Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार एक आदमी मिस्टर x शहर की नामी एक रेडीमेड कपडे की दूकान पर गया
वहां के सेल्समेन से सूट दिखाने को कहा
सेल्समेन सूट दिखानेलगा
करीब 50 सूट दिखाने के बाद भी मिस्टर x को कोई सूट पसंद नहीं आया तब वहां दूकान का मालिक आया और उनसे सूट न पसंद आने का कारण पूछा
मिस्टर x ने कहा इस सूट को अगर मैं आपसे खरीदूंगा तो कितनी छूट मिलेगी क्योंकि कोई भी सूट 14000 से कम नहीं है और मुझे 25000 से निचे का सूट पसंद ही नहीं आ रहा है
दूकानदार ने महंगाई का हवाला देते हुए बमुश्किल 5 %छूट देने का भरोसा दिया वो भी तब जब बिल बनेगा और सारे टैक्स छूट देने के बाद जुड़ेगा
x राजी हो गया फिर एक सूट जो कि30000 का था पसंद कर के बोला इसके कपडे की गारंटी आपको लिखकर देनी पड़ेगी
और इसके साथ एक महंगा डिब्बा जो की देखने में अच्छा लगे
और एक झोला जो की अच्छा हो बाद में इस्तेमाल किया जा सके
दुकानदार परेशान बिल बन चूका था लेकिन कपडे की गारंटी लिखकर देना असंभव था बहुत समझानेके बाद दुकानदार बोला जब कपडे में कोई शिकायत हो तो मैं उसको बदल सकता हु वापस नहीं ले सकता
और झोला और डिब्बा जो मेरे पास है मैं वो ही दे सकता हु
इसके अलावा और नहीं है
तब मिस्टर x ने कहा चलो मैं तुम्हारी सारी बात मान लेता हु की तुम मजबूरहो अब ये बताओ कि जरूरत पड़ने पर क्या ये सूट तुम्हारे यहाँ 15000 में गिरवी रखा या बेचाजा सकता है
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दुकानदार ने अपना सर पकड़ा और बोला भाई कपडा भी कहीं गिरवी या बिक सकता है वो भी आधी कीमत पर।।।
तब मिस्टर x ने कहा फिर तुमने पेपर वालों को ये क्यों कहा की ज्वेलर्स लूटते हैँ
डिब्बा और महंगा झोला देकर

एक बार जेवर खरीदने के बाद 20 प्रतिशत तक कटौती करके वापस लेते है हमारी सारी कमाई खा जाते है

जेवर चाहे जितनी बार पहनाजाए कुछ कटौती करके कहीं भी किसी भी सराफे की दूकान पर बेचाबदला या जरूरत पड़ने पर गिरवी रखा जा सकता है परंतु उतनी ही कीमत का कपडा आप आधे दाम पर भी वापस नहीं लेते आधे तो छोड़ो10 प्रतिशत पर भी नहीं लेते फिर सराफे जैसे मददगार व्यापारके लिए इतनी खिन्नता क्यों

मैं एक सराफा दूकानदार हु
मैंने जितनी फरमाइश आपसे की रोज ये फरमाइश ग्राहकों की पूरी करता हु और इसके बदले जो भी कमाता हु जैसा की अपने परिवार के लिए आप करते है फिर आपके और मेरे लिए आप जैसे लोगों के नजरिये में अन्तर क्यों
और हाँ हमें आपकी कमाई नहीं चाहिए हमें बस अपनी मेहनत जो की कच्चे सोने चांदीसे शुरू होकर आप जैसो की मदद पर जाकर ख़त्म होती है उसका लाभ जो की जायज है वही चाहिए इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं
अगर आप सम्मान नहीं दे सकते तो कृपया हमारा अपमान भी मत कीजिये

दूकान दार चुप था और शायद शर्मिंदा भी
“””””

संजय गुप्ता

Posted in संस्कृत साहित्य

भारत में आँखों 👁की सर्जरी का इतिहास दो सौ वर्ष पुराना
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भारत में 200 वर्ष पहले आँखों 👀की सर्जरी होती थी…शीर्षक देखकर आप निश्चित ही चौंके होंगे ना!!! बिलकुल, अक्सर यही होता है जब हम भारत के किसी प्राचीन ज्ञान अथवा इतिहास के किसी विद्वान के बारे में बताते हैं तो सहसा विश्वास ही नहीं होता. क्योंकि भारतीय संस्कृति और इतिहास की तरफ देखने का हमारा दृष्टिकोण ऐसा बना दिया गया है

मानो हम कुछ हैं ही नहीं, जो भी हमें मिला है वह सिर्फ और सिर्फ पश्चिम और अंग्रेज विद्वानों की देन है. जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है. भारत के ही कई ग्रंथों एवं गूढ़ भाषा में मनीषियों द्वारा लिखे गए दस्तावेजों से पश्चिम ने बहुत ज्ञान प्राप्त किया है… परन्तु “गुलाम मानसिकता” के कारण हमने अपने ही ज्ञान और विद्वानों को भुला दिया है.
भारत के दक्षिण में स्थित है तंजावूर. छत्रपति शिवाजी महाराज ने यहाँ सन 1675 में मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी तथा उनके भाई वेंकोजी को इसकी कमान सौंपी थी. तंजावूर में मराठा शासन लगभग अठारहवीं शताब्दी के अंत तक रहा. इसी दौरान एक विद्वान राजा हुए जिनका नाम था “राजा सरफोजी”. इन्होंने भी इस कालखंड के एक टुकड़े 1798 से 1832 तक यहाँ शासन किया. राजा सरफोजी को “नयन रोग” विशेषज्ञ माना जाता था. चेन्नई के प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सालय “शंकरा नेत्रालय” के नयन विशेषज्ञ चिकित्सकों एवं प्रयोगशाला सहायकों की एक टीम ने डॉक्टर आर नागस्वामी (जो तमिलनाडु सरकार के आर्कियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष तथा कांचीपुरम विवि के सेवानिवृत्त कुलपति थे) के साथ मिलकर राजा सरफोजी के वंशज श्री बाबा भोंसले से मिले. भोंसले साहब के पास राजा सरफोजी द्वारा उस जमाने में चिकित्सा किए गए रोगियों के पर्चे मिले जो हाथ से मोड़ी और प्राकृत भाषा में लिखे हुए थे. इन हस्तलिखित पर्चों को इन्डियन जर्नल ऑफ औप्थैल्मिक में प्रकाशित किया गया.

प्राप्त रिकॉर्ड के अनुसार राजा सरफोजी “धनवंतरी महल” के नाम से आँखों का अस्पताल चलाते थे जहाँ उनके सहायक एक अंग्रेज डॉक्टर मैक्बीन थे. शंकर नेत्रालय के निदेशक डॉक्टर ज्योतिर्मय बिस्वास ने बताया कि इस वर्ष दुबई में आयोजित विश्व औपथेल्मोलौजी अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हमने इसी विषय पर अपना रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया और विशेषज्ञों ने माना कि नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में सारा क्रेडिट अक्सर यूरोपीय चिकित्सकों को दे दिया जाता है जबकि भारत में उस काल में की जाने वाले आई-सर्जरी को कोई स्थान ही नहीं है. डॉक्टर बिस्वास एवं शंकरा नेत्रालय चेन्नई की टीम ने मराठा शासक राजा सरफोजी के कालखंड की हस्तलिखित प्रतिलिपियों में पाँच वर्ष से साठ वर्ष के 44 मरीजों का स्पष्ट रिकॉर्ड प्राप्त किया. प्राप्त अंतिम रिकॉर्ड के अनुसार राजा सर्फोजी ने 9 सितम्बर 1827 को एक ऑपरेशन किया था, जिसमें किसी “विशिष्ट नीले रंग की गोली” का ज़िक्र है. इस विशिष्ट गोली का ज़िक्र इससे पहले भी कई बार आया हुआ है, परन्तु इस दवाई की संरचना एवं इसमें प्रयुक्त रसायनों के बारे में कोई नहीं जानता. राजा सरफोजी द्वारा आँखों के ऑपरेशन के बाद इस नीली गोली के चार डोज़ दिए जाने के सबूत भी मिलते हैं.

प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार ऑपरेशन में बेलाडोना पट्टी, मछली का तेल, चौक पावडर तथा पिपरमेंट के उपयोग का उल्लेख मिलता है. साथ ही जो मरीज उन दिनों ऑपरेशन के लिए राजी हो जाते थे, उन्हें ठीक होने के बाद प्रोत्साहन राशि एवं ईनाम के रूप में “पूरे दो रूपए” दिए जाते थे, जो उन दिनों भारी भरकम राशि मानी जाती थी. कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय इतिहास और संस्कृति में ऐसा बहुत कुछ छिपा हुआ है (बल्कि जानबूझकर छिपाया गया है) जिसे जानने-समझने और जनता तक पहुँचाने की जरूरत है… अन्यथा पश्चिमी और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा भारतीयों को खामख्वाह “हीनभावना” से ग्रसित रखे जाने का जो षडयंत्र रचा गया है उसे छिन्न-भिन्न कैसे किया जाएगा… (आजकल के बच्चों को तो यह भी नहीं मालूम कि “मराठा साम्राज्य”, और “विजयनगरम साम्राज्य” नाम का एक विशाल शौर्यपूर्ण इतिहास मौजूद है… वे तो सिर्फ मुग़ल साम्राज्य के बारे में जानते हैं…).

लेख का मूल स्रोत :- sanskritimagazine.com

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राम नाम की शक्ति
जब प्रभु राम जी को समुद्र देवता ने बतलाया, कि हे भगवन् आपकी ही सेना में नल और नील नाम का दो बानर है जो पुल निर्माण करने में अति कुशल है।आप उन दोंनों की सहायता से सेतु का निर्माण कराकर लंका तक आसानी से पहुँच जायेंगें। तब राम जी ने दोनों को बुलाकर सेतु निर्माण का आदेश दिया और सभी बानर पत्थर उठा उठकर लाने लगे। ,हनुमान जी उन पत्थरों पर राम राम लिखते जाते और नल तथा नील उसे ले जाकर समुद्र में गिराते जाते। इस प्रकार जो भी पत्थर समुद्र में गया सभी के सभी एक दुसरे से जुड़कर उपलाते हुए सेतु के रूप में बँधते रहे।सेतु निर्माण कार्य बहुत द्रुत गति से सुचारू रूप से चल रहा था।प्रभु राम को शाम की वेला मेंसेतु बंधन कार्य की प्रगति के बारे में बता दिया गया।हनुमान ने बताया कि भगवन ,सभी पत्थरें आपका नाम लिखकर समुद्र में डालने पर वे सभी आपस में जुड़कर सेतु के रूप में हो जा रहे हैं। इस प्रकार सेतु निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है।
परन्तु ज्यों ज्यों रात होती गयी प्रभु राम जी की बैचेनी बढ़ती गयी।उन्हें आश्चर्य हो रहा था ,कि ऐसा कैसे हो सकता है। परन्तु अपनी आशंका किसी पर प्रकट न होने दी और बीते रात चुपके से उठे और कुटिया से निकल कर पहरे दारों की नजरों से बचते बचाते समुद्र किनारे पहुँच गये।
उन्होंने एक पत्थर उठाया और समुद्र में गिरा दिया। पत्थर समुद्र में डुब गया।
फि एक पत्थर लिया और उसपर अपना नाम “राम” लिखकर समुद्र में गिराया तो वह तैरने लगा। यह देख राम जी प्रभु को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी हनुमान जी वहाँ प्रकट हो गये और मुस्कुराते हुए बोला,” देख लिया भगवन ,आपमें और आपके नाम में से किसमें कितना सामर्थ्य हैं।
हनुमान को अचानक वहाँ पाकर और उनकी बात सुनकर भगवान राम सकपका गये।फिर आगे हनुमान जी ने कहा, “प्रभु ,आप जिसे छोड़ देंगें उसको तो डुबना ही पड़ेगा। हाँ,जिसे आपके नाम तक का भी सहारा मिल जायेगा, वह तो इस भव सागर से पार हो ही जायेगा।
तब श्री राम जी ने हनुमान से कहा,” तुम ठीक कहते हो हनुमान। भबिष्य में खासकर कलियुग में तो इस नाम का अत्यधिक प्रभाव होगा।उस समय केवल मेरा नाम ही ऐसा आधार होगा जिसको लेकर भक्तजन संसार रूपी भवसागर से
तर जायेंगें। यह सुनकर हनुमान ने अपना मस्तक प्रभु चरणों में झुका दिया और भगवान राम जी ने हनुमान को उठाकर अपने सीने से लगा लिया फिर कुटिया में
आकर चैन की नींद

संजय गुप्ता

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ईश्वर का आशीर्वाद
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तीरथ नाम का एक कुम्हार जितना कमाता था, उससे उसका घर आसानी से चल जाता था. तीरथ को अधिक धन की चाह थी भी नहीं थी. वह दिन भर बर्तन बनाता. दोपहर में बर्तन बेचने जाता. शाम को घंटों बांसुरी बजाता.
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इसी तरह उसके दिन आनंद-उमंग में बीतते जा रहे थे. परिवार वालों ने तीरथ की एक सुंदर लड़की कल्याणी से शादी कर दी. कल्याणी जितनी सुंदर थी उतनी ही सुशील. वह पति के काम में हाथ बंटाती, घर भी संभालती. इससे तीरथ की कमाई पहले से काफी बढ़ गई.
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पति-पत्नी दोनों जीवन का आनंद ले रहे थे. उनके पड़ोसी तीरथ और कल्याणी दोनों को हमेशा खुश देखकर जलते थे. उन्हें जलन होती कि पति-पत्नी दोनों दिन भर मिलकर काम करते है, पति प्रतिदिन शाम को बांसुरी बजाता और पत्नी गीत गुनगुनाती रहती है. दोनों में झगड़ा भी नहीं होता.
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पड़ोस की महिलाओं द्वारा सिखाने पर एक दिन कल्याणी ने तीरथ से कहा- तुम जितना कमाते हो वह रोज खर्च हो जाता है. आमदनी बढ़ानी पड़ेगी. पड़ोसी घर खर्च में से कुछ न कुछ भविष्य के लिए बचाकर रखते हैं. हमें भी अपनी कमाई से बचत करनी चाहिए.
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तीरथ बोला- “हमें ज्यादा कमा कर क्या करना है ? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूं. छोटा ही सही, पर हमारा अपना घर है. दोनों वक्त हम पेटभर खाते हैं, भगवान की पूजा-पाठ करते खुशी से जीवन बिता रहे हैं. हमें और क्या चाहिए ?”
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इस पर कल्याणी बोली – “ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इससे खुश भी हूं. परन्तु आड़े वक्त के लिए भी हमें कुछ बचाकर रखना चाहिए.” कल्याणी के समझाने पर तीरथ मान गया. बचत करने के लिए दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे.
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कल्याणी अब सुबह 4 बजे उठकर काम में लग जाती. तीरथ भी रात देर तक काम करता. लेकिन फिर भी दोनों अधिक बचत नहीं कर पाते. न तीरथ पहले की तरह बांसुरी बजाता न कल्याणी उसकी धुन पर गुनगुनाती. दोनों ने फैसला किया कि अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है.
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बचत का इरादा छोड़ वे पहले की तरह मस्त रहने लगे. एक दिन तीरथ बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था. अचानक उसकी निगाह एक चमचमाती थैली पर गई. उसने थैली उठाई तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा. थैली में चांदी के सिक्के भरे थे.
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तीरथ ने सोचा कि यह थैली जरूर किसी की गिर गई है. वह थैली के मालिक को खोजने लगा. उसने चारों तरफ खोजबीन की लेकिन दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया. हारकर वह इसे ईश्वर का दिया उपहार समझकर घर ले आया. घर आकर तीरथ ने सारा किस्सा कल्याणी को कह सुनाया.
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तीरथ बोला- “तुम आड़े वक्त के लिए कुछ बचाकर रखना चाहती थी. सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें यह उपहार दिया है. ईश्वर को धन्यवाद कर कल्याणी ने थौली खोलकर धन गिना. थैली में चांती के पूरे निन्यानवे सिक्के थे.
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दोनों खुश होकर विचार-विमर्श करने लगे. कल्याणी बोली- “इन्हें हमें आड़े समय के लिए रख लेना चाहिए. कल को परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेंगे. तीरथ बोला- “पर निन्यानवे तो शुभ नहीं है. क्यों न हम इसे पूरे सौ बना दें. फिर इन्हें भविष्य के लिए बचा कर रखे देंगे.
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दोनों जानते थे कि चांदी के निन्यानवे रुपये को सौ रुपये करना बहुत कठिन काम है. फिर भी दोनों ने इरादा पक्का किया. तीरथ और कल्याणी पहले से चौगुनी मेहनत करने लगे. तीरथ सुबह-सुबह बर्तन बेचने निकल जाता.
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शाम तक लौटता फिर बर्तन बनाता. काम खत्म होते देर रात हो जाती. कल्याणी दिन में बर्तन सुखाती और पकाती. इस तरह दोनों लोग थक कर चूर हो जाते. अब तीरथ बांसुरी नहीं बजाता न ही कल्याणी खुशी के गीत गुनगुनाती. उसे फुरसत ही नहीं थी.
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वह अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में भी नहीं जा पाती थी. दिन-रात एक करके दोनों पैसे जोड़ रहे थे. पैसे बचाने के लिए उन्होंने एक वक्त का खाना भी छोड़ दिया. लेकिन चांदी के सौ रुपये पूरे ही नहीं हो पा रहे थे. इस तरह तीन महीने बीत गए.
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तीरथ के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके घर में जरूर कोई परेशानी है तभी तो दोनों दिन-रात काम करते हैं और थके-थके रहते हैं. किसी तरह छ: महीने बीतने पर उन्होंने सौ रुपये पूरे कर लिए.
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लेकिन चांदी का रुपया जोड़ने के चक्कर में तीरथ और कल्याणी को पैसे जोड़ने का लालच पड़ चुका था. दोनों को भविष्य के लिए सौ सिक्के कम लगने लगा. उन्होंने तय किया कि अच्छे भविष्य के लिए कम से कम सौ सिक्के और जोड़ने होंगे.
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उन्होंने आगे भी उसी तरह मेहनत जारी रखी. पैसे कमाने की धुन में पति-पत्नी में मामूली बातों पर किचकिच भी होने लगी. अगर एक बर्तन भी गलती से फूट जाता तो पति-पत्नी को उसमें बड़ा नुकसान दिखता. दोनों झगड़ने लगते. इधर पड़ोसियों की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी.
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एक पड़ोसन से न रहा गया. वह कल्याणी के घर की थाह लेने के लिए नजर रखने लगी. एक दोपहर को वह कल्याणी के घर जा धमकी. कल्याणी बर्तन बनाने में व्यस्त थी. उसने कल्याणी से पूछा कि वह पहले की तरह रोज शाम गुनगुनाती क्यों नहीं ?
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कल्याणी ने बात टालने की कोशिश की लेकिन पड़ोसन मानने वाली कहां थी. कल्याणी के मन की बात निकालने के लिए पड़ोसन पुचकारते हुए कहा- तुम बहुत थक जाती हो. मेरे पास समय रहता है. कहो तो मैं रोज तुम्हारी मदद कर दिया करूं.
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कल्याणी प्यार भरे शब्द सुनकर पिघल गई. उसने सारा किस्सा कह सुनाया. पड़ोसन जोर-जोर से हंसने लगी. उसे हंसता देखकर कल्याणी को गुस्सा आया. कल्याणी ने कहा- किसी की परेशानी पर खुश नहीं होना चाहिए. दूसरो के कष्ट पर हंसने वालों को ईश्वर पसंद नहीं करते.
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अब पड़ोसन की बारी थी. उसने कल्याणी से कहा-” बहन, तुम दोनों जिस चक्कर में पड़े उसमें पड़ा इंसान कहीं का नहीं रहता. उसके अच्छे गुण धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं. रोज बांसुरी बजाने वाला तुम्हारा पति बिना बात झगड़ता है.
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खुशी के गीत गानेवाली कल्याणी बांसुरी की जगह सिक्कों की खनक सुनना चाहती है. दोनों पेटभर भोजन नहीं करते. बहन तुम किस खुशी और किस भविष्य के लिए काम कर रही हो. कल्याणी को पड़ोसन की बात समझ में आ रही थी.
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पड़ोसन ने समझाया निन्यानवे का चक्कर छोड़ो. इस चक्कर में फंसकर तुमने ईश्वर के कई आशीर्वाद ठुकरा दिए. रोज भरपेट भोजन मिलना ईश्वर का बड़ा आशीर्वाद है, तुमने उसे ठुकराया. घर की सुख-शांति उससे भी बड़ा उपहार है- उसे भी गंवा दिया.
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पति-पत्नी के बीच प्रेम और ईश्वर की भक्ति में दिन बीतना गृहस्थ जीवन का सबसे बड़ा सुख है. तुम लोग इससे भी वंचित हो गए. अब खुद निर्णय करो कि तुम दोनों हाड़-तोड़ मेहनत से पा रहे हो या गंवा रहे हो. इसे ही तो कहते हैं निन्यान्वे का फेर.
जय जय श्री राधे
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संजय गुप्ता

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एक संत को सुबह-सुबह सपना आया। सपने में सब तीर्थों में चर्चा चल रही थी की कि इस कुंभ के मेले में सबसे अधिक किसने पुण्य अर्जित किया।

श्री प्रयागराज ने कहा कि ” सबसे अधिक पुण्य तो रामू मोची को ही मिला हैं।”

गंगा मैया ने कहाः ” लेकिन रामू मोची तो गंगा में स्नान करने ही नहीं आया था।”
देवप्रयाग जी ने कहाः ” हाँ वो यहाँ भी नहीं आया था।”
रूद्रप्रयाग ने भी बोला “हाँ इधर भी नहीं आया था।”

फिर प्रयागराज ने कहाः ” लेकिन फिर भी इस कुंभ के मेले में जो कुंभ का स्नान हैं उसमे सबसे अधिक पुण्य रामू मोची को मिला हैं।

सब तीर्थों ने प्रयागराज से पूछा
“रामू मोची किधर रहता हैं और वो क्या करता हैं?

श्री प्रयागराजजी ने कहाः “वह रामू मोची जूता की सिलाई करता हैं और केरल प्रदेश के दीवा गाँव में रहता हैं।”

इतना स्वप्न देखकर वो संत नींद से जाग गए। और मन ही मन सोचने लगे कि क्या ये भ्रांति है या फिर सत्य हैं!

सुबह प्रभात में सपना अधिकतर सच्चे ही होते हैं। इसलिए उन्ह संत ने इसकी खोजबीन करनी की सोची।
जो जीवन्मुक्त संत महापुरूष होते हैं वो निश्चय के बड़े ही पक्के होते है,

और फिर वो संत चल पड़े केरल दिशा की ओर। स्वंप्न को याद करते और किसी किसी को पूछते – पूछते वो दीवा गाँव में पहुँच ही गये। जब गावं में उन्होंने रामू मोची के बारे में पूछा तो, उनको रामू मोची मिल ही गया। संत के सपने की बात सत्य निकली।

वो संत उस रामू मोची से मिलने गए। वह रामू मोची संत को देखकर बहुत ही भावविभोर हो गया और कहा

“महाराज! आप मेरे घर पर? मै जाति तो से चमार हूँ, हमसे तो लोग दूर दूर रहते हैं, और आप संत होकर मेरे घर आये। मेरा काम तो चमड़े का धन्धा हैं।

मै वर्ण से शूद्र हूँ। अब तो उम्र से भी लाचार हो गया हूँ। बुद्धि और विद्धा से अनपढ़ हूँ मेरा सौभाग्य हैं की आप मेरे घर पधारे.”

संत ने कहा “हाँ” मुझे एक स्वप्न आया था उसी कारण मै यहाँ आया और संत तो सबमे उसी प्रभु को देखते हैं इसलिए हमें किसी भी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हैं किसी की घर जाने में और मिलने में।

संत ने कहा आपसे से एक प्रश्न था की “आप कभी कुम्भ मेले में गए हो”? और इतना सारा पुण्य आपको कैसे मिला?

वह रामू मोची बोला ” नहीं महाराज! मै कभी भी कुंभ के मेले में नहीं गया, पर जाने की बहुत लालसा थी इसलिए मै अपनी आमदनी से रोज कुछ बचत कर रहा था।

इस प्रकार महीने में करीब कुछ रूपया इकट्ठा हो जाता था और बारह महीने में कुम्भ जाने लायक और उधर रहने खाने पीने लायक रूपये हो गए थे।

जैसे ही मेरे पास कुम्भ जाने लायक पैसे हुए मुझे कुम्भ मेले का शुरू होने का इंतज़ार होने लगा और मै बहुत ही प्रसन्न था की मै कुंभ के मेले में गंगाजी स्नान करूँगा.

लेकिन उस समय मेरी पत्नी माँ बनने वाली थी। अभी कुछ ही समय पहले की बात हैं।

एक दिन मेरी पत्नी को पड़ोस के किसी घर से मेथी की सब्जी की सुगन्ध आ गयी। और उसने वह सब्जी खाने की इच्छा प्रकट की। मैंने बड़े लोगो से सुना था कि गर्भवती स्त्री की इच्छा को पूरा कर देना चाहिए। मै सब्जी मांगने उनके घर चला गया और उनसे कहा

“बहनजी, क्या आप थोड़ी सी सब्जी मुझको दे सकते हो। मेरी पत्नी गर्भवती हैं और उसको खाने की इच्छा हो रही हैं।
“हाँ रामू भैया! हमने मेथी की सब्जी तो बना रखी हैं”

वह बहन हिचकिचाने लग गई। और फिर उसने जो कहा उसको सुनकर मै हैरान रह गया ” मै आपको ये सब्जी नहीं दे सकती क्योंकि आपको देने लायक नहीं हैं।”

“क्यों बहन जी?”
“आपको तो पता हैं हम बहुत ही गरीब हैं और हमने पिछले दो दिन से कुछ भी नहीं खाया। भोजन की कोई व्यवस्था नही हो पा रही थी। आपके जो ये भैया वो काफी परेशान हो गए थे।
मसबसे कर्जा भी ले लिया था। उनको जब कोई उपाय नहीं मिला तो भोजन के लिए घूमते – घूमते शमशान की ओर चले गए। उधर किसी ने मृत्य की बाद अपने पितरों के निमित्त ये सब्जी रखी हुई थी।

ये वहां से छिप – छिपाकर गए और उधर से ये सब्जी लेकर आ गए। अब आप ही कहो मै किसी प्रकार ये अशुद्ध और अपवित्र सब्जी दे दूं?”

उस रामू मोची ने फिर बड़े ही भावबिभोर होकर कहा “यह सब सुनकर मुझको बहुत ही दुःख हुआ कि इस संसार में केवल मै ही गरीब नहीं हूँ, जो टका-टका जोड़कर कुम्भ मेले में जाने को कठिन समझ रहा था।

जो लोग अच्छे कपडे में दिखते है वो भी अपनी मुसीबत से जूझ रहे हैं और किसी से कह भी नहीं सकते, और इस प्रकार के दिन भी देखने को मिलता हैं

और खुद और बीबी बच्चो को इतने दिन भूख से तड़फते रहते हैं! मुझे बहुत ही दुःख हुआ की हमारे पड़ोस में ऐसे लोग भी रहते हैं, और मै टका-टका बचाकर गंगा स्नान करने जा रहा हूँ ?

उनकी सेवा करना ही मेरा कुम्भ मेले जाना हैं। मैंने जो कुम्भ मेले में जाने के लिए रूपये इकट्ठे किये हुए थे वो घर से निकाल कर ले आया। और सारे पैसे उस बहन के हाथ में रख दिए।
उस दिन मेरा जो ये हृदय है बहुत ही सन्तुष्ट हो गया।
प्रभु जी! उस दिन से मेरे हृदय में आनंद और शांति आने लगी।”
वो संत बोलेः ” हाँ इसलिए जो मैने सपना देखा, उसमें सभी तीर्थ मिलकर आपकी प्रशंसा कर रहे थे।”

इसलिए संतो ने सही कहा
“वैष्णव जन तो तेने रे कहीए जे पीड़ पराई जाणे रे।
पर दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे।।“

संजय गुप्ता

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अनसुनी भक्ति कथाएँ

(((((((( स्तंभतीर्थ का महत्व ))))))))

हमारे देश का नाम भारत वर्ष जिन भरत के नाम पर पड़ा उनके बेटे थे राजर्षि शतश्रृंग. शतश्रृंग के आठ बेटे और एक बेटी हुई। बेटी को कुमारी कहकर बुलाया गया। उसका शरीर तो बहुत सुंदर था पर उसका मुख बकरी के मुख जैसा था।

राजा ने कुछ त्रिकालदर्शी ऋषियों से इस संदर्भ में पूछा, ऋषियों ने बताया कि वह पिछले जन्म में बकरी थी। बकरी के शरीर में वह स्तम्भ तीर्थ नामक स्थान पर एक झाड़ी में उलझ कर मर गई थी। जब वह मरी तो मुख को छोड़कर शेष देह खम्भार्क की खाड़ी में गिर गया था। उस पवित्र तीर्थ के प्रताप से वह दिव्य देह वाली कुमारी बन गई लेकिन गिरते समय उसका मुख वहीं झाडियों-लताओं में उलझा रह गया, इसीलिए उसका मुंह बकरी का ही रह गया।

राजर्षि ने ऐसा प्रबंध करा दिया कि कभी भी राजकुमारी के सामने कोई दर्पण न आए, कुमारी शीशे या जल में अपनी छाया न देख सके। पर जब किशोर उम्र में गई तो एक दिन उसने दर्पण में अपना मुख देख ही लिया।

अपना बकरी जैसा मुख देखते ही उसे अपने पिछले जन्म की याद हो आई. उसने अपने माता-पिता को अपने पिछले जन्म के बारे में सब कुछ बता दिया और कहा कि मुझे अपना चेहरा ठीक करने के लिये खम्भार्क-क्षेत्र जाना होगा।

माता पिता की अनुमति लेकर कुमारी वहां पहुंची और उसने अपने पिछले जन्म के सिर को लताओं में से ढूंढ़ निकाला और उसका खम्भार्क तीर्थ में दाह संस्कार किया। हड्डियों और राख को खम्भार्क तीर्थ के पवित्र जल में डाल दिया। यह सब करने के तुरंत बाद उसका मुख मानव सरीखा हो गया और चंद्रमा के समान चमक उठा। इस चमत्कार का तीनों लोकों में प्रचार हो गया। सारी बात सुनकर देवता, गंधर्व और राजा लोग विवाह के लिए उसके पिता के पास आने लगे।

जो लोग राजकुमारी का उपहास करते थे वे अब उससे विवाह को लालायित रहने लगे। राजकुमारी को आभास था कि ये सब उसके सौंदर्य पर मुग्ध है, हृदय से कोई लगाव नहीं। उसने विवाह से साफ मना कर दिया और कठिन तप में लग गई।

उसने एक साल तक की कठोर तपस्या के बाद भगवान शंकर प्रकट हुए और वर देने को कहा। कुमारी ने कहा- यदि आप प्रसन्न हैं तो इस तीर्थ में आपका वास हो। भगवान शंकर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।वहां के शिव ‘बर्करेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुए।

यह बात सब जगह फैल गई तो नागों का राजा स्वस्तिक पाताल लोक से कुमारी को देखने स्तम्भ तीर्थ आया। स्वास्तिक भगवान् शंकर के स्थान के करीब जहां धरती फोड़ कर बाहर निकला था, वहां उसके आने से बने कूप को उसके नाम पर स्वस्तिक कुआं रख दिया गया, इसमें हमेशा गंगा जल भरा रहता है।

भगवान शंकर से वर पाने में सफल हो कुमारी अपने माता-पिता के पास सिंहलद्वीप लौट आई। राजा शतश्रृंग अपनी कन्या की बातों को सुनकर चकित रह गए। शतश्रृंग ने देश को नौ भागों में बांट दिया।

आठ बेटों को एक एक और एक भाग कुमारी को दिया। उसको जो हिस्सा दिया उसको कुमारिका खंड कहा गया जिसमें पारियात्र पहाड़ भी था। यह पर्वत आर्यावर्त की दक्षिणी सीमा पर था जिसे आजकल हिंदुकुश कहते हैं।

गुप्तक्षेत्र में कुमारेश्वर का पूजन करती हुई कठिन तपस्या करने लगी। शिव जी तप से प्रसन्न हो वहां प्रकट हुए, उनकी आज्ञा से कुमारी ने तब महाकाल को अपने पति के रूप में चुना और उनके साथ रुद्रलोक चली गई। यह मंदिर कुमारेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

कुमारी रुद्रलोक पहुंची तो पार्वती जी ने उसे गले लगाया और चित्रलेखा नाम से अपनी सखी बना लिया।

कहते हैं कुमारी द्वारा बसाये कुमारिका कंड स्थित स्तंभतीर्थ या खंभात की खाड़ी में दाह संस्कार करना और भस्मावशेष को इसके जल में डालना प्रयाग से भी अधिक उत्तम है।

( स्रोत: स्कंद पुराण )
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संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

टांगीनाथ धाम – यहाँ पर आज भी है भगवान परशुराम का फरसा, खुदाई में निकला था खजाना!!!!!

टांगीनाथ धाम, झारखंड राज्य मे गुमला शहर से करीब 75 km दूर तथा रांची से करीब 150 km दूर घने जंगलों के बीच स्थित है। यह जगह अब अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र मे आती है। इस जगह का परशुराम से गहरा नाता है। यहाँ पर आज भी भगवान परशुराम का फरसा ज़मीं मे गड़ा हुए है। झारखंड में फरसा को टांगी कहा जाता है, इसलिए इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया। धाम में आज भी भगवान परशुराम के पद चिह्न मौजूद हैं।

परशुराम ने यहाँ पर कि थी घोर तपस्या :- टांगीनाथ धाम मे भगवान विष्णु के छठवें अवतार परशुराम ने तपस्या कि थी। परशुराम टांगीनाथ कैसे पहुचे इसकी कथा इस प्रकार है। जब राम, राजा जनक द्वारा सीता के लिये आयोजित स्वयंवर मे भगवान शिव का धनुष तोड़ देते है तो परशुराम बहुत क्रोधित होते हुए वहा पहुँचते है और राम को शिव का धनुष तोड़ने के लिए भला – बुरा कहते है।

सब कुछ सुनकर भी राम मौन रहते है, यह देख कर लक्ष्मण को क्रोध आ जाता है और वो परशुराम से बहस करने लग जाते है। इसी बहस के दौरान जब परशुराम को यह ज्ञात होता है कि राम भी भगवान विष्णु के ही अवतार है तो वो बहुत लज्जित होते है और वहाँ से निकलकर पश्चाताप करने के लिये घने जंगलों के बीच आ जाते है। यहां वे भगवान शिव की स्थापना कर और बगल मे अपना फरसा गाड़ कर तपस्या करते है। यहीं जगह आज का टांगीनाथ धाम है।

यहाँ पर गड़े लोहे के फरसे कि एक विशेषता यह है कि हज़ारों सालों से खुले मे रहने के बावजूद इस फरसे पर ज़ंग नही लगी है। और दूसरी विशेषता यह है कि ये जमीन मे कितना नीचे तक गड़ा है इसकी भी कोइ जानकारी नही है। एक अनुमान 17 फ़ीट का बताया जाता है।

फरसे से जुडी किवदंती : – कहा जाता है कि एक बार क्षेत्र मे रहने वाली लोहार जाति के कुछ लोगो ने लोहा प्राप्त करने के लिए फरसे को काटने प्रयास किया था। वो लोग फरसे को तो नही काट पाये पर उनकी जाति के लोगो को इस दुस्साहस कि कीमत चुकानी पड़ी और वो अपने आप मरने लगे। इससे डर के लोहार जाति ने वो क्षेत्र छोड़ दिया और आज भी धाम से 15 km की परिधि में लोहार जाति के लोग नही बसते है।

शिवजी से भी जोड़ा जाता है टांगीनाथ का सम्बन्ध :
कुछ लोग टांगीनाथ धाम मे गड़े फरसे को भगवान शिव का त्रिशुल बताते हुए इसका सम्बन्ध शिवजी से जोड़ते है। इसके लिए वो पुराणों कि एक कथा का उल्लेख करते है जिसके अनुसार एक बार भगवान शिव किसी बात से शनि देव पर क्रोधित हो जाते है। गुस्से में वो अपने त्रिशूल से शनि देव पर प्रहार करते है। शनि देव त्रिशूल के प्रहार से किसी तरह अपने आप को बचा लेते है। शिवजी का फेका हुआ त्रिशुल एक पर्वत को चोटी पर जा कर धस जाता है। वह धसा हुआ त्रिशुल आज भी यथावत वही पडा है। चुकी टांगीनाथ धाम मे गडे हुए फरसे की उपरी आकर्ति कुछ-कुछ त्रिशूल से मिलती है इसलिए शिव जी का त्रिशुल भी मानते है।

हम अपनी ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों के प्रति कितने लापरवाह है, टांगीनाथ धाम इसका एक जीता – जागता उदाहरण है। यहाँ पर सैकड़ों की संख्या मे प्राचीन शिवलिंग और मूर्तियां बिखरी पड़ी है लेकिन उनके रख रखाव और सुरक्षा का यहा कोइ प्रबन्ध नही है। इनकी ऐसी स्तिथि देखकर यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि अब तक कितनी पुरासम्पदा गलत हाथोँ मे जा चुकि होगी। टांगीनाथ में स्थित प्रतिमाएं उत्कल के भुवनेश्वर, मुक्तेश्वर व गौरी केदार में प्राप्त प्रतिमाओं से मेल खाती है।

टांगीनाथ धाम मे हुई थी खुदाई, निकले थे सोने और चांदी के आभूषण : – 1989 में पुरातत्व विभाग ने टांगीनाथ धाम मे खुदाई कि थी। खुदाई में उन्हें सोने चांदी के आभूषण सहित अनेक मूल्यवान वस्तुए मिली थी। लेकिन कुछ कारणों से यहां पर खुदाई बन्द कर दि गई और फिर कभी यहां पर खुदाई नही कि गई। खुदाई में हीरा जडि़त मुकुट, चांदी का अर्धगोलाकार सिक्का, सोने का कड़ा, कान की सोने की बाली, तांबे की बनी टिफिन जिसमें काला तिल व चावल रखा था, आदि चीजें मिलीं थीं।

यह सब चीज़े आज भी डुमरी थाना के मालखाना में रखी हुई है। अब संदेह में डालने वाली और आश्चर्य चकित करने वाली बात यह है कि जब वहा से इतनी बहुमूल्य चीजें मिल रही थी तो आखिर क्यों वहा पर ख़ुदाई बन्द कर दि गई ? हो सकता है कि वहा पर और खुदाई कि जाती या आज भी कि जाये तो हमे टांगीनाथ के बारे मे कुछ नई जानकारी प्राप्त हो सके। टांगीनाथ धाम में खुदाई मे निकली हुई चीज़े जो कि अभी मालखाने मे पडी है।

कभी रहा था हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल : टांगीनाथ धाम के विशाल क्षेत्र मे फैले हुए अनगिनत अवशेष यह बताने के लिए काफी है कि यह क्षेत्र किसी जमाने मे हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल रहा होगा लेकिन किसी अज्ञात कारन से यह क्षेत्र खंडहर मे तब्दील हो गया और भक्तों का यहां पहुचना कम हो गया। रही सही कमी वर्तमान समय मे सरकारी उपेक्षा और नक्सलवाद ने कर दि। लेकिन अब लगता है की धाम कि कुछ दशा सुधरने वाली है क्योकि धाम के सुंदरीकरण के लिए झारखंड सरकार के पर्यटन विभाग ने गुमला जिला प्रशासन को 43 लाख रुपए आवंटित किए हैं।

संजय गुप्ता

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एक ज्ञानवर्धक शिक्षाप्रद लघु द्रष्टान्त विवेकी विचारों सहित!!!!!

दो संन्यासी युवक यात्रा करते-करते किसी गाँव में पहुँचे। लोगों से पूछा हमें एक रात्रि यहाँ रहना है किसी पवित्र परिवार का घर दिखाओ ।लोगों ने बताया कि वहाँ एक चाचा का घर है। साधु-महात्माओं का आदर सत्कार करते हैं।

दोनों संन्यासी वहाँ गये। चाचा ने प्रेम से सत्कार किया, भोजन कराया और रात्रि-विश्राम के लिए बिछौना दिया। रात्रि को कथा-वार्ता के दौरान एक संन्यासी ने प्रश्न किया किआपने कितने तीर्थों में स्नान किया है ,कितनी तीर्थयात्राएँ की हैं। ?

हमने तो चारों धाम की तीन-तीन बार यात्रा की है।

चाचा ने कहा.. मैंने एक भी तीर्थ का दर्शन या स्नान नहीं किया है। यहीं रहकर भगवान का भजन करता हूँ और आप जैसे भगवत्स्वरूप अतिथि पधारते हैं तो सेवा करने का मौका पा लेता हूँ। अभी तक कहीं भी नहीं गया हूँ।

दोनों संन्यासी आपस में विचार करने लगे ,ऐसे व्यक्ति का अन्न खाया ! अब यहाँ से चले जायें तो रात्रि कहाँ बितायेंगे ? यकायक चले जायें तो उसको दुःख भी होगा। चलो, कैसे भी करके इस विचित्र वृद्ध के यहाँ रात्रि बिता दें। जिसने एक भी तीर्थ नहीं किया उसका अन्न खा लिया, हाय क्या अनर्थ हो गया हमसे ! आदि-आदि।

इस प्रकार विचारते हुए वे सोने लगे लेकिन नींद कैसे आऐ ! करवटें बदलते-बदलते मध्यरात्रि हुई। इतने में द्वार से बाहर देखा तो गौ के गोबर से लीपे हुए बरामदे में एक काली गाय आयी…. फिर दूसरी आयी…. तीसरी, चौथी…. पाँचवीं… ऐसा करते-करते कई गायें आयीं।

हरेक गाय वहाँ आती, बरामदे में लोटपोट होती और सफेद हो जाती तब अदृश्य हो जाती। ऐसी कितनी ही काली गायें आयीं और सफेद होकर विदा हो गयीं। दोनों संन्यासी फटी आँखों से देखते ही रह गये। वे दंग रह गये कि यह क्या कौतुक हो रहा है !

आखिरी गाय जाने की तैयारी में थी तो उन्होंने उसे प्रणाम करके पूछाः हे गौ माता ! आप कौन हो और यहाँ कैसे आना हुआ ? यहाँ आकर आप श्वेतवर्ण हो जाती हो इसमें क्या रहस्य है ? कृपा करके आपका परिचय दें।

गाय बोलने लगीः हम गायों के रूप में सब तीर्थ हैं। लोग हममें हर हर गंगे , हर हर यमुने ,हर हर नर्मदे आदि बोलकर गोता लगाते हैं। हममें अपने पाप धोकर पुण्यात्मा होकर जाते हैं और हम उनके पापों की कालिमा मिटाने के लिए द्वन्द्व-मोह से विनिर्मुक्त आत्मज्ञानी, आत्मा-परमात्मा में विश्रान्ति पाये हुए सत्पुरूषों के आँगन में आकर पवित्र हो जाती हैं।

हमारा काला बदन पुनः श्वेत हो जाता है। तुम लोग जिनको अशिक्षित, गँवार, बूढ़ा समझते हो वे बुजुर्ग के जहाँ से तमाम विद्याएँ निकलती हैं…. उस आत्मदेव में विश्रान्ति पाये हुए आत्मवेत्ता संत हैं।

तीर्थी कुर्वन्ति जगतीं….

ऐसे आत्मारामी ब्रह्मवेत्ता महापुरुष जगत को तीर्थरूप बना देते हैं। अपनी दृष्टि से, संकल्प से, संग से जन-साधारण को उन्नत कर देते हैं। ऐसे पुरुष जहाँ ठहरते हैं, उस जगह को भी तीर्थ बना देते हैं।

विवेक विचार।

आप हवाई जहाज में बेफिक्र होके बैठते हैं जबकि आप पायलट को जानते तक नहीं।

आप जहाज में बेफिक्र हो कर बैठते है जबकि आप केप्टन को जानते तक नहीँ।

आप बस में भी बेफिक्र होकर सवारी करते हैं जबकि बस ड्राइवर को आप पहचानते तक नहीं।

ट्रेन में भी आप बेफिक्र होकर यात्रा करते हैं जबकि मोटरमैन को आप जानते तक नहीं।

फिर जिंदगी में आप बेफिक्र होकर क्यों नहीं रहते जबकि आप जानते हैं कि जिंदगी चलाने वाला भगवान हैं ।

इसीलिये बाबा तुलसी ने रामचरितमानस में लिखा है,,,,

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥

भावार्थ:-कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्‌जी हैं॥

સંજય ગુપ્તા

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

साइमन कमीशन क्या था —
साइमन आयोग सात ब्रिटिश सांसदो का समूह था, जिसका गठन 1927 मे भारत मे संविधान सुधारों के अध्ययन के लिये किया गया था। इसे साइमन आयोग (कमीशन) कहते हैं । इसके अध्यक्ष सर जोन साइमन के नाम पर साइमन कमीशन कहा जाता है।

साइमन कमीशन के सुझाव —

साइमन कमीशन की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि- (१) प्रांतीय क्षेत्र में विधि तथा व्यवस्था सहित सभी क्षेत्रों में उत्तरदायी सरकार गठित की जाए। (२) केन्द्र में उत्तरदायी सरकार के गठन का अभी समय नहीं आया। (३) केंद्रीय विधान मण्डल को पुनर्गठित किया जाय जिसमें एक इकाई की भावना को छोड़कर संघीय भावना का पालन किया जाय। साथ ही इसके सदस्य परोक्ष पद्धति से प्रांतीय विधान मण्डलों द्वारा चुने जाएं।

जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर विदेश से पढकर भारत में बडौदा नरेश के यहां नौकरी करने लगे तो उनके साथ बहुत ज्यादा जातिगत भेदभाव हुआ। इस कारण उन्हें 11 वें दिन ही नौकरी छोड़कर बडौदा से वापस बम्बई जाना पड़ा। उन्होंने अपने समाज को अधिकार दिलाने की बात ठान ली।

उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को बार-बार पत्र लिखकर depressed class की स्थिति से अवगत करवाया और उन्हें अधिकार देने की माँग की।
बाबा साहेब के पत्रों में वर्णित छुआछूत व भेदभाव के बारे में पढकर अंग्रेज़ दंग रह गए कि क्या एक मानव दूसरे मानव के साथ ऐसे भी पेश आ सकता है। बाबा साहेब के तथ्यों से परिपूर्ण तर्कयुक्त पत्रों से अंग्रेज़ी हुकूमत अवाक् रह गई और 1927 में depressed class की स्थिति के अध्ययन के लिए मिस्टर साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया गया।

जब कांग्रेस व महत्मा गांधी को कमीशन के भारत आगमन की सूचना मिली तो उन्हें लगा कि यदि यह कमीशन भारत आकर depressed class की वास्तविक स्थिति का अध्ययन कर लेगा तो उसकी रिपोर्ट के आधार पर अंग्रेजी हुकूमत इस वर्ग के लोगों को अधिकार दे देगी। कांग्रेस व महत्मा गांधी ऐसा होने नहीं देने चाहते थे।

साइमन कमीशन का बिरोध —-

कमीशन के सभी सदस्य अंग्रेज (केवल बाबा साहब अम्बेडकर को छोड़कर) थे । जो कि भारतीय मनुवादी विचाराधारा के पैरोकारी करने वाले जवाहर लाल नेहरू , महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय जैसे नेताओं को नागवार गुजरा और इससे वे अपना अपमान समझते थे । और वे अपनी सामाजिक शाषन सत्ता को डगमगाते देख साइमन कमीशन विरोध करने लगे । चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आन्दोलन वापस लिए जाने के बाद आजा़दी की लड़ाई में जो ठहराव आ गया था वह अब साइमन कमीशन के गठन की घोषणा से टूट गया। 1927 में मद्रास में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें सर्वसम्मति से साइमन कमीशन के बहिष्कार का फैसला लिया गया। मुस्लिम लीग ने भी साइमन के बहिष्कार का फैसला किया।
साइमन कमीशन कोलकाता लाहौर लखनऊ, विजयवाड़ा और पुणे सहित जहाँ जहाँ भी पहुंचा उसे जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा और लोगों ने उसे काले झंडे दिखाए। पूरे देश में साइमन गो बैक (साइमन वापस जाओ) के नारे गूंजने लगे।

अतः 1927 में जब साईमन कमीशन अविभाजित भारत के लाहौर पहुंचा तो पूरे भारत में कांग्रेस की अगुवाई में जगह-जगह पर विरोध प्रदर्शन हुआ और लाहौर में मिस्टर साईमन को काले झंडे दिखा कर go back के नारे लगाए गए। बाबा साहेब स्वयं मिस्टर साईमन से मिलने लाहौर पहुंचे और उन्हें 400 पन्नों का प्रतिवेदन देकर depressed class की स्थिति से अवगत कराया। कांग्रेस ने मिस्टर साईमन की आँखों में धूल झोंकने के लिए उनके सामने ब्राह्मणों को depressed class के लोगों के साथ बैठ कर भोजन करवाया (बाद में ब्राह्मण अपने घर जाकर गोमूत्र पीकर उससे नहाये)। यह सब पाखण्ड देखकर बाबा साहेब मिस्टर साईमन को गांव के एक तालाब पर ले गये। उनके साथ एक कुत्ता भी था। वह कुत्ता अपने स्वभाव के मुताबिक सबके सामने उस तालाब में डुबकी लगाकर नहा कर बाहर आया। तब बाबा साहेब ने एक depressed class के व्यक्ति को तालाब का पानी पीने के लिए कहा। उस व्यक्ति ने घबराते हुए जैसे ही पानी पिया तो आसपास के ब्राह्मणों ने हमला बोल दिया। आखिरकार बाबा साहेब सहित अन्य व्यक्तियों को पास की एक मुस्लिम बस्ती में शरण लेकर अपना बचाव करना पड़ा।

मिस्टर साईमन को सब कुछ समझ में आ गया। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को वस्तु स्थिति रिपोर्ट सौंप दी। बाबा साहेब भी बार-बार पत्राचार करते रहे और उन्होंने लंदन जाकर अंग्रेजी हुकूमत के वरिष्ठ अधिकारियों व राजनेताओं को बार-बार भारत की depressed class को अधिकार देने की मांग की।

बाबा साहेब के तर्कों को अंग्रेजी हुकूमत नकार नहीं सकी और उसने भारत की depressed class को अधिकार देने के लिए 1930 में communal award (संप्रदायिक पंचाट) पारित किया।

हमें विद्यालय में यह पढाया गया था कि कांग्रेस ने साईमन कमीशन को काले झंडे दिखा कर go back के नारे लगाए। परंतु उसने वास्तव में ऐसा क्यों किया, यह नहीं पढाया गया।

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Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

💖 अक्षय तृतीया का इतना महत्व क्यों है जानिए कुछ और महत्वपुर्ण जानकारी 💖🌟💖
🌟माँ गंगा का अवतरण धरती पर आज ही के दिन हुआ था।
🌟महर्षी श्री परशुराम जी का जन्म आज ही के दिन हुआ था।
🌟माता अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था।
🌟द्रोपदी को चीरहरण से आज ही के दिन भगवान कृष्ण ने बचाया था।
🌟भगवान कृष्ण और मित्र सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था।
🌟भगवन कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था।
सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था।
🌟भगवान श्री ब्रह्मा जी के पुत्र श्री अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था।
🌟प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी व बद्री विशाल जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है।
💖🌟💖 बृंदावन के भगवान श्री बाँके बिहारी जी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री चरण विग्रह के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वह वस्त्र से ढके रहते है। 💖🌟💖

🌟आज ही के दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था।

💖🌟💖अक्षय तृतीया के दिन कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है। अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है।💖🌟💖