Posted in रामायण - Ramayan

केवट का प्रेम और प्रभुश्रीराम का गंगा पार जाना,,,,,,,

निषादराज केवट, रामायण का एक पात्र है। जिसने प्रभु श्रीराम को वनवास के दौरान माता सीता और लक्ष्मण के साथ अपने नाव में बिठा कर गंगा पार करवाया था। इसका वर्णन रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में किया गया है।

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥

भावार्थ:-श्री राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म (भेद) जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है,॥

छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥
तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥

भावार्थ:-जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदरी स्त्री हो गई (मेरी नाव तो काठ की है)। काठ पत्थर से कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जाएगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जाएगी, मैं लुट जाऊँगा (अथवा रास्ता रुक जाएगा, जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जाएगी) (मेरी कमाने-खाने की राह ही मारी जाएगी)॥

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥
जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥

भावार्थ:-मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरणकमल पखारने (धो लेने) के लिए कह दो॥

  • पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।
    मोहि राम राउरि आन दसरथसपथ सब साची कहौं॥
    बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।
    तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

भावार्थ:-हे नाथ! मैं चरण कमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा, मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजी की सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जब तक मैं पैरों को पखार न लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा।

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥

भावार्थ:-केवट के प्रेम में लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्री रामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजी की ओर देखकर हँसे॥

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥
बेगि आनु जलपाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥

भावार्थ:-कृपा के समुद्र श्री रामचन्द्रजी केवट से मुस्कुराकर बोले भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाए। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे॥

जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥

भावार्थ:-एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं और जिन्होंने (वामनावतार में) जगत को तीन पग से भी छोटा कर दिया था (दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था), वही कृपालु श्री रामचन्द्रजी (गंगाजी से पार उतारने के लिए) केवट का निहोरा कर रहे हैं!॥

पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥

भावार्थ:-प्रभु के इन वचनों को सुनकर गंगाजी की बुद्धि मोह से खिंच गई थी (कि ये साक्षात भगवान होकर भी पार उतारने के लिए केवट का निहोरा कैसे कर रहे हैं), परन्तु (समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान) पदनखों को देखते ही (उन्हें पहचानकर) देवनदी गंगाजी हर्षित हो गईं। (वे समझ गईं कि भगवान नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया और इन चरणों का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गईं।) केवट श्री रामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया॥

अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥

भावार्थ:-अत्यन्त आनंद और प्रेम में उमंगकर वह भगवान के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं है॥

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥

भावार्थ:-चरणों को धोकर और सारे परिवार सहित स्वयं उस जल (चरणोदक) को पीकर पहले (उस महान पुण्य के द्वारा) अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनंदपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्रजी को गंगाजी के पार ले गया॥

उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामुगुह लखन समेता॥
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥

भावार्थ:-निषादराज और लक्ष्मणजी सहित श्री सीताजी और श्री रामचन्द्रजी (नाव से) उतरकर गंगाजी की रेत (बालू) में खड़े हो गए। तब केवट ने उतरकर दण्डवत की। (उसको दण्डवत करते देखकर) प्रभु को संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं॥

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥

भावार्थ:-पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनंद भरे मन से अपनी रत्न जडि़त अँगूठी (अँगुली से) उतारी। कृपालु श्री रामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए॥

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥

भावार्थ:-(उसने कहा-) हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी॥

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीन दयाल अनुग्रह तोरें॥
फिरती बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥

भावार्थ:-हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा॥

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ॥

भावार्थ:- प्रभु श्री रामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी ने बहुत आग्रह (या यत्न) किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणा के धाम भगवान श्री रामचन्द्रजी ने निर्मल भक्ति का वरदान देकर उसे विदा किया॥

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

💥भजन कैसा हो……बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढे।

➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖
एक मन है और उसके दो एरिया है , एक तो ये माया का जगत और दूसरा भगवान l अब मन यदि भगवान में नहीँ लगता ,तो ये स्वतः सिद्ध है कि मन संसार में लगा हुआ है l क्योंकि मन कभी पेंडिंग में नहीँ रह सकता l
➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖

भजनीय की सेवा उनकी इच्छानुसार बर्तना वह चाहे किसी भी प्रकार से किया जाये वह भजन है
भजन करने वाले को दो बातें जाननी चाहिये एक जोभजन में बाधा देती है और दूसरी जो भजन में सहायता देती है.
जैसे बुखार एवं जुखाम होने पर किसी को एक महात्मा ने कहा के सात पत्ती तुलसी, सात काली मिर्च आदि आदि घोट कर उबाल कर पी लेना वो समझ नहीं पाया,घोट कर तो पी गया पर उबाला नहीं,उससे जुकाम,बुखार और बढ़ गया इसलिए दोनों को जानना जरुरी है.
भजन में आत्मीयता होनी चाहिए, जैसे यदि कोई घर पर आये और यदि हम केवल ऊपर से ही कह दे कि चाय पी लीजिए तो क्या वह चाय पीएगा?
यदि हम आत्मीयता से यही बात कहेगे तो उसका मन न होने पर भी वह चाय पी लेगा या हमारी बात रख लेगा जैसे मेहमान घर आये तो वह हमारी आँखों से ही समझ जायेगा कि हमारा उसके प्रति क्या भाव है
उसका स्वागत भले ही हम खाने पीने से न करे परन्तु यदि नैनों में स्नेह नहीं दिखा तो क्या वह रुकेगा? नहीं.
तुलसी दास जी ने कहा है –
“आव नहीं, आदर नहीं, नहीं नैनन बीच स्नेह,
तुलसी तहा न जाइये, चाहे बरसे कंचन मेघ”
इसी प्रकार भजन में यदि हम आत्मीयता नहीं रखेगे तो क्या भगवान आयेगे,हमें आत्मीयता रखना जरुरी है मन हमारा कहा है संसार में तो नहीं है
क्योकि हमें ये जानना जरुरी है कि हम भजन किसका कर रहे है भगवान का या संसार का क्योकि मन जहाँ होगा हम उसका ही भजन कर रहे है.
“माला तो कर मे फिरे, जीभ फिरे मुख माहि,
मनवा तो चहु दिसि फिरे, यह तो सुमिरन नाही”
भजन में केवल भगवान की या उनके प्रेम की कामना के अतिरिक्त और किसी भी वस्तु की कामना नहीं होनी चाहिए भजन करने से पाप नष्ट होते है.
एक बार यशोदाजी दधि मंथन कर रही थी आँखे बंद करके भगवान के लिए दधि मंथन कर रही है मन में ये विचार है कही मेरे लाला उठ न जाये उठाने से पहले मथना है मुख से भगवान ने जो जो लीला अब तक वृंदावन में की उनको पद बना बनाकर गा रही है
और कर्म भी भगवान के लिए ही कर रही है अर्थात मन वचन कर्म तीनो से भगवान के भजन में लगी ऐसी लगी हुयी है कि अपने शरीर की भी सुधि भी नहीं है
भगवान जल्दी से उठकर आते है और मथानी पकडकर खड़े हो जाते मानो कह रहे हो बस अब तुम्हारी साधन पूरी हो गयी.
कहने का तात्पर्य यह है कि
भजन में बड़ी शक्ति है भगवान स्वयं चलकर उसके पास आ जाते है जो उनका भजन करते है पर भजन हो तो यशोदा जी जैसा हो.जो उन्हें जैसे भजता है हमारे बिहारी जी भी उन्हें वैसे ही भजते है
भगवान को तो बस हमारा भाव ही चाहिए क्योकि कृष्ण तो बस प्रेम ही खाते है प्रेम ही पीते है प्रेम ही लेते है प्रेम ही देते है प्रेम से ही बने है.
“राम नाम सब कोई कहे ठग ठाकुर और चोर
बिना प्रेम रीझे नहीं नागर नन्द किशोर”

     🌷नारायण नारायण 🌷

🙏🏻लक्ष्मीनारायण भगवान की जय 🙏🏻

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

भक्त चरितांक (कल्याण-40)
पृष्ठ संख्या- 682

           भक्त सेन नाई
            °°°°°°°°°°°°

    पाँच-छः सौ साल पहले की बात है । बघेलखण्ड का बान्धवगढ़ नगर अत्यन्त समृद्ध था। महाराज वीर सिंह के राज्यकाल में बान्धवगढ़ का सुदूर प्रान्तों में बड़ा नाम था। नगर के एक भाग में अट्टालिकाएं थीं, सुन्दर और प्रशस्त राजपथ थे, अच्छे-अच्छे उपवन और  मनमोहक सरोवर थे। एक ओर सभ्य, संस्कृत और शिष्ट जनों के घर थे तो दूसरी ओर कुछ झोपड़ियों थीं, हरे भरे खेत थे,  प्रकृति देवी की सुषमा थी, दैवी सुख और शान्ति का अकृत्रिम साम्राज्य था। नगर के इसी दूसरे भाग में एक परम संतोषी, उदार, विनयशील व्यक्ति रहते थे; उनका नाम था सेन। राजपरिवार से उनका नित्य का सम्पर्क था; भगवान की कृपा से दिनभर की मेहनत मजदूरी से जो कुछ भी मिल जाता था, उसी से परिवार का भरण-पोषण और संत-सेवा करके निश्चिन्त हो जाते थे।न तो उन्होंने कभी किसी के सामने एक पैसे के लिए हाथ पसारा और न उन्हें कभी आवश्यकता ही प्रतीत हुई कि किसी से कुछ माँगकर काम चलायें।भगवान ही उनके सब कुछ थे। राजा और नगर निवासी उनकी निःस्पृहता और सीधे-सादे उदार स्वभाव की सराहना करते थे।
      वे नित्य प्रातःकाल स्नान, ध्यान और भगवान के स्मरण पूजन और भजन के बाद ही राजसेवा के लिए घर से निकल पड़ते थे और दोपहर को लौट आते थे।जाति के नाई थे। राजा का बाल बनाना, तेल लगाकर स्नान कराना आदि ही उनका दैनिक काम था। एक दिन वे घर से निकले ही थे कि उन्होंने देखा एक भक्त मण्डली मधुर-मधुर ध्वनि से भगवान के नाम का संकीर्तन करती उन्हीं के घर की ओर चली आ रही है। संत समागम का पवित्र अवसर मिला, इससे बढ़कर आनन्द की बात दूसरी थी भी नहीं । सेन ने प्रेम पूर्वक बड़ी श्रद्धा और भक्ति से उनकी चरण धूलि ली। उन्हें इस बात का तनिक भी ध्यान नहीं रहा कि महाराज वीर सिंह उनकी प्रतीक्षा करते होंगे । संतों को घर लाकर सेन ने यथाशक्ति उनकी सेवा-पूजा की, सत्संग किया।
       महाराज वीरसिंह को प्रतीक्षा करते करते अधिक समय बीत गया। इधर सेन संतों के आतिथ्य और स्वागत सत्कार में पूर्णरूप से निमग्न थे । उन्हें तनिक भी बाह्यज्ञान नहीं था। काफी धूप चढ़ चुकी थी। इतने में सेन नाई के रूप में स्वयं लीलाविहारी राजमहल में पहुँच गये। सदा की भाँति उनके कंधे पर छुरे, कैंची यथा अन्य उपयोगी सामान तथा दर्पण आदि की छोटी सी पेटी लटक रही थी। मुख पर अलौकिक शान्ति की किरणें थीं, प्रसन्नतामयी मुस्कान की ज्योतिर्मयी तरंगें अधरों पर खेल रही थीं। उनकी प्रत्येक क्रिया में  विलक्षण नवीनता थी। उन्होंने राजा के सिर में तेल लगाया, शरीर में मालिश की, दर्पण दिखाया । उनके कोमल करस्पर्श से राजा को आज जितना सुख मिला, उतना और  पहले कभी अनुभव में नहीं आया था। सेन नाई राजा की पूरी-पूरी परिचर्या और सेवा करके चले गये। राजा को ऐसा लगा कि सेन के रूप में कोई स्वर्गीय और  सर्वथा दिव्य प्राणी ही उतर आये थे।
      भक्तमण्डली चली गई । थोड़ी देर के बाद  भक्त  सेन को स्मरण हुआ कि मुझे तो राजा की सेवा में भी जाना था। उन्होंने आवश्यक सामान लिया और डरते-डरते राजपथ पर पैर रखा। वे चिन्ताग्रस्त थे, राजा के बिगड़ने की बात सोचकर वे डर रहे थे।
       'कुछ भूल तो नहीं आये?' एक साधारण राजसैनिक ने टोक दिया।
       'नहीं तो, अभी तो राजमहल ही नहीं जा सका।' सेन आश्चर्यचकित थे।
       'आपको कुछ हो तो नहीं गया है? मस्तिष्क ठिकाने तो है न?'
      'भैया! अब और बनाने का यत्न न करो।' सेन के मुख से सहसा निकल पड़ा।
      'आप सचमुच भगवान के भक्त हैं। भगवान के भक्त कितने सीधे-सादे होते हैं, इसका पता तो आज ही चल सका।' सैनिक कहता गया । '  आज तो राजा आपकी सेवा से इतने अधिक प्रसन्न हैं कि इसकी चर्चा सारे नगर में फैल रही है ।' सैनिक आगे कुछ न बोल सका।
       सेन को पूरा-पूरा विश्वास हो गया कि मेरी प्रसन्नता और संतोष के लिये भगवान को मेरी अनुपस्थिति में नाई का रूप धारण करना पड़ा। वे अपने आपको धिक्कार लगे कि एक तुच्छ सी सेवापूर्ति के लिए शोभानिकेतन श्री  राघवेन्द्र को बहुरूपिया बनना पड़ा। प्रभु को इतना कष्ट उठाना पड़ा। जो पलभर में  लोक-लोकान्तर का संहार कर सकते हैं, जिनके एक संकल्पाभास मात्र पर विश्व का विधान उलट जाता है,  उन्होंने कन्धे पर छुरे आदि की पेटी लटकाने में भी रस की अनुभूति की। भगवान की सहज रसमयता,  प्रगाढ़ भृत्यवत्सलता,  कोमल कृपा और पावन प्रसन्नता का चिन्तन करते-करते वे आत्मग्लानि के अतल सागर में डूबने-उतराने लगे।उन्होंने भगवान के चरण-कमल का ध्यान किया, मन ही मन प्रभु से क्षमा माँगी।
      उनके राजमहल पहुँचते ही राजा वीर सिंह बड़े प्रेम और विनय तथा स्वागत-सत्कार से मिले,  भगवान के साक्षात्कार का प्रभाव जो था। भक्त सेन ने बड़े संकोच से विलम्ब के लिए क्षमा माँगी, संतों के अचानक मिल जाने की बात कही। दोनों ने एक दूसरे का जी भर आलिंगन किया।राजा ने सेन के चरण पकड़ लिये। वीर सिंह ने कहा---'राजपरिवार जन्म-जन्मांतर तक आपका और आपके वंशजों का आभार मानता रहेगा। भगवान ने आपकी ही प्रसन्नता के लिए मंगलमय दर्शन देकर हमारे असंख्य पाप-तापों का अन्त किया है ।' भक्त सेन तो प्रेमविह्वल थे। शरीर में विलक्षण भाव-कम्पन था, अंग-अंग भगवान के रूप-माधुर्य के रस में सम्प्लावित थे। बान्धवगढ़ सेन की उपस्थिति से धन्य हो गया । वे परम भागवत थे, भगवान के महान् कृपापात्र-भक्त थे।
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक गांव मे एक बहुत गरीब सेठ रहता था जो कि किसी जमाने बहुत बड़ा धनवान था जब सेठ धनी था उस समय सेठ ने बहुत पुण्य किए,गउशाला बनवाई, गरीबों को खाना खिलाया,अनाथ आश्रम बनवाए और भी बहुत से पुण्य किए थे लेकिन जैसे जैसे समय गुजरा सेठ निर्धन हो गया

एक समय ऐसा आया कि राजा ने ऐलान कर दिया कि यदि किसी व्यक्ति ने कोई पुण्य किए हैं तो वह अपने पुण्य बताएं और अपने पुण्य का जो भी उचित फल है ले जाए
यह बात जब सेठानी ने सुनी तो सेठानी सेठ को कहती है कि हमने तो बहुत पुण्य किए हैं तुम राजा के पास जाओ और अपने पुण्य बताकर उनका जो भी फल मिले ले आओ
सेठ इस बात के लिए सहमत हो गया और दुसरे दिन राजा के महल जाने के लिए तैयार हो गया
जब सेठ महल जाने लगा तो सेठानी ने सेठ के लिए चार रोटी बनाकर बांध दी कि रास्ते मे जब भूख लगी तो रोटी खा लेना
सेठ राजा के महल को रवाना हो गया

गर्मी का समय दोपहर हो गई,सेठ ने सोचा सामने पानी की कुंड भी है वृक्ष की छाया भी है क्यों ना बैठकर थोड़ा आराम किया जाए व रोटी भी खा लूंगा
सेठ वृक्ष के नीचे रोटी रखकर पानी से हाथ मुंह धोने लगा
तभी वहां पर एक कुतिया अपने चार पांच छोटे छोटे बच्चों के साथ पहुंच गई और सेठ के सामने प्रेम से दुम हिलाने लगी क्योंकि कुतिया को सेठ के पास के अनाज की खुशबु आ रही थी
कुतिया को देखकर सेठ को दया आई सेठ ने दो रोटी निकाल कुतिया को डाल दी अब कुतिया भूखी थी और बिना समय लगाए कुतिया दोनो रोटी खा गई और फिर से सेठ की तरफ देखने लगी
सेठ ने सोचा कि कुतिया के चार पांच बच्चे इसका दूध भी पीते है दो रोटी से इसकी भूख नही मिट सकती और फिर सेठ ने बची हुई दोनो रोटी भी कुतिया को डाल कर पानी पीकर अपने रास्ते चल दिया

सेठ राजा के दरबार मे हाजिर हो गया और अपने किए गए पुण्य के कामों की गिनती करने लगा
और सेठ ने अपने द्वारा किए गए सभी पुण्य कर्म विस्तार पुर्वक राजा को बता दिए और अपने द्वारा किए गए पुण्य का फल देने बात कही

तब राजा ने कहा कि आपके इन पुण्य का कोई फल नही है यदि आपने कोई और पुण्य किया है तो वह भी बताएं शायद उसका कोई फल मै आपको दे पाउं

सेठ कुछ नही बोला और यह कहकर बापिस चल दिया कि यदि मेरे इतने पुण्य का कोई फल नही है तो और पुण्य गिनती करना बेकार है अब मुझे यहां से चलना चाहिए

जब सेठ बापिस जाने लगा तो राजा ने सेठ को आवाज लगाई कि सेठ जी आपने एक पुण्य कल भी किया था वह तो आपने बताया ही नही
सेठ ने सोचा कि कल तो मैनें कोई पुण्य किया ही नही राजा किस पुण्य की बात कर रहा है क्योंकि सेठ भुल चुका था कि कल उसने कोई पुण्य किया था
सेठ ने कहा कि राजा जी कल मैनें कोई पुण्य नहीं किया
तो राजा ने सेठ को कहा कि कल तुमने एक कुतिया को चार रोटी खिलाई और तुम उस पुण्य कर्म को भूल गए
कल किए गए तेरे पुण्य के बदले तुम जो भी मांगना चाहते हो मांग लो वह तुझे मिल जाएगा
सेठ ने पुछा कि राजा जी ऐसा क्यों
मेरे किए पिछले सभी कर्म का कोई मूल्य नही है और एक कुतिया को डाली गई चार रोटी का इनका मोल क्यों

राजा के कहा
हे सेठ जो पुण्य करके तुमने याद रखे और गिनकर लोंगों को बता दिए वह सब बेकार है क्यों कि तेरे अन्दर मै बोल रही है कि यह मैनें किया
तेरा सब कर्म व्यर्थ है जो तु करता है और लोगों को सुना रहा है

जो सेवा कल तुमने रास्ते मे कुतिया को चार रोटी पुण्य करके की वह तेरी सबसे बड़ी सेवा है उसके बदले तुम मेरा सारा राज्य भी ले लो वह भी बहुत कम है

कहानी का अर्थ
दान व पुण्य वही है जो एक हाथ से करें तो दुसरे हाथ को भी पता न हो कि दान किया है |