Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

“अनपढ़ जाट पढ़ा जैसा,
पढ़ा जाट खुदा जैसा”

यह घटना सन् 1270-1280 के बीच की है । दिल्ली में बादशाह
बलबन का राज्य था । उसके दरबार में एक अमीर दरबारी था ।जिसके
तीन बेटे
थे । उसके पास उन्नीस घोड़े भी थे । मरने से पहले वह वसीयत
लिख
गया था कि इन घोड़ों का आधा हिस्सा… बड़े बेटे को,
चौथाई
हिस्सा मंझले को और पांचवां हिस्सा सबसे छोटे बेटे को बांट
दिया जाये

बेटे उन 19 घोड़ों का इस तरह बंटवारा कर ही नहीं पाये और
बादशाह के
दरबार में इस समस्या को सुलझाने के लिए अपील की ।
बादशाह
ने
अपने सब दरबारियों से सलाह ली पर उनमें से कोई भी इसे हल
नहीं कर
सका ।
उस समय प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो बादशाह
का दरबारी कवि था ।
उसने जाटों की भाषा को समझाने के लिए एक पुस्तक
भी बादशाह के
कहने पर लिखी थी जिसका नाम “खलिक बारी” था ।
खुसरो ने
कहा कि मैंने जाटों के इलाक़े में खूब घूम कर देखा है और
पंचायती फैसले
भी सुने हैं और सर्वखाप पंचायत का कोई पंच ही इसको हल कर
सकता है ।
नवाब के लोगों ने इन्कार किया कि यह
फैसला तो हो ही नहीं सकता..!
परन्तु कवि अमीर खुसरो के कहने पर बादशाह बलबन ने सर्वखाप
पंचायत में अपने एक खास आदमी को चिट्ठी देकर गांव-अवार
(जिला- भरतपुर) राजस्थान भेजा (इसी गांव में शुरू से सर्वखाप पंचायत
का मुख्यालय चला आ रहा है और आज भी मौजूद है) ।
चिट्ठी पाकर पंचायत ने प्रधान पंच चौधरी रामसहाय सूबेदार
को दिल्ली भेजने
का फैसला किया। चौधरी साहब अपने घोड़े पर सवार होकर
बादशाह के
दरबार में दिल्ली पहुंच गये और बादशाह ने अपने सारे
दरबारी बाहर के
मैदान में इकट्ठे कर लिये । वहीं पर 19 घोड़ों को भी लाइन में
बंधवा दिया ।
चौधरी रामसहाय ने अपना परिचय देकर कहना शुरू किया
“शायद
इतना तो आपको पता ही होगा कि हमारे यहां राजा और
प्रजा का सम्बंध बाप-बेटे का होता है और
प्रजा की सम्पत्ति पर
राजा का भी हक
होता है । इस नाते मैं जो अपना घोड़ा साथ लाया हूं, उस पर
भी राजा का हक बनता है । इसलिये मैं यह
अपना घोड़ा आपको भेंट
करता हूं और इन 19 घोड़ों के साथ मिला देना चाहता हूं, इसके
बाद मैं
बंटवारे के बारे में अपना फैसला सुनाऊंगा ।”
बादशाह बलबन ने इसकी इजाजत दे दी और चौधरी साहब ने
अपना घोड़ा उन 19 घोड़ों वाली कतार के आखिर में बांध
दिया, इस तरह
कुल बीस घोड़े हो गये ।
अब चौधरी ने उन घोड़ों का बंटवारा इस तरह कर दिया-
– आधा हिस्सा (20 ¸ 2 = 10) यानि दस घोड़े उस अमीर के बड़े
बेटे
को दे दिये ।
चौथाई हिस्सा (20 ¸ 4 = 5) यानि पांच घोडे मंझले बेटे
को दे
दिये ।
– पांचवां हिस्सा (20 ¸ 5 = 4) यानि चार घोडे छोटे बेटे को दे
दिये ।
इस प्रकार उन्नीस (10 + 5 + 4 = 19)
घोड़ों का बंटवारा हो गया ।
बीसवां घोड़ा चौधरी रामसहाय का ही था जो बच गया ।
बंटवारा करके
चौधरी ने सबसे कहा – “मेरा अपना घोड़ा तो बच ही गया है,
इजाजत
हो तो इसको मैं ले जाऊं ?”
बादशाह ने हां कह दी और चौधरी साहब का बहुत सम्मान और
तारीफ
की । चौधरी रामसहाय अपना घोड़ा लेकर अपने गांव सौरम
की तरफ कूच
करने ही वाले थे, तभी वहां पर मौजूद कई हजार दर्शक इस पंच के
फैसले
से गदगद होकर नाचने लगे और कवि अमीर खुसरो ने जोर से
कहा –
“अनपढ़ जाट पढ़ा जैसा, पढ़ा जाट खुदा जैसा”।
सारी भीड़ इसी पंक्ति को दोहराने लगी । तभी से यह
कहावत
हरियाणा,
पंजाब, राजस्थान व उत्तरप्रदेश तंथा दूसरी जगहों पर फैल गई ।
यहां यह बताना भी जरूरी है कि 19 घोड़ों के बंटवारे के समय
विदेशी यात्री और इतिहासकार इब्नबतूता भी वहीं दिल्ली दरबार में
मौजूद था । यह वृत्तांत सर्वखाप पंचायत के अभिलेखागार में
मौजूद है।
धन्यवाद.

संजय गुप्ता

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भक्त श्री भानुदास जी
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     श्री भानुदास जी आश्वलायनसूत्री ऋग्वेदी ब्राह्मण थे।इनके कुल में परम्परा से श्री विट्ठलोपासना चली आयी थी। यथासमय इनका उपनयन हुआ । इन्होंने दस वर्ष की उम्र में एक प्राचीन जीर्ण मन्दिर के तहखाने में बैठकर सात दिनों तक लगातार  श्री सूर्य नारायण की अखण्ड उपासना की। आठवें दिन भगवान सूर्यदेव ने इनको दर्शन देकर कृतार्थ किया।तभी से इनका नाम भानुदास हुआ । पीछे इन्होंने तीन गायत्री-पुनरश्चरण किये। यथासमय इनका विवाह हुआ,  सन्तान हुई।यहाँ तक ये काम-धंधा कुछ भी नहीं करते थे। इनके कुछ हितैषियों ने इन्हें कुछ रुपये देकर कपड़े का व्यापार करा दिया। ये गाँव में अपनी दूकान रखते और हर आठवें दिन घोड़े पर कपड़ा लादकर आस-पास के गाँवों में बेच आते। जो मिल जाता, उसी से निर्वाह करते,पर कभी झूठ न बोलते। इनकी सच्चाई देखकर अपने को चतुर मानने वाले व्यापारी यही कहा करते कि 'ये व्यापार करके कुछ कमा न सकेंगे ।' दो बार इनको बड़ा घाटा लगा, पर इन्होंने अपने 'सत्य ' व्रत को नहीं छोड़ा। अन्त में इनकी सचाई की ऐसी साख जमी कि ग्राहक इन्हीं की दूकान पर टूट पड़ने लगे। धन इनके पास नदी की तरह बहता हुआ आने लगा। चार-पाँच वर्ष में ये बहुत बड़े धनी हो गये। व्यापार में ये कभी भगवान को नहीं भूले। सतत नाम स्मरण करते हुए ही सारा काम काज करते। समय पर सद्ग्रन्थ पठन भी किया करते। पण्ढरी की आषाढ़ी-कार्तिकी वारी इनकी कभी न चूकी। भक्तों ने शीघ्र ही जान लिया कि ये एक महान भक्त हैं।
     इन दिनों विजयनगर के राजा महाबली और महापराक्रमी कृष्णराय थे, जिन्होंने विजयनगर साम्राज्य का चारों ओर विस्तार किया था और उसकी सर्वांगीण उन्नति की थी। ये विट्ठल भगवान के दर्शनों के लिए जब पण्ढरपुर आये, तब लौटते हुए श्री विट्ठलमूर्ति को अपनी राजधानी में ले गये । आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर जब भक्त लोग एकत्र हुए तब उन्होंने देखा कि मन्दिर में श्री विट्ठलमूर्ति नहीं है । इससे वे बहुत दुखी हुये। भक्तों ने यह संकल्प किया कि जब तक भगवान फिर से मन्दिर में नहीं पधारेंगे; तब तक हम लोग यहीं उनका भजन करते हुए पड़े रहेंगे । इन भक्तों में भानुदास भी थे। उन्होंने कहा, 'मैं भगवान को ले आता हूँ ।' यह कहकर भानुदास विजयनगर गये। मध्यरात्रि के समय वे मन्दिर के समीप पहुँचे । दरवाजों में जो ताले लगे थे, वे अपने आप खुल गये, पहरेदार सो गए और भानुदास मन्दिर में घुसकर भगवान के सामने जा उपस्थित हुए । भगवान के चरणों को आलिंगन कर उन्हें प्रेमाश्रुओं से नहलाया और हाथ जोड़कर कहने लगे---'भगवन्! अब आप मेरे साथ चलिये।' भगवान ने अपने गले का नवरत्नहार भानुदास के गले में डाल दिया। रत्नहार सहित भानुदास पकड़े गए । राजाज्ञा से सिपाही उन्हें सूली पर चढ़ाने के लिए ले गये। उस समय भानुदास ने श्री विट्ठल को पुकार कर कहा---'चाहे आकाश टूट पड़े या ब्रह्माण्ड फट जाय या तीनों भुवन दावानल के ग्रास बन जायँ, तो भी हे विट्ठल!  मैं तो तुम्हारी ही प्रतीक्षा करूँगा ।' इस प्रकार भानुदास भगवान के साथ तन्मय हो रहे थे,  इतने में ही जिस सूली पर वे चढ़ाये जाने को थे, उसमें पत्ते निकल आये और देखते-देखते फल-फूलों से लदा एक सुन्दर वृक्ष ही बन गया। जब राजा कृष्णराय को यह मालूम हुआ,  तब यह जानकर कि भानुदास चोर नहीं कोई बड़े महापुरुष हैं, वे दौड़े हुए भानुदास के समीप आये और उनके चरणों पर लोट गये। तब भानुदास जी ने भी राजा से कहा---'मैं श्री विट्ठल भगवान को पण्ढरपुर ले जाने के लिये यहाँ आया हूँ ।' राजा ने रत्नजटित पालकी में भगवान को पधरवाकर और संरक्षकों की एक छोटी सी सेना साथ देकर भानुदास के साथ बड़े ठाठ-बाट के साथ विदा किया।कार्तिकी एकादशी से पहले भगवान को लेकर भानुदास पण्ढरपुर लौट आये। तबसे इसी उपलक्ष में पण्ढरपुर में कार्तिकी एकादशी के दिन बड़े समारोह के साथ भगवान की सवारी निकलती है। इन्हीं भानुदास के वंश में आगे चलकर महात्मा श्री एकनाथ महाराज अवतीर्ण हुए ।
             (भक्त चरितांक)
             ( कल्याण- 40)

संजय गुप्ता

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सत्संग की महिमा और साथ मे सत्संग से संबंधित एक लघु दृष्टान्त !!!!!

  • तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
    तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥

भावार्थ:-हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥

हमारे ग्रन्थ पुराणों, संत-महात्माओं और भगवन ने सत्संग की अनंत महिमा गाई है। श्रीमद भागवत पुराण में आया है की सत्संग करो। जब आशक्ति संसार के प्रति होती है तो वह बंधन बन जाती है और जब यही आशक्ति भगवान के प्रति हो जाती है तो मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं।

‘सत्’ का अर्थ है परम सत्य। इसलिए सत्य का संग करना ही सत्संग कहलाता है। यहाँ पर सत्य का अर्थ केवल भगवान से है। क्योंकि वो परम सत्य है। आप यहाँ पर सत्संग का अर्थ पढ़ रहे हैं। ये सत्य है। थोड़ी देर बाद आप अपने काम करेंगे। ये भी सत्य है। लेकिन परम सत्य नही है। क्योंकि परम सत्य वो है जो अब भी यहाँ है।

कल भी था और कल भी रहेगा। इसलिए केवल भगवान ही परम सत्य है। जब आप भगवान के साथ हैं तभी आप सत्संग कर रहे हैं। इसके लिए आपको केवल किसी कथा पंडाल या सत्संग भवन में जाने की जरुरत नही है। या कोई लम्बी चौड़ी दाढ़ी वाले किसी बाबा के पास जाने की जरुरत नही हैं।

आपके पास समय है तो कथा में जरूर जाइये लेकिन समय नही है तो आप जहाँ पर भी हैं यदि आपको भगवान की याद आ गई तो आप सत्संग में हैं। आप कोई अच्छी पुस्तक पढ़ रहे हैं वो भी सत्संग है। अपने दोस्तों से भगवत चर्चा कर रहे हैं वो भी सत्संग है। सबके कल्याण की आप सोच रहे हैं तो वो भी सत्संग है। यदि आपसे कोई भगवान की कथा पूछना चाहे तो बता दो, ये सत्संग है।

यदि आपको कोई भगवान की कथा, चर्चा सुनाना चाहे तो आप सुन लो ये भी सत्संग है। अगर कोई नही है तो भगवान को ह्रदय से याद कीजिये ये भी सत्संग है। क्योंकि सत्संग से ह्रदय में प्रकाश आ जाता है। और वो प्रकाश भगवान ही हैं। और एक बार ह्रदय में भगवान आ गए तो किसी की भी कमी महसूस नही होगी।

कृष्ण ने उद्धव से जाते हुए कहा था कि उद्धव मुझे अफसोस है कि मुझे जीवन में अच्छे लोग नहीं मिले। जाते-जाते कह गए यदि कोई भूले से अच्छा आदमी आपके पास आए तो बाहों में भर लेना, दिल में उतार लेना। बड़ा मुश्किल है दुनिया में अच्छे आदमी को ढूंढऩा, नहीं मिलेंगे। आपको ऐसा लगता है कि आपने माता-पिता की सेवा कर ली, सत्संग भी कर लिया लेकिन चिंतन करके आपने जो भी कुछ किया है, रात को सोने से पहले स्वयं से एक बार पूछ लीजिएगा कि आज सबकुछ ठीक रहा।

भगवान कहते हैं – जो लोग सहनशील, दयालु, समस्त देहधारियों के अकारण हितू, किसी के प्रति भी शत्रुभाव न रखनेवाले, शान्त, सरलस्वभाव और सत्पुरुषों का सम्मान करनेवाले होते हैं, जो मुझमें अनन्यभाव से सुदृढ़ प्रेम करते हैं, मेरे लिए सम्पूर्ण कर्म तथा अपने सगे-संबंधियों को भी त्याग देते हैं और मेरे परायण रहकर मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण, कीर्तन करते हैं तथा मुझमें ही चित्त लगाए रहते है- उन भक्तों को संसार के तरह-तरह के ताप कोई कष्ट नहीं पहुंचाते हैं।

ऐसे-ऐसे सर्वसंगपरित्यागी महापुरुष ही साधू होते हैं, तुम्हें उन्ही के संग की इच्छा करनी चाहिए, क्योंकि वे आसक्ति से उत्पन्न सभी दोषों को हर लेनेवाले हैं । सत्पुरुषों के समागम से मेरे पराक्रमों का यथार्थ ज्ञान करानेवाली तथा हृदय और कानों को प्रिय लगनेवाली कथाएँ होती हैं । उनका सेवन करने से शीघ्र ही मोक्षमार्ग में श्रद्धा, प्रेम और भक्ति का क्रमशः विकास होगा।

सत्संग से शांति मिलती है। सत्संग हमे अच्छे बुरे की पहचान बताता है । ‘पुण्य कर्म के प्रभाव से ही इंसान को साधु व संतों का संग व वचन-प्रवचन सुनने को मिलते हैं।

सत्संग संत बनाता है। सत्संग राम बनने की प्रेरणा देता है। जबकि कुसंग हमें हराम बनाता है। सत्संग से हमें अपने साधना-पथ पर दृढता से आगे बढने की प्रेरणा मिलती है

  • संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।
    कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥

सत्संग से संबंधित एक लघु दृष्टान्त ,,,,नारद और कृष्ण जी सत्संग महिमा कथा !!!!!

एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गये और प्रणाम करते हुए बोलेः “हे लक्ष्मीपते, हे कमलनयन ! कृपा करके इस दास को सत्संग की महिमा सुनाइये।”

भगवान ने मंद-मंद मुस्कराते हुए अपनी मधुर वाणी में कहाः हे नारद ! सत्संग की महिमा का वर्णन करने में तो वाणी की गति नहीं है।

” फिर क्षण भर रूककर श्री भगवान बोलेः ” हाँ, यहाँ से तुम आगे जाओ। वहाँ इमली के पेड़ पर एक बड़ा विचित्र, रंगीन गिरगिट है, वह सत्संग की महिमा जानता है। उसी से पूछ लो।”

देवर्षि खुशी-खुशी इमली के पेड़ के पास गये और योगविद्या के बल से गिरगिट से बातें करने लगे। उन्होंने गिरगिट से पूछाः “सत्संग की महिमा क्या है ? कृपया बतलाइये।”

सवाल सुनते ही वह गिरगिट पेड़ से नीचे गिर गया और छटपटाते हुए प्राण छोड़ दिये। नारदजी को बड़ा अचंभा हुआ। वे डरकर लौट आये और भगवान को सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

भगवान ने मुस्कराते हुए कहाः “अच्छा, नगर के उस धनवान के घर जाओ और वहाँ जो तोता पिंजरे में दिखेगा, उसी से सत्संग की महिमा पूछ लेना।”

नारदजी क्षण भर में वहाँ पहुँच गये एवं तोते से वही सवाल पूछा, मगर देवर्षि के देखते ही देखते उसने आँखें मूंद लीं और उसके भी प्राणपखेरू उड़ गये। अब तो नारद जी बड़े घबरा गये।

वे तुरंत भगवान के पास लौट आये और कहने लगेः “यह क्या लीला है भगवन् ! क्या सत्संग का नाम सुनकर मरना ही सत्संग की महिमा है ?”

श्री भगवान हँसकर बोलेः “वत्स ! इसका मर्म भी तुमको समझ में आ जायेगा। इस बार नगर के राजा के महल में जाओ और उसके नवजात पुत्र से अपना प्रश्न पूछो।”

नारदजी तो थरथर काँपने लगे और बोलेः “हे प्रभु ! अब तक तो बच गया लेकिन अब की बार तो लगता है मुझे ही मरना पड़ेगा। अगर वह नवजात राजपुत्र मर गया तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा।”

भगवान ने नारदजी को अभयदान दिया। नारदजी दिल मुट्ठी में रखकर राजमहल में आये। वहाँ उनका बड़ा सत्कार किया गया। अब तक राजा को कोई संतान नहीं थी। अतः पुत्र के जन्म पर बड़े आनन्दोल्लास से उत्सव मनाया जा रहा था।

नारदजी ने डरते-डरते राजा से पुत्र के बारे में पूछा। नारदजी को राजपुत्र के पास ले जाया गया। पसीने से तर होते हुए, मन-ही-मन श्रीहरि का नाम लेते हुए नारदजी ने राजपुत्र से सत्संग की महिमा के बारे में प्रश्न किया तो वह नवजात शिशु हँस पड़ा और बोलाः “महाराज ! चंदन को अपनी सुगंध और अमृत को अपने माधुर्य का पता नहीं होता। ऐसे ही आप अपनी महिमा नहीं जानते इसलिए मुझसे पूछ रहे हैं।

वास्तव में आप ही के क्षणमात्र के संग से मैं गिरगिट की योनि से मुक्त हो गया और आप ही के दर्शनमात्र से तोते की क्षुद्र योनि से मुक्त होकर इस मनुष्य जन्म को पा सका।

आपके सान्निध्यमात्र से मेरी कितनी सारी योनियाँ कट गयीं और मैं सीधे मानव-तन में पहुँच गया, राजपुत्र बना। यह सत्संग का कितना अदभुत प्रभाव है ! हे ऋषिवर ! अब मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य को पा लूँ।”

नारदजी ने खुशी-खुशी आशीर्वाद दिया और भगवान श्री हरि के पास जाकर सब कुछ बता दिया। श्रीहरि बोलेः “सचमुच, सत्संग की बड़ी महिमा है। संत का सही गौरव या तो संत जानते हैं या उनके सच्चे प्रेमी भक्त !” इसलिए जब भी समय मिले सत्संग कीजिये ।

संजय गुप्ता

Posted in संस्कृत साहित्य

21.4.18 ¤¤ भौमासुर का रहस्य ¤¤
भौम का अर्थ है शरीर । शारीरिक सुख मेँ ही रमा रहे , वह है भौमासुर । विलासी जीव ही भौमासुर है । भौमासुर ने सोलह हजार कन्याओ को बन्दी बनाया था। ये सोलह हजार कन्याएँ वेदो की ऋचाएँ है वेद के तीन काण्ड और लाख मन्त्र है¤¤¤¤¤
1. कर्मकाण्ड ¤¤¤ इसके अस्सी हजार मन्त्र है जो ब्रह्मचारी के लिए हैँ ।
2. उपासनाकाण्ड ¤¤¤ इसके सोलह हजार मन्त्र हैँ , जो गृहस्थ के लिए हैँ ।
3. ज्ञानकाण्ड ¤¤¤ इसके चार हजार मन्त्र हैँ , जो सन्यासियोँ के लिए है ।
वेदान्त का ज्ञान विरक्त के लिए है , विलासी के लिए नहीँ। विलासी उपनिषद् का तत्वज्ञान समझ नही पाता किन्तु भागवत तो सभी के लिए है ।
वेदो ने ईश्वर के स्वरुप का वर्णन तो किया किन्तु उनको पा न सके । सो वेदोँ की ऋचा कन्या बनकर श्रीकृष्ण से विवाह करने आयीँ । वेदोँ के मन्त्र केवल शब्दरुप नहीँ है, बल्कि प्रत्येक मन्त्र ऋषि हैँ, देव हैँ । वेदमन्त्र के देव तपश्चर्या करके थक हार गये फिर भी ब्रह्मसम्बन्ध नहीँ हो पाया । सो कन्या का रुप लेकर आये । वेद की ऋचाएँ कन्या बनकर प्रभू सेवा करने आयीँ । गृहस्थाश्रम धर्म का वर्णन वेद के सोलह हजार मन्त्रोँ मेँ किया गया है सो श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियाँ कही गयी हैँ ।
श्रीकृष्ण ने सोलह हजार कन्याओ को मुक्त तो किया किन्तु वे सब भौमासुर के कारागृह मेँ बन्द थीँ सो जगत का कोई पुरुष उनसे विवाह करने के लिए तैयार नहीँ हुआ। वे सभी कन्याएँ श्रीकृष्ण की शरण मेँ आयी । श्रीकृष्ण ने उन सभी कन्याओँ के साथ विवाह कर लिया ।।
विलासी भौमासुर ने कन्याओ को बन्दी बनाया अर्थात् अनधिकारी कामी व्यक्ति ने मन्त्रोँ का अनर्थ किया था । कामी व्यक्ति मन्त्र का अपने विलासी मन की पुष्टि के लिए विकृत अर्थ करता है । ऐसे व्यक्ति मंत्रो का दुरुपयोग करते हैँ ।
वेद का तात्पर्य भोग मेँ नही त्याग मेँ है । वेद को भोग नही , त्याग ही इष्ट है । वेदो का तात्पर्य भोगपरक नही , निवृतिपरक है । प्रवृत्तियो को एक साथ छोड़ा तो नही जा सकता किन्तु कुछ भी करे , धर्म की मर्यादा मे रहकर करेँ । धर्म की मर्यादा मेँ रहकर ही अर्थोपार्जन एवं कामोपभोग करेँ । वेद कहते हैँ कि भोगोँ को धीरे धीरे कम करते हुए संयम को बढ़ाओ । वेदो ने प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनो की चर्चा की है किन्तु निर्देश निवृत्ति का ही है ।।

संजय गुप्ता

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दो सुन्दर प्रसंग एक श्रीकृष्ण की और एक श्री राम की

माखन चोरी का….

माखन चोर नटखट श्री कृष्ण को रंगे हाथों पकड़ने के लिये एक ग्वालिन ने एक अनोखी जुगत भिड़ाई।

उसने माखन की मटकी के साथ एक घंटी बाँध दी, कि जैसे ही बाल कृष्ण माखन-मटकी को हाथ लगायेगा, घंटी बज उठेगी और मैं उसे रंगे हाथों पकड़ लूँगी।

बाल कृष्ण अपने सखाओं के साथ दबे पाँव घर में घुसे।

श्री दामा की दृष्टि तुरन्त घंटी पर पड़ गई और उन्होंने बाल कृष्ण को संकेत किया।

बाल कृष्ण ने सभी को निश्चिंत रहने का संकेत करते हुये, घंटी से फुसफसाते हुये कहा:-

“देखो घंटी, हम माखन चुरायेंगे, तुम बिल्कुल मत बजना”

घंटी बोली “जैसी आज्ञा प्रभु, नहीं बजूँगी”

बाल कृष्ण ने ख़ूब माखन चुराया अपने सखाओं को खिलाया – घंटी नहीं बजी।

ख़ूब बंदरों को खिलाया – घंटी नहीं बजी।

अंत में ज्यों हीं बाल कृष्ण ने माखन से भरा हाथ अपने मुँह से लगाया , त्यों ही घंटी बज उठी।

घंटी की आवाज़ सुन कर ग्वालिन दौड़ी आई।
ग्वाल बालों में भगदड़ मच गई।
सारे भाग गये बस श्री कृष्ण पकड़ाई में आ गये।

बाल कृष्ण बोले – “तनिक ठहर गोपी , तुझे जो सज़ा देनी है वो दे दीजो , पर उससे पहले मैं ज़रा इस घंटी से निबट लूँ…क्यों री घंटी…तू बजी क्यो…मैंने मना किया था न…?”

घंटी क्षमा माँगती हुई बोली – “प्रभु आपके सखाओं ने माखन खाया , मैं नहीं बजी…आपने बंदरों को ख़ूब माखन खिलाया , मैं नहीं बजी , किन्तु जैसे ही आपने माखन खाया तब तो मुझे बजना ही था…मुझे आदत पड़ी हुई है प्रभु…मंदिर में जब पुजारी भगवान को भोग लगाते हैं तब घंटियाँ बजाते हैं…इसलिये प्रभु मैं आदतन बज उठी और बजी…”

श्री गिरिराज धरण की जय…
श्री बाल कृष्ण की जय
राधे~राधे💝👏👏

उस समय का प्रसंग है जब
केवट भगवान के चरण धो रहा है.
बड़ा प्यारा दृश्य है, भगवान का एक पैर धोता का उसे निकलकर कठौती से बाहर रख देता है,
और जब दूसरा धोने लगता है तो
पहला वाला पैर गीला होने से
जमीन पर रखने से धूल भरा हो जाता है,
केवट दूसरा पैर बाहर रखता है फिर पहले वाले को धोता है,
एक-एक पैर को सात-सात बार धोता है.
कहता है प्रभु एक पैर कठौती मे रखिये दूसरा मेरे हाथ पर रखिये, ताकि मैला ना हो.
जब भगवान ऐसा करते है
तो जरा सोचिये क्या स्थिति होगी , यदि एक पैर कठौती में है दूसरा केवट के हाथो में, भगवान दोनों पैरों से खड़े नहीं हो पाते बोले – केवट मै गिर जाऊँगा ?
केवट बोला – चिंता क्यों करते हो सरकार !
दोनों हाथो को मेरे सिर पर रखकर खड़े हो जाईये, फिर नहीं गिरेगे ,
जैसे कोई छोटा बच्चा है जब उसकी माँ उसे स्नान कराती है तो बच्चा माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है,भगवान भी आज वैसे ही खड़े है.
भगवान केवट से बोले – भईया केवट !
मेरे अंदर का अभिमान आज टूट गया.
केवट बोला – प्रभु ! क्या कह रहे है ?
भगवान बोले – सच कह रहा हूँ केवट,
अभी तक मेरे अंदर अभिमान था, कि
मै भक्तो को गिरने से बचाता हूँ पर
आज पता चला कि,
भक्त भी भगवान को गिरने से बचाता है.

प्रभु तू मेरा
मे तेरा
। राम,राम जय जय राम 👏👏।

संजय गुप्ता

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एक अती सुन्दर महिला ने विमान में प्रवेश किया और अपनी सीट की तलाश में नजरें घुमाईं। उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है। जिसके दोनों ही हाथ नहीं है। महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में झिझक हुई।
उस ‘सुंदर’ महिला ने एयरहोस्टेस से बोला “मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी। क्योंकि साथ की सीट पर जो व्यक्ति बैठा हुआ है उसके दोनों हाथ नहीं हैं।” उस सुन्दर महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया।
असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, “मैम क्या मुझे कारण बता सकती है..?”
‘सुंदर’ महिला ने जवाब दिया “मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। मैं ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर यात्रा नहीं कर पाउंगी।”
दिखने में पढी लिखी और विनम्र प्रतीत होने वाली महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई। महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा कि “मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जाए।”
एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर नजर घुमाई, पर कोई भी सीट खाली नहीं दिखी।
एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि “मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है। अतः मैं विमान के कप्तान से बात करती हूँ। कृपया तब तक थोडा धैर्य रखें।” ऐसा कहकर होस्टेस कप्तान से बात करने चली गई।
कुछ समय बाद लोटने के बाद उसने महिला को बताया, “मैडम! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है | इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है और वह प्रथम श्रेणी में है। मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया। एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है।”
‘सुंदर’ महिला अत्यंत प्रसन्न हो गई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती और एक शब्द भी बोल पाती… एयरहोस्टेस उस अपाहिज और दोनों हाथ विहीन व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे पूछा “सर, क्या आप प्रथम श्रेणी में जा सकेंगे..? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप एक अशिष्ट यात्री के साथ यात्रा कर के परेशान हों।
यह बात सुनकर सभी यात्रियों ने ताली बजाकर इस निर्णय का स्वागत किया। वह अति सुन्दर दिखने वाली महिला तो अब शर्म से नजरें ही नहीं उठा पा रही थी।
तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा, “मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ। और मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ खोये थे। सबसे पहले, जब मैंने इन देवी जी की चर्चा सुनी, तब मैं सोच रहा था। की मैंने भी किन लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली और अपने हाथ खोये..? लेकिन जब आप सभी की प्रतिक्रिया देखी तो अब अपने आप पर गर्व महसूस हो रहा है कि मैंने अपने देश और देशवासियों की खातिर अपने दोनों हाथ खोये।”और इतना कह कर, वह प्रथम श्रेणी में चले गए।
‘सुंदर’ महिला पूरी तरह से शर्मिंदा होकर सर झुकाए सीट पर बैठ गई।
अगर विचारों में उदारता नहीं है तो ऐसी सुंदरता का कोई मूल्य नहीं है।

मैरे पास ये कहानी आई थी। मैंने इसे पढ़ा तो दिल को छू गई इसलिये पोस्ट कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि आप लोगों भी बहुत पसंद आएगी। 🙏🙏🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

नाजायज़ विरोध:–

एक बहुत बड़ा अमीर आदमी था।
उसने अपने गांव के सब गरीब लोगों के लिए, भिखमंगों के लिए माहवारी दान बांध दिया था।

किसी भिखमंगे को दस रुपये मिलते महीने में, किसी को बीस रुपये मिलते। वे हर एक तारीख को आकर अपने पैसे ले जाते थे। वर्षों से ऐसा चल रहा था। एक भिखमंगा था जो बहुत ही गरीब था और जिसका बड़ा परिवार था। उसे पचास रुपये महीने मिलते थे। वह हर एक तारीख को आकर अपने रुपये लेकर जाता था।

एक तारीख आई। वह रुपये लेने आया, बूढ़ा भिखारी। लेकिन धनी के मैनेजर ने कहा कि भई, थोड़ा हेर-फेर हुआ है। पचास रुपये की जगह सिर्फ पच्चीस रुपये अब से तुम्हें मिलेंगे। वह भिखारी बहुत नाराज हो गया। उसने कहा, क्या मतलब? सदा से मुझे पचास मिलते रहे हैं। और बिना पचास लिए मैं यहां से न हटूंगा। क्या कारण है पच्चीस देने का?

मैनेजर ने कहा कि जिनकी तरफ से तुम्हें रुपये मिलते हैं उनकी लड़की का विवाह है और उस विवाह में बहुत खर्च होगा। और यह कोई साधारण विवाह नहीं है। उनकी एक ही लड़की है, करोड़ों का खर्च है। इसलिए अभी संपत्ति की थोड़ी असुविधा है। पच्चीस ही मिलेंगे।

उस भिखारी ने जोर से टेबल पीटी और उसने कहा, इसका क्या मतलब? तुमने मुझे क्या समझा है? मैं कोई बिरला हूं? मेरे पैसे काट कर और अपनी लड़की की शादी? अगर अपनी लड़की की शादी में लुटाना है तो अपने पैसे लुटाओ।

कई सालों से उसे पचास रुपये मिल रहे हैं; वह आदी हो गया है, अधिकारी हो गया है; वह उनको अपने मान रहा है। उसमें से पच्चीस काटने पर उसको विरोध है तुम्हें जो मिला है उसे तुम अपना मान रहे हो। उसमें से कटेगा तो तुम विरोध तो करोगे, लेकिन उसके लिए तुमने धन्यवाद कभी नहीं दिया है।

इस भिखारी ने कभी धन्यवाद नहीं दिया उस अमीर को आकर कि तू पचास रुपये महीने हमें देता है, इसके लिए धन्यवाद। लेकिन जब कटा तो विरोध।

आरक्षण की स्थिति ठीक ऐसी ही है ।कुछ विशेषाधिकार दिए गए थे इन्हें , उनमें से शासन ने यदि कुछ वापस ले लिये तो इतना हो हल्ला।

और फिर सारे अधिकार समाप्त नहीं किए गये केवल उनके दुरुपयोग को रोकने के प्रयास किया गया है तो फिर विरोध कैसा?

सक्षम बनों भिखारी नहीं।
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