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हनुमानजी की जन्मस्थली का जानिये सच

इन 3 स्थानों पर दावा किया जाता है हनुमानजी के जन्म का

हम में से बहुत कम लोग जानते हैं कि हनुमानजी का जन्म भारत में कहां हुआ था। हनुमानजी की माता का नाम अंजना है इसीलिए उन्हें आंजनेय भी कहा जाता है। उनके पिता का नाम केसरी है इसीलिए उन्हें केसरीनंदन भी कहा जाता है। केसरी को कपिराज भी कहा जाता था, क्योंकि वे कपिक्षेत्र के राजा थे। अब सवाल यह उठता है कि यह कपि क्षे‍त्र भारत में कहां स्थित है? इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं।

हनुमानजी का जन्म कल्पभेद से कई विद्वान चैत्र सुद 1 मघा नक्षत्र को मानते हैं। कोई कार्तिक वद 14, कोई कार्तिक सुद 15 को मानते हैं। कुछ चैत्र माह की पूर्णिमा को उनके जन्म का समय मानते हैं और कुछ कार्तिक, कृष्ण चतुर्दशी की महानिशाको, लेकिन ज्यादातर जगह चैत्र माह की पूर्णिमा को मान्यता मिली हुई है।

हनुमानजीकी जन्मतिथि को लेकर मतभेद हैं। कुछ हनुमान जन्मोत्सव की तिथि कार्तिक कृष्णचतुर्दशी मानते हैं तो कुछ चैत्र शुक्ल पूर्णिमा। इस विषय में ग्रंथों में दोनों के ही उल्लेख मिलते हैं, किंतु इनके कारणों में भिन्नता है। वास्तव में पहला जन्मदिवस है और दूसरा विजय अभिनन्दन महोत्सव।

  1. डांग जिला का अंजनी पर्वत : कुछविद्वान मानते हैं कि नवसारी (गुजरात) स्थित डांग जिला पूर्व काल में दंडकारण्य प्रदेश के रूप में पहचाना जाता था। इस दंडकारण्य में राम ने अपने जीवन के 10 वर्ष गुजारे थे। डांग जिला आदिवासियों का क्षेत्र है। आजकल यहां ईसाई मिशनरी सक्रिय है। हालांकि आदिवासियों के प्रमुख देव राम हैं। आदिवासी मानते हैं कि भगवान राम वनवास के दौरान पंचवटी की ओर जाते समय डांग प्रदेश से गुजरे थे। डांग जिले के सुबिर के पास भगवान राम और लक्ष्मण को शबरी माता ने बेर खिलाए थे। शबरी भील समाज से थी। आज यह स्थल शबरी धाम नाम से जाना जाता है।

शबरीधाम से लगभग 7 किमी की दूरी पर पूर्णा नदी पर स्थित पंपा सरोवर है। यहीं मातंग ऋषिका आश्रम था। डांग जिले के आदिवासियों की सबसे प्रबल मान्यता यह भी है कि डांग जिले के अंजना पर्वत में स्थित अंजनी गुफा में ही हनुमानजीका जन्म हुआ था।

  1. कैथल का अंजनी मंदिर : कैथल हरियाणा प्रान्त का एक शहर है। इसकी सीमा करनाल, कुरुक्षेत्र, जिंद, और पंजाब के पटियाला जिले से मिली हुई है। इसे वानर राज हनुमान का जन्म स्थान माना जाता है। इसका प्राचीन नाम था कपिस्थल। कपिस्थल कुरू साम्राज्य का एक प्रमुख भाग था। आधुनिक कैथल पहले करनाल जिले का भाग था।

पुराणों के अनुसार इसे वानरराज हनुमान का जन्म स्थान माना जाता है। कपि के राजा होने के कारण हनुमानजी के पिता को कपिराज कहा जाता था। कैथल में पर्यटक ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं से जुड़े अवशेष भी देखे जा सकते हैं। इसके अलावा यहां पर हनुमानजी की माता अंजनी का एक प्राचीन मंदिर भी और अजान किला भी।

  1. गुमला का पंपा सरोवर : कुछ लोग मानते हैं कि हनुमानजी का जन्म झारखंड राज्य के उग्रवाद प्रभावित क्षे‍त्र गुमला जिला मुख्‍यालय से 20 किलोमीटर दूर आंजन गांव की एक गुफा में हुआ था। इसी जिले के पालकोट प्रखंड में बालि और सुग्रीव का राज्य था। माना यह भी जाता है कि यहीं पर शबरी का आश्रम था। यह क्षेत्र रामायण काल में दंडकारण्यण क्षेत्र का हिस्सा था। यहीं पर पंपा सरोवर हैं जहां राम और लक्ष्मण ने रुककर जल ग्रहण किया था।

जंगल और पहाड़ों में से घिरे इस आंजन गांव में एक अति प्राचीन गुफा है। यह गुफा पहाड़ की चोटी पर स्थित है। माना जाता है कि यहीं पर माता अंजना और पिताकेसरी रहते थे। यहीं पर हनुमानजी का जन्म हुआ था। गुफा का द्वार बड़े पत्थरों से बंद है लेकिन छोटे छिद्र से आदिवासी लोग उस स्थान के दर्शन करते हैं और अक्षत व पुष्प चढ़ाते हैं। लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि यह स्थान माता अंजना के जन्म से जुड़ा है।

एक जनश्रुति के अनुसार आदिवासियों को इस बात का भान नहीं था कि हनुमानजी और उनके माता-पिता पवित्रता और धर्म के पालन करने वालों के प्रति प्रसन्न रहते हैं। आदिवासियों ने माता अंजना को प्रसन्न करने के लिए एक दिन उनकी गुफा के समक्ष बकरे की बलि दे दी। इससे माता अप्रसन्न हो गई और उन्होंने एक विशालकाय पत्थर से हमेशा-हमेशा के लिए गुफा का द्वार बंद कर दिया। अब जो भी इस गुफा के द्वार को खोलने का प्रयास करेगा उसके ऊपर विपत्ति आएगी। इस गुफा की लंबाई 1500 फीट से अधिक है। इसी गुफा से माता अंजना खटवा नदी तक जाती थीं और स्नान कर लौट आती थीं। खटवा नदी में एक अंधेरी सुरंग है, जो आंजन गुफा तक ले जाती है।

मान्यता अनुसार इस गुफा के आंजन पहाड़ पर रामायण काल में ऋषि-मुनियों ने सप्त जनाश्रम स्थापित किए थे। यहां सात जनजातियां निवास करतीं थीं- 1.शबर, 2.वानर, 3.निषाद्, 4. गृद्धख् 5.नाग, 6.किन्नर व 7.राक्षस। जनाश्रम के प्रभारी थे-अगस्त्य, अगस्त्यभ्राता, सुतीक्ष्ण, मांडकणि, अत्रि, शरभंग व मतंग। यहां छोटानागपुर में दो स्थानों पर आश्रम है- एक आंजन व दूसरा टांगीनाथ धाम है।

अन्य मतातंर से कुछ लोग राजस्थान के चुरु जिले के सुजानगढ़ में, कुछ हंफी में तो कुछ लोग नासिक के त्र्यंबकेश्वर के पास अंजनेरी पहाड़ी को हनुमान जी का जन्म स्थल मानते हैं।
जैसी हरी इच्छा हरी ही जाने
🙏🙏जय श्री राम🙏🙏

संजय गुप्ता

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बहुत ही प्रेरक प्रसंग है…

एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं। उसने मन में सोचा यह बढिया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है।
गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं? लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं गुरुजी : कोई काम नहीं करना है बस पूजा करनी होगी आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा …

अब आनंद महाराज आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो। महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है

तुम्हारा भी उपवास है । उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो …. हम नहीं कर सकते उपवास… हमें तो भूख लगती है आपने पहले क्यों नहीं बताया? गुरुजी ने कहा ठीक है तुम ना करो उपवास, पर खाना भी तुम्हारे लिए कोई और नहीं बनाएगा तुम खुद बना लो। मरता क्या न करता गया रसोई में, गुरुजी फिर आए ”देखो अगर तुम खाना बना लो तो राम जी को भोग जरूर लगा लेना और नदी के उस पार जाकर बना लो रसोई। ठीक है, लकड़ी, आटा, तेल, घी, सब्जी लेकर आंनद महाराज चले गए, जैसा तैसा खाना भी बनाया, खाने लगा तो याद आया गुरुजी ने कहा था कि राम जी को भोग लगाना है।

वह भजन गाने लगा…आओ मेरे राम जी , भोग लगाओ जी प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए मेरे भोजन का भोग लगाइए….. कोई ना आया, तो बैचैन हो गया कि यहां तो भूख लग रही है और राम जी आ ही नहीं रहे। भोला मानस जानता नहीं था कि प्रभु साक्षात तो आएंगे नहीं । पर गुरुजी की बात मानना जरूरी है। फिर उसने कहा , देखो प्रभु राम जी, मैं समझ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हैं। मैंने रूखा सूखा बनाया है और आपको तर माल खाने की आदत है इसलिए नहीं आ रहे हैं…. तो सुनो प्रभु … आज वहां भी कुछ नहीं बना है, सबकी एकादशी है, खाना हो तो यह भोग ही खालो…
श्रीराम अपने भक्त की सरलता पर बड़े मुस्कुराए और माता सीता के साथ प्रकट हो गए। भक्त असमंजस में। गुरुजी ने तो कहा था कि राम जी आएंगे पर यहां तो माता सीता भी आईं है और मैंने तो भोजन बस दो लोगों का बनाया हैं। चलो कोई बात नहीं आज इन्हें ही खिला देते हैं। बोला प्रभु मैं भूखा रह गया लेकिन मुझे आप दोनों को देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है लेकिन अगली एकादशी पर ऐसा न करना पहले बता देना कि कितने जन आ रहे हो, और हां थोड़ा जल्दी आ जाना। राम जी उसकी बात पर बड़े मुदित हुए। प्रसाद ग्रहण कर के चले गए। अगली एकादशी तक यह भोला मानस सब भूल गया। उसे लगा प्रभु ऐसे ही आते होंगे और प्रसाद ग्रहण करते होंगे। फिर एकादशी आई। गुरुजी से कहा, मैं चला अपना खाना बनाने पर गुरुजी थोड़ा ज्यादा अनाज लगेगा, वहां दो लोग आते हैं। गुरुजी मुस्कुराए, भूख के मारे बावला है। ठीक है ले जा और अनाज लेजा। अबकी बार उसने तीन लोगों का खाना बनाया। फिर गुहार लगाई प्रभु राम आइए, सीताराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए…
प्रभु की महिमा भी निराली है। भक्त के साथ कौतुक करने में उन्हें भी बड़ा मजा आता है। इस बार वे अपने भाई लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न और हनुमान जी को लेकर आ गए। भक्त को चक्कर आ गए। यह क्या हुआ। एक का भोजन बनाया तो दो आए आज दो का खाना ज्यादा बनाया तो पूरा खानदान आ गया। लगता है आज भी भूखा ही रहना पड़ेगा। सबको भोजन लगाया और बैठे-बैठे देखता रहा। अनजाने ही उसकी भी एकादशी हो गई। फिर अगली एकादशी आने से पहले गुरुजी से कहा, गुरुजी, ये आपके प्रभु राम जी, अकेले क्यों नहीं आते हर बार कितने सारे लोग ले आते हैं? इस बार अनाज ज्यादा देना। गुरुजी को लगा, कहीं यह अनाज बेचता तो नहीं है देखना पड़ेगा जाकर। भंडार में कहा इसे जितना अनाज चाहिए दे दो और छुपकर उसे देखने चल पड़े।
इस बार आनंद ने सोचा, खाना पहले नहीं बनाऊंगा, पता नहीं कितने लोग आ जाएं। पहले बुला लेता हूं फिर बनाता हूं। फिर टेर लगाई प्रभु राम आइए , श्री राम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए… सारा राम दरबार मौजूद… इस बार तो हनुमान जी भी साथ आए लेकिन यह क्या प्रसाद तो तैयार ही नहीं है। भक्त ठहरा भोला भाला, बोला प्रभु इस बार मैंने खाना नहीं बनाया, प्रभु ने पूछा क्यों? बोला, मुझे मिलेगा तो है नहीं फिर क्या फायदा बनाने का, आप ही बना लो और खुद ही खा लो…. राम जी मुस्कुराए, सीता माता भी गदगद हो गई उसके मासूम जवाब से… लक्ष्मण जी बोले क्या करें प्रभु… प्रभु बोले भक्त की इच्छा है पूरी तो करनी पड़ेगी। चलो लग जाओ काम से। लक्ष्मण जी ने लकड़ी उठाई, माता सीता आटा सानने लगीं। भक्त एक तरफ बैठकर देखता रहा। माता सीता रसोई बना रही थी तो कई ऋषि-मुनि, यक्ष, गंधर्व प्रसाद लेने आने लगे। इधर गुरुजी ने देखा खाना तो बना नहीं भक्त एक कोने में बैठा है। पूछा बेटा क्या बात है खाना क्यों नहीं बनाया? बोला, अच्छा किया गुरुजी आप आ गए देखिए कितने लोग आते हैं प्रभु के साथ….. गुरुजी बोले, मुझे तो कुछ नहीं दिख रहा तुम्हारे और अनाज के सिवा भक्त ने माथा पकड़ लिया, एक तो इतनी मेहनत करवाते हैं प्रभु, भूखा भी रखते हैं और ऊपर से गुरुजी को दिख भी नहीं रहे यह और बड़ी मुसीबत है। प्रभु से कहा, आप गुरुजी को क्यों नहीं दिख रहे हैं? प्रभु बोले : मैं उन्हें नहीं दिख सकता। बोला : क्यों वे तो बड़े पंडित हैं, ज्ञानी हैं विद्वान हैं उन्हें तो बहुत कुछ आता है उनको क्यों नहीं दिखते आप? प्रभु बोले , माना कि उनको सब आता है पर वे सरल नहीं हैं तुम्हारी तरह। इसलिए उनको नहीं दिख सकता….
आनंद ने गुरुजी से कहा, गुरुजी प्रभु कह रहे हैं आप सरल नहीं है इसलिए आपको नहीं दिखेंगे, गुरुजी रोने लगे वाकई मैंने सबकुछ पाया पर सरलता नहीं पा सका तुम्हारी तरह, और प्रभु तो मन की सरलता से ही मिलते हैं। प्रभु प्रकट हो गए और गुरुजी को भी दर्शन दिए। इस तरह एक भक्त के कहने पर प्रभु ने रसोई भी बनाई , भक्ति का प्रथम मार्ग सरलता है !
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संकट मोचन कृपा निधान जय हनुमान जय जय हनुमान जय सियाराम जय जय सियाराम
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एक कहानी या सच्चाई पिताजी के अचानक आधमकने से गुस्से से पत्नी तमतमा उठी..“लगता है, बूढ़े को पैसों कीज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था. अपने पेट का गड्ढ़ा भरता नहीं, घरवालों का कहाँ से भरोगे ?”

मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा।

पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफ़र की थकान दूर कर रहे थे।

इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया।

बड़े बेटे का जूता फट चुका है।वह स्कूल जाते वक्त रोज भुनभुनाता है।

पत्नी के इलाज के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं।

बाबूजी को भी अभी आना था।घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी खाना खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आये होंगे।

पिताजी कुर्सी पर उठ कर बैठ गए। एकदम बेफिक्र।

“ सुनो ” कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा।मैं सांस रोक कर उनके मुँह की ओर देखने लगा।

रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।

वे बोले… “ खेती के काम में घड़ी भर भी फुर्सत नहीं मिलती।इस बखत काम का जोर है।

रात की गाड़ी से
वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली… जब तुम परेशान होते हो,

तभी ऐसा करते हो उन्होंने जेब से सौ-सौ के पचास नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए, “रख लो तुम्हारे काम आएंगे धान की फसल अच्छी हो गई थी।

घर में कोई दिक्कत नहीं है तुम बहुत कमजोर लग रहे हो।ढंग से खाया-पिया करो बहू का भी ध्यान रखो।

मैं कुछ नहीं बोल पाया शब्द जैसे मेरे हलक में फंस कर रह गये हों।

मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार
से डांटा…“ले लो, बहुत बड़े हो गये हो क्या ..?”

और मैं अपने आँखों के अनमोल मोतियो को चाहते हुवे भी नहीं रोक पाया दोस्तों और मेरे आँखों से जल की नदिया बहने लगी मैं ने पिता जी को अपने सीने से लगा लिया और खूब जी भर के रोया यकींन मानिये दोस्तों मुझे उस दिन बहुत सुकून मिला था और मुझे बच्चपन याद आ गया था फिर मैं बोला????

“ नहीं तो।” मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए।

बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने
के लिए इसी तरह हथेली पर अठन्नी टिका देते थे,

पर तब
मेरी नज़रें आजकी तरह झुकी नहीं होती थीं।
दोस्तों एक बात हमेशा ध्यान रखे…

माँ बाप अपने बच्चो पर बोझ हो सकते हैं बच्चे उन पर बोझ कभी नही होते है।

माता पिता ही पृथ्वी पर सबसे बड़े भगवान है दोस्तों वो अच्छे हो या बुरे उन्होंने हमें जन्म दिया यही बड़ी बात है।
सारे लड़ाई झगडे भुला के माँ पिता के पैर छूवो देखो कितनी ख़ुशी मिलता है।।

        संजय गुप्ता
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भक्तवत्सल भगवान श्री कृष्ण की महिमा अपरंपार💐💐

नंदा नाई
एक नाई जिसका नाम नंदा था। वह एक कृष्ण भक्त था। सुबह उठकर कृष्ण की सेवा करता। उन्हें भोग लगाता। कीर्तन करता। फिर अपने काम पर निकलता था। सबसे पहले राजा की हजामत करता था क्योंकि राजा को दरबार जाना होता था।
राजा की हजामत के बाद नंदा नगर के लिए निकलता था। जहाँ उसे जीवन यापन के लिए अन्य साधन मिल जाते।
एक दिन कृष्ण सेवा के बाद कीर्तन करते करते नंदा कृष्ण के ध्यान में खो गया।
पत्नी ने देर होते देख और राजा के क्रोध की बात सोचकर नंदा को झंझोरते हुए कहा। “अजी सुनते हो” – राजा के दरबार में जाने का समय हो गया है। राजा की हजामत करनी है अन्यथा राजा क्रोधित हो जायेंगे।
नंदा ने जल्दी जल्दी अपना सामान समेटा और महल की ओर दौड़ा। जब वह महल पहुंचा तो वहां से राजा दरबार के लिए निकल रहे थे। राजा ने नंदा को देखकर कहा अभी-अभी तो हजामत कर गये थे, क्या तुम्हे कोई परेशानी है, या किसी चीज आवश्यकता है? नंदा ने कहा जी नहीं, मुझे लगा मैं शायद कुछ भूल गया हूँ। लेकिन अंदर ही अंदर उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।
शाम को नंदा फिर राजा के दरबार में अपनी उत्कंठा शांत करने के उद्देश्य से पहुंचा। पर राजा की बात सुन कर चौंक गया।
राजा ने कहा-“अरे नंदा आज तुम दो बार हजामत बनाओगे क्या?”
सुबह जो तुमने हजामत बनाई और सेवा की उससे मैं अभी तक आनंदित हूँ। आज तक इतना आनंद नहीं मिला।
ये सुन कर नंदा नाई रो पड़ा और रोते हुए बोला – ” हे राजन आप बहुत भाग्यवान हैं। मैं जिसकी भक्ति में दिन रात लगा रहता हूँ। मेरे उस प्यारे ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए पर अपने भक्त की लाज बचाने के लिए स्वयं आपकी हजामत बना के चले गए. मैं तो अभी आ रहा हूँ। सुबह से प्रभु के ध्यान में था। जब ध्यान टुटा तो आपके डर वश् अब आया हूँ।
और ये सोच कर शर्मिंदा हूँ कि भगवान ने मुझे बचाने के लिए खुद नाई का रूप धार लिया।
यह सुनकर पूरा दरबार भक्तिमय हो उठा और भक्त के आगे नतमस्तक हो गया और कह उठा भक्तवत्सल भगवान की जय।

संजय गुप्ता

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राम राम जी…..

उस समय का प्रसंग है जब भरतजी गुरू वशिष्ठ जी के साथ श्रीराम के वनवास प्रस्थान के पश्चात मिलने निकले और निषादराज केवट से भेंट हुई !

निषादराज ने आगे बढ़कर अपना परिचय दिया और दण्डवत् प्रणाम कर दिया !

भरतजी ने पूछा – गुरुजी ! ये कौन हैं ?

गुरुजी ने कहा – ये राम सखा हैं !

बस भरतजी रथ से कूद गए, निषादराज को उठाकर गले से लगा लिया !

बाद में गुरुजी ने कहा – भरत ! तुम चक्रवर्तीजी के उत्तराधिकारी हो, वह छोटे से कबीले का मुखिया, तुम्हें उतावलापन नहीं दिखाना चाहिए था !

भरतजी ने कहा – गुरुजी, वो रामजी का सखा है, मैं रामजी का सेवक हूँ । सखा जमीन पर पड़ा हो और सेवक रथ पर चढ़ा रहे, यह कैसे ठीक होता ?

गुरुजी कहने लगे – भरत तुम जैसा कोई नहीं !

पहला विश्राम श्रृंगवेरपुर में ही हुआ । भरतजी ने सबको सुला दिया । आप कहेंगे रामजी तो सोए हुओं को छोड़ गए, भरतजी ने सुला क्यों दिया ?

तो रामजी ज्ञान हैं, ज्ञान जगाता है, कि दुख से छूटना है तो जाग जाओ !

भरतजी भक्त हैं, भक्ति कहती है, भगवान के आश्रय में निश्चिंत होकर सो जाओ । भक्ति माँ है, अपनी गोद में सुला लेती है !

दृष्टि भिन्न है, उद्देश्य एक ही है, दुख से छुड़ाना और भगवान से मिलाना । भरतजी ने सबको सुला दिया, पर खुद नहीं सोए, आँखों में नीर है, नींद कैसे आए ?

निषादराज के पास गए,बोले – भैया ! मुझे वह जगह दिखा दो, जहाँ श्रीसीतारामजी सोए थे !

कह तो दिया, पर कलेजा कट गया, गला रूधं गया ।
दोनों चले, शीशम का वृक्ष, भरतजी ने धूल में लोटकर प्रणाम किया !

निषादराज बोले – यह वृक्ष सौभाग्यशाली है, जो आप इसे प्रणाम कर रहे हैं !

भरतजी कहें – हाँ बहुत सौभाग्यशाली है ! पर इसलिए नहीं कि मैं प्रणाम कर रहा हूँ । यह सौभाग्यशाली है, इसीलिये मैं इसे प्रणाम कर रहा हूँ !

यह तो कल्पवृक्ष से भी बड़ा है, सारा संसार जिनकी कृपा छाया में बैठता हो, वे इसकी छाया में आ बैठे !!

धन्य है भरतजी धन्य उनकी भक्ती और धन्य है उनका भ्रातप्रेम !

                 ।। जय जय श्रीराम ।।

संजय गुप्ता

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ठाकुर जी की दर्पण सेवा………

एक मैया अपने श्याम सुन्दर की बड़ी सेवा करती थी,.वह प्रातः उठकर अपने ठाकुर जी को बड़े प्यार दुलार और मनुहार से उठाती और स्नान श्रृंगार के बाद उनको आइना दिखाती .उसके बाद भोग लगाती थी.

एक बार उसको एक मास की लंबी यात्रा पर जाना पड़ा .जाने से पूर्व उसने ठाकुर जी की सेवा अपनी पुत्रवधू को सौपते हुई समझा रही थी .ठाकुर जी की सेवा में कोई कमी न करना .उनको श्रृंगार के बाद आइना दिखाना इतना अच्छा श्रृंगार करना कि ठाकुर जी मुस्करा दें.

दूसरे दिन बहू ने सास की आज्ञानुसार ठाकुर जी की सेवा की .उनको श्रृंगार के बाद दर्पण दिखाया और उसी दर्पण में धीरे से देखने लगी कि ठाकुर जी मुस्कराए या नहीं. ठाकुर जी को जब मुस्कराता न देखा तो सोचा श्रृंगार में कमी हो गई होगी .

पगड़ी बंसी पोशाक सब ठीक करके फिर दर्पण दिखा कर झुक कर देखा. ठाकुर जी पहले जैसे खड़े थे.एक बार पुनः पोशाक श्रृंगार ठीक किया .फिर से दर्पण दिखाया ठाकुर जी नहीं मुस्कराए.

अब बेचारी डर गई सोचा शायद ठीक से नहीं नहलाया नहीं. फिर से कपडे उतार कर ठाकुर जी को स्नान कराया , पोशाक और श्रृंगार पधराया.पुनः दर्पण दिखाया.किंतु ठाकुर जी की मुस्कान न देख सकी.

एक बार फिर पोशाक उतार कर पूरा क्रम दुहराया .ठाकुर जी की मुस्कान तो नहीं मिली.
इस प्रकार उसने 12 बार यही उपक्रम किया. सुबह से दोपहर हो चुकी थी. घर का सब काम बाकी पड़ा था.

न कुछ खाया था न पानी पिया था.बहुत जोर की भूख प्यास लगी थी.किंतु सास के आदेश की अवहेलना करने की उसकी हिम्मत नहीं थी.
तेरहवीं बार उसने ठाकुर जी के वस्त्र उतारे .पुनः जल से स्नान कराया .ठाकुर जी सुबह से सर्दी के मौसम में स्नान कर कर के तंग हो चुके थे.

उन्हें भी जोर की भूख प्यास लगी थी, इस बार फिर से वस्त्र आभूषण पहन रहे थे किन्तु उनके मन में भी बड़ी दुविधा थी .क्या करूँ ?

श्रृंगार होने के बाद आसन पर विराज चुके थे.बहू ने दर्पण उठाया .ठाकुर जी ने निश्चय कर लिया था मुस्कराने का.जैसे ही उसने दर्पण दिखाया और झुक कर बगल से देखने की चेष्टा की श्याम सुन्दर मुस्करा रहे थे.उनकी भुवन मोहिनी हंसी देख कर बहू विस्मित हो गई .

सारी दुनिया को भूल गई .
थोड़ी देर में होश में आने के बाद उसको लगा.शायद मेरा भ्रम हो.ठाकुर जी तो हंसे नहीं.उसने पुनः दर्पण दिखाया .

ठाकुर जी ने सोचा प्यारे अगर भोजन पाना है तो मुस्कराना पड़ेगा.वो पुनः मुस्कराने लगे.ऐसी हँसी उसने पहले नहीं देखी थी.वह मन्द हास उसके ह्रदय में बस गया था.उस छवि को देखने का उसका बार बार मन हुआ.एक बार फिर उसने दर्पण दिखाया और ठाकुर जी को मुस्कराना पड़ा.

अब तो मारे ख़ुशी के वह फूली न समाई बड़े प्रेम से उनको भोग लगाया और आरती की .दिन की शेष सेवाएं भी की और रात्रि को शयन कराया.
अगले दिन पुनः उसने पहली बार ही जैसे ठाकुर जी को स्नान करा के और वस्त्राभूषणों को पहना कर सुन्दर श्रृंगार करके आसन पर विराजमान किया और दर्पण दिखाया ठाकुर जी कल की घटनाओं और भूख को याद किया .

ठन्डे जल से 13 बार का स्नान याद करके ठाकुर जी ने मुस्कराने में ही अपनी भलाई समझी .उसने तीन बार ठाकुर जी को दर्पण दिखाया और उनकी मनमोहक हँसी का दर्शन किया .आगे की सेवा भी क्रमानुसार पूरी की.

अब तो ठाकुर जी रोज ही यही करने लगे दर्पण देखते ही मुस्करा देते .बहू ने सोचा शायद उसको ठीक से श्रृंगार करना आ गया है वह इस सेवा में निपुण हो गई है.

एक मास बाद जब मैया यात्रा से वापस आई आते ही उसने बहू से सेवा के बारे में पूछताछ की .बहू बोली मैया मुझे एक दिन तो सेवा मुश्किल लगी किन्तु अब मैं निपुण हो गई हूँ.
अगले दिन मैया ने स्वयं अपने हाथों से सारी सेवा की श्रृंगार कराया अब दर्पण लेने के लिए हाथ उठाया ठाकुर जी स्वयं प्रकट हो गए .

मैया का हाथ पकड़ लिया बोले ,” मैया मैं तेरी सेवा से प्रसन्न तो हूँ पर दर्पण दिखाने की सेवा तो मैं तेरी बहूरानी से ही करवाऊंगा .तू तो रहने दे.

मैया बोली – लाला ! क्या मुझसे कोई भूल हुई .ठाकुर जी ने कहा नहीं मैया भूल तो नहीं हुई .पर मेरा मुस्कराने का मन करता है .और मैं तो तेरी बहूरानी के हाथ से दर्पण देखकर मुस्कराने की आदत डाल चुका हूँ .अब ये सेवा तू उसी को करने दे .”

मैया ने बहूरानी को आवाज लगाई और उससे सारी बात पूँछी, बहू ने बड़े सहज भाव से बता दिया हाँ ऐसा रोज मुस्कराते हैं ये केवल पहले दिन समय लगा था .मैया बहू रानी की श्रद्धा और उसकी लगन और ठाकुर जी दर्शन से अति प्रसन्न हो गई .

उसे पता चल गया कि उसकी बहू ने ठाकुर जी को अपने प्रेम से पा लिया है.
मैया अपनी बहू रानी को ठाकुर जी की सेवा सौप कर निश्चिन्त हो गई!!
🌼🌸जय जय श्री राधे🌼🌸

संजय गुप्ता

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😎 🌷 🌷 सुदामा ने एक बार श्रीकृष्ण ने पूछा कान्हा, मैं आपकी माया के दर्शन करना चाहता हूं… कैसी होती है?”

श्री कृष्ण ने टालना चाहा, लेकिन सुदामा की जिद पर श्री कृष्ण ने कहा, “अच्छा, कभी वक्त आएगा तो बताऊंगा।

और फिर एक दिन कृष्ण कहने लगे… सुदामा, आओ, गोमती में स्नान करने चलें| दोनों गोमती के तट पर गए। वस्त्र उतारे| दोनों नदी में उतरे… श्रीकृष्ण स्नान करके तट पर लौट आए। पीतांबर पहनने लगे… सुदामा ने देखा, कृष्ण तो तट पर चला गया है, मैं एक डुबकी और लगा लेता हूं… और जैसे ही सुदामा ने डुबकी लगाई… भगवान ने उसे अपनी माया का दर्शन कर दिया।

सुदामा को लगा, गोमती में बाढ़ आ गई है, वह बहे जा रहे हैं, सुदामा जैसे-तैसे तक घाट के किनारे रुके| घाट पर चढ़े| घूमने लगे। घूमते-घूमते गांव के पास आए। वहां एक हथिनी ने उनके गले में फूल माला पहनाई। सुदामा हैरान हुए लोग इकट्ठे हो गए। लोगों ने कहा, “हमारे देश के राजा की मृत्यु हो गई है। हमारा नियम है, राजा की मृत्यु के बाद हथिनी, जिस भी व्यक्ति के गले में माला पहना दे, वही हमारा राजा होता है| हथिनी ने आपके गले में माला पहनाई है, इसलिए अब आप हमारे राजा हैं।

सुदामा हैरान हुआ। राजा बन गया एक राजकन्या के साथ उसका विवाह भी हो गया। दो पुत्र भी पैदा हो गए एक दिन सुदामा की पत्नी बीमार पड़ गई… आखिर मर गई… सुदामा दुख से रोने लगा… उसकी पत्नी जो मर गई थी, जिसे वह बहुत चाहता था, सुंदर थी, सुशील थी… लोग इकट्ठे हो गए… उन्होंने सुदामा को कहा, आप रोएं नहीं, आप हमारे राजा हैं… लेकिन रानी जहां गई है, वहीं आप को भी जाना है, यह मायापुरी का नियम है| आपकी पत्नी को चिता में अग्नि दी जाएगी… आपको भी अपनी पत्नी की चिता में प्रवेश करना होगा… आपको भी अपनी पत्नी के साथ जाना होगा।

सुना, तो सुदामा की सांस रुक गई… हाथ-पांव फुल गए… अब मुझे भी मरना होगा… मेरी पत्नी की मौत हुई है, मेरी तो नहीं… भला मैं क्यों मरूं… यह कैसा नियम है? सुदामा अपनी पत्नी की मृत्यु को भूल गया… उसका रोना भी बंद हो गया। अब वह स्वयं की चिंता में डूब गया… कहाभी, ‘भई, मैं तो मायापुरी का वासी नहीं हूं… मुझ पर आपकी नगरी का कानून लागू नहीं होता… मुझे क्यों जलना होगा|’ लोग नहीं माने, कहा, ‘अपनी पत्नी के साथ आपको भी चिता में जलना होगा… मरना होगा… यह यहां का नियम है। आखिर सुदामा ने कहा, ‘अच्छा भई, चिता में जलने से पहले मुझे स्नान तो कर लेने दो…’ लोग माने नहीं… फिर उन्होंने हथियारबंद लोगों की ड्यूटी लगा दी… सुदामा को स्नान करने दो… देखना कहीं भाग न जाए…

रह-रह कर सुदामा रो उठता| सुदामा इतना डर गया कि उसके हाथ-पैर कांपने लगे… वह नदी में उतरा… डुबकी लगाई… और फिर जैसे ही बाहर निकला… उसने देखा, मायानगरी कहीं भी नहीं, किनारे पर तो कृष्ण अभी अपना पीतांबर ही पहन रहे थे… और वह एक दुनिया घूम आया है| मौत के मुंह से बचकर निकला है…सुदामा नदी से बाहर आया… सुदामा रोए जा रहा था।

श्रीकृष्ण हैरान हुए… सबकुछ जानते थे… फिर भी अनजान बनते हुए पूछा, “सुदामा तुम रो क्यों रो रहे हो?”सुदामा ने कहा, “कृष्ण मैंने जो देखा है, वह सच था या यह जो मैं देख रहा हूं|” श्रीकृष्ण मुस्कराए, कहा, “जो देखा, भोगा वह सच नहीं था| भ्रम था… स्वप्न था… माया थी मेरी और जो तुम अब मुझे देख रहे हो… यही सच है… मैं ही सच हूं…मेरे से भिन्न, जो भी है, वह मेरी माया ही है| और जो मुझे ही सर्वत्र देखता है,महसूस करता है, उसे मेरी माया स्पर्श नहीं करती| माया स्वयं का विस्मरण है…माया अज्ञान है, माया परमात्मा से भिन्न… माया नर्तकी है… नाचती है… नाचती है… लेकिन जो श्रीकृष्ण से जुड़ा है, वह नाचता नहीं… भ्रमित नहीं होता… माया से निर्लेप रहता है, वह जान जाता है, सुदामा भी जान गया था… जो जान गया वह श्रीकृष्ण से अलग कैसे रह सकता है!!!!

🌷।। जय श्री कृष्णा।। 🌷 जय श्री राधे राधे 🌷🙏🌷
Sanjay Gupta

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साभार….

एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो।

एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया। आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, “बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।” कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, ” यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।

एक-दो रोगी आए थे। उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी। वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे।
दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन करें। वह साहब कहने लगे “वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अंधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया। ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी। एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, ” चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है। आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं।
मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।” आपने कहा था, “मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में होता है। जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था। मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था, बस ठीक है। मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है। मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते। मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है। मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।

वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है। हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था। मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है। मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।

वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, ” कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है। आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।” और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी। वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ”दहेज का सामान” के सामने लिखा हुआ था ” यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।”

काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, “कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो। आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने। वाह भगवान वाह! तू महान है तू दयावान है। मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।”

वैद्यजी ने आगे कहा, “जब से होश सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।

शुक्र है मेरे मालिक
तेरा लाख-लाख ….

Posted in संस्कृत साहित्य

विश्व-भर की वैदिक काल-गणना
The World Keeps Vedic Time

विश्व-भर में चली आ रही वह वैदिक समय- नापन प्रणाली विश्वसाम्राज्य का एक ठोस प्रमाण है। अतीत में सारे लोग वैदिक धर्मी थे। अतः वे बौद्ध, कृस्ती या इस्लामी बनने पर भी उसी सामान वैदिक पद्दति से काल-नापं करते हैं। विश्व भर में हिन्दू वैदिक पंचांग सबसे प्राचीन है। इतना ही नहीं यह एकमेव पंचांग ऐसा है सृष्टि उत्त्पति के दिन से बीते हुए काल का हिसाब लगातार प्रतिदिन रखा जाता है। इस समय विक्रम संवत २०७० चल रहा है।

आजकल आँगल प्रभाव के कारण सामान्यजन भी “टेम (यानि Time) क्या है? ऐसा एक दुसरे को पूछते हैं। संस्कृत शब्द ‘समय’ है। महाभारतीय युद्ध के पश्चात गुरुकुल शिक्षा बंद हो जाने पर ‘समय’ शब्द का विकृत उच्चार ‘टमय’ बन गया और आगे चल कर ‘टाइम’ और ‘टेम’ कहलाने लगा। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। अंग्रेजी में ऐसे भरपूर शब्द है जो संस्कृत शब्दों के ही विकृत रूप हैं। उदहारणार्थ संस्कृत में जिसे ‘आश्रयम’ कहते हैं आँगल भाषा में Assylum (असालयम्) कहते हैं। उसी प्रकार ‘विस्मय’ को आँगल भाषा में Dismay डिस्मे (उर्फ़ डिसमय ) कहते हैं। उसी प्रकार समय का टमय हो गया और टमय का टाइम उर्फ़ टेम उच्चारण होने लगा।

Samay समय – Tamay टमय, बाद में Time टाइम
Kalantar कालांतर – Calender कलेण्डर

वैदिक पद्दति में क्षण, घटि, होरा, प्रदर इत्यादि काल विभाग होते हैं। आंगल भाषा में क्षण को second (सेकंड) कहते हैं। उस आंगल शब्द से अंतिम ‘क’ अक्षर निकल कर शेष अक्षर यदि Cson क्रम में लिखें तो वह स्पष्टतया ‘क्षण’ शब्द ही जान पड़ता है। संस्कृत को तोड़-मोड़ होते होते कुछ अक्षर इधर-उधर या कम-अधिक होकर विविध भाषाएँ बनी। अतः क्षण शब्द का उच्चार ‘सेकण्ड’ हुआ।

Minute (मिनिट) इस आंगल शब्द में बीच का अक्षर ‘नि’ फ़ालतू पड़ गया है। उसे हटाकर शेष शब्द ‘मिट’ उर्फ़ ‘मित’ रह जाता है। वह संस्कृत ‘मित’ यानि छोटा-नपा (समय) विभाग इस अर्थ का संस्कृत शब्द ही है।

६० सेकण्डों का एक मिनट और ६० मिनटों का एक घंटा। यह ६०-६० वाला हिसाब वैदिक संस्कृति का है। वैदिक कालगणनानुसार ६० पल की एक घटी और ६० घटियों का एक दिन होता है। २ १/२ घटियों का एक होरा बनता है। उस होरा शब्द का ही ‘आवर’ (Hour) विकृत उच्चार आंगल भाषा में रूढ़ है।

60 Pal = 1 Ghati (24 Minutes) 2.5 Ghati = 1 Hora (=1 Hour)

विस्तार –

Krati =34,000th of a second Truti =300th of a second 2 Truti =1 Luv 2 Luv = 1 Kshana 30 Kshana =1 Vipal 60 Vipal = 1 Pal 60 Pal = 1 Ghati (24 Minutes) 2.5 Ghati = 1 Hora (=1 Hour) 24 Hora = 1 Divas (1 Day) 7 Divas = 1 Saptah (1 Week) 4 Saptah = 1 Maas (1 Month) 2 Maas = 1 Ritu (1 Season) 6 Ritu = 1 Varsha (1 Year) 100 Varsha = 1 Shatabda (1 Century) 10 Shatabda = 1 Sahasrabda 432 Sahasrabda = 1Yuga (Kali Yuga)) 2 Kali Yuga = 1 Dwaapar Yuga 3 Kali Yuga = 1 Treta Yuga 4 Kali Yuga = Kruta Yuga 10 Kali Yuga = 1 Maha Yuga (4,320,000) 1000 Maha Yuga = 1 Kalpa 1 Kalpa = 4.32 Billion Years

Day (डे) यह आंगल शब्द संस्कृत ‘दिनम्’ या ‘दिवस’ शब्द का ही एक छोटा टुकड़ा है।

तत्पश्चात् साप्ताहिक दिनों का क्रम देखें। सात ग्रहों के नाम से वे सात दिन हैं।शनि को आंगल भाषा में saturn (सटर्न) कहते हैं। अतः शनिवार को आंगल भाषा में सटरडे (saturday) हुआ। तत्पश्चात् रवि का वार Sunday (सन्डे), तदुपरांत चंद्रवार यानि Moonday उर्फ़ Monday जिसे हम सोम (यानि चन्द्र) वार कहते हैं। इस प्रकार सप्ताह के सातों दिन विविध ग्रहों के नाम से विश्व में प्रत्येक जनजाति में उसी क्रम में प्रचलित हैं जैसे अनादिकाल से वैदिक संस्कृत ने चलाये हैं।

सप्ताह के पश्चात् मास्। वे भी वैदिक पद्दति के अनुसार सर्वत्र बारह ही हैं।यूरोप में कृसमास, मायकेलमास आदि जो शब्द हैं, उनसे जाना जा सकता है कि प्राचीन यूरोप में भी महीनो को मास कहा करते थे जैसा संस्कृत में रूढ़ है। कृष्ण उर्फ़ कृस्त के उत्सव का मास कृस्तमास् और मायकेल उत्सव का मास मायकेलमास कहा जाता था।

जनुअरी का रोमन नाम जनुएरिएस् था जो ‘गणराय ईश’ ऐसा पूरा वैदिक – संस्कृत है। गणेशजी का होने से उसे सर्वप्रथम स्थान मिला।

दूसरा महीना फेब्रुवारी रोमन परंपरा में फेब्रुएरियस् लिखा जाता है। वह वास्तव में ‘प्रवरेश’ इस संस्कृत शब्द का विकृत रूप है। ऋषि को प्रवर कहते थे।कृस्ती परंपरा में उसी का अपभ्रंश Friar ‘फायर’ (यानि साधु-सन्यासी) हो गया है। प्रवरेश का अर्थ है श्रेष्ठ ऋषि या ऋषियों का ईश्वर।

तीसरा महीना ‘मार्च’। इसके दो प्रयोजन हैं। कवायत में ‘मार्च’ का अर्थ होता है ‘चल पड़ना’। वैदिक संस्कृति के अनुसार बसंत सम्पात से मार्च में ही (लगभग) नया वर्ष आरम्भ होता है। अतः जिस महीने से नया वर्ष चल पड़ता है वह मार्च मास। इस नाम की दूसरी व्युपतत्ति मरीचि (यानि सूर्य) नाम से मिलती है। उस मास से सूर्य प्रखर होने लगता है।

पाँचवा महीना May माया (ईश्वर की माया) इस वैदिक शब्द से पड़ा है। इस प्रकार पाश्चात्य लोगों के बारह मासों के नाम इतिहास के टूटे-फूटे टुकड़ों से कामचलाऊ प्रकार से जैसे-तैसे टेढ़े-मेढ़े जोड़े गए हैं।

विविध महीनों के नामों के बारे में वूरोपे के विद्वान् जो विवरण देते हैं वह अटपटा-सा है।वे समझते हैं कि July और August यह दो नाम रोमन सम्राट जुयूलियस (सीजर) और ऑगस्टस के दिए हुए हैं। यदि वह धारणा रही होती तो सम्राटों के नामों में भिन्नता नहीं होती, जुयूलियस के बजाई जुलै और ऑगस्टस के बजाए ऑगस्ट नाम क्यूँ पड़ते।

अब महीनो के कुछ नया यूरोपियन नाम देखें। सेप्तेम्बर, ऑक्टोबर, नव्हेम्बर और डिसेम्बर। यह नाम ससांवर, अष्टांवर, नवांवर और दशांवर ऐसे पूर्णतया संस्कृत हैं। प्रतयेक भाग में सूर्य एक-एक मास रहता है। अतः सप्तांबर, अष्टांबर, नवांबर और दशांबर यह पृथ्वी की भ्रमण कक्षा के ७वें, ८वें,९वें और १० वें भाग है। तथापि यूरोपियन गणना में उन महीनों, स्थान ९वाँ, १०वाँ, ११वाँ और १२वाँ है। नामानुसार जो महीने सातवें, आठवें, नवें और दसवें कहलाते हैं वे प्रत्यक्ष में नौवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें क्यूँ माने जाते हैं? यह असंगति कैसे निर्माण हुई? हो सकता है कि इतिहास की उथल-पुथल में दो मास गिनती से बाहर रह गए हों। हो सकता है वे दो गायब मास माइकेलमास और कृसमास ही हो !

ऊपर दिए विवरण से स्पष्ट है कि बारह मासों का क्रम और नाम अभी तक अनादि वैदिक परंपरा पर ही आधारित है।

नव वर्ष का आरम्भ भी यूरोप में वैदिक पचांग के अनुसार मार्च अंत के लगभग ही होता था। रोमन साम्राज्य कृस्ती बन जाने पर चन्द्र तिथि के बजाय १४ मार्च को नया वर्ष दिन मानने लगा।

इंग्लैंड में सन् 1752 तक २४ मार्च नया वर्ष दिन माना जाता था। सन् 1752 में पार्लियामेंट के प्रस्ताव द्वारा २४ मार्च बदलकर १ जनुअरी नव वर्ष दिन घोसित किया गया।

इंग्लैंड में रात के बारह बजे नए दिन का आरम्भ मानने की प्रथा है। वह बड़ी अटपटी-सी लगती है। क्यूंकि प्रतिदिन रात के १२ बजे से उठकर कैलेंडर की तारीख बदलेगा? वह प्रथा इसलिए पड़ी कि वैदिक संस्कृति के अनुसार भारत में ५.३० बजे सूर्योदय होने पर तिथि बदली जाती थी। उस समय भारत का वैदिक पचांग ही सारे विश्व में प्रमाण माना जाता था। भारत और इंग्लैंड के समय में ठीक साढ़े पाँच घंटो का अंतर है। अतः जब भारत में सूर्योदय होता था इंग्लैंड में रात्रि के बारह बजते थे। उस समय सूर्योदय पर भारत निजी तिथि बदलता ब्रिटेन के लोग भी उसी समय अगले दिन का आरम्भ मानते।

सारे यूरोप में रात के १२ बजे नयी तिथि का आरम्भ माने की जो प्रथा है कृष्णमास के मध्यरात्रि की पूजा के कारण है। ब्रिटेन, यूरोप में वैदिक संस्कृति का एक प्रमुख धर्म केंद्र था। अतः ब्रिटेन के वैदिक धर्म-केंद्र ने नयी वैदिक तिथि घोसित करने पर सारे यूरोप में मध्यरात्रि का समय ही तिथि आरम्भ माना जाने लगा।

पाशचात्य प्राथा के अनुसार मध्यरात्रि से दोपहर के १२ बजे तक के समय को a.m. यानि (ante-meridian) और दोपहर से मध्यरात्रि के समय को p.m. (post-meridian) लिखा जाता है. ante-meridian का अर्थ है शिरोरेखा के उरली तरफ, उसी प्रकार post-meridian का अर्थ है शिरोरेखा के परली तरफ। किन्तु यह विवरण पर्याप्त नहीं, आधा-अधुरा है। शिरोरेखा के उरली तरफ या परली तरफ जाने वाले सूर्य का तो उसमें उल्लेख ही नहीं है।

अतः A.M और P.M. यह अधाक्षर वास्तव में ‘आरोहणम् मार्तडस्य्’ और ‘पतनम् मार्तडस्य्’ अर्थ का घोतक है। इनमे उदय के पश्चात शिरोरेखा तक आरोहण और मध्याह के पश्चात क्षितिज तक सूर्य के अवतरण का पूरा उल्लेख है।

2 Paramaanu= 1 Anu [sub-atomic particle, idivisible and cannot contain life] 3 Anu= 1 Trasarenu – 3 Trasarenu= 1 Truti – time the Sun takes to cross 3 Trasarenu is called Truti (8/13,500 parts of a second) 100 Truti= 1 Vedh (8/135 parts of a second) 3 Vedh= 1 Lav (8/45 parts of a second) 3 Lav= 1 Nimesh (8/15 parts of a second) 3 Nimesh= 1 Kshan, or Pal, or second (8/5 parts of a second) 5 Kshan= 1 Kaashthaa (8 seconds) 15 Kaashthaa= 1 Laghu (120 seconds or 2 minutes) 15 Laghu= 1 Naadikaa*, or 1 Dand, or 30 minutes

दो-चार सौ वर्ष पूर्व जब अन्य देशों में लोग एक सहस्त्र से अधिक संख्या गिन नहीं पाते थे तब भारत में १ पर १६ शुन्य (१००००००००००००००००) इतनी ऊंची संख्या तक का गणन होता था. जिस संस्कृति में सूक्ष्मातिसूक्ष्म से स्थूल से स्थूल मात्र तक गणन की व्यवस्था है उसके लोग शास्त्र, विद्या, और कलाओं में अति प्रवीण और प्रगत थे, इसके बाबत किसी के मन में संदेह नहीं होना चाहिए।