Posted in संस्कृत साहित्य

मित्रोआज रविवार है, आज हम आपको भगवान सूर्य के बारे में बतायेगें,,,,,,

भुवन भास्कर भगवान सूर्यनारायण प्रत्यक्ष देवता हैं, प्रकाश रूप हैं। उपनिषदों में भगवान सूर्य के ‍तीन रूप माने गए हैं- (1) निर्गुण, निराकार, (2) सगुण निराकार तथा (3) सगुण साकार। यद्यपि सूर्य निर्गुण निराकार हैं तथा अपनी माया शक्ति के संबंध में सगुण आकार भी हैं।

वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, यह आज एक सर्वमान्य सत्य है। वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता धर्ता मानते थे। सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक.यह सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी है। ऋग्वेद के देवताओं कें सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद ने “चक्षो सूर्यो जायत” कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है।

छान्दोग्यपनिषद में सूर्य को प्रणव निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उतपत्ति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है। और उन्ही को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है।

सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नही कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी। बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र तत्र सूर्य मन्दिरों का नैर्माण हुआ। भविष्य पुराण में ब्रह्मा विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा एवं मन्दिर निर्माण का महत्व समझाया गया है।

अनेक पुराणों में यह आख्यान भी मिलता है, कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्री कृष्ण पुत्र साम्ब ने सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति पायी थी। प्राचीन काल में भगवान सूर्य के अनेक मन्दिर भारत में बने हुए थे। उनमे आज तो कुछ विश्व प्रसिद्ध हैं। वैदिक साहित्य में ही नही आयुर्वेद, ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है।

उपनिषदों में सूर्य के स्वरूप का मार्मिक वर्णन है:- ‘जो ये भगवान सूर्य आकाश में तपते हैं उनकी उपासना करनी चाहिए।’ भविष्य पुराण के ब्रह्मपर्व (अध्याय 48/ 21-28) में भगवान बासुदेव ने साम्ब को उनकी जिज्ञासा का उत्तर देते हुए कहा है- सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। वे इस समस्त जगत के नेत्र हैं। इन्हीं से दिन का सृजन होता है।

इनसे अधिक निरंतर रहने वाला कोई देवता नहीं है। इन्हीं से यह जगत उत्पन्न होता है और अंत समय में इन्हीं में लय को प्राप्त होता है। कृत ‍आदि लक्षणों वाला यह काल भी दिवाकर ही कहा गया है। जितने भी ग्रह-नक्षत्र, करण, योग, राशियां, आदित्य गण, वसुगण, रुद्र, अश्विनी कुमार, वायु, अग्नि, शुक्र, प्रजापति, समस्त भूर्भुव: स्व: आदि लोक, संपूर्ण नग (पर्वत), नाग, नदियां, समुद्र तथा समस्त भूतों का समुदाय है, इन सभी के हेतु दिवाकर ही हैं।

इन्हीं से यह जगत स्थित रहता है, अपने अर्थ में प्रवृत्त होता तथा चेष्टाशील होता हुआ दिखाई पड़ता है। इसके उदय होने पर सभी का उदय होता है और अस्त होने पर सभी अस्तगत हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि इनसे श्रेष्ठ देवता न हुए हैं, न भविष्य में होंगे।

अत: समस्त वेदों में वे परमात्मा के नाम से पुकारे जाते हैं। इतिहास और पुराणों में इन्हें ‘अंतरात्मा’ नाम से अभिहित किया गया है, जैसे भगवान विष्णु का स्थान वैकुंठ, भूतभावन शंकर का कैलाश तथा चतुर्मुख ब्रह्मा का स्थान ब्रह्मलोक है। वैसे ही भुवन भास्कर सूर्य का स्थान आदित्यलोक सूर्य मंडल है।

प्राय: लोग सूर्य मंडल और सूर्यनारायण को एक ही मानते हैं। सूर्य ही कालचक्र के प्रणेता हैं, सूर्य से ही दिन-रात्रि, घटी, पल, मास, अयन तथा संवत् आदि का विभाग होता है। सूर्य संपूर्ण संसार के प्रकाशक हैं। इनके बिना सब अंधकार है। सूर्य ही जीवन, तेज, ओज, बल, यश, चक्षु, आत्मा और मन हैं।

आदित्य लोक में भगवान सूर्यनारायण का साकार विग्रह है। वे रक्तकमल पर विराजमान हैं, उनकी चार भुजाएं हैं। वे सदा दो भुजाओं में पद्म धारण किए रहते हैं और दो हाथ अभय तथा वरमुद्रा से सुशोभित हैं। वे सप्ताश्वयुक्त रथ में स्‍थित हैं।

जो उपासक ऐसे उन भगवान सूर्य की उपासना करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल प्राप्त होता है। उपासक के सम्मुख उपस्थित होकर भगवान सूर्य स्वयं अपने उपासक की इच्छापूर्ति करते हैं। उनकी कृपा से मनुष्य के मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि,,,,,

‘मानसं वाचिकं वापि कायजं यच्च दुष्कृतम्।’
सर्व सूर्य प्रसादेन तदशेषं व्यपोहति।।’

भगवान सूर्य अजन्मा है फिर भी एक जिज्ञासा होती है कि इनका जन्म कैसे हुआ। कहां हुआ और किसके द्वारा हुआ। परमात्मा का अवतार तो होता ही है। इस संबंध में पुराण में एक कथा प्राप्त होती है।

एक बार संग्राम में दैत्य-दावनों ने मिलकर देवताओं को हरा दिया, तबसे देवता अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा में सतत प्रयत्नशील थे। देवताओं की माता अदिति प्रजापति दक्ष की कन्या थीं। उनका विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था।

अपने पुत्रों की हार से अत्यंत दुखी होकर वे सूर्य उपासना करने लगीं- ‘हे भक्तों पर कृपा करने वाले प्रभो! मेरे पुत्रों का राज्य एवं यज्ञ दैत्यों एवं दानवों ने छीन लिया है। आप अपने अंश से मेरे गर्भ द्वारा प्रकट होकर पुत्रों की रक्षा करें।’

भगवान सूर्य प्रसन्न होकर ‘देवी! मैं तुम्हारे पुत्रों की रक्षा करूंगा, अपने हजारवें अंश से तुम्हारे गर्भ से प्रकट होकर’ इतना कहकर अंतर्ध्यान हो गए। समय पाकर भगवान सूर्य का जन्म अदिति के गर्भ से हुआ। इस अवतार को मार्तण्ड के नाम से पुकारा जाता है। देवतागण भगवान सूर्य को भाई के रूप में पाकर बहुत प्रसन्न हुए।

अग्नि पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्माजी का जन्म हुआ। ब्रह्माजी के पुत्र का नाम मरीचि है। मरीचि से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ। ये महर्षि कश्यप ही सूर्य के पिता हैं।

संजय गुप्ता

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