Posted in महाभारत - Mahabharat

श्री कृष्ण अपनी शिक्षा ग्रहण करने आवंतिपुर (उज्जैन) गुरु सांदीपनि के आश्रम में गए थे। जहां वो मात्र 64 दिन रहे थे। वहां पर उन्होंने ने मात्र 64 दिनों में ही अपने गुरु से 64 कलाओं की शिक्षा हासिल कर ली थी। दरअसल, श्री कृष्ण भगवान के अवतार थे और ये कलाएं उन को पहले से ही आती थी। मगर उनका जन्म एक साधारण इंसान के रूप में हुआ था इसलिए उन्होंने गुरु के पास जाकर इन्हें सीखा।
1- नृत्य – नाचना
2- वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3- गायन विद्या – गायकी।
4- नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5- इंद्रजाल- जादूगरी
6- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7- सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना
8- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10- बच्चों के खेल
11- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12- मंत्रविद्या
13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
14- रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना
15- कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
16- सांकेतिक भाषा बनाना
17- जल को बांधना।
18- बेल-बूटे बनाना
19- चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)
20- फूलों की सेज बनाना।
21- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22- वृक्षों की चिकित्सा
23- भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24- उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26- गलीचे, दरी आदि बनाना
27- बढ़ई की कारीगरी
28- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29- तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30- हाथ की फूर्ती के काम
31- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33- द्यू्त क्रीड़ा
34- समस्त छन्दों का ज्ञान
35- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37- कपड़े और गहने बनाना
38- हार-माला आदि बनाना
39- विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40-कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना – स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।
41- कठपुतली बनाना, नाचना
42- प्रतिमा आदि बनाना
43- पहेलियां बूझना
44- सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 – बालों की सफाई का कौशल
46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47- कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके।
49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 – सोना-चांदी आदि बना लेना
51 – मणियों के रंग को पहचानना
52- खानों की पहचान
53- चित्रकारी
54- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55- शय्या-रचना
56- मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57- कूटनीति
58- ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई
59- नई-नई बातें निकालना
60- समस्यापूर्ति करना
61- समस्त कोशों का ज्ञान
62- मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63-छल से काम निकालना
64- कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।

जय श्री कृष्ण..

संजय गुप्ता

Posted in संस्कृत साहित्य

मित्रोआज रविवार है, आज हम आपको भगवान सूर्य के बारे में बतायेगें,,,,,,

भुवन भास्कर भगवान सूर्यनारायण प्रत्यक्ष देवता हैं, प्रकाश रूप हैं। उपनिषदों में भगवान सूर्य के ‍तीन रूप माने गए हैं- (1) निर्गुण, निराकार, (2) सगुण निराकार तथा (3) सगुण साकार। यद्यपि सूर्य निर्गुण निराकार हैं तथा अपनी माया शक्ति के संबंध में सगुण आकार भी हैं।

वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, यह आज एक सर्वमान्य सत्य है। वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता धर्ता मानते थे। सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक.यह सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी है। ऋग्वेद के देवताओं कें सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद ने “चक्षो सूर्यो जायत” कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है।

छान्दोग्यपनिषद में सूर्य को प्रणव निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उतपत्ति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है। और उन्ही को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है।

सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नही कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी। बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र तत्र सूर्य मन्दिरों का नैर्माण हुआ। भविष्य पुराण में ब्रह्मा विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा एवं मन्दिर निर्माण का महत्व समझाया गया है।

अनेक पुराणों में यह आख्यान भी मिलता है, कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्री कृष्ण पुत्र साम्ब ने सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति पायी थी। प्राचीन काल में भगवान सूर्य के अनेक मन्दिर भारत में बने हुए थे। उनमे आज तो कुछ विश्व प्रसिद्ध हैं। वैदिक साहित्य में ही नही आयुर्वेद, ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है।

उपनिषदों में सूर्य के स्वरूप का मार्मिक वर्णन है:- ‘जो ये भगवान सूर्य आकाश में तपते हैं उनकी उपासना करनी चाहिए।’ भविष्य पुराण के ब्रह्मपर्व (अध्याय 48/ 21-28) में भगवान बासुदेव ने साम्ब को उनकी जिज्ञासा का उत्तर देते हुए कहा है- सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। वे इस समस्त जगत के नेत्र हैं। इन्हीं से दिन का सृजन होता है।

इनसे अधिक निरंतर रहने वाला कोई देवता नहीं है। इन्हीं से यह जगत उत्पन्न होता है और अंत समय में इन्हीं में लय को प्राप्त होता है। कृत ‍आदि लक्षणों वाला यह काल भी दिवाकर ही कहा गया है। जितने भी ग्रह-नक्षत्र, करण, योग, राशियां, आदित्य गण, वसुगण, रुद्र, अश्विनी कुमार, वायु, अग्नि, शुक्र, प्रजापति, समस्त भूर्भुव: स्व: आदि लोक, संपूर्ण नग (पर्वत), नाग, नदियां, समुद्र तथा समस्त भूतों का समुदाय है, इन सभी के हेतु दिवाकर ही हैं।

इन्हीं से यह जगत स्थित रहता है, अपने अर्थ में प्रवृत्त होता तथा चेष्टाशील होता हुआ दिखाई पड़ता है। इसके उदय होने पर सभी का उदय होता है और अस्त होने पर सभी अस्तगत हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि इनसे श्रेष्ठ देवता न हुए हैं, न भविष्य में होंगे।

अत: समस्त वेदों में वे परमात्मा के नाम से पुकारे जाते हैं। इतिहास और पुराणों में इन्हें ‘अंतरात्मा’ नाम से अभिहित किया गया है, जैसे भगवान विष्णु का स्थान वैकुंठ, भूतभावन शंकर का कैलाश तथा चतुर्मुख ब्रह्मा का स्थान ब्रह्मलोक है। वैसे ही भुवन भास्कर सूर्य का स्थान आदित्यलोक सूर्य मंडल है।

प्राय: लोग सूर्य मंडल और सूर्यनारायण को एक ही मानते हैं। सूर्य ही कालचक्र के प्रणेता हैं, सूर्य से ही दिन-रात्रि, घटी, पल, मास, अयन तथा संवत् आदि का विभाग होता है। सूर्य संपूर्ण संसार के प्रकाशक हैं। इनके बिना सब अंधकार है। सूर्य ही जीवन, तेज, ओज, बल, यश, चक्षु, आत्मा और मन हैं।

आदित्य लोक में भगवान सूर्यनारायण का साकार विग्रह है। वे रक्तकमल पर विराजमान हैं, उनकी चार भुजाएं हैं। वे सदा दो भुजाओं में पद्म धारण किए रहते हैं और दो हाथ अभय तथा वरमुद्रा से सुशोभित हैं। वे सप्ताश्वयुक्त रथ में स्‍थित हैं।

जो उपासक ऐसे उन भगवान सूर्य की उपासना करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल प्राप्त होता है। उपासक के सम्मुख उपस्थित होकर भगवान सूर्य स्वयं अपने उपासक की इच्छापूर्ति करते हैं। उनकी कृपा से मनुष्य के मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि,,,,,

‘मानसं वाचिकं वापि कायजं यच्च दुष्कृतम्।’
सर्व सूर्य प्रसादेन तदशेषं व्यपोहति।।’

भगवान सूर्य अजन्मा है फिर भी एक जिज्ञासा होती है कि इनका जन्म कैसे हुआ। कहां हुआ और किसके द्वारा हुआ। परमात्मा का अवतार तो होता ही है। इस संबंध में पुराण में एक कथा प्राप्त होती है।

एक बार संग्राम में दैत्य-दावनों ने मिलकर देवताओं को हरा दिया, तबसे देवता अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा में सतत प्रयत्नशील थे। देवताओं की माता अदिति प्रजापति दक्ष की कन्या थीं। उनका विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था।

अपने पुत्रों की हार से अत्यंत दुखी होकर वे सूर्य उपासना करने लगीं- ‘हे भक्तों पर कृपा करने वाले प्रभो! मेरे पुत्रों का राज्य एवं यज्ञ दैत्यों एवं दानवों ने छीन लिया है। आप अपने अंश से मेरे गर्भ द्वारा प्रकट होकर पुत्रों की रक्षा करें।’

भगवान सूर्य प्रसन्न होकर ‘देवी! मैं तुम्हारे पुत्रों की रक्षा करूंगा, अपने हजारवें अंश से तुम्हारे गर्भ से प्रकट होकर’ इतना कहकर अंतर्ध्यान हो गए। समय पाकर भगवान सूर्य का जन्म अदिति के गर्भ से हुआ। इस अवतार को मार्तण्ड के नाम से पुकारा जाता है। देवतागण भगवान सूर्य को भाई के रूप में पाकर बहुत प्रसन्न हुए।

अग्नि पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्माजी का जन्म हुआ। ब्रह्माजी के पुत्र का नाम मरीचि है। मरीचि से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ। ये महर्षि कश्यप ही सूर्य के पिता हैं।

संजय गुप्ता

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☘झुठा☘
“मम्मी , मम्मी ! मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नही जाउँगा ना ही उसके साथ वापस आउँगा।”मेरे दस वर्ष के बेटे ने गुस्से से अपना स्कुल बैग फेकतै हुए कहा तो मैं बुरी तरह से चौंक गई।
यह क्या कह रहा है? अपनी दादी को बुढिया क्यों कह रहा है? कहाँ से सीख रहा है इतनी बदतमीजी? मैं सोच ही रही थी कि बगल के कमरे से उसके चाचा बाहर निकले और पुछा-“क्या हुआ बेटा?”
उसने फिर कहा -“चाहे कुछ भी हो जाए मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नहीं जाउँगा। हमेशा डाँटती है और मेरे दोस्त भी मुझे चिढाते हैं।”
घर के सारे लोग उसकी बात पर चकित थे।
घर मे बहुत सारे लोग थे। मैं और मेरे पति,दो देवर और देवरानी , एक ननद , ससुर और नौकर भी।
फिर भी मेरे बेटे को स्कुल छोडने और लाने की जिम्मेदारी उसके दादी की थी। पैरों मे दर्द रहता था पर पोते के प्रेम मे कभी शिकायता नही करती थी।बहुत प्यार करती थी उसको क्योंकि घर का पहला पोता था।
पर अचानक बेटे के मुँह से उनके लिए ऐसे शब्द सुन कर सबको बहुत आश्चर्य हो रहा था। शाम को खाने पर उसे बहुत समझाया गया पर बह अपनी जिद पर अडा रहा
पति ने तो गुस्से मे उसे थप्पड़ भी मार दिया। तब सबने तय किया कि कल से उसे स्कुल छोडने और लेने माँजी नही जाएँगी ।

अगले दिन से कोई और उसे लाने ले जाने लगा पर मेरा मन विचलित रहने लगा कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया? मै उससे कुछ नाराज भी थी।

शाम का समय था ।मैने दुध गर्म किया और बेटे को देने के लिए उसने ढुँढने लगी।मैं छत पर पहुँची तो बेटे के मुँह से मेरे बारे मे बात करते सुन कर मेरे पैर ठिठक गये ।
मैं छुपकर उसकी बात सुनने लगी।वह अपनी दादी के गोद मे सर रख कर कह रहा था-
“मैं जानता हूँ दादी कि मम्मी मुझसे नाराज है।पर मैं क्या करता? इतनी ज्यादा गरमी मे भी वो आपको मुझे लेने भेज देते थे।आपके पैरों मे दर्द भी तो रहता है।मैने मम्मी से कहा तो उन्होंने कहा कि दादी अपनी मरजी से जाती हैं।
दादी मैंने झुठ बोला।बहुत गलत किया पर आपको परेशानी से बचाने के लिये मुझे यही सुझा।
आप मम्मी को बोल दो मुझे माफ कर दे।”
वह कहता जा रहा था और मेरे पैर तथा मन सुन्न पड़ गये थे। मुझे अपने बेटे के झुठ बोलने के पीछे के बड़प्पन को महसुस कर गर्व हो रहा था।
मैने दौड कर उसे गले लगा लिया और बोली-“नहीं , बेटे तुमने कुछ गलत नही किया।
हम सभी पढे लिखे नासमझो को समझाने का यही तरीका था।

संजय गुप्ता

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: गोपियों के श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम की एक बहुत सुन्दर कथा

द्वारका में जब भी गोपियों की बात चलती तो श्रीकृष्ण को रोमांच हो आता। आँसू बहने लगते, वाणी गद्गद् हो जाती और वे कुछ बोल नहीं पाते।

*श्रीकृष्ण की ऐसी दशा देखकर सभी पटरानियों को बड़ा आश्चर्य होता कि हममें ऐसी क्या कमी है और गोपियों में ऐसा क्या गुण है जो श्रीकृष्ण की यह दशा हो जाती है ! क्या नहीं है यहां, जो वहां है।
भगवान ने इसका उत्तर देने के लिए एक नाटक किया। वे सर्वसमर्थ हैं, कुछ भी बन सकते हैं। वे रोगी बन गए और उनका पेट दुखने लगा। सभी रानियों ने काफी दवा की पर श्रीकृष्ण के पेट का दर्द ठीक नहीं हुआ।
वैद्यजी बुलाए गए। उन्होंने पूछा–’महाराज, क्या पहले भी कभी पेट में दर्द हुआ है और कोई दवा आपने प्रयोग की हो तो बताएँ।’
भगवान ने कहा–’हां, दवा तो मैं जानता हूँ। यदि हमारा कोई प्रेमी अपने चरणों की धूल दे दे तो उस धूल के साथ हम दवा ले लें।’ रुक्मिणीजी और सत्यभामाजी ने सोचा–चरणों की धूल तो हमारे पास है ही और प्रेमी भी हम हैं ही, पर शास्त्र कहता है कि पति को चरणों की धूल देने पर पाप लगेगा और नरक में जाना पड़ेगा। अत: पाप और नरक के डर से उन्होंने चरणधूलि देने से मना कर दिया। उनको देखकर अन्य सोलह हजार रानियों व द्वारकावासियों ने भी चरणधूलि देने से मना कर दिया।
उसी समय नारदजी वहां पधारे और बोले– ’महाराज पेट दुखता है, यह कैसी माया रची है आपने?’
भगवान श्रीकृष्ण बोले–’दुखता तो बहुत है, तुम कुछ उपाय कर दो, किसी प्रेमी की चरणधूलि ला दो।’ नारदजी ने सोचा–प्रेमी तो हम भी हैं और हमारे पास भी धूल है पर जब हमसे बड़ा प्रेम का दर्जा रखने वाली रुक्मिणीजी ने ही चरणधूलि नहीं दी तो हम कैसे दे दें?
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–’नारद ! जरा व्रज में तो हो आओ।’ वीणा बजाते हरिगुणगान करते हुए नारदजी व्रज में गोप-गोपियों के बीच जा पहुँचे।
गोपियाँ बोली–’वे प्रेमी मानते हैं हमको? तो ले जाइए चरणों की धूल। जितनी चाहिए उतनी ले जाइए।’ ऐसा कहकर सब गोपियों ने अपने चरण आगे बढ़ा दिए।
जितनी मरजी हो बाँध लें महाराज ! नारदजी ने कहा–’अरे ! पागल हो गयी हो क्या, क्या कर रही हो तुम? जानती नहीं किसको धूल दे रही हो तुम, भगवान को ! नरक मिलेगा तुम्हें।’
गोपियाँ बोली–’हम भगवान तो जानती नहीं, वे तो हमारे प्राणनाथ हैं और यदि उनके पेट का दर्द अच्छा होता है तो हमें अनन्तकाल तक नरक में रहना पड़े तो भी हम नरक में रहेंगी, कभी शिकायत नहीं करेंगी। आप धूल ले जाइए और जल्दी जाइए जिससे उनके पेट का दर्द अच्छा हो जाए।’
तो वो लो राधे राधे

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारतीय शिक्षा पद्धति

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

जिन मनुष्यों में न विद्या का निवास है, न मेहनत का भाव, न दान की इच्छा, और न ज्ञान का प्रभाव, न गुणों की अभिव्यक्ति और न धर्म पर चलने का संकल्प, वे मनुष्य नहीं, वे मनुष्य रूप में जानवर ही धरती पर विचरते हैं।

मित्रो हमारे जीवन मे शिक्षा का बड़ा महत्व है। शिक्षा मनुष्य के सम्यक् विकास के लिए उसके विभिन्न ज्ञान तंतुओ को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया है, इसके द्वारा लोगों में आत्मसात करने, ग्रहण करने, रचनात्मक कार्य करने, दूसरों की सहायता करने और राष्ट्र स्वाभिमान को बढ़ाने में सहयोग देने की भावना का विकास होता है, इसका उद्देश्य व्यक्ति को परिपक्व बनाना है।

नीति शास्त्र की उक्ति है ‘‘ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः” अर्थात् ज्ञान के बगैर मनुष्य पशु के तुल्य है, ज्ञान की प्राप्ति शिक्षा या विद्या से होती है, ऋषियों की दृष्टि में विद्या वही है जो हमें अज्ञान के बंधन से मुक्त कर दे “सा विद्या सा विमुक्तये” भगवान श्री कृष्ण ने गीता में “अध्यात्म विद्यानाम्” कहकर इसी सिद्धांत का समर्थन किया है।

शिक्षा की प्रक्रिया युग सापेक्ष होती है, युग की गति और उसके नए-नये परिवर्तनों के आधार पर प्रत्येक युग में शिक्षा की परिभाषा और उद्देश्य के साथ ही उसका स्वरूप भी बदल जाता है, यह मानव इतिहास की सच्चाई है, मानव के विकास के लिए खुलते नित नये आयाम शिक्षा और शिक्षाविदों के लिए चुनौती का कार्य करते है।

उन आयामों के अनुरूप ही शिक्षा की नयी परिवर्तित-परिवर्धित रूप-रेखा की आवश्यकता होती है, शिक्षा की एक बहुत बड़ी भूमिका यह भी है कि वह अपनी संस्कृति, धर्म तथा अपने इतिहास को अक्षुण्ण बनाए रखें, जिससे की राष्ट्र का गौरवशाली अतीत भावी पीढ़ी के समक्ष द्योतित हो सके और युवा पीढ़ी अपने अतीत से कटकर न रह जायें।

वर्तमान समय में शिक्षक को चाहियें कि सामाजिक परिवर्तन को देखते हुये उच्च शिक्षा में गुणवत्ता को बनाये रखें, और केवल अक्षर एवम् पुस्तक ज्ञान का माध्यम न बनाकर शिक्षित को केवल भौतिक उत्पादन-वितरण का साधन न बनाया जायें, अपितु नैतिक मूल्यों से अनुप्राणित कर आत्मसंयम, इंद्रियनिग्रह, प्रलोभनोपेक्षा, तथा नैतिक मूल्यों का केंद्र बनाकर भारतीय समाज की सुख-शान्ति और समृध्दि को माध्यम तथा साधन बनाया जायें।

ऐसी शिक्षा निश्चित ही “स्वर्ग लोके च कामधुग् भवति” यानी कामधेनु बनकर सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली और सुख-समृध्दि तथा शान्ति का संचार करने वाली होगी, वर्तमान शिक्षा में नैतिक मूल्यों का महती आवश्यकता है, वैदिक शिक्षा प्रणाली का मानना है कि समस्त ज्ञान मनुष्य के अंतर में स्थित है।

भारतीय ऋषियों के अनुसार आत्मा ज्ञान रूप है, ज्ञान आत्मा का प्रकाश है, मनुष्य को बाहर से ज्ञान प्राप्त नहीं होता प्रत्युत आत्मा के अनावरण से ही ज्ञान का प्रकटीकरण होता है, मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है, ज्ञान मनुष्य में स्वभाव सिद्ध है कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता सब अंदर ही है।

यथार्थ में मानव शास्त्र संगत भाषा में हमें कहना चाहियें की वह अविष्कार करता है, अनावृत ज्ञान को प्रकट करता है, अतः समस्त ज्ञान चाहे वह भौतिक हो, नैतिक हो अथवा आध्यात्मिक मनुष्य की आत्मा में है, बहुधा वह प्रकाशित न होकर ढका रहता है और जब आवरण धीरे-धीरे हट जाता है तब हम कहते है कि हम सीख रहे है, जैसे-जैसे इस अनावरण की क्रिया बढ़ती जाती है हमारे ज्ञान में वृद्धि होती जाती है।

इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य नये सिरे से कुछ निर्माण करना नहीं अपितु मनुष्य में पहले से ही सुप्त शक्तियों का अनावरण और उसका विकास करना है, शिक्षा मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता का विकास है, वह शिक्षा जो जनसमुदाय को जीवन संग्राम के उपयुक्त नहीं बना सकती।

जो उनकी चारित्रिक शक्ति का विकास नहीं कर सकती, जो उनके मन में परहित भावना और शेर के समान साहस पैदा नहीं कर सकती , क्या उसे भी हम शिक्षा नाम दे सकते है? सज्जनों! सभी शिक्षाओं का, अभ्यासों का अंतिम ध्येय मनुष्य का विकास करना है, जिस अभ्यास के द्वारा मनुष्य की इच्छा शक्ति का प्रवाह और आविष्कार संयमित होकर फलदायी बन सकें।

शिक्षार्थी के जीवन में नैतिक मूल्य पूरक उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि नैतिक मूल्यों वाली उच्च शिक्षा लोगों को एक अवसर प्रदान करती है जिससे वे मानवता के सामने आज शोचनीय रूप से उपस्थित सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक मसलों पर सोच-विचार कर सकें।

अपने विशिष्ट ज्ञान और कौशल के प्रसार द्वारा उच्च शिक्षा समाज और राष्ट्रीय विकास में योगदान करती है, इस कारण हमारे अस्तित्व के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है, उच्च शिक्षा का संबंध जीवन में गुणात्मक मूल्यों के विस्तार से है, जिससे सभ्यता के विकास क्रम में अर्जित मानवता के दीर्घकालिक अनुभवों को आत्मलब्धि की दिशा में समाजीकरण के साथ अग्रसारित किया जा सके।

ऐसे अनुभवों के समुच्चय ही कालान्तर में मूल्य बनते हैं जिन्हें अपनाने की परम्परा ही संक्षेप में संस्कृति कहलाती है, और इस संस्कृति के निर्माण में एक शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका है, आज के बदलते सामाजिक परिवेश में शिक्षा, शिक्षा के प्रकार और शिक्षा प्राप्त करने के तरीकों में कई परिवर्तन आये है, जो शुभ संकेत नहीं है।

साथ ही शिक्षक की भूमिका में भी बदलाव आया है, श्रेष्ठ शिक्षक वही है जिसकी अपने विषय में गहरी पैठ हो, उसका अपने विषय पर तो अधिकार होना ही चाहिये, अध्यापन क्षमता भी उत्कृष्ट कोटि की होनी चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ ज्ञान का लाभ मिल सके।

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

राधा का अदभुत कृष्ण ज्ञान :-

एक बार कृष्ण के सखा उद्धव जी जो ज्ञान और योग सीख कर उसकी महत्ता बताने में लगे थे तब ,कृष्ण ने उन्हें एक चिट्ठी लिख कर दी जिस पर कृष्ण ने लिखा था कि ” मैं अब वापस नहीं आऊंगा तुम सभी मुझे भूल जाओ और योग में ध्यान लगाओ ” और कहा कि इसे ले जाकर ब्रज के लोगों को दिखाना और योग के महत्व से उन्हें परिचित करवाना | उद्धव जी के लिए परमब्रह्म का लिखा लेख वेद समान था वे उसे संभाले संभाले ब्रज में गए और कृष्ण विरह में व्याकुल राधा जी को वह पाती दिखाई , राधा रानी ने उसे पढ़े बिना गोपियों को दे दी और गोपियों ने उसे पढ़े बिना उसके कई टुकड़े कर आपस में बाँट लिया | उद्धव जी बबौखला गए , चिल्लाने लगे अरे मूर्खो इस पर जगदगुरु ने योग का ज्ञान लिखा है , क्या तुम कृष्ण विरह में नहीं हो जो उनका लिखा पढ़ा तक नहीं |
तब राधा जी ने उद्धव को समझाया
” उधौ तुम हुए बौरे, पाती लेके आये दौड़े…हम योग कहाँ राखें ? यहां रोम रोम श्याम है ”
अर्थात हे उधौ कृष्ण तो यहां से गए ही नहीं ? कृष्ण होंगे दुनिया के लिए योगेश्वर यहां पर तो अब भी वो धूल में सने हर घाट वृक्ष पर बंसी बजा रहे हैं | बताओ कहाँ है विरह ? यह ज्ञान आज के युग के लिए एक मार्ग दर्शन है , जब कि हम कृष्ण को आडम्बरों में खोजते हैं |
क्यों नहीं हो पाया राधा कृष्ण का भौतिक मिलन :-
मथुरा जाते समय राधा रानी ने कृष्ण का रास्ता रोका था , मगर कृष्ण ने उन्हें समझाया था कि यदि मैं तुमसे बंध गया तो मेरे जन्म का प्रायोजन व्यर्थ चला जाएगा, जगत में पाप और अधर्म का साम्राज्य फैलता ही जाएगा | मैं प्रेमी बनकर संहार नहीं साध सकता , मैं ब्रज में रहकर युद्ध नहीं रचा सकता , मैं बांसुरी बजाते हुए चक्र धारण नहीं कर सकता | और यह सत्य भी है कि राधा से विरह के बाद कृष्ण ने कभी बांसुरी को हाथ नहीं लगाया | कृष्ण ने मथुरा जाते समय राधा से साथ चलने को कहा था , किन्तु राधा भी कृष्ण की गुरु थीं , वे समझ सकती थीं कि जिसे संसार को मोह से मुक्ति का पथ सिखाना है , उसे मोह में बाँध कर मैं समय चक्र को नहीं रोकूंगी | और उन्होंने कृष्ण से वचन लिया कि वे जब अपने जन्म -अवतार के सभी उद्देश्यों को पूर्ण कर लें तब लौट आएं , और ऐसा हुआ भी कृष्ण अपने जन्म के सभी प्रायोजनों को पूर्ण कर , और अपने अवतार के कर्तव्य से मुक्त हो सदैव राधा के हो गए | वे अब ना द्वारिका में मिलते हैं, और ना ही कुरुक्षेत्र में , वे तो आज भी ब्रज की भूमि पर राधा रानी के साथ धूल उड़ाते दौड़ते जाते हैं…दूर तक

राधे राधे🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

संजय गुप्त

Posted in संस्कृत साहित्य

🕉 जय गुरुदेव 🕉

जानिए पौराणिक काल के चौबीस चर्चित श्राप और उनके पीछे के रहस्य,विस्तृत प्रस्तुति,,,,,

हिन्दू पौराणिक ग्रंथो में अनेको अनेक श्रापों का वर्णन मिलता है। हर श्राप के पीछे कोई न कोई कहानी जरूर मिलती है। आज हम आपको हिन्दू धर्म ग्रंथो में उल्लेखित 24 ऐसे ही प्रसिद्ध श्राप और उनके पीछे के रहस्य बताएँगे।

  1. युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप : – महाभारत के शांति पर्व के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।
  2. ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप : – महाभारत के अनुसार एक बार राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। उन्होंने वहां हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई।

  3. माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप : – महाभारत के अनुसार माण्डव्य नाम के एक ऋषि थे। राजा ने भूलवश उन्हें चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया।

तब ऋषि यमराज के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 12 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा।

तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 12 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण यमराज ने महात्मा विदुर के रूप में जन्म लिया।

  1. नंदी का रावण को श्राप : – वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।
  • कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप : – महाभारत के अनुसार ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है।

  • कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे।

    1. उर्वशी का अर्जुन को श्राप :- महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भांति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा।
  • तुलसी का भगवान विष्णु को श्राप :- शिवपुराण के अनुसार शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था। उसकी पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी पतिव्रता थी, जिसके कारण देवता भी शंखचूड़ का वध करने में असमर्थ थे। देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का शील भंग कर दिया। तब भगवान शंकर ने शंखचूड़ का वध कर दिया। यह बात जब तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु की पूजा शालीग्राम शिला के रूप में की जाती है।

  • श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप :- पाण्डवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने शासन किया। उसके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए। तब उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए, जो मौन अवस्था में थे। राजा परीक्षित ने उनसे बात करनी चाहिए, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जबाव नहीं दिया।

  • ये देखकर परीक्षित बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने एक मरा हुआ सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यह बात जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने श्राप दिया कि आज से सात दिन बात तक्षक नाग राजा परीक्षित को डंस लेगा, जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी।

    1. राजा अनरण्य का रावण को श्राप :- वाल्मीकि रामायण के अनुसार रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुई। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई। मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा। इन्हीं के वंश में आगे जाकर भगवान श्रीराम ने जन्म लिया और रावण का वध किया।
  • परशुराम का कर्ण को श्राप : – महाभारत के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे। सूर्यपुत्र कर्ण उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम को अपना परिचय एक ब्राह्मण के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे, उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए, ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया।

  • नींद से उठने पर जब परशुराम ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण ब्राह्मण नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे।

    1. तपस्विनी का रावण को श्राप : – वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था। तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, जो भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी।
  • गांधारी का श्रीकृष्ण को श्राप : – महाभारत के युद्ध के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण गांधारी को सांत्वना देने पहुंचे तो अपने पुत्रों का विनाश देखकर गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार पांडव और कौरव आपसी फूट के कारण नष्ट हुए हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने बंधु-बांधवों का वध करोगे। आज से छत्तीसवें वर्ष तुम अपने बंधु-बांधवों व पुत्रों का नाश हो जाने पर एक साधारण कारण से अनाथ की तरह मारे जाओगे। गांधारी के श्राप के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण के परिवार का अंत हुआ।

  • महर्षि वशिष्ठ का वसुओं को श्राप :- महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह पूर्व जन्म में अष्ट वसुओं में से एक थे। एक बार इन अष्ट वसुओं ने ऋषि वशिष्ठ की गाय का बलपूर्वक अपहरण कर लिया। जब ऋषि को इस बात का पता चला तो उन्होंने अष्ट वसुओं को श्राप दिया कि तुम आठों वसुओं को मृत्यु लोक में मानव रूप में जन्म लेना होगा और आठवें वसु को राज, स्त्री आदि सुखों की प्राप्ति नहीं होगी। यही आठवें वसु भीष्म पितामह थे।

  • शूर्पणखा का रावण को श्राप : – वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।

  • ऋषियों का साम्ब को श्राप : – महाभारत के मौसल पर्व के अनुसार एक बार महर्षि विश्वामित्र, कण्व आदि ऋषि द्वारका गए। तब उन ऋषियों का परिहास करने के उद्देश्य से सारण आदि वीर कृष्ण पुत्र साम्ब को स्त्री वेष में उनके पास ले गए और पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से क्या उत्पन्न होगा। क्रोधित होकर ऋषियों ने श्राप दिया कि श्रीकृष्ण का ये पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए लोहे का एक भयंकर मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा समस्त यादव कुल का नाश हो जाएगा।

  • दक्ष का चंद्रमा को श्राप : – शिवपुराण के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से करवाया था। उन सभी पत्नियों में रोहिणी नाम की पत्नी चंद्रमा को सबसे अधिक प्रिय थी। यह बात अन्य पत्नियों को अच्छी नहीं लगती थी। ये बात उन्होंने अपने पिता दक्ष को बताई तो वे बहुत क्रोधित हुए और चंद्रमा को सभी के प्रति समान भाव रखने को कहा, लेकिन चंद्रमा नहीं माने। तब क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया।

  • माया का रावण को श्राप :- रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपनी बातों में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया।

  • इस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासना युक्त होकर मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया। इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।

    1. शुक्राचार्य का राजा ययाति को श्राप : – महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार राजा ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ था। देवयानी की शर्मिष्ठा नाम की एक दासी थी। एक बार जब ययाति और देवयानी बगीचे में घूम रहे थे, तब उसे पता चला कि शर्मिष्ठा के पुत्रों के पिता भी राजा ययाति ही हैं, तो वह क्रोधित होकर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गई और उन्हें पूरी बात बता दी। तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने ययाति को बूढ़े होने का श्राप दे दिया था।
  • ब्राह्मण दंपत्ति का राजा दशरथ को श्राप :- वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार जब राजा दशरथ शिकार करने वन में गए तो गलती से उन्होंने एक ब्राह्मण पुत्र का वध कर दिया। उस ब्राह्मण पुत्र के माता-पिता अंधे थे। जब उन्हें अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया कि जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में अपने प्राणों का त्याग कर रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग के कारण ही होगी।

  • नंदी का ब्राह्मण कुल को श्राप : – शिवपुराण के अनुसार एक बार जब सभी ऋषिगण, देवता, प्रजापति, महात्मा आदि प्रयाग में एकत्रित हुए तब वहां दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर का तिरस्कार किया। यह देखकर बहुत से ऋषियों ने भी दक्ष का साथ दिया। तब नंदी ने श्राप दिया कि दुष्ट ब्राह्मण स्वर्ग को ही सबसे श्रेष्ठ मानेंगे तथा क्रोध, मोह, लोभ से युक्त हो निर्लज्ज ब्राह्मण बने रहेंगे। शूद्रों का यज्ञ करवाने वाले व दरिद्र होंगे।

  • नलकुबेर का रावण को श्राप : – वाल्मीकि रामायण के अनुसार विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूं। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूं। लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएगा।

  • श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप : – महाभारत युद्ध के अंत समय में जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया, तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम तक पहुंच गए। तब अश्वत्थामा ने पाण्डवों पर ब्रह्मास्त्र का वार किया। ये देख अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा।

  • महर्षि व्यास ने दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा और अर्जुन से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने अपने अस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी।

    यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने परीक्षित की रक्षा कर दंड स्वरुप अश्वत्थामा के माथे पर लगी मणि निकालकर उन्हें तेजहीन कर दिया और युगों-युगों तक भटकते रहने का शाप दिया था।

    1. तुलसी का श्रीगणेश को श्राप : – ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार तुलसीदेवी गंगा तट से गुजर रही थीं, उस समय वहां श्रीगणेश तप कर रहे थे। श्रीगणेश को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने श्रीगणेश से कहा कि आप मेरे स्वामी हो जाइए, लेकिन श्रीगणेश ने तुलसी से विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोधवश तुलसी ने श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप दे दिया और श्रीगणेश ने तुलसी को वृक्ष बनने का।
  • नारद का भगवान विष्णु को श्राप :- शिवपुराण के अनुसार एक बार देवऋषि नारद एक युवती पर मोहित हो गए। उस कन्या के स्वयंवर में वे भगवान विष्णु के रूप में पहुंचे, लेकिन भगवान की माया से उनका मुंह वानर के समान हो गया। भगवान विष्णु भी स्वयंवर में पहुंचे। उन्हें देखकर उस युवती ने भगवान का वरण कर लिया। यह देखकर नारद मुनि बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे स्त्री के लिए व्याकुल किया है। उसी प्रकार तुम भी स्त्री विरह का दु:ख भोगोगे। भगवान विष्णु ने राम अवतार में नारद मुनि के इस श्राप को पूरा किया।

  • .संजय गुप्ता

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    गुरु गोरखनाथ के गुरु थे परम योगी गुरु मत्स्येन्द्र नाथ । जिन्हे लोग मछिन्दर नाथ के नाम से भी जानते हैं । शायद बचपन मे आपने एक कहावत सुनी होगी कि “जाग मछिन्दर गोरख आया । ” जी हां । इन्ही की बात कर रहा हूँ । यह कहानी भी आप लोगो ने अवश्य सुनी होगी । यह कहानी गुरु और शिष्य के प्रेम की पराकाष्ठा की कहानी है
    कि एक गुरु अपने शिष्य को कितना पुत्रवत प्यार करता है और शिष्य के वियोग मे गुरु पित्रवत मरणासन्न दशा मे पहुंच जाता है । यहाँ इन दोनों ही योगियो की एक अन्य कहानी की बात करेंगे जो की कम प्रचलित है । पर है मजेदार !! ☺👌

    जैसे बालक को अपने पिता से बड़ा हीरो कोई दूसरा नही लगता और वो अपने पिता की बुराई नही सुन सकता, वैसे ही ये बात शिष्य के लिये भी लागू होती है । गुरु शिष्य के रिश्ते बिल्कुल पिता-पुत्र जैसे ही होते हैं और इसको गुरु शिष्य ही समझ सकते हैं ।
    हुआ ऐसा था कि गुरु मछिन्दर नाथ जी भ्रमण करते हुये पुर्वोत्तर भारत की यात्रा पर थे । उधर ऐसा हुआ की वहां की राज कन्या के रुप यौवन के जादू मे गिरफ़तार हो गये और उस राज कन्या से शादी कर ली । सब योगिक क्रिया भक्ति छोड़ छाड़ कर मोह माया मे पडकर और वहीं रहने लग गये । वहीं उनको उस राज कन्या से एक पुत्र की प्राप्ति भी हो गई ।

    इधर गोरख नाथ और उनके दूसरे गुरु भाईयों को दूसरे पंथ वाले ताने मारते और कहते कि ये लोग काहे के योगी हैं ? ढोंगी हैं ढोंगी । इनका गुरु मछिन्दर नाथ तो शादी करके दुनियादारी मे पडा है । यह जो गुरु की गलती शिष्यों को भुगतनी पड़ रही थी, गोरखनाथ जी को भी बहुत बुरा लगता था । यह ऐसे ही था जैसे किसी बच्चे को कोई उसके पिता के बारे मे कुछ कहे और साधू समाज मे तो आज भी इस बात्त को लेकर खून खराबा तक हो जाता है । खैर साहब .. गोरख ने अपने साथियों से चर्चा की ।
    और यह तय हुआ की – अब बहुत हो गया । गुरु मछिन्दर नाथ को वापस उस मोह जाल से निकाल
    कर लाना ही पडेगा और उनको लाने गोरख जायेंगे । क्योंकी गोरख उस समय तक महान सिद्ध
    योगी बन चुके थे । पर क्या करें ? गुरु के कारण सब बेकार । अब गोरख वहां पहुंच गये जहां गुरु मछिन्दर का महल था । सन्देश भिजवाया । पर गुरु मछिन्दर ने हर बार मिलने मे आनाकानी की । उनको लग गया था कि ये मुझको लिये बगैर वापस लौटने वाला नही है ।

    अब गोरख को वहां काफ़ी समय हो गया परंतु गोरख अपने गुरु से अपने मन की बात कह सकें,
    इतना मौका ही उनको नही मिला । मछीन्दर नाथ जी ने गोरख को सब सुख सुविधा दे रखी थी, पर जैसे ही गोरख काम की बात पर आते, वो बात पलट देते और चूँकि वो गुरु थे, अत: गोरख उनसे कुछ उल्टा सीधा भी नही बोल सकते थे । मछिन्दर तो बस सब समय उस छोटे बच्चे को ही खिलाया करते थे और महल के बाग बगीचों मे उसको लेकर घूमा करते थे ।
    महल भी बडा रमणीय था पास ही बगीचा और साथ ही बहती नदी । वहीं गुरु मछीन्दर बालक
    को लिये घूमा करते थे । उनका प्रेम अब रानी मे कम और बेटे मे ज्यादा हो गया था । गोरख इसी उधेड बुन मे रहते थे कि किसी तरह गुरु अकेले मे मिल जायें और उनको समझाने की कोशिश करें । पर मछीन्दर के साथ तो कभी रानी कभी दासियां, भरपूर महफ़िल रहती थी ।

    एक दिन ऐसा हुआ की बच्चे को लेकर मछीन्दर बगीचे मे टहल रहे थे और देव योग से अकेले ही थे और हुआ ये की राजकुमार जी हां . उनका बेटा ! उसने उनकी गोद मे मल-मूत्र त्याग दिया जिससे पिता पुत्र उसमे गंदे हो गये । अब गोरख ने देखा की
    उनके गुरु बडे प्रेम से उस बच्चे की गन्दगी साफ़ कर रहे हैं । उनको बडा आश्चर्य हुआ की ये सब गुरु जी को क्या हो गया है । वो मौका देख कर मछीन्दर नाथ के पास पहुंचे और बोले – गुरुदेव ! आप छोड़ो मै धो कर लाता हूँ राजकुमार को नदी पर । मछीन्दर नाथ ने सोचा – ठीक है तब तक मैं अपने आपको साफ़ कर लेता हूँ ।

    काफी देर हो गई और गोरख नही आये तो उनको चिंता होने लगी । इतनी देर मे गोरख उनको अकेले आते दिखाई पडे तो उनकी चिन्ता और बढ गई क्योंकि गोरख अकेले ही आये थे ।
    मछिन्दर बोले – राजकुमार कहां है गोरख ?
    गोरख – गुरुदेव उसको तो मैने धो कर सुखा दिया !
    मछिन्दर – इसका क्या मतलब ?
    गोरख बोले – गुरु जी आपने उसको धो कर लाने को कहा था और वो बुरी तरह गन्दगी मे भी सना था, सो मैने उसकी दोनों टांग पकड कर उल्टा किया और फ़िर उसको खूब सिर की तरफ़ से नदी मे डुबोया निकाला और फ़िर जैसे धोबी कपडों को पछाडता है । उस तरह मैने उसको पत्थर पर पटक पटक कर पछाड़ा, तब जाकर बड़ी मुश्किल से उसकी गन्दगी साफ़ हुई और फ़िर उसमे ज्यादा जान तो थी नही । इतना धोने के बाद केवल कुछ हड्डियां ही बाकी बची थी । सो वो सूखने के लिये वहीं एक पत्थर पर रख आया हूँ ।

    और गुरु मछिन्दर तो इतना सुनते सुनते ही पागल जैसे हो गये और उन्होने पूछा । अरे गोरख ! ये क्या किया तूने ! अरे मेरे राज कुमार ने तेरा क्या बिगाडा था ?
    हाय ! मेरा बेटा कहां है ? इस तरह प्रलाप करने लग गये और थोडी देर बाद बेहोश हो गये । अब गोरख उनको होश मे लाने का उपाय करने लगे ।

    गुरु मछिन्दर नाथ जी पुत्र वियोग मे अर्धमूर्छित से थे और इधर गोरख सोच रहे थे कि मोह माया भी क्या चीज है ? जिसने गुरु मछिन्दर नाथ जैसे महाज्ञानी की बुद्धि पर भी पत्थर पटक दिये । गोरख ने गुरु को जगाने की बडी युक्तियां की । पर सब बेकार । असल मे गोरख जानते थे की जब तक इनका मन
    पुत्र मे रहेगा, तब तक गुरु वापस नही जायेंगे और गुरु वापस नही जायेंगे, तब तक शिष्यों को दूसरे लोगो के ताने सुनने पडेंगे ।

    गुरु गोरख इतने सिद्ध महायोगी थे कि अगर किसी मरे हुये पशु की हड्डियां भी हो तो अपने योग बल से उसमे जान डाल देते थे और इन गोरखनाथ को आकाश मार्ग से यानि हवा मे उडने की सिद्धि भी प्राप्त हो चुकी थी । वे नही चाहते थे कि बालक को वापस जिन्दा किया जाये । वे तो बस किसी तरह गुरु का भ्रम तोड कर उनको वापस ले जाना चाहते थे । गुरु होश मे आये तो फ़िर उनका प्रलाप शुरु हो
    गया । तब गोरख ने लाख समझाया कि महाराज ये सब झूठी माया है आप जागो और मेरे साथ चलो । पर मछिन्दर तो जैसे पूरे मोह ममता मे डूबे थे । आखिर गोरख ने एक और पैंतरा फैंका और बोले – अगर आप चाहते हैं कि ये बालक जीवित हो जाये तो आप बदले मे क्या दे सकते हैं ?
    मछिन्दर बोले – इस बालक के एवज में मैं अपने प्राण भी दे सकता हूँ ।
    गोरख तो इसी घडी के इन्तजार में थे । उन्होने कहा की गुरु तो आप संकल्प करो इस बात का । फ़िर मैं किसी से बात करके देखता हूँ ।
    मछिन्दर बोले – गोरख, जल्दी कर ।
    कहीं इस विरह वेदना मे मेरे प्राण ही ना निकल जायें । गोरख ने मन ही मन कहा – कि वो तो मैं नही निकलने दूंगा ।

    उधर जैसे ही मछिन्दर ने संकल्प लिया वैसे ही गोरख ने उस बालक की हड्डियां इक्कठी करके उसको जिन्दा कर दिया वैसे ही मछीन्दर नाथ के तो प्राण मे प्राण लौट आये ।

    अब गोरख ने उनको इशारा किया कि अब चलो, बहुत हो गई आपकी घर गृहस्थी । अब आप शर्त हार चुके हो, अपना वचन निभाओ और अब देर मत करिए । अब मछीन्दर अनमने से वापसी के लिये तैयार होने महल चले गये । वहां उन्होनें रानी
    को सारी बात बताई । रानी भी जानती थी कि इनके शिष्य बडे पराक्रमी हैं और एक ना एक दिन तो उनको लौटना ही होगा । रानी को उनसे एक पुत्र की अभिलाषा थी, वह भी पूरी हो ही चुकी थी । सो रानी ने उन्हे विदा किया, परंतु चूँकि वो पत्नि थी
    उनकी, सो साथ मे एक पोटली मे बहुत सारा यानि पांच छह किलो सोने का एक टुकडा भी रख दिया । उसने सोचा की अब इनको फ़कीरी की आदत तो रही नही सो यह इनके रास्ते मे कहीं वक़्त बेवक़्त काम आ ही जायेगा ।

    दोनो गुरु चेले वहां से चल दिये, अब रास्ते मे कहीं जंगल मे रुकते कहीं पहाड पर । अब यहां मछीन्दर कहते, – गोरख कही आसपास बस्ती देख कर रात्री विश्राम करेंगे और गोरख को जंगल मे रुकने का मन रहता । अब गोरख को मालूम नही की इस पोटली मे माया है और इसी माया को कोई चोर डाकू ना लूट ले, इसिलिये मछिन्दर किसी ग्राम के आस पास
    रुकने की जिद्द करते ।

    गोरख ने देखा की गुरु के पास एक पोटली है वे इसको नही छोडते । आखिर इसमे है क्या ?
    सोते जागते उनका मन इस पोटली मे ही बस रहा था । आखिर है क्या ? जो गुरु इतने अनमने से चल रहे हैं । एक दिन मछिन्दर को जरा जल्दी मे शौच लग गया और वो पोटली वहीं भूल कर चले गये । पीछे से गोरख ने देखा की अरे यह तो सोना
    है । तब समझ आया कि गुरुजी क्यों अनमने हैं ? और जंगल मे रुकने से क्यों डरते हैं ।

    गोरख ने पोटली ऊठाकर पहाड से नीचे फ़ेंक दी । मछीन्दर को शौच से वापसी मे पोटली याद आयी और जल्दी जल्दी वापस आये और नजरों से इधर उधर देखना शुरु किया । संकोच वश गोरख से भी नही पूछ सके । आखिर सब जगह देखने के बाद
    उन्होने गोरख से पूछा – गोरख इधर एक पोटली थी , देखी क्या ?
    गोरख बोले – गुरुजी वो आफ़त की पोटली थी और अब आप उस आफ़त से निश्चिंत रहो । मैने वो आफ़त पहाड से नीचे फ़ेंक दी है । आप आराम से चलो, अब चोर उचक्कों का भी डर नही ।
    ना रहा बांस और अब ना बजेगी बाँसुरी ।

    इस तरह गुरु मछिन्दर नाथ जी का भ्रम टुटा । और वो वहां से वापस अपने धूने पर पहुंचकर तप मे लीन हो गये ।

    सच ही कहा गया है की मोह और माया अच्छे अच्छे ज्ञानियों की भी बुद्धि भ्रष्ट कर देती है ।

    ।।श्री गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में आदेश आदेश।।
    
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    “भगवान विष्णु पूरी करते है अपने भक्तों की मनोकामना”

    प्राचीन काल की बात है। किसी राज्य में एक बड़ा प्रतापी और दानी राजा राज करता था। वह प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखता एवं भूखे और गरीबों को दान देकर पुण्य प्राप्त करता था। परंतु यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी। वह न तो व्रत करती थी, न ही किसी को एक भी पैसा दान में देती थी और राजा को भी ऐसा करने से मना करती थी।

    एक समय की बात है, राजा शिकार खेलने के लिए वन चले गए थे। घर पर रानी और दासी थी। उसी समय गुरु बृहस्पतिदेव साधु का रूप धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने आए। साधु ने जब रानी से भिक्षा मांगी तो वह कहने लगी, हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे कि सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं।

    बृहस्पतिदेव ने कहा, हे देवी, तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से कोई दुखी होता है। अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचे का निर्माण कराओ, जिससे तुम्हारे दोनों लोक सुधरें। परंतु साधु की इन बातों से रानी को खुशी नहीं हुई। उसने कहा कि मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं है, जिसे मैं दान दूं और जिसे संभालने में मेरा सारा समय नष्ट हो जाए।

    तब साधु ने कहा- यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो मैं जैसा तुम्हें बताता हूं तुम वैसा ही करना। गुरुवार के दिन तुम घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस मदिरा खाना, कपड़ा धोबी के यहां धुलने डालना. इस प्रकार सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा समस्त धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर साधु रुपी बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए।

    साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा। तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूं, क्योंकि यहां पर सभी लोग मुझे जानते हैं। इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी।

    एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा- हे दासी, पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए। दासी रानी की बहन के पास गई। उस दिन गुरुवार था और रानी की बहन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा। उधर, रानी की बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुखी हुई होगी। कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहन के घर आई और कहने लगी- हे बहन, मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो दासी क्यों गई थी। रानी बोली- बहन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई। उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहन को विस्तारपूर्वक सूना दी। रानी की बहन बोली- देखो बहन, भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो।

    पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई। दासी रानी से कहने लगी- हे रानी, जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा। उसकी बहन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहन अपने घर को लौट गई। सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया।

    अब पीला भोजन कहां से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे। चूंकि उन्होंने व्रत रखा था इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया। उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी। तब दासी बोली- देखो रानी, तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है। रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पित्र प्रसन्न होंगे. दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा।

    संजय गुप्ता

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    किसी जंगल में एक बहुत बड़ा तालाब था . तालाब के पास एक बागीचा था , जिसमे अनेक प्रकार के पेड़ पौधे लगे थे . दूर- दूर से लोग वहाँ आते और बागीचे की तारीफ करते .
    गुलाब के पेड़ पे लगा पत्ता हर रोज लोगों को आते-जाते और फूलों की तारीफ करते देखता, उसे लगता की हो सकता है एक दिन कोई उसकी भी तारीफ करे. पर जब काफी दिन बीत जाने के बाद भी किसी ने उसकी तारीफ नहीं की तो वो काफी हीन महसूस करने लगा . उसके अन्दर तरह-तरह के विचार आने लगे—” सभी लोग गुलाब और अन्य फूलों की तारीफ करते नहीं थकते पर मुझे कोई देखता तक नहीं , शायद मेरा जीवन किसी काम का नहीं …कहाँ ये खूबसूरत फूल और कहाँ मैं… ” और ऐसे विचार सोच कर वो पत्ता काफी उदास रहने लगा.
    दिन यूँही बीत रहे थे कि एक दिन जंगल में बड़ी जोर-जोर से हवा चलने लगी और देखते-देखते उसने आंधी का रूप ले लिया. बागीचे के पेड़-पौधे तहस-नहस होने लगे , देखते-देखते सभी फूल ज़मीन पर गिर कर निढाल हो गए , पत्ता भी अपनी शाखा से अलग हो गया और उड़ते-उड़ते तालाब में जा गिरा.
    पत्ते ने देखा कि उससे कुछ ही दूर पर कहीं से एक चींटी हवा के झोंको की वजह से तालाब में आ गिरी थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी.
    चींटी प्रयास करते-करते काफी थक चुकी थी और उसे अपनी मृत्यु तय लग रही थी कि तभी पत्ते ने उसे आवाज़ दी, ” घबराओ नहीं, आओ , मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ .”, और ऐसा कहते हुए अपनी उपर बैठा लिया. आंधी रुकते-रुकते पत्ता तालाब के एक छोर पर पहुँच गया; चींटी किनारे पर पहुँच कर बहुत खुश हो गयी और बोली, ” आपने आज मेरी जान बचा कर बहुत बड़ा उपकार किया है , सचमुच आप महान हैं, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ! “
    यह सुनकर पत्ता भावुक हो गया और बोला,” धन्यवाद तो मुझे करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज पहली बार मेरा सामना मेरी काबिलियत से हुआ , जिससे मैं आज तक अनजान था. आज पहली बार मैंने अपने जीवन के मकसद और अपनी ताकत को पहचान पाया हूँ … .’
    मित्रों , ईश्वर ने हम सभी को अनोखी शक्तियां दी हैं ; कई बार हम खुद अपनी काबिलियत से अनजान होते हैं और समय आने पर हमें इसका पता चलता है, हमें इस बात को समझना चाहिए कि किसी एक काम में असफल होने का मतलब हमेशा के लिए अयोग्य होना नही है . खुद की काबिलियत को पहचान कर आप वह काम कर सकते हैं , जो आज तक किसी ने नही किया है !

    संजय गुप्ता