Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

भाग्यवती यज्ञपत्नियाँ
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     वृन्दावन में कुछ याज्ञिक ब्राह्मण यज्ञ कर रहे थे। भगवान श्री कृष्ण ने अपने सखाओं को भूखा जान उनके पास अन्न के लिए भेजा। याज्ञिकों ने उन्हें फटकारकर खदेड़ दिया। तब भगवान ने याज्ञिक ब्राह्मणों की पत्नियों के पास भेजा। वे श्री कृष्ण का मधुर नाम सुनते ही विविध भोजनों के थाल सजाकर चल दीं।
      जब यज्ञशाला से सभी याज्ञिकों की पत्नियाँ  श्यामसुंदर के समीप जाने लगीं,  तब एक याज्ञिक पत्नी के पति भोजन कर रहे थे। वे बड़े ही क्रोधी और कृपण थे। उनकी पत्नी ने जब सभी को जाते देखा, तब उसका हृदय भर आया। श्यामसुंदर की सलोनी सूरत को देखने की कितने  समय की उसकी साध थी। मनमोहन की मंजुल मूर्ति का ध्यान करते-करते ही उसने अनेकों दिन तथा रात्रियों को बिताया था। वे ही घनश्याम आज समीप ही आ गये हैं और संग की सभी सहेलियाँ उस मनोहारिणी मूर्ति के दर्शन से अपने नेत्रों को सार्थक बनायेंगी। इस बात के स्मरण से उसे ईर्ष्या सी होने लगी। उसने भी जल्दी-जल्दी एक थाल सजाया।
      उसके पति ने पूछा-'क्यों,  कहाँ की तैयारी हो रही है?'
      उसने सरलता के स्वर में कहा--'सुन्दरता के सागर श्यामसुन्दर के दर्शन के लिए मैं सहेलियों के साथ जाऊँगी।'
      उसने कहा-'मैं भोजन जो कर रहा हूँ? '
      उसने अत्यन्त ही विनय और स्नेह के स्वर में कहा-'आप भोजन तो कर ही चुके हैं, अब मुझे जाने की आज्ञा दीजिए। देखिये, मेरी सब सहेलियाँ आगे निकली जा रही हैं।'
     क्रोधी ब्राह्मण एकदम अग्निशर्मा बन गये और कठोर स्वर में बोले-'बड़ी उतावली लगी है, क्या धरा है वहाँ?'
     उसने कहा-'वहाँ त्रिभुवनमोहन श्याम की झाँकी है,  मेरा मन बिना गये नहीं मानता।'
    ब्राह्मण---'तब क्या तू बिना गये न मानेगी?'
    उसने कहा-हाँ, मैं उन मदनमोहन के दर्शन के लिए अवश्य जाऊँगी।' क्रोध के स्वर में ब्राह्मण ने कहा- 'न जाय तब?'
    उसने दृढ़ता से कहा-'न कैसे जाऊँगी? जरूर जाऊँगी और सबसे आगे जाऊँगी। भला, जो मेरे प्राणों के प्राण हैं,  मन के मन हैं और आत्मा के आत्मा हैं,  उन सच्चे स्वामी के पास न जाऊँगी , तो क्या जगत के झूठे--बनावटी सम्बन्धों में फँसी रहूँगी?'
     ब्राह्मण ने कहा-'तेरा स्वामी तो मैं ही हूँ । मुझे भी छोड़कर तेरा कोई दूसरा स्वामी है क्या?'
     उसने कहा---'आप मेरे शरीर के स्वामी हैं, आत्मा के प्रभु तो वे सारे जगत के समस्त प्राणियों के अधीश्वर- -सर्वलोकमहेश्वर परमात्मा श्री मदनमोहन ही हैं । उन्हीं सच्चे स्वामी के दर्शन से आज इन नेत्रों को सार्थक करूँगी ।'
     ब्राह्मण खाना-पीना भूल गए,  उन्हें पत्नी पर बड़ा क्रोध आया। मुझे स्वामी न मानकर और मेरी उपेक्षा करके यह दूसरे के पास जाती है,  इससे वे अभिमानी ब्राह्मण जल उठे। अत्यन्त ही हठ के साथ उन्होंने क्रोध और दृढ़ता के स्वर में कहा--'अच्छी बात है,  देखता हूँ  तू मेरी आज्ञा के विना कैसे जाती है।'
      उसने कहा-'आप व्यर्थ ही क्रोध करते हैं। मेरा-उनका ऐसा सम्बन्ध है कि कोई लाख प्रयत्न करे, मुझे उनके दर्शन से रोक नहीं सकता।'
     ब्राह्मण ने उसी स्वर में कहा--'हाथ कंगन को आरसी क्या! देखना है,  तू कैसे मदनमोहन के दर्शन करती है ।' यह कहकर उन क्रोधी ब्राह्मण ने पत्नी के हाथ-पैरों को कसकर बाँध दिया और  स्वयं उसके पास ही बैठ गया।
      यज्ञपत्नी ने दृढता के स्वर में कहा-'बस, इतना ही करेंगे या और भी कुछ?'
      उसने कहा--'और यह करूँगा कि जब तक वे सब लौटकर नहीं आयेंगी, तब तक यहीं बैठा-बैठा पहरा देता रहूँगा ।'
      उसने सूखी हँसी हँसकर कहा---'पहरे की अब क्या आवश्यकता है । शरीर पर आपका अधिकार है,  उसे आपने बाँध ही दिया। प्राण और आत्मा तो उन्हीं परमात्मा श्री नन्दनन्दन के हैंं,  उन पर तो उन्हीं का एक मात्र अधिकार है । शरीर से न सही, तो मेरे प्राणों के और आत्मा के साथ उनका मेल होगा।' यह कहकर उसने आँखें मूंद लीं।
      जिस सुन्दरी मालिन को मनमोहन ने अपनाकर निहाल कर दिया था, अपना यथार्थ स्वरूप ज्ञान करवाकर कृतार्थ कर दिया था, वही मालिन मथुरा में इन ब्राह्मणों के घरों में फूल माला देने जाया करती थी। वही प्रतिदिन जा जाकर इन विप्रपत्नियों के सामने श्यामसुन्दर के स्वरूप-सौन्दर्य का बखान किया करती। उसी के मुख से इसने यशोदानन्दन के स्वरूप की व्याख्या और प्रशंसा सुनी थी। उसने जिस प्रकार व्रजेन्द्रनन्दन के स्वरूप का वर्णन सुना था, उसी रूप का वह आँखें मूंद धीरे-धीरे ध्यान करने लगी।
     ध्यान में उसने देखा,  नीलमणि के समान तो शरीर की सुन्दर आभा है,  भरे हुए गोल गोल मुख के ऊपर  काली-काली घुंघराली लटें लटक रही हैं। गले मेंं  सुन्दर फूलों की माला तथा कंठे आदि आभूषण पड़े हुए हैं । कमर में सुन्दर पीली धोती बँधी है । कंधों पर जरी का दुपट्टा फहरा रहा है । हाथ में छोटी सी मुरली शोभायमान है । ऐसे मन्द-मन्द मुस्कराते हुए श्यामसुन्दर अत्यन्त ही ममता के साथ देखते हुए मेरी ओर आ रहे हैं। उन्हें देखते ही ब्राह्मणी का श्वास रुक गया। उसके नेत्रों के दोनों कोरों में से अश्रु ढलक पड़े। मुख्य प्राण उसके शरीर से निकलकर प्रियतम के शरीर में समा गये। ब्राह्मणी का बचन सत्य हुआ। उसकी आत्मा सबसे पहले श्यामसुंदर के पास पहुंच गयी। ब्राह्मण ने देखा उसकी पत्नी का प्राणहीन शरीर उसके पास पड़ा है । वह हाय-हाय करके अपने भाग्य को कोसने लगा।
     हे प्राणों के प्राण!  हे सभी के प्रिय स्वामिन्! इस ब्राह्मणी की सी उत्कट अभिलाषा और ऐसी एकाग्रता कभी इस प्रेमहीन जीवन में भी एक-आध क्षण के लिए हो सकेगी क्या?
             (भक्त चरितांक)

संजय गुप्ता

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