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अहंकार की कोई कीमत नहीं है

अशोक के जीवन में मैंने पढ़ा है, गांव में एक भिक्षु आता था। अशोक गया और उस भिक्षु के चरणों में सिर रख दिया। अशोक के बड़े आमात्य, वह जो बड़ा वजीर था अशोक का, उसे यह अच्छा नहीं लगा। अशोक जैसा सम्राट गांव में भीख मांगते एक भिखारी के पैरों पर सिर रखे! बहुत……घर लौटते ही, महल लौटते ही उसने कहा कि नहीं सम्राट, यह मुझे ठीक नहीं लगा। आप जैसा सम्राट, जिसकी कीर्ति शायद जगत में कोई सम्राट नहीं छू सकेगा फिर, वह एक साधारण से भिखारी के चरणों पर सिर रखे!

अशोक हंसा और चुप रह गया। महीने भर, दो महीने बीत जाने पर उसने बड़े वजीर को बुलाया और कहा कि एक काम करना है। कुछ प्रयोग करना है, तुम यह सामान ले जाओ और गांव में बेच आओ। सामान बड़ा अजीब था। उसमें बकरी का सिर था, गाय का सिर था, आदमी का सिर था, कई जानवरों के सिर थे और कहा कि जाओ बेच आओ बाजार में।

वह वजीर बेचने गया। गाय का सिर भी बिक गया और घोड़े का सिर भी बिक गया, सब बिक गया, वह आदमी का सिर नहीं बिका। कोई लेने को तैयार नहीं था कि इस गंदगी को कौन लेकर क्या करेगा? इस खोपड़ी को कौन रखेगा? वह वापस लौट आया और कहने लगा कि महाराज! बड़े आश्चर्य की बात है, सब सिर बिक गए हैं, सिर्फ आदमी का सिर नहीं बिक सका। कोई नहीं लेता है।

सम्राट ने कहा कि मुफ्त में दे आओ। वह वजीर वापस गया और कई लोगों के घर गया कि मुफ्त में देते हैं इसे, इसे आप रख लें। उन्होंने कहा. पागल हो गए हो! और फिंकवाने की मेहनत कौन करेगा? आप ले जाइए। वह वजीर वापस लौट आया और सम्राट से कहने लगा कि नहीं, कोई मुफ्त में भी नहीं लेता।

अशोक ने कहा कि अब मैं तुमसे यह पूछता हूं कि अगर मैं मर जाऊं और तुम मेरे सिर को बाजार में बेचने जाओ तो कोई फर्क पड़ेगा? वह वजीर थोड़ा डरा और उसने कहा कि मैं कैसे कहूं क्षमा करें तो कहूं। नहीं, आपके सिर को भी कोई नहीं ले सकेगा। मुझे पहली दफा पता चला कि आदमी के सिर की कोई भी कीमत नहीं है।

उस सम्राट ने कहा, उस अशोक ने कि फिर इस बिना कीमत के सिर को अगर मैंने एक भिखारी के पैरों में रख दिया था तो क्यों इतने परेशान हो गए थे तुम।

आदमी के सिर की कीमत नहीं, अर्थात आदमी के अहंकार की कोई भी कीमत नहीं है। आदमी का सिर तो एक प्रतीक है आदमी के अहंकार का, ईगो का। और अहंकार की सारी चेष्टा है भीतर लाने की और भीतर कुछ भी नहीं जाता—न धन जाता है, न त्याग जाता है, न ज्ञान जाता है। कुछ भी भीतर नहीं जाता। बाहर से भीतर ले जाने का उपाय नहीं है। बाहर से भीतर ले जाने की सारी चेष्टा खुद की आत्महत्या से ज्यादा नहीं है, क्योंकि जीवन की धारा सदा भीतर से बाहर की ओर है।

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महामृत्युंजय मंत्र और लघु मृत्‍युंजय मंत्र के जप का लाभ

महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का एक श्लोक है.शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित ये महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है

महा मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म। उर्वारुकमिव बन्धनामृत्येर्मुक्षीय मामृतात् !!

|संपुटयुक्त महा मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

|लघु मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ। किसी दुसरे के लिए जप करना हो तो-ॐ जूं स (उस व्यक्ति का नाम जिसके लिए अनुष्ठान हो रहा हो) पालय पालय स: जूं ॐ

महा मृत्‍युंजय जप की विधि ||

महा मृत्युंजय मंत्र का पुरश्चरण सवा लाख है और लघु मृत्युंजय मंत्र की 11 लाख है.मेरे विचार से तो कोई भी मन्त्र जपें,पुरश्चरण सवा लाख करें.इस मंत्र का जप रुद्राक्ष की माला पर सोमवार से शुरू किया जाता है.जप सुबह १२ बजे से पहले होना चाहिए,क्योंकि ऐसी मान्यता है की दोपहर १२ बजे के बाद इस मंत्र के जप का फल नहीं प्राप्त होता है.आप अपने घर पर महामृत्युंजय यन्त्र या किसी भी शिवलिंग का पूजन कर जप शुरू करें या फिर सुबह के समय किसी शिवमंदिर में जाकर शिवलिंग का पूजन करें और फिर घर आकर घी का दीपक जलाकर मंत्र का ११ माला जप कम से कम ९० दिन तक रोज करें या एक लाख पूरा होने तक जप करते रहें. अंत में हवन हो सके तो श्रेष्ठ अन्यथा २५ हजार जप और करें.ग्रहबाधा, ग्रहपीड़ा, रोग, जमीन-जायदाद का विवाद, हानि की सम्भावना या धन-हानि हो रही हो, वर-वधू के मेलापक दोष, घर में कलह, सजा का भय या सजा होने पर, कोई धार्मिक अपराध होने पर और अपने समस्त पापों के नाश के लिए महामृत्युंजय या लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप किया या कराया जा सकता है.

|| महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ ||

त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वालायजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देयसुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधितपुष्टि = एक सुपोषित स्थिति,फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णतावर्धनम = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है,स्वास्थ्य, धन, सुख में वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है, और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा मालीउर्वारुकम= ककड़ीइव= जैसे, इस तरहबंधना= तनामृत्युर = मृत्यु सेमुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति देंमा= नअमृतात= अमरता, मोक्ष

|महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ ||

समस्‍त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।|| इस मंत्र का विस्तृत रूप से अर्थ ||हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं,उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए.जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं.

| महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव ||

मेरे विचार से महामृत्युंजय मंत्र शोक,मृत्यु भय,अनिश्चता,रोग,दोष का प्रभाव कम करने में,पापों का सर्वनाश करने में अत्यंत लाभकारी है.महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना या करवाना सबके लिए और सदैव मंगलकारी है,परन्तु ज्यादातर तो यही देखने में आता है कि परिवार में किसी को असाध्य रोग होने पर अथवा जब किसी बड़ी बीमारी से उसके बचने की सम्भावना बहुत कम होती है,तब लोग इस मंत्र का जप अनुष्ठान कराते हैं.महामृत्युंजय मंत्र का जाप अनुष्ठान होने के बाद यदि रोगी जीवित नहीं बचता है तो लोग निराश होकर पछताने लगे हैं कि बेकार ही इतना खर्च किया.

यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि मेरे विचार से तो इस मंत्र का मूल अर्थ ही यही है कि हे महादेव..या तो रोगी को ठीक कर दो या तो फिर उसे जीवन मरण के बंधनों से मुक्त कर दो.अत: इच्छानुसार फल नहीं मिलने पर पछताना या कोसना नहीं चाहिए.अंत में एक बात और कहूँगा कि महामृत्युंजय मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण न करें और महा मृत्युंजय मन्त्र जपने के बाद में इक्कीस बार गायत्री मन्त्र का जाप करें ताकि महामृत्युंजय मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण होने पर भी पर अनिष्ट होने का भय न रहे.जगत के स्वामी बाबा भोलेनाथ और माता पार्वती आप सबकी मनोकामना पूर्ण करे

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श्रीकृष्ण लीला
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भगवान दूर खड़े मुस्कुरा रहे है।तभी भगवान के परम मित्र मनसुखा आ गए तो मैया मनसुखा से कहती है-“मनसुखा तू आज लल्ला को पकडवाने मे मदद करेगा तो तुझको खाने को मक्खन दूंगी”

मनसुखा बातों मे आ जाते हैं। अब मनसुखा भी कन्हैया को पकड़ने भागे।कन्हैया बोले-“क्यों रे सखा तू आज माखन के लोभ मे मैया से मार लगवायगो। सोच ले में तो तुझ को रोज चोरी करके माखन खाने की लिए देता हूँ। मैया तो तुझे सिर्फ आज माखन खाने को देगी।अगर तूने मुझे पकड़ा और मैया से मार लगवाई तो अपनी सखा मंडली से तोय बाहर कर दूंगो”

मनसुखा बोले-“देख कान्हा मैया का क्या है एक तो वो तुझ से प्यार इतना करती है जो तुझको जोर से मार तो लगाएगी नहीं और 2 चपत तेरे गाल पे लग जायेगी तो क्या इस ब्राहमण सखा का भला हो जायेगा और माखन खाने को मिल जायेगा चोरी भी नहीं करनी पड़ेगी।
कान्हा बोले-“अच्छा मेरी होए पिटाई और तेरी होय चराई।वाह मनसुखा वाह”

और यह सब कहते हुएउनके छोटे छोटे पैरों में घुंघरू छन-छन करके बज रहे हैं।यशोदा सब कुछ सुन रही हैं।अपने लाल की लीला देख के गुस्सा भी और प्रसन्न भी हो रही हैं। गुस्सा इसलिए हो रही है की इतना छोटा और इतना खोटा, पकड़ मैं ही नहीं आ रहा।अपने लाल की लीला जिसपे सारा बृज वारी-वारी जाता है। भगवान् सुंदर लीला कर रहे हैं। तभी मनसुखा ने माखन के लोभ में कृष्ण को पकड़ लिया है व जोर से आवाज लगायी काकी जल्दी आओ मैंने कान्हा को पकड़ लिया है। आवाज सुनकर मैया दौड़ी-दौड़ी आई।जैसे ही मैया पास पहुंची मनसुखा ने कान्हा को छोड दिया। मनसुखा बोले मैया मैंने इतनी देर से पकड़ के रखो पर तू नाए आई। कान्हा तो हाथ छुडवा के भाग गयो।

जब मैया थककर बैठ गयी तो मनसुखा मैया से बोलो-“मैया तू कहे तो कान्हा को पकड़ने को तरीका बताऊँ तू इसे अपने भक्तन (सखा और सखी गोपियों ) की सौगंध खवा”
मैया बोली-“या चोर को कौन भक्त बनेगो”
फिर भी मैया कन्हैया को सौगंध खवाती है कि कन्हैया तुझे तेरे भक्तो की सौगंध जो मेरी गोदी मे न आयो।
भगवान् मन मे सोचते है “अहम् भक्ता पराधीन “ मैं तो भक्त के आधीन हूँ और वो भागकर मैया के पास चले आते हैं। मैया से बोलते हैं -“अरी मैया अब तू मोये मार या छोड दे ले अब मे तेरे हाथ मे हूँ”

मैया बोली-“लल्ला आज मारूंगी तो नहीं पर छोडूंगी भी नहीं पर तेरी सब नटखटी तो बंद करनी ही पड़ेगी” मैया रेशम की डोरी से उखल से कृष्ण के पेट को बांध रही हैं। भगवान सोच रहे हैं मैया मेरे हाथ को बांधे तो बंध जाऊं पैर बांधे तो भी बंध जाऊं पर मैया तो पेट से बांध रही और मेरे पेट मैं तो पूरा ब्रहम्मांड समाया है। मैया बार बार बंध रही है पर हर बार डोरी 2 उंगल छोटी पड़ जाती है और डोरी जोडके बंधती है तो भी 2 उंगल छोटी पड़ जाती है एक उंगल प्रेम है और दूसरा है कृपा भगवान सोच रहे है की अगर प्रेम है तो कृपा तो मैं अपने आप ही कर देता हूँ। आज जब मैया थक गयी और प्रेम मैं आ गयी तो प्रभु ने कृपा कर दी और अब मैया ने कान्हा को बाँध दिया है।
संस्कृत मे डोरी को दाम कहते है और पेट को उदर कहते है जब भगवान् को रस्सी से पेट से बांधा तो कान्हा का येे नया नाम उत्पन्न हुआ दामोदर।
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देव शर्मा

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किसी राज्य में यज्ञ के लिए राजा एक बकरे की बलि चढ़ाने जा रहा था। उसी समय उधर से भगवान बुद्ध गुजर रहे थे। राजा को ऐसा करते देख वह राजा से बोले, ठहरो, राजन! यह क्या कर रहे हो? इस बेजान बकरे की भेंट क्यों चढ़ा रहे हो? आखिर किसलिए? राजा ने कहा, इसकी बलि चढ़ाने से मुझे बहुत पुण्य प्राप्त होगा। और यह हमारी प्रथा भी है।

राजा की इस बात पर बुद्ध ने कहा, ‘यदि ऐसी बात है तो मुझे भेंट चढ़ा दो। तुम्हें और ज्यादा पुण्य मिलेगा। बकरे के मुकाबले एक मनुष्य की बलि से तुम्हारे भगवान और खुश होंगे।’ यह सुनकर राजा थोड़ा डरा। क्योंकि बकरे की बलि चढ़ाने में कोई हर्जा नहीं था। बकरे की तरफ से बोलने वाला कोई होगा, ऐसा राजा सोच नहीं सकता था। मगर, बुद्ध की बलि चढ़ाने की बात मन में आते ही राजा कांप गया। उसने कहा,‘अरे, नहीं महाराज! आप ऐसी बात न करें।

इस बारे में तो मैं सोच भी नहीं सकता। बकरे की बात अलग है। ऐसा तो सदियों से होता आया है। और फिर इसमें किसी का नुकसान भी तो नहीं। बकरे का भी फायदा ही है। वह सीधा स्वर्ग चला जाएगा।’ बुद्ध बोले,‘यह तो बहुत ही अच्छा है, मैं स्वर्ग की तलाश कर रहा हूं, तुम मुझे बलि चढ़ा दो और मुझे स्वर्ग भेज दो। या फिर ऐसा क्यों नहीं करते कि तुम अपने माता-पिता को ही स्वर्ग भेज दो। और खुद को ही क्यों रोके हुए हो..जब स्वर्ग जाने की ऐसी सरल व सुगम तरकीब मिल गई है तो काट लो गर्दन।

इस बेचारे बेजान बकरे को क्यों स्वर्ग में भेज रहे हो? यह शायद स्वर्ग में जाना भी न चाहता हो। बकरे को खुद ही चुनने दो कि उसे कहां जाना है।’ राजा के सामने अपने तर्कों की पोल खुल चुकी थी। वह महात्मा बुद्ध के चरणों पर झुक कर बोला, ‘महाराज आपने मेरी आंखों पर पड़े अज्ञान के परदे को हटाकर मेरा जो उपकार किया है वह मैं भूल नहीं सकता।’

संजय गुप्ता

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भगवान के वंश और नृग राजा की कथा


Dasham skandh utrardh
भगवान के वंश और नृग राजा की कथा

भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक पत्नी के गर्भ से दस-दस पुत्र उत्पन्न हुए, पुत्रो की माताये ही सोलह हजार से अधिक थी, इसलिए उनके पुत्र-पौत्रो की संख्या करोडो़ तक पहुँच गयी .छप्पन करोड़ का भगवान का वंश हो गया. वे रूप, बल, आदि गुणों में, अपने पिता भगवान श्रीकृष्ण से किसी बात में कम न थे. उन्हें पढाने के लिए तीन हजार शिक्षक लगे थे.
रानियाँ देखती कि भगवान हमारे महल से कभी बाहर नहीं जाते, सदा हमारे पास बने रहते है. इससे वे यही समझती कि श्रीकृष्ण को मै ही सबसे प्यारी हूँ. परन्तु वे अपने पति भगवान श्रीकृष्ण का तत्व- उनकी महिमा नहीं समझती थी. वे सुंदरियाँ अपने आत्मानंद में एकरस स्थित भगवान श्रीकृष्ण के कमल-कलि के समान सुन्दर मुख, विशाल बाहु, प्रेमभरी मुस्कान, से स्वयं ही मोहित रहती थी.अब नित्य-निरंतर उनके प्रेम और आनंद की अभिवृद्धि होती रहती थी.वे प्रेम भरी मुस्कराहट, मधुर चितवन, आदि से भगवान की सेवा करती रहती थी. उनमे से सभी पत्नियों के साथ सेवा करने के लिए सैकड़ो दासियाँ रहती फिर भी जब उनके महल में भगवान पधारते, तब वे स्वयं आगे जाकर आदरपूर्वक उन्हें लिवा लाती श्रेष्ठ आसन पर बैठाती, उत्तम सामग्रियों से उनकी पूजा करती, चरणकमल पखारती, पान लगाकर खिलाती, पाँव दबाकर थकावट दूर करती, पंखा झलती, इत्र-फुलेल, चन्दन, आदि लगाती फूलो के हार पहनाती, केश सवारती, सुलाती, स्नान कराती, और अनेक के भोजन कराकर अपने हाथो भगवान की सेवा करती.
रुक्मिणी के दस पुत्र थे जिनमे ‘प्रधुम्न’सबसे बड़े थे. – कामदेव का जन्म ही प्रधुम्न के नाम से भगवान कृष्ण के पुत्र के रूप में हुआ. प्रधुम्न के पुत्र ‘अनिरुद्ध’हुए. जिनका विवाह बाणासुर की बेटी उषा से हुआ.जाम्बवती के बड़े बेटे का नाम साम्ब था.
एक दिन साम्ब, प्रधुम्न, चारुभानु आदि राजकुमार घूमने के लिए उपवन में गए. वहाँ बहुत देर तक खेल-खेलते हुए उन्हें प्यास लगी.वे इधर-उधर जल की खोज करने लगे. वे एक कुएँ के पास गए उसमे जल तो था नहीं, एक बड़ा विचित्र जीव दीख पड़ा. वह जीव पर्वत के समान आकर का एक गिरगिट था उसे देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही.
उन्होंने यह वृत्तान्त श्रीकृष्ण के पास जाकर निवेदन किया. जगत के जीवनदाता कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण उस कुएँ पर आये.और अनायास ही उसको बाहर निकाल लिया. भगवान श्रीकृष्ण के करकमलों का स्पर्श होते ही उसका गिरगिट रूप जाता रहा और वह एक स्वर्गीय देवता के रूप में परिणित हो गया. अब उसके शरीर का रंग तपाये हुए सोने के समान चमक रहा था. भगवान ने उससे पूछा- महाभाग तुम कौन हो? तुम्हे किस कर्म के फलस्वरुप इस योनी में आना पड़ा था? आप अपना परिचय दो.
राजा ने कहा – ‘प्रभु! मै महाराज इक्ष्वाकु का पुत्र राजा नृग हूँ. जब कभी किसी ने आपके सामने दानियो की गिनती की होगी तब उसमे मेरा नाम अवश्य ही आपने सुना होगा. ‘भगवन! पृथ्वी में जितने धूलिकण है, आकाश में जितने तारे है, और वर्षा में जितनी जलधाराएँ गिरती है, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थी. वे सभी गौएँ दुधारू, नौजवान, सीधी, सुन्दर, और कपिला थी.उन्हें मैंने न्याय के धन से प्राप्त किया था. उनके सीगो में सोना मढ़ा दिया गया था और खुर चाँदी के थे.उन्हे वस्त्र, हार, से सजा दिया था. सबके बछड़े थे. और भगवन् मै श्रेष्ठ ब्राह्मण कुमारो को जो सद्गुणी, शील, संपन्न, वेदपाठी होते, उन्हें गौओ का दान करता.
एक दिन किसी अयाचक(दान न लेने वाले)तपस्वी ब्राह्मण की एक गाय बिछुड़कर कर मेरी गौओ में आ मिली. मुझे इस बात का बिलकुल पता न चला इसलिए मैंने अनजाने में उसे किसी दूसरे ब्राह्मण को दान कर दिया. जब उस गाय को वे ब्राह्मण ले चले.
तब उस गाय के असली स्वामि ने कहा–‘यह गौ मेरी है’
दान ले जाने वाले ब्राह्मण ने कहा- ‘यह तो मेरी है’ क्योकि राजा नृग ने मुझे दी है और वे दोनों ब्राह्मण आपस में झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करने के लिए मेरे पास आये.
एकनेकहा- यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है. और दूसरे ने कहा –यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है. ‘भगवन् उन दोनों ब्राह्मणों की बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया. मैंने धर्मसंकट में पड़कर उन दोनों से बड़ी अनुनय-विनय की. और कहा कि मै बदले में एक लाख उत्तम गौए दूँगा.मुझसे अनजाने में यह अपराध बन गया है.पर दोनों ब्राह्मण नहीं माने और चले गए.
इसके बाद आयु समाप्त होने पर यमराज ने मुझसे पूंछा – ‘राजन! तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? तुम्हारे दान और धर्म के फलस्वरूप तुम्हे ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होने वाला है जिसकी कोई सीमा ही नहीं है. तब मैंने यमराज से कहा –‘देव! पहले मै अपने पाप का फल भोगना चाहता हूँ.
और उसी क्षण यमराज ने कहा – तुम गिर जाओ. उनके ऐसा कहते ही, मै वहाँ से गिरा और गिरते ही समय मैंने देखा कि मै गिरगिट हो गया हूँ.तब से आज तक में इसी रूप में पद हूँ आज आपकी कृपा से इस देह से मुक्ति मिली है.राजा नृग इस प्रकार कहकर भगवान की परिक्रमा की.और फिर आज्ञा लेकार सबके देखते-देखते ही वे श्रेष्ठ विमान पर सवार हो गए.
राजा नग के चले जाने पर भगवान श्री कृष्ण ने अपने कुटुंब के लोगो को शिक्षा देने के लिए कहा – जो लोग अग्नि के समान तेजस्वी है वे भी ब्राह्मणों का थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते. मै हलाहल विष को विष नहीं मानता क्योकि उसकी चिकित्सा होती है. परन्तु ब्राह्मणों का धन ही ‘परमविष’ है उसको पचा लेने के लिए पृथ्वी में कोई औषधि, कोई उपाय, नहीं है. हलाहल विष केवल खाने वाले का ही प्राण लेता है परन्तु ब्राह्मण के धन रूप अरणी से जो आग पैदा होती है वह सारे कुल को समूल जला डालती है. ब्राह्मण का धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिए बिना भोग जाये तब तो वह भोगने वाले उसके लड़के, और पौत्र इन तीन पीढियों को ही चौपट करता है. परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाये तब तो पूर्वपुरुषो की दस पीढियाँ और आगे आने की भी दस पीढियाँ नष्ट हो जाती है. जो ब्राह्मण का धन हड़पता है समझना चाहिये कि वह जान-बूझकर नर्क में जाने का रास्ता साफ कर रहे है. उनके रोने पर, उनके आँसू की बूंदों से जितने धरती के धूलिकण भीगते है उतने वर्षों तक ब्राह्मण के स्वत्व छीनने वाले को कुम्भीपाक नरक में दुख भोगना पड़ता है. वे साठ हजार वर्षों तक विष्ठा के कीड़े होते है. इसलिए कभी भूले से भी ब्राह्मण के धन की इच्छा भी करते है उसे छीनना तो अलग रहा. वे इस जन्म में अल्पायु, शत्रुओ से पराजित, और राज्यभ्रष्ट हो जाते है. ब्राह्मण अपराध करे, मार ही क्यों न बैठे. बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे. उसे नमस्कार ही करो. इस प्रकार भगवान अपने ही पुत्रो, पौत्रो को समय-समय पर शिक्षा देते रहते थे.
सार-
भगवान भी ब्राह्मण को अपना ईष्ट देव मानते है ब्राह्मण शब्द में ही हम ब्राह्मण ‘देव’ लगाते है.नारदजी को भगवान वैकुण्ठ बार-बार बुलाते है ताकि उनकी चरण धूलि से वैकुण्ठ पवित्र हो जाये.
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संजय गुप्ता

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Excellent Story, Pl read till end

  कर्म और  भाग्य

एक पान वाला था। जब भी पान खाने जाओ ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता। कई बार उसे कहा की भाई देर हो जाती है जल्दी पान लगा दिया करो पर उसकी बात ख़त्म ही नही होती।
एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।
तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैनें सोचा कि चलो आज उसकी फ़िलासफ़ी देख ही लेते हैं।
मैंने एक सवाल उछाल दिया।
मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?
और उसके जवाब से मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।
कहने लगा,आपका किसी बैंक में लाॅकर तो होगा?
उसकी चाभियाँ ही इस सवाल का जवाब है। हर लाॅकर की दो चाभियाँ होती हैं।
एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास।
आप के पास जो चाभी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली भाग्य।
जब तक दोनों नहीं लगतीं लाॅकर का ताला नही खुल सकता।
आप कर्मयोगी पुरुष हैं ओर मैनेजर भगवान।
अाप को अपनी चाभी भी लगाते रहना चाहिये।
पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगा दे। कहीं ऐसा न हो की भगवान अपनी भाग्यवाली चाभी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाभी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये ।

what a beautiful interpretation of Karma and Bhagya
🌹👌🌹

संजय गुप्ता

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सामर्थवान बनो
शेर बनना है या लोमड़ी….
एक बार एक किसान जंगल में लकड़ी बिनने गया तो उसने एक अद्भुत बात देखी.
एक लोमड़ी के दो पैर नहीं थे, फिर भी वह खुशी खुशी घसीट कर चलरही थी.यह कैसे ज़िंदा रहती है जबकि किसी शिकार को भी नहीं पकड़ सकती,
किसान ने सोचा. तभी उसने देखा कि एक शेर अपने दांतो में एक शिकार दबाए उसी तरफ आ रहा है.सभी जानवर भागने लगे, वह किसान भी पेड़ पर चढ़ गया. उसने देखा कि शेर, उस लोमड़ी के पास आया. उसे खाने की जगह, प्यार से शिकार का थोड़ा हिस्सा डालकर चला गया.दूसरे दिन भी उसने देखा कि शेर बड़े प्यार से लोमड़ी को खाना देकर चला गया.
किसान ने इस अद्भुत लीला के लिये भगवान का मनमें नमन किया.उसे अहसास हो गया कि भगवान जिसे पैदा करते है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देते हैं.यह जानकर वह भी एक निर्जन स्थान चला गया और वहां पर चुपचाप बैठ कर भोजन का रास्ता देखता.
कई दिन गुज़र गये, कोई नहीं आया . वह मरणासन्न होकर वापस लौटने लगा.
तभी उसे एक विद्वान महात्मा मिले. उन्होंने उसे भोजन पानी कराया.तो वह किसान उनके चरणों में गिरकर वह लोमड़ी की बात बताते हुए बोला, महाराज, भगवान ने उस अपंग लोमड़ी पर दया दिखाई पर मैं तो मरते मरते बचा.ऐसा क्यों हुआ कि भगवान् मुझ पर इतने निर्दयी हो गये ?
महात्मा उस किसान के सर पर हाथ फिराकर मुस्कुराकर बोले, तुम इतने नासमझ हो गये कि तुमने भगवान का इशारा भी नहीं समझा,इसीलिये तुम्हें इस तरह की मुसीबत उठानी पड़ी. तुम ये क्योंनहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह मदद करने वाला बनते देखना चाहते थे,निरीह लोमड़ी की तरह नहीं।
हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिएउसके विपरीत समझ लेते हैं. ईश्वर ने हम सभी के अन्दर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं.चुनाव हमें करना है, शेर बनना है या लोमड़ी।🌹..OM SHANTI ….🌹

संजय गुप्ता

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सोया भाग्य

एक व्यक्ति जीवन से हर प्रकार से निराश था । लोग उसे मनहूस के नाम से बुलाते थे ।
एक ज्ञानी पंडित ने उसे बताया कि तेरा भाग्य फलां पर्वत पर सोया हुआ है , तू उसे जाकर जगा ले तो भाग्य तेरे साथ हो जाएगा । बस ! फिर क्या था वो चल पड़ा अपना सोया भाग्य जगाने ।
रास्ते में जंगल पड़ा तो एक शेर उसे खाने को लपका , वो बोला भाई ! मुझे मत खाओ , मैं अपना सोया भाग्य जगाने जा रहा हूँ ।
शेर ने कहा कि तुम्हारा भाग्य जाग जाये तो मेरी एक समस्या है , उसका समाधान पूछते लाना । मेरी समस्या ये है कि मैं कितना भी खाऊं … मेरा पेट भरता ही नहीं है , हर समय पेट भूख की ज्वाला से जलता रहता है ।
मनहूस ने कहा– ठीक है । आगे जाने पर एक किसान के घर उसने रात बिताई । बातों बातों में पता चलने पर कि वो अपना सोया भाग्य जगाने जा रहा है ,
किसान ने कहा कि मेरा भी एक सवाल है .. अपने भाग्य से पूछकर उसका समाधान लेते आना … मेरे खेत में , मैं कितनी भी मेहनत कर लूँ . पैदावार अच्छी होती ही नहीं । मेरी शादी योग्य एक कन्या है, उसका विवाह इन परिस्थितियों में मैं कैसे कर पाऊंगा ?

मनहूस बोला — ठीक है । और आगे जाने पर वो एक राजा के घर मेहमान बना । रात्री भोज के उपरान्त राजा ने ये जानने पर कि वो अपने भाग्य को जगाने जा रहा है , उससे कहा कि मेरी परेशानी का हल भी अपने भाग्य से पूछते आना । मेरी परेशानी ये है कि कितनी भी समझदारी से राज्य चलाऊं… मेरे राज्य में अराजकता का बोलबाला ही बना रहता है ।
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मनहूस ने उससे भी कहा — ठीक है । अब वो पर्वत के पास पहुँच चुका था । वहां पर उसने अपने सोये भाग्य को झिंझोड़ कर जगाया— उठो ! उठो ! मैं तुम्हें जगाने आया हूँ । उसके भाग्य ने एक अंगडाई ली और उसके साथ चल दिया ।
उसका भाग्य बोला — अब मैं तुम्हारे साथ हरदम रहूँगा ।
अब वो मनहूस न रह गया था बल्कि भाग्यशाली व्यक्ति बन गया था और अपने भाग्य की बदौलत वो सारे सवालों के जवाब जानता था ।
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वापसी यात्रा में वो उसी राजा का मेहमान बना और राजा की परेशानी का हल बताते हुए वो बोला — चूँकि तुम एक स्त्री हो और पुरुष वेश में रहकर राज – काज संभालती हो , इसीलिए राज्य में अराजकता का बोलबाला है । तुम किसी योग्य पुरुष के साथ विवाह कर लो , दोनों मिलकर राज्य भार संभालो तो तुम्हारे राज्य में शांति स्थापित हो जाएगी ।
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रानी बोली — तुम्हीं मुझ से ब्याह कर लो और यहीं रह जाओ ।
भाग्यशाली बन चुका वो मनहूस इन्कार करते हुए बोला — नहीं नहीं ! मेरा तो भाग्य जाग चुका है । तुम किसी और से विवाह कर लो । तब रानी ने अपने मंत्री से विवाह किया और सुखपूर्वक राज्य चलाने लगी |
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कुछ दिन राजकीय मेहमान बनने के बाद उसने वहां से विदा ली ।
चलते चलते वो किसान के घर पहुंचा और उसके सवाल के जवाब में बताया कि तुम्हारे खेत में सात कलश हीरे जवाहरात के गड़े हैं , उस खजाने को निकाल लेने पर तुम्हारी जमीन उपजाऊ हो जाएगी और उस धन से तुम अपनी बेटी का ब्याह भी धूमधाम से कर सकोगे ।
किसान ने अनुग्रहित होते हुए उससे कहा कि मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ , तुम ही मेरी बेटी के साथ ब्याह कर लो ।पर भाग्यशाली बन चुका वह व्यक्ति बोला कि नहीं !नहीं ! मेरा तो भाग्योदय हो चुका है , तुम कहीं और अपनी सुन्दर कन्या का विवाह करो । किसान ने उचित वर देखकर अपनी कन्या का विवाह किया और सुखपूर्वक रहने लगा ।
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कुछ दिन किसान की मेहमाननवाजी भोगने के बाद वो जंगल में पहुंचा और शेर से उसकी समस्या के समाधानस्वरुप कहा कि यदि तुम किसी बड़े मूर्ख को खा लोगे तो तुम्हारी ये क्षुधा शांत हो जाएगी ।

शेर ने उसकी बड़ी आवभगत की और यात्रा का पूरा हाल जाना । सारी बात पता चलने के बाद शेर ने कहा कि भाग्योदय होने के बाद इतने अच्छे और बड़े दो मौके गंवाने वाले ऐ इंसान ! तुझसे बड़ा मूर्ख और कौन होगा ? तुझे खाकर ही मेरी भूख शांत होगी और इस तरह वो इंसान शेर का शिकार बनकर मृत्यु को प्राप्त हुआ ।
यदि आपके पास सही मौका परखने का विवेक और अवसर को पकड़ लेने का ज्ञान नहीं है तो भाग्य भी आपके साथ आकर आपका कुछ भला नहीं कर सकता है।

संजय गुप्ता

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श्रीमद भागवत पुराण से ली गयी, विष्णु भक्त अजामिल की कथा!!!!

कान्यकुब्ज (कन्नौज) में एक दासी पति ब्राम्हण रहता था। उसका नाम अजामिल था। यह अजामिल बड़ा शास्त्रज्ञ था। शील, सदाचार और सद्गुणों का तो यह खजाना ही था। ब्रम्हचारी, विनयी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ, मन्त्रवेत्ता और पवित्र भी था। इसने गुरु, संत-महात्माओं सबकी सेवा की थी। एक बार अपने पिता के आदेशानुसार वन में गया और वहाँ से फल-फूल, समिधा तथा कुश लेकर घर के लिये लौटा।

लौटते समय इसने देखा की एक व्यक्ति मदिरा पीकर किसी वेश्या के साथ विहार कर रहा है। वेश्या भी शराब पीकर मतवाली हो रही है। अजामिल ने पाप किया नहीं केवल आँखों से देखा और काम के वश हो गया । अजामिल ने अपने मन को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। अब यह मन-ही-मन उसी वेश्या का चिन्तन करने लगा और अपने धर्म से विमुख हो गया ।

अजामिल सुन्दर-सुन्दर वस्त्र-आभूषण आदि वस्तुएँ, जिनसे वह प्रसन्न होती, ले आता। यहाँ तक कि इसने अपने पिता की सारी सम्पत्ति देकर भी उसी कुलटा को रिझाया। यह ब्राम्हण उसी प्रकार की चेष्टा करता, जिससे वह वेश्या प्रसन्न हो।

इस वेश्या के चक्कर में इसने अपने कुलीन नवयुवती और विवाहिता पत्नी तक का परित्याग कर दिया और उस वैश्या के साथ रहने लगा। इसने बहुत दिनों तक वेश्या के मल-समान अपवित्र अन्न से अपना जीवन व्यतीत किया और अपना सारा जीवन ही पापमय कर लिया। यह कुबुद्धि न्याय से, अन्याय से जैसे भी जहाँ कहीं भी धन मिलता, वहीं से उठा लाता। उस वेश्या के बड़े कुटुम्ब का पालन करने में ही यह व्यस्त रहता। चोरी से, जुए से और धोखा-धड़ी से अपने परिवार का पेट पलटा था।

एक बार कुछ संत इसके गांव में आये। गाँव के बाहर संतों ने कुछ लोगों से पूछा की भैया, किसी ब्राह्मण का घर बताइए हमें वहां पर रात गुजारनी है। इन लोगों ने संतों के साथ मजाक किया और कहा- संतों- हमारे गाँव में तो एक ही श्रेष्ठ ब्राह्मण है जिसका नाम है अजामिल। और इतना बड़ा भगवान का भक्त है की गाँव के अंदर नहीं रहता गाँव के बाहर ही रहता है।

अब संत जन अजामिल के घर पहुंचे और दरवाजा खटखटाया- भक्त अजामिल दरवाजा खोलो। जैसे ही अजामिल ने आज दरवाजा खोला तो संतों के दर्शन करते ही मानो आज अपने पुराने अच्छे कर्म उसे याद आ गए।

संतों ने कहा की भैया- रात बहुत हो गई है आप हमारे लिए भोजन और सोने का प्रबंध कीजिये।अजामिल ने सुंदर भोजन तैयार करवाया और संतो को करवाया। जब अजामिल ने संतों से सोने के लिए कहा तो संत कहते हैं भैया- हम प्रतिदिन सोने से पहले कीर्तन करते हैं। यदि आपको समस्या न हो तो हम कीर्तन करलें?

अजामिल ने कहा- आप ही का घर है महाराज! जो दिल में आये सो करो।

संतों ने सुंदर कीर्तन प्रारम्भ किया और उस कीर्तन में अजामिल बैठा। सारी रात कीर्तन चला और अजामिल की आँखों से खूब आसूं गिरे हैं। मानो आज आँखों से आंसू नहीं पाप धूल गए हैं। सारी रात भगवान का नाम लिया ।

जब सुबह हुई संत जन चलने लगे तो अजामिल ने कहा- महात्माओं, मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं कोई भक्त वक्त नहीं हूँ। मैं तो एक मह पापी हूँ। मैं वैश्या के साथ रहता हूँ। और मुझे गाँव से बाहर निकाल दिया गया है। केवल आपकी सेवा के लिए मैंने आपको भोजन करवाया। नहीं तो मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं है।

संतों ने कहा- अरे अजामिल! तूने ये बात हमें कल क्यों नहीं बताई, हम तेरे घर में रुकते ही नहीं।

अब तूने हमें आश्रय दिया है तो चिंता मत कर। ये बता तेरे घर में कितने बालक हैं। अजामिल ने बता दिया की महाराज 9 बच्चे हैं और अभी ये गर्भवती है।

संतों ने कहा की अबके जो तेरे संतान होंगी वो तेरे पुत्र होगा। और तू उसका नाम “नारायण” रखना। जा तेरा कल्याण हो जायेगा।

संत जन आशीर्वाद देकर चले गए। समय बिता उसके पुत्र हुआ। नाम रखा नारायण। अजामिल अपने नारायण पुत्र में बहुत आशक्त था। अजामिल ने अपना सम्पूर्ण हृदय अपने बच्चे नारायण को सौंप दिया था। हर समय अजामिल कहता था- नारायण भोजन करलो।

नारायण पानी पी लो। नारायण तुम्हारा खेलने का समय है तुम खेल लो। हर समय नारायण नारायण करता था।

इस तरह अट्ठासी वर्ष बीत गए। वह अतिशय मूढ़ हो गया था, उसे इस बात का पता ही न चला कि मृत्यु मेरे सिर पर आ पहुँची है ।

अब वह अपने पुत्र बालक नारायण के सम्बन्ध में ही सोचने-विचारने लगा। इतने में ही अजामिल ने देखा कि उसे ले जाने के लिये अत्यन्त भयावने तीन यमदूत आये हैं। उनके हाथों में फाँसी है, मुँह टेढ़े-टेढ़े हैं और शरीर के रोएँ खड़े हुए हैं । उस समय बालक नारायण वहाँ से कुछ दूरी पर खेल रहा था।

यमदूतों को देखकर अजामिल डर गया और अपने पुत्र को कहता हैं-नारायण! नारायण मेरी रक्षा करो! नारायण मुझे बचाओ!

भगवान् के पार्षदों ने देखा कि यह मरते समय हमारे स्वामी भगवान् नारायण का नाम ले रहा है, उनके नाम का कीर्तन कर रहा है; अतः वे बड़े वेग से झटपट वहाँ आ पहुँचे । उस समय यमराज के दूर दासीपति अजामिल के शरीर में से उसके सूक्ष्म शरीर को खींच रहे थे। विष्णु दूतों ने बलपूर्वक रोक दिया ।

उनके रोकने पर यमराज के दूतों ने उनसे कहा—‘अरे, धर्मराज की आज्ञा का निषेध करने वाले तुम लोग हो कौन ? तुम किसके दूत हो, कहाँ से आये हो और इसे ले जाने से हमें क्यों रोक रहे हो ?

जब यमदूतों ने इस प्रकार कहा, तब भगवान् नारायण के आज्ञाकारी पार्षदों ने हँसकर कहा—यमदूतों! यदि तुम लोग सचमुच धर्मराज के आज्ञाकारी हो तो हमें धर्म का लक्षण और धर्म का तत्व सुनाओ । दण्ड का पात्र कौन है ?

यमदूतों ने कहा—वेदों ने जिन कर्मों का विधान किया है, वे धर्म हैं और जिनका निषेध किया है, वे अधर्म हैं। वेद स्वयं भगवान् के स्वरुप हैं। वे उनके स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास एवं स्वयं प्रकाश ज्ञान हैं—ऐसा हमने सुना है । पाप कर्म करने वाले सभी मनुष्य अपने-अपने कर्मों के अनुसार दण्डनीय होते हैं ।

भगवान् के पार्षदों ने कहा—यमदूतों! यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि धर्मज्ञों की सभा में अधर्म प्रवेश कर रह है, क्योंकि वहाँ निरपराध और अदण्डनीय व्यक्तियों को व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है । यमदूतों! इसने कोटि-कोटि जन्मों की पाप-राशि का पूरा-पूरा प्रायश्चित कर लिया है। क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान् के परम कल्याणमय (मोक्षप्रद) नाम का उच्चारण तो किया है ।

जिस समय इसने ‘नारायण’ इन चार अक्षरों का उच्चारण किया, उसी समय केवल उतने से ही इस पापी के समस्त पापों का प्रायश्चित हो गया । चोर, शराबी, मित्रद्रोही, ब्रम्हघाती, गुरुपत्नीगामी, ऐसे लोगों का संसर्गी; स्त्री, राजा, पिता और गाय को मारने वाला, चाहे जैसा और चाहे जितना बड़ा पापी हो, सभी के लिये यही—इतना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है कि भगवान् के नामों का उच्चारण किया जाय; क्योंकि भगवन्नामों के उच्चारण से मनुष्य की बुद्धि भगवान् के गुण, लीला और स्वरुप में रम जाती है और स्वयं भगवान् की उसके प्रति आत्मीय बुद्धि हो जाती है ।

तुम लोग अजामिल को मत ले जाओ। इसने सारे पापों का प्रायश्चित कर लिया है, क्योंकि इसने मरते समय भगवान् के नाम का उच्चारण किया है।

इस प्रकार भगवान् के पार्षदों ने भागवत-धर्म का पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मृत्यु के मुख से बचा लिया भगवान् की महिमा सुनने से अजामिल के हृदय में शीघ्र ही भक्ति का उदय हो गया।

अब उसे अपने पापों को याद करके बड़ा पश्चाताप होने लगा । (अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा—) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियों का दास हूँ! मैंने एक दासी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न करके अपना ब्राम्हणत्व नष्ट कर दिया। यह बड़े दुःख की बात है। धिक्कार है! मुझे बार-बार धिक्कार है! मैं संतों के द्वारा निन्दित हूँ, पापात्मा हूँ! मैंने अपने कुल में कलंक का टीका लगा दिया! मेरे माँ-बाप बूढ़े और तपस्वी थे। मैंने उनका भी परित्याग कर दिया।

ओह! मैं कितना कृतघ्न हूँ। मैं अब अवश्य ही अत्यन्त भयावने नरक में गिरूँगा, जिसमें गिरकर धर्मघाती पापात्मा कामी पुरुष अनेकों प्रकार की यमयातना भोगते हैं। कहाँ तो मैं महाकपटी, पापी, निर्लज्ज और ब्रम्हतेज को नष्ट करने वाला तथा कहाँ भगवान् का वह परम मंगलमय ‘नारायण’ नाम! (सचमुच मैं तो कृतार्थ हो गया)।

अब मैं अपने मन, इन्द्रिय और प्राणों को वश में करके ऐसा प्रयत्न करूँगा कि फिर अपने को घोर अन्धकारमय नरक में न डालूँ । मैंने यमदूतों के डर अपने पुत्र “नारायण” को पुकारा। और भगवान के पार्षद प्रकट हो गए यदि मैं वास्तव में नारायण को पुकारता तो क्या आज श्री नारायण मेरे सामने प्रकट नहीं हो जाते?

अब अजामिल के चित्त में संसार के प्रति तीव्र वैराग्य हो गया। वे सबसे सम्बन्ध और मोह को छोड़कर हरिद्वार चले गये। उस देवस्थान में जाकर वे भगवान् के मन्दिर में आसन से बैठ गये और उन्होंने योग मार्ग का आश्रय लेकर अपनी सारी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन में लीन कर लिया और मन को बुद्धि में मिला दिया। इसके बाद आत्मचिन्तन के द्वारा उन्होंने बुद्धि को विषयों से पृथक् कर लिया तथा भगवान् के धाम अनुभव स्वरुप परब्रम्ह में जोड़ दिया ।

इस प्रकार जब अजामिल की बुद्धि त्रिगुणमयी प्रकृति से ऊपर उठकर भगवान् के स्वरुप में स्थित हो गयी, तब उन्होंने देखा कि उनके सामने वे ही चारों पार्षद, जिन्हें उन्होंने पहले देखा था, खड़े हैं। अजामिल ने सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया। उनका दर्शन पाने के बाद उन्होंने उस तीर्थस्थान में गंगा के तट पर अपना शरीर त्याग दिया और तत्काल भगवान् के पार्षदों का स्वरुप प्राप्त कर दिया।

अजामिल भगवान् के पार्षदों के साथ स्वर्णमय विमान पर आरूढ़ होकर आकाश मार्ग से भगवान् लक्ष्मीपति के निवास स्थान वैकुण्ठ को चले गये ।

शुकदेव जी महाराज कहते हैं परीक्षित्! यह इतिहास अत्यन्त गोपनीय और समस्त पापों का नाश करने वाला है। जो पुरुष श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह नरक में कही नहीं जाता। यमराज के दूत तो आँख उठाकर उसकी ओर देख तक नहीं सकते। उस पुरुष का जीवन चाहे पापमय ही क्यों न रहा हो, वैकुण्ठलोक में उसकी पूजा होती है । परीक्षित्! देखो-अजामिल-जैसे पापी ने मृत्यु के समय पुत्र के बहाने भगवान् नाम का उच्चारण किया! उसे भी वैकुण्ठ की प्राप्ति हो गयी! फिर जो लोग श्रद्धा के साथ भगवन्नाम का उच्चारण करते हैं, उनकी तो बात ही क्या है ।

जब भगवान के पार्षदों ने यमदूतों से अजामिल को छुड़ाया तो यमदूत यमराज के पास पहुंचे और कहते हैं-

प्रभो! संसार के जीव तीन प्रकार के कर्म करते हैं—पाप, पुण्य अथवा दोनों से मिश्रित। इन जीवों को उन कर्मों का फल देने वाले शासक संसार में कितने हैं ?

हम तो ऐसा समझते हैं कि अकेले आप ही समस्त प्राणियों और उनके स्वामियों के भी अधीश्वर हैं। आप ही मनुष्यों के पाप और पुण्य के निर्णायक, दण्डदाता और शासक हैं।

यमराज ने कहा—दूतों! मेरे अतिरिक्त एक और ही चराचर जगत् के स्वामी हैं। उन्हीं में यह सम्पूर्ण जगत् सूत में वस्त्र के समान ओत-प्रोत है। उन्हीं के अंश, ब्रम्हा, विष्णु और शंकर इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करते हैं। उन्हीं ने इस सारे जगत् को नथे हुए बैल के समान अपने अधीन कर रखा है।

मेरे प्यारे दूतों! जैसे किसान अपने बैलों को पहले छोटी-छोटी रस्सियों में बाँधकर फिर उन रस्सियों को एक बड़ी आड़ी रस्सी में बाँध देते हैं, वैसे ही जगदीश्वर भगवान् ने भी ब्रम्हाणादि वर्ण और ब्रम्हचर्य आदि आश्रम रूप छोटी-छोटी नाम की रस्सियों में बाँधकर फिर सब नामों को वेदवाणी रूप बड़ी रस्सी में बाँध रखा है। इस प्रकार सारे जीव नाम एवं कर्म रूप बन्धन में बँधे हुए भयभीत होकर उन्हें ही अपना सर्वस्व भेंट कर रहे हैं।

सभी भगवान के आधीन हैं इनमें मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, शंकर, वायु, सूर्य, ब्रम्हा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रूद्र, रजोगुण एवं तमोगुण से रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता।

भगवान् के नामोच्चारण की महिमा तो देखो, अजामिल-जैसा पापी भी एक बार नामोच्चारण करने मात्र से मृत्युपाश से छुटकारा पा गया। भगवान् के गुण, लीला और नामों का भलीभाँति कीर्तन मनुष्यों के पापों का सर्वथा विनाश कर दे, यह कोई उसका बहुत बड़ा फल नहीं है, क्योंकि अत्यन्त पापी अजामिल ने मरने के समय चंचल चित्त से अपने पुत्र का नाम ‘नारायण’ उच्चारण किया। उस नामाभासमात्र से ही उसके सारे पाप तो क्षीण हो ही गये, मुक्ति की प्राप्ति भी हो गयी। बड़े-बड़े विद्वानों की बुद्धि कभी भगवान् की माया से मोहित हो जाती है।

वे कर्मों के मीठे-मीठे फलों का वर्णन करने वाली अर्थवाद रूपिणी वेदवाणी में ही मोहित हो जाते हैं और यज्ञ-यागादि बड़े-बड़े कर्मों में ही संलग्न रहते हैं तथा इस सुगमातिसुगम भगवन्नाम की महिमा को नहीं जानते। यह कितने खेद की बात है। प्रिय दूतों! बुद्धिमान् पुरुष ऐसा विचार कर भगवान् अनन्त में ही सम्पूर्ण अन्तःकरण से अपना भक्तिभाव स्थापित करते हैं। वे मेरे दण्ड के पात्र नहीं हैं। पहली बात तो यह है कि वे पाप करते ही नहीं, लेकिन यदि कदाचित् संयोगवश कोई पाप बन भी जाय, तो उसे भगवान् का गुणगान तत्काल नष्ट कर देता है।

जिनकी जीभ भगवान् के गुणों और नामों का उच्चारण नहीं करती, जिनका चित्त उनके चरणारविन्दों का चिन्तन नहीं करता और जिनका सिर एक बार भी भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में नहीं झुकता, उन भगवत्सेवा-विमुख पापियों को ही मेरे पास लाया करो।

जब यमदूतों ने अपने स्वामी धर्मराज के मुख से इस प्रकार भगवान् की महिमा सुनी और उसका स्मरण किया, तब उनके आश्चर्य की सीमा न रही। तभी से वे धर्मराज की बात पर विश्वास करके अपने नाश की आशंका से भगवान् के आश्रित भक्तों के पास नहीं जाते और तो क्या, वे उनकी ओर आँख उठाकर देखने में भी डरते हैं।

प्रिय परीक्षित्! यह इतिहास परम गोपनीय—अत्यन्त रहस्यमय है। मलय पर्वत पर विराजमान भगवान् अगस्त्यजी ने श्रीहरि की पूजा करते समय मुझे यह सुनाया था।

संजय गुप्ता

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रीत के ससुराल की अनोखी रीत !! एक बहु की कल्पना ……

रीत की शादी को आज लगभग पांच दिन हो गए , आज पहली बार उसे रसोई में जाने का मौका मिला । पहले तो घर मे रीति रिवाज और उसके बाद मेहमानों की इतनी भीड़ भाड़ ,

आज जाकर उसने पहली बार रसोई में कदम रखा था । सभी मेहमान लगभग जा चुके थे और शादी के बाद पहली रसोई के शगुन के नाम से आज रीत को रसोई बनानी थी ।

पर ये क्या ?? यहाँ तो पहले ही से सासु माँ खाना बनाने की तैयारी कर रही है , उसे लगा सासु माँ नाराज़ है डरते डरते …… उसने सासु माँ से पूछा , माँ जी ये सब ?? आज तो मुझे ही सब बनाना है ना , सासु माँ ने कहा ” हाँ बहु बनाना तो है ,

लेकिन आज से हम दोनों साथ खाना बनायेंगी , अभी तीन चार दिन तो मुझे तुम्हे समझाना भी पड़ेगा कि हमारे यहां कैसा खाना बनता है , और दोनों ने मिल कर खाना बनाना शुरू कर दिया ।

खाना बनाते बनाते उसकी सासु माँ ने उससे काफी बातें की , जैसे उसे सबसे अच्छा क्या बनाना आता है , सबसे ज्यादा खाने में क्या पसन्द है , उनके घर मे खाना कौन और कैसे बनाता है , पर इन सबके बीच , सासु माँ ने कुछ ऐसा कहा की रीत की आंखे खुली की खुली रह गयी !!

जब उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ कोई बर्तन वाली नही आती ,बल्कि सब अपने अपने खाने के बर्तन खुद साफ करते है , रीत ने आश्चर्य से उन्हें देखा , क्योंकि !! उसने ऐसा कभी कही भी नही देखा था या तो हर घर मे कोई काम वाली आती या ये सब घर की ही महिला को ही करना पड़ता है ।

उसे बहुत उत्सुकता हुई ये जानने की, कि कैसे उनके मन मे ये विचार आया ?? तो उन्होंने बताया , पहले तो जब मेरी शादी हुई तब मेरी सासु माँ और मैं मिल कर सब काम खुद करते थे , फिर धीरे धीरे चार बेटो की जिम्मेदारी बढ़ गयी , तो हमने काम वाली बाई रखने का फैसला लिया । पर उसकी रोज रोज की छुटियों से हम परेशान रहने लगी ।

एक दिन सासु माँ ने भी बिस्तर पकड़ लिया । और रोज़ रोज़ की काम की झिक झिक सी रहने लगी तब मैंने तय किया कि सभी लोग अपना नाश्ता और खाना निपटा कर अपने बर्तन खुद मांज ले तो काफी सुकून हो जाएगा ……

हाँ ! लेकिन खाना बनाने वाले बर्तन मैं खुद ही मांजती हूँ , बाकी सब अपने खुद । मैंने घर के और भी काम बाटने चाहे थे , पर बच्चों की पढ़ाई में व्यस्तता को देखते हुए नही कर पाई ,

कभी – कभी मेरी तबियत ठीक नही होने के कारण बच्चे अपने कपड़े भी खुद धोने लगे थे , रोज़ रोज़ उनके लिए भी ये मुश्किल था तो इसीलिये मशीन लेनी पड़ी , पर आज भी बच्चे अपने अंडर गारमेंट्स खुद ही धोते है ,

रीत ने ध्यान किया कि वो भी जब से इस घर मे आयी है उसने कभी बाथरूम में रोहित के कपड़े नही देखे । नही तो ये आम है , घर के मर्द नहाकर निकले नही ,

कि औरतों को उनके कपड़े धोने के लिए वही का रुख करना पड़ता है , और हां मैने अपने सब बच्चो को रसोई का इतना काम तो सिखा ही रखा है कि वो एक दो टाइम बिना किसी परेशानी के खाना बना सकते है , और हमे खिला भी सकते है ……

अब तुम्हे भी !! कहते हुए सासु माँ ने मुस्कुराते हुए रीत को देखा , फिर कहने लगी कि तुम्हे ये जानकर और भी आश्चर्य होगा जहां आज कल के दौर में भी कोई माँ अपने लड़को से रसोई का काम करना उसकी बेइज्जती समझती है , मेरी सासु माँ ने इसका पूरा समर्थन किया था ।

आज रीत के सारे भ्रम दूर हो गए थे , जो शादी के नाम से ही उसके भीतर उसके अपनो ने ही पैदा कर दिए थे , जिसके कारण वो पिछले कितने ही महीनों से ढंग सो भी नही पायी थी । उन्होंने कहा मेरा मानना सिर्फ यही है ….

कि केवल बेटियो को ही ससुराल के लिए तैयार न करे , बल्कि बेटो को भी भविष्य में किसी और की बेटी के लिए तैयार करे अगर आप उसका कदम से कदम मिला कर चलना उसका नौकरी करना पसंद करते है तो घर के काम मे भी उसका सहयोग करे जैसे वो आपका सहयोग करती है ।।

बहुत छोटी सी ही बात है लेकिन घर के काम तो दोनों को ही सिखाये जाने चाहिये , जब लड़कियों को इसीलिए पढ़ाया जाता है कि भले वो भविष्य में नौकरी या न करे ,

लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वो इतनी समर्थ हो कि उसे मजबूर न होना पड़े या किसी का मोहताज न रहना पड़े , तो फिर लड़को को केवल एक ही शिक्षा क्यो ,जबकि घर का काम तो जब तक जीवन है करना ही पड़ता है ।।

      क्यू_ना_हम_भी_ऐसा_ही_बनने_की_कोशिश_करें

संजय गुप्ता