Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

(((( भक्त नरसी मेहता ))))
.
भारत भूमि अनेक संतों-महात्माओं की जननी रही है । भारत के हर प्रांतों में अनेका नेक संतों ने जन्म लिया है । ऐसे संतों में एक संत नरसी मेहता का जन्म गुजरात प्रांत में जूनागढ़ नामक नगर में बड़ नगरा जाति के नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ ।
.
उनके पिता का नाम कृष्णदास और माता का नाम दया कुंवर था। पत्नी माणेक बाई थीं । बचपन में ही नरसी के अपने मा-बाप स्वर्ग वासी हो गए थे । वह अपने भाई-भावज के आश्रय में रहते थे । वह भाभी के प्रतिकूल स्वभाव के कारण अनमने रहते थे ।
.
एक दिन उद्विग्न मन वाले नरसी भाभी के घर का त्याग करके वन की ओर चले गए । रास्ते में एक अपूज शिवालय के पास पहुंच गए । पूजा-ध्यान में कई रात और दिन बीतते चले गए । सात दिन के उपवास के बाद शंकर भगवान ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए ।
.
भगवान शकर ने उनको कुछ वरदान मांगने को कहा । नरसी ने सुख-सम्पत्ति न मांग कर भगवान विष्णु के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की । यह सुनकर शंकर अधिकाधिक प्रसन्न हुए । स्वयं महादेव जी हाथ पकड़कर उनको बैकुंठ में ले गए ।
.
वहां कृष्ण की रास लीला देखकर उनका दिल परिपूर्ण हो गया । शंकर जी ने लोकाचार छोड्कर उनको भगवद्भक्ति में लीन होने की प्रेरणा दी क्योंकि भक्ति से भवसागर पार करना सरल है । पलभर में स्वप्नवत यह सारा देवदृश्य अदृश्य हो गया । शंकर भगवान भी अंतर्धान हो गए ।
.
नरसी के रोम-रोम में भक्ति का रोमांच फैल गया । मुख से भक्तिपद झरने लगे । अब नरसी कृष्णोपासक बन गए । घर लौटकर भाभी के चरणों में गिरकर उन्होंने भाभी का उपकार माना कि उन्हीं के कारण उनको भगवान का साक्षात्कार हुआ ।
.
इस तरह जो इधर-उधर बे-रोजगार नरसी थोड़े दिन पहले भटकते थे वो रातों रात भक्ति के रंग में रग चुके थे। उनकी वाणी में सरस्वती का पावन प्रवाह बहने लगा । अब भक्ति ही उनका कार्य बन गया ।
.
घर में पत्नी बड़ी साध्वी थी । इससे नरसी का भक्तिछंद बिना रोक-टोक समृद्ध बनता गया । अपने आंगन में तुलसी के पौधों को पालने लगे साधु-वैरागी की जमात इकट्ठा करते रहते। करताल मृदग और शंख जैसे भक्ति के साज लिए हुए रात-दिन अपने आगन में भजन-कीर्तन की धुन बजाते रहते।
.
आजीविका का कोई व्यवसाय न होने पर भी ईश्वर भरोसे जीवन नैया भवसागर में आगे बढ़ाते रहे । ईश्वर में अटट श्रद्धा ही उनकी भक्ति का मूल मंत्र है ।
.
वह दो संतानों के पिता बने । पुत्र सामला दास और पुत्री कुंवर बाई । बच्चों का विवाह अच्छे घराने में किया । किंतु कर्म वश थोड़े ही दिनों में पुत्र ओर पत्नी स्वर्गवासी हो गए ।
.
गृह-संसार लुट गया फिर भी नरसी उसको भक्ति के लिए उपयुक्त समझकर थोड़े ही दिनों में शोक रहित बन गए । उन्होंने यही मान लिया अच्छा हुआ यह संसार टूट गया जिससे सुख से श्री गोपाल की भक्ति हो सकेगी।
.
नरसी के जीवन में अनेक चमत्कार युक्त बातें जुड़ी हैं । एक बार नागरिकों ने नरसी की बेइज्जती करने के लिए कुछ तीर्थ यात्रियों को नरसी के घर भेजा और द्वारिका के किसी सेठ के ऊपर हुंडी (चैक) लिखने के लिए कहा ।
.
नरसी ने वहां कोई पहचान वाला न होने पर भी शामलशा सेठ के नाम पर चिट्ठी लिखी । स्वय भगवान ने शामलशा के रूप में आकर हुंडी को स्वीकार किया और नरसी की बात रखी ।
.
पुत्री कुंवर बाई के यहां एक मांगलिक प्रसंग था । नरसी के पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी । लेकिन भगवान पर भरोसा रखकर साधु-संतों के साथ मृदग शख और करताल लिए खाली हाथ वह पुत्री के ससुराल में जा पहुंचे ।
.
नरसी को ऐसे वेश में देखकर कुवर बाई के ससुराल वाले उन पर हंसने लगे । उन्होंने नरसी की भक्ति का मजाक करते हुए नहाने के लिए गरम पानी दिया और कहा कि अगर तुम्हारी भक्ति सच्ची होती तो आसमान से पानी बरसता ।
.
नरसी ने हाथ में करताल लेकर मल्लार राग छेड़ दिया । पल भर में आकाश में काले बादल उमड़ने लगे और मूसलाधार वर्षा हुई । यह देखकर सब दंग रह गए ।
.
संत परम्परानुसार नरसी भगत को एक यज्ञ में भोज देना (भात देना) था । उनके पास तो कुछ था नहीं । उन्होंने जगत पालक भगवान श्रीविष्णु का आवाहन किया । थोड़ी देर में भगवान श्रीकृष्ण और महालक्ष्मी स्वयं प्रकट हुए और फिर वह भोज हुआ कि लोग देखते रह गए ।
.
तेरी मोहब्बत मे साँवरे एक बात सीखी है,
तेरी भक्ति के बिना ये सारी दुनिया फीकी है।
तेरा दर ढूढते-ढूढते जिदंगी की शाम हो गई
जब तेरा दर देखा मेरे साँवरे तो जिदंगी ही तेरे नाम हो गई ..

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

रोनाल्ड निक्सन का पूरा नाम
रोनाल्ड हेनरी निक्सन था। ये अंग्रेज थे लेकिन आज लोग इन्हें
“कृष्ण प्रेम” के नाम से जानते हैं।
ये इंग्लैंड से थे। 18 वर्ष की उम्र में प्रथम जर्मन युद्ध में श्री रोनाल्ड निक्सन ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। वे उस युद्ध में हवाई बेड़े में एक ऊँचे अफसर थे। युद्ध का उन्माद उतर जाने पर उनके हृदय में भयंकर विभीषिका अपनी आँखों देखी थी।
हत्या, मारकाट, मृत्यु का ताँडव रक्तपात, हाहाकार और चीत्कार ने उनकी शाँति हरण कर ली। उन्होंने लिखा कि मानव विकास के उस वीभत्स दृश्य ने उनके हृदय में भयंकर उथल-पुथल मचा दी। बहुत प्रयत्न करने पर भी उनकी मनःस्थिति शाँत नहीं हो रही थी। मानसिक व्यग्रता ने उन्हें विक्षिप्त सा बना दिया था। इनके मन को कहीं भी शांति नही मिली।
फिर वे एक दिन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जा पहुँचे। जहाँ इनका परिचय वेदांत, ईश्वरज्ञान और महात्मा बुद्ध के बारे में हुआ। और ईश्वर प्राप्ति की खोज में भारत आ गए।
श्री कृष्ण प्रेरणा से ब्रज में आकर बस गये। उनका कन्हैया(कृष्ण) से इतना प्रगाढ़ प्रेम था कि वे कन्हैया को अपना छोटा भाई(younger brother ) मानने लगे थे।
एक दिन उन्होंने हलुवा बनाकर
कृष्ण जी को भोग लगाया। पर्दा हटाकर देखा तो हलुवा में छोटी छोटी उँगलियों के निशान थे। जिसे देख कर
‘निक्सन’ की आखों से प्रेम के अश्रु धारा बहने लगे क्योंकि इससे पहले भी वे कई बार भोग लगा चुके थे पर पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था।
एक दिन ऐसी घटना घटी कि सर्दियों का समय था। निक्सन जी कुटिया के बाहर सोते थे। इनका प्रतिदिन का नियम था कृष्ण जी को अंदर विधिवत सुलाकर रजाई ओढाकर, फिर खुद लेटते थे।
एक दिन की बात है। निक्सन सो रहे थे। मध्यरात्रि को अचानक उनको ऐसा लगा। जैसे किसी ने उन्हें आवाज दी हो- दादा ! ओ दादा!
इन्होने जब उठकर देखा तो कोई नहीं दिखा। सोचने लगे हो सकता हमारा भ्रम हो। थोड़ी देर बाद उनको फिर सुनाई दिया- दादा ! ओ दादा !
उन्होंने अंदर जाकर देखा तो पता चला की आज वे कृष्ण जी को रजाई ओढ़ाना भूल गये थे। वे कृष्ण जी के पास जाकर बैठ गये।
और बड़े प्यार से बोले…’ आपको भी सर्दी लगती है क्या…?”
निक्सन का इतना कहना था- की श्री कृष्ण जी के विग्रह से आसुओं की अद्भुत धारा बह चली।
ठाकुर जी को इस तरह रोता देख निक्सन जी भी फूट-फूट कर रोने लगे। उस रात्रि ठाकुर जी के प्रेम में वह अंग्रेज भक्त इतना रोया कि उनकी आत्मा उनके पंचभौतिक शरीर को छोड़कर भगवान के लोक में चली गयी। फिर यही रोनाल्ड निक्सन आगे चलकर अपनी कृष्ण भक्ति के कारण ‘कृष्ण प्रेम’ नाम से विश्व विख्यात हुए।
वो बांके बिहारी मिलते हैं वो बांके बिहारी दीखते हैं लेकिन तब जब हमारी मिलने की चाह हो और देखने की लालसा हो।
बांके बिहारी लाल की जय!

संजय गुप्ता

Posted in संस्कृत साहित्य

भारद्वाज आश्रम , प्रयाग -भारद्वाज मुनि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे!!!!!!!

*भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥

भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं, उनका श्री रामजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीत चित्त, जितेन्द्रिय, दया के निधान और परमार्थ के मार्ग में बड़े ही चतुर हैं॥

वन जाते समय तथा लंका-विजय के पश्चात वापस लौटते समय श्री रामचन्द्र जी इनके आश्रम में गए थे। जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था।

वायुमार्ग से पुष्पक विमान से लौटते समय प्रभु राम महर्षि भरद्वाज के आश्रम के वर्णन करते हुए कहते हैं- सुमित्रानन्दन! वह देखो प्रयाग के पास भगवान् अग्निदेव की ध्वजा रूप धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं।

महर्षि वाल्मिकी अपने ग्रंथ रामायण में लिखते हैं- श्रीरामचन्द्र जी ने चौदहवां वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भारद्वाज आश्रम में पहुंचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को प्रणाम किया। तीर्थराज प्रयाग में संगम से थोड़ी दूरी पर इनका आश्रम था, जो आज भी विद्यमान है।

ये उतथ्य ऋषि का क्षेत्रज और देवगुरु बृहस्पति का औरस पुत्र थे। माता ममता और पिता बृहस्पति दोनों के द्वारा परित्याग कर दिए जाने पर मरुद्गणों ने इनका पालन किया, तब इनका एक नाम वितथ पड़ा।

जब राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र सम्राट भरत का वंश डूबने लगा, तो उन्होंने पुत्र-प्राप्ति हेतु मरुत्सोम यज्ञ किया, जिससे प्रसन्न होकर मरुतों ने अपने पालित पुत्र भारद्वाज को उपहार रूप में भरत को अर्पित कर दिया।

भरत का दत्तक-पुत्र बनने पर ये ब्राह्मण से क्षत्रिय हो गए थे। इनका निवास गोवर्धन पर्वत (व्रज-क्षेत्र) पर था, जहां इन्होंने वृक्ष लगाए।

महर्षि भारद्वाज आंगिरस की पन्द्रह शाखाओं में से शाखा प्रवर्तक तथा एक मंत्रदृष्टा ऋषि हैं। (वायुपुराण-65, 103( 207 तथा 59, 101)। – ये आयुर्वेद शास्त्र के आदि प्रवर्तक भी हैं, जिसे इन्होंने आठ भागों में बांटा था। अष्टांग आयुर्वेद से प्राय: सभी आयुर्वेदज्ञ सुपरिचित हैं और महर्षि ने इन भागों को पृथक-पृथक कर इनका ज्ञान अपने शिष्यों को दिया था। – इन्होंने आयुर्वेद पर प्रथम संगोष्ठी का आयोजन किया था। आयुर्वेद की शिक्षा इन्होंने इन्द्र से ली थी (भाव प्रकाश)।

काशिराज दिवोदास और धन्वन्तरि इन्हीं के शिष्य थे (हरिवंश पुराण)।

भारद्वाज ऋषि काशीराज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं मन्त्रदृष्टा ऋषि ने यज्ञ सम्पन्न कराया था।

साम-गायक भारद्वाज ने सामगान को देवताओं से प्राप्त किया था। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में कहा गया है- यों तो समस्त ऋषियों ने ही यज्ञ का परम गुह्य ज्ञान जो बुद्धि की गुफा में गुप्त था, उसे जाना, परंतु भारद्वाज ऋषि ने स्वर्गलोक के धाता, सविता, विष्णु और अग्नि देवता से ही बृहत्साम का ज्ञान प्राप्त किया।

राष्ट्र को समृद्ध और दृढ़ बनाने के लिए भारद्वाज ने राजा प्रतर्दन से यज्ञ में इसका अनुष्ठान कराया था, जिससे प्रतर्दन का खोया राष्ट्र उन्हें मिला था।

रत्न -प्रदीपिकां नामक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ में कृत्रिम हीरा के निर्माण के विषय में मुनि वैज्ञानिक भारद्वाज ने हीरे और कृत्रिम हीरे के संघटन को विस्तार से बताया है। पचास के दशक के अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी द्वारा पहले कृत्रिम हीरे के निर्माण से भी सहस्रों वर्ष पूर्व मुनिवर भारद्वाज ने कृत्रिम हीरा के निर्माण की विधि बतलाई थी। एकदम स्पष्ट है कि वे रत्नों के पारखी ही नहीं, रत्नों की निर्माण-विधि के पूर्ण ज्ञाता भी थे।

भारद्वाज मुनि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे।

महर्षि भारद्वाज द्वारा वर्णित विमानों में से एक मरुत्सखा विमान का निर्माण 1895 ई. में मुम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स के अध्यापक शिवकर बापूजी तलपड़े, जो एक महान वैदिक विद्वान थे, ने अपनी पत्नी (जो स्वयं भी संस्कृत की विदुषा थीं) की सहायता से विमान का एक मॉडल (नमूना) तैयार किया। दिखलाया था। दुर्भाग्यवश इसी बीच तलपड़े की विदुषी जीवनसंगिनी का देहावसान हो गया। फलत: वे इस दिशा में और आगे न बढ़ सके। 17 सितंबर, 1917 ई. को उनका स्वर्गवास हो जाने के बाद उस मॉडल विमान तथा सामग्री को उत्तराधिकारियों ने एक ब्रिटिश फर्म राइट ब्रदर्स के हाथ बेच दिया।

सप्त ऋषियों में महत्वपूर्ण :- ऋग्वेद के मंत्रों की शाब्दिक रचना जिन ऋषि परिवारों द्वारा हुई है, उनमें सात अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इन सात में महर्षि भारद्वाज अनन्यतम हैं। ये छठे मण्डल के ऋषि के रूप में विख्यात हैं।

रामायण तथा महाभारत में भी गोत्र ऋषि के रूप में भारद्वाज का उल्लेख है। इन्हें एक महान चिन्तक और ज्ञानी माना गया है।

महर्षि भारद्वाज ऐसे पहले विमान-शास्त्री हैं, जिन्होंने अगस्त्य के समय के विद्युत ज्ञान को विकसित किया, तब उसकी संज्ञा विद्युत, सौदामिनी, हलालिनी आदि वर्गीकृत नामों से की जाने लगी।

अन्तरराष्ट्रीय संस्कृत शोध मंडल ने प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज के विशेष प्रयास किए। फलस्वरूप जो ग्रंथ मिले, उनके आधार पर भारद्वाज का विमान-प्रकरण प्रकाश में आया।

महर्षि भारद्वाज रचित यंत्र-सर्वस्वं के विमान-प्रकरण की यती बोधायनकृत वृत्ति (व्याख्या) सहित पाण्डुलिपि मिली, उसमें प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा चमत्कारिक तथ्य उद्घाटित हुए। –

सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली द्वारा इस विमान-प्रकरण का स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक की हिन्दी टीका सहित सम्पादित संस्करण वृहत विमान शास्त्र के नाम से 1958 ई. में प्रकाशित हुआ। यह दो अंशों में प्राप्त हुआ। कुछ अंश पहले बड़ौदा के राजकीय पुस्तकालय की पाण्डुलिपियों में मिले, जिसे वैदिक शोध-छात्र प्रियरत्न आर्य ने विमान-शास्त्रं नाम से वेदानुसंधान सदन, हरिद्वार से प्रकाशित कराया। बाद में कुछ और महत्वपूर्ण अंश मैसूर राजकीय पुस्तकालय की पाण्डुलिपियों में प्राप्त हुए। इस ग्रंथ के प्रकाशन से भारत की प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अनेक महत्वपूर्ण तथा आश्चर्यचकित कर देने वाले तथ्यों का पता चला।

भारद्वाज प्रणीत यंत्र-सर्वस्व ग्रंथ तत्कालीन प्रचलित सूत्र शैली में लिखा गया है। इसके वृत्तिकार यती बोधायन ने अपनी व्याख्या में स्पष्ट लिखा है कि- महर्षि भारद्वाज ने वेदरूपी समुद्र का निर्मन्थन कर सब मनुष्यों के अभीष्ट फलप्रद यंत्रसर्वस्व ग्रंथरूप नवनीत (मक्खन) को निकालकर दिया।’यंत्रसर्वस्व में लिखा है विमान बनाने और उड़ाने की कला स्पष्ट है कि ‘यन्त्रसर्वस्व ग्रंथ और उसके अन्तर्गत वैमानिक-प्रकरण की रचना वेदमंत्रों के आधार पर ही की गई है।

विमान की तत्कालीन प्रचलित परिभाषाओं का उल्लेख करते हुए भारद्वाज ने बतलाया है कि वेगसाम्याद् विमानोण्डजजानामितिं अर्थात् आकाश में पक्षियों के वेग सी जिसकी क्षमता हो, वह विमान कहा गया है। वैमानिक प्रकरण में आठ अध्याय हैं, जो एक सौ अधिकरणों में विभक्तऔर पांच सौ सूत्रों में निबद्ध हैं। इस प्रकरण में बतलाया गया है कि विमान के रहस्यों का ज्ञाता ही उसे चलाने का अधिकारी है। इन रहस्यों की संख्या बत्तीस है।

विमान बनाना, उसे आकाश में ले जाना, आगे बढ़ाना, टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना, वेग को कम या अधिक करना, लंघन (लांघना), सर्पगमन, चपल परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियारहस्यग्रहण, शब्दप्रसारण, दिक्प्रदर्शन इत्यादि। ये तो हुए विमानों के सामान्य रहस्य हैं।

विभिन्न प्रकार के विमानों में चालकों को उनके विशिष्ट रहस्यों का ज्ञान होना आवश्यक होता था। रहस्य लहरी नामक ग्रंथ में विमानों के इन रहस्यों का विस्तृत वर्णन है।

तीन प्रकार के विमान :- वैमानिक प्रकरणं के अनुसार विमान मुख्यत: तीन प्रकार के होते थे-
1. मान्त्रिक (मंत्रचालित दिव्य विमान),
2. तांत्रिक-औषधियों तथा शक्तिमय वस्तुओं से संचालित तथा
3. कृतक-यन्त्रों द्वारा संचालित।

  • 56 प्रकार के विमानों की गणना :- पुष्पक मांत्रिक विमान था। यह विमान मंत्रों के आधार पर चलता था। कह सकते हैं कि यह रिमोट पद्धति से चलता था। मांत्रिक विमानों का प्रयोग त्रेता युग तक रहा और तांत्रिक विमानों का द्वापर तक। इस श्रेणी में छप्पन प्रकार के विमानों की गणना की गई है। तृतीय श्रेणी कृतक के विमान कलियुग में प्रचलित रहे। ये विमान पच्चीस (25) प्रकार के गिनाए गए हैं।

इनमें शकुन अर्थात पक्षी के आकार का पंख-पूंछ सहित, सुन्दर अर्थात धुएं के आधार पर चलने वाला-यथा आज का जेट विमान, रुक्म अर्थात खनिज पदार्थों के योग से रुक्म अर्थात् सोने जैसी आभायुक्त लोहे से बिना विमान, त्रिपुर अर्थात् जल, स्थल और आकाश तीनों में चलने, उडऩे में समर्थ आदि का उल्लेख मिलता है।

  • इन विमानों की गति अत्याधुनिक विमानों की गति से कहीं अधिक होती थी। विमानों और उनमें
  • प्रयुक्त होने वाले यंत्रों को बनाने के काम में लाया जाने वाला लोहा भी कई प्रकार को होता था।
  • भारद्वाज ने जिन विमानों तथा यंत्रों का उल्लेख अपने यंत्र-सर्वस्वं ग्रंथ में किया है, उनमें से अनेक तो ऐसे हैं, जिन्हें आज के समुन्नत वैज्ञानिक युग में भी नहीं बनाया जा सका है।

  • शकुन, सुन्दर और रुक्म के अतिरिक्त एक ऐसे भी विमान का वर्णन उक्त ग्रंथ में है, जिसे न तो खंडित किया जा सके, न जलाया जा सके और न ही काटा जा सके।

  • ऐसे विमानों का उल्लेख भी है, जिनमें यात्रा करने पर मनुष्य का शरीर जरा भी न हिले, शत्रु के विमान की सभी बातें सुनी जा सकें और यह भी ज्ञात किया जा सके कि शत्रु-विमान कहां तक कितने समय में पहुंचेगा। – विमान को हवा में स्थिर रखने (जैसे हेलीकॉप्टर) और कार की तरह बिना मुड़े ही पीछे जाने का उल्लेख है। (हवा में स्थिर रह सकने वाला हेलीकॉटर तो बना लिया गया है, परन्तु कार की तरह बिना मुड़े पीछे की ओर गति कर सकने वाला विमान अभी तक नहीं बनाया जा सका है।)

  • महर्षि भारद्वाजकृत यंत्र-सर्वस्व ग्रंथ के अतिरिक्त उन्हीं की लिखी एक प्राचीन पुस्तक अंशुबोधिनीं में अन्य अनेक विद्याओं का वर्णन हैं। इसमें प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक अधिकरण है। एक अधिकरण में विमानों के संचालन के लिए प्रयुक्त होने वाली शक्ति के अनुसार उनका वर्गीकरण किया गया है।

  • महर्षि के सूत्रों की व्याख्या करते हुए यती बोधायन ने आठ प्रकार के विमान बतलाए हैं-

  1. शक्तियुद्गम – बिजली से चलने वाला।
  2. भूतवाह – अग्नि, जल और वायु से चलने वाला।
  3. धूमयान – गैस से चलने वाला।
  4. शिखोद्गम – तेल से चलने वाला।
  5. अंशुवाह – सूर्यरश्मियों से चलने वाला।
  6. तारामुख – चुम्बक से चलने वाला।
  7. मणिवाह – चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला।
  8. मरुत्सखा – केवल वायु से चलने वाला।

भारद्वाज के विचार – महान विचारक भारद्वाज कहते हैं अग्नि को देखो, यह मरणधर्मा मानवों में मौजूद अमर ज्योति है। यह अग्नि विश्वकृष्टि है अर्थात सर्वमनुष्य रूप है। यह अग्नि सब कर्मों में प्रवीणतम ऋषि है, जो मानव में रहती है, उसे प्रेरित करती है ऊपर उठने के लिए। मानवी अग्नि जागेगी। विश्वकृष्टि को जब प्रज्ज्वलित करेंगे तो उसे धारण करने के लिए साहस और बल की आवश्यकता होगी। इसके लिए आवश्यक है कि आप सच्चाई पर दृढ़ रहें।

ऋषि भारद्वाज कहते हैं- हम झुकें नहीं। हम सामथ्र्यवान के आगे भी न झुकें। दृढ़ व्यक्ति के सामने भी नहीं झुकें। क्रूर-दुष्ट-हिंसक-दस्यु के आगे भी हमारा सिर झुके नहीं।
– ऋषि समझाते हैं कि जीभ से ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि सुनने वाले बुद्धिमान बनें। हमारी विद्या ऐसी हो, जो कपटी दुष्टों का सफाया करे, युद्धों में संरक्षण दे, इच्छित धनों का प्राप्त कराए और हमारी बुद्धियों को निन्दित मार्ग से रोके।

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🔍🔍🔍🔍🔍🔍🔍🔍🔍🔍🔍

एक संन्यासी ईश्वर की खोज में निकला हुआ था और एक आश्रम में जाकर ठहरा।

पंद्रह दिन तक उस आश्रम में रहा, फिर ऊब गया। उस आश्रम का जो बूढ़ा गुरु था वह कुछ थोड़ी सी बातें जानता था, रोज उन्हीं को दोहरा देता था।

फिर उस युवा संन्यासी ने सोचा, यह गुरु मेरे योग्य नहीं, मैं कहीं और जाऊं। यहां तो थोड़ी सी बातें हैं, उन्हीं का दोहराना है। कल सुबह छोड़ दूंगा इस आश्रम को, यह जगह मेरे लायक नहीं।

लेकिन उसी रात एक घटना घट गई कि फिर उस युवा संन्यासी ने जीवनभर वह आश्रम नहीं छोड़ा।

क्या हो गया ?

रात एक और संन्यासी मेहमान हुआ। रात आश्रम के सारे मित्र इकट्ठे हुए, सारे संन्यासी इकट्ठे हुए, उस नये संन्यासी से बातचीत सुनने।

उस नये संन्यासी ने बड़ी ज्ञान की बातें कहीं, उपनिषद की बातें कहीं, वेदों की बातें कहीं। वह इतना जानता था, इतना सूक्ष्म उसका विश्लेषण था, ऐसा गहरा उसका ज्ञान था कि दो घंटे तक वह बोलता रहा। सबने मंत्रमुग्ध होकर सुना।

फिर उस युवा संन्यासी के मन में हुआ : गुरु हो तो ऐसा हो। इससे कुछ सीखने को मिल सकता है। एक वह गुरु है, वह चुपचाप बैठा है, उसे कुछ भी पता नहीं। अभी सुन कर उस बूढ़े के मन में बड़ा दुख होता होगा, पश्चात्ताप होता होगा, ग्लानि होती होगी—कि मैंने कुछ न जाना और यह अजनबी संन्यासी बहुत कुछ जानता है।

युवा संन्यासी ने यह सोचा कि आज वह बूढ़ा गुरु अपने दिल में बहुत—बहुत दुखी, हीन अनुभव करता होगा। तभी उस आए हुए संन्यासी ने बात बंद की और बूढ़े गुरु से पूछा कि आपको मेरी बातें कैसी लगीं ?

बूढ़ा गुरु खिलखिला कर हंसने लगा और कहने लगा, तुम्हारी बातें ?

मैं दो घंटे से सुनने की कोशिश कर रहा हूं तुम तो कुछ बोलते ही नहीं हो। तुम तो बिलकुल बोलते ही नहीं हो।

वह संन्यासी बोला, दो घंटे से मैं बोल रहा हूं आप पागल तो नहीं हैं ! और मुझसे कहते हैं कि मैं बोलता नहीं हूं।

उस ने कहा, हां, तुम्हारे भीतर से गीता बोलती है, उपनिषद बोलता है, वेद बोलता है, लेकिन तुम तो जरा भी नहीं बोलते हो। तुमने इतनी देर में एक शब्द भी नहीं बोला ! एक शब्द तुम नहीं बोले, सब सीखा हुआ बोले, सब याद किया हुआ बोले, जाना हुआ एक शब्द तुमने नहीं बोला। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम कुछ भी नहीं बोलते हो,तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती हैं।

एक ज्ञान है जो उधार है, जो हम सीख लेते हैं। ऐसे ज्ञान से जीवन के सत्य को कभी नहीं जाना जा सकता। जीवन के सत्य को केवल वे जानते हैं जो उधार ज्ञान से मुक्त होते हैं। और हम सब उधार ज्ञान से भरे हुए हैं। हमें ईश्वर के संबंध में पता है। और ईश्वर के संबंध में हमें क्या पता होगा जब अपने संबंध में ही पता नहीं है ?

हमें मोक्ष के संबंध में पता है। हमें जीवन के सभी सत्यों के संबंध में पता है। और इस छोटे से सत्य के संबंध में पता नहीं है जो हम हैं!

अपने ही संबंध में जिन्हें पता नहीं है, उनके ज्ञान का क्या मूल्य हो सकता है ?

लेकिन हम ऐसा ही ज्ञान इकट्ठा किए हुए हैं। और इसी ज्ञान को जान समझ कर जी लेते हैं और नष्ट हो जाते हैं। आदमी अज्ञान में पैदा होता है और मिथ्या ज्ञान में मर जाता है, ज्ञान उपलब्ध ही नहीं हो पाता।

दुनिया में दो तरह के लोग हैं एक अज्ञानी और एक ऐसे अज्ञानी जिन्हें ज्ञानी होने का भ्रम है ।

तीसरी तरह का आदमी मुश्किल से कभी—कभी जन्मता है।लेकिन जब तक कोई तीसरी तरह का आदमी न बन जाए, तब तक उसकी जिंदगी में न सुख हो सकता है, न शांति हो सकती है।

क्योंकि जहां सत्य नहीं है, वहां सुख असंभव है। सुख सत्य की छाया है।

जिस जीवन में सत्य नहीं है, वहां संगीत असंभव है, क्योंकि सभी संगीत सत्य की वीणा से पैदा होता है।

जिस जीवन में सत्य नहीं है, उस जीवन में सौंदर्य असंभव है; क्योंकि सौंदर्य वस्त्रों का नाम नहीं है और न शरीर का नाम है। सौंदर्य सत्य की उपलब्धि से पैदा हुई गरिमा है।

और जिस जीवन में सत्य नहीं है, वह जीवन अशक्ति का जीवन होगा, क्योंकि सत्य के अतिरिक्त और कोई शक्ति दुनिया में नहीं है।

⚜⚜⚜⚜⚜⚜⚜⚜⚜⚜⚜

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

भाग्य का लिखा होकर रहेगा
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
कथा लंबी है लेकिन उतनी ही रोचक

एक समय की बात है। एक बहुत ही ज्ञानी पण्डित था। वह अपने एक बचपन के घनिष्‍ट मित्र से मिलने के लिए किसी दूसरे गाँव जा रहा था जो कि बचपन से ही गूंगा व एक पैर से अपाहिज था। उसका गांव काफी दूर था और रास्‍ते में कई और छोटे-छोटे गांव भी पडते थे।*

पण्डित अपनी धुन में चला जा रहा था कि रास्‍ते में उसे एक आदमी मिल गया, जो दिखने मे बडा ही हष्‍ठ-पुष्‍ठ था, वह भी पण्डित के साथ ही चलने लगा। पण्डित ने सोचा कि चलो अच्‍छा ही है, साथ-साथ चलने से रास्‍ता जल्‍दी कट जायेगा। पण्डित ने उस आदमी से उसका नाम पूछा तो उस आदमी ने अपना नाम महाकालबताया। पण्डित को ये नाम बडा अजीब लगा, लेकिन उसने नाम के विषय में और कुछ पूछना उचित नहीं समझा। ‍दोनों धीरे-धीरे चलते रहे तभी रास्‍त में एक गाँव आया। महाकाल ने पण्डित से कहा- तुम आगे चलो, मुझे इस गाँव मे एक संदेशा देना है। मैं तुमसे आगे मिलता हुं।

“ठीक है” कहकर पण्डित अपनी धुन में चलता रहा तभी एक भैंसे ने एक आदमी को मार दिया और जैसे ही भैंसे ने आदमी को मारा, लगभग तुरन्‍त ही महाकाल वापस पण्डित के पास पहुंच गया।

चलते-चलते दोनों एक दूसरे गांव के बाहर पहुंचे जहां एक छोटा सा मन्दिर था। ठहरने की व्‍यवस्‍था ठीक लग रही थी और क्‍योंकि पण्डित के मित्र का गांव अभी काफी दूर था साथ ही रात्रि होने वाली थी, सो पण्डित ने कहा- रात्रि होने वाली है। पूरा दिन चले हैं, थकावट भी बहुत हो चुकी है इसलिए आज की रात हम इसी मन्दिर में रूक जाते हैं। भूख भी लगी है, सो भोजन भी कर लेते हैं और थोडा विश्राम करके सुबह फिर से प्रस्‍थान करेंगे।

महाकाल ने जवाब दिया- ठीक है, लेकिन मुझे इस गाँव में किसी को कुछ सामान देना है, सो मैं देकर आता हुं, तब तक तुम भोजन कर लो, मैं बाद मे खा लुंगा।”

और इतना कहकर वह चला गया लेकिन उसके जाते ही कुछ देर बाद उस गाँव से धुंआ उठना शुरू हुआ और धीरे-धीरे पूरे गांव में आग लग गई थी । पण्डित को आर्श्‍चय हुआ। उसने मन ही मन सोचा कि- जहां भी ये महाकाल जाता है, वहां किसी न किसी तरह की हानि क्‍यों हो जाती है? जरूर कुछ गडबड है।

लेकिन उसने महाकाल से रात्रि में इस बात का कोई जिक्र नहीं किया। सुबह दोनों ने फिर से अपने गन्‍तव्‍य की ओर चलना शुरू किया। कुछ देर बाद एक और गाँव आया और महाकाल ने फिर से पण्डित से कहा कि- पण्डित जी… आप आगे चलें। मुझे इस गांव में भी कुछ काम है, सो मैं आपसे आगे मिलता हुँ’।

इतना कहकर महाकाल जाने लगा। लेकिन इस बार पण्डित आगे नहीं बढा बल्कि खडे होकर महाकाल को देखता रहा कि वह कहां जाता है और करता क्‍या है।

तभी लोगों की आवाजें सुनाई देने लगीं कि एक आदमी को सांप ने डस लिया और उस व्‍यक्ति की मृत्‍यु हो गई। ठीक उसी समय महाकाल फिर से पण्डित के पास पहुंच गया। लेकिन इस बार पण्डित को सहन न हुआ। उसने महाकाल से पूछ ही लिया कि- तुम जिस गांव में भी जाते हो, वहां कोई न कोई नुकसान हो जाता है? क्‍या तुम मुझे बता सकते हो कि आखिर ऐसा क्‍याें होता है?

महाकाल ने जवाब दिया: पण्डित जी… आप मुझे बडे ज्ञानी मालुम पडे थे, इसीलिए मैं आपके साथ चलने लगा था क्‍योंकि ज्ञानियाें का संग हमेंशा अच्‍छा होता है। लेकिन क्‍या सचमुच आप अभी तक नहीं समझे कि मैं कौन हुँ?

पण्डित ने कहा: मैं समझ तो चुका हुँ, लेकिन कुछ शंका है, सो यदि आप ही अपना उपयुक्‍त परिचय दे दें, तो मेरे लिए आसानी होगी।

महाकल ने जवाब दिया कि- मैं यमदूत हुँ और यमराज की आज्ञा से उन लोगों के प्राण हरण करता हुँ जिनकी आयु पूर्ण हो चुकी है।

हालांकि पण्डित को पहले से ही इसी बात की शंका थी। फिर भी महाकाल के मुंह से ये बात सुनकर पण्डित थोडा घबरा गया लेकिन फिर हिम्‍मत करके पूछा कि- अगर ऐसी बात है और तुम सचमुच ही यमदूत हो, तो बताओ अगली मृत्‍यु किसकी है?

यमदूत ने जवाब दिया कि- अगली मृत्‍यु तुम्‍हारे उसी मित्र की है, जिसे तुम मिलने जा रहे हो और उसकी मृत्‍यु का कारण भी तुम ही होगे।

ये बात सुनकर पण्डित ठिठक गया और बडे पशोपेश में पड गया कि यदि वास्‍तव में वह महाकाल एक यमदूत हुआ तो उसकी बात सही होगी और उसके कारण मेरे बचपन के सबसे घनिष्‍ट मित्र की मृत्‍यु हो जाएगी। इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने मित्र से मिलने ही न जाऊं, कम से कम मैं तो उसकी मृत्‍यु का कारण नहीं बनुंगा। तभी महाकाल ने कहा कि-

तुम जो सोंच रहे हो, वो मुझे भी पता है लेकिन तुम्‍हारे अपने मित्र से मिलने न जाने के विचार से नियति नहीं बदल जाएगी। तुम्‍हारे मित्र की मृत्‍यु निश्चित है और वह अगले कुछ ही क्षणों में घटित होने वाली है।

महाकाल के मुख से ये बात सुनते ही पण्डित को झटका लगा क्‍योंकि महाकाल ने उसके मन की बात जान ली थी जो कि किसी सामान्‍य व्‍यक्ति के लिए तो सम्‍भव ही नहीं थी। फलस्‍वरूप पण्डित को विश्‍वास हो गया कि महाकाल सचमुच यमदूत ही है। इसलिए वह अपने मित्र की मृत्‍यु का कारण न बने इस हेतु वह तुरन्‍त पीछे मुडा और फिर से अपने गांव की तरफ लौटने लगा।

परन्‍तु जैसे ही वह मुडा, सामने से उसे उसका मित्र उसी की ओर तेजी से आता हुआ दिखाई दिया जो कि पण्डित को देखकर अत्‍यधिक प्रसन्‍न लग रहा था। अपने मित्र के आने की गति को देख पण्डित को ऐसा लगा जैसे कि उसका मित्र काफी समय से उसके पीछे-पीछे ही आ रहा था लेकिन क्‍योंकि वह बचपन से ही गूूंगा व एक पैर से अपाहिज था, इसलिए न तो पण्डित तक पहुंच पा रहा था न ही पण्डित को आवाज देकर रोक पा रहा था।

लेकिन जैसे ही वह पण्डित के पास पहुंचा, अचानक न जाने क्‍या हुआ और उसकी मृत्‍यु हो गर्इ। पण्डित हक्‍का-बक्‍का सा आश्‍चर्य भरी नजरों से महाकाल की ओर देखने लगा जैसे कि पूछ रहा हो कि आखिर हुआ क्‍या उसके मित्र को। महाकाल, पण्डित के मन की बात समझ गया और बोला-

तुम्‍हारा मित्र पिछले गांव से ही तुम्‍हारे पीछे-पीछे आ रहा था लेकिन तुम समझ ही सकते हो कि वह अपाहिज व गूंगा होने की वजह से ही तुम तक नहीं पहुंच सका। उसने अपनी सारी ताकत लगाकर तुम तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन बुढापे में बचपन जैसी शक्ति नहीं होती शरीर में, इसलिए हृदयाघात की वजह से तुम्‍हारे मित्र की मृत्‍यु हो गई और उसकी वजह हो तुम क्‍योंकि वह तुमसे मिलने हेतु तुम तक पहुंचने के लिए ही अपनी सीमाओं को लांघते हुए तुम्‍हारे पीछे भाग रहा था।

अब पण्डित को पूरी तरह से विश्‍वास हो गया कि महाकाल सचमुच ही यमदूत है और जीवों के प्राण हरण करना ही उसका काम है। चूंकि पण्डित एक ज्ञानी व्‍यक्ति था और जानता था कि मृत्‍यु पर किसी का कोई बस नहीं चल सकता व सभी को एक न एक दिन मरना ही है, इसलिए उसने जल्‍दी ही अपने आपको सम्‍भाल लिया लेकिन सहसा ही उसके मन में अपनी स्‍वयं की मृत्‍यु के बारे में जानने की उत्‍सुकता हुई। इसलिए उसने महाकाल से पूछा- अगर मृत्‍यु मेरे मित्र की होनी थी, तो तुम शुरू से ही मेरे साथ क्‍यों चल रहे थे?

महाकाल ने जवाब दिया- मैं, तो सभी के साथ चलता हुं और हर क्षण चलता रहता हुं, केवल लोग मुझे पहचान नहीं पाते क्‍योंकि लोगों के पास अपनी समस्‍याओं के अलावा किसी और व्‍यक्ति, वस्‍तु या घटना के संदर्भ में सोंचने या उसे देखने, समझने का समय ही नहीं है।

पण्डित ने आगे पूछा- तो क्‍या तुम बता सकते हो कि मेरी मृत्‍यु कब और कैसे होगी?

महाकाल ने कहा- हालांकि किसी भी सामान्‍य जीव के लिए ये जानना उपयुक्‍त नहीं है, क्‍योंकि कोई भी जीव अपनी मृत्‍यु के संदर्भ में जानकर व्‍यथित ही होता है, लेकिन तुम ज्ञानी व्‍यक्ति हो और अपने मित्र की मृत्‍यु को जितनी आसानी से तुमने स्‍वीकार कर लिया है, उसे देख मुझे ये लगता है कि तुम अपनी मृत्‍यु के बारे में जानकर भी व्‍यथित नहीं होगे। सो, तुम्‍हारी मृत्‍यु आज से ठीक छ: माह बाद आज ही के दिन लेकिन किसी दूसरे राजा के राज्‍य में फांसी लगने से होगी और आश्‍चर्य की बात ये है कि तुम स्‍वयं खुशी से फांसी को स्‍वीकार करोगे। इतना कहकर महाकाल जाने लगा क्‍योंकि अब उसके पास पण्डित के साथ चलते रहने का कोई कारण नहीं था।

पण्डित ने अपने मित्र का यथास्थिति जो भी कर्मकाण्‍ड सम्‍भव था, किया और फिर से अपने गांव लौट आया। लेकिन कोई व्‍यक्ति चाहे जितना भी ज्ञानी क्‍यों न हो, अपनी मृत्‍यु के संदर्भ में जानने के बाद कुछ तो व्‍यथित होता ही है और उस मृत्‍यु से बचने के लिए कुछ न कुछ तो करता ही है सो पण्डित ने भी किया।

चूंकि पण्डित विद्वान था इसलिए उसकी ख्‍याति उसके राज्‍य के राजा तक थी। उसने सोंचा कि राजा के पास तो कई ज्ञानी मंत्राी होते हैं आैर वे उसकी इस मृत्‍यु से सम्‍बंधित समस्‍या का भी कोई न कोई समाधान तो निकाल ही देंगे। इसलिए वह पण्डित राजा के दरबार में पहुंचा और राजा को सारी बात बताई। राजा ने पण्डित की समस्‍या को अपने मंत्रियों के साथ बांटा और उनसे सलाह मांगी।

अन्‍त में सभी की सलाह से ये तय हुआ कि यदि पण्डित की बात सही है, तो जरूर उसकी मृत्‍यु 6 महीने बाद होगी लेकिन मृत्‍यु तब होगी, जबकि वह किसी दूसरे राज्‍य में जाएगा। यदि वह किसी दूसरे राज्‍य जाए ही न, तो मृत्‍यु नहीं होगी। ये सलाह राजा को भी उपयुक्‍त लगी सो उसने पण्डित के लिए महल में ही रहने हेतु उपयुक्‍त व्‍यवस्‍था करवा दी। अब राजा की आज्ञा के बिना कोई भी व्‍यक्ति उस पण्डित से नहीं मिल सकता था लेकिन स्‍वयं पण्डित कहीं भी आ-जा सकता था ताकि उसे ये न लगे कि वह राजा की कैद में है। हालांकि वह स्‍वयं ही डर के मारे कहीं आता-जाता नहीं था।

धीरे-धीरे पण्डित की मृत्‍यु का समय नजदीक आने लगा और आखिर वह दिन भी आ गया, जब पण्डित की मृत्‍यु होनी थी। सो, जिस दिन पण्डित की मृत्‍यु होनी थी, उससे पिछली रात पण्डित डर के मारे जल्‍दी ही सो गया ताकि जल्‍दी से जल्‍दी वह रात और अगला दिन बीत जाए और उसकी मृत्‍यु टल जाए। लेकिन स्‍वयं पण्डित को नींद में चलने की बीमारी थी और इस बीमारी के बारे में वह स्‍वयं भी नहीं जानता था, इसलिए राजा या किसी और से इस बीमारी का जिक्र करने अथवा किसी चिकित्‍सक से इस बीमारी का र्इलाज करवाने का तो प्रश्‍न ही नहीं था।

चूंकि पण्डित अपनी मृत्‍यु को लेकर बहुत चिन्तित था और नींद में चलने की बीमारी का दौरा अक्‍सर तभी पडता है, जब ठीक से नींद नहीं आ रही होती, सो उसी रात पण्डित रात को नींद में चलने का दौरा पडा, वह उठा और राजा के महल से निकलकर अस्‍तबल में आ गया। चूंकि वह राजा का खास मेहमान था, इसलिए किसी भी पहरेदार ने उसे न ताे रोका न किसी तरह की पूछताछ की। अस्‍तबल में पहुंचकर वह सबसे तेज दौडने वाले घोडे पर सवार होकर नींद की बेहोशी में ही राज्‍य की सीमा से बाहर दूसरे राज्‍य की सीमा में चला गया। इतना ही नहीं, वह दूसरे राज्‍य के राजा के महल में पहुंच गया और संयोग हुआ ये कि उस महल में भी किसी पहरेदार ने उसे नहीं रोका न ही कोई पूछताछ की क्‍योंकि सभी लोग रात के अन्तिम प्रहर की गहरी नींद में थे।

वह पण्डित सीधे राजा के शयनकक्ष्‍ा में पहुंच गया। रानी के एक ओर उस राज्‍य का राजा सो रहा था, दूसरी आेर स्‍वयं पण्डित जाकर लेट गया। सुबह हुई, तो राजा ने पण्डित को रानी की बगल में सोया हुआ देखा। राजा बहुत क्रोधित हुआ। पण्डित काे गिरफ्तार कर लिया गया।

पण्डित को तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह आखिर दूसरे राज्‍य में और सीधे ही राजा के शयनकक्ष में कैसे पहुंच गया। लेकिन वहां उसकी सुनने वाला कौन था। राजा ने पण्डित को राजदरबार में हाजिर करने का हुक्‍म दिया। कुछ समय बाद राजा का दरबार लगा, जहां राजा ने पण्डित को देखा और देखते ही इतना क्रोधित हुआ कि पण्डित को फांसी पर चढा दिए जाने का फरमान सुना दिया।

फांसी की सजा सुनकर पण्डित कांप गया। फिर भी हिम्‍मत कर उसने राजा से कहा कि *महाराज मैं नहीं जानता कि मैं इस राज्‍य में कैसे पहुंचा। मैं ये भी नहीं जानता कि मैं आपके शयनकक्ष में कैसे आ गया और आपके राज्‍य के किसी भी पहरेदार ने मुझे रोका क्‍यों नहीं, लेकिन मैं इतना जानता हुं कि आज मेरी मृत्‍यु होनी थी और होने जा रही है।

राजा को ये बात थोडी अटपटी लगी। उसने पूछा- तुम्‍हें कैसे पता कि आज तुम्‍हारी मृत्‍यु होनी थी? कहना क्‍या चाहते हो तुम?

राजा के सवाल के जवाब में पण्डित से पिछले 6 महीनों की पूरी कहानी बता दी और कहा कि- महाराज… मेरा क्‍या, किसी भी सामान्‍य व्‍यक्ति का इतना साहस कैसे हो सकता है कि वह राजा की उपस्थिति में राजा के ही कक्ष में रानी के बगल में सो जाए। ये तो सरासर आत्‍महत्‍या ही होगी और मैं दूसरे राज्‍य से इस राज्‍य में आत्‍महत्‍या करने क्‍यों आऊंगा।

राजा को पण्डित की बात थोडी उपयुक्‍त लगी लेकिन राजा ने सोंचा कि शायद वह पण्डित मृत्‍यु से बचने के लिए ही महाकाल और अपनी मृत्‍यु की भविष्‍यवाणी का बहाना बना रहा है। इसलिए उसने पण्डित से कहा कि – यदि तुम्‍हारी बात सत्‍य है, और आज तुम्‍हारी मृत्‍यु का दिन है, जैसाकि महाकाल ने तुमसे कहा है, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु का कारण मैं नहीं बनुंगा लेकिन यदि तुम झूठ कह रहे हो, तो निश्चित ही आज तुम्‍हारी मृत्‍यु का दिन है।

चूंकि पडौस्‍ाी राज्‍य का राजा उसका मित्र था, इसलिए उसने तुरन्‍त कुछ सिपाहियों के साथ दूसरे राज्‍य के राजा के पास पत्र भेजा और पण्डित की बात की सत्‍यता का प्रमाण मांगा।

शाम तक भेजे गए सैनिक फिर से लौटे और उन्‍होंने आकर बताया कि- महाराज… पण्डित जो कह रहा है, वह सच है। दूसरे राज्‍य के राजा ने पण्डित को अपने महल में ही रहने की सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था दे रखी थी और पिछले 6 महीने से ये पण्डित राजा का मेहमान था। कल रात राजा स्‍वयं इससे अन्तिम बार इसके शयन कक्ष में मिले थे और उसके बाद ये इस राज्‍य में कैसे पहुंच गया, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। इसलिए उस राज्‍य के राजा के अनुसार पण्डित को फांसी की सजा दिया जाना उचित नहीं है।

लेकिन अब राजा के लिए एक नई समस्‍या आ गई। चूंकि उसने बिना पूरी बात जाने ही पण्डित को फांसी की सजा सुना दी थी, इसलिए अब यदि पण्डित को फांसी न दी जाए, तो राजा के कथन का अपमान हो और यदि राजा द्वारा दी गई सजा का मान रखा जाए, तो पण्डित की बेवजह मृत्‍यु हो जाए।

राजा ने अपनी इस समस्‍या का जिक्र अपने अन्‍य मंत्रियों से किया और सभी मंत्रियों ने आपस में चर्चा कर ये सुझाव दिया कि- महाराज… आप पण्डित को कच्‍चे सूत के एक धागे से फांसी लगवा दें। इससे आपके वचन का मान भी रहेगा और सूत के धागे से लगी फांसी से पण्डित की मृत्‍यु भी नहीं होगी, जिससे उसके प्राण भी बच जाऐंगे।

राजा को ये विचार उपयुक्‍त लगा और उसने ऐसा ही आदेश सुनाया। पण्डित के लिए सूत के धागे का फांसी का फन्‍दा बनाया गया और नियमानुसार पण्डित को फांसी पर चढाया जाने लगा। सभी खुश थे कि न तो पण्डित मरेगा न राजा का वचन झूठा पडेगा। पण्डित को भी विश्‍वास था कि सूत के धागे से तो उसकी मृत्‍यु नहीं ही होगी इसलिए वह भी खुशी-खुशी फांसी चढने को तैयार था, जैसाकि महाकाल ने उसे कहा था।

लेकिन जैसे ही पण्डित को फांसी दी गई, सूत का धागा तो टूट गया लेकिन टूटने से पहले उसने अपना काम कर दिया। पण्डित के गले की नस कट चुकी थी उस सूत के धागे से और पण्डित जमीन पर पडा तडप रहा था, हर धडकन के साथ उसके गले से खून की फूहार निकल रही थी और देखते ही देखते कुछ ही क्षणों में पण्डित का शरीर पूरी तरह से शान्‍त हो गया। सभी लोग आश्‍चर्यचकित, हक्‍के-बक्‍के से पण्डित को मरते हुए देखते रहे। किसी को भी विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि एक कमजाेर से सूत के धागे से किसी की मृत्‍यु हो सकती है लेकिन घटना घट चुकी थी, नियति ने अपना काम कर दिया था।

जो होना होता है, वह होकर ही रहता है। हम चाहे जितनी सावधानियां बरतें या चाहे जितने ऊपाय कर लें, लेकिन हर घटना और उस घटना का सारा ताना-बाना पहले से निश्चित है जिसे हम रत्‍ती भर भी इधर-उधर नहीं कर सकते। इसीलिए ईश्‍वर ने हमें भविष्‍य जानने की क्षमता नहीं दी है, ताकि हम अपने जीवन को ज्‍यादा बेहतर तरीके से जी सकें और यही बात उस पण्डित पर भी लागु होती है। यदि पण्डित ने महाकाल से अपनी मृत्‍यु के बारे में न पूछा होता, तो अगले 6 महीने तक वह राजा के महल में कैद होकर हर रोज डर-डर कर जीने की बजाय ज्‍यादा बेहतर जिन्‍दगी जीता।

प्रकृति ने जो भी कुछ बनाया है और उसे जैसा बनाया है, वह सबकुछ किसी न किसी कारण से वैसा है और उसके वैसा होने पर सवाल उठाना गलत है क्‍योंकि हर व्‍यक्ति, वस्‍तु या स्थिति का सम्‍बंध किसी न किसी घटना से है, जिसे घटित होना है।

उदाहरण के लिए पण्डित की मृत्‍यु का सम्‍बंध उसके मित्र से था क्‍योंकि यदि वह उसके मित्र से मिलने न जा रहा होता, तो उसे रास्‍ते में महाकाल न मिलता और पण्डित उससे अपनी मृत्‍यु से सम्‍बंधित सवाल न पूछता। जबकि यदि पण्डित अपने मित्र से मिलने न जाता और पण्डित का मित्र बचपन से ही गूंगा व अपाहिज न होता, तो उसकी मृत्‍यु न होती क्‍योंकि उस स्थिति में वह अपने मित्र को पीछे से आवाज देकर रोक सकता था। यानी बपचन से प्रकृति ने उसे जो अपंगता दी थी, उसका सम्‍बंध उसकी मृत्‍यु से था।

इसी तरह से पण्डित को नींद में चलने की बीमारी है, इस बात का पता यदि स्‍वयं पण्डित को पहले से होता, तो वह इस बात का जिक्र राजा से जरूर करता, परिणामस्‍वरूप वह राजा के महल से निकलता तो कोई न कोई पहरेदार उसे जरूर रोक लेता अथवा राजा ने कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था जरूर की होती, ताकि पण्डित नींद में उठकर कहीं न जा सके।

*यानी हर घटना के घटित होने के लिए प्रकृति पहले से ही सारे बीज बो देती है जो अपने निश्चित समय पर अंकुरित होकर उस घटना के घटित होने में अपना योगदान देते हैं। इसलिए प्रकृति से लडने का कोई मतलब नहीं है क्‍योंकि हमें नहीं पता कि किस घटना के घटित होने के लिए कौन-कौन से कारण होंगे और उन कारणों से सम्‍बंधित बीज कब, कहां और कैसे बोए गए हैं और इसी को हम सरल शब्‍दों में भाग्‍य कहते हैं।
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

देव शर्मा

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Gyaan Ki Ganga
बहुत ही हृदय विदारक कथा है अवश्य पढ़ें
.
एक बूँद ..जो सागर का अंश थी ! एक बार हवा के संग बादलों तक पहुँच गई। इतनी ऊँचाई पाकर उसे
बड़ा अच्छा लगा। अब उसे सागर के आँचल में कितने ही दोष नज़र आने लगे।
.
लेकिन अचानक ..एक दिन
बादल ने उसे ज़मीन पर एक गंदे नाले मेँ पटक दिया।
.
एकाएक उसके सारे सपने, सारे अरमां चकनाचूर हो गए।
ये एक बार नहीं अनेकों बार हुआ। वो बारिश बन नीचे आती, फिर सूर्य की किरणें उसे बादल तक पहुँचा देतीं।
अब उसे अपने सागर की बहुत याद आने लगी..!
.
उससे मिलने को वो बेचैन हो गई; बहुत तड़पी, बहुत तड़पी…
फिर.. एक दिन सौभाग्यवश एक नदी के आँचल में जा गिरी। उस नदी ने
अपनी बहती रहनुमाई में उसे सागर तक पहुँचा दिया।
.
सागर को सामने देख बूँद बोली –
हे मेरे पनाहगार सागर ! मैं शर्मसार हूँ। अपने किये कि सज़ा भोग चुकी हूँ। आपसे बिछुड़ कर मैं एक पल भी शांत ना रह पाई। दिन-रैन दर्द भरे आँसू बहाए हैं; अब इतनी प्रार्थना है कि आप मुझे अपने पवित्र आँचल मेँ
समेट लो !
.
सागर बोला – बूँद ! तुझे पता है तेरे बिन मैं कितना तड़पा हूँ ! तुझे तो दुःख सहकर एहसास हुआ।
लेकिन मैं… मैं तो उसी वक़्त से तड़प रहा हूँ जब तूने पहली बार हवा का संग किया था। तभी से तेरा इंतज़ार कर रहा हूँ… और जानती है उस
नदी को मैँने ही तेरे पास भेजा था। अब आ ! आजा मेरे आँचल मेँ !
बूँद आगे बढ़ी और सागर में समा गई । बूँद सागर बन गई।
.
ये बूँद कोई और नहीं; हम सब ही वो बूँदेँ हैँ, जो अपने आधारभूत सागर उस परमात्मा से बिछुड़ गई हैं।
इसलिए ना जाने कितने जन्मों से भटक रहे हैं… और वो ईश्वर ना जाने कब से हमसे मिलने को तड़प रहा हूँ
.
उस सागर की बूँद की तरह महासागर रूपी परम पिता परमात्मा जी से मिलने के लिए हम सबको हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामंत्र का जाप करते रहना चाहिये
.
इस कलियुगी भवसागर से पर उतरने श्री भग्वद् प्राप्ति के लिए श्री भगवानश्रीकृष्ण जी द्वारा दिया यह महामंत्र की जाप अवश्य करते रहें…shree radhe. .

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#ऐतबार…एक सच्ची कहानी

वह एक गरीब लड़की थी। उसके पिता किसी दुकान पर मजदूरी करते थे और मां घरों में चौका बरतन। वह अपने मां-बाप की इकलौती लड़की थी, इसलिए उन्होंने उसे बड़े लाड प्यार से पाला था। वे चाहते थे कि वह पढ़ लिख करबड़ी आदमी बने, जिससे उसे गरीबी में दिन न गुजारने पड़ें।जब उसने गांव के स्कूल से 10वीं का इक्ज़ाम पास किया, तो बहुत खुश हुई।

मां-बात ने किसी तरह पैसोें का जुगाड़ करके गांव से 8 किमी0 दूर के कस्बे में उसका इंटर कॉलेज में नाम लिखा दिया। वह साइकिल से स्कूल जाने लगी। इस तरह से उसकी जिंदगी आगे बढ़ने लगी।लेकिन एक दिन उसकी जिंदगी में एक नया मोड़ आया। स्कूल से निकलते वक्त एक लड़का बाइक लेकर उसके पास आया और धीरे से बोला- अगर आप बुरा न मानेंतो मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं।लड़की उस लड़के को अक्सर रास्ते में देखा करती थी। जब भी वह स्कूल आती और स्कूल से जाती, वह लड़का सडक के किनारे खड़ा उसे निहारा करता।

पहले शुरू में तो उसे यह सब अच्छा नहीं लगा, लेकिन धीरे-धीरे वह भी उसे अच्छा लगने लगा था। इसलिए जब उस लड़के ने कहने की अनुमति मांगी, तो उसने धीरे से सिर हिलाकर अनुमति दे दी।उस लड़के ने अपनी शर्ट की जेब से एक गुलाब की कली निकाल कर उसके हाथ में रख दी और उसकी मुटठी बंद करते हुए बोला- ”मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं। उठते-बैठते, सोते जगते हर समय बस तुम्हारे बारे में सोचा करता हूं। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है….”लड़का और भी बहुत कुछ कहना चाहता था, पर लड़की ने धीरे से उसके होठों पर अपना हाथ रख कर उसके प्यार का इकरार कर लिया। इस तरह उन दोनों में बात-चीत की शुरूआत हो गयी।

लड़का रोज उसके लिए कोई न कोई गिफ्ट लाता और उसके लिए जीने मरने की कसमें खाता। उसकी बातें सुनकर लड़की दीवानी हो जाती और ख्वाबों की दुनिया में खो जाती।एक दिन वह लड़का उस लड़की को अपनी बाइक पर घुमाने ले गया। दोनों लोग नदी के किनारे पहुंचें और घास पर बैठ कर बातें करने लगे। लेकिन लड़के की मंशा तो कुछ और थी। लेकिन प्यार में अंधी हो चुकी वह लड़की उसकी मंशा समझ नहीं पाई और उसने अपने आप को लड़के के हवाले कर दिया। दोनों लोग एक दूसरे के प्यार में ऐसे खोए कि दो जिस्म एक जान हो गये।

लेकिन न जाने कहां से वहां पर तीन लड़के आ गये। उन्हें देखकर लड़की हक्का-बक्का रह गयी और अपने कपड़े सही करने लगी। यह देख कर एक लड़का उसका हाथ पकड़ता हुआ बोला- इतनी भी क्या जल्दी है मेरी रानी, हम भी तो तुम्हारे दिवाने हैं। थोड़ा हमारा भी तो मनोरंजन कर दो।लडकी ने अपने प्रेमी से मदद मांगी। मगर वह यह सब देखकर हंसता रहा। यह देख कर लड़की का हृदय धक्क से रह गया। यानी कि यह सब इसकी चाल थी?आगे लड़की कुछ सोच ही नहीं पाई। क्योंकि वे तीनों लड़के उसके शरीर पर भूखे भेडिए की तरह टूट पड़े और अपनी हवस की आग बुझाते रहे।

वह लड़की मदद के लिए चिल्लाती रही और वे उसे नोचते-घसोटते चले।लगभग एक घंटे के बाद लड़की को होश आया, तो उसने अपने आपको नंग-धडंग पाया। वे तीनों लड़के और उसका प्रेमी वहां से जा चुके थे। लड़की की आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था। उसकी दुनिया अंधेरे से भर चुकी थी। उसे अपना जीवन समाप्त होता हुआ लग रहा था।वह सोचती रही कि क्यों उसने उस बेवफा लड़के की बातों पर ऐतबार किया। क्यों मैं उसके साथ यहां पर आई। अब मैं क्या मुंह लेकर अपने घर जाऊंगी। अपने मां-बाप को क्या बताऊंगी।

मेरा ये हाल देखकर वे तो जीतेजी मर जाएंगे।लड़की का गला बुरी तरह से सूख रहा था। वह किस तरह घिसटती हुई नदी के किनारे पहुंची। नदी का पानी कल-कल करता हुआ तेजी से बह रहा था। लड़की ने एक बार फिर अपने मजबूर मां-बाप, अपने बेवफा प्रेमी के बारे में सोचाऔर फिर नदी में छलांग लगा दी।अगले ही पल वह नदी में डूबने उतराने लगी। लेकिन अब न तो वह किसी को अपनी जान बचाने के लिए पुकार रही थी और न ही बचने के लिए संघर्ष कर रहीथी। उसका मन ठहरे हुए जल की शांत था। वह भी अपने बेवफा प्रेमी के बारे में सोच रही थी कि क्यों उसने उसकी बातों पर इस तरह से ऐतबार कर लिया, क्यों मैंने उससे अंधा प्यार किया, क्यों मैंने उसके प्यार को जरूरत नहीं समझी? अगर मैं ऐसा कर पाती, तो शायद….. और फिर वह नदी की गहराई में डूबती चली गयी।

दोस्तो किसी से प्यार करना, किसी पर ऐतबार करना बुरा नहीं है, लेकिन जज्बातों को पहचानने की क्षमता भी रखिए। किसी को अपना तन-मन सौंपने सेपहले उसके परिणामों के बारे में भी जरूर सोचिए। नहीं तो आप भी धोखा खा सकते हैं, आप भी ठगे जा सकते हैं।आपको यह कहानी कैसी लगी, हमें जरुर बताएं। और इसे शेयर करके अपने दोस्तों तक भी पहुंचाए। हो सकता है कि आपके इस प्रयास से किसी का जीवन संवर जाए।
संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

घर को औरत ही घढ़ती है जरा गोर से पढ़ना

एक गांव में एक जमींदार था। उसके कई नौकरों में जग्गू भी था। गांव से लगी बस्ती में, बाकी मजदूरों के साथ जग्गू भी अपने पांच लड़कों के साथ रहता था। जग्गू की पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। एक झोंपड़े में वह बच्चों को पाल रहा था। बच्चे बड़े होते गये और जमींदार के घर
नौकरी में लगते गये।
सब मजदूरों को शाम को मजूरी मिलती। जग्गू और उसके लड़के चना और गुड़ लेते थे। चना भून कर गुड़ के साथ खा लेते थे।
बस्ती वालों ने जग्गू को बड़े लड़के की शादी कर देने की सलाह दी।
उसकी शादी हो गई और कुछ दिन बाद गौना भी आ गया। उस दिन जग्गू की झोंपड़ी के सामने बड़ी बमचक मची। बहुत लोग इकठ्ठा हुये नई बहू देखने को। फिर धीरे धीरे भीड़ छंटी। आदमी काम पर चले गये। औरतें अपने अपने घर। जाते जाते एक बुढ़िया बहू से कहती गई – पास ही घर है। किसी चीज की जरूरत हो तो संकोच मत करना, आ जाना लेने। सबके जाने के बाद बहू ने घूंघट उठा कर अपनी ससुराल को देखा तो उसका कलेजा मुंह को आ गया।जर्जर सी झोंपड़ी, खूंटी पर टंगी कुछ पोटलियां और झोंपड़ी के बाहर बने छः चूल्हे (जग्गू और उसके सभी बच्चे अलग अलग चना भूनते थे)। बहू का मन हुआ कि उठे और सरपट अपने गांव भाग चले। पर अचानक उसे सोच कर धचका लगा– वहां कौन से नूर गड़े हैं। मां है नहीं। भाई भौजाई के राज में नौकरानी जैसी जिंदगी ही तो गुजारनी होगी। यह सोचते हुये वह बुक्का फाड़ रोने लगी। रोते-रोते थक कर शान्त हुई। मन में कुछ सोचा। पड़ोसन के घर जा कर पूछा –
अम्मां एक झाड़ू मिलेगा? बुढ़िया अम्मा ने झाड़ू, गोबर और मिट्टी दी।साथ मेंअपनी पोती को भेज दिया।वापस आ कर बहू ने
एक चूल्हा छोड़ बाकी फोड़ दिये।सफाई कर गोबर-मिट्टी से झोंपड़ीऔर दुआर लीपा।फिर उसने सभी पोटलियों के चने
एक साथ किये और अम्मा के घर जा कर चना पीसा।अम्मा ने उसे सागऔर चटनी भी दी। वापस आ कर बहू ने चने के आटे की रोटियां बनाई और इन्तजार करने लगी।जग्गू और उसके लड़के जब लौटे तो एक ही चूल्हा देख भड़क गये।चिल्लाने
लगे कि इसने तो आते ही सत्यानाश कर दिया। अपने आदमी का छोड़ बाकी सब का चूल्हा फोड़ दिया। झगड़े की आवाज सुन बहू झोंपड़ी से निकली। बोली –आप लोग हाथ मुंह धो कर बैठिये, मैं खाना
निकालती हूं। सब अचकचा गये! हाथ मुंह धो कर बैठे। बहू ने पत्तल पर खाना परोसा – रोटी, साग, चटनी। मुद्दत बाद उन्हें ऐसा खाना मिला था। खा कर अपनी अपनी कथरी ले वे सोने चले गये।
सुबह काम पर जाते समय बहू ने उन्हें एक एक रोटी और गुड़ दिया।चलते समय जग्गू से उसने पूछा – बाबूजी, मालिक आप लोगों को चना और गुड़ ही देता है क्या? जग्गू ने बताया कि मिलता तो सभी अन्न है पर वे चना-गुड़ ही लेते हैं।आसान रहता है खाने में। बहू ने समझाया कि सब
अलग अलग प्रकार का अनाज लिया करें। देवर ने बताया कि उसका काम लकड़ी चीरना है। बहू ने उसे घर के ईंधन के लिये भी कुछ लकड़ी लाने को कहा।बहू सब की मजदूरी के अनाज से एक- एक मुठ्ठी अन्न अलग रखती। उससे बनिये की दुकान से बाकी जरूरत की चीजें लाती। जग्गू की गृहस्थी धड़ल्ले से चल पड़ी। एक दिन सभी भाइयों और बाप ने तालाब की मिट्टी से झोंपड़ी के आगे बाड़ बनाया। बहू के गुण गांव में चर्चित होने लगे।जमींदार तक यह बात पंहुची। वह कभी कभी बस्ती में आया करता था।
आज वह जग्गू के घर उसकी बहू को आशीर्वाद देने आया। बहू ने पैर छू
प्रणाम किया तो जमींदार ने उसे एक हार दिया। हार माथे से लगा बहू ने कहा कि मालिक यह हमारे किस काम आयेगा। इससे अच्छा होता कि मालिक हमें चार लाठी जमीन दिये होते झोंपड़ी के दायें – बायें,तो एक कोठरी बन जाती। बहू की चतुराई पर जमींदार हंस पड़ा। बोला –
ठीक, जमीन तो जग्गू को मिलेगी ही। यह हार तो तुम्हारा हुआ। –औरत चाहे घर को स्वर्ग बना दे, चाहे नर्क! मुझे लगता है कि देश, समाज, और
घर को औरत ही गढ़त।
संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏जय श्री लक्ष्मी नारायण जी की🙏

एक बार भगवान नारायण लक्ष्मी जी से बोले, “लोगो में कितनी भक्ति बढ़ गयी है …. सब “नारायण नारायण” करते हैं !”
..
तो लक्ष्मी जी बोली, “आप को पाने के लिए नहीं!, मुझे पाने के लिए भक्ति बढ़ गयी है!”
..
तो भगवान बोले, “लोग “लक्ष्मी लक्ष्मी” ऐसा जाप थोड़े ही ना करते हैं !”
..
तो माता लक्ष्मी बोली
कि , “विश्वास ना हो तो परीक्षा हो जाए!”
..भगवान नारायण एक गाँव में ब्राह्मण का रूप लेकर गए…एक घर का दरवाजा खटखटाया…घर के यजमान ने दरवाजा खोल कर पूछा , “कहाँ के है ?”
तो …भगवान बोले, “हम तुम्हारे नगर में भगवान का कथा-कीर्तन करना चाहते है…”
..
यजमान बोला, “ठीक है महाराज, जब तक कथा होगी आप मेरे घर में रहना…”

गाँव के कुछ लोग इकट्ठा हो गये और सब तैयारी कर दी….पहले दिन कुछ लोग आये…अब भगवान स्वयं कथा कर रहे थे तो संगत बढ़ी ! दूसरे और तीसरे दिन और भी भीड़ हो गयी….भगवान खुश हो गए..की कितनी भक्ति है लोगो में….!
लक्ष्मी माता ने सोचा अब देखा जाये कि क्या चल रहा है।
..
लक्ष्मी माता ने बुढ्ढी माता का रूप लिया….और उस नगर में पहुंची…. एक महिला ताला बंद कर के कथा में जा रही थी कि माता उसके द्वार पर पहुंची ! बोली, “बेटी ज़रा पानी पिला दे!”
तो वो महिला बोली,”माताजी ,
साढ़े 3 बजे है…मेरे को प्रवचन में जाना है!”
..
लक्ष्मी माता बोली..”पिला दे बेटी थोडा पानी…बहुत प्यास लगी है..”
तो वो महिला लौटा भर के पानी लायी….माता ने पानी पिया और लौटा वापिस लौटाया तो सोने का हो गया था!!
..
यह देख कर महिला अचंभित हो गयी कि लौटा दिया था तो स्टील का और वापस लिया तो
सोने का ! कैसी चमत्कारिक माता जी हैं !..अब तो वो महिला हाथ-जोड़ कर कहने लगी कि, “माताजी आप को भूख भी लगी होगी ..खाना खा लीजिये..!” ये सोचा कि खाना खाएगी तो थाली, कटोरी, चम्मच, गिलास आदि भी सोने के हो जायेंगे।
माता लक्ष्मी बोली, “तुम जाओ बेटी, तुम्हारा प्रवचन का टाइम हो गया!”
..
वह महिला प्रवचन में आई तो सही …
लेकिन आस-पास की महिलाओं को सारी बात बतायी….
..
अब महिलायें यह बात सुनकर चालू सत्संग में से उठ कर चली गयी !!
अगले दिन से कथा में लोगों की संख्या कम हो गयी….तो भगवान ने पूछा कि, “लोगो की संख्या कैसे कम हो गयी ?”
….
किसी ने कहा, ‘एक चमत्कारिक माताजी आई हैं नगर में… जिस के घर दूध पीती हैं तो गिलास सोने का हो जाता है,…. थाली में रोटी सब्जी खाती हैं तो थाली सोने की हो जाती है !… उस के कारण लोग प्रवचन में नहीं आते..”
..
भगवान नारायण समझ गए कि लक्ष्मी जी का आगमन हो चुका है!
इतनी बात सुनते ही देखा कि जो यजमान सेठ जी थे, वो भी उठ खड़े हो गए….. खिसक गए!
..
पहुंचे माता लक्ष्मी जी के पास ! बोले, “ माता, मैं तो भगवान की कथा का आयोजन कर रहा था और आप ने मेरे घर को ही छोड़ दिया !”
माता लक्ष्मी बोली, “तुम्हारे घर तो मैं सब से पहले आनेवाली थी ! लेकिन तुमने अपने घर में जिस कथा कार को ठहराया है ना , वो चला जाए तभी तो मैं आऊं !”
सेठ जी बोले, “बस इतनी सी बात !…
अभी उनको धर्मशाला में कमरा दिलवा देता हूँ !”
..
जैसे ही महाराज (भगवान्) कथा कर के घर आये तो सेठ जी बोले, “

महाराज आप अपना बिस्तर बांधो ! आपकी व्यवस्था अबसे धर्मशाला में कर दी है !!”
महाराज बोले, “ अभी तो 2/3 दिन बचे है कथा के…..यहीं रहने दो”
सेठ बोले, “नहीं नहीं, जल्दी जाओ ! मैं कुछ नहीं सुनने वाला ! किसी और मेहमान को ठहराना है। ”
..
इतने में लक्ष्मी जी आई , कहा कि, “सेठ जी , आप थोड़ा बाहर जाओ… मैं इन से निबट लूँ!”
माता लक्ष्मी जी भगवान् से बोली, “

प्रभु , अब तो मान गए?”
भगवान नारायण बोले, “हां लक्ष्मी तुम्हारा प्रभाव तो है, लेकिन एक बात तुम को भी मेरी माननी पड़ेगी कि तुम तब आई, जब संत के रूप में मैं यहाँ आया!!
संत जहां कथा करेंगे वहाँ लक्ष्मी तुम्हारा निवास जरुर होगा…!!”
यह कह कर नारायण भगवान् ने वहां से बैकुंठ के लिए विदाई ली। अब प्रभु के जाने के बाद अगले दिन सेठ के घर सभी गाँव वालों की भीड़ हो गयी। सभी चाहते थे कि यह माता सभी के घरों में बारी 2 आये। पर यह क्या ? लक्ष्मी माता ने सेठ और बाकी सभी गाँव वालों को कहा कि, अब मैं भी जा रही हूँ। सभी कहने लगे कि, माता, ऐसा क्यों, क्या हमसे कोई भूल हुई है ? माता ने कहा, मैं वही रहती हूँ जहाँ नारायण का वास होता है। आपने नारायण को तो निकाल दिया, फिर मैं कैसे रह सकती हूँ ?’ और वे चली गयी।
शिक्षा : जो लोग केवल माता लक्ष्मी को पूजते हैं, वे भगवान् नारायण से दूर हो जाते हैं। अगर हम नारायण की पूजा करें तो लक्ष्मी तो वैसे ही पीछे 2 आ जाएँगी, क्योंकि वो उनके बिना रह ही नही सकती ।
जहाँ परमात्मा की याद ह , वहाँ लक्ष्मी का वास होता है।
केवल लक्ष्मी के पीछे भागने वालों को न माया मिलती ना ही राम।

” लक्ष्मी नारायण नारायण हरि हरि ”

संजय गुप्ता

Posted in कहावतें और मुहावरे

કહેવતો અને ઉક્તિઓની રસપ્રદ વાતો


કહેવતો અને ઉક્તિઓની રસપ્રદ વાતો

મહાસાગરમાં ડૂબકી દેનારા મરજીવાની મુઠ્ઠીઓ શંખ, છીપલાં, કોડીઓ અને મુલ્યવાન મોતીડાંથી ભરાઈ જાય છે એમ લોકસાગરની લ્હેરોની સેલગાહ કરતો કોઈ સંશોધક મરજીવો કોઠાસૂઝવાળા ‘લોક’-ના હૈયાકપાટ કને પહોંચીને એને ઉઘડાવી શકે તો લોકસંસ્કૃતિ, લોકવિધા, લોકવાડ્‌મયની અપાર સમૃદ્ધિ હાથ લાગે છે. પોરસીલો કણબી જેમ ખાતર-પાણીવાળા ખેતરમાંથી મબલખ મૉલ લણે છે એમ સૂઝવાળો સંશોધક લોકવાણીમાં ફરતાં- તરતાં લોકગીતો, લોકકથાઓ, કહેવતો, જોડકણાં, દુહા, ઉખાણાં, ડીગ, ઉક્તિઓ, હડૂલા રામવળા, કૃષ્ણવાતા, પાંચકડા, ખાંયણાં, મરશિયા, રાજિયા, છાજિયા, ઉક્તિઓ વગેરેની અપાર કંઠસ્થ સામગ્રી પ્રાપ્ત કરી શકે છે.
લોકરંગનું મેઘધનુષ પ્રગટાવનારા અન્ય પ્રકારોની વાત ફરી કોઈ વાર, પણ આજે તો લોકવાણી ને ઘરેણા જેવી કહેવતો, ઉક્તિઓ અને દુહાની દુનિયામાં ‘ત્રણ’ વસ્તુઓ વડે ઉપદેશ- બોધ આપવામાં આવ્યો હોય એવી દુહાની લોકવાણીની અનોખી ડાબલી ઉઘાડવી છે. ગામડાં ભાંગીને ફાટફાટ થતાં શહેરોમાં ડોનેશનવાળા ‘ભણતર’ની બોલબાલા છે પણ ‘ગણતર’ની સંસ્કૃતિની, સંસ્કારની તો કોઈ વાત જ કરતું નથી; ત્યારે આ ‘ગામડિયા ગણતર’ની વાત માંડવી છે. એક કાળે આપણા વિદ્વાનો જેની ગમાર ગામડિયાના ગાણાં તરીકે ઉપેક્ષા કરતા, નાકનું ટીચકું ચડાવતા કે મોં મરડતા એ ‘ગણતર’ દ્વારા લોકસમાજનું ઘડતર થતું, જીવનને વ્યવહારજ્ઞાનથી તરબતર કરતું, એને સંસ્કાર સમૃદ્ધ બનાવતું. આ ઉખાણાં, કહેવતો, ઉક્તિઓ એ શબ્દાળુ સસ્તી રમત જ નહોતી પણ આપણી સાંસ્કૃતિક વિરાસત પણ હતી.
જીવનભર ગુજરાતની ભવાઈને જીવાડવા સંઘર્ષ કરી ૯૨ વર્ષની જૈફ વયે અમદાવાદમાં જીવનનો થાક ઉતારનારા કવિ, કલાકાર અને સંગીતકાર પાંચોટના શ્રી વિઠ્ઠલદાસ પાંચોટિયાએ એકવાર જૂની ભવાઈના વેશોની વાત કરતાં કઈ ‘ત્રણ’ વસ્તુ અલેખે જાય છે તેની રસપ્રદ માંડણી કરી હતી. આજે તેઓ હયાત નથી પણ મારા ચોપડાનું ટાંચણ બોલે છે ઃ
રોતલ રખવાળાં કરે, ભેંસ માંદળે નહાય;
નકટી આભૂષણ ધરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
*
દંભીજન ટીલાં કરે, હલક હામી થાય;
મેલો મંતર ભણે, એ ત્રણે એલેખે જાય.
*
માનુનિ મહિયર વસે, પરનારીનો પ્રેમ;
વેશ્યા વિઠ્ઠલને ભજે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
*
રખડેલ રખવાળી કરે, વ્યંઢળ કરે વિવાહ;
ભોગી જોગી વેશ ધરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
*
સમુદ્રમાં વર્ષા પડે, રણમાં રોપે રોપ;
સ્વપ્નમાં સોનું મળે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
*
અંધ ખરીદે આરસી, બહેરો વખાણે બોધ;
લલના લૂલી નાચ કરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
*
ભાવ વગર ભોજન કરે, પાત્ર વિનાનું દાન;
શ્રદ્ધાહીણ જે શ્રાદ્ધ કરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
*
તકરારીને વખત મળે, ઢાઢી કરે વખાણ;
ગરજવાન ગુસ્સો કરે, એ ત્રણે અલેખે જાય.
*
મુરખથી મસલત કરે, બીકણનો સંગાથ;
શત્રુ સાથે સરળતા, એ ત્રણે અલેખે જાય.
*
લોકવાણીમાંથી ફાંટુની ફાંટું બંધાય એટલી ઉક્તિઓ મળે છે. તેમાંથી ‘ત્રણ’ વાળી ઉક્તિઓની અહીં થોડી વાત કરીએ. સાચુકલું ભણતર- જ્ઞાન ‘અભણ’ માનવીઓ ‘લોક’ પાસેથી આપણને સાંપડે છે.
દેવ દરિયો ને દરબાર એ ત્રણ વિના પૈસો નહીં.
આધિ વ્યાધિ ને ઉપાધિ એ ત્રણ વિના દુખ નહીં.
જ્ઞાન, ભક્તિ ને વૈરાગ્ય એ ત્રણ વિના શાંતિ નહીં.
ઉત્ત્પત્તિ, સ્થિતિ અને પ્રલય એ ત્રણ વિના જગતના ખેલ નહીં.
*
સેગ, સરિયો ને પોપટો એ ત્રણ વિના ધાન્ય નહીં.
વા, ઘા ને ગહરકો એ ત્રણ વિના વાજું નહીં.
અણી, ધાર ને ધબાકો એ ત્રણ વિના હથિયાર નહીં.
ચાવવું, ચૂસવું નેસબડકો એ ત્રણ વિના ખાવાનું નહીં.
*
તાવ, તામસ ને તલાટી એ ત્રણ ગયા વિના સારા નહીં
વા’ણ, વિવાહ ને વરસાદ એ ત્રણ આવ્યા વિના સારા નહીં
ખંત, મહેનત ને બુદ્ધિ એ ત્રણ વિના વિધા નહીં.
જૂઠ, કરજ ને કપટ એ ત્રણ વિના દુઃખ નહીં.
*
બ્રહ્મા, વિષ્ણુ ને મહેશ એ ત્રણ વિના દેવ નહીં
વાત, પિત્ત ને કફ એ ત્રણ વિના રોગ નહીં
આદિ મધ્ય ને અંત એ ત્રણ વિના નાડી નહીં
જય, સમાધાની ને નાશ એ ત્રણ વિના અવધિ નહીં.
*
ગીધ, ગધેડો ને ઘૂવડ એ ત્રણ વિના અપશુકન નહીં
સ્વપ્ન, ચિત્ર ને સાક્ષાત્‌ એ ત્રણ વિના દર્શન નહીં
રજો, તમો અને સતો એ ત્રણ વિના ગુણ નહીં.
રાગ નાચ ને પૈસો એ ત્રણ વિના ગરજ નહીં.
*
ભૂત ભવિષ્ય અને વર્તમાન એ ત્રણ વિના કાળ નહીં
કુંવારી, સધવા ને વિધવા એ ત્રણ વિના સ્ત્રી નહીં.
સંતતિ, ક્રિયમાણ ને પ્રારબ્ધ એ ત્રણ વિના ક્રિયા નહીં
શ્વાસ, જ્ઞાન કે કામ એ ત્રણ જીવના આધાર વિના નહીં.
*
સુખ, જિંદગી ને માન એ ત્રણ વિના સંતોષ નહીં.
જર, જોરૂ ને જમીન એ ત્રણ વિના વઢવાડ નહીં.
અક્કલ, અમલ અને ડોળદમામ એ ત્રણ વિના કારભારુ નહીં.
વાચવું, લખવું ને શીખવું એ ત્રણ વિના બુદ્ધિના હથિયાર નહીં.
*
આળસ, રોગ ને સ્ત્રીની સેવા એ ત્રણ વિના મોટાઈ જાય નહીં.
કરજ, અગ્નિ ને રોગ એ ત્રણ વિના ખરાબી નહીં.
પૂછવું, જોવું ને દવા દેવી એ ત્રણ વિના વૈધું નહીં.
ક્રૂરતા, કૃપણતા ને કૃતજ્ઞતા એ ત્રણ વિના મોટું કષ્ટ નહીં.
*
માલ, ખજાનો ને જિંદગી એ ત્રણે રહેવાના નહીં.
અક્કલ, યકીન અને પ્રભુતા એ ત્રણ પૂરતા હોય નહીં.
વિધા, કળા ને ધન એ ત્રણ સ્વેદ વિના મળવાના નહીં
દુઃખ, દરિદ્રતા ને પરઘેર રહેવું એ ત્રણ વિના મોટું દુઃખ નહીં.
*
પાન, પટેલ ને પ્રધાન ત્રણ કાચા સારા નહીં.
નાર, ચાર ને ચાકરૂ એ ત્રણ પાકા સારા નહીં.
ડોશી, જોષી ને વટેમાર્ગુ એ ત્રણ વિના ફોગટિયા નહીં.
વૈધ, વેશ્યા ને વકીલ એ ત્રણ વિના રોકડિયા નહીં.
*
ઘંટી, ઘાણી ને ઉઘરાણી એ ત્રણ ફેરા ખાધા વિના પાકે નહીં.
દુર્ગુણ, સદગુણ ને વખત એ ત્રણ સ્થિર રહેવાના નહીં.
વિધા, હોશિયારી ને અક્કલ એ ત્રણ આળસુ પાસે જાય નહીં.
દેવનું વચન, વિધા ને ધરમ એ ત્રણ દરિદ્રી પાસે રહે નહીં.
લોકજીવનનાં મોતી – જોરાવરસિંહ જાદવ