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मन को छूने वाला प्रसंग
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एक बार मेरे शहर में एक प्रसिद्ध बनारसी विद्वान् “ज्योतिषी” का आगमन हुआ..!! माना जाता है कि उनकी वाणी में सरस्वती विराजमान है। वे जो भी बताते है वह 100% सच होता है।
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501/- रुपये देते हुए “शर्मा जी” ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए ज्योतिषी को कहा.., “महाराज, मेरी मृत्यु कब, कहॉ और किन परिस्थितियों में होगी?”
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ज्योतिषी ने शर्मा जी की हस्त रेखाऐं देखीं, चेहरे और माथे को अपलक निहारते रहे। स्लेट पर कुछ अंक लिख कर जोड़ते–घटाते रहे। बहुत देर बाद वे गंभीर स्वर में बोले.., “शर्मा जी, आपकी भाग्य रेखाएँ कहती है कि जितनी आयु आपके पिता को प्राप्त होगी उतनी ही आयु आप भी पाएँगे। जिन परिस्थितियों में और जहाँ आपके पिता की मृत्यु होगी, उसी स्थान पर ओर उसी तरह, आपकी भी मृत्यु होगी।”
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यह सुन कर “शर्मा जी” भयभीत हो उठे और चल पडे ……
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एक घण्टे बाद …
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“शर्मा जी” वृद्धाश्रम से अपने वृद्ध पिता को साथ लेकर घर लौट रहे थे..!!👍🌹👌

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पौराणिक कहानी====जरूर पढ़ें

जब युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण ने की अर्जुन के घोड़ों की सेवा

महाभारत की लड़ाई में अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु को कौरवों और उसके पक्ष के वीरों ने चारों ओर से घेरकर मार डाला। और तो और जयद्रथ ने तो अभिमन्यु की लाश पर लात भी मारी। जब अर्जुन को यह पता चला तो उनका रक्त खौल उठा उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे जयद्रथ का अगले दिन सूर्यास्त होने से पहले ही वध कर देंगे।
अगले दिन अर्जुन कौरव सेना को अपने तीरों से मारते-काटते आगे बढ़ चले। अभी जयद्रथ लगभग 6 कोस की दूरी पर था और उन्हें उसके पास सूर्यास्त से पहले ही पहुँचना था। भगवान् श्रीकृष्ण रथ को शीघ्रता से ले जा रहे थे। किंतु, रथ के घोड़े बहुत सारे तीरों से घायल थे, जिस कारणउनके शरीर से खून के फौव्वारे छूट रहे थे। उन्हें भूख-प्यास लगी हुई थी और वे थके हुए भी थे। इसलिए वे बड़ी मुश्किल से रथ खींच पा रहे थे। अर्जुन श्रीकृष्ण से बोले, “भगवन! ऐसा लगता है कि घोड़े बहुत थके हुए हैं। इसलिए इन्हें कुछ समय के लिए खुला छोड़ देना चाहिए।”

श्रीकृष्ण बोले, “अर्जुन! मैं भी ऐसा ही सोच रहा था।” रथ को रोककर उन्होंने सारे घोड़े खोल दिए। घोड़ों की प्यास बुझाने के लिए अर्जुन ने भूमि पर तीर छोड़ा, और वहाँ पर भूमि के अंदर से जलधारा फूट निकली। इसके बाद, अर्जुन ने अनेक तीरों से घोड़ों की सुरक्षा के लिए तीरों की दीवार खड़ी कर दी। वे खुद धनुष-बाण लेकर घोड़ों की रक्षा करने के लिए खड़े हो गए। जब घोड़ों ने पानी पी लिया, तो श्रीकृष्णजी ने उनके शरीर में बिंधे हुए तीर निकाले, घावों पर मरहम लगाया, उनके शरीर की मालिश की, उन्हें टहलाया, पृथ्वी पर लिटाया और फिर अपने पीतांबर का दोना बनाकर उसमें घास भर-भरकर उन्हें खिलाने लगे।
श्रीकृष्ण की इस सेवा को देखकर घोड़े प्रेम के आँसू बहाने लगेगे। उनके शरीर की सारी पीड़ा और थकान दूर हो गई और वे तरोताजा हो गए। कृष्ण ने उन्हें फिर से रथ में जोत दिया और घोड़े फिर से हवा से बातें करने लगे। शीघ्र ही कृष्ण अर्जुन जयद्रथ के पास जा पहुँचे और अर्जुन ने श्रीकृष्ण की कूटनीति से जयद्रथ का सूर्यास्त से पहले ही वध कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की।

======जय श्री कृष्णा,=======

संजय गुप्ता

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🌹🌹🌹🕉 नमः भगवते वासुदेवाय नमः नमः 🕉 🌹🌹🌹
🌹दानवीर कर्ण 🌹
एक राज पुत्र होते हुए भी कर्ण सुत पुत्र कहा गया। कर्ण एक महान दानवीर था। अपनें प्रण और वचन के लिए कर्ण अपनें प्राणों की भी बलि दे सकता था। पांडवों की शिक्षा खतम होने के बाद रंग-भूमि में आकर कर्ण अर्जुन को ललकारता है कि अगर वह संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुरधर है तो उससे मुक़ाबला कर के सिद्ध करे।
कर्ण एक सूत के घर पला-बढ़ा होता है, तो उसे सूत पुत्र समझ कर अर्जुन से मुक़ाबला नहीं करने दिया जाता है। पांडवों के प्रखर विरोधी दुर्योधन को यहां एक अवसर दिखता है, और वह फोरन कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया जाता है। और कर्ण को अपना मित्र बना लेता है।

दुर्योधन के इस कृत्य से कर्ण के दुखते घावों पर मरहम लगा जाता है। लेकिन समय सीमा समाप्त होने के कारण रंगभूमि में कर्ण-अर्जुन का मुक़ाबला टल जाता है।

पांडवो और कौरवों के अंतिम निर्णायक युद्ध के पहले भगवान कृष्ण कर्ण को यह भेद बताते हैं कि आप एक पांडव हो और कुंती के ज्येष्ठ पुत्र हो। इस रहस्य को जान कर भी कर्ण अपनें मित्र दुर्योधन से घात कर के अपनें भाइयों की ओर नहीं जाता है।
दिव्य कवच-कुंडल के साथ कर्ण अजेय था और महाभारत के युद्ध में पांडव कभी उसे परास्त नहीं कर सकते थे। एक दिन इन्द्रदेव सुबह सुबह स्नान के समय ब्राह्मण स्वरूप में कर कर में कवच-कुंडल मांगते हैं। पिता सूर्य देव द्वारा दिखाए गए स्वप्न से कर्ण यह बात पहले ही ज्ञात हो जाता है कि इंद्र देव से रूप बदल कर कवच-कुंडल मांगने आएंगे पर फिर भी दानवीर कर्ण ब्राह्मण रुपी इंद्र देवता खाली हाथ नहीं लौटता और उनकी मांग पूर्ण करता है । इंद्र देव कवच-कुंडल के बदले में कर्ण एक शक्ति अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका उपयोग केवल एक बार किया जा रहा था और उसकी कोई काट नहीं था।

युद्ध के दौरान भीम का पुत्र घटोत्कर्च कौरव सेना को तिनके की तरह उड़ाए जा रहा था। उसने दुर्योधन को भी लहूलहान कर दिया। तब दुर्योधन सहायता मांगने के के पास 1। कर्ण शक्ति अस्त्र अर्जुन पर इस्तेमाल करना चाहता था, पर मित्रता से विवश हो कर वह वह अस्त्र भीम पुत्र घटोत्कर्च पर चला गया और उसका अंत कर दिया गया। और इस तरह अर्जुन सुरक्षित हो गया।

अपनें साथ दो-दो शापों का बोझ ले कर चल रहा कर्ण को यह बात पता थी –
“” “” जहां धर्म है वही कृष्ण है और जहां कृष्ण है वही विजय भी है। “” “” “” ”
फिर भी उसने न तो दुर्योधन के एहसान भूल कर धाते किया, और ना ही खुद दानवीरता से कभी पीछे हटा दिया।
करम की गठरी लाद के, जग में फिरे इंसान!
जैसा करे वैसा भरे, विधि का यही विधान !!
करम करे किस्मत बने, जीवन का ये मरम!
प्राणी तेरे भाग्य में, तेरा अपना करम !!
🚩🙏🙏🚩

अतुल सोनी

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🙏प्रार्थना का प्रभाव

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यह घटना बड़ौदा के एक वरिष्ठ डॉक्टर की आपबीती है जिसने उनका जीवन बदल दिया। वह heart specialist हैं।उनके अनुसार:

  एक दिन मेरे पास एक दंपति अपनी छः साल की बच्ची को लेकर आए।निरिक्षण के बाद पता चला कि उसके heart में पूर्ण रूप से    clogging हो चुकी है।मैंने अपनी पूरीteam से discuss करने के बाद उस दंपति से कहा कि 30% chance है survival  का open heart surgeryके बाद नहीं तो बच्ची के पास तीन महीने का समय है।माता पिता भावुक हो कर बोले कि वह surgeryका chance  लेगें।

  सर्जरी के पांच दिन पहले बच्ची को  admit कर लिया गया।उसकी माँ को प्रार्थना में अटूट विश्वास था।वह सुबह शाम बच्ची को यही कहती कि God lives in ur heart..वह तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।

सर्जरी के दिन मैंने उस बच्ची से कहा; don't worry u will be alright after surgery..उसने कहा डाक्टर I am not worried coz God is in my heart पर surgery में आप जब मेरा heart open करोगे तो देखकर बताना God कैसे दिखते हैं।

ऑपरेशन के दौरान पता चल गया कि कुछ नहीं हो सकता।

बच्ची को बचाना असंभव है।heart में blood का एक drop भी नहीं आ रहा था।निराश होकर मैंने अपनी team  से वापिस stich करने का आदेश दिया।तभी मुझे बच्ची के आखिरी बात याद आई और मैं अपने रक्त भरे हाथों को जोड कर प्रार्थना करने लगा कि हे इश्वर!  मेरा सारा  अनुभव तो इस बच्ची को बचाने में असमर्थ है पर यदि आप इसके हृदय में विराजमान हो तो आप ही कुछ कीजिए।

  यह मेरी पहली अश्रु पूर्ण प्रार्थना थी।इसी बीच मेरे junior doctor ने मुझे कोहनी मारी। मैं miracles में विश्वास नहीं करता था पर मैं स्तब्ध हो गया  यह देखकर कि heart में blood supply शुरू हो गई।मेरे 60yrs के career में ऐसा पहली बार हुआ था।

आपरेशन सफल तो हो गया पर मेरा जीवन बदल गया।मैंने बच्ची से कहा don’t make effort to see God..He can’t be seen, He can be experienced…

इस घटना के बाद मैंने अपने आपरेशन थियेटर में प्रार्थना का नियम निभाना शुरू कर दिया।मैं यह अनुरोध करता हूं कि सभी को अपने बच्चों में प्रार्थना का संस्कार डालना ही चाहिए।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

संजय गुप्त

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“गंवार”++++±

एक लड़की की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ एक सीधे साधे लड़के से की जाती है जिसके घर मे एक मां के आलावा और कोई नहीं है।
दहेज मे लड़के को बहुत सारे उपहार और पैसे मिलते हैं । लड़की किसी और लड़के से बेहद प्यार करती थी ।
लड़की शादी के बाद आ गयी अपने ससुराल…
सुहागरात के वक्त लड़का दूध लेके आता है तो दुल्हन सवाल पूछती है अपने पति से…एक पत्नी की मर्जी के बिना पति उसको हाथ लगाये तो उसे बलात्कार कहते है या हक?
पति – आपको इतनी लम्बी और गहरी जाने की कोई जरूरत नहीं है..
बस दूध लाया हूँ पी लिजीयेगा.. . हम सिर्फ आपको शुभ रात्रि कहने आये थे कहकर लड़का कमरे से निकल जाता है। लड़की मन मारकर रह जाती है क्योंकि लड़की चाहती थी की झगड़ा हो ताकि मैं इस गंवार से पिछा छुड़ा सकूँ ।
दुल्हन घर का कोई भी काम नहीं करती। बस दिनभर मोबाइल पर आनलाइन रहती और न जाने किस किस से बातें करती मगर उधर लड़के की माँ बिना शिकायत के दिन भर चुल्हा चौका से लेकर घर का सारा काम करती , हर पल अपने होंठों पर मुस्कुराहट लेके फिरती ।
लड़का एक कम्पनी मे छोटा सा मुलाजीम है और बेहद ही मेहनती और ईमानदार। करीब महीने भर बीत गये मगर पति पत्नी अब तक साथ नहीं सोये… वैसे लड़का बहुत शांत स्वाभाव वाला था इसलिए वह ज्यादा बातें नहीं करता था, बस खाने के वक्त अपनी पत्नी से पूछ लेता था कि… .कहा खाओगी..अपने कमरे मे या हमारे साथ, और सोने से पहले डायरी लिखने की आदत थी जो वह हर रात को लिखता था।
लड़की के पास एक स्कूटी था वह हर रोज बाहर जाती थी पति के आफिस जाने के बाद और पति के वापस लौटते ही आ जाती थी। छुट्टी का दिन था लड़का भी घर पे ही था तो लड़की ने अच्छे भले खाने को भी गंदा कहके मां को अपशब्द बोलके खाना फेंक देती है तो वह शांत रहने वाला उसका पति अपनी पत्नी पर हाथ उठा देता है, मगर माँ अपने बेटे को बहुत डांटती है। इधर लड़की को बहाना चाहिए था झगड़े का जो उसे मिल गया था, वह पैर पटकती हुई स्कूटी लेके निकल पड़ती है।
लड़की जो रोज घर से बाहर जाती थी वह अपने प्यार से मिलने जाती थी, लड़की भले टूटकर चाहती थी लड़के को मगर उसे पता था की हर लड़की की एक हद होती है जिसे इज्जत कहते है वह उसको बचाये रखी थी।
इधर लड़की अपने प्यार के पास पहुँचकर कहती है।
अब तो एक पल भी उस घर मे नहीं रहना है मुझे । आज गंवार ने मुझपर हाथ उठाके अच्छा नही किया ।
लड़का – अरे तुमसे तो मैं कब से कहता हूँ कि भाग चलो मेरे साथ कहीं दूर, मगर तुम हो की आज कल आज कल पे लगी रहती हो।
लड़की – शादी के दिन मैं आई थी तो तुम्हारे पास। तुम ही ने तो लौटाया था मुझे ।
लड़का – खाली हाथ कहा तक भागते, तुम ही बोलो..मैंने तो कहा था कि कुछ पैसे और गहने साथ ले लो तुम तो खाली हाथ आई थी।
आखिर दूर एक नयी जगह मे जिंदगी नये सिरे से शुरू करने के लिए पैसे तो चाहिए न?
लड़की – तुम्हारे और मेरे प्यार के बारे मे जानकर मेरे घरवालो ने बैंक के पास बुक एटीएम और मेरे गहने तक रख लिये थे, तो मैं क्या लाती अपने साथ । हम दोनों मेहनत करके कमा भी तो सकते थे।
लड़का – भागने को इंसान पहले सोचता है और फिर काम करता है, खाली हाथ भागते तो ये इश्क का भूत दो दिन मे उतर जाता समझी?
और जब भी तुम्हें छुना चाहता हूँ बहुत नखरे है तुम्हारे । बस कहती हो शादी के बाद ।
लड़की – हाँ शादी के बाद ही अच्छा होता है, ये सब और सब तुम्हारा तो है। मैं आज भी एक कुवारी लड़की हूँ । शादी करके भी आज तक उस गंवार के साथ सो न सकी क्योंकि तुम्हें ही अपना पति मान चुकी हूँ बस तुम्हारे नाम की सिंदूर लगानी बाकी है। बस वह लगा दो सबकुछ तुम अपनी मर्जी से करना।
लड़का – ठीक है मैं तैयार हूँ , मगर इस बार कुछ पैसे जरूर साथ लेके आना, मत सोचना हम दौलत से प्यार करते हैं । हम सिर्फ तुमसे प्यार करते है बस कुछ छोटे मोटे बिजनेस के लिए पैसे चाहिए ।
लड़की – उस गंवार के पास कहां होगा पैसा, मेरे बाप से 3 लाख रूपया उपर से मारूती कार लिया है।
हां बस कुछ गहने है वह लेके आउगी आज।
लड़का लड़की को होटल का पता देकर चला जाता है । लड़की घर आके फिर से लड़ाई करती है।
मगर अफसोस वह अकेली चिल्लाती रहती है उससे लड़ने वाला कोई नहीं था।
रात 8 बजे लड़के का मैसेज आता है वाट्स अप पे की कब आ रही हो?
लड़की जवाब देती है सब्र करो कोई सोया नहीं है। मैं 12 बजे से पहले पहुँच जाउगी क्योंकि यहां तुम्हारे बिना मेरी सांसे घुटती है।
लड़का ओ के जल्दी आना, मैं होटल के बाहर खड़ा रहूंगा।

लड़की अपने पति को बोल देती है की मुझे खाना नहीं चाहिए मैंने बाहर खा लिया है इसलिए मुझे कोई परेशान न करे इतना कहके दरवाजा बंद करके अंदर आती है कि…पति बोलता है कि…वह आलमारी से मेरी डायरी दे दो फिर बंद करना दरवाजा। हम परेशान नहीं करेंगे ।
लड़की दरवाजा खोले बिना कहती है की चाभीयां दे दो अलमारी की,
लड़का – तुम्हारे बिस्तर के पैरों तले है चाबी ।
मगर लड़की दरवाजा नहीं खोलती बल्की जोर -जोर से गाना सुनने लगती है। बाहर पति कुछ देर दरवाजा पिटता है , फिर हारकर लौट जाता है। लड़की ने बड़े जोर से गाना बजा रखा था, फिर वह आलमारी खोल के देखती है जो उसने पहली बार खोला था, क्योंकि वह अपना समान अलग आलमारी मे रखती थी।
आलमारी खोलते ही हैरान रह जाती है। आलमारी मे उसके अपने पास बुक एटीएम कार्ड थे जो उसके घरवालो ने छीन के रखे थे।
खोेल कर चेक किया तो उसमें वह पैसे भी ऐड थे जो दहेज मे लड़के को मिले थे, और बहुत सारे गहने भी जो एक पेपर के साथ थे और उसकी मिल्कीयत लड़की के नाम थी, लड़की बेहद हैरान और परेशान थी। फिर उसकी नजर डायरी मे पड़ती है और वह जल्दी से
वह डायरी निकाल के पढ़ने लगती है।

लिखा था, तुम्हारे पापा ने एक दिन मेरी मां की जान बचाई थी अपना खून देकर । मैं अपनी माँ से बेहद प्यार करता हूँ इसलिए मैंने झूककर आपके पापा को प्रणाम करके कहा की…आपका ये अनमोल एहसान कभी नही भूलूंगा, कुछ दिन बाद आपके पापा हमारे घर आये हमारे तुम्हारे रिश्ते की बात लेकर और उन्होंने आपकी हर बात बताई हमें की आप एक लड़के से बेहद प्यार करती हो। आपके पापा आपकी खुशी चाहते थे इसलिए वह पहले लड़के को जानना चाहते थे। आखिर आप अपने पापा की princess जो थी और हर बाप अपने Princess के लिए एक अच्छा ईमानदार Prince चाहता है। आपके पापा ने खोजकर के पता लगाया की वह लड़का बहुत सी लड़कीयों को धोखा दे चुका है, और उसकी पहले शादी भी हो चुकी है पर आपको बता न सके , क्योंकि उन्हें पता था की ये जो इश्क का नशा है वह हमेशा अपनों को गैर और गैर को अपना समझता है। मैं एक बाप के मुँह से एक बेटी की कहानी सुनकर मै अचम्भीत हो गया। हर बाप यंहा तक शायद ही सोचे। मुझे यकीन हो गया था की एक अच्छा पति होने का सम्मान मिले न मिले मगर एक “दामाद” होने की इज्जत मैं हमेशा पा सकता हूँ।

मुझे दहेज मे मिले सारे पैसे मैंने तुम्हारे एकाउण्ट में डाल दिए और तुम्हारे घर से मिली गाड़ी आज भी तुम्हारे घर पे है जो मैंने इसलिए भेजी ताकि जब तुम्हें मुझसे प्यार हो जाये तो साथ चलेंगे कही दूर घूमने।
दहेज…इस नाम से नफरत है मुझे क्योंकि मैंने इस दहेज मे अपनी बहन और बाप को खोया है। मेरे बाप के अंतिम शब्द भी यही थे कि.. किसी बेटी के बाप से कभी एक रूपया न लेना। “मर्द ” हो तो कमाके खिलाना, तुम आजाद हो कहीं भी जा सकती हो। डायरी के बीच पन्नों पर तलाक की पेपर है जंहा मैंने पहले ही साईन कर दिया है । जब तुम्हें लगे की अब इस गंवार के साथ नही रहना है तो साईन करके कहीं भी अपनी सारी चीजे लेके जा सकती हो।
लड़की …हैरान थी परेशान थी…न चाहते हुए भी गंवार के शब्दों ने दिल को छुआ था। न चाहते हुए भी गंवार के अनदेखे प्यार को महसूस करके पलकें नम हुई थी।
आगे लिखा था, मैंने आज तुम्हें इसलिए मारा क्योंकि आपने मां को गाली दी, और जो बेटा खुद के आगे मां की बेइज्जती होते सहन कर जाये…फिर वह बेटा कैसा ।
कल आपके भी बच्चे होंगे । चाहे किसी के साथ भी हो, तब महसूस होगी माँ की महानता और प्यार।
आपको दुल्हन बनाके हमसफर बनाने लाया हूँ जबरदस्ती करने नहीं। जब प्यार हो जाये तो भरपूर वसूल कर लूँगा आपसे… आपके हर गुस्ताखी का बदला हम शिद्दत से लेंगे हम आपसे.. .गर आप मेरी हुई तो बेपनाह मोहब्बत करके
किसी और की हुई तो आपके हक मे दुआये माँग के😢😢😢
लड़की का फोन बज रहा था जो वायब्रेशन मोड पे था, लड़की अब दुल्हन बन चुकी थी। पलकों से आंसू गिर रहे थे । सिसकते हुए मोबाइल से पहले सिम निकाल के तोड़ा फिर सारा सामान जैसा था वैसे रख के न जाने कब सो गई पता नहीं चला। सुबह देर से जागी तब तक गंवार आफिस जा चुका था, लड़की पहले नहा धोकर साड़ी पहनी , फिर लम्बी सी सिंदूर डाली अपनी माँग मे, फिर मंगलसूत्र पहना ।।।।
जबकि पहले एक टीकी जैसी साईड पे सिंदूर लगाती थी ताकि कोई लड़का ध्यान न दे।

मगर आज कोन्हों दूर से भी दिखाई दे ऐसी लम्बी और गाढ़ी सिंदूर लगाई थी दुल्हन ने, फिर किचन मे जाके सासु मां को जबर्दस्ती कमरे मे लेके तैयार होने को कहती है, और अपने गंवार पति के लिए थोड़े नमकीन थोड़े हलुवे और चाय बनाके अपनी स्कूटी मे सासु मां को जबर्दस्ती बिठाकर (जबकी मां को कुछ पता ही नहीं है कि उनको बहू आज मुझे कहा ले जा रही है बस बैठ जाती है)
फिर रास्ते मे सासु मां को पति के आफिस का पता पूछकर आफिस पहुँच जाती है। पति हैरान रह जाता है पत्नी को इस हालत मे देखकर।

पति – सब ठीक तो है न मां?
मगर माँ बोलती इससे पहले पत्नी उसे गले लगाकर कहती है की..अब सब ठीक है…कहती हैं ” I love you forever.”..

आफिस के लोग सब खड़े हो जाते है तो दुल्हन कहती है की..मै इनकी धर्मपत्नी हूँ , वनवास गई थी सुबह लौटी हूँ।

अबसे एक महीने तक मेरे पतिदेव
आफिस मे दिखाई नहीं देंगे
आफिस के लोग सन्न ??????
दुल्हन – क्योंकि हम लम्बी छुट्टी पे जा रहे साथ साथ।
पति- पागल…
दुल्हन – आपके सादगी और भोलेपन ने बनाया है।
सभी लोग तालीयां बजाते हैं और दुल्हन फिर से लिपट जाती है अपने “गंवार “से …
जंहा से वह दोबारा कभी भी छूटना नहीं चाहती।

  • बड़े कड़े फैसले होते है कभी कभी हमारे अपनों के मगर हम समझ नहीं पाते कि….हमारे अपने हमारी फिकर खुद से ज्यादा क्यों करते हैं*
  • माता-पिता के फैसलों का सम्मान करे*
    क्योंकि ये दो ऐसे शख्स है जो आपको हमेशा दुनियादारी से ज्यादा प्यार करते हैं ।+++

संजय गुप्ता

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राजा विदूरथ की कथा

विख्यात कीर्ति राजा विदूरथ के सुनीति और सुमति नामक दो पुत्र थे। एक समय विदूरथ शिकार के लिये वन में गये, वहां ऊपर निकले हुए पृथ्वी के मुख के समान एक विशाल गड्ढे को देखकर वे सोचने लगे कि यह भीषण गर्त क्या है? यह भूमि-विवर तो नहीं हो सकता? वे इस प्रकार चिंता कर ही रहे थे कि इस निर्जन वन में उन्होंने सुव्रत नामक एक तपस्वी ब्राम्हण को समीप आते देखा। आश्चर्यचकित राजा ने उस तपस्वी को भूमि के उस भयंकर गड्ढे को दिखाकर पूछा कि ‘यह क्या है?’

ऋषि ने कहा- ‘महीपाल! क्या आप इसे नहीं जानते? रसातल में अतिशय बलशाली उग्र नामक दानव निवास करता है। वह पृथ्वी को विदीर्ण करता है, अत: उसे कुजृम्भ कहा जाता है। पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने सुनन्द नामक जिस मूसल का निर्माण किया था, उसे इस दुष्ट ने चुरा लिया है। यह उसी मूसल से रण में शत्रुओं को मारता है। पाताल में निवास करता हुआ वह असुर उस मूसल से पृथ्वी को विदीर्ण कर अन्य सभी असुरों के लिये द्वारों का निर्माण करता है। उसने ही उस मूसलरूरी शस्त्र से पृथ्वी को इस स्थान पर विदीर्ण किया है। उस पर विजय पाए बिना आप कैसे पृथ्वी का भोग करेंगे? मूसलरूपी आयुधधारी महाबली उग्र यज्ञों का विध्वंस, देवों के पीड़ित और दैत्यों को संतुष्ट करता है। यदि आप पाताल में रहने वाले उस शत्रु को मारेंगे तभी सम्राट बन सकेंगे। उस मूसल को लोग सौनन्द कहते हैं। मनीषिगण उस मूसल के बल और अबल के प्रसंग में कहते हैं कि उस मूसल को जिस दिन नारी छू लेती है, उसी क्षण वह शक्तिहीन हो जाता है और दूसरे दिन शक्तिशाली हो जाता है। आप के नगर के समीप में ही उसने पृथ्वी में छिद्र कर दिया है, फिर आप कैसे निश्र्चिन्त रहते हैं? ऐसा कहकर ऋषि के प्रस्थान करने पर राजा अपने नगर में लौटकर उस विषय पर मंत्रियों के साथ विचार करने लगे। मूसल के प्रभाव एवं उसकी शक्तिहीनता आदि के विषय में उन्होंने जो कुछ सुना था, वह सब मंत्रियों के सम्मुख व्यक्त किया। मंत्रियों से परामर्श करते समय राजा के समीप में बैठी हुई उनकी पुत्री मुदावती ने भी सभी बातें सुनीं।

इस घटना के कुछ दिनों के बाद अपनी सखियों से घिरी हुई मुदावती जब उपवन में थी, तब कुजृम्भ दैत्य ने उस वयस्क कन्या का अपहरण कर लिया। यह सुनकर राजा के नेत्र क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने अपने दोनों कुमारो से कहा कि तुम लोग शीघ्र जाओ और निर्विन्ध्या नदी के तट प्रांत में जो गड्ढा है, उससे रसातल में जाकर मुदावती का अपहरण करने वाले का विनाश करो।

इसके बाद परम क्रुद्ध दोनों राजकुमारों ने उस गड्ढे को प्राप्त कर पैर के चिन्हों का अनुसरण करते हुए सेनाओं के साथ वहां पहुंचकर कुजृम्भ के साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। माया के बल से बलशाली दैत्यों ने सारी सेना को मारकर उन दो राजकुमारों को भी बंदी बना लिया। पुत्रों के बंदी होने का समाचार सुनकर राजा को बहुत दु:ख हुआ। उन्होंने सैनिको को बुलाकर कहा– जो उस दैत्य को मारकर मेरी कन्या और पुत्रों को मुक्त करायेगा उसी से मै अपनी कन्या का विवाह करूंगा।

राजा की यह घोषणा शस्त्र विद्या में निपूर्ण भनन्दन के पुत्र बलवान वत्सप्रीन ने भी सुनी और अपने गुरुदेव को प्रणाम कर सेना लेकर पाताल में दैत्यों से युद्ध करने निकल गया। पाताल में दोनों की सेनाओं में युद्ध छिड़ गया। वह दानव तीन दिनों तक युद्ध करने के बाद कोध्र से आविष्ट होकर मूसल लाने के लिए दौड़ा। उधर मूसल के प्रभाव से अवगत मुदावती ने श्रद्धावनत होकर उस मूसल का पुन: पुन: स्पर्श किया।

इसके बाद असुरपति ने रणभूमि में उपस्थित होकर उस मूसल से युद्ध आरम्भ किया, किंतु शत्रुओं के बीच उसका पात व्यर्थ होने लगा। राजकुमार ने उसे रथहीन कर दिया और कालाग्नि के समान आग्नेय शास्त्र से उसे काल के गाल में भेज दिया। राजपुत्र पर फूलों की वर्षा होने लगी।

कृजम्भ के मारे जाने पर शेष नामक नागराज भगवान अनन्त ने उस मूसल को ले लिया। उन्होंने आन्नद के साथ सौनन्द मूसल का गुण जानने वाली मुदावती का नाम सौनन्दा रखा। राजपुत्र वत्सप्री भी दोनों राजकुमारों सहित राजकुमारी को राजा के पास ले आया और निवेदन किया- “आपकी आज्ञा के अनुसार मै आपके दोनों कुमारों और मुदावती को छुड़ा लाया हूं, अब मेरा क्या कर्तव्य है, आज्ञा प्रदान करें।”

राजा ने कहा- “आज मैं तीन कारणों से देवों के द्वारा भी प्रशंसित हुआ हूं- पहला तुमको जमाता के रूप में प्राप्त किया, दूसरा शत्रु विनष्ट हुआ, तीसरा मेरे दोनों पुत्र और कन्या वहां से अक्षत- शरीर लौट आये। राजपुत्र! आज शुभ दिन में मेरी आज्ञा के अनुसार तुम मेरी पुत्री मुदावती का प्रीतिपूर्वक परिग्रहण करों और मुझे सत्यवादी बनाओ।”

वत्सप्री ने कहा- आप जो कहेंगे उसका पालन होगा।
इसके बाद राजा विदूरथ ने अपनी कन्या मुदावती और भनन्दन पुत्र वत्सप्री का विवाह सम्पन्न किया। वत्सप्री राजा होकर यज्ञों का अनुष्ठान एवं धर्मानुसार प्रजा का पालन करने लगे।

संजय गुप्ता

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#भाभी_माँ..

मोनू को देखने और उसके परिवार से मिलने लड़की वाले होटल में आने वाले थे मोनू ने फोनपर भैया और मंझली भाभी को अच्छे से सारी तैयारी कर लेने के लिए बोला था कडी मेहनत करने के बाद मोनू दिल्ली पुलिस में एक साल से नौकरी कर रहा था मगर उसके फोन से मंझली भाभी और भैया बड़े चिंता में थे क्योंकि भाभी के पास एक अच्छी सी साड़ी और भैया के पास अच्छा से कुर्ता तक न था ..7 साल पहले मंझली भाभी की शादी बेरोजगार भैया से हुई थी।

बड़े भैया को डाक्टरी पढ़ाने में पिताजी की छोटी से जमा पूंजी भी ख़त्म हो गयी थी और डाक्टर बनने के बाद बड़े भैया एक डाक्टरानी से खुद शादी कर लिए बड़ी भाभी ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवार देख सबसे उनका रिश्ता तुडवा अपने संग विदेश ले गई फिर मंझले भैया किसी तरह 10वींपास कर शहर मे एक pvt कम्पनी मे नौकरी करली मां बाबूजी को गांव बराबर पैसा भेजते ओर शहर मे कम्पनी से मिले क्वार्टर मे छोटे भाई मोनू को ले आये असल मे उसे पढाकर एक काबिल इंसान बनाने की जिम्मेदारी मंझले भैया भाभी ने ली थी मोनू को शुरू से वो अपना बेटा मानते थे शहर मे गृहस्थी की गाड़ी बड़ी मुश्किल से चल रही थी।

उनका 3 साल का एक छोटा सा बच्चा भी था फिरभी मंझले भैया ने कभी भी उफ्फ तक नहीं की मंझली भाभी ने तो जैसे अपने शौक को बलिदान कर दिया था मोनू की पढ़ाई की खातिर घूमना फिरना और जेवर सोना तो दूर की बात कभी एक नई साड़ी तक कि जिद न की।पढ़ने के लिए घर मे जो एक ही कमरा था वो भी दे देतीं और बच्चे से पढ़ाई में कोई बाधा न हो बच्चे को लेकर पड़ोस में चली जाती।खुद और भैया तो कम दूध वाली फीकी चाय पीते ही अपने बच्चे को भी थोड़ा दूध कम देतीं लेकिन मोनू को खाने पीने में कोई कमी न होने देतीं मोनू के बहुत अच्छे रिजल्ट के बाद एक सप्ताह के भीतर ही उसे training के लिए 50 हजार रुपये की जरूरत थी कोई उपाय न सूझ रहा था।

बड़े भैयाको फ़ोन लगाया गया पर पैसे की कोई कमी ना होने के बाद भी बडी भाभी ने पैसे की कमी का रोना शुरू कर दिया तब उसी वक़्त मंझली भाभी ने अपना मंगलसूत्र और शरीर के सारे गहने उतारकर भैया के हाथ में रख दीं और कसम दे दी थी उन्हें आखिर बेटे जैसे देवर की जिंदगी का सवाल था आखिर संघर्ष काम आया मोनू का slc पुलिस विभाग मे हो गया सालभर से वही रहकर नौकरी कर रहा था खत मे बताया था अपनी पसंद की लडकी के बारे मे फोटो भेजी थी कहा था।

आपको और भैया की पसंद पर ही शादी होगी दोनों ने हां कर दी थी मगर ऐसे हालत मे लडकी देखनेकैसे जाए तभी दरवाजे पर मोनू को देखा सबसे पहले भैया के पैर छुए ओर एक पैकेट मे कोट पेंट देते बोला-जरा पहनकर तो बताइए फिर मुन्ना को नया सूट देकर बोला-अबसे तुम मेरे साथ रहोगे तुमहारी पढाई की पूरी जिम्मेदारी मेरी अंत मे मंझली भाभी को गिरवी पडे छुडाए गहने ओर नए कुछ गहनों सहित एक खूबसूरत साडी देते बोला-सब देवी मां की पूजा करते है मगर उन्हें देखने का सौभाग्य सिर्फ मुझे मिला भाभी मां ..भैया भाभी सबकी आँखों मे खुशी के आँसू थे …

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🔮 एक ब्राम्हण था, कृष्ण के
मंदिर में बड़ी सेवा किया करता था।
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उसकी पत्नी इस बात से हमेशा चिढ़ती थी कि हर बात में वह पहले भगवान को लाता।
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भोजन हो, वस्त्र हो या हर चीज पहले भगवान को समर्पित करता।
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एक दिन घर में लड्डू बने।
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ब्राम्हण ने लड्डू लिए और भोग लगाने चल दिया।
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पत्नी इससे नाराज हो गई, कहने लगी कोई पत्थर की मूर्ति जिंदा होकर तो खाएगी नहीं जो हर चीज लेकर मंदिर की तरफ दौड़ पड़ते हो।
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अबकी बार बिना खिलाए न लौटना, देखती हूं कैसे भगवान खाने आते हैं।
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बस ब्राम्हण ने भी पत्नी के ताने सुनकर ठान ली कि बिना भगवान को खिलाए आज मंदिर से लौटना नहीं है।
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मंदिर में जाकर धूनि लगा ली।
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भगवान के सामने लड्डू रखकर
विनती करने लगा।
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एक घड़ी बीती। आधा दिन बीता, न तो भगवान आए न ब्राम्हण हटा।
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आसपास देखने वालों की भीड़ लग गई
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सभी कौतुकवश देखने लगे कि आखिर होना क्या है।
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मक्खियां भिनभिनाने लगी ब्राम्हण उन्हें उड़ाता रहा।
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मीठे की गंध से चीटियां भी लाईन लगाकर चली आईं।
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ब्राम्हण ने उन्हें भी हटाया, फिर मंदिर के बाहर खड़े आवारा कुत्ते भी ललचाकर आने लगे।
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ब्राम्हण ने उनको भी खदेड़ा।
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लड्डू पड़े देख मंदिर के बाहर बैठे भिखारी भी आए गए।
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एक तो चला सीधे लड्डू उठाने तो ब्राम्हण ने जोर से थप्पड़ रसीद कर दिया।
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दिन ढल गया, शाम हो गई।
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न भगवान आए, न ब्राम्हण उठा।
शाम से रात हो गई।
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लोगों ने सोचा ब्राम्हण देवता पागल हो गए हैं,
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भगवान तो आने से रहे।
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धीरे-धीरे सब घर चले गए।
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ब्राम्हण को भी गुस्सा आ गया।
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लड्डू उठाकर बाहर फेंक दिए।
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भिखारी, कुत्ते,चीटी, मक्खी तो दिन भर से ही इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे, सब टूट पड़े।
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उदास ब्राम्हण भगवान को कोसता हुआ घर लौटने लगा।
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इतने सालों की सेवा बेकार चली गई। कोई फल नहीं मिला।
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ब्राम्हण पत्नी के ताने सुनकर सो गया ।
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रात को सपने में भगवान आए।
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बोले-तेरे लड्डू खाए थे मैंने।
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बहुत बढिय़ा थे, लेकिन अगर सुबह
ही खिला देता तो ज्यादा अच्छा होता ।
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कितने रूप धरने पड़े तेरे लड्डू खाने के लिए।
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मक्खी, चीटी, कुत्ता, भिखारी।
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पर तुने हाथ नहीं धरने दिया।
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दिनभर इंतजार करना पड़ा।
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आखिर में लड्डू खाए लेकिन जमीन से उठाकर खाने में थोड़ी मिट्टी लग गई थी।
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अगली बार लाए तो अच्छे से खिलाना ।
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भगवान चले गए।
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ब्राम्हण की नींद खुल गई।
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उसे एहसास हो गया।
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भगवान तो आए थे खाने लेकिन मैं ही उन्हें पहचान नहीं पाया।
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बस, ऐसे ही हम भी भगवान के संकेतों को समझ नहीं पाते हैं।
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संजय गुप्ता

Posted in संस्कृत साहित्य

जरूर पढ़े====

अदभूत: ताली बजाते ही इस कुंड के पानी में होती हलचल, इसमें नहाने से चर्म रोग होते हैं दूर

कभी कभी कुछ ऐसा देखनेको मिलता है जिस पर यकिन करना मुश्किल हो जाता है । झारखंड के बोकारो जिले में एक पानी का कुंड ऐसा है, जहां ताली बजाने पर तेजी से पानी बाहर निकलता है। ऐसा लगता है मानो किसी बरतन में पानी उबल रहा हो।
ठंड में निकलता है गर्म पानी
यहां गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म पानी निकलता है। लोगों का मानना है कि इसमें नहाने से चर्म रोग दूर होते हैं। साथ ही मन्नतें भी पूरी होती हैं। कुंड से निकलने वाला पानी जमुई नामक छोटी नाले से होते हुए गरगा नदी में मिलता है। इसे दलाही कुंड के नाम से जाना जाता है। कंक्रीट की दीवारों से घेरा हुआ छोटा जलाशय। बेहद साफ और औषधीय गुणों वाला है।
=====कुंड पर शोध=======

ऐसी जगहों पर पानी जमीन के बहुत नीचे से आता है। पानी का तापमान हमेशा फिक्स्ड होता है। तापमान घटना-बढ़ना शोध का विषय है। अगर इस पानी से नहाने पर चर्म रोग दूर होते हैं तो इसका मतलब इसमें गंधक और हीलियम गैस मिला हुआ है। ताली बजाने से ध्वनि तरंगों की वजह से पानी पर असर तो होता है लेकिन नीचे से ऊपर कैसे आता है यह पता करना होगा। -नितिन प्रियदर्शी, भू-वैज्ञानिक
=====संक्रांति मेला========

वर्ष 1984 से यहां हर साल मकर संक्रांति पर मेला लगता है। लोग स्नान के लिए पहुंचते हैं। कुंड के पास दलाही गोसाईं नामक देवता का स्थान है। यहां हर रविवार लोग पूजा करने पहुंचते हैं।
=======पर्यटन केंद्र=======
2011-12 में पर्यटन विभाग ने इसकी दीवार बनवाई। इसके बाद इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। लेकिन प्रशासन चाहे तो यह बेहतरीन पर्यटन स्थल बन सकता है।
बोकारो से करीब 27 किमी दूर। सड़क से जगासुर तक उसके बाद कच्चे रास्ते पर करीब 300 मीटर पैदल चलना पड़ता है।
ऐसा ही कुछ तेलंगानामें भी होता है। तेलंगाना के करीमनगर जिले में कल्वाश्रीरामपुर मंडल में स्थित एदुलापुर पहाड़ी पर भगवान शिव का मंदिर है। वहां भी नंदी के सामने ताली बजाने पर उसके मुंह से पानी निकलता है। इसका कारण स्रोत पता करने की कोशिश भू-वैज्ञानिकों ने की थी। लेकिन कारण पता नहीं कर पाए।

संजय गुप्ता

Posted in रामायण - Ramayan

केवट का प्रेम और प्रभुश्रीराम का गंगा पार जाना,,,,,,,

निषादराज केवट, रामायण का एक पात्र है। जिसने प्रभु श्रीराम को वनवास के दौरान माता सीता और लक्ष्मण के साथ अपने नाव में बिठा कर गंगा पार करवाया था। इसका वर्णन रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में किया गया है।

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥

भावार्थ:-श्री राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म (भेद) जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है,॥

छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥
तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥

भावार्थ:-जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदरी स्त्री हो गई (मेरी नाव तो काठ की है)। काठ पत्थर से कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जाएगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जाएगी, मैं लुट जाऊँगा (अथवा रास्ता रुक जाएगा, जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जाएगी) (मेरी कमाने-खाने की राह ही मारी जाएगी)॥

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥
जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥

भावार्थ:-मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरणकमल पखारने (धो लेने) के लिए कह दो॥

  • पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।
    मोहि राम राउरि आन दसरथसपथ सब साची कहौं॥
    बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।
    तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

भावार्थ:-हे नाथ! मैं चरण कमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा, मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजी की सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जब तक मैं पैरों को पखार न लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा।

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥

भावार्थ:-केवट के प्रेम में लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्री रामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजी की ओर देखकर हँसे॥

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥
बेगि आनु जलपाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥

भावार्थ:-कृपा के समुद्र श्री रामचन्द्रजी केवट से मुस्कुराकर बोले भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाए। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे॥

जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥

भावार्थ:-एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं और जिन्होंने (वामनावतार में) जगत को तीन पग से भी छोटा कर दिया था (दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था), वही कृपालु श्री रामचन्द्रजी (गंगाजी से पार उतारने के लिए) केवट का निहोरा कर रहे हैं!॥

पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥

भावार्थ:-प्रभु के इन वचनों को सुनकर गंगाजी की बुद्धि मोह से खिंच गई थी (कि ये साक्षात भगवान होकर भी पार उतारने के लिए केवट का निहोरा कैसे कर रहे हैं), परन्तु (समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान) पदनखों को देखते ही (उन्हें पहचानकर) देवनदी गंगाजी हर्षित हो गईं। (वे समझ गईं कि भगवान नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया और इन चरणों का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गईं।) केवट श्री रामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया॥

अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥

भावार्थ:-अत्यन्त आनंद और प्रेम में उमंगकर वह भगवान के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं है॥

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥

भावार्थ:-चरणों को धोकर और सारे परिवार सहित स्वयं उस जल (चरणोदक) को पीकर पहले (उस महान पुण्य के द्वारा) अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनंदपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्रजी को गंगाजी के पार ले गया॥

उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामुगुह लखन समेता॥
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥

भावार्थ:-निषादराज और लक्ष्मणजी सहित श्री सीताजी और श्री रामचन्द्रजी (नाव से) उतरकर गंगाजी की रेत (बालू) में खड़े हो गए। तब केवट ने उतरकर दण्डवत की। (उसको दण्डवत करते देखकर) प्रभु को संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं॥

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥

भावार्थ:-पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनंद भरे मन से अपनी रत्न जडि़त अँगूठी (अँगुली से) उतारी। कृपालु श्री रामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए॥

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥

भावार्थ:-(उसने कहा-) हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी॥

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीन दयाल अनुग्रह तोरें॥
फिरती बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥

भावार्थ:-हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा॥

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ॥

भावार्थ:- प्रभु श्री रामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी ने बहुत आग्रह (या यत्न) किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणा के धाम भगवान श्री रामचन्द्रजी ने निर्मल भक्ति का वरदान देकर उसे विदा किया॥

संजय गुप्ता