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भारद्वाज आश्रम , प्रयाग -भारद्वाज मुनि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे!!!!!!!

*भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥

भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं, उनका श्री रामजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीत चित्त, जितेन्द्रिय, दया के निधान और परमार्थ के मार्ग में बड़े ही चतुर हैं॥

वन जाते समय तथा लंका-विजय के पश्चात वापस लौटते समय श्री रामचन्द्र जी इनके आश्रम में गए थे। जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था।

वायुमार्ग से पुष्पक विमान से लौटते समय प्रभु राम महर्षि भरद्वाज के आश्रम के वर्णन करते हुए कहते हैं- सुमित्रानन्दन! वह देखो प्रयाग के पास भगवान् अग्निदेव की ध्वजा रूप धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं।

महर्षि वाल्मिकी अपने ग्रंथ रामायण में लिखते हैं- श्रीरामचन्द्र जी ने चौदहवां वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भारद्वाज आश्रम में पहुंचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को प्रणाम किया। तीर्थराज प्रयाग में संगम से थोड़ी दूरी पर इनका आश्रम था, जो आज भी विद्यमान है।

ये उतथ्य ऋषि का क्षेत्रज और देवगुरु बृहस्पति का औरस पुत्र थे। माता ममता और पिता बृहस्पति दोनों के द्वारा परित्याग कर दिए जाने पर मरुद्गणों ने इनका पालन किया, तब इनका एक नाम वितथ पड़ा।

जब राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र सम्राट भरत का वंश डूबने लगा, तो उन्होंने पुत्र-प्राप्ति हेतु मरुत्सोम यज्ञ किया, जिससे प्रसन्न होकर मरुतों ने अपने पालित पुत्र भारद्वाज को उपहार रूप में भरत को अर्पित कर दिया।

भरत का दत्तक-पुत्र बनने पर ये ब्राह्मण से क्षत्रिय हो गए थे। इनका निवास गोवर्धन पर्वत (व्रज-क्षेत्र) पर था, जहां इन्होंने वृक्ष लगाए।

महर्षि भारद्वाज आंगिरस की पन्द्रह शाखाओं में से शाखा प्रवर्तक तथा एक मंत्रदृष्टा ऋषि हैं। (वायुपुराण-65, 103( 207 तथा 59, 101)। – ये आयुर्वेद शास्त्र के आदि प्रवर्तक भी हैं, जिसे इन्होंने आठ भागों में बांटा था। अष्टांग आयुर्वेद से प्राय: सभी आयुर्वेदज्ञ सुपरिचित हैं और महर्षि ने इन भागों को पृथक-पृथक कर इनका ज्ञान अपने शिष्यों को दिया था। – इन्होंने आयुर्वेद पर प्रथम संगोष्ठी का आयोजन किया था। आयुर्वेद की शिक्षा इन्होंने इन्द्र से ली थी (भाव प्रकाश)।

काशिराज दिवोदास और धन्वन्तरि इन्हीं के शिष्य थे (हरिवंश पुराण)।

भारद्वाज ऋषि काशीराज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं मन्त्रदृष्टा ऋषि ने यज्ञ सम्पन्न कराया था।

साम-गायक भारद्वाज ने सामगान को देवताओं से प्राप्त किया था। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में कहा गया है- यों तो समस्त ऋषियों ने ही यज्ञ का परम गुह्य ज्ञान जो बुद्धि की गुफा में गुप्त था, उसे जाना, परंतु भारद्वाज ऋषि ने स्वर्गलोक के धाता, सविता, विष्णु और अग्नि देवता से ही बृहत्साम का ज्ञान प्राप्त किया।

राष्ट्र को समृद्ध और दृढ़ बनाने के लिए भारद्वाज ने राजा प्रतर्दन से यज्ञ में इसका अनुष्ठान कराया था, जिससे प्रतर्दन का खोया राष्ट्र उन्हें मिला था।

रत्न -प्रदीपिकां नामक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ में कृत्रिम हीरा के निर्माण के विषय में मुनि वैज्ञानिक भारद्वाज ने हीरे और कृत्रिम हीरे के संघटन को विस्तार से बताया है। पचास के दशक के अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी द्वारा पहले कृत्रिम हीरे के निर्माण से भी सहस्रों वर्ष पूर्व मुनिवर भारद्वाज ने कृत्रिम हीरा के निर्माण की विधि बतलाई थी। एकदम स्पष्ट है कि वे रत्नों के पारखी ही नहीं, रत्नों की निर्माण-विधि के पूर्ण ज्ञाता भी थे।

भारद्वाज मुनि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे।

महर्षि भारद्वाज द्वारा वर्णित विमानों में से एक मरुत्सखा विमान का निर्माण 1895 ई. में मुम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स के अध्यापक शिवकर बापूजी तलपड़े, जो एक महान वैदिक विद्वान थे, ने अपनी पत्नी (जो स्वयं भी संस्कृत की विदुषा थीं) की सहायता से विमान का एक मॉडल (नमूना) तैयार किया। दिखलाया था। दुर्भाग्यवश इसी बीच तलपड़े की विदुषी जीवनसंगिनी का देहावसान हो गया। फलत: वे इस दिशा में और आगे न बढ़ सके। 17 सितंबर, 1917 ई. को उनका स्वर्गवास हो जाने के बाद उस मॉडल विमान तथा सामग्री को उत्तराधिकारियों ने एक ब्रिटिश फर्म राइट ब्रदर्स के हाथ बेच दिया।

सप्त ऋषियों में महत्वपूर्ण :- ऋग्वेद के मंत्रों की शाब्दिक रचना जिन ऋषि परिवारों द्वारा हुई है, उनमें सात अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इन सात में महर्षि भारद्वाज अनन्यतम हैं। ये छठे मण्डल के ऋषि के रूप में विख्यात हैं।

रामायण तथा महाभारत में भी गोत्र ऋषि के रूप में भारद्वाज का उल्लेख है। इन्हें एक महान चिन्तक और ज्ञानी माना गया है।

महर्षि भारद्वाज ऐसे पहले विमान-शास्त्री हैं, जिन्होंने अगस्त्य के समय के विद्युत ज्ञान को विकसित किया, तब उसकी संज्ञा विद्युत, सौदामिनी, हलालिनी आदि वर्गीकृत नामों से की जाने लगी।

अन्तरराष्ट्रीय संस्कृत शोध मंडल ने प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज के विशेष प्रयास किए। फलस्वरूप जो ग्रंथ मिले, उनके आधार पर भारद्वाज का विमान-प्रकरण प्रकाश में आया।

महर्षि भारद्वाज रचित यंत्र-सर्वस्वं के विमान-प्रकरण की यती बोधायनकृत वृत्ति (व्याख्या) सहित पाण्डुलिपि मिली, उसमें प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा चमत्कारिक तथ्य उद्घाटित हुए। –

सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली द्वारा इस विमान-प्रकरण का स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक की हिन्दी टीका सहित सम्पादित संस्करण वृहत विमान शास्त्र के नाम से 1958 ई. में प्रकाशित हुआ। यह दो अंशों में प्राप्त हुआ। कुछ अंश पहले बड़ौदा के राजकीय पुस्तकालय की पाण्डुलिपियों में मिले, जिसे वैदिक शोध-छात्र प्रियरत्न आर्य ने विमान-शास्त्रं नाम से वेदानुसंधान सदन, हरिद्वार से प्रकाशित कराया। बाद में कुछ और महत्वपूर्ण अंश मैसूर राजकीय पुस्तकालय की पाण्डुलिपियों में प्राप्त हुए। इस ग्रंथ के प्रकाशन से भारत की प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अनेक महत्वपूर्ण तथा आश्चर्यचकित कर देने वाले तथ्यों का पता चला।

भारद्वाज प्रणीत यंत्र-सर्वस्व ग्रंथ तत्कालीन प्रचलित सूत्र शैली में लिखा गया है। इसके वृत्तिकार यती बोधायन ने अपनी व्याख्या में स्पष्ट लिखा है कि- महर्षि भारद्वाज ने वेदरूपी समुद्र का निर्मन्थन कर सब मनुष्यों के अभीष्ट फलप्रद यंत्रसर्वस्व ग्रंथरूप नवनीत (मक्खन) को निकालकर दिया।’यंत्रसर्वस्व में लिखा है विमान बनाने और उड़ाने की कला स्पष्ट है कि ‘यन्त्रसर्वस्व ग्रंथ और उसके अन्तर्गत वैमानिक-प्रकरण की रचना वेदमंत्रों के आधार पर ही की गई है।

विमान की तत्कालीन प्रचलित परिभाषाओं का उल्लेख करते हुए भारद्वाज ने बतलाया है कि वेगसाम्याद् विमानोण्डजजानामितिं अर्थात् आकाश में पक्षियों के वेग सी जिसकी क्षमता हो, वह विमान कहा गया है। वैमानिक प्रकरण में आठ अध्याय हैं, जो एक सौ अधिकरणों में विभक्तऔर पांच सौ सूत्रों में निबद्ध हैं। इस प्रकरण में बतलाया गया है कि विमान के रहस्यों का ज्ञाता ही उसे चलाने का अधिकारी है। इन रहस्यों की संख्या बत्तीस है।

विमान बनाना, उसे आकाश में ले जाना, आगे बढ़ाना, टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना, वेग को कम या अधिक करना, लंघन (लांघना), सर्पगमन, चपल परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियारहस्यग्रहण, शब्दप्रसारण, दिक्प्रदर्शन इत्यादि। ये तो हुए विमानों के सामान्य रहस्य हैं।

विभिन्न प्रकार के विमानों में चालकों को उनके विशिष्ट रहस्यों का ज्ञान होना आवश्यक होता था। रहस्य लहरी नामक ग्रंथ में विमानों के इन रहस्यों का विस्तृत वर्णन है।

तीन प्रकार के विमान :- वैमानिक प्रकरणं के अनुसार विमान मुख्यत: तीन प्रकार के होते थे-
1. मान्त्रिक (मंत्रचालित दिव्य विमान),
2. तांत्रिक-औषधियों तथा शक्तिमय वस्तुओं से संचालित तथा
3. कृतक-यन्त्रों द्वारा संचालित।

  • 56 प्रकार के विमानों की गणना :- पुष्पक मांत्रिक विमान था। यह विमान मंत्रों के आधार पर चलता था। कह सकते हैं कि यह रिमोट पद्धति से चलता था। मांत्रिक विमानों का प्रयोग त्रेता युग तक रहा और तांत्रिक विमानों का द्वापर तक। इस श्रेणी में छप्पन प्रकार के विमानों की गणना की गई है। तृतीय श्रेणी कृतक के विमान कलियुग में प्रचलित रहे। ये विमान पच्चीस (25) प्रकार के गिनाए गए हैं।

इनमें शकुन अर्थात पक्षी के आकार का पंख-पूंछ सहित, सुन्दर अर्थात धुएं के आधार पर चलने वाला-यथा आज का जेट विमान, रुक्म अर्थात खनिज पदार्थों के योग से रुक्म अर्थात् सोने जैसी आभायुक्त लोहे से बिना विमान, त्रिपुर अर्थात् जल, स्थल और आकाश तीनों में चलने, उडऩे में समर्थ आदि का उल्लेख मिलता है।

  • इन विमानों की गति अत्याधुनिक विमानों की गति से कहीं अधिक होती थी। विमानों और उनमें
  • प्रयुक्त होने वाले यंत्रों को बनाने के काम में लाया जाने वाला लोहा भी कई प्रकार को होता था।
  • भारद्वाज ने जिन विमानों तथा यंत्रों का उल्लेख अपने यंत्र-सर्वस्वं ग्रंथ में किया है, उनमें से अनेक तो ऐसे हैं, जिन्हें आज के समुन्नत वैज्ञानिक युग में भी नहीं बनाया जा सका है।

  • शकुन, सुन्दर और रुक्म के अतिरिक्त एक ऐसे भी विमान का वर्णन उक्त ग्रंथ में है, जिसे न तो खंडित किया जा सके, न जलाया जा सके और न ही काटा जा सके।

  • ऐसे विमानों का उल्लेख भी है, जिनमें यात्रा करने पर मनुष्य का शरीर जरा भी न हिले, शत्रु के विमान की सभी बातें सुनी जा सकें और यह भी ज्ञात किया जा सके कि शत्रु-विमान कहां तक कितने समय में पहुंचेगा। – विमान को हवा में स्थिर रखने (जैसे हेलीकॉप्टर) और कार की तरह बिना मुड़े ही पीछे जाने का उल्लेख है। (हवा में स्थिर रह सकने वाला हेलीकॉटर तो बना लिया गया है, परन्तु कार की तरह बिना मुड़े पीछे की ओर गति कर सकने वाला विमान अभी तक नहीं बनाया जा सका है।)

  • महर्षि भारद्वाजकृत यंत्र-सर्वस्व ग्रंथ के अतिरिक्त उन्हीं की लिखी एक प्राचीन पुस्तक अंशुबोधिनीं में अन्य अनेक विद्याओं का वर्णन हैं। इसमें प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक अधिकरण है। एक अधिकरण में विमानों के संचालन के लिए प्रयुक्त होने वाली शक्ति के अनुसार उनका वर्गीकरण किया गया है।

  • महर्षि के सूत्रों की व्याख्या करते हुए यती बोधायन ने आठ प्रकार के विमान बतलाए हैं-

  1. शक्तियुद्गम – बिजली से चलने वाला।
  2. भूतवाह – अग्नि, जल और वायु से चलने वाला।
  3. धूमयान – गैस से चलने वाला।
  4. शिखोद्गम – तेल से चलने वाला।
  5. अंशुवाह – सूर्यरश्मियों से चलने वाला।
  6. तारामुख – चुम्बक से चलने वाला।
  7. मणिवाह – चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला।
  8. मरुत्सखा – केवल वायु से चलने वाला।

भारद्वाज के विचार – महान विचारक भारद्वाज कहते हैं अग्नि को देखो, यह मरणधर्मा मानवों में मौजूद अमर ज्योति है। यह अग्नि विश्वकृष्टि है अर्थात सर्वमनुष्य रूप है। यह अग्नि सब कर्मों में प्रवीणतम ऋषि है, जो मानव में रहती है, उसे प्रेरित करती है ऊपर उठने के लिए। मानवी अग्नि जागेगी। विश्वकृष्टि को जब प्रज्ज्वलित करेंगे तो उसे धारण करने के लिए साहस और बल की आवश्यकता होगी। इसके लिए आवश्यक है कि आप सच्चाई पर दृढ़ रहें।

ऋषि भारद्वाज कहते हैं- हम झुकें नहीं। हम सामथ्र्यवान के आगे भी न झुकें। दृढ़ व्यक्ति के सामने भी नहीं झुकें। क्रूर-दुष्ट-हिंसक-दस्यु के आगे भी हमारा सिर झुके नहीं।
– ऋषि समझाते हैं कि जीभ से ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि सुनने वाले बुद्धिमान बनें। हमारी विद्या ऐसी हो, जो कपटी दुष्टों का सफाया करे, युद्धों में संरक्षण दे, इच्छित धनों का प्राप्त कराए और हमारी बुद्धियों को निन्दित मार्ग से रोके।

संजय गुप्ता

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