Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मित्रो बहुत भावुक ज्ञानवर्धक कथा है, जब भगवान शंकर को पता चलता है, कि रामावतार हो चुका है, तो वह प्रभुश्रीराम के बालरूप के दर्शन करने के लिये कागभुशुण्डि जी के साथ मनुष्य का रूप बना के अयोध्या आते हैं, आगे पढें,,,,,,,

जिस समय भगवान राम का जन्म हुआ तो चारों और उत्सव मनाया जा रहा है। भगवान शिव भी भगवान राम के बाल रूप का दर्शन करने गए थे। वही कथा पार्वती माँ को सुना रहे है। भगवान शिव कहते हैं पार्वती जिस समय भगवान का अवतरण हुआ था उस समय मुझसे रहा नही गया। मैं अपने मन को रोक नही पाया और तुरंत अवधपुरी पहुंच गया। मेरी चोरी ये थी की मैंने तुमको नही बताया। भगवान ये कहना चाह रहे हैं की जब भगवान का बुलावा आये तो किसी का इंतजार मत करना। और एक मानव रूप धारण कर लिया।

पार्वती बोली की आप महादेव हो। और मानव बनकर क्यों गए?

भगवान शिव बोले हैं की जब महादेव के देव भी मानव बनकर आ सकते हैं तो मैं मानव ना बनूँ तो ये कैसे हो सकता हैं?

जैसे ही अयोध्या में पहुंचा हुईं बहुत भीड़ लगी हुई हैं। भोलेनाथ बहुत प्रयास कर रहे हैं राम जी के दर्शन करने का। लेकिन नही जा पा रहे हैं। शिव ने थोड़ी ताकत लगाई हैं। और थोड़ा धक्का दिया हैं। जैसे ही शिव ने धक्का दिया हैं तो अंदर से ऐसा धक्का आया हैं की भोले नाथ दूर जाकर मंदिर के एक शिवलिंग के पास टकराकर गिर गए हैं।

भोलेनाथ बोले की ये लो, हो गए दर्शन। राम के तो हुए नही पर मेरे खुद के हो गए।

भोलेनाथ ने सोचा की ऐसी भीड़ में दर्शन कैसे हो? तब भोलेनाथ को याद आई मेरा एक चेला हैं वो दिखाई नही दे रहा हैं। यहीं कहीं ही होगा। वो चेला हैं काकभुशुण्डि जी महाराज। सोच रहे हैं की भगवान का दर्शन करने जरूर आये होंगे। जैसे ही भोलेनाथ ने इन्हे याद किया हैं तो काकभुशुण्डि जी तुरंत आ गए हैं। क्योंकि कौवे के रूप में हैं।

भोलेनाथ को कहते हैं महादेव कैसे बुलाया हैं। जल्दी बताइये।

भोलेनाथ बोले की जल्दी बताऊ। पर क्यू? कहाँ जाना हैं?

काकभुशुण्डि जी बोले की तुम्हारे पीछे उत्सव छोड़ कर आया हूँ।

शिव जी बोले की तुम कहाँ थे?

उसने कहा की प्रभु मैं तो अंदर ही था। दशरथ जी खूबआनन्द लूटा रहे हैं। बड़ा आनंद हो रहा हैं।

भगवान शिव बोले की बढ़िया हैं। मानव को तो भीड़ के कारण रोक सकते हैं पर कौवे को कौन रोकेगा। वाह! चेला आनंद ले रहा हैं और गुरु यहाँ बैठा हैं।

भोलेबाबा कहते हैं की चेला जी कोई युक्ति बताइये, हमे भी दर्शन करवाइये।

काकभुशुण्डि जी ने कहा की महाराज चलो कोई युक्ति बनाते हैं।

काकभुशुण्डि ने भी मानव रूप धारण कर लिया। बहुत बार प्रयास किया हैं लेकिन इन्हे अंदर नही जाने दिया। अब जब काफी समय हुआ तो भगवान राम ने भी रोना शुरू कर दिया। इनके मन में भी भोले बाबा के दर्शन करने की तड़प जाग गई हैं। अब राम जी दुःख में तड़प कर रो रहे हैं। और जब ये पीड़ा भरी पुकार मैया के कानों में गई हैं तो कौसल्या जी बिलख पड़ी हैं। की मेरे लाल को आज क्या हो गया हैं। इधर भोले बाबा ने भी पूरा नाटक किया है। भोले बाबा एक 80 साल के ज्योतिष बन गए हैं। गोस्वामी जी ने गीतावली में इस भाव को बताया हैं।

और स्वयं ज्योतिषी बन कर काकभुशुण्डि जी को अपना शिष्य बना लिया है और सरयू जी के किनारे बैठ गए है। जितने भी लोग रस्ते से आ-जा रहे है भगवान शिव सबके हाथ देख रहे है। और भविष्यवाणी कर रहे हैं। अब अवधपुरी में चर्चा शुरू हो गई हैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी आ गया हैं। गोस्वामी जी कह रहे हैं। अवध आजु आगमी एकु आयो।

जब भगवान राम ने रोना शुरू किया हैं तो माँ बहुत परेशान हैं। गुरु वशिष्ठ जी को खबर की गई हैं। लेकिन वशिष्ठ जी व्यस्त हैं। इतने में एक नौकर आकर बोला की मैया,” मुझे खबर मिली हैं की एक बहुत बड़ा ज्योतिषी अवध पूरी में आया हैं। आपकी आज्ञा हो तो उसे बुला लाऊँ।”

माँ तो परेशान थी। मैया ने कहा- की जाओ और जल्दी बुला कर लाओ। बस मेरे लाल का रोना बंद हो जाये।

दौड़े दौड़े सेवक गए हैं । भोले बाबा सरयू नदी के किनारे बैठे हुए हैं। नौकरों ने कहा की आप ही वो ज्योतिषी हैं जिसकी चर्चा हर जगह फैली हुई हैं।

भोले बाबा बोले तुम लोग कहाँ से आये हो?

वो बोले की हम राजभवन से आये हैं।

ये सुनते ही भोले नाथ का रोम-रोम पुलकित हो गया हैं। समझ गए हैं की मेरे राम ने ही इन्हे भिजवाया हैं।

भगवान शिव बोले की क्या करना हैं बोलो?

वो सेवक बोले की महाराज जल्दी चलिए, सुबह से लाला आज बहुत रो रहे हैं। रानी ने आपको बुलाया हैं।

भोले नाथ जैसे ही चलने लगे तो काकभुशुण्डि जी कुरता पकड़ लिया हैं। की महाराज मैं भी तो आपके साथ में हूँ। मुझे भी साथ लेके चलो।

भोले नाथ बोले की तुमने दर्शन तो कर लिए हैं। तुम जाकर क्या करोगे?

काकभुशुण्डि जी कहते हैं की मैंने दर्शन तो किया हैं पर स्पर्श नही किया हैं प्रभु का। यदि तुम स्पर्श करवाओगे तो ठीक नही हैं नही तो अभी पोल खोलता हूँ तुम्हारी। जितनी भी कृपा होगी उस पर हमे भी तो मिलनी चाहिए।

भोले नाथ बोले की ठीक हैं आपको भी दर्शन करवा देते हैं पर आप पोल मत खोलना।

जब राजभवन पर पहुंचे हैं तो पहरेदारों ने रोक लिया हैं। हाँ भैया कौन हो और कहाँ जा रहे हो?

नौकर बोले की इन्हे रानी ने बुलाया हैं। ये ज्योतिषी हैं। इन्हे अंदर जाने दो।

अब भोले बाबा राजभवन में अंदर प्रवेश करने लगे हैं पर काकभुशुण्डि जी को रोक लिया हैं। पहरेदार बोले ठीक हैं ये ज्योतिषी हैं तो अंदर जा रहे हैं पर ये साथ में कौन हैं जो अंदर चला जा रहा हैं। इनके अंदर जाने का क्या काम? दशरथ जी का आदेश हैं की किसी अनजान को अंदर नही आने देना हैं।

भोले बाबा मुस्कुरा कर अंदर जाने लगे हैं तभी काकभुशुण्डि बोले की प्रभु साथ लेके जाओ नही तो पोल खोलता हूँ अभी।

भोले बाबा बोले की ठीक हैं मैं कुछ करता हूँ। भोले बाबा कहते हैं की भैया बात ऐसी हैं। मैंने 80 साल का बूढ़ा हो गया हूँ। ज्योतिषी तो पक्का हूँ पर आँखों से कम दिखाई देता हैं। ये मेरे चेला हैं। इनके बिना मेरा काम चलेगा।

मैया बोली की करो महाराज अब जो आपको अपना झाड़-फूँक करना हैं।

भोले नाथ बोले की मैया- इतनी दूर से कुछ नही होगा। ना तो तू मुँह दिखा रही। ना तू स्पर्श करवा रही। बिना मुँह देखा और बिना स्पर्श करे मैं कुछ नही कर सकता हूँ। मुझे एक एक अंग देखना पड़ेगा की नजर कहाँ लगी हैं। नाक को लगी हैं या आँख को लगी हैं।

मैया बोली की दूर से कुछ नही होगा?
भोले नाथ बोले-मैया दूर से कुछ भी नही होगा।

आज मैया ने अपनी साडी का पल्लू उठा लिया और जो राम जी अब तक रो रहे थे भगवान शिव को देख कर खिलखिलाकर मुस्कुराने लगे हैं।

मैया बोली-महाराज आप तो कमाल के ब्राह्मण हो। आपने सिर्फ लाला को देखा ही हैं और लाला का रोना बंद कर दिया हैं।

भगवान शिव बोले की मैया अभी तो नजर पड़ी हैं और रोना बंद हो गया हैं अगर तू गोदी में दे दे तो हमेशा के लिए आनंद आ जाये।

अब मैया ने तुरंत राम जी को लेकर भोले नाथ की गोदी में दे दिया हैं। जैसे ही भगवान, भगवान शिव की गोदी में आये हैं। मानो साक्षात शिव और राम का मिलान हो गया हैं। भगवान शिव की नेत्रों से आंसू बहने लगे हैं। अब तक जिस बाल छवि का मन में दर्शन करते थे आज साक्षात दर्शन हो गए हैं। भोले नाथ कभी हाथ पकड़ते हैं, कभी गाल छूते हैं और माथा सहलाते हैं।

भगवान राम भी टुकुर-टुकुर अपनी आँखों से शिव जी को देख रहे हैं। जब थोड़ी देर हो गई तो काकभुशुण्डि जी ने पीछे से कुरता पकड़ा हैं। और कहते हैं हमारा हिस्सा भी तो दीजिये। आपने आनंद ले लिया हैं तो मुझे पर भी कृपा करो।

अब भगवान शिव जब राम को काकभुशुण्डि की गोद में देने लगे तो मैया ने रोक दिया हैं। की इनकी गोद में लाला को क्यों दे रहे हो?

भगवान शिव बोले की मैया मैं बूढ़ा हो गया हूँ ये मेरे चेला हैं। ये हाथ देखेंगे और मैं भविष्य बताऊंगा।

काकभुशुण्डि जी की गोद में लाला को दे दिया हैं। अब काकभुशुण्डि जी भी भगवान का दर्शन पा रहे हैं। और भोले नाथ ने भगवान का सारा भविष्य बताया हैं। सब बता दिया हैं की आपके लाला कोई साधारण लाला नही होंगे आपका लाला का जग में बहुत नाम होगा। आपके लाला के नाम से ही लोग भव सागर तर जायेंगे।

मैया बोली की ये सब ठीक हैं पर ये बताओ की लाला की शादी कब होगी?

भोले नाथ बोले की इतना बता सकते हैं आगे चलकर आप थोड़ा ध्यान रखना। एक बूढ़े बाबा आपके लाला को आपसे मांगने के लिए आएंगे। और जब वो मांगने आये तो तुम तुरंत दिलवा देना। मना मत करवाना। क्योंकि आपके लाला उनके साथ चले जायेंगे तो वहां से बहू लेकर ही आएंगे।

कौसल्या जी बोली की आप चिंता मत करो महाराज ये बात मेरे दिमाग में नोट हो गई हैं। मैं इसे हमेशा याद रखूंगी। इस प्रकार भोले बाबा ने सब बताया हैं।

मैया ने बोला की आपने बड़ी कृपा की हैं मेरे लाला का रोना बंद करवा दिया हैं। मेरे लाला का भविष्य बता दिया हैं। अब मेरे लाला को आशीर्वाद भी दे दीजिये।

भगवान शिव ने खूब आशीर्वाद दिया हैं। हे राम! आप जुग-जुग जियो। सबको आनंदित करो। इस प्रकार से भोले नाथ बड़ी मस्ती में राम जी को आशीर्वाद देके अपने धाम पधारते है।

भोले नाथ जी ने ये भी कहा है की इस चरित्र को सब लोग नही जान सकते। बस जिस पर राम की कृपा होगी वो ही लोग इस चरित्र को जान सकते है।

पार्वती जी कहती है महाराज हम पर राम जी की कृपा बनी हुई है तभी हम ये सब जान पाये है।

बोलिए शंकर पार्वती जी की जय !! बाल रूप श्री राम की जय !!

संजय गुप्ता

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“सच से बहुत क़रीब,,,,
एक महिला एक संत के पास गई,
“बोली स्वामी ! कोई ऐसा मंत्र लिखा तावीज़ दें
कि मेरे बच्चे रात को भूक से रोया ना करें।”
संत ने मंत्र लिखा तावीज़ दे दिया।
अगले ही रोज़ किसी ने पैसों से भरा थैला
घर के आँगन में फेंका। थैले से एक पर्चा निकला,
जिस पर लिखा था, कोई कारोबार करलें।
इस बात पर अमल करते हुवे उस औरत के पति ने
एक दुकान किराए पर ले ली। कारोबार में
बढत हुई, और दुकानें बढ़ती गईं। पैसों की
बारिश सी हो गई। पुराने संदूक़ में एक दिन
औरत की नज़र मंत्र लिखे तावीज़ पर पड़ी। “जाने
उन संत ने ऐसा क्या लिखा था?”
अचानक में उसने तावीज़ खोल डाला।
लिखा था कि
“जब पैसों की तंगी खत्म हो जाये, तो
सारा पैसा तिजोरी में छिपाने की
बजाय कुछ पैसे ऐसे घर में डाल देना जहाँ से
रात को बच्चों के भूख से रोने की आवाज़
आती हो।
❄❄

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मित्रो आप जानते हैं प्रभुश्रीराम और लक्ष्मण को मेघनाद ने युद्ध के दौरान नागपास में बांध दिया था। उस बंधन को नारदजी के कहने पर गरुड़जी ने काटा,लेकिन गरुड़जी को शंका हुई कि ये भगवान नही है। गरुड़जी के संसय को कागभुशुण्डि जी ने दूर किया।

अब कागभुशुण्डि जी गरुड़जी को बता रहे हैं, कि एक बार मुझे भी शंका हुई थी। आगे पढ़ें कागभुशुण्डि जी ने क्या कहा ??????

हे पक्षीराज गरुड़जी! श्री रघुनाथजी की प्रभुता सुनिए। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ। मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ॥

*सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥
संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥

भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी का सहज स्वभाव सुनिए। वे भक्त में अभिमान कभी नहीं रहने देते, क्योंकि अभिमान जन्म-मरण रूप संसार का मूल है और अनेक प्रकार के क्लेशों तथा समस्त शोकों का देने वाला है॥

  • ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी॥
    जिमि सिसु तन ब्रन होई गोसाईं। मातु चिराव कठिन की नाईं॥

भावार्थ:-इसीलिए कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं, क्योंकि सेवक पर उनकी बहुत ही अधिक ममता है। हे गोसाईं! जैसे बच्चे के शरीर में फोड़ा हो जाता है, तो माता उसे कठोर हदय की भाँति चिरा डालती है।

  • जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।
    ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर॥

यद्यपि बच्चा पहले (फोड़ा चिराते समय) दुःख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोग के नाश के लिए माता बच्चे की उस पीड़ा को कुछ भी नहीं गिनती ,उसकी परवाह नहीं करती और फोड़े को चिरवा ही डालती है ॥

उसी प्रकार श्री रघुनाथजी अपने दास का अभिमान उसके हित के लिए हर लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभु को भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते॥ हे गरुड़जी! श्री रामजी की कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिए। जब-जब श्री रामचंद्रजी मनुष्य शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिए बहुत सी लीलाएँ करते हैं॥

तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाल लीला को देखकर खुश होता हूँ। वहां जाकर मैं जन्म महोत्सव देखता हूँ और (भगवान्‌ की शिशु लीला में) लुभाकर पाँच वर्ष तक वहीं रहता हूँ॥ बालक रूप श्री रामचंद्रजी मेरे इष्टदेव हैं,जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभु का मुख देख-देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ॥

छोटे से कौए का शरीर धरकर और भगवान्‌ के साथ-साथ फिरकर मैं उनके तरह-तरह के बाल चरित्रों को देखा करता हूँ॥ लड़कपन में वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगन में उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ॥

भुशुण्डिजी कहने लगे- हे पक्षीराज! सुनिए, श्री रामजी का चरित्र सेवकों को सुख देने वाला है। (अयोध्या का) राजमहल सब प्रकार से सुंदर है। सुंदर आँगन का वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं।

माता को सुख देने वाले बालविनोद करते हुए श्री रघुनाथजी आँगन में विचर रहे हैं॥ भगवान का सुंदर रूप है जिसका वर्णन नही किया जा सकता है जो अद्भुत है। मरकत मणि के समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। नवीन (लाल) कमल के समान लाल-लाल कोमल चरण हैं। सुंदर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योति से चंद्रमा की कांति को हरने वाले हैं॥

तलवे में) वज्रादि (वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुंदर चिह्न हैं, चरणों में मधुर शब्द करने वाले सुंदर नूपुर हैं, उनके मुख पर काले और घुँघराले केशों की छबि छा रही है॥ राजा दशरथजी के आँगन में विहार करने वाले रूप की राशि श्री रामचंद्रजी अपनी परछाहीं देखकर नाचते हैं और मुझसे बहुत प्रकार के खेल करते हैं, जिन चरित्रों का वर्णन करते मुझे लज्जा आती है!

किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब मुझे पूआ दिखलाते थे॥ मेरे निकट आने पर प्रभु हँसते हैं और भाग जाने पर रोते हैं और जब मैं उनका चरण स्पर्श करने के लिए पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं॥

साधारण बच्चों जैसी लीला देखकर मुझे मोह (शंका) हुआ कि सच्चिदानंदघन प्रभु यह कौन (महत्त्व का) चरित्र (लीला) कर रहे हैं॥ हे पक्षीराज! मन में इतनी (शंका) लाते ही श्री रघुनाथजी के द्वारा प्रेरित माया मुझ पर छा गई। श्री रामजी ने मुझे जब भ्रम से चकित देखा, तब वे हँसे। इस बात को किसी ने नही जाना, न छोटे भाइयों ने और न माता-पिता ने ही। वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतल वाले बाल रूप श्री रामजी घुटने और हाथों के बल मुझे पकड़ने को दौड़े॥

श्री रामजी ने मुझे पकड़ने के लिए भुजा फैलाई। मैं जैसे-जैसे आकाश में दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्री हरि की भुजा को अपने पास देखता था॥ मैं ब्रह्मलोक तक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछे की ओर देखा, तो हे तात!

श्री रामजी की भुजा में और मुझमें केवल दो ही अंगुल का बीच था॥ सातों आवरणों को भेदकर जहाँ तक मेरी गति थी वहाँ तक मैं गया। पर वहाँ भी प्रभु की भुजा को (अपने पीछे) देखकर मैं व्याकुल हो गया॥ जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूँद लीं। फिर आँखें खोलकर देखते ही अवधपुरी में पहुँच गया। मुझे देखकर श्री रामजी मुस्कुराने लगे।

उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुख में चला गया। मैंने उनके पेट में बहुत से ब्रह्माण्डों के समूह देखे। वहाँ (उन ब्रह्माण्डों में) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक से एक की बढ़कर थी॥

करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चंद्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि, असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकार के जड़ और चेतन जीव देखे॥

जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मन में भी नहीं समा सकता था (अर्थात जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। मैं एक-एक ब्रह्माण्ड में एक-एक सौ वर्ष तक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा॥

प्रत्येक लोक में भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न-भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गंधर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, सर्प, -तथा नाना जाति के देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकार के थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरे ही दूसरी प्रकार की थी॥ प्रत्येक ब्रह्माण्ड में मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं।

प्रत्येक भुवन में न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकार के ही नर-नारी थे॥ दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न-भिन्न रूपों के थे। मैं प्रत्येक ब्रह्माण्ड में रामावतार और उनकी अपार बाल लीलाएँ देखता फिरता॥ मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यंत विचित्र देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डों में फिरा, पर प्रभु श्री रामचंद्रजी को मैंने दूसरी तरह का नहीं देखा॥

सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्री रघुवीर! इस प्रकार मोह रूपी पवन की प्रेरणा से मैं भुवन-भुवन में देखता-फिरता था॥

अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गए। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रम में आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया॥ फिर जब अपने प्रभु का अवधपुरी में जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेम से परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ॥

श्री रामचंद्रजी के पेट में मैंने बहुत से जगत्‌ देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किए जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान माया के स्वामी कृपालु भगवान्‌ श्री राम को देखा॥ मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोह रूपी कीचड़ से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ी में देखा। मन में विशेष मोह होने से मैं थक गया॥ मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्री रघुवीर हँस दिए। हे धीर बुद्धि गरुड़जी! सुनिए, उनके हँसते ही मैं मुँह से बाहर आ गया॥

श्री रामचंद्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकार से मन को समझाता था, पर वह शांति नहीं पाता था॥ यह (बाल) चरित्र देखकर और पेट के अंदर (देखी हुई) उस प्रभुता का स्मरण कर मैं शरीर की सुध भूल गया और हे आर्तजनों के रक्षक! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, पुकारता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। मुख से बात नहीं निकलती थी!

तदनन्तर प्रभु ने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी माया की प्रभुता (प्रभाव) को रोक लिया। प्रभु ने अपना करकमल मेरे सिर पर रखा। दीनदयालु ने मेरा संपूर्ण दुःख हर लिया॥

प्रभु की भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदय में बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने (आनंद से) नेत्रों में जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकार से विनती की॥

मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर श्री रामजी जी ने सुखदायक, गंभीर और कोमल वचन बोले- काकभुशुण्डि! तू मुझे अत्यंत प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा संपूर्ण सुखों की खान मोक्ष,ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगत्‌ में मुनियों के लिए भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें संदेह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले॥

मैंने सोचा भगवान ने सब कुछ देने की बात कही लेकिन अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही॥ भक्ति से रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फीके) हैं जैसे नमक के बिना बहुत प्रकार के भोजन के पदार्थ। भजन से रहित सुख किस काम के। ऐसा विचार कर मैं बोला- हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझ पर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मुझे आप अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य निष्काम) भक्ति दीजिये जिसे श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई विरला ही जिसे पाता है॥

‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर भगवान राम बोले- हे काक! सुन, तू स्वभाव से ही बुद्धिमान्‌ है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता? तूने सब सुखों की खान भक्ति माँग ली, जगत्‌ में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह चतुरता मुझे बहुत ही अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपा से अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदय में बसेंगे॥ माया से उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे।

हे काक! सुन, मुझे भक्त निरंतर प्रिय हैं, ऐसा विचार कर शरीर, वचन और मन से मेरे चरणों में अटल प्रेम करना॥

हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणों के समान प्यारा है। ऐसा विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझी को भज॥ तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरंतर मेरा स्मरण और भजन करते रहना।

मुझे बहुत प्रकार से भलीभाँति समझकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकों के खेल करने लगे। नेत्रों में जल भरकर और मुख को कुछ रूखा (सा) बनाकर उन्होंने माता की ओर देखा- और मुखाकृति तथा चितवन से माता को समझा दिया कि) बहुत भूख लगी है॥

यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ीं और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्री रामजी को छाती से लगा लिया। वे गोद में लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्री रघुनाथजी (उन्हीं) की ललित लीलाएँ गाने लगीं।

  • जेहि सुख लाग पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।
    अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥

भावार्थ:-जिस सुख के लिए (सबको) सुख देने वाले कल्याण रूप त्रिपुरारि शिवजी ने अशुभ वेष धारण किया, उस सुख में अवधपुरी के नर-नारी निरंतर निमग्न रहते हैं॥संजय गुप्ता

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लड़की हुई है —–

लड़की हुई है? पति ने पूछा…
पत्नी को इसी प्रश्न की उम्मीद थी, उसने उम्मीद नहीं की थी कि पति सबसे पहले उसका हाल चाल जानेगा।
पत्नी ने सिर्फ पलके झुका दी, पति इसे हाँ समझे या हाँ से ज्यादा कुछ और, लेकिन पत्नी के पलके झुका देने भर में इतनी दृढ़ता थी कि वह कह देना चाहती है कि हाँ लड़की हुई है और वह इसे पालेगी, पढ़ाएगी !
अब क्या करेगी तू? पति ने पूछा…
पालूंगी, और क्या करुँगी….
शादी कैसे करेगी ? ,
अभी तो पैदा हुई है जी , शादी के नाम पर अभी क्यों सूखने पढ़ गये आप….
तू जैसे जानती नहीं, तीन तीन बेटिया हो गयी हैं, हाथ पहले से टाइट है, शादी कोई ऐसे ही तो हो नहीं जाती ! कहा था टेस्ट करा लेते है, लेकिन सरकार भी जीने नहीं देती साली,
मन क्यों छोटा करते हैं जी आप ,भगवान् ने भेजी है, अपने आप करेगा इंतजाम, पत्नी ने दिलासा दिया…
भगवान! हा हा। भगवान ने ही कुछ करना होता तो लड़का न दे देता ! कुछ जीने का मकसद तो रहता, साले ने काम धंधे में भी ऐसी पनोती डाली है की रोटी तक पूरी नहीं होती! ऊपर से तीन तीन बेटिया और ये नंगा समाज !
पत्नी प्रसव पीड़ा भूल गयी थी, पति की पीड़ा उसे बड़ी लगने लगी एकाएक ! उसने पति की झोली में बेटी डाल दी ! कंधे पर हाथ रख कर रुंधे गले से बोली! गला घोंट देते हैं ! अभी किसी को नहीं पता की जिन्दा हुई है या मरी हुई, दाई को मैं निबट लूंगी !
पति का बदन एक दम से सन्न पड़ गया, वह कभी पत्नी के कठोर पड़ चुके चेहरे की ओर देखता तो कभी नवजात बेटी के चेहरे को ! उसने एकाएक बेटी को सीने से लगा लिया! भीतर प्रकाश का बड़ा सूरज चमकने लगा! बेटी ने पिता के कान में कह दिया था पापा आप चिंता न करें मैं आपके टाइट हाथ खोलने के लिए ही आई हूं।
पिता के सीने से लगी बेटी को देखकर पत्नी की आँखे आंसुओ से टिमटिमाने लगी,
पति ने आगे बढ़कर पत्नी के आंसू पोंछे और भीतर लम्बी सांस भर कर बोला, हम इसे पालेंगे पार्वती..!

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#एकभिखारीकीदर्दभरीकहानीएकबारअवश्य_पढ़े…

काजल स्कूल में टीचर है और हर रोज बस से अपने कॉलेज आती है और हर दिन बस स्टैंड पर एक भिखारी उसको दीखता रहता था | वह बहुत ही बूढा और लाचार था | उसको देख कर मन में यही विचार आता था की भगवान् उसको अपने पास बुला ले | उसकी आँखे काफी गंभीर थी और कुछ बोलती थी , कुछ लोग तो उसको अच्छे से बात करते थे और कुछ लोग बहुत बुरे से पेश आते थे |

समय बीतता गया एक दिन काजल को रहा नहीं गया और वह उस भिखारी के पास जाकर बोली अंकल आप को अभी भी जीने का मन करता है ? आप यहाँ भीख क्यों मांग रहे हो , भगवान से दुवा क्यों नहीं करते की आप को अपने पास बुला ले | वह भिखारी लगभग अस्सी साल का होगा , वह खुद बहुत परेसान था |

उसने काजल से उसका नाम पूछा और बोला बेटी आप क्या करती हो | उसने बताया की वह एक कॉलेज में एक टीचर है और हर रोज आप को यहाँ देखती है |वह बहुत ही प्यासा था उसने काजल से बोला पानी मिलेगा तो उसने तुरंत अपनी बोतल से उसको पानी पिलाया , पानी पीने के बाद उसने काजल से बोला – बेटा दुनिया में बचपन , जवानी और बुढापा सब को आता है | बचपन और जवानी बहुत ही अच्छी होती है लेकिन बुढ़ापा बहुत ही बुरा होता है और सब को ही आता है | इससे कोई बच नहीं सकता है , हम लोग पूरी जिन्दगी पैसा कमाने में और एक दूसरे से नफरत में गुजार देते है और लास्ट में कुछ भी नहीं जाता हमारे साथ सिवाए अपने अच्छे कर्म और ईमानदारी के | उसकी बात सुनकर काजल की आँखे नम हो गयी और वह पानी का बोतल , अपना लंच उसको देकर वहाँ से चली गयी |

दोस्तों उस भिखारी की बात एकदम सही है , हमारे साथ हमारे अच्छे करम ही जाते है न की हमारी धन दौलत | यह कहानी आप सब लोगो को कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जाकर जरूर बताये |

Sanjay gupta

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

मित्रोआज शनिवार है, आज हम आपको एक ऐसी कथा और एक ऐसे मन्दिर के बारे में बतायेगें जब शानिमहाराज को हनुमानजी के डर से बनना पड़ा स्त्री रूप, श्री कष्टभंजन देव सारंगपुर गुजरात!!!!!!

ऐसी मान्‍यता है कि, यहां के ये कष्‍टभंजन हनुमान भक्‍तों को हर कष्‍ट से मुक्ति दिलाते हैं!!!!!!

क्योंकि यहां शनि बजरंग बली के चरणों में स्त्री रूप में दर्शन देते हैं। तभी तो जो भक्त शनि प्रकोपों से परेशान होते हैं वे यहां आकर नारियल चढ़ाकर समस्त चिंताओं से मुक्ति पा जाते …

गुजरात के भावनगर के सारंगपुर में विराजने वाले कष्टभंजन हनुमान यहां महाराजाधिराज के नाम से राज करते हैं। वे सोने के सिंहासन पर विराजकर अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं। कहते हैं कि बजरंग बली के इस दर पर आकर भक्तों का हर दुख, उनकी हर तकलीफ का इलाज हो जाता है। फिर चाहे बात बुरी नजर की हो या शनि के प्रकोप से मुक्ति की।

हनुमान ने अपने बाल रूप में ही सूर्यदेव को निगल लिया था। उन्होंने राक्षसों का वध किया और लक्ष्मण के प्राणदाता भी बने । बजरंग बली ने समय-समय पर देवताओं को अनेक संकटों से निकाला। पवनपुत्र आज भी अपने इस धाम में भक्तों के कष्ट हर लेते हैं, इसलिए उन्हें कष्टभंजन हनुमान कहते हैं। हनुमान के इस इस दर पर आते ही हर कष्ट दूर हो जाता है। यहां आकर हर मनोकामना पूरी होती है।

विशाल और भव्य किले की तरह बने एक भवन के बीचों-बीच कष्टभंजन का अतिसुंदर और चमत्कारी मंदिर है।केसरीनंदन के भव्य मंदिरों में से एक कष्टभंजन हनुमान मंदिर भी है। गुजरात में अहमदाबाद से भावनगर की ओर जाते हुए करीब 175 किलोमीटर की दूरी पर कष्टभंजन हनुमान का यह दिव्य धाम है।

किसी राज दरबार की तरह सजे इस सुंदर मंदिर के विशाल और भव्य मंडप के बीच 45 किलो सोना और 95 किलो चांदी से बने एक सुंदर सिंहासन पर हनुमान विराजते हैं। उनके शीश पर हीरे जवाहरात का मुकुट है और पास ही एक सोने की गदा भी रखी है। संकटमोचन के चारों ओर प्रिय वानरों की सेना दिखती है और उनके पैरों शनिदेवजी महाराज हैं, जो संकटमोचन के इस रूप को खास बना देते हैं।

बजरंग बली के इस रूप में भक्तों की अटूट आस्था है और वे यहां दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं। मान्यता है कि पवनपुत्र का स्वर्ण आभूषणों से लदा हुआ ऐसा भव्य और दुर्लभ रूप कहीं और देखने को नहीं मिलता है। हनुमत लला की ये प्रतिमा अत्यंत प्राचीन है, तो इस रूप में अंजनिपुत्र की शक्ति सबसे निराली।

कष्टभजंन हनुमान के इस मंदिर में दो बार आरती का विधान है, पहली आरती सुबह 5.30 बजे होती है। आरती से पहले पवनपुत्र का रात्रि श्रृंगार उतारा जाता है फिर नए वस्त्र पहनाकर स्वर्ण आभूषणों से उनका भव्य श्रृंगार किया जाता है और इसके बाद वेद मंत्रों और हनुमान चालीसा के पाठ के बीच संपन्न होती है हनुमान लला की यह आरती।

बजरंग बली के इस मंदिर में वैसे तो रोजाना ही भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन मंगलवार और शनिवार को यहां लाखों भक्त आते हैं। नारियल, पुष्प और मिठाई का प्रसाद केसरीनंदन को भेंट कर प्रार्थना करते हैं। कुछ भक्त तो मात्र शनि प्रकोपों से मुक्ति के लिए यहां आते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि वो तो शनिदेव से डरते हैं लेकिन शनि देव अगर किसी से डरते हैं तो वे हैं स्वयं संकटमोचन हनुमान।

कष्टभजंन हनुमान की मंगलवार और शनिवार को विशेष आराधना होती है। भक्त अपने कष्टों और बुरी नजर के दोषों को दूर करने की कामना लेकर यहां आते हैं और मंदिर के पुजारी से बजरंग बली की पूजा करवाकर कष्टों से मुक्ति पाते हैं।

क्या है इस धाम की विशेषता??????

बजरंग बली के इस धाम को उनके अन्य मंदिरों से अलग विशेष स्थान दिलाती है उनके पैरों में विराजमान शनि की मूर्ति। क्योंकि यहां शनि बजरंग बली के चरणों में स्त्री रूप में दर्शन देते हैं। तभी तो जो भक्त शनि प्रकोपों से परेशान होते हैं वे यहां आकर नारियल चढ़ाकर समस्त चिंताओं से मुक्ति पा जाते हैं।

आप जानना चाहते होंगे कि आखिर शनिदेव को क्यों लेना पड़ा स्त्री रूप और वो क्यों हैं बजरंग बली के चरणों में।कहते हैं करीब 200 साल पहले भगवान स्वामी नारायण इस स्थान पर सत्संग कर रहे थे। स्वामी बजरंग बली की भक्ति में इतने लीन हो गए कि उन्हें हनुमान के उस दिव्य रूप के दर्शन हुए जो इस मंदिर के निर्माण की वजह बना। बाद में स्वामी नारायण के भक्त गोपालानंद स्वामी ने यहां इस सुंदर प्रतिमा की स्थापना की।

कहा जाता है कि एक समय था जब शनिदेव का पूरे राज्य पर आतंक था, लोग शनिदेव के अत्याचार से त्रस्त थे।आखिरकार भक्तों ने अपनी फरियाद बजरंग बली के दरबार में लगाई. भक्तों की बातें सुनकर हनुमान जी शनिदेव को मारने के लिए उनके पीछे पड़ गए।

अब शनिदेव के पास जान बचाने का आखिरी विकल्प बाकी था सो उन्होंने स्त्री रूप धारण कर लिया। क्योंकि उन्हें पता था कि हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी हैं और वो किसी स्त्री पर हाथ नहीं उठायेंगे। ऐसा ही हुआ, पवनपुत्र ने शनिदेव को मारने से इनकार कर दिया। लेकिन भगवान राम ने उन्हें आदेश दिया, फिर हनुमानजी ने स्त्री स्वरूप शनिदेव को अपने पैरों तले कुचल दिया और भक्तों को शनिदेव के अत्याचार से मुक्त किया।

मान्यता है बजरंग बली के इसी रूप ने शनि के प्रकोप से मुक्त किया। इसिलिए यहां की गई पूजा से शनि के समस्त प्रकोप तत्काल दूर हो जाते हैं, तभी तो दूर-दूर से भक्त यहां आते हैं और शनि की दशा से मुक्ति पाते हैं। क्योंकि भक्तों का ऐसा विश्वास है कि केसरीनंदन के इस रूप में 33 कोटि देवी देवताओं की शक्ति समाहित है।

इस हनुमान मंदिर के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा है। क्योंकि यहां भक्तों को बजरंग बली के साथ शनि देव का आशीर्वाद भी मिल जाता है। कहते हैं यहां अगर कोई भक्त नारियल चढ़ाकर अपनी कामना बोल दे तो उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती। शनि दशा से मुक्ति तो मिलती ही है साथ ही संकटमोचन का रक्षा कवच भी मिल जाता है।

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👩🏻👉🏿मन की हालत– –

एक बार एक सेठ ने पंडित जी को निमंत्रण किया पर पंडित जी का एकादशी का व्रत था तो पंडित जी नहीं जा सके पर पंडित जी ने अपने दो शिष्यो को सेठ के यहाँ भोजन के लिए भेज दिया..।

पर जब दोनों शिष्य वापस लौटे तो उनमे एक शिष्य दुखी और दूसरा प्रसन्न था!

पंडित जी को देखकर आश्चर्य हुआ और पूछा बेटा क्यो दुखी हो — क्या सेठ नेभोजन मे अंतर कर दिया ?

“नहीं गुरु जी”

क्या सेठ ने आसन मे अंतर कर दिया ?

“नहीं गुरु जी”

क्या सेठ ने दच्छिना मे अंतर कर दिया ?

“नहीं गुरु जी ,बराबर दच्छिना दी 2 रुपये मुझे और 2 रुपये दूसरे को”

अब तो गुरु जी को और भी आश्चर्य हुआ और पूछा फिर क्या कारण है ?
जो तुम दुखी हो ?

तब दुखी चेला बोला गुरु जी मे तो सोचता था सेठ बहुत बड़ा आदमी है कम से कम 10 रुपये दच्छिना देगा पर उसने 2 रुपये दिये इसलिए मे दुखी हू !!

अब दूसरे से पूछा तुम क्यो प्रसन्न हो ?

तो दूसरा बोला गुरु जी मे जानता था सेठ बहुत कंजूस है आठ आने से ज्यादा दच्छिना नहीं देगा पर उसने 2 रुपए दे दिये तो मे प्रसन्न हू …!

बस यही हमारे मन का हाल है संसार मे घटनाए समान रूप से घटती है पर कोई उनही घटनाओ से सुख प्राप्त करता है कोई दुखी होता है ,पर असल मे न दुख है न सुख ये हमारे मन की स्थिति पर निर्भर है!

इसलिए मन प्रभु चरणों मे लगाओ ,क्योकि – कामना पूरी न हो तो दुख और कामना पूरी हो जाये तो सुख पर यदि कोई कामना ही न हो तो आनंद …
जिस शरीर को लोग सुन्दर समझते हैं।
मौत के बाद वही शरीर सुन्दर क्यों नहीं लगता ?
उसे घर में न रखकर जला क्यों दिया जाता है ?
जिस शरीर को सुन्दर मानते हैं।
जरा उसकी चमड़ी तो उतार कर देखो।
तब हकीकत दिखेगी कि भीतर क्या है ?
भीतर तो बस
रक्त,
रोग,
मल
और
कचरा
भरा पड़ा है !
फिर यह शरीर सुन्दर कैसे हुआ.?

शरीर में कोई सुन्दरता नहीं है !
सुन्दर होते हैं
व्यक्ति के कर्म,
उसके विचार,
उसकी वाणी,
उसका व्यवहार,
उसके संस्कार,
और
उसका चरित्र !
जिसके जीवन में यह सब है।
वही इंसान दुनियां का सबसे सुंदर शख्स है …. !!

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ગિજુભાઈની વિવિધ બાળવાર્તાઅો

ગિજુભાઈ બધેકા
17-04-2014

[1]

ગિજુભાઈ બધેકા

ગિજુભાઈ બધેકાગિજુભાઈ બધેકાગિજુભાઈ બધેકા

બાપા-કાગડો !

એક હતો વાણિયો. વાણિયાને છ-સાત વરસનો એક છોકરો. છોકરો બહુ કાલો ને પડપૂછિયો હતો. રોજ તે બાપની સાથે દુકાને જાય અને બાપને કાંઈનું કાંઈ પૂછ્યા જ કરે. વાણિયો એટલો બધો શાંત હતો કે દીકરાને રાજી કરવા માટે જે પૂછે તેનો જવાબ આપ્યા કરે. કોઈ દિવસ ઘેલિયાને નાખુશ કરે નહિ. કોઈ દિવસ પોતે ખિજાઈ ન જાય. હંમેશાં ઘેલિયાભાઈ કહે તેમ કરે.

એક દિવસ ઘેલિયો બાપની સાથે દુકાને આવ્યો અને લાડથી બાપનો ખોળો ખૂંદવા લાગ્યો ને જે તે પૂછવા લાગ્યો. એટલામાં, દુકાનની સામે એક ઝાડ હતું. તેના પર એક કાગડો આવીને બેઠો ને ‘કો-કો’ કરવા લાગ્યો. ઘેલિયાએ કાગડાને જોયો, એટલે તેની તરફ આંગળી કરીને બાપને કહ્યું : ‘બાપા-કાગડો !’

બાપા કહે : ‘હા, ભાઈ ! કાગડો’
ફરી વાર છોકરે બાપનો હાથ પકડી કહ્યું : ‘બાપા-કાગડો !’
બાપાએ એટલી જ ધીરજથી કહ્યું : ‘હા, ભાઈ ! કાગડો’ જવાબ આપીને બાપ દુકાનના કામમાં જરા રોકાયો, એટલે વળી છોકરે બાપનો ગોઠણ હલાવી કહ્યું : ‘જુઓ તો બાપા – કાગડો !’
બાપે ધંધામાંથી ધ્યાન કાઢી ઘણી શાંતિથી કહ્યું : ‘હા, બેટા ! કાગડો.’
છોકરાને આટલાથી સંતોષ થયો નહિ. બાપ પાછો પોતાના કામમાં રોકાયો, ત્યાં તેની પાઘડી ખેંચી વળી બોલ્યો : ‘બાપા – કાગડો !’
બાપે જરા પણ ચિડાયા વિના કહ્યું : ‘હા, ભાઈ ! કાગડો – હં.’
છોકરો તો વેને ચડ્યો ને વળી બોલ્યો : ‘જુઓ તો ખરા ! બાપા – કાગડો !’
બાપે ચોપડો લખતાં લખતાં છોકરા સામે જોઈને વળી કહ્યું : ‘હા હોં, બેટા ! કાગડો. એ કાગડો છે હં.’

થોડી વાર સુધી છોકરો કાગડા સામે જોઈ રહ્યો, અને વળી ઘૂરી આવી હોય તેમ બાપનો ખભો જોરથી હલાવીને બોલ્યો : ‘બાપા-કાગડો !’
બાપે જરા પણ ગુસ્સે થયા વિના કહ્યું : ‘હા, ભાઈ ! કાગડો’
આ રીતે છોકરો તો વારેવારે બાપને ‘બાપા – કાગડો !’ ‘બાપા-કાગડો !’ એમ ચીંધતો ગયો, ને બાપ ‘હા, ભાઈ, કાગડો’ ‘હા, ભાઈ, કાગડો !’ એમ બોલતો જ રહ્યો. છેવટે છોકરો થાક્યો અને ‘બાપા-કાગડો’ બોલતો બંધ પડ્યો. બાપ વાણિયો હતો, શાણો હતો. છોકરો જેમ જેમ ‘બાપા-કાગડો !’ ‘બાપા-કાગડો’ બોલતો ગયો તેમ તેમ તે પોતાના ચોપડામાં ‘બાપા-કાગડો !’ ‘હા, ભાઈ ! કાગડો’ એ પ્રમાણે લખતો ગયો. છોકરો થાકી ગયો ત્યારે બાપે ગણી જોયું તો બરાબર એકસો વાર ‘બાપા-કાગડો’ ‘હા, ભાઈ ! કાગડો’ લખાયેલું હતું. ભવિષ્યમાં કોઈ દિવસ આ ચોપડો કામ આવશે, એમ ધારી ડાહ્યા વાણિયાએ ચોપડાને સાચવીને જૂનાં દફતરોમાં મુકાવ્યો.

આ વાતને ઘણાં વર્ષો વીતી ગયાં. વાણિયો છેક ઘરડો થઈ ગયો હતો; ને પેલો ઘેલિયો ત્રીશ વર્ષનો જુવાન થઈ ગયો હતો. ઘેલિયો તો હવે મોટો શેઠ બની રહ્યો હતો અને વેપાર ધમધોકાર ચાલતો હતો. ‘ઘેલિયો’ સઘળે ‘ઘેલાશેઠ’ ‘ઘેલાશેઠ’ થઈ પડ્યો હતો ને તેનું બધેય બહુ માન હતું. પરંતુ ઘરડો વાણિયો દુ:ખી હતો. ઘેલાશેઠ તેને બહુ દુ:ખ આપતો હતો. બાપ બહુ કંટાળ્યો, એટલે ઘેલિયાને કેવા લાડથી ઉછેર્યો હતો એ તેને યાદ આપવાનો તેણે વિચાર કર્યો. એક દિવસ ઘરડો વાણિયો લાકડીને ટેકે ટેકે દુકાને ગયો અને ઘેલાશેઠની ગાદીએ ચડીને બેઠો. બાપને જોઈને દીકરો ચિડાયો ને મનમાં બબડ્યો : ‘આ ડોસો વળી અહીં ક્યાં આવ્યો ? નકામો ટકટકાટ કરશે અને જીવ ખાશે !’

થોડી વારમાં ડોસાએ એક કાગડો જોઈ ટાઢે પેટે કહ્યું : ‘ભાઈ-કાગડો !’
ઘેલશા તો ડોસાના પ્રશ્નથી જ વિચારમાં પડ્યા અને ચિડાઈને બોલ્યા : ‘હા, બાપા ! કાગડો.’
ડોસાએ વળી કહ્યું : ‘ભાઈ-કાગડો’
ઘેલશાએ જરા વધારે ચિડાઈને અને કાંઈક તિરસ્કારથી જવાબ વાળ્યો : ‘હા, બાપા ! કાગડો.’
ડોસાએ જાણ્યું કે દીકરો ચિડાય છે. પરંતુ તે દીકરાની આંખ ઉઘાડવા જ આવ્યો હતો, તેથી પૂરેપૂરી શાંતિ રાખી ફરી બોલ્યો : ‘ભાઈ-કાગડો !’
ભાઈ તો હવે ભભૂકી ઊઠયા : ‘હા, બાપા ! કાગડો. હા, એ કાગડો છે. એમાં વારે વારે ‘ભાઈ-કાગડો !’
‘ભાઈ-કાગડો !’ એમ શું બોલ્યા કરો છો ? મને મારું કામ કરવા દો ને !’ કહીને ઘેલાશા આડું મોં કરીને પોતાને કામે લાગ્યા.

ઘરડો વાણિયો કંઈ કાચો ન હતો. તેણે ઘેલાશાનો હાથ પકડી, કાગડા તરફ આંગળી કરી ઠંડે પેટે કહ્યું : ‘ભાઈ-કાગડો !’ હવે ઘેલાશાનો મિજાજ ગયો. તેણે વિચાર્યું : ‘આ ડોસો જો ને નકામો ‘ભાઈ-કાગડો’ લવ્યા કરે છે ! નથી કાંઈ કામ કે કાજ. નવરો પડ્યો એટલે નકામો લવારો !’
તેણે ડોસા સામે જોઈ કહ્યું : ‘બાપા ! ઘેર જાઓ. અહીં તમારું શું કામ છે ? દુકાને કામકાજમાં નાહક શા માટે ડબડબ કરો છો ?’
શાંતિથી જરા હસી, કાગડા સામી આંગળી કરી, ડોસો બોલ્યો : ‘પણ, ભાઈ-કાગડો !’
‘હા, બાપા ! કાગડો – કાગડો – કાગડો ! હવે તે કેટલી વાર કાગડો ? કાગડામાં તે શું છે તે ‘કાગડો’ ‘કાગડો’ કરો છો ?’

ડોસો ફરી વાર આંગળી કરી ‘ભાઈ-કાગડો !’ એમ બોલે તે પહેલાં ઘેલા શેઠે વાણોતરને કાગડો ઉડાડી મૂકવાનું કહ્યું. કાગડાને ઉડાડી મુકાવ્યો. પછી લખતો લખતો, પોતાના મનમાં બળતો મોટેથી બબડ્યો : ‘ખરેખર, “સાઠે બુદ્ધિ નાઠી” તે બરાબર સાચું છે. આ ડોસાની બુદ્ધિ હવે છેક ગઈ છે. હવે તો ડોસો મરે તો સારું !’

ડોસાની આંખે આંસુ આવ્યાં. તેણે જૂના વાણોતરને બોલાવીને પેલો જૂનો ચોપડો કઢાવી ઘેલાશાના હાથમાં ‘બાપા – કાગડો !’ ‘હા, ભાઈ ! કાગડો’ લખેલું પાનું મૂકયું. ઘેલાશાને તેના બાળપણની સઘળી હકીકત વાણોતરે કહી સંભળાવી. ઘેલાશા તરત બધું સમજી ગયો : દીકરાએ બાપાની માફી માગી અને તે દિવસથી બાપની ખરા દિલથી ચાકરી કરવા લાગ્યો.

[2]

ભેંશ ભાગોળે

ગામડું એવું ગામ હતું. એક વાર પાદરે ભેંશો વેચાવા આવી. ગામના પટેલને થયું કે, ‘હું એક ભેંશ લઉં.’ જઈને પટલાણીને કહ્યું : ‘સાંભળ્યું કે ? – આપણે એક ભેંશ લેવી છે. આંગણે ભેંશ હોય તો સારું. છોકરાંછૈયાંને દૂધ મળે; બાકી મેળવીએ એનું દહીં થાય, ઘી થાય; ને છાશ થાય તે આડોશીપાડોશીને અપાય.

’
પટલાણી કહે : ‘એ બધું ઠીક, પણ જાડી રેડ જેવી છાશ તો હું મારાં પિયરિયાંને જ આપીશ.

’
‘તે એકલાં તારાં પિયરિયાં જ સગાં, ને મારાં સગાં તો કાંઈ નહિ, કાં ? એમ છાશ નહિ અપાય.

’
પટલાણી કહે : ‘નહિ કેમ અપાય ? અપાશે ! ઘર તો મારું ય છે ને ? ને ભેંશ તો મારી યે તે, ને તમારી યે તે. બહુ બહુ તો દૂધ તમારાં સગાંને, પણ છાશ મારાં પિયરિયાંને !’

પટેલ કહે : ‘છે ડંભો !’


પટલાણી કહે : ‘તમારાંને આપો !’


આમ કરતાં વાત વધી પડી ને પટેલ-પટલાણી લડી પડ્યાં !


એક તો પટેલ – ને એમાં વઢવાડ થઈ. પછી જોઈ લ્યો ! પરોણી લઈને પટેલે પટલાણીને સબોડી જ નાખ્યાં ! ઘરમાં હો-હો થઈ રહ્યું. આડોશીપાડોશી દોડી આવ્યાં.


‘છે શું, પટેલ ? આ શું માંડ્યું છે ?’


પટલાણી કહે : ‘જુઓ તો બાપુ – આ વાંસામાં સોળ ઊઠ્યા છે તે ! પટેલનો કાંઈ હાથ છે !


પટેલ કહે : ‘તે કો’કની જીભ ચાલે, ને કો’કનો હાથ ચાલે !’


‘પણ છે શું ? કજિયો શાનો છે ?’


‘એ તો છાશનો છે. પટેલ કે’છે કે, છાશ તારાં પિયરિયાંને નહિ ! તે નહિ શું કામ ? દૂધ ભલે ને એનાં ખાય; મારાં પિયરિયાં સુધી છાશે નહિ ? એ મારે નહિ ચાલે !’

ત્યાં તો પાછા પટેલ ખિજાયા ને પરોણી લઈને દોડ્યા. પાડોશમાં એક ઠાવકો હતો. તેણે વિચાર્યું : ‘અરે, ભેંશ તો હજી ભાગોળે છે, ને આ ધમરોળ શાના ?’ વાણિયો હતો યુક્તિવાળો.

જઈને કહે : ‘પટેલ, પટેલ ! વઢવાડ શું કરો છો ? આ તમારી ભેંશે શિંગડું મારીને અમારી વંડી પાડી નાખી – તે ચણાવી આપો ! ઢોર રઝળતાં મૂકતાં શરમાતા નથી ?’


પટેલ કહે : ‘ભેંશ વળી કોને હતી ?’


વાણિયો કહે : ‘ત્યારે કઈ ભેંશની છાશ સારું લડો છો ?’


પટેલ-પટલાણી શરમાઈ ગયાં ને છાનાંમાનાં કામે લાગ્યાં.