Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

॥ #अपराधी_कौन ॥
बनारस में देवस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके हरिदास नाम का पुत्र था। हरिदास की बड़ी सुन्दर पत्नी थी। नाम था लावण्यवती। एक दिन वे महल के ऊपर छत पर सो रहे थे कि आधी रात के समय एक गंधर्व-कुमार आकाश में घूमता हुआ उधर से निकला। वह लावण्यवती के रूप पर मुग्ध होकर उसे उड़ाकर ले गया। जागने पर हरिदास ने देखा कि उसकी स्त्री नही है तो उसे बड़ा दुख हुआ और वह मरने के लिए तैयार हो गया। लोगों के समझाने पर वह मान तो गया; लेकिन यह सोचकर कि तीरथ करने से शायद पाप दूर हो जाय और स्त्री मिल जाय, वह घर से निकल पड़ा।

चलते-चलते वह किसी गाँव में एक ब्राह्मण के घर पहुँचा। उसे भूखा देख ब्राह्मणी ने उसे कटोरा भरकर खीर दे दी और तालाब के किनारे बैठकर खाने को कहा। हरिदास खीर लेकर एक पेड़ के नीचे आया और कटोरा वहाँ रखकर तालाब मे हाथ-मुँह धोने गया। इसी बीच एक बाज किसी साँप को लेकर उसी पेड़ पर आ बैठा ओर जब वह उसे खाने लगा तो साँप के मुँह से ज़हर टपककर कटोरे में गिर गया। हरिदास को कुछ पता नहीं था। वह उस खीर को खा गया। ज़हर का असर होने पर वह तड़पने लगा और दौड़ा-दौड़ा ब्राह्मणी के पास आकर बोला, “तूने मुझे जहर दे दिया है।” इतना कहने के बाद हरिदास मर गया।

पति ने यह देखा तो ब्राह्मणी को ब्रह्मघातिनी कहकर घर से निकाल दिया।

इतना कहकर बेताल बोला, “राजन्! बताओ कि साँप, बाज, और ब्राह्मणी, इन तीनों में अपराधी कौन है?”

राजा ने कहा, “कोई नहीं। साँप तो इसलिए नहीं क्योंकि वह शत्रु के वश में था। बाज इसलिए नहीं कि वह भूखा था। जो उसे मिल गया, उसी को वह खाने लगा। ब्राह्मणी इसलिए नहीं कि उसने अपना धर्म समझकर उसे खीर दी थी और अच्छी दी थी। जो इन तीनों में से किसी को दोषी कहेगा, वह स्वयं दोषी होगा। इसलिए अपराधी ब्राह्मणी का पति था जिसने बिना विचारे ब्राह्मणी को घर से निकाल दिया।”

इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वहाँ जाकर उसे लाना पड़ा। बेताल ने चलते-चलते नयी कहानी सनायी।

~ अपराधी कौन? – विक्रम-बेताल

सतीश शशांक

Posted in संस्कृत साहित्य

सर्वमनोकामनाओं के सिद्धिदाता श्री सूर्यदेव की उपासना
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मानव संस्कृति के चलन में आने के बाद से ही धर्मशास्त्रों के अाधार पर मनुष्य का जीवन अग्रसरित होता रहा है। यह कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा देश धर्म प्रधान है और धर्म के बिना जीवन व्यर्थ है। इस संसार में आप लोग जहाँ तक देखेंगे यही पायेंगे कि संसार के सभी लोग चाहे वह ईसाई हों, मुस्लिम हों, सिख हों, जैन हों, बौध हो अपने अपने धर्म के प्रति समर्पित है। मतलब स्पष्ट है कि धर्म का महत्व अपरमित है। यहाँ पर मैं महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गये एक श्लोक का वर्णन करना आवश्यक समझता हूँ ….

धर्मेण हन्यते व्यधि, धर्मेण हन्यते ग्रह: ।
धर्मेण हन्यते शत्रुर्यतोधर्मस्ततो जय: ।।

अर्थात धर्म में इतनी शक्ति है कि धर्म सभी व्याधियों का हरण कर आपको सुखमय जीवन प्रदान कर सकता है । धर्म इतना शक्तिशाली है कि वह सभी ग्रहों के दुष्प्रभावों को दूर कर सकता है । धर्म ही आपके सभी शत्रुओं का हरण कर उनपर आपको विजय दिला सकता है । अत: इसी प्रयास में आज आप लोगों को अपने शास्त्रों व ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण साधना सूर्य देव की साधना को बताने जा रहा हूँ । जो न सिर्फ अत्यन्त सरल है बल्की बहुत ही उपयोगी और प्रभावि है ।

बाल्मीकि रामायण में वर्णित एक प्रसंग के अनुसार जब प्रभु श्रीराम रावण से युद्ध कर रहे थे तो रावण से श्री राम के सामना होने से पूर्ण देव लोक के सभी देवता अत्यन्त ही चिंतित थे , क्योंकि रावण कोई सामान्य योद्धा नही था। उसे जीतना तो दूर उसके साथ युद्ध में किसी देवता को एक पहर तक टिके रहना भी मुश्किल था। अत: ब्रह्मा जीने स्वयं विश्वामित्र जी से निवेदन किया की वह लंका जाकर श्रीराम को सूर्यदेव की उपासना करने के लिए कहें और उन्हें आदित्यहृदयस्त्रोत्र का विधिपूर्वक पाठ व साधना करने की दीक्षा प्रदान करें, जिससे की श्रीराम जी युद्ध में रावण को जीत सकें। मतलब स्पष्ट है कि कठीन से कठीन युद्ध में विजय के लिए सूर्यदेव की साधना अत्यन्त ही कारगर है।

इसी रामायण में एक और प्रसंग है कि जब हनुमान जी इस धरती के सभी विद्याओं में पारंगत हो गये और इस संसार के सभी ज्ञानी महात्मा उनसे तर्क करने में पराजित होने लगा तो भगवान शिव के आज्ञा पर हनुमान जी अग्रणिय विद्या और ज्ञान प्राप्ति के लिए भगवान श्री सूर्यदेव के पास गये और उन्हें गुरू रूप में स्विकार कर वह ज्ञान प्राप्त किए जिसके बल पर हनुमान जी को विद्या और बुद्धि का निधान होने की उपाधि प्राप्त हुई।

तीन और उदाहरण मुझे मेरे महाभारत के अध्ययन के दौरान मिला ।

पहला👉 की कर्ण जो कि सूर्यदेव का पुत्र था और कुंती ने उसे सूर्यदेव की उपासना करके ही प्राप्त किया था । कर्ण सूर्यदेव के आशीर्वाद से सूर्यदेव के शक्ति के साथ ऐसे कवच और कुंडल के साथ पैदा हुआ था, जिसके रहते कर्ण को इस ब्रह्मांड के किसी भी शक्ति से मारना संभव नही था । का ही उपासना भी करता था ।

दूसरा👉 जब पांडव अपने वनवास काल में गरीबी के कारण पेटभर भोजन भी जुटा पाने में असमर्थ थे तो भगवान श्री कृष्ण नें उन्हे सूर्यदेव की उपासना कर अक्षयपात्र मांगने को कहा जिसके रहते वह सम्पूर्ण पृथ्वी को एक साथ करा सकते है ।

तिसरा👉 एक बार सत्राजित ने भगवान सूर्य की उपासना करके उनसे स्यमन्तक नाम की मणि प्राप्त की। उस मणि का प्रकाश भगवान सूर्य के समान ही था। वह मणि नित्य उसे आठ भार सोना देती थी। जिस स्थान में वह मणि होती थी वहाँ के सारे कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते थे। इस मणि की और भी बहुत सी खासियत है यह जिसके पास होती है उसे कोई भी युद्ध में हरा नही सकता। यह मणि जहाँ होगी वहा कभी धन धान्य की कमी नही होगी। यह मणि जहाँ होगी वहाँ कभी सुखा या अकाल नही पड़ सकता। इस मणि के प्राप्ति के लिए ही श्रीकृष्ण को जामवन्त के पुत्री जामवन्ति से विवाह करना पड़ा था।

ज्योतिष के अनुसार सूर्यदेव सभी ग्रहों में प्रथम् व सर्वश्रेष्ठ है यही कारण है कि उन्हें ग्रहों के राजा की उपाधि प्राप्त है। ज्योतिष में जिस प्रकार माता और मन के कारक चन्द्रमा है उसी प्रकार पिता और आत्मा का कारक सूर्य हैं। वेदों और उपनिषदों से लेकर हिन्दू-धर्म से संबंधित सभी धार्मिक ग्रंथों में भगवान सूर्य के महिमा का का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में कहा गया है — ( सूर्यात्मा जगत स्तस्थुषश्च )

प्राचीन काल से ही भारतीय ऋषि-मुनि सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म बेला में या ठीक सूर्योदय के समय नदी में स्नान करते थे और स्नान के उपरान्त सूर्य को जल अर्पित करते थे। सूर्य देव को जल अपने दोनों हाथो से अथवा ताम्बे के जल पात्र से देते थे। सूर्य सभी ग्रहों के राजा हैं।

अत: यह पूर्णतः सिद्ध है कि यदि आप जीवन के हर युद्ध में विजय प्राप्त करना चाहते है, यदि आप अक्षुण लक्ष्मी व धन-धान्य पाना चाहते है, यदि आप अमित तेज व विद्याबुद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, यदि आप बल और तेज से युक्त निरोगी शरीर पाना चाहते हैं को आपको सूर्यदेव की उपसना करना चाहिए ।

सूर्योपासना का लाभ
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👉 सूर्यदेव को अर्घ्य देने की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। छठ ब्रत में उगते हुए सूर्य को तथा अस्तांचल सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

👉 यदि आपके जन्मकुंडली में सूर्य ग्रह नीच के राशि तुला में है तो अशुभ फल से बचने के लिए प्रतिदिन सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए।

👉 यदि सूर्य किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर सुबह स्थान में बैठा है तो सूर्योपासना करनी चाहिए।

👉 जिनकी कुंडली में सूर्यदेव अशुभ ग्रहो यथा शनि, राहु-केतु, के प्रभाव में है तो वैसे व्यक्ति को अवश्य ही प्रतिदिन नियमपूर्वक सूर्य को जल अर्पण करना चाहिए।

👉 यदि कारोबार में परेशानी हो रही हो या नौकरी में सरकार की ओर से परेशानी हो रही हो तो सूर्य की उपासना का लाभ मिलता है।

👉 यदि कोई ऐसी बीमारी हो गई है जो ठीक ही नही हो रही हो तो स्वास्थ्य लाभ के लिए भी सूर्य की उपासना करनी चाहिए।

👉 किसी भी प्रकार के चर्म रोग हो तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ करे शीघ्र ही लाभ होता है।

👉 सूर्य देव को जल अर्पण करने से सूर्यदेव की असीम कृपा की प्राप्ति होती है सूर्य भगवान प्रसन्न होकर आपको दीर्घायु , उत्तम स्वास्थ्य, धन, उत्कृष्ट संतान, मित्र, मान-सम्मान, यश, सौभाग्य और विद्या प्रदान करते हैं।

सूर्य अर्घ्य देने की विधि
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शास्त्रों की मान्यता के अनुसार सूर्योदय के प्रथम किरण में सूर्यदेव को अर्घ्य देना सबसे उत्तम माना गया है। इसके लिए सर्वप्रथम प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्य-क्रिया से निवृत्त्य होकर स्नान करें। उसके बाद उगते हुए सूर्य के सामने आसन लगाए। पुनः आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें। रक्तचंदन आदि से युक्त लाल पुष्प, चावल आदि तांबे के पात्र में रखे जल या हाथ की अंजुलि से तीन बार जल में ही मंत्र पढ़ते हुए जल अर्पण करना चाहिए।

जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्योदय दिखाई दे आप दोनों हाथों से तांबे के पात्र को पकड़कर इस तरह जल अर्पण करे की सूर्य तथा सूर्य की किरण जल की धार से दिखाई दें।

ध्यान रखें जल अर्पण करते समय जो जल सूर्यदेव को अर्पण कर रहें है वह जल पैरों को स्पर्श न करे सम्भव हो तो आप एक पात्र रख लीजिये ताकि जो जल आप अर्पण कर रहे है उसका स्पर्श आपके पैर से न हो पात्र में जमा जल को पुनः किसी पौधे में डाल दे।

यदि सूर्य भगवान दिखाई नहीं दे रहे है तो कोई बात नहीं आप प्रतीक रूप में पूर्वाभिमुख होकर किसी ऐसे स्थान पर ही जल दे जो स्थान शुद्ध और पवित्र हो।

जो रास्ता आने जाने का हो भूलकर भी वैसे स्थान पर अर्घ्य (जल अर्पण) नहीं करना चाहिए।

पुनः उसके बाद दोनों हाथो से जल और भूमि को स्पर्श करे और ललाट, आँख कान तथा गला छुकर भगवान सूर्य देव को एकबार प्रणाम करें।

सूर्योपासना के समय किस मन्त्र का जप करना चाहिए
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अर्घ्य देते समय सूर्य देव के मन्त्र का अवश्य ही जप करना चाहिए। आप जल अर्पण करते समय स्वयं ही या अपने गुरु के आदेशानुसार मन्त्र का चयन कर सकते है।

सूर्यदेव के लिए निम्न मन्त्र है
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सामान्यतः जल अर्पण के समय निम्न मंत्रो का जप करना चाहिए।

‘ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते। अनुकंपये माम भक्त्या गृहणार्घ्यं दिवाकर:।।ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय। मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा :।।ऊँ सूर्याय नमः।ऊँ घृणि सूर्याय नमः।‘ऊं भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात।

इसके बाद सीधे हाथ की अँजूरी में जल लेकर अपने चारों ओर छिड़कना चाहिए। पुनः अपने स्थान पर ही तीन बार घुमकर परिक्रमा करना चाहिए ततपश्चात आसन उठाकर उस स्थान को नमन करें।

सूर्य देव के अन्य मन्त्र निम्न प्रकार से है।

सूर्य मंत्र – ऊँ सूर्याय नमः।

तंत्रोक्त मंत्र – ऊँ ह्यं हृीं हृौं सः सूर्याय नमः। ऊँ जुं सः सूर्याय नमः।

सूर्य का पौराणिक मंत्र
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जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिं।

तमोरिसर्व पापघ्नं प्रणतोस्मि दिवाकरं ।।

सूर्य गायत्री के दो मंत्र है
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1 – ऊँ आदित्याय विदमहे प्रभाकराय धीमहितन्नः सूर्य प्रचोदयात् ।

2 – ऊँ सप्ततुरंगाय विद्महे सहस्त्रकिरणाय धीमहि तन्नो रविः प्रचोदयात् ।

अर्थ मंत्र👉 ऊँ एहि सूर्य ! सहस्त्रांशो तेजोराशि जगत्पते । करूणाकर में देव गृहाणाध्र्य नमोस्तु ते। सूर्य का वेदोक्त

मंत्र-विनियोग
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ऊँ आकृष्णेनेति मंत्रस्य हिरण्यस्तूपऋषि, त्रिष्टुप छनदः सविता देवता, श्री सूर्य प्रीत्यर्थ जपे विनियोगः।

मंत्र –

‘ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्‌॥

इस पोस्ट को लिखने वह भेजने का मेरा मात्र उद्देश्य सिर्फ इतना सा ही है कि सभी का कल्याण हो, सभी सुखी सम्पन्न हो और सभी के जीवन से व्याधियों और परेशानियों का अन्त हो।
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🌹🙏🏻राजा भर्तृहरि की गुरुनिष्ठा🙏🏻🌹

🌹 उज्जयिनी (उज्जैन) के राजा भर्तृहरि से पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए ।
🌹 वर्ष में केवल एक-एक की बारी आती थी ।
🌹 364 दिन वे ताकते रहते थे कि कब हमारी बारे आए और हम राजासाहब के लिए भोजन बनाएं, इनाम पाएं ।
🌹 लेकिन इस दौरान भर्तृहरि जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे ।
🌹 एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘
🌹 शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’
🌹 गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भर्तृहरि से कहा, ‘भर्तृहरि! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’
🌹 राजा भर्तृहरि नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘
🌹 चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भर्तृहरि भी गिर गए।
🌹 भर्तृहरि ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के ।
🌹 गुरु जी ने चेलों से कहा, ‘देखा! भर्तृहरि ने क्रोध को जीत लिया है।’
🌹 शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’
🌹 थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया।
🌹 गोरखनाथ जी भर्तृहरि को महल दिखा रहे थे ।
🌹 युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे।
🌹 भर्तृहरि युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए ।
🌹 गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, ‘अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भर्तृहरि ने काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है।’
🌹 शिष्यों ने कहा, ‘गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए।’
🌹 गोरखनाथजी ने कहा, ‘अच्छा भर्तृहरि! हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’
🌹 भर्तृहरि अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े ।
🌹 पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे।
🌹 धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए ।
🌹 एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए ।
🌹 सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे।
🌹 गोरखनाथ जी बोले,
‘देखो, यह भर्तृहरि जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भर्तृहरि का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो।
🌹 ‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया ? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की ।’
🌹 कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है ।
🌹 जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है ।
🌹 ’ गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी।
🌹 शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’
🌹 गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भर्तृहरि बोले,
🌹 ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’
🌹 गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’
🌹 थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए।
🌹 ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया ।
🌹 पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भर्तृहरि ने ‘आह’ तक नहीं की।
🌹 भर्तृहरि तो और अंतर्मुख हो गए,
’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।
🌹 अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया ।
🌹 प्यास के मारे भर्तृहरि के प्राण कंठ तक आ गये।
🌹 तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया,
🌹 जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी ।
🌹 एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है ।
🌹 उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए ।
🌹 भर्तृहरि ने दंडवत प्रणाम किया।
🌹 गुरुजी बोले, ”शाबाश भर्तृहरि! वर मांग लो । अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो ।
🌹 भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’
🌹 गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भर्तृहरि! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा ।
🌹 ‘ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी ।
🌹 उसे उठाकर भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं ।’
🌹 गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए । मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो । गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं ? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए!
🌹 कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में ।
🌹 एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।’

संजय गुप्ता

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सीता की निंदा करने वाले धोबी के पूर्व जन्म का वृत्तान्त!!!!!!

मिथिला नाम की नगरी में महाराज जनक राज्य करते थे। उनका नाम था सीरध्वज। एक बार वे यज्ञ के लिए पृथ्वी जोत रहे थे उस समय फाल से बनी गहरी रेखा द्वारा एक कुमारी कन्या का प्रादुर्भाव हुआ। रति से भी सुंदर कन्या को देख कर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उस कन्या का नाम सीता रख दिया।

परम सुंदरी सीता एक दिन सखियों के साथ उद्यान में खेल रहीं थीं। वहाँ उन्हें एक शुक पक्षी का जोड़ा दिखाई दिया,जो बड़ा मनोरम था। वे दोनों पक्षी एक पर्वत की चोटी पर बैठ कर इस प्रकार बोल रहे थे —-‘पृथ्वी पर श्री राम नाम से विख्यात एक बड़े सुंदर राजा होंगे। उनकी महारानी, सीता के नाम से विख्यात होंगी। श्री राम, सीता के साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकी देवी और धन्य हैं वे श्री राम।

तोते को ऐसी बातें करते देख सीता ने यह सोचा कि ये दोनों मेरे ही जीवन की कथा कह रहे हैं, इन्हें पकड़ कर सभी बातें पूछूँ।ऐसा विचार कर उन्होंने अपनी सखियों से कहा, ‘यह पक्षियों का जोड़ा सुंदर है तुम लोग चुपके से जाकर इसे पकड़ लाओ।’

सखियाँ उस पर्वत पर गयीं और दोनों सुंदर पक्षियों को पकड़ लायीं।

सीता उन पक्षियों से बोलीं—‘तुम दोनों बड़े सुंदर हो; देखो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँ से आये हो? राम कौन हैं? और सीता कौन हैं? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई? सारी बातों को जल्दी जल्दी बताओ। भय न करो।

सीता के इस प्रकार पूछने पर दोनों पक्षी सब बातें बताने लगे —–‘देवि ! वाल्मीकि नाम से विख्यात एक बहुत बड़े महर्षि हैं। हम दोनों उन्हीं के आश्रम में रहते हैं। महर्षि ने रामायण नाम का एक ग्रन्थ बनाया है जो सदा मन को प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्यों को उस रामायण का अध्ययन भी कराया है। रामायण का कलेवर बहुत बड़ा है। हम लोगों ने उसे पूरा सुना है ।

राम और जानकी कौन हैं, इस बात को हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि जानकी के विषय में क्या क्या बातें होने वाली हैं; तुम ध्यान देकर सुनो।

‘महर्षि ऋष्यश्रंग के द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञ के प्रभाव से भगवान विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। देवांगनाएँ भी उनकी उत्तम कथा का गान करेंगी।

श्री राम महर्षि विश्वामित्र के साथ भाई लक्ष्मण सहित हाथ में धनुष लिए मिथिला पधारेंगे। उस समय वहाँ वे शिव जी के धनुष को तोड़ेंगे और अत्यन्त मनोहर रूप वाली सीता को अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। फिर उन्हीं के साथ श्री राम अपने विशाल राज्य का पालन करेंगे। ये तथा और भी बहुत सी बातें वहाँ हमारे सुनने में आयी हैं। सुंदरी ! हमने तुम्हें सब कुछ बता दिया। अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो।

पक्षियों की ये अत्यंत मधुर बातें सुनकर सीता ने उन्हें मन में धारण किया और पुनः उन दोनों से पूछा —-‘राम कहाँ होंगे? वे किसके पुत्र हैं और कैसे वे आकर जानकी को ग्रहण करेंगे? मनुष्यावतार में उनका श्री विग्रह कैसा होगा?

उनके प्रश्न सुनकर शुकी मन ही मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचान कर वह सामने आ उनके चरणों पर गिर पड़ी और बोली —- श्री रामचन्द्र का मुख कमल की कली के समान सुंदर होगा। नेत्र बड़े बड़े तथा खिले हुए, नासिका ऊँची, पतली और मनोहारिणी होगी। भुजाएँ घुटनों तक, गला शंख के समान होगा।

वक्षःस्थल उत्तम व चौड़ा होगा। उसमें श्रीवत्स का चिन्ह होगा। श्री राम ऐसा ही मनोहर रूप धारण करने वाले हैं। मैं उनका क्या वर्णन कर सकती हूँ। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणों का बखान नहीं कर सकता। फिर हमारे जैसे पक्षी की क्या बिसात है ।वे जानकी देवी धन्य हैं जो शीघ्र रघुनाथ जी के साथ हजारों वर्षों तक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी। परंतु सुंदरी ! तुम कौन हो?

पक्षियों की बातें सुनकर सीता अपने जन्म की चर्चा करती हुई बोलीं—-‘जिसे तुम लोग जानकी कह रहे हो, वह जनक की पुत्री मैं ही हू। श्री राम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम दोनों को छोड़ूँगी। तुम इच्छानुसार खेलते हुए मेरे घर में सुख से रहो।

यह सुनकर शुकी ने जानकी से कहा —-‘साध्वी ! हम वन के पक्षी हैं। हमें तुम्हारे घर में सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थान पर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर यहाँ आ जाऊँगी।

उसके ऐसा कहने पर भी सीता ने उसे नहीं छोड़ा। तब उसके पति ने कहा —-‘सीता ! मेरी भार्या को छोड़ दो। यह गर्भिणी है। जब यह बच्चों को जन्म दे लेगी, तब इसे लेकर फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तोते के ऐसा कहने पर जानकी ने कहा — महामते ! तुम आराम से जा सकते हो, मगर यह मेरा प्रिय करने वाली है। मैं इसे अपने पास बड़े सुख से रखूँगी ।

जब सीता ने उस शुकी को छोड़ने से मना कर दिया, तब वह पक्षी अत्यंत दुखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणी में कहा —-‘योगी लोग जो बात कहते हैं वह सत्य ही है—-किसी से कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोष के कारण ही बन्धन में पड़ता है। यदि हम इस पर्वत के ऊपर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिए यह बन्धन कैसे प्राप्त होता। इसलिए मौन ही रहना चाहिए ।’ इतना कहकर पक्षी पुनः बोला—– ‘सुन्दरी ! मैं अपनी इस भार्या के विना जीवित नहीं रह सकता, इसलिए इसे छोड़ दो।

सीता ! तुम बहुत अच्छी हो, मेरी प्रार्थना मान लो।’ इस तरह उसने बहुत समझाया, किन्तु सीता ने उसकी पत्नी को नहीं छोड़ा, तब उसकी भार्या ने क्रोध और दुख से व्याकुल होकर जानकी को शाप दिया ——- ‘अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पति से अलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणी की अवस्था में श्री राम से अलग होना पड़ेगा।’

यों कहकर पति वियोग के कारण उसके प्राण निकल गये। उसने श्री रामचंद्र जी का स्मरण तथा पुनः पुनः राम नाम का उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिए उसे ले जाने के लिए एक सुंदर विमान आया और वह पक्षिणी उस पर बैठकर भगवान के धाम को चली गई।

भार्या की मृत्यु हो जाने पर पक्षी शोक से आतुर होकर बोला —— ‘मैं मनुष्यों से भरी श्री राम की नगरी अयोध्या में जन्म लूँगा तथा मेरे ही वाक्य से इसे पति के वियोग का भारी दुख उठाना पड़ेगा।’

यह कहकर वह चला गया। क्रोध और सीता जी का अपमान करने के कारण उसका धोबी की योनि में जन्म हुआ।

उस धोबी के कथन से ही सीता जी निन्दित हुईं और उन्हें पति से वियुक्त होना पड़ा।धोबी के रूप में उत्पन्न हुए उस तोते का शाप ही सीता का पति से विछोह कराने में कारण हुआ और वे वन में गयीं।

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एक बार यात्रियों से भरी एक बस
कहीं जा रही थी।
अचानक मौसम बदला धुलभरी आंधी के बाद
बारिश की बूंदे गिरने लगी बारिश तेज
होकर
तूफान मे बदल चुकी थी
घनघोर अंधेरा छा गया भयंकर बिजली
चमकने
लगी बिजली कडककर बस की तरफ आती
और
वापस चली जाती
ऐसा कई बार हुआ सब की सांसे ऊपर की
ऊपर
और नीचे की नीचे।
ड्राईवर ने आखिरकार बस को एक बडे से
पेड से
करीब पचास कदम की दूरी पर रोक दी
और
यात्रियों से कहा कि इस बस मे कोई
ऐसा यात्री बैठा है जिसकी मौत आज
निश्चित है
उसके साथ साथ कहीं हमे
भी अपनी जिन्दगी से हाथ न धोना पडे
इसलिए सभी यात्री एक एक कर
जाओ और उस
पेड के हाथ लगाकर आओ जो भी बदकिस्मत
होगा उस पर बिजली गिर जाएगी और
बाकी सब बच जाएंगे।
सबसे पहले जिसकी बारी थी उसको दो
तीन
यात्रियों ने जबरदस्ती धक्का देकर बस
से नीचे
उतारा वह धीरे धीरे पेड तक गया डरते
डरते पेड
के हाथ लगाया और भाग कर आकर बस मे बैठ
गया।
ऐसे ही एक एक कर सब जाते और भागकर
आकर
बस
मे बैठ चैन की सांस लेते।
अंत मे केवल एक आदमी बच गया उसने
सोचा तेरी मौत तो आज निश्चित है सब
उसे
किसी अपराधी की तरह देख रहे थे जो आज
उन्हे अपने साथ ले मरता
उसे भी जबरदस्ती बस से नीचे उतारा गया
वह
भारी मन से पेड के पास पहुँचा और जैसे ही
पेड के
हाथ लगाया तेज आवाज से
बिजली कडकी और बिजली बस पर गिर
गयी
बस धूं धूं कर जल उठी सब यात्री मारे गये
सिर्फ
उस एक को छोडकर जिसे सब बदकिस्मत
मान
रहे
थे वो नही जानते थे कि उसकी वजह से
ही सबकी जान बची हुई थी।
“दोस्तो हम सब अपनी सफलता का श्रेय
खुद
लेना चाहते है जबकि क्या पता हमारे साथ
रहने वाले की वजह से हमे यह हासिल
हो पाया हो।

मेरी सफलता, मेरी सफलता नहीं है सिर्फ।
ये हमारे साथ देनेवाले लोगों के वजह से भी है।
आप सभी को मेरा साथ देने के लिए धन्यवाद।

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संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अपनी बुद्धि को महान मानना

अपनी बुद्धि को महान और दूसरों की बुद्धि को कम करके आँकने से बहुत-सी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। दूसरे हमसे अधिक बुद्धिमान हो सकते हैं, इस सत्य पर सदा विश्वास करना चाहिए। संसार में वही मनुष्य सफल होता है जो मनीषियों की बात को ध्यान से पढ़े, सुने और समय आने पर उस पर आचरण करे। व्यर्थ टीका-टिप्पणी करके स्वयं को अज्ञ साबित नहीं करना चाहिए। इससे विद्वानों के समक्ष अपनी हेठी होती है।
स्वयं को सर्वश्रेष्ठ विद्वान मानना ठीक नहीं है। दुनिया में विविध विषयों पर इतना सारा ज्ञान भरा हुआ है जिसे आयुपर्यन्त ग्रहण करते रहें, तब भी नहीं कह सकते कि सब कुछ जान लिया है। न जाने कितने जन्म लग जाएँगे, फिर भी मनुष्य पूर्णज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए अपने ज्ञान का मिथ्या दम्भ नहीं भरना चाहिए। संसार में रहते हुए जितना ज्ञान मनुष्य चाहे प्राप्त कर ले पर उसकी शर्त है विनम्रता का पाठ भी पढ़ना।
कुछ दिन पूर्व वट्सअप पर एक बहुत लम्बी-सी कथा सार संक्षेप के साथ पढ़ी थी। उसके कुछ अंश को भाषा शुद्ध करके यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।
बन्दरों का एक समूह फलों के बगीचे से फल तोड़कर खाया करता था। वे माली की मार और डण्डे भी खाते थे यानी रोज पिटते थे।
एक दिन बन्दरों के कर्मठ और जुझारू सरदार ने सब बन्दरों से विचार-विमर्श करके निश्चय किया कि रोज माली के डण्डे खाने से बेहतर है कि हम अपना फलों का बगीचा लगा लें। इससे बहुत सारे मनचाहे फल खाने से उन्हें किसी तरह की रोकटोक भी नहीं होगी और किसी को माली की मार भी नहीं खानी पड़ेगी।
सभी बन्दरों को यह प्रस्ताव बहुत पसन्द आया। जोर-शोर से गड्ढे खोदकर उन्होंने फलों के बीज बो दिए। पूरी रात बन्दरों ने बेसब्री से फलों का इन्तजार किया। सुबह देखा तो फलों के पौधे भी नहीं आए थे। यह देखकर बन्दर भड़क गए और सरदार से गाली-गलौच करने लगे, “कहाँ हैं हमारे हिस्से के फल?”
सरदार ने बन्दरों की मूर्खता पर अपना सिर पीट लिया और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बोला, “साथियों, अभी हमने सिर्फ बीज बोए हैं, फल आने में थोड़ा समय लगता है, इसलिए थोड़ी प्रतीक्षा करो।”
इस बात को सुनकर तो बन्दर मान गए। दो-चार दिन उन्होंने और प्रतीक्षा की परन्तु फिर भी पौधे नहीं आए। अब मूर्ख बन्दरों के सब्र का बाँध टूट गया। उन्होंने जैसे ही मिट्टी हटाई तो देखा कि फलों के बीज तो जमीन में वैसे-के-वैसे पड़े हैं।
बन्दरों को लगा कि सरदार झूठ बोल रहा है। उनकी किस्मत में तो माली के डण्डे खाने ही लिखे हैं। उस समझदार बन्दर के मना करने पर भी बन्दरों ने सभी गड्ढे खोदकर फलों के बीज निकाल-निकालकर फैंक दिए। पुन: अपने भोजन के लिये माली की मार और डण्डे खाने के लिए चल पड़े।
इस कहानी को पढ़ने के उपरान्त विचार यह करना है कि कहीं हम सभी बन्दरों की तरह मूर्खतापूर्ण व्यवहार तो नहीं कर रहे? यानी कोई बेवकूफी तो नहीं कर रहे। ऐसे व्यवहार से बचना चाहिए जो हमारे विनाश का कारण बन जाए या फिर मुसीब बन जाए। हमारे बीच जो भी विद्वान मनीषी हैं, उनकी दी गई शिक्षा का अनादर करने के स्थान उसे मान लेने में ही भला होता है। ऐसा करके हम उन पर कोई अहसान नहीं करते।
दूसरों से हम बहुत अधिक अपेक्षाएँ रखते हैं परन्तु यह कभी नही सोचते कि हम स्वयं दूसरों के लिए कुछ कर भी रहे हैं या नहीं। सारी समस्याओं की जड़ है हमारा व्यर्थ का अहंकार कि मेरे बराबर कोई और बुद्धिमान हो ही नहीं सकता। जब तक इस भ्रम से बाहर नहीं निकलेंगे तब तक कुछ सीख नहीं सकेंगे। जहाँ तक हो सके विनम्र रहकर शिक्षा लेनी चाहिए, उसी में ही जीवन की सार्थकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
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Twitter : http//tco/86whejp

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

मंगला गौरी मंदिर, गया, बिहार
बिहार के गया नगर में मंगला गौरी पर्वत चोटी पर, यह पावन मंदिर पूर्व दिशा की ओर देखते हुए स्थापित है| इस उदार और शक्तिशाली देवी अवतार के भक्त, माता के दर्शनों हेतु या तो मंदिर तक जाने वाली सीढ़ियों से अथवा वैकल्पिक सड़क द्वारा इस पावन स्थान तक पहुँचते हैं|

मंदिर के गर्भ गृह में देवी माँ की मूर्ति है जहाँ अनगिनत भक्तगण माता का आशीर्वाद लेने आते हैं| मंदिर में प्राचीन समय की नक्काशियाँ और मूर्तियाँ भी देखी जा सकती हैं| देवी की आराधना उनके शक्तिशाली, कृपालु और उदार रूप को नमन करते हुए की जाती है| भक्तों के मान में उनके लिए अत्यंत श्रद्धा भाव है, और ऐसा माना जाता है कि वे अपने भक्तों पर हमेशा अपना आशीर्वाद बनाए रखती हैं|

इस पावन मंदिर के समीप कुछ छोटे मंदिर भी स्थापित हैं| इनमें से कुछ मंदिर हैं – भगवान गणेश, भगवान शिव, हनुमान जी, देवी दुर्गा, महिषासुर मर्दिनी, दक्षिण काली, इत्यादि|

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 15वी सदी में किया गया था|

इस प्रसिद्ध, प्राचीन मंदिर की महत्वता इसके 18 महा शक्तिपीठों में से एक होने के कारण है| शक्तिपीठ वह स्थान हैं जहाँ देवी शक्ति के शरीर का एक हिस्सा गिरा था, और ये स्थान हमेशा के लिए पवित्र हो गये|

इस मंदिर की अत्यधिक मान्यता इसके कई पुराणों में उल्लेख होने के कारण भी है|
संजय गुप्ता

Posted in હાસ્ય કવિતા

जय श्री कृष्णा

अक्ल बाटने लगे विधाता, लंबी लगी कतारी ।
सभी आदमी खड़े हुए थे, कहीं नहीं थी नारी ।

सभी नारियाँ कहाँ रह गई, था ये अचरज भारी ।
पता चला ब्यूटी पार्लर में, पहुँच गई थी सारी।

मेकअप की थी गहन प्रक्रिया, एक एक पर भारी ।
बैठी थीं कुछ इंतजार में, कब आएगी बारी ।

उधर विधाता ने पुरूषों में, अक्ल बाँट दी सारी ।
ब्यूटी पार्लर से फुर्सत पाकर, जब पहुँची सब नारी ।

बोर्ड लगा था स्टॉक ख़त्म है, नहीं अक्ल अब बाकी ।
रोने लगी सभी महिलाएं , नींद खुली ब्रह्मा की ।

पूछा कैसा शोर हो रहा है, ब्रह्मलोक के द्वारे ?
पता चला कि स्टॉक अक्ल का पुरुष ले गए सारे ।

ब्रह्मा जी ने कहा देवियों , बहुत देर कर दी है ।
जितनी भी थी अक्ल वो मैंने, पुरुषों में भर दी है ।

लगी चीखने महिलाये , ये कैसा न्याय तुम्हारा?
कुछ भी करो हमें तो चाहिए, आधा भाग हमारा ।

पुरुषो में शारीरिक बल है, हम ठहरी अबलाएं ।
अक्ल हमारे लिए जरुरी , निज रक्षा कर पाएं ।

सोचकर दाढ़ी सहलाकर , तब बोले ब्रह्मा जी ।
एक वरदान तुम्हे देता हूँ , अब हो जाओ राजी ।

थोड़ी सी भी हँसी तुम्हारी , रहे पुरुष पर भारी ।
कितना भी वह अक्लमंद हो, अक्ल जायेगी मारी ।

एक औरत ने तर्क दिया, मुश्किल बहुत होती है।
हंसने से ज्यादा महिलाये, जीवन भर रोती है ।

ब्रह्मा बोले यही कार्य तब, रोना भी कर देगा ।
औरत का रोना भी नर की, अक्ल हर लेगा ।

एक अधेड़ बोली बाबा, हंसना रोना नहीं आता ।
झगड़े में है सिद्धहस्त हम, खूब झगड़ना भाता ।

ब्रह्मा बोले चलो मान ली, यह भी बात तुम्हारी ।
झगड़े के आगे भी नर की, अक्ल जायेगी मारी ।

ब्रह्मा बोले सुनो ध्यान से, अंतिम वचन हमारा ।
तीन शस्त्र अब तुम्हे दिए, पूरा न्याय हमारा ।

इन अचूक शस्त्रों में भी, जो मानव नहीं फंसेगा ।
निश्चित ब्रह्मवाक्य समझो, उसका घर नहीं बसेगा ।

कान खोलकर ध्यान से, सुन लो बात हमारी
बिना अक्ल के भी होती है, नर पर नारी भारी।..

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

नारद मोह,,,,एक सोने के पतरे पर तुलसी रखकर पलड़ें में रखा तब भगवान के बराबर भार बैठा!!!!!

एक बार देवर्षि नारद के मन में आया कि भगवान् के पास बहुत महल आदि है है, एक- आध हमको भी दे दें तो यहीं आराम से टिक जायें, नहीं तो इधर-उधर घूमते रहना पड़ता है। भगवान् के द्वारिका में बहुत महल थे।

नारद जी ने भगवान् से कहा- भगवन ! आपके बहुत महल हैं, एक हमको दो तो हम भी आराम से रहें। आपके यहाँ खाने- पीने का इंतजाम अच्छा ही है । भगवान् ने सोचा कि यह मेरा भक्त है, विरक्त संन्यासी है। अगर यह कहीं राजसी ठाठ में रहने लगा तो थोड़े दिन में ही इसकी सारी विरक्ति भक्ति निकल जायेगी।

हम अगर सीधा ना करेंगे तो यह बुरा मान जायेगा, लड़ाई झगड़ा करेगा कि इतने महल हैं और एकमहल नहीं दे रहे हैं। भगवान् ने चतुराई से काम लिया, नारद से कहा जाकर देख ले, जिस मकान में जगह खाली मिले वही तेरे नाम कर देंगे।

नारद जी वहाँ चले। भगवान् की तो १६१०८ रानियाँ और प्रत्येक के ११- ११ बच्चे भी थे। यह द्वापर युग की बात है।

सब जगह नारद जी घूम आये लेकिन कहीं एक कमरा भी खाली नहीं मिला, सब भरे हुए थे। आकर भगवान् से कहा वहाँ कोई जगह खाली नहीं मिली। भगवान् ने कहा फिर क्या करूँ , होता तो तेरे को दे देता। नारद जी के मन में आया कि यह तो भगवान् ने मेरे साथ धोखाधड़ी की है, नहीं तो कुछ न कुछ करके, किसी को इधर उधर शिफ्ट कराकर, खिसकाकर एक कमरा तो दे ही सकते थे।

इन्होंने मेरे साथ धोखा किया है तो अब मैं भी इन्हे मजा चखाकर छोडूँगा। नारद जी रुक्मिणी जी के पास पहुँचे, रुक्मिणी जी ने नारद जी की आवभगत की, बड़े प्रेम से रखा। उन दिनों भगवान् सत्यभामा जी के यहाँ रहते थे।

एक आध दिन बीता तो नारद जी ने उनको दान की कथा सुनाई, सुनाने वाले स्वयं नारद जी। दान का महत्त्व सुनाने लगे कि जिस चीज का दान करोगे वही चीज आगे तुम्हारे को मिलती है। जब नारद जी ने देखा कि यह बात रुक्मिणी जी को जम गई है तो उनसे पूछा आपको सबसे ज्यादा प्यार किससे है ?

रुक्मिणी जी ने कहा यह भी कोई पूछने की बात है, भगवान् हरि से ही मेरा प्यार है। कहने लगे फिर आपकी यही इच्छा होगी कि अगले जन्म में तुम्हें वे ही मिलें।

रुक्मिणी जी बोली इच्छा तो यही है। नारद जी ने कहा इच्छा है तो फिर दान करदो, नहीं तो नहीं मिलेंगे। आपकी सौतें भी बहुत है और उनमें से किसी ने पहले दान कर दिया उन्हें मिल जायेंगे। इसलिये दूसरे करें, इसके पहले आप ही कर दे। रुक्मिणी जी को बात जँच गई कि जन्म जन्म में भगवान् मिले तो दान कर देना चाहियें।

रुक्मिणी से नारद जी ने संकल्प करा लिया। अब क्या था, नारद जी का काम बन गया। वहाँ से सीधे सत्यभामा जी के महल में पहुँच गये और भगवान् से कहा कि उठाओ कमण्डलु, और चलो मेरे साथ। भगवान् ने कहा कहाँ चलना है, बात क्या हुई ? नारद जी ने कहा बात कुछ नहीं, आपको मैंने दान में ले लिया है। आपने एक कोठरी भी नहीं दी तो मैं अब आपको भी बाबा बनाकर पेड़ के नीचे सुलाउँगा। सारी बात कह सुनाई।

भगवान् ने कहा रुक्मिणी ने दान कर दिया है तो ठीक है। वह पटरानी है, उससे मिल तो आयें। भगवान् ने अपने सारे गहने गाँठे, रेशम के कपड़े सब खोलकर सत्यभामा जी को दे दिये और बल्कल वस्त्र पहनकर, भस्मी लगाकर और कमण्डलु लेकर वहाँ से चल दिये।

उन्हें देखते ही रुक्मिणी के होश उड़ गये। पूछा हुआ क्या ? भगवान् ने कहा पता नहीं, नारद कहता है कि तूने मेरे को दान में दे दिया। रुक्मिणी ने कहा लेकिन वे कपड़े, गहने कहाँ गये, उत्तम केसर को छोड़कर यह भस्मी क्यों लगा ली ? भगवान् ने कहा जब दान दे दिया तो अब मैं उसका हो गया। इसलिये अब वे ठाठबाट नहीं चलेंगे।

अब तो अपने भी बाबा जी होकर जा रहे हैं । रुक्मिणी ने कहा मैंने इसलिये थोड़े ही दिया था कि ये ले जायें।

भगवान् ने कहा और काहे के लिये दान दिया जाता है ? इसीलिये दिया जाता है कि जिसको दो वह ले जाये । अब रुक्मिणी को होश आया कि यह तो गड़बड़ मामला हो गया। रुक्मिणी ने कहा नारद जी यह आपने मेरे से पहले नहीं कहा, अगले जन्म में तो मिलेंगे सो मिलेंगे, अब तो हाथ से ही खो रहे हैं । नारद जी ने कहा अब तो जो हो गया सो हो गया, अब मैं ले जाऊँगा। रुक्मिणी जी बहुत रोने लगी।

तब तक हल्ला गुल्ला मचा तो और सब रानियाँ भी वहा इकठ्ठी हो गई। सत्यभामा, जाम्बवती सब समझदार थीं। उन्होंने कहा भगवान् एक रुक्मिणी के पति थोड़े ही हैं, इसलिये रुक्मिणी को सर्वथा दान करने का अधिकार नहीं हो सकता, हम लोगों का भी अधिकार है।

नारद जी ने सोचा यह तो घपला हो गया। कहने लगे क्या भगवान् के टुकड़े कराओगे ? तब तो 16108 हिस्से होंगे। रानियों ने कहा नारद जी कुछ ढंग की बात करो। नारद जी ने विचार किया कि अपने को तो महल ही चाहिये था और यही यह दे नहीं रहे थे, अब मौका ठीक है, समझौते पर बात आ रही है।

नारद जी ने कहा भगवान् का जितना वजन है, उतने का तुला दान कर देने से भी दान मान लिया जाता है ।

तुलादान से देह का दान माना जाता है। इसलिये भगवान् के वजन का सोना, हीरा, पन्ना दे दो। इस पर सब रानियाँ राजी हो गई। बाकी तो सब राजी हो गये लेकिन भगवान् ने सोचा कि यह फिर मोह में पड़ रहा है । इसका महल का शौक नहीं गया। भगवान् ने कहा तुलादान कर देना चाहिये, यह बात तो ठीक हे ।

भगवान् तराजु के एक पलड़े के अन्दर बैठ गये। दूसरे पलड़े में सारे गहने, हीरे, पन्ने रखे जाने लगे। लेकिन जो ब्रह्माण्ड को पेट में लेकर बैठा हो, उसे द्वारिका के धन से कहाँ पूरा होना है। सारा का सारा धन दूसरे पलड़े पर रख दिया लेकिन जिस पलड़े पर भगवान बैठे थे वह वैसा का वैसा नीचे लगा रहा, ऊपर नहीं हुआ ।

नारद जी ने कहा देख लो, तुला तो बराबर हो नहीं रहा है, अब मैं भगवान् को ले जाऊँगा । सब कहने लगे अरे कोई उपाय बताओ । नारद जी ने कहा और कोई उपाय नहीं है । अन्य सब लोगों ने भी अपने अपने हीरे पन्ने लाकर डाल दिये लेकिन उनसे क्या होना था । वे तो त्रिलोकी का भार लेकर बैठे थे। नारद जी ने सोचा अपने को अच्छा चेला मिल गया, बढ़िया काम हो गया । उधर औरते सब चीख रही थी। नारद जी प्रसन्नता के मारे इधर ऊधर टहलने लगे।

भगवान् ने धीरे से रुक्मिणी को बुलाया। रुक्मिणी ने कहा कुछ तो ढंग निकालिये, आप इतना भार लेकर बैठ गये, हम लोगों का क्या हाल होगा ? भगवान् ने कहा ये सब हीरे पन्ने निकाल लो, नहीं तो बाबा जी मान नहीं रहे हैं।

यह सब निकालकर तुलसी का एक पत्ता और सोने का एक छोटा सा टुकड़ा रख दो तो तुम लोगों का काम हो जायगा। रुक्मिणी ने सबसे कहा कि यह नहीं हो रहा है तो सब सामान हटाओ । सारा सामान हटा दिया गया और एक छोटे से सोने के पतरे पर तुलसी का पता रखा गया तो भगवान् के वजन के बराबर हो गया ।

सबने नारद जी से कहा ले जाओ तूला दान। नारद जी ने खुब हिलाडुलाकर देखा कि कहीं कोई डण्डी तो नहीं मार रहा है । नारद जी ने कहा इन्होंने फिर धोखा दिया । फिर जहाँ के तहाँ यह लेकर क्या करूँगा ? उन्होंने कहा भगवन्। यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं, केवल घरवालियों की बात सुनते हैं, मेरी तरफ देखो।

भगवान् ने कहा तेरी तरफ क्या देखूँ ? तू सारे संसार के स्वरूप को समझ कर फिर मोह के रास्ते जाना चाह रहा है तो तेरी क्या बात सुनूँ। तब नारद जी ने समझ लिया कि भगवान् ने जो किया सो ठीक किया । नारद जी ने कहा एक बात मेरी मान लो। आपने मेरे को तरह तरह के नाच अनादि काल से नचाये और मैंने तरह तरह के खेल आपको दिखाये।

कभी मनुष्य, कभी गाय इत्यादि पशु, कभी इन्द्र, वरुण आदि संसार में कोई ऐसा स्वरूप नहीं जो चैरासी के चक्कर में किसी न किसी समय में हर प्राणी ने नहीं भोग लिया। अनादि काल से यह चक्कर चल रहा है, सब तरह से आपको खेल दिखाया आप मेरे को ले जाते रहे और मैं खेल करता रहा ।

अगर आपको मेरा कोई खेल पसंद आगया हो तो आप राजा की जगह पर हैं और मैं ब्राह्मण हूँ तो मेरे को कुछ इनाम देना चाहिये । वह इनाम यही चाहता हूँ कि मेरे शोक मोह की भावना निवृत्त होकर मैं आपके परम धाम में पहुँच जाऊँ ।

और यदि कहो कि तूने जितने खेल किये सब बेकार है, तो भी आप राजा हैं । जब कोई बार बार खराब खेल करता है तो राजा हुक्म देता है कि इसे निकाल दो । इसी प्रकार यदि मेरा खेल आपको पसन्द नहीं आया है तो फिर आप कहो कि इसको कभी संसार की नृत्यशाला में नहीं लाना है । तो भी मेरी मुक्ति है । भगवान् बड़े प्रसन्न होकर तराजू से उठे और नारद जी को छाती से लगाया और कहा तेरी मुक्ति तो निश्चित है।

संजय गुप्ता

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जहां नहीं है नंदी ऐसा है कपालेश्वर महादेव मंदिर,

गोदावरी तट पर बना कपालेश्वर महादेव मंदिर संसार का एक मात्र शिवमंदिर है जहां उनके वाहन नंदी मंदिर में नहीं है। हिंदू पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है, ‘कपालेश्वर महादेव मंदिर में एक समय भगवान शिवजी ने निवास किया था। यह उस समय की बात है जब ब्रह्मदेव के पांच मुख थे।
चार मुख वेदोच्चारण करते थे, और पांचवां निंदा करता था। निंदा वाले मुख से शिव नाराज हो गए और उन्होंने उस मुख को ब्रह्माजी के शरीर से अलग कर दिया। इस घटना के कारण शिव जी को ब्रह्महत्या का पाप लगा।
उस पाप से मुक्ति पाने के लिए शिवजी ब्रह्मांड में हर जगह घूमे लेकिन उन्हें मुक्ति का उपाय नहीं मिला। एक समय जब वे सोमेश्वर में बैठे थे, तब एक बछड़े द्वारा उन्हें इस पाप से मुक्ति का उपाय बताया गया। बछड़े के रूप में नंदी थे।
वह शिव जी के साथ गोदावरी के रामकुंड तक गए और कुंड में स्नान करने को कहा। स्नान के बाद शिव जी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो सके। नंदी के कारण ही शिवजी की ब्रह्म हत्या से मुक्ति हुई थी।
इसलिए उन्होंने नंदी को गुरु माना और यहां यहीं शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए। चूंकि अब नंदी महादेव के गुरू बन गए इसीलिए उन्होंने इस मंदिर में उन्हें स्वयं के सामने बैठने से मना किया।

संजय गुप्त