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा।

फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया…
3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी,

वो भला दूर कहाँ है,
बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए।

किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा,

जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया,

शिकार मिल गया, शिकार मिल गया,
और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला,
अच्छा बच्चु .. 3 दिन भूखा प्यासा रखा, अब मिले हो,

और मुझ पर जादू कर रहे हो।
शयाम सुंदर उसके भोले पन पर रीझे जा रहे थे एवं मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे।
किरात, कृष्ण को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर और संत के पास ले आया।

बाबा,आपका शिकार लाया हुँ… बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं किरात के कंधे पे श्री कृष्ण हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं।

संत के तो होश उड़ गए, किरात के चरणों में गिर पड़े, फिर ठाकुर कातर वाणी बोले –
हे नाथ मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये, आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा, इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए…!!

भगवान बोले – इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया और मुझ से इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया।

भगवान तो भक्तों के संतों के आधीन ही होतें हैं।
जिस पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करतें हैं। किरात तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं,

पर संत को रोज़ प्रणाम करता था। संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है कि 3 दिन में ही ठाकुर मिल गए ।

यह होता है संत की संगति का परिणाम!!

“संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान,
ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान”
जय जय श्री राधे।
Jai shri krishna

संजय गुप्ता

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भलाई और शिकायत

एक बार एक केकड़ा समुद्र किनारे अपनी मस्ती में चला जा रहा था और बीच बीच में रुक कर अपने पैरों के निशान देख कर खुश होता
आगे बढ़ता पैरों के निशान देखता और खुश होता,,,,,
इतने में एक लहर आई और उसके पैरों के सभी निशान मिट गये
इस पर केकड़े को बड़ा गुस्सा आया, उसने लहर से कहा

“ए लहर मैं तो तुझे अपना मित्र मानता था, पर ये तूने क्या किया ,मेरे बनाये सुंदर पैरों के निशानों को ही मिटा दिया
कैसी दोस्त हो तुम”

तब लहर बोली “वो देखो पीछे से मछुआरे पैरों के निशान देख कर केकड़ों को पकड़ने आ रहे हैं
हे मित्र, तुमको वो पकड़ न लें ,बस इसीलिए मैंने निशान मिटा दिए

ये सुनकर केकड़े की आँखों में आँसू आ गये ।

हमारे साथ भी तो ऐसा ही होता है ज़िन्दगी अच्छी खासी चलती रहती है, और हम उसे देखते रहने में ही इतने ज्यादा मगन हो जाते हैं कि सोचते हैं कि बस इसी तरह ही ज़िन्दगी चलती रहे ।

लेकिन जैसे ही कोई दुःख या मुसीबत आती है या कोई काम हमारी सोच के मुताबित नही होता तो हम ऊँगली उस मलिक की तरफ उठाना शुरू कर देते हैं, लेकिन ये भूल जाते हैं कि शायद ये दुःख या तकलीफ जो उसने दी हुई है, इसके पीछे भी हमारे भले का कोई राज छिपा होगा ।

जब तक समय और काम हमारी मर्ज़ी से चलते रहते है , तब हम खुश रहते है, और जब काम उस मालिक की मर्ज़ी से होता है, तो हम क्यों उसकी तरफ मुँह बना कर शिकायत करने पर आ जाते हैं। जबकि हमे तो खुश होना चाहिए कि जब मैं अपनी मर्ज़ी से इतना खुश था तो अब मुझे मलिक की मर्ज़ी कितना खुश रख सकती है ।

उसकी☝ मौज दिखती नही, लेकिन दिखाती बहुत है ।

उसकी☝ मौज बोलती नही, लेकिन करती बहुत है🙏
राधै राधै

संजय गुप्ता

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

700 साल पुराना है रानी सती का यह मंदिर
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राजस्थान के झुंझुनू में स्थित है रानी सती का मंदिर। शहर के बीचों-बीच स्थित मंदिर झुंझुनू शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। बाहर से देखने में ये मंदिर किसी राजमहल सा दिखाई देता है। पूरा मंदिर संगमरमर से निर्मित है। इसकी बाहरी दीवारों पर शानदार रंगीन चित्रकारी की गई है। मंदिर में शनिवार और रविवार को खास तौर पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

रानी सती जी को समर्पित झुंझुनू का ये मंदिर 700 साल पुराना है। यह मंदिर सम्मान, ममता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। देश भर से भक्त रानी सती मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। भक्त यहां विशेष प्रार्थना करने के साथ ही भाद्रपद माह की अमावस्या पर आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में भी हिस्सा लेते हैं।

लगी है 16 देवियों की मूर्तियां
रानी सती मंदिर के परिसर में कई और मंदिर हैं, जो शिवजी, गणेशजी, माता सीता और रामजी के परम भक्त हनुमान को समर्पित हैं। मंदिर परिसर में षोडश माता का सुंदर मंदिर है, जिसमें 16 देवियों की मूर्तियां लगी हैं। परिसर में सुंदर लक्ष्मीनारायण मंदिर भी बना है।

राजस्थान के मारवाड़ी लोगों का दृढ़ विश्वास है कि रानी सतीजी, स्त्री शक्ति की प्रतीक और मां दुर्गा का अवतार थीं। उन्होंने अपने पति के हत्यारे को मार कर बदला लिया और फिर अपनी सती होने की इच्छा पूरी की। रानी सती मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। वैसे अब मंदिर का प्रबंधन सती प्रथा का विरोध करता है। मंदिर के गर्भ गृह के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा है- हम सती प्रथा का विरोध करते हैं।

मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर एक बजे तक और शाम 3 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर के गर्भ गृह में निकर और बरमुडा पहने लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर का दफ्तर सुबह 9 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। राजस्थान के झुंझुनू में स्थित है रानी सती का मंदिर। शहर के बीचों-बीच स्थित मंदिर झुंझुनू शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। बाहर से देखने में ये मंदिर किसी राजमहल सा दिखाई देता है। पूरा मंदिर संगमरमर से निर्मित है। इसकी बाहरी दीवारों पर शानदार रंगीन चित्रकारी की गई है। मंदिर में शनिवार और रविवार को खास तौर पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

रानी सती जी को समर्पित झुंझुनू का ये मंदिर 400 साल पुराना है। यह मंदिर सम्मान, ममता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। देश भर से भक्त रानी सती मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। भक्त यहां विशेष प्रार्थना करने के साथ ही भाद्रपद माह की अमावस्या पर आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में भी हिस्सा लेते हैं।

रानी सती मंदिर के परिसर में कई और मंदिर हैं, जो शिवजी, गणेशजी, माता सीता और रामजी के परम भक्त हनुमान को समर्पित हैं। मंदिर परिसर में षोडश माता का सुंदर मंदिर है, जिसमें 16 देवियों की मूर्तियां लगी हैं। परिसर में सुंदर लक्ष्मीनारायण मंदिर भी बना है।

राजस्थान के मारवाड़ी लोगों का दृढ़ विश्वास है कि रानी सतीजी, स्त्री शक्ति की प्रतीक और मां दुर्गा का अवतार थीं। उन्होंने अपने पति के हत्यारे को मार कर बदला लिया और फिर अपनी सती होने की इच्छा पूरी की। रानी सती मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। वैसे अब मंदिर का प्रबंधन सती प्रथा का विरोध करता है। मंदिर के गर्भ गृह के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा है- हम सती प्रथा का विरोध करते हैं।

कब खुलता है मंदिर
मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर एक बजे तक और शाम 3 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर के गर्भ गृह में निकर और बरमुडा पहने लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर का दफ्तर सुबह 9 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए विशाल आवास बना है, जहां 100 रुपये से लेकर 700 रुपये तक के कमरे उपलब्ध हैं। मंदिर में एक कैंटीन और एक भोजनालय भी है। कैंटीन में दक्षिण भारतीय भोजन भी उपलब्ध है। भोजन दिन में 11 बजे से 1 बजे तक और शाम को 8 बजे से 10 बजे तक उपलब्ध रहता है।

कैसे पहुंचें-

झुंझुनू बस स्टैंड से रानी सती मंदिर के लिए ऑटो रिक्शा लें। दूरी तीन किलोमीटर है। ऑटो रिक्शा वाले 10 रुपये किराया लेते हैं। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 2 किलोमीटर है। वहीं शहर के गांधी चौक से मंदिर की दूरी महज एक किलोमीटर है। आप ऑटो रिजर्व करके भी मंदिर जा सकते हैं। अगर एक दिन रुकना है तो रानी सती मंदिर के स्वागत कक्ष पर आवास के लिए भी आग्रह कर सकते हैं।

संजय गुप्ता

Posted in महाभारत - Mahabharat

कर्ण से जुडी कुछ रोचक बातें
*********

कर्ण के पिता सूर्य और माता कुंती थी, पर चुकि उनका पालन एक रथ चलाने वाले ने किया था, इसलिए वो सूतपुत्र कहलाएं और इसी कारण उन्हें वो सम्मान नहीं मिला, जिसके वो अधिकारी थे। इस लेख में आज हम महारथी कर्ण से सम्बंधित कुछ रोचक बातें जानेंगे।

क्यों नहीं चुना द्रौपदी ने कर्ण
को अपना पति?

कर्ण द्रोपदी को पसंद करता था और उसे अपनी
पत्नी बनाना चाहता था साथ ही द्रौपदी भी कर्ण से
बहुत प्रभावित थी और उसकी तस्वीर देखते ही यह
निर्णय कर चुकी थी कि वह स्वयंवर में उसी के गले
में वरमाला डालेगी। लेकिन फिर
भी उसने ऐसा नहीं किया।

द्रोपदी और कर्ण, दोनों एक-दूसरे से विवाह करना
चाहते थे लेकिन सूतपुत्र होने की वजह से यह
विवाह नहीं हो पाया। नियति ने इन दोनों का
विवाह नहीं होने दिया, जिसके परिणामस्वरूप
कर्ण, पांडवों से नफरत करने लगा।

द्रोपदी ने कर्ण के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया
क्योंकि उसे अपने परिवार के सम्मान को बचाना था।
क्या आप जानते है द्रौपदी के विवाह प्रस्ताव को
ठुकरा देने के बाद कर्ण ने दो विवाह किए थे।

चलिए आपको बताते हैं किन हालातों में
किससे कर्ण ने विवाह किया था।

कर्ण ने किए थे दो विवाह-
********
अविवाहित रहते हुए कुंती ने कर्ण को जन्म
दिया था। समाज के लांछनों से बचने के लिए
उसने कर्ण को स्वीकार नहीं किया।

कर्ण का पालन एक रथ चलाने वाले ने किया
जिसकी वजह से कर्ण को सूतपुत्र कहा जाने लगा।
कर्ण को गोद लेने वाले उसके पिता आधीरथ चाहते थे
कि कर्ण विवाह करे। पिता की इच्छा को पूरा करने
के लिए कर्ण ने रुषाली नाम की एक सूतपुत्री से विवाह
किया। कर्ण की दूसरी पत्नी का नाम सुप्रिया था।
सुप्रिया का जिक्र महाभारत की कहानी में ज्यादा
नहीं किया गया है।

रुषाली और सुप्रिया से कर्ण के नौ पुत्र थे।
वृशसेन, वृशकेतु, चित्रसेन, सत्यसेन,सुशेन,
शत्रुंजय, द्विपात, प्रसेन और बनसेन।

कर्ण के सभी पुत्र महाभारत के युद्ध में शामिल हुए,
जिनमें से 8 वीरगति को प्राप्त हो गए। प्रसेन की
मौत सात्यकि के हाथों हुई, शत्रुंजय, वृशसेन और
द्विपात की अर्जुन, बनसेन की भीम, चित्रसेन,
सत्यसेन और सुशेन की नकुल के द्वारा मृत्यु हुई थी।

वृषकेतु एकमात्र ऐसा पुत्र था जो जीवित रहा।
कर्ण की मौत के पश्चात उसकी पत्नी रुषाली
उसकी चिता में सती हो गई थी।

महाभारत के युद्ध के पश्चात जब पांडवों को यह बात
पता चली कि कर्ण उन्हीं का ज्येष्ठ था, तब उन्होंने
कर्ण के जीवित पुत्र वृषकेतु को इन्द्रप्रस्थ की गद्दी

सौंपी थी। अर्जुन के संरक्षण में वृषकेतु ने कई युद्ध
भी लड़े थे।

श्री कृष्ण ने क्यों किया कर्ण का अंतिम संस्कार
अपने ही हाथों पर?

जब कर्ण मृत्युशैया पर थे तब कृष्ण उनके पास
उनके दानवीर होने की परीक्षा लेने के लिए आए।

कर्ण ने कृष्ण को कहा कि उसके पास देने के लिए
कुछ भी नहीं है। ऐसे में कृष्ण ने उनसे उनका सोने
का दांत मांग लिया।

कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर को उठाया और
उससे अपना दांत तोड़कर कृष्ण को दे दिया।
कर्ण ने एक बार फिर अपने दानवीर होने का
प्रमाण दिया जिससे कृष्ण काफी प्रभावित हुए।

कृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान
मांग़ सकते हैं।

कर्ण ने कृष्ण से कहा कि एक निर्धन सूत पुत्र होने
की वजह से उनके साथ बहुत छल हुए हैं। अगली
बार जब कृष्ण धरती पर आएं तो वह पिछड़े वर्ग
के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें।
इसके साथ कर्ण ने दो और वरदान मांगे।

दूसरे वरदान के रूप में कर्ण ने यह मांगा कि
अगले जन्म में कृष्ण उन्हीं के राज्य में जन्म लें
और तीसरे वरदान में उन्होंने कृष्ण से कहा कि
उनका अंतिम संस्कार ऐसे स्थान पर होना चाहिए
जहां कोई पाप ना हो।

पूरी पृथ्वी पर ऐसा कोई स्थान नहीं होने के कारण
कृष्ण ने कर्ण का अंतिम संस्कार अपने ही हाथों
पर किया। इस तरह दानवीर कर्ण मृत्यु के पश्चात
साक्षात वैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुए।

ऐसा भी बताया जाता है कि कर्ण की अन्तेष्टि
कृष्णजी द्वारा चक्र पर उज्जैन मे हुई तभी से
चक्रतिर्थ नाम पड़ा।✍☘💕

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌹कामवाली बाई (घर की नौकरानी)🌹
सच्ची घटना पर आधारित
यह बात कुछ दिनों पुरानी है, जब स्कूल बस की हड़ताल चल रही थी।
मेरे मिस्टर अपने व्यवसाय की एक आवश्यक मीटिंग में बिजी थे इसलिए मेरे 5 साल के बेटे को स्कूल से लाने के लिए मुझे टू-व्हीलर पर जाना पड़ा।
जब मैं टू व्हीलर से घर की ओर वापस आ रही थी, तब अचानक रास्ते में मेरा बैलेंस बिगड़ा और मैं एवं मेरा बेटा हम दोनों गाड़ी सहित नीचे गिर गए।
मेरे शरीर पर कई खरोंच आए लेकिन प्रभु की कृपा से मेरे बेटे को कहीं खरोंच तक नहीं आई ।
हमें नीचे गिरा देखकर आसपास के कुछ लोग इकट्ठे हो गए और उन्होंने हमारी मदद करना चाही।
तभी मेरी कामवाली बाई राधा ने मुझे दूर से ही देख लिया और वह दौड़ी चली आई ।
उसने मुझे सहारा देकर खड़ा किया, और अपने एक परिचित से मेरी गाड़ी एक दुकान पर खड़ी करवा दी।
वह मुझे कंधे का सहारा देकर अपने घर ले गई जो पास में ही था।
जैसे ही हम घर पहुंचे वैसे ही राधा के दोनों बच्चे हमारे पास आ गए।
राधा ने अपने पल्लू से बंधा हुआ 50 का नोट निकाला और अपने बेटे राजू को दूध ,बैंडेज एवं एंटीसेप्टिक क्रीम लेने के लिए भेजा तथा अपनी बेटी रानी को पानी गर्म करने का बोला। उसने मुझे कुर्सी पर बिठाया तथा मटके का ठंडा जल पिलाया। इतने में पानी गर्म हो गया था।
वह मुझे लेकर बाथरूम में गई और वहां पर उसने मेरे सारे जख्मों को गर्म पानी से अच्छी तरह से धोकर साफ किए और बाद में वह उठकर बाहर गई ।
वहां से वह एक नया टावेल और एक नया गाउन मेरे लिए लेकर आई।
उसने टावेल से मेरा पूरा बदन पोंछ तथा जहां आवश्यक था वहां बैंडेज लगाई। साथ ही जहां मामूली चोट पर एंटीसेप्टिक क्रीम लगाया।
अब मुझे कुछ राहत महसूस हो रही थी।
उसने मुझे पहनने के लिए नया गाउन दिया वह बोली “यह गाउन मैंने कुछ दिन पहले ही खरीदा था लेकिन आज तक नहीं पहना मैडम आप यही पहन लीजिए तथा थोड़ी देर आप रेस्ट कर लीजिए। ”
“आपके कपड़े बहुत गंदे हो रहे हैं हम इन्हें धो कर सुखा देंगे फिर आप अपने कपड़े बदल लेना।”
मेरे पास कोई चॉइस नहीं थी । मैं गाउन पहनकर बाथरुम से बाहर आई।
उसने झटपट अलमारी में से एक नया चद्दर निकाल और पलंग पर बिछाकर बोली आप थोड़ी देर यहीं आराम कीजिए।

इतने मैं बिटिया ने दूध भी गर्म कर दिया था।

राधा ने दूध में दो चम्मच हल्दी मिलाई और मुझे पीने को दिया और बड़े विश्वास से कहा मैडम आप यह दूध पी लीजिए आपके सारे जख्म भर जाएंगे।

लेकिन अब मेरा ध्यान तन पर था ही नहीं बल्कि मेरे अपने मन पर था।

मेरे मन के सारे जख्म एक एक कर के हरे हो रहे थे।।मैं सोच रही थी “कहां मैं और कहां यह राधा?”

जिस राधा को मैं फटे पुराने कपड़े देती थी, उसने आज मुझे नया टावेल दिया, नया गाउन दिया और मेरे लिए नई बेडशीट लगाई। धन्य है यह राधा।

एक तरफ मेरे दिमाग में यह सब चल रहा था तब दूसरी तरफ राधा गरम गरम चपाती और आलू की सब्जी बना रही थी।
थोड़ी देर मे वह थाली लगाकर ले आई। वह बोली “आप और बेटा दोनों खाना खा लीजिए।”

राधा को मालूम था कि मेरा बेटा आलू की सब्जी ही पसंद करता है और उसे गरम गरम रोटी चाहिए। इसलिए उसने रानी से तैयार करवा दी थी।
रानी बड़े प्यार से मेरे बेटे को आलू की सब्जी और रोटी खिला रही थी और मैं इधर प्रायश्चित की आग में जल रही थी ।
सोच रही थी कि जब भी इसका बेटा राजू मेरे घर आता था मैं उसे एक तरफ बिठा देती थी, उसको नफरत से देखती थी और इन लोगों के मन में हमारे प्रति कितना प्रेम है ।

यह सब सोच सोच कर मैं आत्मग्लानि से भरी जा रही थी। मेरा मन दुख और पश्चाताप से भर गया था।

तभी मेरी नज़र राजू के पैरों पर गई जो लंगड़ा कर चल रहा था।

मैंने राधा से पूछा “राधा इसके पैर को क्या हो गया तुमने इलाज नहीं करवाया ?”
राधा ने बड़े दुख भरे शब्दों में कहा मैडम इसके पैर का ऑपरेशन करवाना है जिसका खर्च करीबन ₹ 10000 रुपए है।

मैंने और राजू के पापा ने रात दिन मेहनत कर के ₹5000 तो जोड़ लिए हैं ₹5000 की और आवश्यकता है। हमने बहुत कोशिश की लेकिन कहीं से मिल नहीं सके ।

ठीक है, भगवान का भरोसा है, जब आएंगे तब इलाज हो जाएगा। फिर हम लोग कर ही क्या सकते हैं?
तभी मुझे ख्याल आया कि राधा ने एक बार मुझसे ₹5000 अग्रिम मांगे थे और मैंने बहाना बनाकर मना कर दिया था।

आज वही राधा अपने पल्लू में बंधे सारे रुपए हम पर खर्च कर के खुश थी और हम उसको, पैसे होते हुए भी मुकर गए थे और सोच रहे थे कि बला टली।

आज मुझे पता चला कि उस वक्त इन लोगों को पैसों की कितनी सख्त आवश्यकता थी।

मैं अपनी ही नजरों में गिरती ही चली जा रही थी।

अब मुझे अपने शारीरिक जख्मों की चिंता बिल्कुल नहीं थी बल्कि उन जख्मों की चिंता थी जो मेरी आत्मा को मैंने ही लगाए थे। मैंने दृढ़ निश्चय किया कि जो हुआ सो हुआ लेकिन आगे जो होगा वह सर्वश्रेष्ठ ही होगा।

मैंने उसी वक्त राधा के घर में जिन जिन चीजों का अभाव था उसकी एक लिस्ट अपने दिमाग में तैयार की। थोड़ी देर में मैं लगभग ठीक हो गई।

मैंने अपने कपड़े चेंज किए लेकिन वह गाउन मैंने अपने पास ही रखा और राधा को बोला “यह गाऊन अब तुम्हें कभी भी नहीं दूंगी यह गाऊन मेरी जिंदगी का सबसे अमूल्य तोहफा है।”

राधा बोली मैडम यह तो बहुत हल्की रेंज का है। राधा की बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं घर आ गई लेकिन रात भर सो नहीं पाई ।

मैंने अपनी सहेली के मिस्टर, जो की हड्डी रोग विशेषज्ञ थे, उनसे राजू के लिए अगले दिन का अपॉइंटमेंट लिया। दूसरे दिन मेरी किटी पार्टी भी थी । लेकिन मैंने वह पार्टी कैंसिल कर दी और राधा की जरूरत का सारा सामान खरीदा और वह सामान लेकर में राधा के घर पहुंच गई।

राधा समझ ही नहीं पा रही थी कि इतना सारा सामान एक साथ में उसके घर मै क्यों लेकर गई।
मैंने धीरे से उसको पास में बिठाया और बोला मुझे मैडम मत कहो मुझे अपनी बहन ही समझो यह सारा सामान मैं तुम्हारे लिए नहीं लाई हूं मेरे इन दोनों प्यारे बच्चों के लिए लाई हूं और हां मैंने राजू के लिए एक अच्छे डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया है अपन को शाम 7:00 बजे उसको दिखाने चलना है उसका ऑपरेशन जल्द से जल्द करवा लेंगे और तब राजू भी अच्छी तरह से दोड़ने लग जाएगा। राधा यह बात सुनकर खुशी के मारे रो पड़ी लेकिन यह भी कहती रही कि “मैडम यह सब आप क्यों कर रहे हो?” हम बहुत छोटे लोग हैं हमारे यहां तो यह सब चलता ही रहता है। वह मेरे पैरों में गिरने लगी। यह सब सुनकर और देखकर मेरा मन भी द्रवित हो उठा और मेरी आंखों से भी आंसू के झरने फूट पड़े। मैंने उसको दोनों हाथों से ऊपर उठाया और गले लगा लिया मैंने बोला बहन रोने की जरूरत नहीं है अब इस घर की सारी जवाबदारी मेरी है। मैंने मन ही मन कहा राधा तुम क्या जानती हो कि मैं कितनी छोटी हूं और तुम कितने बड़ी हो आज तुम लोगों के कारण मेरी आंखे खुल सकीं। मेरे पास इतना सब कुछ होते हुए भी मैं भगवान से और अधिक की भीख मांगती रही मैंने कभी संतोष का अनुभव नहीं किया।
लेकिन आज मैंने जाना के असली खुशी पाने में नहीं देने में है ।
मैं परमपिता परमेश्वर को बार-बार धन्यवाद दे रही थी, कि आज उन्होंने मेरी आंखें खोल दी। मेरे पास जो कुछ था वह बहुत अधिक था उसके लिए मैंने परमात्मा को बार-बार अपने ऊपर उपकार माना तथा उस धन को जरूरतमंद लोगों के बीच खर्च करने का पक्का निर्णय किया।
( किसी के व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित : प्रेरक सत्य कथा 🙂
🌹🙏जय जय श्री राधे🙏🌹

संजय गुप्ता

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चतुर लड़की

बहुत समय पूर्व एक किसान अपनी बेटी के साथ एक गॉंव में रहता था। उसकी आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उसे गॉंव के साहूकार से ऋण लेना पड़ा। बहुत समय बीत जाने के बाद भी वह साहूकार का ऋण नहीं चुका पाया। साहूकार बूढ़ा और देखने में कुरूप था। उसके अनुचित स्वाभाव के कारण गॉंव में उसे कोई भी पसंद नहीं करता था। किसान की बेटी बहुत सुंदर और सुशील थी। किसान ने उसे बड़े लाड़-प्यार से पाला था। वह अपने पिता के साथ ही खेतों में काम करती थी। एक दिन उस बूढ़े साहूकार की दृष्टि किसान की सुदंर पुत्री पर पड़ी और वह उस पर मोहित हो गया और मन ही मन उससे विवाह करने की सोचने लगा।

लेकिन उसे पता था कि किसान अपनी लड़की का विवाह उससे कभी नहीं करेगा। इसके साथ-साथ उसे यह भी ज्ञात था कि किसान इस समय ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह अपना ऋण चुका सके। किसान के खेत का रास्ता छोटे-छोटे कंकड़ों और रोड़ियों से भरा पड़ा था। एक दिन साहूकार खेत की ओर जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो गया। कुछ समय पश्चात् किसान और उसकी बेटी भी वहाँ जा पहुँचे। उसने किसान के सामने एक प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव यह था कि यदि उसने अपनी बेटी का विवाह उसके साथ कर दिया तो वह उसका पूरा ऋण ब्याज सहित माफ़ कर देगा। साहूकार के इस बेतुके प्रस्ताव से पिता-पुत्री दोनों भयभीत हो गए। धूर्त साहूकार ने पुनः सुझाव देते हुए कहा कि इसका निर्णय न मैं करूँगा न आप। इसे आप अपने भाग्य पर छोड़ दें। इतना कहकर उसने अपनी जेब से एक ख़ाली थैली निकाली और उसे दिखाते हुए कहा कि मैं इसके अंदर एक काला और एक सफ़ेद कंकड़ डालता हूँ। अब तुम्हारी बेटी को बिना देखे इस थैली में से एक कंकड़ निकालना होगा और यहॉं शर्त यह रहेगी कि:-

यदि उसने काले रंग का कंकड़ निकला तब उसे मुझसे विवाह करना होगा और तुम्हारे सारे ऋण ब्याज सहित माफ़ कर दिए जाएँगे
यदि तुम्हारी बेटी ने सफ़ेद रंग का कंकड़ निकाला तब इसे मुझसे विवाह नहीं करना होगा और फिर भी सारे ऋण ब्याज सहित माफ़ कर दिए जाएँगे।
यदि इसने कंकड़ निकालने से मना कर दिया तो फिर तुम्हें जेल जाना होगा। जब किसान और उसकी बेटी आपस में विचार-विमर्श कर रहे थे तभी साहूकार अचानक कंकड़ों को उठाने के लिए नीचे झुका और उसने जैसे ही दो कंकड़ों को उठाया उसी समय किसान की बेटी की नज़र उस पर पड़ी। उसने देखा कि साहूकार ने दोनों काले रंग के कंकड़ थैली में रखे हैं। साहूकार ने लड़की को थैली में से एक कंकड़ निकालने को कहा। किसान की बेटी ने साहूकार के कहे अनुसार थैली में से एक कंकड़ निकाला और बिना देखे हुए जानबूझकर धीरे से उछाल दिया जिससे वह कंकड़ नीचे पड़े अन्य कंकड़ों में मिल जाए। उसके बाद लड़की ने झूठा खेद व्यक्त करते हुए कहा, “ ओह, मैं कितनी लापरवाह हूँ।” इस बात पर साहूकार लड़की पर थोड़ा क्रोधित हुआ लेकिन फिर उस लड़की ने स्थिति को संभालते हुए कहा कि चिंता न करें। आप थैली में देखें कि उसमें किस रंग का कंकड़ बचा है। इससे स्पष्ट हो जाएगा कि मैंने किस रंग का कंकड़ निकाला था। यह तो साहूकार को ज्ञात ही था कि थैली में काले रंग का कंकड़ ही होगा क्योंकि उसने दोनों कंकड़ काले रंग के ही डाले थे। इस प्रकार सिद्ध हो गया कि लड़की ने सफ़ेद कंकड़ निकाला था। ऐसी स्थिति में साहूकार चाहकर भी अपनी बेईमानी और धूर्तता को प्रकट नहीं कर सकता था। इस प्रकार लड़की ने बहुत चतुरता से अपने विरुद्ध परिस्थिति को अपने पक्ष में कर लिया।

सीख: किसी भी जटिल समस्या का समाधान सरलता से हो सकता है यदि स्थिति अनुसार हम अपनी सोच और सुलझाने के तरीक़ों को बदल लें।

संजय गुप्ता

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!!! हे शिव तेरी महिमा अपरंपार !!!

गुफा का रहस्य : अमरनाथ गुफा से जुडे हैरान कर देने वाले तथ्य !!!

भगवान शिव को समर्पित यह गुफा 12,756 फीट की उंचाई पर स्थ‌ित है। अमरनाथ की यह पब‌ित्र गु्फा श्रीनगर से 141 किमी दूर है।

गुफा लगभग 150 फीट क्षेत्र में फैली हुई है और इसकी ऊंचाई करीब 11 मीटर है। इस पब‌ित्र गुफा की खोज सोलहवीं शताब्दी के आस पास हुई है।

इस गुफा की जानकारी कश्मीर का इत‌िहास बताने वाली क‌िताब राजतंरगणी में भी क‌िया गया हैं।

भगवान श‌िंव ने अमर कथा सुनाने से पहले अपनी कई चीजों को रास्ते में छोड़ द‌िया था।

बाबा बर्फानी के दर्शन के ल‌िए प्राय: पहलगाम वाला रास्ता सबसे ज्यदा प्रचल‌ित है। लेक‌िन अमरनाथ की गुफा तक पहुंचने के ल‌िए एक और मार्ग सोनमार्ग बालटाल मार्ग से भी जाया जा सकता है।

लेक‌िन पौराण‌िक कथाओं के मुताबिक‌ भगवान श‌िंव ने गुफा तक पहुंचने के पहलगाम वाला मार्ग चुना था।

श‌िवल‌िंग से जुड़ा अद्भूत सच !!!

पब‌ित्र गुफा में बनने वाले श‌िवल‌िंग या ह‌िमल‌िंग के बनने की कहानी क‌िसी चमत्कार से कम नहीं है। आज तक व‌िज्ञान भी ह‌िमल‌िंग के बनने की गुत्थी नहीं सुलझा पाई है।

इस शिवलिंग का निर्माण गुफा की छत से पानी की बूंदों के टपकने से होता है। पानी के रुप में ग‌िरने वाली बूंदे इतनी ठंडी होती है कि नीचे गिरते ही बर्फ का रुप लेकर ठोस हो जाती है।

यह क्रम लगातार चलता रहता है और बर्फ का 12 से 18 फीट तक ऊंचा शिवलिंग बन जाता है।

जिन प्राकृतिक स्थितियों में इस शिवलिंग का निर्माण होता है वह विज्ञान के तथ्यों से विपरीत है।

विज्ञान के अनुसार बर्फ को जमने के लिए करीब शून्य डिग्री तापमान जरुरी है लेक‌िन अमरनाथ यात्रा के समय इस स्थान का तापमान शून्य से उपर होता है।

कबूतरों का रहस्य !!!

अमरनाथ गुफा में बर्फ के श‌िवल‌िंग के बाद कबूतरों के एक जोड़े की उपस्थ‌ित‌ि भी एक तरह रहस्य है। कोई नहीं जाना क‌ि ये जोड़ा क‌ितना पुराना है।

इस जोड़े के लेकर एक प्रस‌िद्ध कथा भी प्रचल‌ित है। जब भगवान श‌िव पार्वती को अमरकथा सुना रहे थे तब उस गुफा में एक कबूतर का जोड़ा भी उपस्थ‌ित था ज‌िसने वह पूरी कथा स‌ुनी और हमेशा के ल‌िए अमर हो गया।

माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है।

इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा।

  • गुफा की खोज से जुड़ी रोचक कहानी !!!

16वीं सदी में इस गुफा की खोज हुई थी। गुफा की खोज को लेकर कई कहानियां प्रचल‌ित हैं परंतु सबसे प्रचलित कहानी एक गड़रिये की है।

घाटी में रहने वाले बूटा मलिक नामक एक मुस्ल‌िम गड़रिये को किसी दिव्य पुरूष ने कोयले से भरा हुआ थैला दिया था।

थैले को लेकर जब वह घर पहुंचा तो थैले में उसे कोयले के स्थान पर सोने के सिक्के मिले।

खुशी के मारे वह दौड़ता हुआ उसी स्थान पर गया जहां उसे दिव्य पुरूष मिले थे।

उस स्थान पर पहुंचकर बूटा मलिक को वह दिव्य पुरूष नहीं मिले परंतु यह गुफा और शिवलिंग मिला।

इस खोज का श्रेय इस मुस्ल‌िम गड़र‌िए को जाता है।

आज भी चढ़ावे का चौथाई उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है।

          !!! हर हर महादेव !!!

संजय गुप्ता