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बालकृष्ण लीला
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एक बार भगवान शंकर के मन में भी विष्णु के बाल स्वरूप के दर्शन करने की इच्छा हुई। भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वादशी के दिन भगवान शंकर अलख जगाते हुए गोकुल में आए। शिव द्वार पर आकर खड़े हो गए। तभी नंद के भवन से एक दासी शिव के पास आई और कहने लगी कि- “यशोदाजी ने ये भिक्षा भेजी है, इसे स्वीकार कर लें और लाला को आशीर्वाद दे दें।” शिव बोले- “मैं भिक्षा नहीं लूँगा, मुझे किसी भी वस्तु की अपेक्षा नहीं है, मुझे तो बालकृष्ण के दर्शन करना है।”[1] दासी ने यह समाचार यशोदाजी के पास पहुँचा दिया। भगवान शिव ने आवाज़ लगाई- “अरी मईया! दिखा दे मुख लाल का,तेरे पलने में, पालनहार दिखा दे मुख लाल का।” माँ यशोदा ने खिड़की से बाहर देखकर कह दिया कि “लाला को बाहर नहीं लाऊँगी। तुम्हारे गले में सर्प है, जिसे देखकर मेरा लाला डर जाएगा।” शिव बोले- “माता तेरा कन्हैया तो काल का काल है, ब्रह्म का ब्रह्म है। वह किसी से नहीं डर सकता, उसे किसी की भी कुदृष्टि नहीं लग सकती और वह तो मुझे पहचानता है। यशोदाजी बोलीं- “कैसी बातें कर रहे हैं आप? मेरा लाला तो नन्हा-सा है, आप हठ न करें।” शिव ने कहा- “तेरे लाला के दर्शन किए बिना मैं यहाँ से नहीं हटूँगा। मैं यहीं समाधि लगा लूँगा।” बाल कन्हैया ने भी यह जान लिया कि शिवजी पधारे हैं और माता उन्हें वहाँ ले नहीं ले जा रही हैं और शिव दर्शन न मिलने पर समाधि लगा लेंगे। बाल कन्हैया भली प्रकार जानते थे कि भोले बाबा की समाधि लग गई तो हज़ारों वर्ष के बाद ही खुलेगी तो उन्होंने ज़ोर से रोना शुरू कर दिया।[1] जब कन्हैया किसी भी प्रकार चुप नहीं हुए तो यशोदाजी को लगा कि सचमुच वे योगी परमतपस्वी हैं। यशोदाजी बालकृष्ण को बाहर लेकर आईं। शिव ने सोचा कि अब तो कन्हैया मेरे पास आएंगे ही। उन्होंने बालकृष्ण के दर्शन करके प्रणाम किया, किन्तु इतने से ही उनकी तृप्ति नहीं हुई। वे बालकृष्ण को अपनी गोद में लेना चाहते थे। शिव यशोदाजी से बोले कि- “तुम बालक के भविष्य के बारे में पूछती हो, यदि इसे मेरी गोद में दिया जाए तो मैं इसके हाथों की रेखा अच्छी तरह से देख लूँगा। यशोदा ने बालकृष्ण को शिव की गोद में रख दिया। शिव की गोद में आते ही बालकृष्ण खिलखिला कर हँस पड़े। वे योगी के रूप में आये हुए शिव के कभी गाल नोंचते तो कभी उनकी बड़ी-बड़ी दाढ़ी के केशों को खींचते।
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देव शर्मा

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(((((((( भक्त नरहरिदेव जी ))))))))
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बुंदेलखंड में गूड़ों नाम का एक ग्राम था। इसी गांव’ में विष्णुदास और उत्तमा देवी नाम के दम्पती रहते थे। साधारण जीवन जीते हुए दम्पती भगवान का भजन भी करते और साधु सेवा भी करते।
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विक्रम सवत् 1640 (सन् 1583) में उत्तमा देवी के गर्भ से एक दिव्य बालक ने जन्म लिया। बालक का रूप-स्वरूप अत्यत आकर्षक और मनमोहक था। जैसे-जैसे यह बालक बड़ा होता गया इसका व्यक्तित्व आकर्षक होता गया। माता-पिता ने बालक का नाम नरहरि रखा।
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बाल्यावस्था से भक्ति और धर्म के प्रति नरहरि के हृदय में आस्था थी। अपने हम उम्र बालकों में नरहरि सबसे विलक्षण था। उसकी बौद्धिक क्षमता और विश्लेषण क्रिया के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान भी आश्चर्यचकित हो उठते।
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जिस प्रकार सुगंध दूर-दूर जाकर भ्रमर को पुष्प का पता बताती है उसी प्रकार सत्पुरुष की ख्याति दूर तक जाती है। नरहरि के भक्तिभाव और ज्ञान से सब उसका सम्मान करते थे।
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उसी समय पास के किसी गाव में एक धन धान्य से समृद्ध वैश्य कुष्ठ रोग से पीड़ित था। उसके पास सब कुछ होते हुए भी लोग उसके पास बैठने से कतराते थे।
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उसका रोग लोगों में उसके प्रति घृणा का कारण बन गया था। जब किसी भी उपचार से उसे कोई लाभ न हुआ तो उसने ईश्वर का साथ पकड़ा।
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”हे कृपानिधान मैंने किस जन्म में कौन अपराध किया है जिसका मुझे यह दंड मिला है।” उसने रोज प्रभु से विनती की: “मेरे पास सब कुछ है पर निरोगी काया न होने से मैं उपेक्षा का पात्र हूं। यदि मैंने कोई पूर्वजन्म में अपराध किया है तो मुझे क्षमा करें करुणा सागर।”
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उसी रात उसकी सच्चे मन की प्रार्थना स्वीकार हो गई। ”तेरी सच्ची पुकार मैंने सुन ली है।” भगवान ने स्वप्न में कहा: ”पूर्वजन्म में किए पापकर्मों से तुझे यह दंड मिला था। यदि तू अब भी धर्मपथ पर चलने का वादा करे तो मैं तुझे इस रोग से मुक्ति पाने का मार्ग बता सकता हूं ।”
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”भगवन्, मैं संकल्प करता हूं कि स्वयं को आपको समर्पित कर दूंगा।”
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”तो ठीक है। यहां से कुछ दूरी पर गूड़ो गांव में मेरा परमभक्त नरहरि रहता है। उसके पास जा उसके चरणामृत पीने से तेरे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।” वैश्य ने उसी क्षण सकल्प किया कि वह अपना शेष जीवन प्रभु की भक्ति में बिताएगा।
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भोर होते ही वह गूड़ों गांव की ओर चल दिया। लोग उसे देखकर घृणा से मुंह फेर लेते थे और मार्ग छोड़कर एक तरफ हट जाते थे।
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”भाई मुझे सिद्धपुरुष नरहरि के दर्शन करने हैं।” वैश्य ने एक व्यक्ति से याचनापूर्ण स्वर में पूछा: कृपा करके मुझे उनका निवास बताओ।
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”सिद्धपुरुष..! और नरहरि ! हमारे गांव में तो एक भक्त नरहरि है।” व्यक्ति ने कहा।
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”मुझे उन्हीं के पास जाना है। मुझे भगवान ने स्वप्न में बताया है कि मेरा यह कुष्ठ रोग उन्हीं सिद्धपुरुष के चरणामृत-पान करने से ठीक होगा।”
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वह व्यक्ति हंस पड़ा और अन्य लोगों को भी यह बात बताई। सभी वैश्य को मूर्ख कहकर हंसी का पात्र बनाने लगे।
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”चल भाई कोढ़ी ! हम भी देखें कि नरहरि कब से सिद्ध पुरुष हो गया।” वैश्य को नरहरि के पास लाया गया।
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नरहरि ने भी उसकी बात सुनी और उसकी आखों में सत्य का आभास किया । वैश्य ने बड़ी श्रद्धा सै नरहरि के चरण धोए और चरणामृत पिया।
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यह आस्था थी या कि चमत्कार ! उसी क्षण वह निरोगी हो गया। कुष्ठ मिट गया। वहां उपस्थित सभी ग्रामवासियों ने ‘नरहरिदैव की जय’ का घोष किया।
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उसी दिन से नरहरि में लोगों की श्रद्धा और आस्था बढ़ गई धीरे-धीरे नरहरि की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी।
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नरहरिदेव ने नित्य नियम बना लिया कि वह भगवान की लीलाओं पर पद रचते और भाव विभोर होकर गाते। भक्ति और भजन ही उनकी दिनचर्या वन गए थे।
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वृंदावन की मनमोहिनी महिमा ने उन्हें मोह लिया था। वह ब्रज चल दिए। जब यमुना के किनारे पहुंचे तो श्याम जल की लहराती जलराशि देखकर आनंदित हो उठे पाप हारिणी यमुना के तट की माटी मस्तक पर धारण की।
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कैसी लुभावनी छटा थी वृदावन की ! दूर-दूर तक कृष्ण-कन्हैया की यश पताकाओं की शृंखला थी। मंदिरों पर लहराती पताकाएं कृष्णभक्ति में डूबी नाच रही लगती थीं।
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अब तो नरहरि के हृदय में भगवान के दर्शनों की इच्छा और व्याकुलता थी। वृंदावन की पवित्र भूमि का रज-रज कण-कण भगवान कृष्ण की भक्ति के गीत गा रहा था।
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नरहरि का मन भी प्रेम से भर उठा। वह भी गाने लगे। वे तन की सुधि-बुधि भूल गए। कृष्ण के नाम में तो ऐसा ही रस और भाव है। जिसके हृदय में कृष्ण की नाम धुन ने स्थान कर लिया वह लोक लाज बिसराकर उन्मुक्त हो जाता है।
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यही तो प्रेम दीवानी मीरा के साथ हुआ। युद्धों की भूमि पर जन्मी मीराबाई ने कृष्ण-प्रेम का ऐसा अनूठा उदाहरण दिया कि मीरा का नाम युगों-युगों तक चिरस्मरणीय बना रहेगा।
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नरहरि को भी जब वृंदावन की माटी से कृष्ण नाम की धुन सुनाई पड़ी तो वह भी दीवाने हो गए और अपना हृदय उस पवित्र भूमि और कृष्ण नाम को समर्पित कर दिया।
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ऐसी लगन लगी कि हर श्वास में कृष्ण ने वास कर लिया और जब कोई भक्त भगवान में लीन हो जाता तो भगवान भी अपने भक्त के दर्शन के लिए आतुर हो उठते हैं।
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नरहरिदेव सब कुछ भूल कर पद गा रहे थे। कृष्ण की प्रीति ने कंठ अवरुद्ध कर दिया और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
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तत्काल एक वृद्धा ने आकर उनका हाथ पकड़ लिया। कुछ समय बाद उन्हें चेत हुआ। वृद्धा के अधरों पर निश्छल मुस्कान थी।
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”भक्त तुम्हारी कृष्ण प्रीति सच्ची है। प्रीति को ज्ञान से सींचो और कृष्णमय हो जाओ। जाओ वृंदावन में परम विद्वान महात्मा सरसदेव जी तुम्हें तुम्हारे इष्ट से मिला देंगे। वृद्धा ने कहा। नरहरि को लगा जैसे कोई बलात उन्हें ले जा रहा था।
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वह क्षण-भर में महात्मा सरसदेव के समक्ष थे। नरहरिदेव को देखकर महात्मा जी मुस्कराए। ”आ गए नरहरिदेव ! मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था।”
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सरसदेव जी ने कहा : ”आओ तुम्हारी प्रीति को ज्ञान के जल से सींच दूं।” नरहरि गुरु के चरणों में गिर पड़े।
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तब गुरुदेव ने उन्हें राधा-कृष्ण की रास-माधुरी का ज्ञान देना आरम्भ किया। गुरु की वाणी में ज्ञान का तो शिष्य के श्रवण में प्रीति थी और पैंतीस वर्ष की आयु में ही नरहरिदेव गुरुकृपा और कृष्ण की दया से उच्चकोटि के रसोपासक संतों में गिने जाने लगे।
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उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति और गुरुभक्ति ने महात्मा सरसदेव को भी आनंदित कर दिया था। अपना सम्पूर्ण जीवन प्रेम के पर्याय ब्रज के ठाकुर रासबिहारी श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करके श्री नरहरिदेव जी ने विक्रम संवत् 1741 (सन् 1684) में निकुंज लीला में वास किया।

जब आँख खुले तो …
धरती श्री वृन्दावन धाम की हो:
जब आँख बंद हो तो …
यादेँ श्री वृन्दावन धाम की हो:
हम मर भी जाए तो …
कोई गम नही लेकिन मरते वक्त
मिट्टी श्री वृन्दावन धाम की हो।।
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देव शर्मा

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नारद और कृष्ण जी सत्संग महिमा कथा-
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एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गये और प्रणाम करते हुए बोलेः “हे लक्ष्मीपते, हे कमलनयन ! कृपा करके इस दास को सत्संग की महिमा सुनाइये।”
भगवान ने मंद-मंद मुस्कराते हुए अपनी मधुर वाणी में कहाः हे नारद ! सत्संग की महिमा का वर्णन करने में तो वाणी की गति नहीं है।
” फिर क्षण भर रूककर श्री भगवान बोलेः ” हाँ, यहाँ से तुम आगे जाओ। वहाँ इमली के पेड़ पर एक बड़ा विचित्र, रंगीन गिरगिट है, वह सत्संग की महिमा जानता है। उसी से पूछ लो।”
देवर्षि खुशी-खुशी इमली के पेड़ के पास गये और योगविद्या के बल से गिरगिट से बातें करने लगे। उन्होंने गिरगिट से पूछाः “सत्संग की महिमा क्या है ? कृपया बतलाइये।”
सवाल सुनते ही वह गिरगिट पेड़ से नीचे गिर गया और छटपटाते हुए प्राण छोड़ दिये। नारदजी को बड़ा अचंभा हुआ। वे डरकर लौट आये और भगवान को सारा वृत्तान्त कह सुनाया।
भगवान ने मुस्कराते हुए कहाः “अच्छा, नगर के उस धनवान के घर जाओ और वहाँ जो तोता पिंजरे में दिखेगा, उसी से सत्संग की महिमा पूछ लेना।”
नारदजी क्षण भर में वहाँ पहुँच गये एवं तोते से वही सवाल पूछा, मगर देवर्षि के देखते ही देखते उसने आँखें मूंद लीं और उसके भी प्राणपखेरू उड़ गये। अब तो नारद जी बड़े घबरा गये।
वे तुरंत भगवान के पास लौट आये और कहने लगेः “यह क्या लीला है भगवन् ! क्या सत्संग का नाम सुनकर मरना ही सत्संग की महिमा है ?”
श्री भगवान हँसकर बोलेः “वत्स ! इसका मर्म भी तुमको समझ में आ जायेगा। इस बार नगर के राजा के महल में जाओ और उसके नवजात पुत्र से अपना प्रश्न पूछो।”
नारदजी तो थरथर काँपने लगे और बोलेः “हे प्रभु ! अब तक तो बच गया लेकिन अब की बार तो लगता है मुझे ही मरना पड़ेगा। अगर वह नवजात राजपुत्र मर गया तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा।”
भगवान ने नारदजी को अभयदान दिया। नारदजी दिल मुट्ठी में रखकर राजमहल में आये। वहाँ उनका बड़ा सत्कार किया गया। अब तक राजा को कोई संतान नहीं थी। अतः पुत्र के जन्म पर बड़े आनन्दोल्लास से उत्सव मनाया जा रहा था।
नारदजी ने डरते-डरते राजा से पुत्र के बारे में पूछा। नारदजी को राजपुत्र के पास ले जाया गया। पसीने से तर होते हुए, मन-ही-मन श्रीहरि का नाम लेते हुए नारदजी ने राजपुत्र से सत्संग की महिमा के बारे में प्रश्न किया तो वह नवजात शिशु हँस पड़ा और बोलाः “महाराज ! चंदन को अपनी सुगंध और अमृत को अपने माधुर्य का पता नहीं होता।
ऐसे ही आप अपनी महिमा नहीं जानते इसलिए मुझसे पूछ रहे हैं।
वास्तव में आप ही के क्षणमात्र के संग से मैं गिरगिट की योनि से मुक्त हो गया और आप ही के दर्शनमात्र से तोते की क्षुद्र योनि से मुक्त होकर इस मनुष्य जन्म को पा सका।
आपके सान्निध्यमात्र से मेरी कितनी सारी योनियाँ कट गयीं और मैं सीधे मानव-तन में पहुँच गया, राजपुत्र बना। यह सत्संग का कितना अदभुत प्रभाव है ! हे ऋषिवर ! अब मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य को पा लूँ।”
नारदजी ने खुशी-खुशी आशीर्वाद दिया और भगवान श्री हरि के पास जाकर सब कुछ बता दिया। श्रीहरि बोलेः “सचमुच, सत्संग की बड़ी महिमा है। संत का सही गौरव या तो संत जानते हैं या उनके सच्चे प्रेमी भक्त !” इसलिए जब भी समय मिले सत्संग कीजिये ।
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देव शर्मा

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“जीवन साथी”-
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अस्पताल मे प्रसव के लिए भर्ती शांति को नर्स जैसे उठाकर दवाई देने को हुई तभी कानों मे मासा की आवाज पडी-ये कया कर रही हे छोरी…तुझे पता नही इसका उपवास हे करवाचोथ का आज सांझ चांद निकलने तक इसे भूखा प्यासा रहना है,नर्स-पर मासा इनहे कमजोरी हे ओर जल्दी आप्रेशन को लेकर जाना पडेगा ये दवाई बहुत जरूरी है प्लीज देने दीजिए वरना कही कुछ…. मासा-चुप कर कहा ना मेरे लडके की जिंदगी कुछ नही हे कया ,हमे समझा रही हे हमने भी चार चार बच्चे पैदा किए हे एकदिन मे कुछ ना होता चांद निकलने छोरे का चेहरा देखकर उपवास खोल ले फिर चाहे ये अंग्रेजी दवाई खाये या पानी पिये मुझे कोई मतलब नही… नर्स वापस चली गई इसके बाद डाक्टर ने भी बहुत समझाने की कोशिश की मगर मासा कहा मानने वाली थी आखिर रूतबा था पूरे जिले मे काफी पैसा देती थी अस्पताल मे डोनेशन के लिए.. आखिर सभी ने चुप रहने मे भलाई समझी ,दोपहर को शांति का पति सूरज आया ओर जब डाक्टर नर्स ने उसे दवाओं की जरूरत के बारे मे कहा तो बहाने से मासा को घर भेज दिया और शांति के पास आकर जूस पिलाया ओर फिर डाक्टर की बताई दवाई खिलाई शांति हरबार मासा के बारे मे कहकर बोलती तो सूरज बोला-पगली तेरा सुहाग मे हूं ओर मां को तू जानती है पुराने खयालात की है उनके सामने चुप रह और हां ऐसे मे भूखा रहना अच्छा नही चल खा ..शांति मुसकुराते हुए खाने लगी तो सूरज बोला -देवी जी जरा हमें भी खिलाओ हमने भी तुम्हारे ओर अपने होने वाली संतान की सलामती को व्रत रखा हे ..शांति-कया आपने …मासा को पता हे..सूरज-कयो कया पत्नियों का फर्ज हे पतियों की लम्बी उम्र बढाने को व्रत अरे हम दोनों जीवनसाथी हे तुमहारी उम्र भी मेरे बराबर होनी चाहिए वरना कया हमदोनो एकदूसरे के बिना रह सकते है..हे..दोनों हंसने लगे…दोस्तों हर पति पत्नी एकदूसरे के पूरक होते हे यही वो रिश्ता हे जो जन्म जन्म तक निभाया जाता है इसीलिए हर पति को अपनी पत्नी का ,ओर हर पत्नी को अपने पति का हर कदम पर साथ देना चाहिए………

. आप कया कहते हो
Yes/no जबाब जरूर दीजिएगा…….

संजय गुप्ता

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मूर्ती पूजा का रहस्य जरूर पढ़े :-

कोई कहे की की हिन्दू मूर्ती पूजा क्यों
करते हैं तो उन्हें बता दें
मूर्ती पूजा का रहस्य :-

स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने
अपने भवन में बुलाया और बोला,

“तुम हिन्दू लोग मूर्ती की पूजा करते हो!
मिट्टी, पीतल, पत्थर की मूर्ती का.!

पर मैं ये सब नही मानता।
ये तो केवल एक पदार्थ है।”

उस राजा के सिंहासन के पीछे
किसी आदमी की तस्वीर लगी थी।

विवेकानंद जी कि नजर उस
तस्वीर पर पड़ी।

विवेकानंद जी ने राजा से पूछा,
“राजा जी, ये तस्वीर किसकी है?”

राजा बोला, “मेरे पिताजी की।”

स्वामी जी बोले, “उस तस्वीर को अपने
हाथ में लीजिये।”

राज तस्वीर को हाथ मे ले लेता है।

स्वामी जी राजा से : “अब आप उस
तस्वीर पर थूकिए!”

राजा : “ये आप क्या बोल रहे हैं
स्वामी जी.?

“स्वामी जी : “मैंने कहा उस
तस्वीर पर थूकिए..!”

राजा (क्रोध से) : “स्वामी जी, आप होश मे
तो हैं ना? मैं ये काम नही कर सकता।”

स्वामी जी बोले, “क्यों?

ये तस्वीर तो केवल
एक कागज का टुकड़ा है,
और जिस पर कूछ रंग लगा है।

इसमे ना तो जान है,

ना आवाज,

ना तो ये सुन सकता है,

और ना ही कूछ बोल सकता है।”

और स्वामी जी बोलते गए,

“इसमें ना ही हड्डी है और ना प्राण।

फिर भी आप इस पर कभी थूक
नही सकते।

क्योंकि आप इसमे अपने
पिता का स्वरूप देखते हो।

और आप इस तस्वीर का अनादर
करना अपने पिता का अनादर करना
ही समझते हो।”

थोड़े मौन के बाद स्वामी जी आगे कहाँ,
“वैसे ही, हम हिंदू भी उन पत्थर, मिट्टी,
या धातु की पूजा भगवान का स्वरूप मान
कर करते हैं।

भगवान तो कण-कण मे है, पर
एक आधार मानने के लिए और
मन को एकाग्र करने के
लिए हम मूर्ती पूजा करते हैं।”

स्वामी जी की बात सुनकर राजा ने
स्वामी जी के चरणों में गिर कर
क्षमा माँगी।
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🌹 श्री शुभम् भवतु 🌹
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

संजय गुप्ता

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ईश्वर से बढ़कर कोई नहीं

अकबर और बीरबल के किस्से बहुत प्रसिद्ध हैं। वे किस्से कितने थे और विद्वानों ने अपनी बुद्धि के अनुसार कितने किस्से उनमें और जोड़े, यह किसी को ज्ञात नहीं। अकबर विभिन्न विषयों पर बीरबल से प्रश्न पूछते थे। बीरबल अपनी सूझबूझ और धैर्य से उन प्रश्नों का उत्तर देकर उन्हें सन्तुष्ट करता रहता था। बाजार में भी इनके किस्सों की पुस्तकें उपलब्ध हैं। बहरहाल आज हम एक ऐसे किस्से पर चर्चा करते हैं जो ईश्वर के प्रति हमारे विश्वास को और अधिक दृढ़ करता है। परमपिता परमात्मा से बढ़कर और अन्य कोई नहीं है जो हमारी झोलियाँ अपनी नेमतों से भर सकता है। हम ही उन्हें पाने के लिए स्वयं को योग्य नहीं बना पाते।
एक बार राजा अकबर ने बीरबल से पूछा- “तुम हिन्दू लोग दिन में कभी मन्दिर जाते हो, कभी पूजा-पाठ करते हो, आखिर भगवान तुम्हें देता क्या है?”
बीरबल ने इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कुछ दिन का समय माँगा। बीरबल ने एक बूढी भिखारन के पास जाकर कहा- “मैं तुम्हें पैसे भी दूँगा और रोज खाना भी खिलाऊँगा। तुम्हें मेरा एक काम करना होगा।”
बुढ़िया ने कहा- “ठीक है जनाब।”
बीरबल ने कहा- “आज के बाद अगर कोई तुमसे पूछे कि क्या चाहिए तो कहना अकबर? अगर कोई पूछे किसने दिया तो कहना अकबर शहंशाह ने।”
वह भिखारिन अकबर को बिल्कुल नहीं जानती थी पर प्रतिदिन वह हर बात में अकबर का नाम लेने लगी। कोई पूछता क्या चाहिए तो वह कहती- “अकबर”, कोई पूछता किसने दिया, तो कहती- “अकबर मेरे मालिक ने दिया है।’
धीरे-धीरे यह सारी बातें अकबर के कानों तक भी पहुँच गई। वह खुद भी उस भिखारन के पास गया और पूछा- “यह सब तुझे किसने दिया है?”
उसने जवाब दिया- “मेरे शहंशाह अकबर ने मुझे सब कुछ दिया है।
अकबर ने फिर पूछा- “और क्या चाहिए?”
बड़े अदब से भिखारन ने कहा- “अकबर का दीदार, मैं उसकी हर रहमत का शुक्राना अदा करना चाहती हूँ, बस और मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
अकबर उसका प्रेम और श्रद्धा देखकर निहाल हो गया और उसे अपने महल में ले आया। भिखारन तो हक्की-बक्की रह गई और अकबर के पैरों में लेट गई- “धन्य है मेरा शहंशाह।”
अकबर ने उसे बहुत सारा सोना दिया, रहने के लिए घर दिया, सेवा करने वाले नौकर भी देकर उसे विदा किया ।
तब बीरबल ने कहा- “महाराज यह आपके उस सवाल का जवाब है। जब इस भिखारिन ने सिर्फ केवल कुछ दिन सारा समय आपका नाम लिया तो आपने उसे निहाल कर दिया। इसी तरह जब हम सारा दिन सिर्फ मालिक को ही याद करेंगे तो वह हमें अपनी दया की मेहर से निहाल और मालामाल कर देगा।”
एक सांसारिक बादशाह के सिमरन से इतना कुछ मिल सकता है। उस मालिक ने, जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और बादशह बनाए हैं, उसके सिमरन से कितनी नेमते मिलेंगी? वह तो बिनमाँगे ही हमें सब कुछ देता रहता है। हमारा आँचल ही छोटा पड़ जाता है। दिनभर, सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते मालिक का ध्यान करते रहना चाहिए। आठों पहर उसके नाम का सिमरन करते रहना चाहिए। एक बार हमारा ध्यान लग गया तो बस बेड़ा पार हो जाएगा। तब फिर चौरासी लाख योनियों और जन्म-मरण के बन्धनों से मनुष्य को मुक्ति मिल जाती है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
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जरूर पढ़े. ======पुराण कथा
जो महाकाल की शरण में है स्वयं

काल उसके चरण में हैः शिवभक्त भद्रायु की कथा.

भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र को शुद्ध-शुद्ध पढा जाए तो मौत भी भाग जाती है, जीवन सफल हो जाता है और जीवन के बाद की राह भी आसान और सुखद हो जाती है. स्कंदपुराण में कही गयी भद्रायु की कथा यह साबित करती है.पौराणिक काल में एक राज्य था दर्शाण. यह आजकल के मध्य प्रदेश के उत्तर पूर्व में स्थित था. यहां वज्रबाहु नाम का राजा राजकरता था जो अपनी कई पत्नियों में रानी सुमति को सबसे ज्यादा प्यार करता था इससे सभी रानियां जलती थी.सुमति गर्भवती थी. सौतनों ने उसे ज़हर दे दिया. ज़हर से सुमति मरी नहीं न ही गर्भ में पल रहा बच्चा मरा. हां, इसका असर यह हुआ कि पहले तो सुमति की देह पर भायनक फोड़े निकल आए फिर जो बालक पैदा हुआ उसका शरीर भी फफोलों और घावों से भरा था.

बहुत इलाज कराया पर मां बेटे पर कोई असर न हुआ. रानियों ने राजा के कान भर दिए कि यह एक संक्रामक बीमारी बन सकती है और इससे प्रजा का अहित होगा. इससे पहले कि बात खुले राजा ने सुमति को बच्चे के साथ जंगल में छुड़वा दिया.रानी सुमति अपने बेटे को लेकर किसी तरह जंगल से बाहर निकली तो उसे एक औरत मिली जो पास के ही शहर के महाजन की दासी थी. वह उसे वहां ले गयी. नगर रक्षक पद्माकर ने वैद्य बुलाए इलाज कराया पर कोई लाभ न हुआ.सुमति की हालत खराब थी, उसका नवजात बेटा यह रोग न झेल सका और चल बसा. यह देख सुमति बेहोश हो गयी. होश आया तो वह रोते रोते भगवान शिव से प्रार्थना करने लगी कि अब आपके सिवा मेरा कोई नहीं है, साथ ही वह महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने लगी.

महादेव ने उसकी पुकार सुन ली. एक नामी शिवयोगी ऋषभ वहां प्रकट हो गये और सुमति से बोले, बेटी तुम इतना विलाप क्यों कर रही हो. काल से कौन बचा है, यह शरीर तो एक बुलबुला है जो फिर महासमुद्र के पानी में मिल गया. अपना जीवन देखो.सुमति बोली- भगवन्! जिसका एकलौता बेटा मर गया हो, जिसका कोई घरबार,रिश्तेदार न हो, जो न ठीक होने वाले रोग से पीडित हो उस अभागिन के लिये मौत से बेहतर क्या है?इसलिये मैं बेटे के साथ ही मरना चाहती हूँ!

शिवकृपा से आपके दर्शन हो गए यही इस जीवनका सुफल मानूंगी. वह शिवयोगी रानी सुमति के उत्तर से बड़े खुश हुए और बोले- देवी तुम महामृत्युंजय मंत्र का जाप आरंभ करो.शिवयोगी ने खुद भस्म लेकर उसपर मंत्र पढा और थोड़ा सा मरे हुये बालक के मुंह में डाला और बाकी उसके और सुमति के शरीर पर. बालक जीवित हो उठा. बालक और सुमति के सारे फोड़े, घाव दूर हो गये. देह चमकने लगी.शिवयोगी ने कहा, बेटी तुम जीवन भर ऐसी ही युवा रहोगी. अपने बेटे का नाम भद्रायु रखो यह बड़ा होकर नामी विद्वान बनेगा, वीरभी होगा और अपना खोया राज्य भी वापस पा लेगा. मन को महादेव के ध्यान में लगाओ.सुमति और भद्रायु दोनों शिव अर्चना और मृत्युंजय मंत्र का जाप करने लगे. सोलह साल बीत गये. अब भद्रायु पढ लिखकर एक सुंदर युवक बनने की ओर था तभी शिव योगी ऋषभ एक बार फिर वहां आये. भद्रायु उनकी चरणों में लोट गया.उन्होंने भद्रायु को न केवल आशीर्वाद बल्कि तरह तरह की शिक्षाएं भी दीं. शिव योगी ऋषभ ने कहा, भद्रायु जल्द ही तुम अपना वह राज्य हासिल करोगे जिस पर तुम्हारा अधिकार है.

उन्होंने भद्रायु को एक शंख तथा एक खड्ग दिया. दोनों ही दिव्य थे जिन्हें सुन और देख कर बैरी भाग जाते. फिर मंत्र पढ कर भद्रायु के शरीर में भस्म लगायी जिससे उसमें बारह हजार हाथियों का बल आ गया.शिवयोगी ऋषभ के जाने के बाद पता चला कि वज्रबाहु के दुश्मनों ने उनकी सारी रानियों का अपहरण कर लिया और उन्हें कैद.समाचार सुन क्रोधित भद्रायु शेर की तरह गरजा. हालांकि यह उनको अपनी निर्दोष पत्नी और अबोध बालक को व्यर्थ कष्ट पहुंचाने की ही सज़ा थी.भद्रायु ने अपने पिता के शत्रुओं पर आक्रमण कर उन्हें मार डाला और पिता को छुड़ा लिया. उनको उनका राज्य वापस मिल गया. इस कारनामे से भद्रायु का यश चारों और फैल गया. वज्रबाहु अपने बेटे से मिलकरखुश और पत्नी सुमति से मिल कर बहुत लज्जित हुए.निषाधराज चित्रांगद और सीमन्तिनी ने अपनी कन्या कीर्तिमालिनी का विवाह भद्रायु के साथ कर दिया. वज्रबाहु ने वीरविद्वान शिव भक्त बेटे के लिये राजगद्दीखाली कर दी. भद्रायु ने हजारों साल राज करते हुए शिव पूजन और महामृत्युंजय का जाप जारी रखा और अंत में शिवस्वरूप होकर शिवलोक को गए. (स्कंद पुराण की कथा)
हर हर महादेव
संजय गुप्ता

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ART OF LIFE
“जीने की कला”

एक शाम माँ ने दिनभर की लम्बी थकान एवं काम के बाद जब डिनर बनाया तो उन्होंने पापा के सामने एक प्लेट सब्जी और एक जली हुई रोटी परोसी। मुझे लग रहा था कि इस जली हुई रोटी पर कोई कुछ कहेगा।
परन्तु पापा ने उस रोटी को आराम से खा लिया ।मैंने माँ को पापा से उस जली रोटी के लिए “साॅरी” बोलते हुए जरूर सुना था। और मैं ये कभी नहीं भूल सकता जो पापा ने कहा “प्रिये, मूझे जली हुई कड़क रोटी बेहद पसंद है।”
देर रात को मैंने पापा से पूछा, क्या उन्हें सचमुच जली रोटी पसंद है?
उन्होंने मुझे अपनी बाहों में लेते हुए कहा – तुम्हारी माँ ने आज दिनभर ढ़ेर सारा काम किया, और वो सचमुच बहुत थकी हुई थी और…वेसे भी…एक जली रोटी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती, परन्तु कठोर-कटू शब्द जरूर पहुंचाते हैं।
तुम्हें पता है बेटा – जिंदगी भरी पड़ी है अपूर्ण चीजों से…अपूर्ण लोगों से… कमियों से…दोषों से…मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ नहीं, साधारण हूँ और शायद ही किसी काम में ठीक हूँ।
मैंने इतने सालों में सीखा है कि-
“एक दूसरे की गलतियों को स्वीकार करो…अनदेखी करो… और चुनो… पसंद करो…आपसी संबंधों को सेलिब्रेट करना।”
मित्रों, जिदंगी बहुत छोटी है…उसे हर सुबह दु:ख…पछतावे…खेद के साथ जताते हुए बर्बाद न करें।
जो लोग तुमसे अच्छा व्यवहार करते हैं, उन्हें प्यार करो ओर जो नहीं करते उनके लिए दया सहानुभूति रखो।
किसी ने क्या खूब कहा है-

“मेरे पास वक्त नहीं उन लोगों से नफरत करने का जो मुझे पसंद नहीं करते,

*क्योंकि मैं व्यस्त हूँ उन लोगों को प्यार करने में जो मुझे पसंद करते हैं।✌

संजय गुप्ता

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लड़की हुई है —–
लड़की हुई है? पति ने पूछा…
पत्नी को इसी प्रश्न की उम्मीद थी, उसने उम्मीद नहीं की थी कि पति सबसे पहले उसका हाल चाल जानेगा।
पत्नी ने सिर्फ पलके झुका दी, पति इसे हाँ समझे या हाँ से ज्यादा कुछ और, लेकिन पत्नी के पलके झुका देने भर में इतनी दृढ़ता थी कि वह कह देना चाहती है कि हाँ लड़की हुई है और वह इसे पालेगी, पढ़ाएगी !
अब क्या करेगी तू? पति ने पूछा…
पालूंगी, और क्या करुँगी….
शादी कैसे करेगी ? ,
अभी तो पैदा हुई है जी , शादी के नाम पर अभी क्यों सूखने पढ़ गये आप….
तू जैसे जानती नहीं, तीन तीन बेटिया हो गयी हैं, हाथ पहले से टाइट है, शादी कोई ऐसे ही तो हो नहीं जाती ! कहा था टेस्ट करा लेते है, लेकिन सरकार भी जीने नहीं देती साली,
मन क्यों छोटा करते हैं जी आप ,भगवान् ने भेजी है, अपने आप करेगा इंतजाम, पत्नी ने दिलासा दिया…
भगवान! हा हा। भगवान ने ही कुछ करना होता तो लड़का न दे देता ! कुछ जीने का मकसद तो रहता, साले ने काम धंधे में भी ऐसी पनोती डाली है की रोटी तक पूरी नहीं होती! ऊपर से तीन तीन बेटिया और ये नंगा समाज !
पत्नी प्रसव पीड़ा भूल गयी थी, पति की पीड़ा उसे बड़ी लगने लगी एकाएक ! उसने पति की झोली में बेटी डाल दी ! कंधे पर हाथ रख कर रुंधे गले से बोली! गला घोंट देते हैं ! अभी किसी को नहीं पता की जिन्दा हुई है या मरी हुई, दाई को मैं निबट लूंगी !
पति का बदन एक दम से सन्न पड़ गया, वह कभी पत्नी के कठोर पड़ चुके चेहरे की ओर देखता तो कभी नवजात बेटी के चेहरे को ! उसने एकाएक बेटी को सीने से लगा लिया! भीतर प्रकाश का बड़ा सूरज चमकने लगा! बेटी ने पिता के कान में कह दिया था पापा आप चिंता न करें मैं आपके टाइट हाथ खोलने के लिए ही आई हूं।
पिता के सीने से लगी बेटी को देखकर पत्नी की आँखे आंसुओ से टिमटिमाने लगी,
पति ने आगे बढ़कर पत्नी के आंसू पोंछे और भीतर लम्बी सांस भर कर बोला, हम इसे पालेंगे पार्वती..!

संजय गुप्ता

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एक बेहद भावुक कहानी🔍
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एक आइसक्रीम वाला रोज एक मोहल्ले में आइसक्रीम बेचने जाया था , उस कालोनी में सारे पैसे वाले लोग रहा करते थे .

लेकिन वहाँ एक परिवार ऐसा भी था जो आर्थिक तंगी से गुजर रहा था.
उनका एक चार साल का बेटा था जो हर दिन खिड़की से उस आइसक्रीम वाले को ललचाई नजरो से
देखा करता था.
आइसक्रीम वाला भी उसे पहचानने लगा था . लेकिन
कभी वो लड़का घर से बाहर नहीं आया आइसक्रीम खाने .
एक दिन उस आइसक्रीम वाले का मन
नहीं माना तो वो खिड़की के पास
जाकर उस बच्चे से बोला ,

” बेटा क्या आपको आइसक्रीम
अच्छी नहीं लगती. आप
कभी मेरी आइसक्रीम नहीं खरीदते ? ”
उस चार साल के बच्चे ने बड़ी मासूमियत
के साथ कहा ,

” मुझे आइसक्रीम बहुत पसंद है . पर माँ के
पास पैसे नहीं है, मैं माँ से पैसे नही माँगता वो रोने लगती है। मेरे पापा जब भगवान के पास से वापस आएगें तब ढेर सारी आइसक्रीम लाएंगे”

उस आइसक्रीम वाले को यह सूनकर उस
बच्चे पर बड़ा प्यार आया .

उसने कहा ,
” बेटा तुम मुझसे रोज आइसक्रीम ले
लिया करो. मुझसे तुमसे पैसे नहीं चाहिए

वो बच्चा बहुत समझदार निकला . बहुत
सहज भाव से बोला ,

” नहीं ले सकता , माँ ने कहा है किसी से
मुफ्त में कुछ लेना गन्दी बात होती है,
इसलिए में कुछ दिए बिना आइसक्रीम
नहीं ले सकता ”

वो आइसक्रीम वाला बच्चे के मुह से
इतनी गहरी बात सूनकर आश्चर्यचकित रह
गया .
फिर उसने कहा ,

” तुम मुझे आइसक्रीम के बदले में रोज एक
पप्पी दे दिया करो . इस तरह मुझे
आइसक्रीम की कीमत मिल
जाया करेगी ”

बच्चा ये सुकर बहुत खुश हुआ वो दौड़कर घर
से बाहर आया . आइसक्रीम वाले ने उसे
एक आइसक्रीम दी और बदले में उस बच्चे ने
उस आइसक्रीम वाले के गालो पर एक
पप्पी दी और खुश होकर घर के अन्दर भाग गया .

अब तो रोज का यही सिलसिला हो गया.
वो आइसक्रीम वाला रोज आता और एक
पप्पी के बदले उस बच्चे को आइसक्रीम दे जाता .

करीब एक महीने तक यही चलता रहा .
लेकिन उसके बाद उस बच्चे ने अचानक से
आना बंद कर दिया . अब वो खिड़की पर
भी नजर नहीं आता था .

जब कुछ दिन हो गए तो आइसक्रीम वाले
का मन नहीं मन और वो उस घर पर पहुच
गया . दरवाजा उस बालक की माँ ने
खोला . आइसक्रीम वाले ने उत्सुकता से
उस बच्चे के बारे में पूछा तो उसकी माँ ने
कहा ,

” देखिये भाई साहब हम गरीब लोग है.
हमारे पास इतना पैसा नहीं के अपने बच्चे
को रोज आइसक्रीम खिला सके . आप
उसे रोज मुफ्त में आइसक्रीम खिलाते रहे.
जिस दिन मुझे ये बात पता चली तो मुझे
बहुत शर्मिंदगी हुई .आप एक अच्छे इंसान है
लेकिन मैं अपने बेटे को मुफ्त में आइसक्रीम
खाने नहीं दे सकती . ”

बच्चे की माँ की बाते सूनकर उस
आइसक्रीम वाले ने जो उत्तर
दिया,

” बहनजी , कौन कहता है कि मैं उसे मुफ्त में
आइसक्रीम खिलाता था .
मैं इतना दयालु या उपकार करने वाला नहीं हूँ मैं व्यापार करता हूँ . और आपके बेटे से जो मुझे मिला वो उस
आइसक्रीम की कीमत से कही अधिक
मूल्यवान था .

और कम मूल्य की वास्तु
का अधिक मूल्य वसूल करना ही व्यापार है।

एक बच्चे का निश्छल प्रेम पा लेना सोने
चांदी के सिक्के पा लेने से कही अधिक
मूल्यवान है आपने अपने बेटे को बहुत अच्छे
संस्कार दिए है लेकिन आपसे पूछता हूँ
क्या प्रेम का कोई मूल्य नहीं होता ?”

उसकी एक पप्पी पाकर मेरा सारा दिन बहुत ही अच्छा गुजरता है। मेरे अपनी कोई औलाद नही है। बीवी मर गई। बूढी माँ के लिए ये धंधा करता हूँ। अगर आपको एतराज है तो रहने दो। अब इस गली में कभी नही आऊंगा।

उस आइसक्रीम वाले के अर्थपूर्ण और प्रेमपूर्ण शब्द
सूनकर बालक की माँ की आँखे भीग
गयी उन्होंने बालक
को पुकारा तो वो दौड़कर आ गया .
माँ का इशारा पाते ही बालक दौड़कर
आइसक्रीम वाले से लिपट गया .

आइसक्रीम वाले ने बालक को गोद में
उठा लिया और बाहर जाते हुए कहने
लगा ,
” तुम्हारे लिए आज चोकलेट आइसक्रीम
लाया हूँ . तुझे बहुत पसंद है न ?”
बच्चा उत्साह से बोला ,
” हां बहुत ”
बालक की माँ ख़ुशी से रो पड़ती है।
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संजय गुप्ता