Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कठोर निर्णय जीवन के….
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एक बार एक बुजुर्ग की तबियत खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा। वहाँ पता लगा कि उन्हें कोई गम्भीर बीमारी है हालांकि ये कोई छूत की बीमारी नही है, पर फिर भी इनका बहुत ध्यान रखना पड़ेगा। कुछ समय बाद वो घर आए। पूरे समय के लिए नौकर और नर्स रख लिए गए ताकि उनका ध्यान रखा जा सके।

पर यह क्या.. धीरे-धीरे उनके पोते-पोति ने कमरे में आना बंद कर दिया। बेटा बहू भी ज्यादातर अपने कमरे में ही रहने लगे थे। उन बुजुर्ग को यह अच्छा नहीं लगता था मन ही मन बहुत कुछ सोचते लेकिन किसी से कुछ कहते नही थे। एक दिन वो कमरे के बाहर टहल रहे थे तभी उनके कान में अपने बेटे बहू की आवाज़ आई। बहू उनके बेटे से कह रही थी कि पिताजी को किसी वृद्धाश्रम या किसी अस्पताल के प्राइवेट कमरे एडमिट करा दें उनके कारण कहीं बच्चे भी बीमार न हो जाए।

बेटे ने बहु से कहा, तुम ठीक ही कह रही हो, मैं आज ही पिताजी से बात करूंगा। पिता यह सब सुनकर चुपचाप अपने कमरे में लौटा, यह सुनकर दुख तो बहुत हुआ पर उन्होंने मन ही मन कुछ सोच लिया। शाम जब बेटा कमरे में आया तो पिताजी बोले अरे बेटे मैं तो तुम्हें ही याद कर रहा था मुझे कुछ जरूरी बात करनी है। बेटा बोला पिताजी मुझे भी आपसे कुछ बात करनी है।पहले आप बताओ क्या बात हैं।

पिताजी बोले तुम्हें तो पता ही है कि मेरी तबियत बिल्कुल ठीक नहीं रहती, इसलिए अब मै चाहता हूं कि मैं अपना बचा खुचा जीवन मेरे जैसे बीमार, असहाय, जरूरतमंद और बेसहारा बुजुर्गों के साथ बिताऊं। उनके मुंह से यह बात सुनते ही बेटा मन ही मन खुश हो गया मानो कि उसे तो कुछ कहने सुनने की जरूरत नहीं पड़ी और उसका काम भी हो गया। पर दिखावे के लिए उसने अपने पिता से कहा, ये आप क्या कह रहे हो पिताजी आपको यहां रहने में क्या दिक्कत है ?

तब बुजुर्ग बोले नही बेटे, मुझे यहां रहने में तो कोई तकलीफ नहीं लेकिन यह कहने में मुझे बहुत तकलीफ हो रही है कि तुम अब अपने परिवार सहित अपने रहने की व्यवस्था कहीं ओर कर लो, अब से मैने यह निश्चय कर लिया है कि मै अपने इस बंगले को ही “वृद्धाश्रम” बनाऊंगा। और असहाय, बेसहारों और जरुरतमंदो की देख रेख करते हुए ही बाकी का अपना यह जीवन व्यतीत करूंगा। अरे हाँ बेटे तुम भी तो मुझसे कुछ कहना चाहते थे न बताओ क्या बात थी ?

उस कमरे में एकाएक सन्नाटा छा गया था.. कभी-कभी अपने अपनों को सबक सिखाने के लिए जीवन में सख्त कदम उठाने की जरूरत होती है। हम सब विशेष रूप से एक बात का ध्यान रखें हमारे माता-पिता या बड़े-बुजुर्गों को वृद्धा वस्था में सबसे ज्यादा हमारी जरूरत होती है। उन्हें हमारे पैसे नही हमारे प्यार हमारी देखभाल की जरूरत होती है। जो आजकल अक्सर घरों में नही देखने को मिलती है।

आज के समय मे हम सभी अपनी-अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त और मस्त हो गए है कि हमे इस बात का जरा भी भान नही रहता कि हमारे साथ हमारे अपने भी रहते है जिन्हें हमारी अत्यधिक आवश्यकता होती है। हमारे बड़े हमसे सिर्फ उर्म ही नही बल्कि हर बात में बड़े होते है उनके पास हमसे कही अधिक तजुर्बा होता है, हमसे कही अधिक उन्होंने इस दुनिया को देखा होता है जीया होता है।

आप सभी से करबद्ध निवेदन है हमारे बड़े हमारे अपने हमारे घर की शान है, धरोहर है ! उन्हें खूब इज्जत दे, खूब सम्मान करें व अपना जितना अधिक समय हम उन्हें दे सके जरूर दे।

धन्यवाद 🙏🙏
संजय गुप्ता

Posted in ज्योतिष - Astrology

क्यों सात बार राई वारने से उतर जाती हैं नजर ?
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अक्सर हम सुनते है कि जब किसी को नजर लग जाती है तो उसे कहते हैं कि अपनी मुट्ठी में राई लेकर अपने सिर से सात बार वार कर फेंक दो। क्या राई को सात बार वार देने क्या नजर उतर सकती हैं ? आइये इसके पीछे क्या विज्ञान काम करता हैं समझने का प्रयास करते हैं।
मित्रों अक्सर आप देखते होंगे की राई को जब किसी प्लास्टिक बेग से निकालते हैं तो राई उस प्लाष्टिक बेग से चिपक जाती हैं। वो इसलिये कि राई में चुम्बकीय गुण विद्धमान होता हैं। और राई को बेग से निकालते वक्त घर्षण से उसका चुम्बकीय गुण सक्रीय हो जाता हैं।
अब जब इसे सात बार हमारे शरीर पर से वारा जाता हैं तब इसका संपर्क हमारे शरीर के सात रंग वाले आभामंडल से होता हैं, जिसे हम सुरक्षा चक्र भी कहते हैं। राई के लगातार हमारे आभामंडल से टकराने से इसका चुम्बकीय गुण सक्रीय होकर हमारे शरीर के सातों चक्रों में फैली नकारात्मकता को सोख लेता हैं। सात बार वारने का मतलब हमारे सूक्ष्म शरीर के सातों चक्रों का शुद्धिकरण करना होता हैं। सात बार राई को वारने के बाद उसे घर से कुछ दूर नाली में फेंक दिया जाता हैं।
वैसे आभामंडल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इसके लिए साधारण तौर पर इतना बता देता हूँ कि आभामंडल हमारे शरीर का सुरक्षा चक्र होता हैं। जब ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अच्छी-बुरी दशा चलती हैं तो उसका सबसे पहला प्रभाव हमारे आभामंडल पर ही पड़ता हैं। पर अगर हम किसी अच्छी संगत, अच्छे विचार या किसी ज्ञानी गुरु के संपर्क में हो या किसी भगवान् में हमारी आस्था बहुत मजबूत हो तो ग्रहों के बुरे प्रभाव की रश्मियाँ हमारे उस आभामंडल यानी सुरक्षा चक्र का भेदन करने में कामयाब नही होती। इसलिए जो लोग निरंतर सत्संग करते हैं, सकारात्मक विचारों के संपर्क में रहते हैं ऐसे पुण्यशाली लोगों पर ग्रहों, टोने-टोटके और नजर इत्यादि का बुरा प्रभाव आसानी से नही पड़ता। और न ही कोई नकारात्मकता उनके आभामंडल को भेद पाती हैं।

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बहुत ज्ञानवर्धक सीख देने वाला शिक्षाप्रद लघु दृष्टांत,,,,,,

एक बार की बात है एक बहुत ही पुण्यात्मा व्यक्ति अपने परिवार सहित तीर्थ के लिए निकला .. कई कोस दूर जाने के बाद पूरे परिवार को प्यास लगने लगी , ज्येष्ठ का महीना था , आस पास कहीं पानी नहीं दिखाई पड़ रहा था .. उसके बच्चे प्यास से ब्याकुल होने लगे .. समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे … अपने साथ लेकर चलने वाला पानी भी समाप्त हो चुका था!!

एक समय ऐसा आया कि उसे भगवान से प्रार्थना करनी पड़ी कि हे प्रभु अब आप ही कुछ करो मालिक … इतने में उसे कुछ दूर पर एक साधू तप करता हुआ नजर आया.. व्यक्ति ने उस साधू से जाकर अपनी समस्या बताई … साधू बोले की यहाँ से एक कोस दूर उत्तर की दिशा में एक छोटी दरिया बहती है जाओ जाकर वहां से पानी की प्यास बुझा लो …

साधू की बात सुनकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुयी और उसने साधू को धन्यवाद बोला .. पत्नी एवं बच्चो की स्थिति नाजुक होने के कारण वहीं रुकने के लिया बोला और खुद पानी लेने चला गया..

जब वो दरिया से पानी लेकर लौट रहा था तो उसे रास्ते में पांच व्यक्ति मिले जो अत्यंत प्यासे थे .. पुण्य आत्मा को उन पांचो व्यक्तियों की प्यास देखि नहीं गयी और अपना सारा पानी उन प्यासों को पिला दिया .. जब वो दोबारा पानी लेकर आ रहा था तो पांच अन्य व्यक्ति मिले जो उसी तरह प्यासे थे … पुण्य आत्मा ने फिर अपना सारा पानी उनको पिला दिया …

यही घटना बार बार हो रही थी … और काफी समय बीत जाने के बाद जब वो नहीं आया तो साधू उसकी तरफ चल पड़ा …. बार बार उसके इस पुण्य कार्य को देखकर साधू बोला – ” हे पुण्य आत्मा तुम बार बार अपना बाल्टी भरकर दरिया से लाते हो और किसी प्यासे के लिए ख़ाली कर देते हो … इससे तुम्हे क्या लाभ मिला …? पुण्य आत्मा ने बोला मुझे क्या मिला ? या क्या नहीं मिला इसके बारें में मैंने कभी नहीं सोचा .. पर मैंने अपना स्वार्थ छोड़कर अपना धर्म निभाया ..

साधू बोला – ” ऐसे धर्म निभाने से क्या फ़ायदा जब तुम्हारे अपने बच्चे और परिवार ही जीवित ना बचे ? तुम अपना धर्म ऐसे भी निभा सकते थे जैसे मैंने निभाया ..

पुण्य आत्मा ने पूछा – ” कैसे महाराज ?
साधू बोला – ” मैंने तुम्हे दरिया से पानी लाकर देने के बजाय दरिया का रास्ता ही बता दिया … तुम्हे भी उन सभी प्यासों को दरिया का रास्ता बता देना चाहिए था … ताकि तुम्हारी भी प्यास मिट जाये और अन्य प्यासे लोगो की भी … फिर किसी को अपनी बाल्टी ख़ाली करने की जरुरत ही नहीं …” इतना कहकर साधू अंतर्ध्यान हो गया …

पुण्य आत्मा को सब कुछ समझ आ गया की अपना पुण्य ख़ाली कर दुसरो को देने के बजाय , दुसरो को भी पुण्य अर्जित करने का रास्ता या विधि बताये ..

मित्रो – ये तत्व ज्ञान है … अगर किसी के बारे में अच्छा सोचना है तो उसे उस परमात्मा से जोड़ दो ताकि उसे हमेशा के लिए लाभ मिले!!!

बद्रीनाथ जी की आरती,,, बहुत बहुत फलदायक स्तुति है, इसे अवश्य सेयर करें और कण्ठस्थ कर प्रतिदिन इसका पाठ करें, आप के ऊपर बद्रीनाथ भगवान की कृपा अवश्य होगी।

संजय गुप्ता

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

[14/04, 7:37 p.m.] संस्कृति ईबुक्स: आदमी जब पत्तल में खाना खाता था,
और घर मे जब कोई मेहमान आता था..
मेहमान को देख के वह हरा हो जाता था,
स्वागत में पूरा परिवार बिछ जाता था….

बाद में जब वह मिट्टी के बर्तन में खाने लगा,
रिश्तों को जमीन से जुड़कर निभाने लगा..

फिर जब पीतल के बर्तन उपयोग में लेता था,
रिश्तों को साल छः महीने में चमका लेता था..

फिर परिवार स्टील के बर्तन में खाने लगा,
रिश्तों को भी लंबे समय तक निभाने लगा..

लेकिन बर्तन कांच के जब से बरतने लगे,
एक हल्की सी चोट में रिश्ते बिखरने लगे..

अब बर्तन थर्मोकोल पेपर के इस्तेमाल होने लगे,
सारे सम्बन्ध भी अब यूज़ एंड थ्रो होने लगे….!!!

[14/04, 7:40 p.m.] संस्कृति ईबुक्स: बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती
ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं
रिमोट के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता
ना ही खाने की नई नई फ़रमायशें हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ।

सुबह अख़बार के लिए भी नहीं होती मारा मारी
घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है
पर हर कमरा बेजान सा लगता है
अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता
बचपन की यादें कुछ फ़ोटो में सिमट गयी हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ।

अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता
ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है
खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती
खाना खिलाने के बाद की तसल्ली भी अब नहीं मिलती
ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है
ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है
ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार है
बजट की खींच तान भी अब नहीं है
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं

पलक झपकते ही जीवन का स्वर्ण काल निकल गया
पता ही नहीं चला
इतना ख़ूबसूरत अहसास कब पिघल गया
तोतली सी आवाज़ में हर पल उत्साह था
पल में हँसना पल में रो देना
बेसाख़्ता गालों पर उमड़ता प्यार था
कंधे पर थपकी और गोद में सो जाना
सीने पर लिटाकर वो लोरी सुनाना
बार बार उठ कर रज़ाई को उड़ाना
अब तो बिस्तर बहुत बड़ा हो गया है
मेरे बच्चों का प्यारा बचपन कहीं खो गया है

अब तो रोज सुबह शाम मेरी सेहत पूँछते हैं
मुझे अब आराम की हिदायत देते हैं
पहले हम उनके झगड़े निपटाते थे
आज वे हमें समझाते हैं
लगता है अब शायद हम बच्चे हो गए हैं
मेरे बच्चे अब बहुत बड़े हो गए

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ભકત અને ભગવાન

​તે ઉઘાડે પગે આવ્યો……..

એક ગામમાં એક ડોસો અને ડોસી રહેતાં હતાં. એમને કોઈ સંતાન ન હતું. નાનું મોટું વણાટનું કામ કરતાંઅને ગુજરાન ચલાવતાં. દિવાળીનો તહેવાર આવતો હતો. ડોસીએ કહ્યું : ‘દિવાળીનો તહેવાર આવે છે, પણ ઘરમાં કંઈ છે નહિ, શું કરીશું?’ ડોસાએ એક કામળો હજી હમણાં જ પૂરો કર્યો હતો, એટલે કહ્યું : ‘મને કામળો દે, હું વેચી આવું !’ ડોસો કામળો લઈને બાજુના ગામમાં વેચવા નીકળ્યો. એ ગામ મોટું હતું એટલે ખપત રહેતી.ડોસો આખો દી’ ગામમાં ફર્યો પણ કામળાનું કોઈ ઘરાક ન થયું. સાંજ પડવા આવી કે તે પોતાને ગામ પાછો વળ્યો. ચાલતાં ચાલતાં એક ત્રિભેટે(તર્ણ રસ્તા) પહોંચ્યો. ત્રિભેટે એક મંદિર હતું. મંદિરમાં ભગવાન રામ બિરાજ્યા હતા, મૂર્તિ વિશાળ કદની હતી. ભગવાન રામ ભેગા સીતા મૈયા અને લખન ભૈયા તો હોય જ, પણ અહીં,મંદિરની વિશેષતા જાણો તો વિશેષતા, ભગવાન રામ એકલા બિરાજ્યા હતા. સાંજ ઢળી ગઈ હતી.આ વખતે હિમાલયની ગિરિમાળામાં બરફ વહેલો પડ્યો હતો, એટલે ઠંડી વળી ગઈ હતી. આમ પણ ડોસાને ટાઢ પણ લાગતી હતી અને થાક્યો પણ હતો, એટલે ભગવાન રામનાં દર્શન કરવા અને થોડો વિસામો ખાવા મંદિરમાં દાખલ થયો. તેણે ભગવાન રામનાં દર્શન કર્યાં, અને તેની મૂર્તિ સન્મુખ બેઠો. સભા મંડપ ખુલ્લો હતો, ઠંડા પવનના સુસવાટા આવતા હતા. ડોસાને ટાઢનું લખલખું આવી જતું હતું. તે મૂર્તિ સામે એક ધ્યાન થઈને બેઠો હતો અને કોણ જાણે તેને થયું કે, ‘મને ટાઢ લાગે છે, તો આ મારા વ્હાલાને નહિ લાગતી હોય ?’ તેને જાણે કોઈએ દોર્યો, ઊભો થયો, ગર્ભગૃહમાં ગયો અને ભગવાન રામને કામળો લપેટી દીધો, અને બોલ્યો, ‘લે પ્રભુ, હવે તને ટાઢ નહિ લાગે !’
આ પછી થોડો વિસામો ખાઈને તે પોતાના ગામ ભણી ચાલી નીકળ્યો.તે ઘરે પહોંચ્યો. ડેલીની સાંકળ ખખડાવી. ડોસાએ ડેલી ખોલી. ડોસાના હાથમાં કામળો ન હતો. ડોસીને થયું કે કામળો ખપી ગયો લાગે છે, હવે ભલે દિવાળી આવે ! ડોસો ઘરમાં દાખલ થયો. તે થાકી ગયો હતો, પણ સૂતો નહિ, ગોદડું ઓઢીને બેઠો. ડોસી પણ તેની પાસે બેઠી. પછી ડોસાએ જરાક નિરાશામાં કહ્યું, ‘આજે કામળાનું કોઈ ઘરાક ન થયું.’ડોસીએ પૂછ્યું : ‘તો કામળો ક્યાં ?’ડોસાએ કહ્યું : ‘મેં રામજીને ઓઢાડી દીધો.’ડોસીએ પૂછ્યું : ‘ક્યાં ?’‘ત્રિભેટાના મંદિરે.’ ડોસી તેની સામે જોઈ રહી, પણ ગુસ્સે ન થઈ, તેનું હૈયું માર્દવભર્યું હતું એટલે બોલી, ‘તમે જે કર્યું તે ઠીક કર્યું.’પછી ડોસીએ કહ્યું : ‘થાકી ગયા હશો, લો હું ખાટલો ઢાળું.’ ડોસી ખાટલો ઢાળવા ગઈ, એ ટાણે ડેલીએ હળવેથી ટકોરા પડ્યા. ડોસીને થયું, ‘અત્યારે કોણ હશે ?’ ડોસાએ જઈને ડેલી ખોલી, પણ ત્યાં કોઈ ન હતું ! ડેલીની આગળ એક કોથળી પડી હતી. ડોશાએ તે લીધી, ડેલી વાસી અને અંદર આવ્યો. તેણે ડોસીને કહ્યું, ‘ડેલીએ તો કોઈ ન હતું, આ કોથળી પડી હતી.’તેણે ડોસીને કોથળી દીધી અને કહ્યું, ‘જો તો ખરી, માંહ્ય શું છે ?’ ડોસીએ કોથળીનું મોઢું ખોલ્યુંકે માંહ્ય સોના-ચાંદીના સિક્કા દીઠા ! ડોસીને નવાઈનો પાર ન રહ્યો. ડોસાને આ કૌતુક સમજાણું નહિ.એ આખી રાત બેયને નીંદર ન આવી. વહેલા ઊઠીને ડોસાએ ડેલી ખોલી તો ડેલીના આગળ ધૂળમાં કોઈનાં પગલાં દીઠાં અને એ પગલાં પાછાં પણ વળ્યાં હતાં ! અને ડોસાનો અંતરાત્મા બોલી ઊઠ્યો, ‘નક્કી આ પગલાં મારા રામનાં છે ! મારો વ્હાલો ઉઘાડે પગે કામળાના પૈસા દેવા આવ્યો હતો !’ તેની આંખોમાં આંસુ આવી ગયાં, ડોસીએ પણ જ્યારે વાત સાંભળી ત્યારે તેની આંખો પણ છલકાઈ ઊઠી !પછી તેઓએ રંગેચંગે દિવાળી ઊજવી.

………….જો તમે ભગવાનના છો, તો ભગવાન તમારો છે..

🙏🏻🌹જય શ્રી કૃષ્ણ🌹🙏🏻

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कर्मों का फल

बात प्राचीन महाभारत काल की है। महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैंदान में हुआ, जिसमें अठारह अक्षौहणी सेना मारी गई, इस युद्ध के समापन और सभी मृतकों को तिलांज्जलि देने के बाद पांडवों सहित श्री कृष्ण पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस हुए

तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया, “मधुसूदन, मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं सरसैया पर पड़ा हुआ हूँ?” यह बात सुनकर मधुसूदन मुस्कराये और पितामह भीष्म से पूछा, ‘पितामह आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है?” इस पर पितामह ने कहा, ‘हाँ”। श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया |

इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे, लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा। आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस गये क्योंकि पीठ के बल ही जाकर गिरा था? करकेंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, ‘हे युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक इसी प्रकार तुम भी होना।” तो, हे पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे। जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन आपने दुर्योधन और दुःशासन को नहीं रोका। इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गये और करकेंटा का ‘श्राप’ आप पर लागू हो गया।

अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी तो भोगना ही पड़ेगा। प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के ही अनुसार ही जन्म होता है।

संजय गुप्ता

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शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ मोह, गरुड़जी का काकभुशुण्डि से रामकथा और राम महिमा सुनना!!!!!

भगवान शंकर सम्पूर्ण रामकथा माता पार्वती को सुनाने के बाद पूछते हैं कि हे पार्वती अब बोलो ओर क्या जानना चाहती हो!!!!!

माता पार्वती कहती हैं,,,
* राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर।
नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर॥

भावार्थ:-हे नाथ! कहिए, (ऐसे) श्री रामपरायण, ज्ञाननिरत, गुणधाम और धीरबुद्धि भुशुण्डिजी ने कौए का शरीर किस कारण पाया?

शिवजी कहते हैं- हे गिरिजे! श्री रामजी के चरित्र सौ करोड़ (अथवा) अपार हैं। वेद और सरस्वती भी उनका वर्णन नहीं कर सकते॥ यह पवित्र कथा भगवान्‌ के परम पद को देने वाली है। इसके सुनने से अविचल भक्ति प्राप्त होती है। बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥

मैंने वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को सुनाई थी॥ हे भवानी! सो कहो, अब और क्या कहूँ?

रामजी की मंगलमयी कथा सुनकर पार्वतीजी अत्यंत विनम्र तथा कोमल वाणी बोलीं- हे त्रिपुरारि। मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ जो मैंने जन्म-मृत्यु के भय को हरण करने वाले श्री रामजी के गुण (चरित्र) सुने॥ हे नाथ! आपका मुख रूपी चंद्रमा श्री रघुवीर की कथा रूपी अमृत बरसाता है। हे मतिधीर मेरा मन कर्णपुटों से उसे पीकर तृप्त नहीं होता॥

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥ श्री रामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं (बस कर देते हैं), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं।

भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥ जो संसार रूपी सागर का पार पाना चाहता है, उसके लिए तो श्री रामजी की कथा दृढ़ नौका के समान है।

ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥ जिन्हें श्री रघुनाथजी की कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्मा की हत्या करने वाले हैं॥

हे नाथ! आपने कहा कि यह सुंदर कथा काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कही थी। लेकिन काकभुसुण्डि तो एक कौवा है। उसे भगवान की भक्ति कैसे प्राप्त हुई, इस बात पर मुझे संदेह हो रहा है। हे देवाधिदेव महादेवजी! वह प्राणी अत्यंत दुर्लभ है जो मद और माया से रहित होकर श्री रामजी की भक्ति के परायण हो।हे विश्वनाथ! ऐसी दुर्लभ हरि भक्ति को कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिए॥

भुशुण्डिजी ने कौए का शरीर किस कारण पाया? हे कृपालु! बताइए, उस कौए ने प्रभु का यह पवित्र और सुंदर चरित्र कहाँ पाया? और हे कामदेव के शत्रु! यह भी बताइए, आपने इसे किस प्रकार सुना?

और गरुण जी जो श्री हरि के सेवक है उन्होंने मुनियों के समूह को छोड़कर, कौए से जाकर हरिकथा किस कारण सुनी? काकभुशुण्डि और गरुड़ इन दोनों हरिभक्तों की बातचीत किस प्रकार हुई?

शिवजी सुख पाकर आदर के साथ बोले-हे सती! तुम धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि अत्यंत पवित्र है। श्री रघुनाथजी के चरणों में तुम्हारा कम प्रेम नहीं है। (अत्यधिक प्रेम है)।

शिव कहते हैं- पक्षीराज गरुड़जी ने भी जाकर काकभुशुण्डिजी से प्रायः ऐसे ही प्रश्न किए थे। हे उमा! मैं वह सब आदरसहित कहूँगा, तुम मन लगाकर सुनो॥

पहले तुम्हारा अवतार दक्ष के घर हुआ था। तब तुम्हारा नाम सती था॥ दक्ष के यज्ञ में तुम्हारा अपमान हुआ। तब तुमने अत्यंत क्रोध करके प्राण त्याग दिए थे और फिर मेरे सेवकों ने यज्ञ विध्वंस कर दिया था। वह सारा प्रसंग तुम जानती ही हो॥ तब मेरे मन में बड़ा सोच हुआ और हे प्रिये! मैं तुम्हारे वियोग से दुःखी हो गया।

मैं विरक्त भाव से सुंदर वन, पर्वत, नदी और तालाबों का कौतुक (दृश्य) देखता फिरता था॥ सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में और भी दूर, एक बहुत ही सुंदर नील पर्वत है। उसके सुंदर स्वर्णमय शिखर हैं, (उनमें से) चार सुंदर शिखर मेरे मन को बहुत ही अच्छे लगे॥ न शिखरों में एक-एक पर बरगद, पीपल, पाकर और आम का एक-एक विशाल वृक्ष है। पर्वत के ऊपर एक सुंदर तालाब शोभित है। उस सुंदर पर्वत पर वही पक्षी (काकभुशुण्डि) रहते है। उसका नाश कल्प के अंत में भी नहीं होता।

उस पर्वत के आस पास गुण-दोष, मोह, काम आदि अविवेक जो सारे जगत्‌ में छा रहे हैं वो नही फटकते। उन काकभुशुण्डि जी का श्री हरि के भजन को छोड़कर उसे दूसरा कोई काम नहीं है॥ बरगद के नीचे वह श्री हरि की कथाओं के प्रसंग कहता है। वहाँ अनेकों पक्षी आते और कथा सुनते हैं। वह विचित्र रामचरित्र को अनेकों प्रकार से प्रेम सहित आदरपूर्वक गान करता है॥

जब मैंने वहाँ जाकर यह कौतुक (दृश्य) देखा, तब मेरे हृदय में विशेष आनंद उत्पन्न हुआ॥ तब मैंने हंस का शरीर धारण कर कुछ समय वहाँ निवास किया और श्री रघुनाथजी के गुणों को आदर सहित सुनकर फिर कैलास को लौट आया॥ मैंने वह सब इतिहास कहा कि जिस समय मैं काकभुशुण्डि के पास गया था।

अब वह कथा सुनो जिस कारण से पक्ष‍ी कुल के ध्वजा गरुड़जी उस काग के पास गए थे॥

जिस समय युद्ध में श्री रघुनाथजी ने मेघनाद के हाथों अपने को बँधा लिया, तब नारद मुनि ने गरुड़ को भेजा॥ सर्पों के भक्षक गरुड़जी बंधन काटकर गए, तब उनके हृदय में बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ। ये कैसे भगवान राम हैं की एक नागपाश से अपनी रक्षा नही कर सके?

जिनका नाम जपकर मनुष्य संसार के बंधन से छूट जाते हैं, उन्हीं राम को एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश से बाँध लिया॥ गरुड़जी ने अनेकों प्रकार से अपने मन को समझाया। पर उन्हें ज्ञान नहीं हुआ संदेहजनित) दुःख से दुःखी होकर, मन में कुतर्क बढ़ाकर वे तुम्हारी ही भाँति मोहवश हो गए॥

दुखी होकर वे देवर्षि नारदजी के पास गए। नारदजी ने कहा- हे गरुड़! सुनिए! श्री रामजी की माया बड़ी ही बलवती है॥ जिसने मुझको भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षीराज! वही माया आपको भी व्याप गई है॥ जो मेरे समझाने से भी दूर नही होगी। इसलिए आप ब्रह्मा जी के पास जाइये।

तब पक्षीराज गरुड़ ब्रह्माजी के पास गए और अपना संदेह उन्हें कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजी ने श्री रामचंद्रजी को सिर नवाया और ब्रह्मा ने सोचा जब सभी माया से नाच सकते है यहाँ तक की मैं भी, तब गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य (की बात) नहीं है। ब्रह्मा जी बोले- हे गरुड़! तुम शंकरजी के पास जाओ। और किसी के पास मत जाना।

तब बड़ी आतुरता (उतावली) से पक्षीराज गरुड़ मेरे पास आए। हे उमा! उस समय मैं कुबेर के घर जा रहा था और तुम कैलास पर थीं॥

गरुण ने शंकर भगवान से विनती की- आप मेरे मोह को दूर कीजिये।

भोले नाथ बोले हे गरुड़! तुम मुझे रास्ते में मिले हो। राह चलते मैं तुम्हे किस प्रकार समझाऊँ?

सब संदेहों का तो तभी नाश हो जब दीर्घ काल तक सत्संग किया जाए॥ तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥

हे भाई! जहाँ प्रतिदिन हरिकथा होती है, तुमको मैं वहीं भेजता हूँ, तुम जाकर उसे सुनो। उसे सुनते ही तुम्हारा सब संदेह दूर हो जाएगा और तुम्हें श्री रामजी के चरणों में अत्यंत प्रेम होगा॥

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥

क्योंकि सत्संग के बिना हरि की कथा सुनने को नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के गए बिना श्री रामचंद्रजी के चरणों में दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता॥

तुम सत्संग के लिए वहाँ जाओ जहाँ उत्तर दिशा में एक सुंदर नील पर्वत है। वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं॥ उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुण्डि सुसीला॥

राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥ वे रामभक्ति के मार्ग में परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणों के धाम हैं और बहुत काल के हैं।

वे निरंतर श्री रामचंद्रजी की कथा कहते रहते हैं, वहाँ जाकर श्री हरि के गुण समूहों को सुनो। उनके सुनने से मोह से उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जाएगा।

भगवान शिव कहते हैं- मैं चाहता तो गरुण का मोह दूर कर सकता था लेकिन उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्री रामजी नष्ट करना चाहते हैं। फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षी की ही बोली समझते हैं। शिव जी कहते हैं – भगवान की माया जब शिवजी और ब्रह्माजी को भी मोह लेती है, तब दूसरा बेचारा क्या चीज है?

अब गरुण जी वहां गए जहाँ काकभुशुण्डि बसते थे। उस पर्वत को देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और (उसके दर्शन से ही) सब माया, मोह तथा सोच जाता रहा॥

तालाब में स्नान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्त से वटवृक्ष के नीचे गए। वहाँ श्री रामजी के सुंदर चरित्र सुनने के लिए बूढ़े-बूढ़े पक्षी आए हुए थे॥ भुशुण्डिजी कथा आरंभ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षीराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने पक्षीराज गरुड़जी का बहुत ही आदर-सत्कार किया।

फिर प्रेम सहित पूजा कर के कागभुशुण्डिजी बोले- हे पक्षीराज ! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया। आप किस कार्य के लिए आए हैं?

पक्षीराज गरुड़जी ने कहा- हे नाथ! सुनिए, मैं जिस कारण से आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया। फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गए। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह संदेह और अनेक प्रकार के भ्रम सब जाते रहे॥

आप मुझे श्री रामजी की अत्यंत पवित्र करने वाली, सदा सुख देने वाली और दुःख समूह का नाश करने वाली कथा सादर सहित सुनाएँ। हे प्रभो! मैं बार-बार आप से यही विनती करता हूँ॥ बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥

गरुड़जी की विनम्र, सरल, सुंदर और प्रेमयुक्त वाणी सुनते ही भुशण्डिजी के मन में परम उत्साह हुआ और वे श्री रघुनाथजी के गुणों की कथा कहने लगे॥

हे भवानी! उन्होंने बड़े ही प्रेम से रामजी के सब उज्ज्वल चरित्र काकभुशुण्डिजी ने विस्तारपूर्वक वर्णन किया। भुशुण्डिजी ने वह सब कथा कही जो हे भवानी! मैंने तुमसे कही।

सारी रामकथा सुनकर गरुड़जी आनंदित होकर वचन कहने लगे- श्री रघुनाथजी के सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा संदेह जाता रहा। हे काकशिरोमणि! आपके अनुग्रह से श्री रामजी के चरणों में मेरा प्रेम हो गया॥ युद्ध में प्रभु का नागपाश से बंधन देखकर मुझे अत्यंत मोह हो गया था। अब सब मोह जाता रहा।

हे तात! यदि मुझे अत्यंत मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता? सच्चे संत उसी को मिलते हैं, जिसे श्री रामजी कृपा करके देखते हैं। श्री रामजी की कृपा से मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपा से मेरा संदेह चला गया॥

पक्षीराज गरुड़जी की विनय और प्रेमयुक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी का शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रों में जल भर आया और वे मन में अत्यंत हर्षित हुए॥

काकभुशुण्डिजी ने फिर कहा- पक्षीराज पर उनका प्रेम कम न था। आप सब प्रकार से मेरे पूज्य हैं और श्री रघुनाथजी के कृपापात्र हैं॥ हे पक्षीराज! मोह के बहाने श्री रघुनाथजी ने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है॥

जो माया सारे जगत्‌ को नचाती है और जिसका चरित्र (करनी) किसी ने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्री रामचंद्रजी की भृकुटी के इशारे पर अपने समाज (परिवार) सहित नटी की तरह नाचती है॥ भगवान्‌ प्रभु श्री रामचंद्रजी ने भक्तों के लिए राजा का शरीर धारण किया और साधारण मनुष्यों के से अनेकों परम पावन चरित्र किए॥

हे गरुड़जी! ऐसी ही श्री रघुनाथजी की यह लीला है, जो राक्षसों को विशेष मोहित करने वाली और भक्तों को सुख देने वाली है। हे स्वामी! जो मनुष्य मलिन बुद्धि, विषयों के वश और कामी हैं, वे ही प्रभु पर इस प्रकार मोह का आरोप करते हैं॥ जो काम, क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःख रूप घर में आसक्त हैं, वे श्री रघुनाथजी को कैसे जान सकते हैं?

हे पक्षीराज गरुड़जी! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ॥ श्री रामचंद्रजी का सहज स्वभाव सुनिए। वे भक्त में अभिमान कभी नहीं रहने देते। हे गरुड़जी! श्री रामजी की कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिए।

जब-जब श्री रामचंद्रजी मनुष्य शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिए बहुत सी लीलाएँ करते हैं॥ तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाल लीला को देखकर खुश होता हूँ। वहां जाकर मैं जन्म महोत्सव देखता हूँ और (भगवान्‌ की शिशु लीला में) लुभाकर पाँच वर्ष तक वहीं रहता हूँ॥ बालक रूप श्री रामचंद्रजी मेरे इष्टदेव हैं,जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभु का मुख देख-देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ॥

छोटे से कौए का शरीर धरकर और भगवान्‌ के साथ-साथ फिरकर मैं उनके तरह-तरह के बाल चरित्रों को देखा करता हूँ॥ लड़कपन में वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगन में उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ॥

भुशुण्डिजी कहने लगे- हे पक्षीराज! सुनिए, श्री रामजी का चरित्र सेवकों को सुख देने वाला है। (अयोध्या का) राजमहल सब प्रकार से सुंदर है। सुंदर आँगन का वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं। माता को सुख देने वाले बालविनोद करते हुए श्री रघुनाथजी आँगन में विचर रहे हैं॥ भगवान का सुंदर रूप है जिसका वर्णन नही किया जा सकता है जो अद्भुत है।

मरकत मणि के समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। नवीन (लाल) कमल के समान लाल-लाल कोमल चरण हैं। सुंदर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योति से चंद्रमा की कांति को हरने वाले हैं॥

तलवे में) वज्रादि (वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुंदर चिह्न हैं, चरणों में मधुर शब्द करने वाले सुंदर नूपुर हैं, उनके मुख पर काले और घुँघराले केशों की छबि छा रही है॥ राजा दशरथजी के आँगन में विहार करने वाले रूप की राशि श्री रामचंद्रजी अपनी परछाहीं देखकर नाचते हैं और मुझसे बहुत प्रकार के खेल करते हैं, जिन चरित्रों का वर्णन करते मुझे लज्जा आती है!

किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब मुझे पूआ दिखलाते थे॥ मेरे निकट आने पर प्रभु हँसते हैं और भाग जाने पर रोते हैं और जब मैं उनका चरण स्पर्श करने के लिए पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं॥

साधारण बच्चों जैसी लीला देखकर मुझे मोह (शंका) हुआ कि सच्चिदानंदघन प्रभु यह कौन (महत्त्व का) चरित्र (लीला) कर रहे हैं॥ हे पक्षीराज! मन में इतनी (शंका) लाते ही श्री रघुनाथजी के द्वारा प्रेरित माया मुझ पर छा गई। श्री रामजी ने मुझे जब भ्रम से चकित देखा, तब वे हँसे। इस बात को किसी ने नही जाना, न छोटे भाइयों ने और न माता-पिता ने ही। वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतल वाले बाल रूप श्री रामजी घुटने और हाथों के बल मुझे पकड़ने को दौड़े॥

श्री रामजी ने मुझे पकड़ने के लिए भुजा फैलाई। मैं जैसे-जैसे आकाश में दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्री हरि की भुजा को अपने पास देखता था॥ मैं ब्रह्मलोक तक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछे की ओर देखा, तो हे तात! श्री रामजी की भुजा में और मुझमें केवल दो ही अंगुल का बीच था॥

सातों आवरणों को भेदकर जहाँ तक मेरी गति थी वहाँ तक मैं गया। पर वहाँ भी प्रभु की भुजा को (अपने पीछे) देखकर मैं व्याकुल हो गया॥ जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूँद लीं। फिर आँखें खोलकर देखते ही अवधपुरी में पहुँच गया। मुझे देखकर श्री रामजी मुस्कुराने लगे।

उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुख में चला गया। मैंने उनके पेट में बहुत से ब्रह्माण्डों के समूह देखे। वहाँ (उन ब्रह्माण्डों में) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक से एक की बढ़कर थी॥

करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चंद्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि, असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकार के जड़ और चेतन जीव देखे॥

जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मन में भी नहीं समा सकता था (अर्थात जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। मैं एक-एक ब्रह्माण्ड में एक-एक सौ वर्ष तक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा॥

प्रत्येक लोक में भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न-भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गंधर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, सर्प, तथा नाना जाति के देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकार के थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरे ही दूसरी प्रकार की थी॥

प्रत्येक ब्रह्माण्ड में मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक भुवन में न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकार के ही नर-नारी थे॥ दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न-भिन्न रूपों के थे। मैं प्रत्येक ब्रह्माण्ड में रामावतार और उनकी अपार बाल लीलाएँ देखता फिरता॥ मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यंत विचित्र देख

मैं अनगिनत ब्रह्माण्डों में फिरा, पर प्रभु श्री रामचंद्रजी को मैंने दूसरी तरह का नहीं देखा॥ सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्री रघुवीर! इस प्रकार मोह रूपी पवन की प्रेरणा से मैं भुवन-भुवन में देखता-फिरता था॥

अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गए। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रम में आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया॥ फिर जब अपने प्रभु का अवधपुरी में जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेम से परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ॥

श्री रामचंद्रजी के पेट में मैंने बहुत से जगत्‌ देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किए जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान माया के स्वामी कृपालु भगवान्‌ श्री राम को देखा॥ मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोह रूपी कीचड़ से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ी में देखा। मन में विशेष मोह होने से मैं थक गया॥ मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्री रघुवीर हँस दिए। हे धीर बुद्धि गरुड़जी! सुनिए, उनके हँसते ही मैं मुँह से बाहर आ गया॥

श्री रामचंद्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकार से मन को समझाता था, पर वह शांति नहीं पाता था॥ यह (बाल) चरित्र देखकर और पेट के अंदर (देखी हुई) उस प्रभुता का स्मरण कर मैं शरीर की सुध भूल गया और हे आर्तजनों के रक्षक! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, पुकारता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। मुख से बात नहीं निकलती थी!

तदनन्तर प्रभु ने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी माया की प्रभुता (प्रभाव) को रोक लिया। प्रभु ने अपना करकमल मेरे सिर पर रखा। दीनदयालु ने मेरा संपूर्ण दुःख हर लिया॥

प्रभु की भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदय में बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने (आनंद से) नेत्रों में जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकार से विनती की॥

मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर श्री रामजी जी ने सुखदायक, गंभीर और कोमल वचन बोले काकभुशुण्डि! तू मुझे अत्यंत प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा संपूर्ण सुखों की खान मोक्ष,ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगत्‌ में मुनियों के लिए भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें संदेह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले॥

मैंने सोचा भगवान ने सब कुछ देने की बात कही लेकिन अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही॥ भक्ति से रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फीके) हैं जैसे नमक के बिना बहुत प्रकार के भोजन के पदार्थ। भजन से रहित सुख किस काम के। ऐसा विचार कर मैं बोला- हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझ पर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मुझे आप अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य निष्काम) भक्ति दीजिये जिसे श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई विरला ही जिसे पाता है॥

‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर भगवान राम बोले- हे काक! सुन, तू स्वभाव से ही बुद्धिमान्‌ है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता? तूने सब सुखों की खान भक्ति माँग ली, जगत्‌ में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह चतुरता मुझे बहुत ही अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपा से अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदय में बसेंगे॥ माया से उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे।

हे काक! सुन, मुझे भक्त निरंतर प्रिय हैं, ऐसा विचार कर शरीर, वचन और मन से मेरे चरणों में अटल प्रेम करना॥

हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणों के समान प्यारा है। ऐसा विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझी को भज॥ तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरंतर मेरा स्मरण और भजन करते रहना।

मुझे बहुत प्रकार से भलीभाँति समझकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकों के खेल करने लगे। नेत्रों में जल भरकर और मुख को कुछ रूखा (सा) बनाकर उन्होंने माता की ओर देखा- और मुखाकृति तथा चितवन से माता को समझा दिया कि) बहुत भूख लगी है॥

यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ीं और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्री रामजी को छाती से लगा लिया। वे गोद में लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्री रघुनाथजी (उन्हीं) की ललित लीलाएँ गाने लगीं।

संजय गुप्ता

Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

#बेलपत्र के यह अनोखे स्वास्थ्य लाभ

  1. जब कभी आपको बुखार हो जाए तो बेल की पत्तियों का काढ़ा बना लें और फिर उसे पी जाए। ऐसा करने से आपका बुखार तुरंत ठीक हो जाएगा। यही नहीं, मधुमक्खी, बर्र अथवा ततैया के काटने पर बहुत जलन होती है, यह हम सभी जानते हैं, ऐसी स्थिति में काटे गए स्थान पर बेलपत्र का रस लगाना बहुत उपयोगी साबित होगा।
  2. जान लें कि हृदय रोगियों के लिए भी बेलपत्र का प्रयोग बेहद असरदार है। बेलपत्र का काढ़ा रोजाना बनाकर पीने से आपका हृदय हमेशा मजबूत रहेगा और हार्ट अटैक का खतरा भी कम होगा। वहीं, श्वास रोगियों के लिए भी यह बेलपत्र किसी अमृत से कम नहीं है। इन पत्तियों का रस पीने से श्वास रोग में काफी लाभ होता है।

  3. शरीर में जब कभी गर्मी बहुत बढ़ जाए या मुंह में गर्मी के कारण छाले हो जाएं, तो बेल की पत्तियों को मुंह में रखकर चबाते रहे। इससे लाभ जरूर मिलेगा और छाले समाप्त हो जाएंगे।

  4. इन दिनों बवासीर नामक बीमारी बहुत ही आम हो गई है। सबसे ज्यादा तकलीफ देह होती है खूनी बवासीर। बेल की जड़ का गूदा पीसकर बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर उसका चूर्ण बनाकर, इस चूर्ण को रोज़ सुबह-शाम ठंडे पानी के साथ खा लें। अगर बवासीर का दर्द बहुत अधिक है तो दिन में तीन से चार बार लें। इससे आपकी बवासीर की समस्या तुरंत ठीक हो जाएगी।

  5. वहीं अगर किसी कारण से बेल की जड़ उपलब्ध न हो सके तो बेस्ट ऑप्शन होगा कि आप कच्चे बेलफल का गूदा, सौंफ और सौंठ मिलाकर उसका काढ़ा बना कर सेवन कर लें। यह बेहद लाभदायक है।

  6. बरसात आता नहीं कि सर्दी, जुकाम और बुखार की समस्याएं तैयार रहती हैं लोगों पर अटैक करने के लिए। अगर आप बेलपत्र के रस में शहद मिलाकर पीएंगे तो बहुत फायदा पहुंचेगा। वहीं विषम ज्वर हो जाने पर इसके पेस्ट की गोलियां बनाकर गुड़ के साथ खाई जाती हैं।

  7. अकसर छोटे-छोटे बच्चों के पेट या आंतों में कीड़े हो जाते हैं या फिर बच्चें में दस्त लगने की समस्या हो जाती है तो आप बेलपत्र का रस पिलाए, इससे काफी फायदा होगा और यह समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बहुत समय पहले की बात है वृन्दावन में एक बाबा का निवास था जो युगल स्वरुप की उपासना किया करते थे.

एक बार वे बाबा संध्या वन्दन के उपरान्त कुँजवन की राह पर जा रहे थे, मार्ग में बाबा जब एक वटवृक्ष के नीचे होकर निकले तो उनकी जटा उस वट-वृक्ष की जटाओं में उलझ गईं,
बहुत प्रयास किया सुलझाने का परन्तु जब जटा नहीं सुलझी.
तो महात्मा भी तो महात्मा हैं वे आसन जमा कर बैठ गए,कि जिसने जटा उलझाई है वो सुलझाने आएगा तो ठीक है नही तो मैं ऐसे ही बैठा रहूँगा और बैठे-बैठे ही प्राण त्याग दूँगा. तीन दिन बीत गए बाबा जी को बैठे हुए.

एक सांवला सलोना ग्वाल आया जो पाँच-सात वर्ष का था
वो बालक ब्रजभाषा में बड़े दुलार से बोला – ” बाबा! तुम्हारी तो जटा उलझ गईं, अरे मैं सुलझा दऊँ का”? और जैसे ही वो बालक जटा सुलझाने आगे बढ़ा.

बाबा ने कहा- “हाथ मत लगाना. पीछे हटो…कौन हो तुम” ?
ग्वाल – अरे !हमारो जे ही गाम है महाराज गैया चरा रह्यो तो मैंने देखि बाबा की जटा उलझ गईं है मैंने सोची ऐसो करूँ मैं जाए के सुलझा दऊँ.
बाबा – न न न दूर हट जा
ग्वाल – चौं काह भयो..?

बाबा – जिसने जटा उलझाई है वो आएगा तो ठीक नहीं तो इधर ही बस गोविन्दाय नमो नमः
ग्वाल – अरे महाराज! तो जाने उलझाई है वाको नाम बताए देयो वाहे बुला लाऊँगो.

बाबा – बोला न जिसने उलझाई है वो अपने आप आ जायेगा .तू जा नाम नहीं बताते हम.
कुछ देर तक वो बालक बाबा को समझाता रहा परन्तु जब बाबा नहीं माने तो उसी क्षण ग्वाल के भेष को छुपा कर ग्वाल में से साक्षात् मुरली बजाते हुए मुस्कुराते हुए भगवान बाँकेबिहारी प्रकट हो गए.

सांवरिया सरकार बोले – “महात्मन मैंने जटा उलझाई है
? तो लो आ गया मैं”. और जैसे
ही सांवरिया जी जटा सुलझाने आगे बढे.

बाबा ने कहा – “हाथ मत लगाना.पीछे हटो. पहले बताओ तुम कौन से कृष्ण हो ? बाबा के वचन सुनकर सांवरिया जी सोच में पड़ गए, अरे कृष्ण भी दस-पाँच होते हैं क्या ?
बाबा फिर बोले- “बताओ भी तुम कौन से कृष्ण हो.?”

सांवरिया जी – कौन से कृष्ण हो मतलब ?
बाबा – देखो कृष्ण भी कई प्रकार के होते हैं, एक होते हैं देवकीनंदन कृष्ण, एक होते हैं यशोदानंदन कृष्ण, एक होते हैं द्वारकाधीश कृष्ण, एक होते हैं नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण.

सांवरिया जी- आपको कौन सा चाहिए.?
बाबा – मैं तो नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण का परमोपासक हूँ.

सांवरिया जी- वही तो मैं हूँ. अब सुलझा दूँ. ?
और जैसे ही जटा सुलझाने सांवरिया सरकार आगे बढे तो बाबा बोल उठे – “हाथ मत लगाना, पीछे हटो .बड़े आये नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण. अरे नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण तो किशोरी जी के बिना मेरी स्वामिनी श्री राधारानी के बिना एक पल भी नहीं रहते और तुम तो अकेले सोटा से खड़े हो.”

बाबा के इतना कहते ही सांवरिया जी के कंधे पर श्रीजी का मुख दिखाई दिया, आकाश में बिजली सी चमकी और साक्षात् वृषभानु नंदिनी, वृन्दावनेश्वरी, रासेश्वरी श्री हरिदासेश्वरी स्वामिनी श्री राधिका जी अपने प्रीतम को गल-बहियाँ दिए बाबा के समक्ष प्रकट हो गईं.

और बोलीं – ” बाबा मैं अलग हूँ क्या ? अरे! मैं ही तो ये कृष्ण हूँ और ये कृष्ण ही तो राधा हैं, हम दोनों अलग थोड़े न है. हम दोनों एक हैं “.अब तो युगल स्वरुप का दर्शन पाकर बाबा आनंदविभोर हो उठे. उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी. अब जैसे ही किशोरी राधा-कृष्ण जटा सुलझाने आगे बढे.

बाबा चरणों में गिर पड़े और बोले – ” अब जटा क्या सुलझाते हो युगल जी अब तो जीवन ही सुलझा दो. मुझे नित्य लीला में प्रवेश देकर इस संसार से मुक्त करो दो”. बाबा ने ऐसी प्रार्थना करी और प्रणाम करते-करते उनका शरीर शांत हो गया. स्वामिनी जी ने उनको नित्य लीला में स्थान प्रदान किया.

ये भाव राज्य की लीला है, भगवान श्रीराधा-माधव में कोई भेद नहीं है. दोनों एक प्राण दो देह हैं.जो मनुष्य अपनी अल्पज्ञतावश मूढ़तावश या अहंकारवश किशोरी राधा-कृष्ण दोनों में भेद समझते हैं वे संसार के घोर मायाजाल में गिर जाते हैं उनका पतन होना निश्चित है, वे भक्ति के परमपद को कभी प्राप्त नहीं करते.
ऐसे दयालु है मेरे प्रियाप्रितम सरकार……
जय श्री राधेकृष्ण 🙏🌷🙏

संजय गुप्ता

Posted in संस्कृत साहित्य

आज ज्ञानेश्वरीला 725 वर्ष पुर्ण झाली…..

आता विश्वात्मके देवे”

“पसाय” म्हणजे प्रसाद हे पसायदान ज्ञानेश्वरांनी मागितलेलं आहे विश्वात्मक देवाजवळ. प्रसाद हा शब्द सुद्धा चांगला आहे. “प्रसादे सर्वदु:खानाम हानिरस्योप जायते !!” अंतःकरणाची प्रसादता, अंतःकरणाची प्रसन्नता, अंतःकरणाचा प्रल्हाद हा त्या प्रसाद शब्दाचा अर्थ. पण ज्ञानेश्वरांनी त्याचा वापरलेला जो मराठी पर्याय आहे तो अधिक आस्वाद्य आहे.”पसाय” हा प्रसाद ज्ञानेश्वरांनी कोणाजवळ मागावा…? हा प्रसाद सुद्धा ज्ञानेश्वरीचा अभंग ज्यांना अनुवादन करून ज्ञानेश्वरांनी केला ओम नमोजी आज्ञा….., त्या विश्वात्मक देवाजवळ ज्ञानेश्वरांनी पसायदान मागितलेला आहे.

इतके दिवस हा ९००० ओव्यांचा हा वाग्यज्ञ केला, याने प्रसन्न व्हावे या विश्वात्मक देवाने आणि तोषोनि मज द्यावे पसायदान हे. माझ्या झोळीमध्ये या प्रसादाची भिक्षा टाकावी, कोणता प्रसाद मागतायत ज्ञानेश्वर…???

काय गम्मत आहे ज्ञानेश्वरांनी संपूर्ण समाजाला भक्तीचा वळण लावलं. संपूर्ण समाजाच्या सत्प्रवृत्तीच पोषण केलं आणि देवाच्या नादी लावलेत लोकांना, अशी जी सज्जन माणस त्यांची आठवण पसायदान मागताना ज्ञानेश्वरांना झाली नाही. झाली ती ज्या प्रवृत्तीने ज्ञानेश्वरांचा छळ केला त्या दृष्ट लोकांची आठवण पहिल्यांदा झाली, त्या खल पुरुषांची आठवण पहिल्यांदा झाली, हा सज्जन सत्पुरुषांवर अन्याय नाही का? ज्ञानेश्वरांनी शेवटचं “पसायदान” विश्वात्मक देवाजवळ मागताना झुकतं माप पहिल्यांदा त्या खल-पुरुषांना द्यावं? हा अन्याय नाही, हाहाहा हा अन्याय नाही मित्रांनो कारण ज्ञानेश्वरांना आपण माउली म्हणतो , त्याच हे प्रत्युत्तर आहे , याच कारण “माउली” आपल्या चांगल्या अपत्यावर प्रेम करतेच पण वाईट अपत्याबद्दल अधिक कळवळा बाळगते. कारण तिला हि खात्री असते कि आपला जो चांगला मुलगा आहे त्याचा चांगल्यापणामुळे जग त्याला जवळ केल्याशिवाय राहणार नाही पण हा जो पांगला आहे त्याला जग दूर लोटेल त्याला प्रेमाने जवळ घेणारं एकच स्थळ आहे ते म्हणजे “मातृदृदय”….

ज्ञानेश्वरांना आपण माउली म्हणतो, या मताने पहिला कळवळा हा खल-पुरुषांचा आहे. “जे खळांची व्यंकटी सांडो” त्यांची पहिली प्रार्थना अशी आहे. कि खळांची व्यंकटी म्हणजे मनाचा वाकडेपणा, मनाचा दुष्टपणा सांडो म्हणजे तो नष्ट होवो. ज्ञानेश्वरांनी खल नष्ट होवो अस म्हटलेलं नाही, खळांची व्यंकटी नष्ट होवो एवढंच म्हटल आहे. खल राहिले तरी चालतील , त्याचं खलत्व गळून खाली पडल कि त्यानंतर उरलेला जो मनुष्य आहे तो ज्ञानेश्वरांना स्वीकार्य आहे. याच कारण नंतर त्या माणसाची देवत्वाकडे होणारी वाटचाल आपल्याला सुकर करता येते. ज्ञानेश्वरांचा माणसाच्या मुलभूत माणूसपणावर अत्यंत प्रगाढ आशा रीतीचा विश्वास आहे, म्हणून ते म्हणतात कि “खळांची व्यंकटी सांडो” खुद्ध गीता ज्याने सांगितली आहे तो गीतेचा प्रवक्ता भगवान श्री कृष्ण आपल्या अवताराचं प्रयोजन सांगताना अस म्हणतो “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम् । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्-कृताम्, धर्म-संस्थापन-अर्थाय सम्भवामि युगे …”

ज्या ज्या वेळी धर्माला ग्लानी होते तेव्हा धर्माचा अभि-उत्थानम् घडवून आणण्याकरता मी जन्म घेईन आणि काय करीन? “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्-कृताम्” साधूंचा मी परित्रण करीन आणि दुष्टांचा विनाश घडवून आणीन. प्रत्यक्ष श्री कृष्ण दृष्टांच्या विनाशाची भाषा बोलतो. आणि त्याचा भक्त ज्ञानेश्वर फक्त दुष्टपणा नष्ट होण्याची भाषा करतात. कारण ज्ञानेश्वरांना माहित आहे कि दुष्टांना नष्ट करून जगातून दुष्ट प्रवृत्ती कधीही नष्ट झालेली नाही. त्यामुळे दुष्टप्रवृत्ती नष्ट होण्याची प्रार्थना ज्ञानेश्वर करताहेत. दुष्ट राहिला तरी चालेल. “जे खळांची व्यंकटी सांडो” कशी सांडेल..?? त्याचीही रीत ज्ञानेश्वरांनी दुसऱ्या ओळीत दिली आहे.

त्यांना चांगल्या गोष्टीमध्ये , चांगल्या कर्मांमध्ये रती म्हणजे आवड वाढो. ज्ञानेश्वरांनी रती रुजो असं म्हटलं नाही, रती वाढो म्हटलं आहे, याचा अर्थ कितीही दुष्ट असला तरीही त्याला सत्कार्मामध्ये रती असतेच ते या महात्म्याने गृहीत धरलेले आहे. फक्त असलेली रती वाढो. चांगल्या गोष्टी बद्दल ची आवड वाढली कि वाईट गोष्टीकडचा कल ओढा आपोआप कमी होईल. असं त्याचा सिद्धांत आहे. आणि मग

भूता म्हणजे भूतलावरील प्राणीमात्र.एकदा का दुष्टपणा नाहीसा झाला आणि दुष्टांना सुद्धा चांगल्या कामामध्ये रममाण करून सोडलं कि मग आपोआप जगातले सर्व जीव परस्परांवर प्रेम करायला लागतील. जगातल्या जीवमात्रांच परस्परामधलं सख्य वाढावं ते स्वप्न ज्ञानेश्वर पाहतायत. केवळ मनुष्यमात्रांच नाही, ज्या कळत कळत ज्ञानेश्वरांचा हा पसायदानाचा हा उद्गार आपण उच्चारतोत त्या काळात सुद्धा माणसाचाच माणसावर विश्वास उरलेला नाही. माणसाला माणसाबद्दल संशय आहे. माणसाला माणसाबद्दल अविश्वास आहे. माणसाला माणसाबद्दल दुरावा आहे. माणसाला माणसाबद्दल अकारण शत्रुत्व आहे. अशा काळात ज्ञानेश्वर संपूर्ण जीवमात्रामधलं मैत्र्या वाढीला लावण्याचे भव्य स्वप्न आपल्याजवळ बाळगतात.

दुरित म्हणजे पाप याचा अंधार नाहीसा होवो. पापाला त्यांनी अंधार म्हटल आहे.याचा अर्थ पुण्ण्याला उजेड म्हणायला पाहिजे . अंधार नाहीसा कसा होईल? सूर्योदय झाल्याबरोबर अंधार आपोआप नाहीसा होतो. अंधार नाहीसा करण्याच्या वेगवेगळ्या प्रक्रिया नाहीत. अंधार नाहीसा करण्याचा वेगळा कार्यक्रम नाही. सूर्य प्रगत झाला कि अंधार आपोआप नाहीसा होतो. “दुरितांचे तिमिर जावो” जगताल पाप नाहीसा होवो. जगातलं दुराचरण नाहीसं व्हाव, त्यासाठी काय करायला पाहिजे…?? विश्वस्वधर्म सूर्ये पाहो. कोणता सूर्योदय ज्ञानेश्वरांना अभिप्रेत आहे…?? स्वधर्माचा (मित्रांनो इथे हिंदू, मुस्लीम, असं धर्म नाही आहे, याठिकाणी धर्म याचा अर्थ वेगळा आहे ) सूर्योदय प्रत्येकाला आपापल्या धर्माचं भान आलं कि तो स्वतःच कर्तव्य बजावत राहील, आपोआप पापचरणाकडचा त्याचा कल कमी होत जाईल. पापकर्म हे माणसाच स्वाभाविक कर्म नाही आहे. हे नियतकर्म नाही. ज्ञानेश्वरांनी म्हटलंय “विश्वस्वधर्म सूर्ये पाहो ” स्वधर्माचं ज्ञान आणि स्वधर्माच आचरण हाच सूर्योदय , या सुर्योदयामुळे आपोआप पापाचा अंधार नाहीसं झाल्याशिवाय राहत नाही. आपला धर्म ओळखण आणि धर्माचं पालन करन हे ज्ञानेश्वरांना अभिप्रेत आहे.आपला जो धर्म नाही त्याचं पालन करण्याचा मोह होणं हा परधर्म आहे, आणि गीतेने म्हटल होतं, ।। स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मो भयावहः।। धर्म कसा ओळखायचा ? प्रत्येकाचा धर्म त्याच्या जन्मापासूनच त्याची सोबत करत असतो, बाई हि बाईचं असते परंतु जेव्हा ती आई होते त्यावेळी तीच्यामधला मातृधर्म जागृत होतो. त्याचं आचरण हे तिच्याकडून अभिप्रेत असतं, ते सोडून इतर कुठलाही मोह तिला झाला तर त्याला पापाचरण म्हणता येईल. आम्हाला जगातील दुरितांचा अंधार नाहीसं करायचा आहे. आणि स्वधर्माकडची प्रवृत्ती आपल्याला वाढवायची आहे…..!!