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गणेश प्रश्नावली


श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्रजानिए इस चमत्कारिक यंत्र से अपनी समस्याओं का समाधान
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हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में कई तरह के यंत्रों के बारे में बताया गया है जैसे हनुमान प्रश्नावली चक्र, नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र, राम श्लोकी प्रश्नावली, श्रीगणेश प्रश्नावली चक्र आदि। इन यंत्रों की सहायता से हम अपने मन में उठ रहे सवाल, हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों आदि का समाधान पा सकते है। इन्ही में से एक श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के बारे में हम आज आपको बता रहे है।

हिंदू धर्म में भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य माना गया है अर्थात सभी मांगलिक कार्यों में सबसे पहले श्रीगणेश की ही पूजा की जाती है। श्रीगणेश की पूजा के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के माध्यम से आप अपने जीवन की परेशानियों व सवालों का हल आसानी से पा सकते हैं। यह बहुत ही चमत्कारी यंत्र है।

उपयोग विधि
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जिसे भी अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना है वो पहले पांच बार ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ गं गणपतयै नम: मंत्र का जप करें। इसके बाद आंखें बंद करके अपना सवाल पूछें और भगवान श्रीगणेश का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक(खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक के फलादेश को ही अपने अपने प्रश्न का उत्तर समझें।

1- आप जब भी समय मिले राम नाम का जप करें। आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।

2- आप जो कार्य करना चाह रहे हैं, उसमें हानि होने की संभावना है। कोई दूसरा कार्य करने के बारे में विचार करें। गाय को चारा खिलाएं।

3- आपकी चिंता दूर होने का समय आ गया है। कष्ट मिटेंगे और सफलता मिलेगी। आप रोज पीपल की पूजा करें।

4- आपको लाभ प्राप्त होगा। परिवार में वृद्धि होगी। सुख संपत्ति प्राप्त होने के योग भी बन रहे हैं। आप कुल देवता की पूजा करें।

5- आप शनिदेव की आराधना करें। व्यापारिक यात्रा पर जाना पड़े तो घबराएं नहीं। लाभ ही होगा।

6- रोज सुबह भगवान श्रीगणेश की पूजा करें। महीने के अंत तक आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी।

7- पैसों की तंगी शीघ्र ही दूर होगी। परिवार में वृद्धि होगी। स्त्री से धन प्राप्त होगा।

8- आपको धन और संतान दोनों की प्राप्ति के योग बन रहे हैं। शनिवार को शनिदेव की पूजा करने से आपको लाभ होगा।

9- आपकी ग्रह दिशा अनुकूल चल रही है। जो वस्तु आपसे दूर चली गई है वह पुन: प्राप्त होगी।

10- शीघ्र ही आपको कोई प्रसन्नता का समाचार मिलने वाला है। आपकी मनोकामना भी पूरी होगी। प्रतिदिन पूजन करें।

11- यदि आपको व्यापार में हानि हो रही है तो कोई दूसरा व्यापार करें। पीपल पर रोज जल चढ़ाएं। सफलता मिलेगी।

12- राज्य की ओर से लाभ मिलेगा। पूर्व दिशा आपके लिए शुभ है। इस दिशा में यात्रा का योग बन सकता है। मान-सम्मान प्राप्त होगा।

13- कुछ ही दिनों बाद आपका श्रेष्ठ समय आने वाला है। कपड़े का व्यवसाय करेंगे तो बेहतर रहेगा। सब कुछ अनुकूल रहेगा।

14- जो इच्छा आपके मन में है वह पूरी होगी। राज्य की ओर से लाभ प्राप्ति का योग बन रहा है। मित्र या भाई से मिलाप होगा।

15- आपके सपने में स्वयं को गांव जाता देंखे तो शुभ समाचार मिलेगा। पुत्र से लाभ मिलेगा। धन प्राप्ति के योग भी बन रहे हैं।

16- आप देवी मां पूजा करें। मां ही सपने में आकर आपका मार्गदर्शन करेंगी। सफलता मिलेगी।

17- आपको अच्छा समय आ गया है। चिंता दूर होगी। धन एवं सुख प्राप्त होगा।

18- यात्रा पर जा सकते हैं। यात्रा मंगल, सुखद व लाभकारी रहेगी। कुलदेवी का पूजन करें।

19- आपके समस्या दूर होने में अभी करीब डेढ़ साल का समय शेष है। जो कार्य करें माता-पिता से पूछकर करें। कुल देवता व ब्राह्मण की सेवा करें।

20- शनिवार को शनिदेव का पूजन करें। गुम हुई वस्तु मिल जाएगी। धन संबंधी समस्या भी दूर हो जाएगी।

21- आप जो भी कार्य करेंगे उसमें सफलता मिलेगी। विदेश यात्रा के योग भी बन रहे हैं। आप श्रीगणेश का पूजन करें।

22- यदि आपके घर में क्लेश रहता है तो रोज भगवान की पूजा करें तथा माता-पिता की सेवा करें। आपको शांति का अनुभव होगा।

23- आपकी समस्याएं शीघ्र ही दूर होंगी। आप सिर्फ आपके काम में मन लगाएं और भगवान शंकर की पूजा करें।

24- आपके ग्रह अनुकूल नहीं है इसलिए आप रोज नवग्रहों की पूजा करें। इससे आपकी समस्याएं कम होंगी और लाभ मिलेगा।

25- पैसों की तंगी के कारण आपके घर में क्लेश हो रहा है। कुछ दिनों बाद आपकी यह समस्या दूर जाएगी। आप मां लक्ष्मी का पूजन रोज करें।

26- यदि आपके मन में नकारात्मक विचार आ रहे हैं तो उनका त्याग करें और घर में भगवान सत्यनारायण का कथा करवाएं। लाभ मिलेगा।

27- आप जो कार्य इस समय कर रहे हैं वह आपके लिए बेहतर नहीं है इसलिए किसी दूसरे कार्य के बारे में विचार करें। कुलदेवता का पूजन करें।

28- आप पीपल के वृक्ष की पूजा करें व दीपक लगाएं। आपके घर में तनाव नहीं होगा और धन लाभ भी होगा।

29- आप प्रतिदिन भगवान विष्णु, शंकर व ब्रह्मा की पूजा करें। इससे आपको मनचाही सफलता मिलेगी और घर में सुख-शांति रहेगी।

30- रविवार का व्रत एवं सूर्य पूजा करने से लाभ मिलेगा। व्यापार या नौकरी में थोड़ी सावधानी बरतें। आपको सफलता मिलेगी।

31- आपको व्यापार में लाभ होगा। घर में खुशहाली का माहौल रहेगा और सबकुछ भी ठीक रहेगा। आप छोटे बच्चों को मिठाई बांटें।

32- आप व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं। सब कुछ ठीक हो रहा है। आपकी चिंता दूर होगी। गाय को चारा खिलाएं।

33- माता-पिता की सेवा करें, ब्राह्मण को भोजन कराएं व भगवान श्रीराम की पूजा करें। आपकी हर अभिलाषा पूरी होगी।

34- मनोकामनाएं पूरी होंगी। धन-धान्य एवं परिवार में वृद्धि होगी। कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाएं।

35- परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं है। जो भी करें सोच-समझ कर और अपने बुजुर्गो की राय लेकर ही करें। आप भगवान दत्तात्रेय का पूजन करें।

36- आप रोज भगवान श्रीगणेश को दुर्वा चढ़ाएं और पूजन करें। आपकी हर मुश्किल दूर हो जाएंगी। धैर्य बनाएं रखें।

37- आप जो कार्य कर रहे हैं वह जारी रखें। आगे जाकर आपको इसी में लाभ प्राप्त होगा। भगवान विष्णु का पूजन करें।

38- लगातार धन हानि से चिंता हो रही है तो घबराइए मत। कुछ ही दिनों में आपके लिए अनुकूल समय आने वाला है। मंगलवार को हनुमानजी को सिंदूर अर्पित करें।

39- आप भगवान सत्यनारायण की कथा करवाएं तभी आपके कष्टों का निवारण संभव है। आपको सफलता भी मिलेगी।

40- आपके लिए हनुमानजी का पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा। खेती और व्यापार में लाभ होगा तथा हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी।

41- आपको धन की प्राप्ति होगी। कुटुंब में वृद्धि होगी एवं चिंताएं दूर होंगी। कुलदेवी का पूजन करें।

42- आपको शीघ्र सफलता मिलने वाली है। माता-पिता व मित्रों का सहयोग मिलेगा। खर्च कम करें और गरीबों का दान करें।

43- रुका हुआ कार्य पूरा होगा। धन संबंधी समस्याएं दूर होंगी। मित्रों का सहयोग मिलेगा। सोच-समझकर फैसला लें। श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।

44- धार्मिक कार्यों में मन लगाएं तथा प्रतिदिन पूजा करें। इससे आपको लाभ होगा और बिगड़ते काम बन जाएंगे।

45- धैर्य बनाएं रखें। बेकार की चिंता में समय न गवाएं। आपको मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी। ईश्वर का चिंतन करें।

46- धार्मिक यात्रा पर जाना पड़ सकता है। इसमें लाभ मिलने की संभावना है। रोज गायत्री मंत्र का जप करें।

47- प्रतिदिन सूर्य को अध्र्य दें और पूजन करें। आपको शत्रुओं का भय नहीं सताएगा। आपकी मनोकामना पूरी होगी।

48- आप जो कार्य कर रहे हैं वही करते रहें। पुराने मित्रों से मुलाकात होगी जो आपके लिए फायदेमंद रहेगी। पीपल को रोज जल चढ़ाएं।

49- अगर आपकी समस्या आर्थिक है तो आप रोज श्रीसूक्त का पाठ करें और लक्ष्मीजी का पूजा करें। आपकी समस्या दूर होगी।

50- आपका हक आपको जरुर मिलेगा। आप घबराएं नहीं बस मन लगाकर अपना काम करें। रोज पूजा अवश्य करें।

51- आप जो व्यापार करना चाहते हैं उसी में सफलता मिलेगी। पैसों के लिए कोई गलत कार्य न करें। आप रोज जरुरतमंद लोगों को दान-पुण्य करें।

52- एक महीने के अंदर ही आपकी मुसीबतें कम हो जाएंगी और सफलता मिलने लगेगी। आप कन्याओं को भोजन कराएं।

53- यदि आप विदेश जाने के बारे में सोच रहे हैं तो अवश्य जाएं। इसी में आपको सफलता मिलेगी। आप श्रीगणेश का आराधना करें।

54- आप जो भी कार्य करें किसी से पुछ कर करें अन्यथा हानि हो सकती है। विपरीत परिस्थिति से घबराएं नहीं। सफलता अवश्य मिलेगी।

55- आप मंदिर में रोज दीपक जलाएं, इससे आपको लाभ मिलेगा और मनोकामना पूरी होगी।

56- परिजनों की बीमारी के कारण चिंतित हैं तो रोज महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। कुछ ही दिनों में आपकी यह समस्या दूर हो जाएगी।

57- आपके लिए समय अनुकूल नहीं है। अपने कार्य पर ध्यान दें। प्रमोशन के लिए रोज गाय को रोटी खिलाएं।

58- आपके भाग्य में धन-संपत्ति आदि सभी सुविधाएं हैं। थोड़ा धैर्य रखें व भगवान में आस्था रखकर लक्ष्मीजी को नारियल चढ़ाएं।

59- जो आप सोच रहे हैं वह काम जरुर पूरा होगा लेकिन इसमें किसी का सहयोग लेना पड़ सकता है। आप शनिदेव की उपासना करें।

60- आप अपने परिजनों से मनमुटाव न रखें तो ही आपको सफलता मिलेगी। रोज हनुमानजी के मंदिर में चौमुखी दीपक लगाएं।

61- यदि आप अपने करियर को लेकर चिंतित हैं तो श्रीगणेश की पूजा करने से आपको लाभ मिलेगा।

62- आप रोज शिवजी के मंदिर में जाकर एक लोटा जल चढ़ाएं और दीपक लगाएं। आपके रुके हुए काम हो जाएंगे।

63- आप जिस कार्य के बारे में जानना चाहते हैं वह शुभ नहीं है उसके बारे में सोचना बंद कर दें। नवग्रह की पूजा करने से आपको सफलता मिलेगी।

64- आप रोज आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं। आपकी हर समस्या का निदान स्वत: ही हो जाएगा।
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Posted in संस्कृत साहित्य

मित्रो प्रस्तुत प्रस्तुति में हम आपको कुछ ऐसे राक्षसों के बारे में बताएंगे, जिनके नाम पर ये कुछ शहर बसे हुये हैं।
राक्षस की लाश पर बसा एक शहर जिसके बिना श्राद्ध नहीं होते!!!!!

जगहों के नाम आमतौर पर देवताओं, भलमानसों या महापुरुषों के नाम पर रखे जाते हैं. पर हम कहें कि कुछ जगहें ऐसी भी हैं जिनके नाम राक्षसों के नाम पर रखे गए हैं तो? आप मानेंगे? मानिए तो भला वरना इन जगहों के बारे में पढ़िए. पर हम चेता दें ये तमाम कहानियां जनश्रुतियों पर आधारित हैं. आप खोजें तो कुछ और किस्से भी हाथ लग सकते हैं. कुछ और तथ्य भी सामने आ सकते हैं. ऋग्वेद में लिखा भी है ‘एकम सत्य विप्र बहुधा वदन्ति’ सत्य एक है ज्ञानीजन अपने-अपने हिसाब से बताते हैं. हमें जो पता है हम बताते हैं. आप पढ़िए. आप जो जानिएगा आप कहिएगा।

  1. जालंधर,,जालंधर पंजाब का सबसे पुराना शहर है और अपने चमड़ा उद्योग के लिए जाना जाता है. पुराने समय में जालंधर,जलंधर राक्षस की राजधानी हुआ करता था. जलंधर का जन्म भगवान् शिव के अपनी तीसरी आंख खोल उसका तेज समुद्र में डाल देने से हुआ था. तेज समझते हैं न? जलंधर की पत्नी वृंदा के पतिव्रत के कारण उसे कोई नहीं मार सकता था. बाद में भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रत भंग किया जिससे जलंधर मारा गया. कुछ जगहों पर कहा गया है जलंधर भगवान राम के बेटे लव की राजधानी थी।
  2. गया,,,गया बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर है. गयासुर को भगवान ब्रह्मा से वरदान मिला था जिसके चलते वह देवताओं से भी ज्यादा पवित्र हो गया. उसे देखने और छूने से ही लोगों के पाप दूर हो जाते और वो स्वर्ग चले जाते. हुआ ये कि असुर भी स्वर्ग पहुंचने लगे. इसे रोकने के लिए भगवान नारायण ने ब्रह्मा जी के जरिए यज्ञ के लिए गयासुर से उसकी देह मांग ली. गयासुर देहदान कर गया. ये जो गया नाम की जगह है. वो गयासुर का ही पांच कोस का शरीर है. जहां लोग अपने पितरों के तर्पण के लिए पहुंचते हैं।

  3. कुल्लू घाटी,,,,कुल्लू घाटी हिमाचल प्रदेश में है. पहले कभी इसका नाम हुआ करता था कुलंथपीठ. माने रहने लायक दुनिया का अंत. कुलान्त नाम का एक राक्षस था. एक बार वो अजगर बनकर कुंडली मार ब्यास नदी के रास्ते में बैठ गया. ऐसा कर वो पानी में डुबाकर दुनिया का अंत करना चाहता था. भगवान शिव को पता चला तो वो उस जगह पहुंचे. कहा: देखो तुम्हारी पूंछ में आग लगी है. वो जैसे ही पीछे मुड़ा त्रिशूल से उसका सिर काट लिया. उस राक्षस के मरने के बाद उसका पूरा शरीर पहाड़ में बदल गया जो कुल्लू घाटी कहलाया।

  4. मैसूर,,,मैसूर बेंगलुरु से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर कर्नाटक-तमिलनाडु बॉर्डर के नजदीक बसा है. इसका नाम महिषासुर राक्षस के नाम पर पड़ा था. महिषासुर के समय इसे महिषा-ऊरु कहा जाता था. देवी भागवत के अनुसार राक्षस को देवी चामुंडी ने मार दिया था. महिषा-ऊरु बाद में महिषुरु कहा जाने लगा.फिर कन्न्ड़ में इसे मैसुरु कहा गया. जो अब मैसूर के रूप में फेमस हो गया है।

  5. तिरुचिरापल्ली,,,तिरुचिरापल्ली तमिलनाडु का जिला है। जो चेन्नई से लगभग सवा तीन सौ किलोमीटर दूर है. इसको पहले थिरि-सिकरपुरम के नाम से जानते थे. अब इसे त्रिची भी कह देते हैं. कावेरी नदी के किनारे पर बसे इस शहर में थिरिसिरन नाम के राक्षस ने भगवान शिव की तपस्या की थी, इसी वजह से इसका नाम थिरिसिरपुरम पड़ा कहा जाता है। बाद में थिरि-सिकरपुरम से थिरिसिरपुरम हुआ और फिर तिरुचिरापल्ली।

  6. सुद्धमहादेव,,सुद्धमहादेव जम्मू कश्मीर के उधमपुर में है. सुद्धांत नाम का राक्षस शंकर जी का भक्त था. एक दिन वो पार्वती जी को डराने लगा। पार्वती जी ने आवाज देकर शिव जी से मदद मांगी। भगवान ने हिमालय से त्रिशूल फेंककर मारा , त्रिशूल लगा और राक्षस वहीं ढेर हो गया। बाद में शंकर जी ने उसे दर्शन भी दिए। और उसके वरदान मांगने पर उस जगह का नाम अपने और उसके नाम पर कर दिया। आज भी वहां भगवान का टूटा त्रिशूल तीन टुकड़ों में गड़ा है और राक्षस सुद्ध का नाम महादेव के पहले लिया जाता है।

  7. पलवल,,,,पलवल जिला हरियाणा में है पहले ये पंजाब में हुआ करता था। पलवल ही वो जगह है जहां महात्मा गांधी को सबसे पहले गिरफ्तार किया गया था. पलवल का नाम पलंबासुर राक्षस के नाम पर पड़ा. एक समय इसे पलंबरपुर कहा जाता था. समय के साथ नाम बदला और पलवल हो गया. पलंबासुर को भगवान कृष्ण के भाई बलराम ने मारा था. बलराम की याद में आज भी वहां बलदेव छठ का मेला भरता है।

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

” कोयले का टुकड़ा फिर से धधक कर जलने लगा ”

अमित एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का था। वह बचपन से ही बड़ा आज्ञाकारी और मेहनती छात्र था। लेकिन जब से उसने कॉलेज में दाखिला लिया था उसका व्यवहार बदलने लगा था। अब ना तो वो पहले की तरह मेहनत करता और ना ही अपने माँ-बाप की सुनता। यहाँ तक की वो घर वालों से झूठ बोल कर पैसे भी लेने लगा था। उसका बदला हुआ आचरण सभी के लिए चिंता का विषय था। जब इसकी वजह जानने की कोशिश की गयी तो पता चला कि अमित बुरी संगती में पड़ गया है। कॉलेज में उसके कुछ ऐसे मित्र बन गए हैं जो फिजूलखर्ची करने , सिनेमा देखने और धूम्र-पान करने के आदि हैं।

पता चलते ही सभी ने अमित को ऐसी दोस्ती छोड़ पढाई- लिखाई पर ध्यान देने को कहा ; पर अमित का इन बातों से कोई असर नहीं पड़ता , उसका बस एक ही जवाब होता , ” मुझे अच्छे-बुरे की समझ है , मैं भले ही ऐसे लड़को के साथ रहता हूँ पर मुझपर उनका कोई असर नहीं होता … “

दिन ऐसे ही बीतते गए और धीरे-धीरे परीक्षा के दिन आ गए , अमित ने परीक्षा से ठीक पहले कुछ मेहनत की पर वो पर्याप्त नहीं थी , वह एक विषय में फेल हो गया । हमेशा अच्छे नम्बरों से पास होने वाले अमित के लिए ये किसी जोरदार झटके से कम नहीं था। वह बिलकुल टूट सा गया , अब ना तो वह घर से निकलता और ना ही किसी से बात करता। बस दिन-रात अपने कमरे में पड़े कुछ सोचता रहता। उसकी यह स्थिति देख परिवारजन और भी चिंता में पड़ गए। सभी ने उसे पिछला रिजल्ट भूल आगे से मेहनत करने की सलाह दी पर अमित को तो मानो सांप सूंघ चुका था , फेल होने के दुःख से वो उबर नही पा रहा था।

जब ये बात अमित के पिछले स्कूल के प्रिंसिपल को पता चली तो उन्हें यकीन नहीं हुआ, अमित उनके प्रिय छात्रों में से एक था और उसकी यह स्थिति जान उन्हें बहुत दुःख हुआ , उन्होंने निष्चय किया को वो अमित को इस स्थिति से ज़रूर निकालेंगे।

इसी प्रयोजन से उन्होंने एक दिन अमित को अपने घर बुलाया।

प्रिंसिपल साहब बाहर बैठे अंगीठी ताप रहे थे। अमित उनके बगल में बैठ गया। अमित बिलकुल चुप था , और प्रिंसिपल साहब भी कुछ नहीं बोल रहे थे। दस -पंद्रह मिनट ऐसे ही बीत गए पर किसी ने एक शब्द नहीं कहा। फिर अचानक प्रिंसिपल साहब उठे और चिमटे से कोयले के एक धधकते टुकड़े को निकाल मिटटी में डाल दिया , वह टुकड़ा कुछ देर तो गर्मी देता रहा पर अंततः ठंडा पड़ बुझ गया।

यह देख अमित कुछ उत्सुक हुआ और बोला , ” प्रिंसिपल साहब , आपने उस टुकड़े को मिटटी में क्यों डाल दिया , ऐसे तो वो बेकार हो गया , अगर आप उसे अंगीठी में ही रहने देते तो अन्य टुकड़ों की तरह वो भी गर्मी देने के काम आता !”

प्रिंसिपल साहब मुस्कुराये और बोले , ” बेटा , कुछ देर अंगीठी में बाहर रहने से वो टुकड़ा बेकार नहीं हुआ , लो मैं उसे दुबारा अंगीठी में डाल देता हूँ….” और ऐसा कहते हुए उन्होंने टुकड़ा अंगीठी में डाल दिया।

अंगीठी में जाते ही वह टुकड़ा वापस धधक कर जलने लगा और पुनः गर्मी प्रदान करने लगा।

“कुछ समझे अमित। “, प्रिंसिपल साहब बोले , ” तुम उस कोयले के टुकड़े के समान ही तो हो, पहले जब तुम अच्छी संगती में रहते थे , मेहनत करते थे , माता-पिता का कहना मानते थे तो अच्छे नंबरों से पास होते थे , पर जैस वो टुकड़ा कुछ देर के लिए मिटटी में चला गया और बुझ गया , तुम भी गलत संगती में पड़ गए और परिणामस्वरूप फेल हो गए , पर यहाँ ज़रूरी बात ये है कि एक बार फेल होने से तुम्हारे अंदर के वो सारे गुण समाप्त नहीं हो गए… जैसे कोयले का वो टुकड़ा कुछ देर मिटटी में पड़े होने के बावजूब बेकार नहीं हुआ और अंगीठी में वापस डालने पर धधक कर जल उठा , ठीक उसी तरह तुम भी वापस अच्छी संगती में जाकर , मेहनत कर एक बार फिर मेधावी छात्रों की श्रेणी में आ सकते हो … याद रखो, मनुष्य ईश्वर की बनायीं सर्वश्रेस्ठ कृति है उसके अंदर बड़ी से बड़ी हार को भी जीत में बदलने की ताकत है , उस ताकत को पहचानो , उसकी दी हुई असीम शक्तियों का प्रयोग करो और इस जीवन को सार्थक बनाओ। “

अमित समझ चुका था कि उसे क्या करना है , वह चुप-चाप उठा , प्रिंसिपल साहब के चरण स्पर्श किये और निकल पड़ा अपना भविष्य बनाने ….संजय गुप्ता

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पौराणिक कहानी=======जरूर पढ़ें

जब श्रीकृष्ण ने लूट लिया एक डाकू का दिल

पुराने समय की बात है। एक धनिक के घर श्रीमद्भागवत की कथा चल रही थी। घर के सब लोग कथामृत का पान कर रहे थे। उसी समय अवसर का लाभ उठाकर एक डाकू उस घर में घुस गया। भगवान की कुछ ऐसी लीला हुई कि उसे बहुत खोजने पर भी कुछ न मिला। कथावाचक पंडितजी उस समय भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की मधुर लीलाएँ सुना रहे थे। अचानक कथा के ये अंश डाकू के कानों में भी पड़े-
“यशोदा मैया ने अपने प्यारे कन्हैया को माखन-मिश्री और भिन्न-भिन्न प्रकार के पकवानों का कलेऊ कराकर बड़े चाव से सजाया। लाखों-करोड़ों रुपयों के गहने, हीरे-मोती से जड़े सोने के आभूषण अपने बच्चों को पहनाए। कृष्ण और बलराम के सोने के मुकुट, हार और बाजूबंद में मणियाँ जगमगा रही थीं। फिर यशोदा मैया ने बड़े प्रेम से कृष्ण और बलराम का सिर सूँघकर उन्हें गौ चराने के लिए विदा किया।”
कथा की ये बातें सुनकर डाकू खुशी से फूला न समाया। कथा समाप्त होने पर वह पंडित जी के पीछे-पीछे चल पड़ा। जब सुनसान सड़क आई तो उसने कड़कती आवाज में कहा- “पंडितजी! रुक जाओ!” पंडितजी के पास दक्षिणा का माल और रुपए थे। इसलिए वे तुरंत भाग खड़े हुए। डाकू ने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया और बोला- “पंडितजी! तुरंत मुझे उन कृष्ण और बलराम के घर का पता बता दो, जिनके बारे में अभी आप कथा में बोल रहे थे कि उनकी माँ उन्हें लाखों-करोड़ों रुपयों के गहनों से सजाकर जंगल भेजती है। यदि आपने मुझे उनका पता नहीं बताया तो इस लाठी से आपके सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।”

पंडितजी ने डाकू से कृष्ण और बलराम का पता पूछने का कारण पूछा। उसने कहा- “मैं डाकू हूँ और उन दोनों के गहने लूटना चाहता हूँ। यदि मेरे हाथ उनके गहने लगे, तो मैं उनमें से आपको भी कुछ दे दूँगा।” पंडितजी समझ गए कि डाकू बलवान है, पर नादान है। उन्होंने कुछ हिम्मत करके कहा- “कृष्ण और बलराम का पता तो मेरी पुस्तक में है, जो मेरे डेरे पर है। तुम मेरे साथ चलो। मैं वहाँ पुस्तक देखकर पता बता दूँगा।”
डेरे पर पहुँचकर पंडितजी ने श्रीमद्भागवत निकाली और पढ़ना शुरू किया- “कृष्ण और बलराम के दर्शन प्रायः यमुना के तट पर वृंदावन में कदंब वृक्ष के नीचे होते हैं।” डाकू ने उनसे कृष्ण बलराम के स्थान की दूरी पूछी। पंडितजी ने कहा, “सीधे उत्तर दिशा की ओर चलते जाओ। जहाँ भी नदी के किनारे कदंब का वृक्ष हो, पास में एक छोटा-सा पर्वत हो, घना जंगल हो, गौओं के चरने का मैदान हो और वंशी की मधुर धुन सुनाई पड़े, तो समझ लो कि उसी स्थान पर वे दोनों बालक गौएँ चराने आते हैं।”
डाकू ने पूछा, “पंडित जी! क्या वे दोनों प्रतिदिन वहाँ गौ चराने आते हैं और उनका आने का समय क्या है?” पंडित जी बोले, “वे दोनों तो वहाँ प्रतिदिन प्रातःकाल में आते हैं और उस समय थोड़ा-थोड़ा अँधेरा भी छाया रहता है।” डाकू ने पूछा, “पंडितजी! आपके हिसाब से उनके पास कुल मिलाकर लगभग कितने रुपए के गहने होंगे?” पंडितजी ने कहा, “अरे! इसकी तो कोई गिनती नहीं है। करोड़ों अरबों से भी ज्यादा।” यह सुनकर डाकू प्रसन्नता से झूम उठा और पंडितजी को प्रणाम कर चल पड़ा।

पंडितजी मन ही मन हँसे। तभी उन्हें यह चिंता व्यापी कि तीन-चार दिन तो डाकू कृष्ण बलराम को खोजने का प्रयत्न करेगा, किंतु उनके न मिलने पर वह यहाँ आकर उन पर अत्याचार न करने लगे। तभी पंडितजी के दिमाग में उपाय सूझा कि वे उसे दूसरा रास्ता बतला देंगे। वह तीन-चार दिन फिर भटकेगा और तब तक पंडितजी अपनी कथा समाप्त कर अपने गाँव चलते बनेंगे।
उधर डाकू अपने घर पहुँचा। उसके दिमाग में गहनों से लदे बालकों को ढूंढने की धुन सवार हो गई। उसके मन में कृष्ण बलराम का नाम गूँजने लगा और आँखों के सामने गहनों से लदे दो सुंदर बालक नाचने लगे। रात के अँधेरे में डाकू अपने कंधे पर लाठी रखकर निकल पड़ा ताकि प्रातःकाल होते-होते उस स्थान पर पहुँच सके जहाँ कृष्ण और बलराम प्रतिदिन गौएँ चराने आते हैं। उसके होठों से अनजाने में ही दोनों नंदकुमारों कृष्ण और बलराम का नाम निकल रहा था।
चलते-चलते डाकू को कल-कल बहती हुई एक नदी मिली। ढूंढने पर उसे उसके आसपास कदंब का एक वृक्ष भी मिल गया। भगवान श्रीकृष्ण की लीला से उसी स्थान पर वृन्दावन प्रकट हो गया। डाकू को पास ही छोटा-सा पर्वत, घना जंगल और गौओं के चरने का मैदान भी दिखाई देने लगा। डाकू की खुशी का ठिकाना न रहा। वह कदंब के वृक्ष पर चढ़ गया और सबेरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। धीरे-धीरे सूर्यनारायण भगवान पर्वत के पीछे से उदित हुए। उनकी रंग-बिरंगी किरणें नदी की लहरों के ऊपर नर्तन करने लगीं। किंतु डाकू को अभी वंशी का मधुर स्वर सुनाई नहीं पड़ा। अतः वह और भी चौंकन्ना होकर बैठ गया। उसका हृदय वंशी का स्वर सुनने और आभूषणों से सजे-धजे कृष्ण बलराम को देखने के लिए रह-रहकर तड़पने लगा।

डाकू की प्रतीक्षा की लंबी घड़ियाँ समाप्त हुईं। उसे कहीं बहुत दूर से वंशी की सुरीली लहर आती सुनाई पड़ी। वंशी का स्वर जैसे ही डाकू के कान के रास्ते उसके हृदय में प्रविष्ट हुआ, वह आनंद के आवेश में अपनी सुध-बुध खो बैठा और मूर्च्छित होकर वृक्ष से नीचे गिर पड़ा। कुछ क्षण बाद उसकी मूर्च्छा दूर हुई, तो वह उठ खड़ा हुआ। अचानक उसने देखा कि पास का घना जंगल प्रकाश से जगमगा रहा है। प्रकाश के पुंज में श्याम और गौर वर्ण के दो सुंदर बालक खड़े हुए मुस्करा रहे हैं। गौएँ और ग्वाल उनसे आगे निकल गए हैं। दोनों बालकों ने भाँति-भाँति के सुंदर आभूषण पहने हुए हैं।
डाकू ने कृष्ण बलराम को देखा तो मंत्रमुग्ध होकर झूम उठा। वह मन ही मन बोला, “ये दोनों निश्चय ही वही बालक हैं, जिनके बारे में पंडितजी कथा में बता रहे थे। हाय! इतने नन्हे सुकुमार सुंदर बालकों को इनके माता-पिता ने कैसे गौएँ चराने जंगल में भेज दिया? इनसे गहने छीनने का नहीं, बल्कि इन्हें तो और भी गहनों से सजाने का मन करता है।”
तभी डाकू के गंदे संस्कार आगे आए और बोले, “यदि तू इनसे गहने नहीं छिनेगा, तो तू आखिर यहाँ आया क्यों है?” डाकू लाठी लेकर कृष्ण-बलराम के पीछे दौड़ा और कड़कती हुई आवाज में बोला, “जहाँ खड़े हो, वहीं रुक जाओ! सारे गहने निकालकर मुझे दे दो।” लीलानटनागर बाल श्रीकृष्ण भयभीत होकर ‘माँ-बाबा’ की जोर-जोर से पुकार करने लगे। डाकू ने जैसे ही झपटकर अपने हाथ से उनका मुँह दबाकर उनकी आवाज बंद करनी चाही, तभी उनके स्पर्श से उसके शरीर में बिजली दौड़ गई और वह बेसुध होकर गिर पड़ा।

जब उसे होश आया तो वह श्रीकृष्ण बलराम से बोला, “अरे बालको! तुम दोनों कौन हो? मैं ज्यों-ज्यों तुम्हें देखता हूँ, तुम मुझे त्यों-त्यों और अधिक सुंदर और मनोहर क्यों दिखाई दे रहे हो? हाय! तुम्हारा स्पर्श कितना मधुर और शीतल है! तुम्हारे स्पर्श से और तुम्हें देखकर मुझे रोमांच क्यों हो रहा है? मुझे रोना क्यों आ रहा है? क्या तुम दोनों कोई देव हो?”
श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले, “नहीं! हम मनुष्य हैं और व्रज के राजा नंदबाबा के लड़के हैं।” डाकू बोला, “मैं तुम्हारे आभूषण नहीं छिनूँगा। केवल एक बार अपने चरण मेरे सिर पर धर दो। मुझे अपने हाथों का चुंबन करने दो। क्या तुम प्रतिदिन इसी रास्ते से जाकर मुझे दर्शन देकर मेरे हृदय की ज्वाला शान्त नहीं करोगे?”
श्रीकृष्ण बोले, “यदि तुम हमें न मारने और हमारे आभूषण न छिनने की प्रतिज्ञा करो, तो हम प्रतिदिन यहाँ आ सकते हैं।” डाकू ने प्रतिज्ञा कर उनसे अगले दिन पुनः आने को कहा। श्रीकृष्ण उन्हें अपने आभूषण स्वयं उतारकर देने लगे। डाकू बोला, “अब गहनों की इच्छा तो नहीं है, किंतु आपकी बात टाली भी नहीं जाती। लेकिन आपके माता-पिता आपके शरीर पर गहने न होने पर आपको डांटेंगे तो नहीं?” श्रीकृष्ण बोले, “हम राजकुमार हैं और हमारे पास ऐसे बहुत सारे गहने हैं।” डाकू खुश होकर बोला, “तो फिर कल और गहने लेकर आना। लेकिन मैं आपके गहने न तो अपने हाथ से छिनूँगा और न ही लूँगा। आपको देने हैं तो मेरे दुपट्टे में बाँध दो।” कृष्णजी ने उसके दुपट्टे में गहने बाँधकर उसे देते हुए कहा, “कल फिर आना, कल और गहने देंगे।” डाकू प्रसन्नता भरे आश्चर्य से बोला, “कल भी दोगे? गहने चाहे न देना, लेकिन दर्शन देने जरुर आना।” “हाँ! हाँ! जरुर आएंगें? गहने भी देंगे और दर्शन भी”, यह कहकर कृष्ण-बलराम गौओं और ग्वालों के पीछे-पीछे चले गए।

डाकू प्रसन्नता से नाचता हुआ रात को पंडितजी के डेरे पर पहुँचा और उनके सामने गहनों की पोटली रख दी। बोला, “पंडितजी! देखो! कितने सारे गहने लेकर आया हूँ। आपका जितना मन हो उतने ले लो।, कल वह इनसे भी ज्यादा गहने लाएगा।” पंडितजी चकित होकर बोले, “मैं जिनकी कथा कहता हूँ, क्या तू उन कृष्ण-बलराम के ही गहने लाया है?” डाकू बोला, “और नहीं तो क्या? देखिए न यह सोने का मुकुट और यह सोने की वंशी!” पंडित जी उन अलौकिक आभूषणों को देखकर हक्के-बक्के रह गए। जो श्रीकृष्ण बड़े-बड़े योगी-तपस्वियों को सहस्र वर्ष तप करने पर भी नहीं मिलते, वे इस डाकू को एक ही दिन में कैसे मिल गए?
उन्होंने डाकू से अगले दिन उन्हें भी कृष्ण-बलराम के दर्शन के लिए ले चलने को कहा। अगले दिन दोनों प्रातःकाल से पहले ही उस स्थान पर पहुँच गए। डाकू ने पंडितजी को वृक्ष के पीछे छिपा दिया, कहीं उन्हें देखकर वे दोनों बालक न आएं। जैसे ही प्रातःकाल निकला, डाकू वंशी का मधुर स्वर आनंदित हो उठा, किन्तु पंडितजी को वह स्वर सुनाई ही नहीं दिया। कुछ देर में कृष्ण-बलराम दूर से आते दिखाई दिए, परंतु पंडितजी उन्हें न देख सके। पंडितजी डाकू से बोले, “मुझे तो दोनों बालक दिखाई नहीं दे रहे हैं। तुम श्रीकृष्ण से कहना कि आज जो देना चाहते हो, इन पंडितजी के हाथ पर दो।”
जब कृष्ण बलराम डाकू के पास आ गए तो उन्होंने उससे पूछा, “गहने लोगे?” डाकू पश्चातापपूर्ण स्वर में बोला, “नहीं! मैं गहने नहीं लूँगा। तुमने जो कल गहने दिए थे, उन्हें भी लौटाने को लाया हूँ। तुम ये सब वापस ले लो। किन्तु इन पंडितजी को अपने दर्शन करा दो, क्योंकि इन्हें तुम दोनों नहीं दिखाई दे रहे हो। अन्यथा ये मुझ पर विश्वास नहीं करेंगे।” श्रीकृष्ण बोले, “अरे भैया! ये विद्वान हैं, लेकिन अभी इनका हृदय प्रेम से रहित है। अतः अभी ये मेरे दर्शन के अधिकारी नहीं हैं।” डाकू बोला, “भाई! तुम मुझसे जो कहोगे वही करूँगा, लेकिन पंडितजी को एक बार अपने सुंदर रूप के दर्शन जरुर करा दो।”
श्रीकृष्ण हँसकर बोले, “ठीक है! तुम एक साथ पंडितजी और मुझे स्पर्श करो।” डाकू के ऐसा करते ही पंडितजी को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई और उन्हें भी श्रीकृष्ण बलराम के दर्शन होने लगे। दोनों भगवान के सुखद स्पर्श से रोमांचित होकर उनके चरणों में गिर पड़े।

तो दोस्तों एक जोर से बोले
बाके बिहारी लाल की जय
बोले भैया बलराम जी की जय

जय श्री कृष्ण
जय श्री बलराम जी

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मित्रों #दीप की तरफ से पेश की गई सच्ची कहानी सोने से पहले अवश्य पढ़ना।

#वसीएत…

एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी…बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके मा बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे।
बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया।
छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल अवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई । बहन और मझले को छोड़ दोनों भाईयो ने Love मैरीज की थी।
बहन की शादी भी अच्छे घराने मे हुई थी।
आखीर भाई सब डाक्टर इंजीनियर जो थे।
अब मझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी।
बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था।
वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो…नौकरी कौन देता। मझले की शादी कीये बिना बाप गुजर गये ।
माँ ने सोचा कहीं अब बँटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी।
शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।
दोस्तों ने कहा… ए चन्दू आज अड्डे पे आना।
चंदू – आज नहीं फिर कभी
दोस्त – अरे तू शादी के बाद तो जैसे बिबी का गुलाम ही हो गया?
चंदू – अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज
कल और होगा।
घरवाले नालायक कहते थे कहते हैं मेरे लिए चलता है।
मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दा गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी…फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । कालेज मे नौकरी की डिग्री मिलती है और ऐसे संस्कार मा बाप से मिलते हैं ।

इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नीया मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की…जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा।
मां के लाख मना करने पर भी…बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है मगर चंदू है की काम पे निकलने के बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं । वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है।
चंदू – तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से मे जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर।
बहन- अरे बेवकूफ …तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें
मां- अरे चंदू आज रूक जा।
बंटवारे में कुल दस विघा जमीन मे दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं ।
और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है
तभी चंदू जोर से चिल्लाता है।
अरे???? फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है?
दोनों भाई हंसकर बोलते हैं
अरे मूरख…बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से मे सिर्फ उसका मायका ही है।
चंदू – ओह… शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है।
ठीक है आप दोनों ऐसा करो।
मेरे हिस्से की वसीएत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो।
दोनों भाई चकीत होकर बोलते हैं ।
और तू?
चंदू मां की और देखके मुस्कुराके बोलता है
मेरे हिस्से में माँ है न……
फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके…क्यों चंदूनी जी…क्या मैंने गलत कहा?
चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है। इससे बड़ी वसीएत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासु मिली और बाप जैसा ख्याल रखना वाला पति।
बस येही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा मे बदल दिया ।
बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..मांफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको।
चंदू – इस घर मे तेरा भी उतना ही अधिकार है जीतना हम सभी का।
बहुओं को जलाने की हिम्मत कीसी मे नहीं मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दुर।
माँ का चुनाव इसलिए कीया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जंहा हमने साथ साथ 9 – 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ।
दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते रोते कहते हैं
आज तो तू सचमुच का बाबा लग रहा है। सबकी पलको पे पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है। समाप्त ।

संजय गुप्ता

Posted in ज्योतिष - Astrology

कंठस्थ कर लें हनुमानजी के इन बारह नामों को, दूर होगी हर बाधा!!!!!

कलियुग में हनुमानजी ही एकमात्र ऐसे देवता है जो बड़ी शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते हैं। साधारण पूजा और राम नाम के जाप से भी लोगों को बजरंग बली के दर्शन होने की भी कई कहानियां सुनने को मिलती हैं। इनकी आराधना से कुंडली के सभी ग्रहदोष समाप्त होकर व्यक्ति के सौभाग्य का उदय होता है।

हनुमानजी को प्रसन्न करने और उनके दर्शन करने का एक ऐसा ही सरल उपाय है प्रतिदिन उनके 12 विशेष नामों का स्मरण करना। इस उपाय को सभी राशियों के लोग कर सकते हैं। इससे पवनपुत्र बहुल जल्दी प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। आनन्द रामायण में बताए गए हनुमानजी के ये 12 नाम इस प्रकार हैं-

हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:। रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिङ्गाक्षोऽमितविक्रम:।।
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशन:। लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।
एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:। स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।।
तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भेवत्। राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।।

इस छोटी सी स्तुति में भगवान महावीर के 12 नाम हैं। इसके प्रतिदिन नियमित जप से व्यक्ति को सभी कष्टों से मुक्ति मिलती हैं तथा शनि की साढ़े साती व ढैय्या का असर समाप्त होता है। यदि इस श्लोक का जप नहीं करना चाहते हैं तो आगे दिए सभी बारह नामों का जप भी कर सकते हैं।

ये है इस स्तुति का अर्थ और स्तुति में दिए गए सभी बारह नाम

श्लोक की शुरुआत में ही पहला नाम हनुमान दिया गया है, दूसरा नाम है अंजनीसूनु, तीसरा नाम है वायुपुत्र, चौथा नाम है महाबल, पांचवां नाम है रामेष्ट यानी श्रीराम के प्रिय, छठा नाम है फाल्गुनसुख यानी अर्जुन के मित्र, सातवां नाम है पिंगाक्ष यानी भूरे नेत्रवाले, आठवां नाम है अमितविक्रम, नवां नाम है उदधिक्रमण यानी समुद्र को अतिक्रमण करने वाले, दसवां नाम है सीताशोकविनाशन यानी सीताजी के शोक का नाश करने वाले, ग्याहरवां नाम है लक्ष्मणप्राणदाता यानी लक्ष्मण को संजीवनी बूटी द्वारा जीवित करने वाले और बाहरवां नाम है दशग्रीवदर्पहा यानी रावण के घमंड को दूर करने वाले।

इन सभी नामों से हनुमानजी की शक्तियों तथा गुणों का बोध होता है। साथ ही भगवान राम के प्रति उनकी सेवा भक्ति भी स्पष्ट दिखाई देती है। इसी कारण इन नामों के जप से पवनपुत्र बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं।

यदि किसी व्यक्ति के जीवन में कठिन समय चल रहा है, कुंडली में किसी प्रकार का ग्रह दोष है, कार्यों में सफलता नहीं मिल पा रही है, घर-परिवार में सुख-शांति नहीं है या किसी प्रकार का भय सता रहा है, बुरे सपने आते हैं, विचारों की पवित्रता भंग हो गई है तो यहां दिए गए हनुमानजी बारह नामों का जप करना चाहिए।

-प्रात: काल सो कर उठते ही जिस अवस्था में भी हो बारह नामों को 11 बार लेनेवाला व्यक्ति दीर्घायु होता है।

-नित्य नियम के समय नाम लेने से इष्ट की प्राप्ति होती है।

-दोपहर में नाम लेनेवाला व्यक्ति धनवान होता है। दोपहर संध्या के समय नाम लेनेवाला व्यक्ति पारिवारिक सुखों से तृप्त होता है।

-रात्रि को सोते समय नाम लेनेवाले व्यक्ति की शत्रु से जीत होती है।

-उपरोक्त समय के अतिरिक्त इन बारह नामों का निरंतर जप करने वाले व्यक्ति की श्री हनुमानजी महाराज दसों दिशाओं एवं आकाश पाताल से रक्षा करते हैं।

-लाल स्याही से मंगलवार को भोजपत्र पर ये बारह नाम लिखकर मंगलवार के दिन ही ताबीज बांधने से कभी ‍सिरदर्द नहीं होता। गले या बाजू में तांबे का ताबीज ज्यादा उत्तम है। भोजपत्र पर लिखने के लिए अनार की कलम होनी चाहिए।

संजय गुप्ता

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

जानकी नवमी


जानकी नवमी : जब धरती मां के गर्भ से प्रकट हुई थीं माता सीता!!!!!

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को सीता नवमी या जानकी नवमी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन सीता जी का प्राकट्य हुआ था इसीलिए यह पर्व माँ सीता के जन्म दिवस के रुप में मनाया जाता है।

भगवान श्रीराम की अर्द्धांगिनी देवी सीता जी का जन्मदिवस फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को तो मनाया जाता ही है परंतु वैशाख मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को भी जानकी-जयंती के रूप में मनाया जाता है क्योंकि रामायण के अनुसार वे वैशाख में अवतरित हुईं थीं, किन्तु ‘निर्णयसिन्धु’ के ‘कल्पतरु’ ग्रंथानुसार फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष के दिन सीता जी का जन्म हुआ था इसीलिए इस तिथि को सीताष्टमी के नाम से भी संबोद्धित किया गया है अत: दोनों ही तिथियाँ उनकी जयंती हेतु मान्य हैं तथा दोनों ही तिथियां हिंदू धर्म में बहुत पवित्र मानी गई हैं।

इस दिन वैष्णव संप्रदाय के भक्त माता सीता के निमित्त व्रत रखते हैं और पूजन करते हैं। मान्यता है कि जो भी इस दिन व्रत रखता व श्रीराम सहित सीता का विधि-विधान से पूजन करता है, उसे पृथ्वी दान का फल, सोलह महान दानों का फल तथा सभी तीर्थों के दर्शन का फल अपने आप मिल जाता है। अत: इस दिन व्रत करने का विशेष महत्त्व है।

शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन पुष्य नक्षत्र में जब महाराजा जनक संतान प्राप्ति की कामना से यज्ञ की भूमि तैयार करने के लिए हल से भूमि जोत रहे थे, उसी समय पृथ्वी से एक बालिका का प्राकट्य हुआ। जोती हुई भूमि को तथा हल की नोक को भी ‘सीता’ कहा जाता है, इसलिए बालिका का नाम ‘सीता’ रखा गया।

सीता जन्म कथा सीता के विषय में रामायण और अन्य ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार मिथिला के राजा जनक के राज में कई वर्षों से वर्षा नहीं हो रही थी। इससे चिंतित होकर जनक ने जब ऋषियों से विचार किया, तब ऋषियों ने सलाह दी कि महाराज स्वयं खेत में हल चलाएँ तो इन्द्र की कृपा हो सकती है। मान्यता है कि बिहार स्थित सीममढ़ी का पुनौरा नामक गाँव ही वह स्थान है, जहाँ राजा जनक ने हल चलाया था। हल चलाते समय हल एक धातु से टकराकर अटक गया। जनक ने उस स्थान की खुदाई करने का आदेश दिया। इस स्थान से एक कलश निकला, जिसमें एक सुंदर कन्या थी। राजा जनक निःसंतान थे।

इन्होंने कन्या को ईश्वर की कृपा मानकर पुत्री बना लिया। हल का फल जिसे ‘सीत’ कहते हैं, उससे टकराने के कारण कालश से कन्या बाहर आयी थी, इसलिए कन्या का नाम ‘सीता’रखा गया था। ‘वाल्मीकि रामायण’ के अनुसार श्रीराम के जन्म के सात वर्ष, एक माह बाद वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को जनक द्वारा खेत में हल की नोक (सीत) के स्पर्श से एक कन्या मिली, जिसे उन्होंने सीता नाम दिया। जनक दुलारी होने से ‘जानकी’, मिथिलावासी होने से ‘मिथिलेश’ कुमारी नाम भी उन्हें मिले। वर्तमान में मिथिला नेपाल का हिस्सा हैं अतः नेपाल में इस दिन को बहुत उत्साह से मनाते हैं . वास्तव में सीता, भूमिजा कहलाई क्यूंकि राजा जनक ने उन्हें भूमि से प्राप्त किया था ।

वेदों, उपनिषदों तथा अन्य कई वैदिक वाङ्मय में उनकी अलौकिकता व महिमा का उल्लेख एवं उनके स्वरूप का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है जहाँ ऋग्वेद में एक स्तुति के अनुसार कहा गया है कि असुरों का नाश करने वाली सीता जी आप हमारा कल्याण करें एवं इसी प्रकार सीता उपनिषद जो कि अथर्ववेदीय शाखा से संबंधित उपनिषद है जिसमें सीता जी की महिमा एवं उनके स्वरूप को व्यक्त किया गया है. इसमें सीता को शाश्वत शक्ति का आधार बताया गया है तथा उन्हें ही प्रकृति में परिलक्षित होते हुए देखा गया है. सीता जी को प्रकृति का स्वरूप कहा गया है तथा योगमाया रूप में स्थापित किया गया है.

सीता जी ही प्रकृति हैं वही प्रणव और उसका कारक भी हैं. शब्द का अर्थ अक्षरब्रह्म की शक्ति के रूप में हुआ है यह नाम साक्षात ‘योगमाया’ का है. देवी सीता जी को भगवान श्रीराम का साथ प्राप्त है, जिस कारण वह विश्वकल्याणकारी हैं. सीता जी जग माता हैं और श्री राम को जगत-पिता बताया गया है एकमात्र सत्य यही है कि श्रीराम ही बहुरूपिणीमाया को स्वीकार कर विश्वरूप में भासित हो रहे हैं और सीता जी ही वही योगमाया है.इस तथ्य का उदघाटन निर्णयसिंधु से भी प्राप्त होता है जिसके अनुसार सीता शक्ति, इच्छा-शक्ति तथा ज्ञान-शक्ति तीनों रूपों में प्रकट होती हैं वह परमात्मा की शक्ति स्वरूपा हैं.

इस प्रकार सीता माता के चरित्र का वर्णन सभी वेदों में बहुत सुंदर शब्दों में किया गया हैं । ऋग्वेद में वे असुर संहारिणी, कल्याणकारी, सीतोपनिषद में मूल प्रकृति, विष्णु सान्निध्या, रामतापनीयोपनिषद में आनन्द दायिनी, आदिशक्ति, स्थिति, उत्पत्ति, संहारकारिणी, आर्ष ग्रंथों में सर्ववेदमयी, देवमयी, लोकमयी तथा इच्छा, क्रिया, ज्ञान की संगमन हैं।

गोस्वामी तुलसीदास ने उन्हें सर्वक्लेशहारिणी, उद्भव, स्थिति, संहारकारिणी, राम वल्लभा कहा है। ‘पद्मपुराण’ उन्हें जगतमाता, अध्यात्म रामायण एकमात्र सत्य, योगमाया का साक्षात् स्वरूप और महारामायण समस्त शक्तियों की स्रोत तथा मुक्तिदायिनी कह उनकी आराधना करता है। ‘रामतापनीयोपनिषद’ में सीता को जगद की आनन्द दायिनी, सृष्टि, के उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार की अधिष्ठात्री कहा गया है-
श्रीराम सांनिध्यवशां-ज्जगदानन्ददायिनी।
उत्पत्ति स्थिति संहारकारिणीं सर्वदेहिनम्॥

वाल्मीकि रामायण में भी देवी सीता को शक्ति स्वरूपा, ममतामयी, राक्षस नाशिनी, पति व्रता आदि कई गुणों से सज्जित बताया गया है । वाल्मीकि रामायण’ के अनुसार सीता राम से सात वर्ष छोटी थीं। ‘रामायण’ तथा ‘रामचरितमानस’ के बालकाण्ड में सीता के उद्भवकारिणी रूप का दर्शन होता है एवं उनके विवाह तक सम्पूर्ण आकर्षण सीता में समाहित हैं, जहाँ सम्पूर्ण क्रिया उनके ऐश्वर्य को रूपायित करती है। अयोध्याकाण्ड से अरण्यकाण्ड तक वह स्थितिकारिणी हैं, जिसमें वह करुणा-क्षमा की मूर्ति हैं।

वह कालरात्रि बन निशाचर कुल में प्रविष्ट हो उनके विनाश का मूल बनती हैं। यद्यपि तुलसीदास ने सीताजी के मात्र कन्या तथा पत्नी रूपों को दर्शाया है, तथापि वाल्मीकि ने उनके मातृस्वरूप को भी प्रदर्शित कर उनमें वात्सल्य एवं स्नेह को भी दिखलाया है। इसलिए सीताजी का जीवन एक पुत्री, पुत्रवधू, पत्‍‌नी और मां के रूप में उनका आदर्श रूप सभी के लिए पूजनीय रहा है ।

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम तथा माता जानकी के अनन्य भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी ‘रामचरितमानस’ के बालकांड के प्रारंभिक श्लोक में सीता जी को ब्रह्म की तीन क्रियाओं उद्भव, स्थिति, संहार, की संचालिका तथा आद्याशक्ति कहते हुए नमस्कार करते हैं-

उद्भव स्थिति संहारकारिणीं हारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामबल्लभाम्॥

अद्भुत रामायण का उल्लेख श्रीराम तथा सीता इस घटना से ज्ञात होता है कि सीता राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थीं। धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त होने के कारण सीता खुद को पृथ्वी की पुत्री मानती थीं। लेकिन वास्तव में सीता के पिता कौन थे और कलश में सीता कैसे आयीं, इसका उल्लेख अलग-अलग भाषाओं में लिखे गये रामायण और कथाओं से प्राप्त होता है। ‘अद्भुत रामायण’ में उल्लेख है कि रावण कहता है कि- “जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूँ, तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने।

” रावण के इस कथन से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थीं। ‘अद्भुत रामायण’ में उल्लेख है कि गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप में पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था। एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था, तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहाँ मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया। यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया। रावण ने कहा कि यह तेज विष है। इसे छुपाकर रख दो। मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी।

एक दिन जब रावण बाहर गया था, तब मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया। इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी। कुछ समय बाद रावण को मंदोदरी से एक पुत्री प्राप्त हुई जिसे उसने जन्म लेते ही सागर में फेंक दिया। सागर में डूबती वह कन्या सागर की देवी वरुणी को मिली और वरुणी ने उसे धरती की देवी पृथ्वी को सौंप दिया और देवी पृथ्वी ने उस कन्या को राजा जनक और माता सुनैना को सौंप दिया,जिसके बाद वह कन्या सीता के रूप में जानी गई और बाद में इसी सीता के अपहरण के कारण भगवान राम ने रावण का वध किया .

वास्तव में सीता रावण और मंदोदरी की बेटी थी इसके पीछे बहुत बड़ा कारण थी वेदवती । सीता वेदवती का पुनर्जन्म थी । वेदवती एक बहुत सुंदर, सुशिल धार्मिक कन्या थी जो कि भगवान विष्णु की उपासक थी और उन्ही से विवाह करना चाहती थी । अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वेदवती ने कठिन तपस्या की । उसने सांसारिक जीवन छोड़ स्वयं को तपस्या में लीन कर दिया था ।

वेदवती उपवन में कुटिया बनाकर रहने लगी .
एक दिन वेदवती उपवन में तपस्या कर रही थी . तब ही रावण वहां से निकला और वेदवती के स्वरूप को देख उस पर मोहित हो गया और उसने वेदवती के साथ दुर्व्यवहार करना चाहा, जिस कारण वेदवती ने हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया और वेदवती ने ही मरने से पूर्व रावण को श्राप दिया कि वो खुद रावण की पुत्री के रूप में जन्म लेगी और रावण की मृत्यु का कारण बनेगी ।

सीता नवमी की पौराणिक कथा के अनुसार मारवाड़ क्षेत्र में एक वेदवादी श्रेष्ठ धर्मधुरीण ब्राह्मण निवास करते थे। उनका नाम देवदत्त था। उन ब्राह्मण की बड़ी सुंदर रूपगर्विता पत्नी थी, उसका नाम शोभना था। ब्राह्मण देवता जीविका के लिए अपने ग्राम से अन्य किसी ग्राम में भिक्षाटन के लिए गए हुए थे। इधर ब्राह्मणी कुसंगत में फंसकर व्यभिचार में प्रवृत्त हो गई।

अब तो पूरे गांव में उसके इस निंदित कर्म की चर्चाएं होने लगीं। परंतु उस दुष्टा ने गांव ही जलवा दिया। दुष्कर्मों में रत रहने वाली वह दुर्बुद्धि मरी तो उसका अगला जन्म चांडाल के घर में हुआ। पति का त्याग करने से वह चांडालिनी बनी, ग्राम जलाने से उसे भीषण कुष्ठ हो गया तथा व्यभिचार-कर्म के कारण वह अंधी भी हो गई। अपने कर्म का फल उसे भोगना ही था।

इस प्रकार वह अपने कर्म के योग से दिनों दिन दारुण दुख प्राप्त करती हुई देश-देशांतर में भटकने लगी। एक बार दैवयोग से वह भटकती हुई कौशलपुरी पहुंच गई। संयोगवश उस दिन वैशाख मास, शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी, जो समस्त पापों का नाश करने में समर्थ है।
सीता (जानकी) नवमी के पावन उत्सव पर भूख-प्यास से व्याकुल वह दुखियारी इस प्रकार प्रार्थना करने लगी- हे सज्जनों!

मुझ पर कृपा कर कुछ भोजन सामग्री प्रदान करो। मैं भूख से मर रही हूं- ऐसा कहती हुई वह स्त्री श्री कनक भवन के सामने बने एक हजार पुष्प मंडित स्तंभों से गुजरती हुई उसमें प्रविष्ट हुई। उसने पुनः पुकार लगाई- भैया! कोई तो मेरी मदद करो- कुछ भोजन दे दो।
इतने में एक भक्त ने उससे कहा- देवी! आज तो सीता नवमी है, भोजन में अन्न देने वाले को पाप लगता है, इसीलिए आज तो अन्न नहीं मिलेगा। कल पारणा करने के समय आना, ठाकुर जी का प्रसाद भरपेट मिलेगा, किंतु वह नहीं मानी।

अधिक कहने पर भक्त ने उसे तुलसी एवं जल प्रदान किया। वह पापिनी भूख से मर गई। किंतु इसी बहाने अनजाने में उससे सीता नवमी का व्रत पूरा हो गया।
अब तो परम कृपालिनी ने उसे समस्त पापों से मुक्त कर दिया। इस व्रत के प्रभाव से वह पापिनी निर्मल होकर स्वर्ग में आनंदपूर्वक अनंत वर्षों तक रही। तत्पश्चात् वह कामरूप देश के महाराज जयसिंह की महारानी काम कला के नाम से विख्यात हुई। उसने अपने राज्य में अनेक देवालय बनवाए, जिनमें जानकी-रघुनाथ की प्रतिष्ठा करवाई।

अत: सीता नवमी पर जो श्रद्धालु माता जानकी का पूजन-अर्चन करते है, उन्हें सभी प्रकार के सुख-सौभाग्य प्राप्त होते हैं। श्रीजानकी नवमी पर श्रीजानकी जी की पूजा, व्रत, उत्सव, कीर्तन करने से उन परम दयामयी श्रीमती सीता जी की कृपा हमें अवश्य प्राप्त होती है तथा इस दिन जानकी स्तोत्र, रामचंद्रष्टाकम्, रामचरित मानस आदि का पाठ करने से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

जिस प्रकार हिन्दू धर्म में ‘राम नवमी’ का महात्म्य है, उतना ही महत्व ‘जानकी जयंती’ या ‘सीता नवमी’ का भी है । सीता जयंती के उपलक्ष्य पर भक्तगण माता सीता की उपासना करते हैं। परम्परागत ढंग से श्रद्धा पूर्वक पूजन अर्चन किया जाता है तथा सीता जी की विधि-विधान पूर्वक आराधना की जाती है।

इस दिन व्रत का भी नियम बताया गया है जिसे करने हेतु व्रतधारी को व्रत से जुडे सभी नियमों का पालन करना चाहिए। इस पावन पर्व पर जो व्रत रखता है तथा भगवान रामचन्द्र जी सहित भगवती सीता का अपनी शक्ति के अनुसार भक्तिभाव पूर्वक विधि-विधान से सोत्साह पूजन वन्दन करता है, उसे पृथ्वी दान का फल, महाषोडश दान (16 महान दानों ) का फल, अखिल तीर्थ भ्रमण का फल और सर्वभूत दया का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।

‘सीता नवमी’ पर व्रत एवं पूजन हेतु अष्टमी तिथि को ही स्वच्छ होकर शुद्ध भूमि पर सुन्दर मण्डप बनायें। यह मण्डप सौलह, आठ अथवा चार स्तम्भों का होना चाहिए। मण्डप के मध्य में सुन्दर आसन रखकर भगवती सीता एवं भगवान श्रीराम की स्थापना करें। पूजन के लिए स्वर्ण, रजत, ताम्र, पीतल, काठ एवं मिट्टी इनमें से सामर्थ्य अनुसार किसी एक वस्तु से बनी हुई प्रतिमा की स्थापना की जा सकती है। मूर्ति के अभाव में चित्र द्वारा भी पूजन किया जा सकता है। नवमी के दिन स्नान आदि के पश्चात् जानकी-राम का श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहिए। पूजन में चावल, जौ, तिल आदि का प्रयोग करना चाहिए। ‘

श्री रामाय नमः’ तथा ‘श्री सीतायै नमः’ मूल मंत्र से प्राणायाम करना चाहिए। ‘श्री जानकी रामाभ्यां नमः’ मंत्र द्वारा आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, पंचामृत स्नान, वस्त्र, आभूषण, गन्ध, सिन्दूर तथा धूप-दीप एवं नैवेद्य आदि उपचारों द्वारा श्रीराम-जानकी का पूजन व आरती करनी चाहिए।इसके साथ रामचरित मानस से देवी सीता के प्राकट्य अथवा राम-जानकी विवाह प्रसंग का पाठ करना भी उत्तम है । दशमी के दिन फिर विधिपूर्वक भगवती सीता-राम की पूजा-अर्चना के बाद मण्डप का विसर्जन कर देना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धा व भक्ति से पूजन करने वाले पर भगवती सीता व भगवान राम की कृपा प्राप्ति होती है।

इस दिन आठ सौभाग्यशाली महिलाओं को सौभाग्य की वस्तुएं भेंट करें। लाल वस्त्र का दान जानकी जयंती को किया जाए तो यह अतिशुभ होता है। अगर प्रतिमा निर्माण कर पूजन करें तो दूसरे दिन पवित्र जल में उसका विसर्जन कर देना चाहिए। चढ़ाए गए पुष्प आदि भी साथ ही विसर्जित करने चाहिए। इससे मां सीता जीवन के पाप-संताप और दुखों का निवारण कर सौभाग्य का वरदान देती हैं।

इस व्रत को करने से सौभाग्य सुख व संतान की प्राप्त होती है, माँ सीता लक्ष्मी का हैं इसकारण इनके निमित्त किया गया व्रत परिवर में सुख-समृ्द्धि और धन कि वृद्धि करने वाला होता है. एक अन्य मत के अनुसार माता का जन्म क्योंकि भूमि से हुआ था, इसलिए वे अन्नपूर्णा कहलाती है. माता जानकी का व्रत करने से उपावसक में त्याग, शील, ममता और समर्पण जैसे गुण आते है ।

संजय गुप्ता

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एक दिन सभी शिष्य अपने गुरु के पास गए और बोले की वो दुनिया भर के सभी धार्मिक स्थानो पर जाना चाहते है ताकि उनका मन स्वच्छ और पवित्र हो जाए और उनके अंदर एक बदलाव आ सके, गुरु चंद पलो के शांत रहे और फिर उन्हे एक एक करेला दिया और बोले की जिस जिस जगह तुम घूमो तो अपने साथ ये करेला जरूर रखना, इसका कारण मै तुम्हें तुम्हारे वापस आने के बात बताऊंगा, सभी ने उनकी आज्ञा का पालन किया और उनके कहे अनुसार ही किया, वो जिस जिस पवित्र जगह गए, उन्होने करेले को भी अपने साथ रखा।
पूरी यात्रा करने के बाद वापस जब वो लोटे तो गुरु जी ने उनसे पूछा की जिस काम के लिए वो गए थे क्या वो पूरा हुआ, क्या आप सभी का मन शांत हुआ? सभी के चहरे पर मायूसी थी, तभी गुरु ने एक शिष्य से कहा की सभी से वो करेला ले लो और उसकी सब्जी बनाकर दो, शिष्य ने ऐसा ही किया, खाते ही गुरु ने गुस्से से कहा सभी तीर्थ स्थानो पर ले जाने के बावजूद भी की इन करेलो का स्वाद तो बहुत कड़वा है और उनसे इसका कारण पूछा, सभी शिष्य हैरान थे।
तभी उनमे से एक ने कहा की करेला तो प्राक्रतिक रूप से ही कड़वा होता है, तीर्थ यात्रा पर जाने से इसका स्वाद तो नहीं बदल सकता, तभी गुरु ने कहाँ की बिलकुल सही, मै भी तुम्हें यही समझाना चाहता हूँ, जब तक इंसान अपने आप मे खुद बदलाव नहीं लाएगा कोई भी गुरु या यात्रा उसकी ज़िंदगी नहीं बदल सकती, सभी तीर्थ यात्राएं वास्तव मे हमारे मन के अंदर ही बसी है, जरूरत है सिर्फ ध्यान से देखनी की….
हम कई बार अपने अंदर कुछ बदलाव तो लाना चाहते है लेकिन लाने की ठीक से कोशिश नहीं करते और हज़ार तरीके के बहाने तैयार कर लेते है। जिस तरह नीम और करेले का स्वाद कड़वा, इमली का स्वाद खट्टा और हर फल का अपना स्वाद होता होता है ठीक उसी तरह हर इंसान का स्वभाव भी अलग अलग होता है, कोई भी इंसान अपने आप को बदल नहीं सकता सिर्फ अपने आप मे सुधार ला सकता है, और सुधार करने के लिए अपनी कमियों को पहचानना जरूरी है जो सिर्फ हम खुद ही कर सकते है….
नजरों को बदलो तो नजरिए बदल जाते है,
सोच को बदलो तो सितारे बदल जाते है।
जय श्री कृष्णा………….

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पौराणिक कहानी:::::::::::जरूर पढ़ें

इंद्रपुत्र जयंत को श्रीराम से पहले नृसिंह भगवान ने भी दिया था दंड

आपने रामायण में पढ़ा होगा कि जब भगवान् श्रीराम सीता और लक्ष्मण के संग चित्रकूट में निवास कर रहे थे, तब एक दिन इंद्र का पुत्र जयंत भगवान श्रीराम के बल की परीक्षा लेने के लिए कौए का रूप धरकर आया और सीता जी के चरण में चोंच मारकर भागा। सीता जी के चरण से रक्त की धारा बहते देख भगवान् श्रीराम ने एक सींक को अभिमंत्रित कर जयंत की ओर छोड़ा। जयंत की रक्षा करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। अंततः नारद जी के कहने पर वह राम के पास आकर क्षमा माँगने लगा। सीताजी ने उस कौए का शीश श्रीराम के चरणों में रख करुणानिधान श्रीराम से उस दुष्ट जयंत को क्षमा करने की प्रार्थना की। अतः श्रीराम ने दया कर मात्र एक नेत्र से अँधा कर उसे छोड़ दिया।
किंतु क्या आप जानते हैं कि इंद्र का यह पुत्र अपने कुकर्मों के कारण इससे पूर्व भी नृसिंह भगवान् के हाथों दंड पा चुका था?

प्राचीन काल में अंतर्वेदी नामक नगरी में रवि नाम का एक माली रहता था। उसने अपने घर के अंदर ‘वृंदावन’ नाम का तुलसी का एक बगीचा लगा रखा था। उस बगीचे में उसने तुलसी के साथ-साथ मल्लिका, मालती, जाती, वकुल आदि के सुंदर वृक्ष लगाए थे, जिनके पुष्पों की सुगंध से चारों दिशाएँ सुवासित रहती थीं। रवि माली ने उस बगीचे की चारदीवारी बहुत ऊँची और चौड़ी बनवाई थी, जिससे कि कोई भी व्यक्ति, पशु-पक्षी उसके अंदर प्रवेश न कर सके।
रवि माली प्रतिदिन प्रातःकाल में अपनी पत्नी के संग पुष्प चुनकर मालाएँ बनाता था, जिनमें से कुछ मालाएँ वह सर्वप्रथम अपने इष्टदेव नृसिंह भगवान् को अर्पित करता था। इसके पश्चात कुछ मालाएँ ब्राह्मणों को दे देता था और शेष मालाएँ बेचकर वह अपने परिवार का पालन-पोषण करता था।
एक बार इंद्र का पुत्र जयंत रात्रि में स्वर्ग से पृथ्वीलोक पर घूमने आया। उसके रथ पर स्वर्ग की सुंदर अप्सराएँ भी उपस्थित थीं। रवि माली द्वारा लगाए गए बगीचे के पुष्पों की मधुर सुगंध जब जयंत और अप्सराओं की नासिका में गईं तो वे सब उस बगीचे की ओर खिंचे चले आए। उन पुष्पों की सुगंध इतनी मधुर और भीनी-भीनी थी कि जयंत ने उस बगीचे के सारे पुष्प तोड़ लिए और उन्हें लेकर चला गया। जब प्रातःकाल रवि माली अपनी पत्नी के संग बगीचे में आए तो वहाँ एक भी पुष्प न देखकर चकित और दुःखी हुए। वे सोचने लगे कि हाय! आज अपने नृसिंह भगवान् और ब्राह्मणों को पुष्प अर्पित करने के नियम को कैसे पूर्ण करूँगा।
इधर जयंत का लोभ और दुष्टता बढ़ती ही गई। अब वह प्रतिदिन रात्रि में अप्सराओं के संग उस बगीचे में आता और सारे पुष्प चोरी कर चला जाता। जब पुष्प प्रतिदिन चोरी होने लगे तो माली अत्यंत चिंतित हुआ और उसने इस रहस्य का पता लगाने के लिए रात्रि भर बगीचे में ही रखवाली करने का निश्चय किया।

रात्रि होने पर जयंत प्रतिदिन की भाँति आया और पुष्प लेकर रथ पर बैठकर अप्सराओं के संग हास्य-विनोद करता हुआ चला गया। यह देखकर रवि माली अत्यंत दुःखी हुआ और नृसिंह भगवान् से बगीचे की रक्षा करने की प्रार्थना करते हुए सो गया।
अपने भक्त की व्यथा देखकर नृसिंह भगवान् ने स्वप्न में उसे दर्शन देते हुआ कहा, “पुत्र! तुम बगीचे के समीप मेरा निर्माल्य लाकर छिड़क दो।”
रवि माली स्वप्न टूटते ही चकित और आनंदित होकर उठ बैठा। उसने अपने इष्टदेव की आज्ञा के अनुसार बगीचे में निर्माल्य छिड़क दिया। अगली रात्रि को जयंत आया और रथ से उतरकर पुष्प तोड़ने लगा। अचानक उसने नृसिंह भगवान् के निर्माल्य को लाँघ दिया। जब वह बगीचे के सारे पुष्प बटोरकर रथ की ओर बढ़ा, तो वह रथ पर चढ़ नहीं पाया। जयंत अत्यंत चकित हुआ। तब बुद्धिमान सारथि ने उसे बताया कि नृसिंह भगवान् के निर्माल्य को लाँघने के कारण उसकी रथ पर चढ़ने की शक्ति लुप्त हो गई है। ऐसा कहकर वह रथ चलाने लगा। जयंत ने गिड़गिड़ाते हुए सारथि से इस पाप के निवारण का उपाय पूछा। सारथि ने कहा कि यदि वह कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर 12 वर्ष से चल रहे तथा कुछ दिन में समाप्त होने वाले परशुराम जी के यज्ञ में प्रतिदिन ब्राह्मणों की जूठन साफ करे तो उसे उसके पाप से मुक्ति मिल सकती है। ऐसा कहकर सारथि अप्सराओं के संग रथ लेकर चला गया।
जयंत को अपनी दुष्टता पर अत्यंत पश्चाताप हुआ। वह कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर आया और वहाँ यज्ञभूमि में ब्राह्मणों की जूठन साफ करने लगा। 12वाँ वर्ष पूरा होने पर ब्राह्मणों ने संदेहयुक्त होकर जयंत से उनकी जूठन साफ करने किंतु यज्ञ में भोजन न करने का कारण पूछा। तब जयंत को अपनी दुष्टता की सारी घटना सत्य-सत्य उन्हें बतानी पड़ी। इस प्रकार ब्राह्मणों की जूठन साफ करने और उनके समक्ष अपने पाप का कथन करने से जयंत के पाप की निवृत्ति हो गई। वह रथ पर चढ़कर स्वर्गलोक चला गया। यह कथा नृसिंह पुराण के 28वें अध्याय से ली गई है।

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II श्रीहरिः II

एक तो धनी आदमीका और दुसरे ज्यादा पढ़े-लिखे विद्वान् का उद्धार होना कठिन होता है । धनी आदमीके धनका और विद्वान् के विद्याका अभिमान आ जाता है । अभिमान सब तरहसे नुकसान करनेवाला है – ‘अभिमानद्वेषित्वाद्दैन्यप्रियत्वाच्च’

  • परम श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी महाराज
    ‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे (पृ. ४७)