Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌹🌹🌹🕉 नमः भगवते वासुदेवाय नमः नमः 🕉 🌹🌹🌹
🌹दानवीर कर्ण 🌹
एक राज पुत्र होते हुए भी कर्ण सुत पुत्र कहा गया। कर्ण एक महान दानवीर था। अपनें प्रण और वचन के लिए कर्ण अपनें प्राणों की भी बलि दे सकता था। पांडवों की शिक्षा खतम होने के बाद रंग-भूमि में आकर कर्ण अर्जुन को ललकारता है कि अगर वह संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुरधर है तो उससे मुक़ाबला कर के सिद्ध करे।
कर्ण एक सूत के घर पला-बढ़ा होता है, तो उसे सूत पुत्र समझ कर अर्जुन से मुक़ाबला नहीं करने दिया जाता है। पांडवों के प्रखर विरोधी दुर्योधन को यहां एक अवसर दिखता है, और वह फोरन कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया जाता है। और कर्ण को अपना मित्र बना लेता है।

दुर्योधन के इस कृत्य से कर्ण के दुखते घावों पर मरहम लगा जाता है। लेकिन समय सीमा समाप्त होने के कारण रंगभूमि में कर्ण-अर्जुन का मुक़ाबला टल जाता है।

पांडवो और कौरवों के अंतिम निर्णायक युद्ध के पहले भगवान कृष्ण कर्ण को यह भेद बताते हैं कि आप एक पांडव हो और कुंती के ज्येष्ठ पुत्र हो। इस रहस्य को जान कर भी कर्ण अपनें मित्र दुर्योधन से घात कर के अपनें भाइयों की ओर नहीं जाता है।
दिव्य कवच-कुंडल के साथ कर्ण अजेय था और महाभारत के युद्ध में पांडव कभी उसे परास्त नहीं कर सकते थे। एक दिन इन्द्रदेव सुबह सुबह स्नान के समय ब्राह्मण स्वरूप में कर कर में कवच-कुंडल मांगते हैं। पिता सूर्य देव द्वारा दिखाए गए स्वप्न से कर्ण यह बात पहले ही ज्ञात हो जाता है कि इंद्र देव से रूप बदल कर कवच-कुंडल मांगने आएंगे पर फिर भी दानवीर कर्ण ब्राह्मण रुपी इंद्र देवता खाली हाथ नहीं लौटता और उनकी मांग पूर्ण करता है । इंद्र देव कवच-कुंडल के बदले में कर्ण एक शक्ति अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका उपयोग केवल एक बार किया जा रहा था और उसकी कोई काट नहीं था।

युद्ध के दौरान भीम का पुत्र घटोत्कर्च कौरव सेना को तिनके की तरह उड़ाए जा रहा था। उसने दुर्योधन को भी लहूलहान कर दिया। तब दुर्योधन सहायता मांगने के के पास 1। कर्ण शक्ति अस्त्र अर्जुन पर इस्तेमाल करना चाहता था, पर मित्रता से विवश हो कर वह वह अस्त्र भीम पुत्र घटोत्कर्च पर चला गया और उसका अंत कर दिया गया। और इस तरह अर्जुन सुरक्षित हो गया।

अपनें साथ दो-दो शापों का बोझ ले कर चल रहा कर्ण को यह बात पता थी –
“” “” जहां धर्म है वही कृष्ण है और जहां कृष्ण है वही विजय भी है। “” “” “” ”
फिर भी उसने न तो दुर्योधन के एहसान भूल कर धाते किया, और ना ही खुद दानवीरता से कभी पीछे हटा दिया।
करम की गठरी लाद के, जग में फिरे इंसान!
जैसा करे वैसा भरे, विधि का यही विधान !!
करम करे किस्मत बने, जीवन का ये मरम!
प्राणी तेरे भाग्य में, तेरा अपना करम !!
🚩🙏🙏🚩

अतुल सोनी

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