Posted in रामायण - Ramayan

जय श्री राम ।।🌺💥🌺
जय जय जय वीर हनुमान ।।🌺💥🌺💥

🌹”हनुमान जी के पांच मुख के पीछे क्या राज है”🌹
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🍁आपने कई जगह हनुमान जी के पंचमुखी रूप के दर्शन किए होंगे लेकिन क्या आप जानते हैं उनके इन 5 मुख के पीछे क्या राज है। जब राम और रावण की सेना के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था और रावण अपने पराजय के समीप था तब इस समस्या से उबरने के लिए उसने अपने मायावी भाई अहिरावन को याद किया जो मां भवानी का परम भक्त होने के साथ साथ तंत्र मंत्र का बड़ा ज्ञाता था। उसने अपने माया के दम पर भगवान राम की सारी सेना को निद्रा में डाल दिया तथा राम एव लक्ष्मण का अपरहण कर उन्हें पाताल लोक ले गया।
कुछ घंटे बाद जब माया का प्रभाव कम हुआ तब विभिषण ने यह पहचान लिया कि यह कार्य अहिरावन का है और उसने हनुमानजी को श्री राम और लक्ष्मण की सहायता करने के लिए पाताल लोक जाने को कहा। पाताल लोक के द्वार पर उन्हें उनका पुत्र मकरध्वज मिला और युद्ध में उसे हराने के बाद बंधक श्री राम और लक्ष्मण से मिले।

वहां पांच दीपक उन्हें पांच जगह पर पांच दिशाओं में मिले जिसे अहिरावण ने मां भवानी के लिए जलाए थे। इन पांचों दीपक को एक साथ बुझाने पर अहिरावन का वध हो जाएगा इसी कारण हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा।

उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इस रूप को धरकर उन्होंने वे पांचों दीप बुझाए तथा अहिरावण का वध कर राम, लक्ष्मण को उस से मुक्त किया।

इसी प्रसंग में हमें एक दूसरी कथा भी मिलती है कि जब मरियल नाम का दानव भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र चुराता है और यह बात जब हनुमान को पता लगती है तो वह संकल्प लेते हैं कि वे चक्र पुनः प्राप्त कर भगवान विष्णु को सौप देंगे।
मरियल दानव इच्छानुसार रूप बदलने में माहिर था अत: विष्णु भगवान ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया, साथ ही इच्छानुसार वायुगमन की शक्ति के साथ गरुड़-मुख, भय उत्पन्न करने वाला नरसिंह-मुख, हयग्रीव मुख ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा वराह मुख सुख व समृद्धि के लिए था।

पार्वती जी ने उन्हें कमल पुष्प एवं यम-धर्मराज ने उन्हें पाश नामक अस्त्र प्रदान किया। आशीर्वाद एवं इन सबकी शक्तियों के साथ हनुमान जी मरियल पर विजय प्राप्त करने में सफल रहे। तभी से उनके इस पंचमुखी स्वरूप को भी मान्यता प्राप्त हुई।

Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

🔷 उच्च रक्तचाप (High BP)

जिन मरीजों को रोज BP की दवा खानी पड़ती है उनके लिए एक अचूक हथियार है।

200 ग्राम बड़ी इलायची ले कर तवे पर भूने, इतना भूनना है कि इलायची जल कर राख हो जाये, इस राख को पीस कर किसी डिब्बी में भर लें, सुबह खाली पेट और शाम को भोजन से 1 घंटा पहले 5 ग्राम राख को 2 चम्मच शहद में मिला कर खा लें

नियमित 15-20 दिन इस उपचार को करने के बाद आपको BP की किसी दवा को खाने की ज़रूरत नही पड़ेगी।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

★आओ कुछ अच्छी बातें करें★

“* अमर शहीद ऊधम सिंह – जलियांवाला बाग – बैसाखी *”

दोस्तों, भारत के इतिहास में कुछ तारीख कभी नहीं भूली जा सकती हैं। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पर्व कर पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर द्वारा किए गए निहत्थे मासूमों के हत्याकांड से ब्रिटिश औपनिवेशिक राज की बर्बरता का ही परिचय मिलता हैं। ऊधम सिंह जी 13 अप्रैल 1919 को, उस जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के दिल दहला देने वाले, बैसाखी के दिन में वहीँ मजूद थे। ये ह्रदयविदारक घटना ऊधम सिंह जी के दिल मे घर कर गई। वह जलियावाला बाग हत्या कांड का बदला लेने का मौका ढूंढ रहे थे। यह मौका बहुत दिन बाद, लगभग 21 वर्षों के बाद, 13 मार्च 1940 को आया। उस दिन काक्सटन हॉल, लन्दन Caxton Hall, London में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन East India Association और रॉयल सेंट्रल एशियाई सोसाइटी Royal Central Asian Society का मीटिंग था। लगभग शाम 4.30 बजे उधम सिंह ने पिस्तौल से 5-6 गोलियां सर माइकल ओ द्व्येर Sir Michael O’Dwyer पर फायर किया और वहीँ उसकी मौत हो गयी। इस पर 31 जुलाई 1940 को इस महान देशभक्त ऊधम सिंह जी को लन्दन के Pentonville जेल में फांसी पर लटका दिया गया।

आज बैसाखी वाले दिन पर ★आओ कुछ अच्छी बातें करें★ के तहत मैं और हम सब, फिर से जलियांवाला बाग कांड, उसमें मरने वाले सभी मासूम शहीदों और अमर शहीद ऊधम सिंह जी की शहादत को याद करते हैं, इस प्राथना के साथ कि कृपया इसे दूसरों के लिए, खासतौर से हमारी नौजवान पीढ़ी के लिए, आगे ज़रूर शेयर करे ……..
…….. विजेता मलिक

👉🏼 “* अमर शहीद ऊधम सिंह – जलियांवाला बाग – बैसाखी *”

जलियांवाला बाग हत्याकांड :
जरा याद करो कुर्बानी ………

भारत के इतिहास में कुछ तारीख कभी नहीं भूली जा सकती हैं। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पर्व कर पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर द्वारा किए गए निहत्थे मासूमों के हत्याकांड से केवल ब्रिटिश औपनिवेशिक राज की बर्बरता का ही परिचय नहीं मिलता, बल्कि इसने भारत के इतिहास की धारा को ही बदल दिया।

आजादी के आंदोलन की सफलता और बढ़ता जन आक्रोश देख ब्रिटिश राज ने दमन का रास्ता अपनाया। वैसे भी 6 अप्रैल की हड़ताल की सफलता से पंजाब का प्रशासन बौखला गया। पंजाब के दो बड़े नेताओं, सत्यापाल और डॉ. किचलू को गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया गया, जिससे अमृतसर में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था।

जैसे ही पंजाब प्रशासन को यह खबर मिली कि 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन आंदोलनकारी जलियांवाला बाग में जमा हो रहे हैं, तो प्रशासन ने उन्हें सबक सिखाने की ठान ली। एक दिन पहले ही मार्शल लॉ की घोषणा हो चुकी थी।

पंजाब के प्रशासक ने अतिरिक्त सैनिक टुकड़ी बुलवा ली थी। ब्रिगेडियर जनरल डायर के कमान में यह टुकड़ी 11 अप्रैल की रात को अमृतसर पहुंची और अगले दिन शहर में फ्लैग मार्च भी निकाला गया।

आन्दोलनकारियों के पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बैसाखी के दिन 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। हालांकि शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो आस-पास के इलाकों से बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे।

सभा के शुरू होने तक वहां 10-15 हजार लोग जमा हो गए थे। तभी इस बाग के एकमात्र रास्ते से डायर ने अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वहां पोजिशन ली और बिना किसी चेतावनी गोलीबारी शुरू कर दी।

जलियांवाला बाग में जमा लोगों की भीड़ पर कुल 1,650 राउंड गोलियां चलीं जिसमें सैंकड़ो अहिंसक सत्याग्रही शहीद हो गए, और हजारों घायल हुए। घबराहट में कई लोग बाग में बने कुंए में कूद पड़े।

कुछ ही देर में जलियांवाला बाग में बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों की लाशों का ढेर लग गया था। अनाधिकृत आंकड़े के अनुसार यहा 1000 से भी ज्यादा लोग मारे गए थे। इस बर्बरता ने भारत में ब्रिटिश राज की नींव हिला दी।

मुख्यालय वापस पहुंच कर डायर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया कि उस पर भारतीयों की एक फ़ौज ने हमला किया था जिससे बचने के लिए उसको गोलियां चलानी पड़ी। ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर मायकल ओ डायर ने उसके निर्णय को अनुमोदित कर दिया। इसके बाद गवर्नर मायकल ओ डायर ने अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में मार्शल लॉ लगा दिया।

इस हत्याकाण्ड की विश्वव्यापी निंदा हुई जिसके दबाव में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉंटेग्यु ने 1919 के अंत में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया। कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चलाने का निर्णय पहले से ही ले चुका था और वह उन लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो कि उस संकरे रास्ते से नहीं जा पाई थीं।

हंटर कमीशन की रिपोर्ट आने पर 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत कर कर्नल बना दिया गया और उसे भारत में पोस्ट न देने का निर्णय लिया गया। भारत में डायर के खिलाफ बढ़ते गुस्से के चलते उसे स्वास्थ्य कारणों के आधार पर ब्रिटेन वापस भेज दिया गया।

ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स ने डायर का निंदा प्रस्ताव पारित किया परंतु हाउस ऑफ लॉर्ड ने इस हत्याकांड की प्रशंसा करते हुए उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया। विश्वव्यापी निंदा के दबाव में बाद को ब्रिटिश सरकार को उसका निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफा देना पड़ा।

शहीद उधम सिंह जी
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शहीद उधम सिंह Udham Singh एक राष्ट्रवादी भारतीय क्रन्तिकारी थे जिनका जन्म शेर सिंह के नाम से 26 दिसम्बर 1899 को सुनम, पटियाला, में हुआ था। उनके पिता का नाम टहल सिंह था और वे पास के एक गाँव उपल्ल रेलवे क्रासिंग के चौकीदार थे। सात वर्ष की आयु में उन्होंने अपने माता पिता को खो दिया जिसके कारण उन्होंने अपना बाद का जीवन अपने बड़े भाई मुक्ता सिंह के साथ 24 अक्टूबर 1907 से केंद्रीय खालसा अनाथालय Central Khalsa Orphanage में जीवन व्यतीत किया।

दोनों भाईयों को सिख समुदाय के संस्कार मिले अनाथालय में जिसके कारण उनके नए नाम रखे गए। शेर सिंह का नाम रखा गया उधम सिंह और मुक्त सिंह का नाम रखा गया साधू सिंह। साल 1917 में उधम सिंह के बड़े भाई का देहांत हो गया और वे अकेले पड़ गए।

उधम सिंह के क्रन्तिकारी जीवन की शुरुवात
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उधम सिंह ने अनाथालय 1918 को अपनी मेट्रिक की पढाई के बाद छोड़ दिया। वो 13 अप्रैल 1919 को, उस जलिवाला बाग़ हत्याकांड के दिल दहका देने वाले बैसाखी के दिन में वहीँ मजूद थे। उसी समय General Reginald Edward Harry Dyer ने बाग़ के एक दरवाज़ा को छोड़ कर सभी दरवाजों को बंद करवा दिया और निहत्थे, साधारण व्यक्तियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दी। इस घटना में हजारों लोगों की मौत हो गयी। कई लोगों के शव तो कुए के अन्दर से मिले।

उधम सिंह को जेल
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इस घटना के घुस्से और दुःख की आग के कारण उधम सिंह ने बदला लेने का सोचा। जल्दी ही उन्होंने भारत छोड़ा और वे अमरीका गए। उन्होंने 1920 के शुरुवात में Babbar Akali Movement के बारे में जाना और वे वापस भारत लौट आये। वो छुपा कर एक पिस्तौल ले कर आये थे जिसके कारण पकडे जाने पर अमृतसर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इसके कारण उन्हें 4 साल की जेल हुई बिना लाइसेंस पिस्तौल रखने के कारण।

जेल से छुटने के बाद इसके बाद वे अपने स्थाई निवास सुनाम Sunam में रहने के लिए आये पर वहां के व्रिटिश पुलिस वालों ने उन्हें परेशां किया जिसके कारण वे अमृतसर चले गए। अमृतसर में उधम सिंह ने एक दुकान खोला जिसमें एक पेंटर का बोर्ड लगाया और राम मुहम्मद सिंह आजाद के नाम से रहने लगे। Ram Mohammad Singh Azad, उधम सिंह ने यह नाम कुछ इस तरीके से चुना था की इसमें सभी धर्मों के नाम मौजूद थे।

उधम सिंह शहीद भगत सिंह के विचारों से प्रेरित

उधम सिंह भगत सिंह के कार्यों और उनके क्रन्तिकारी समूह से बहुत ही प्रभावित हुए थे। 1935 जब वे कश्मीर गए थे, उन्हें भगत सिंह के तस्वीर के साथ पकड़ा गया था। उन्हें बिना किसी अपराध के भगत सिंह का सहयोगी मान लिया गया और भगत सिंह को उनका गुरु। उधम सिंह को देश भक्ति गीत गाना बहुत ही अच्छा लगता था और वे राम प्रसाद बिस्मिल के गीतों के बहुत शौक़ीन थे जो क्रांतिकारियों के एक महान कवी थे।

कश्मीर में कुछ महीने रहने के बाद, उधम सिंह ने भारत छोड़ा। 30 के दशक में वे इंग्लैंड गए। उधम सिंह जलियावाला बाग हत्या कांड का बदला लेने का मौका ढूंढ रहे थे। यह मौका बहुत दिन बाद 13 मार्च 1940 को आया।

लन्दन में उधम सिंह ने लिया जलिवाला हत्याकांड का बदला

उस दिन काक्सटन हॉल, लन्दन Caxton Hall, London में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन East India Association और रॉयल सेंट्रल एशियाई सोसाइटी Royal Central Asian Society का मीटिंग था। लगभग शाम 4.30 बजे उधम सिंह ने पिस्तौल से 5-6 गोलियां सर माइकल ओ द्व्येर Sir Michael O’Dwyer पर फायर किया और वहीँ उसकी मौत हो गयी।

इस गोलीबारी के समय भारत के राज्य सचिव को भी Secretary of State for India चोट लग गयी जो इस सभा के प्रेसिडेंट President थे। सबसे बड़ी बात तो यह थी की उधम सिंह को यह करने का कोई भी डर नहीं था। वे वहां से भागे भी नहीं बस उनके मुख से यह बात निकली की – मैंने अपने देश का कर्तव्य पूरा कर दिया।

शहीद उधम सिंह की मृत्यु
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1 अप्रैल, 1940, को उधम सिंह को जर्नल डायर Sir Michael O’Dwyer को हत्यारा माना गया। 4 जून 1940 को पूछताच के लिए सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट, पुराणी बरेली Central Criminal Court, Old Bailey में रखा गया था अलाकी उन्हें जस्टिस एटकिंसन Justice Atkinson के फांसी की सजा सुना दी थी। 15 जुलाई 1940 में एक अपील दायर की गयी थी उन्हें फांसी से बचाने के लिए परन्तु उसको खारीज कर दिया गया। 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को लन्दन के Pentonville जेल में फांसी लगा दिया गया।

उनकी एक आखरी इच्छा थी की उनके अस्थियों को उनके देश भेज दिया जाये पर यह नहीं किया गया। 1975 में भारत सरकार, पंजाब सरकार के साथ मिलकर उधम सिंह के अस्थियों को लाने में सफल हुई। उनको श्रद्धांजलि देने के लिए लाखों लोग जमा हुए थे।

★ कर लो झुक कर नमन, जिन पर ये मुकाम आया है,
खुश नसीब है वो ज़िनका खुन, ‘देश’ के काम आया है ।

🚩” जलियांवाला बाग नरसंहार की पीड़ा आज भी हम सब हिंदुस्तानियों के दिलों में जिंदा है। मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले जलियांवाला बाग के उन सभीअमर शहीदों की शहादत व अमर शहीद ऊधम सिंह जी की शहादत को शत-शत विनम्र नमन करू मैं। ” 🚩

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………… विजेता मलिक 😢

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धन्यवाद दोस्तों।

https://vijetamalikbjp.blogspot.in/2018/04/blog-post_61.html?m=1

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक सुनार से लक्ष्मी जी रूठ गई ।
Happy weekend
…Good evening
….Radhe Radhe

जाते वक्त बोली मैं जा रही हूँ

और मेरी जगह नुकसान आ रहा है ।

तैयार हो जाओ।

लेकिन मै तुम्हे अंतिम भेट जरूर देना चाहती हूँ।
मांगो जो भी इच्छा हो।

सुनार बहुत समझदार था।
उसने 🙏 विनती की नुकसान आए तो आने दो ।

लेकिन उससे कहना की मेरे परिवार में आपसी प्रेम बना रहे।
बस मेरी यही इच्छा है।

लक्ष्मी जी ने तथास्तु कहा।

कुछ दिन के बाद :-

सुनार की सबसे छोटी बहू खिचड़ी बना रही थी।

उसने नमक आदि डाला और अन्य काम करने लगी।

तब दूसरे लड़के की बहू आई और उसने भी बिना चखे नमक डाला और चली गई।

इसी प्रकार तीसरी, चौथी बहुएं आई और नमक डालकर चली गई ।

उनकी सास ने भी ऐसा किया।

शाम को सबसे पहले सुनार आया।

पहला निवाला मुह में लिया।
देखा बहुत ज्यादा नमक है।

लेकिन वह समझ गया नुकसान (हानि) आ चुका है।

चुपचाप खिचड़ी खाई और चला गया।

इसके बाद बङे बेटे का नम्बर आया।

पहला निवाला मुह में लिया।
पूछा पिता जी ने खाना खा लिया क्या कहा उन्होंने ?

सभी ने उत्तर दिया-” हाँ खा लिया, कुछ नही बोले।”

अब लड़के ने सोचा जब पिता जी ही कुछ नही बोले तो मै भी चुपचाप खा लेता हूँ।

इस प्रकार घर के अन्य सदस्य एक एक आए।

पहले वालो के बारे में पूछते और चुपचाप खाना खा कर चले गए।

रात को नुकसान (हानि) हाथ जोड़कर

सुनार से कहने लगा -,”मै जा रहा हूँ।”

सुनार ने पूछा क्यों ?

तब नुकसान (हानि ) कहता है, ” आप लोग एक किलो तो नमक खा गए ।

लेकिन बिलकुल भी झगड़ा नही हुआ। मेरा यहाँ कोई काम नहीं।”

निचोङ

⭐झगड़ा कमजोरी, हानि, नुकसान की पहचान है।

👏जहाँ प्रेम है, वहाँ लक्ष्मी का वास है।

🔃सदा प्यार प्रेम बांटते रहे। छोटे -बङे की कदर करे ।

जो बङे हैं, वो बङे ही रहेंगे ।

चाहे आपकी कमाई उसकी कमाई से बङी हो। 🙏🙏🙏🙏

अच्छा लगे तो आप जरुर किसी अपने को भेजें।

☘☘☘ Զเधे Զเधे – ☘☘☘

         अच्छे के साथ अच्छे बनें,
         पर  बुरे के  साथ बुरे नहीं।

                 ....क्योंकि -
                       🔰
         हीरे से हीरा तो तराशा जा
         सकता है लेकिन कीचड़ से
         कीचड़  साफ  नहीं किया
         जा सकता ।

☘☘☘ ☘☘☘

Posted in रामायण - Ramayan

अयोध्या एवं राम जन्मभूमि का इतिहास ,,,,

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जन्म भूमि का इतिहास लाखो वर्ष पुराना है । इस प्रस्तुति में विभिन्न पुस्तकों से मिले कुछ तथ्यों को संकलित करने का प्रयास कर रहा हूँ, जिससे रामजन्मभूमि और इतिहास के बारे में वास्तविक जानकारी का संग्रहण,विवेचना और ज्ञान हो सके।

ये सारे तथ्य विभिन्न पुस्तकों में उपलब्ध हैं, मगर सरकारी मशीनरी और तुस्टीकरण के पुजारी उन्हें सामान्य जनमानस तक नहीं आने देते मैंने सिर्फ उन तथ्यों का संकलन करके आप के सामने प्रस्तुत किया है॥ इसमे प्रमुखता से स्वर्गीय पंडित रंगोपाल पांडे “शारद” द्वारा लिखे गए तथ्यों को आप के सामने आने वाली सभी कड़ियों मे रखने का प्रयास करूंगा।

श्री रामजन्मभूमि का ईसापूर्व इतिहास.. त्रेता युग के चतुर्थ चरण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी अयोध्या की इस पावन भूमि पर अवतरित हुए थे। श्री राम चन्द्र जी के जन्म के समय यह स्थान बहुत ही विराट,सुवर्ण एवं सभी प्रकार की सुख सुविधाओ से संपन्न एक राजमहल के रूप में था। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण मे जन्मभूमि की शोभा एवं महत्ता की तुलना दूसरे इंद्रलोक से की है ॥धन धान्य रत्नो से भरी हुई अयोध्या नगरी की अतुलनीय छटा एवं गगनचुम्बी इमारतो के अयोध्या नगरी में होने का वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में मिलता है।

भगवान के श्री राम के स्वर्ग गमन के पश्चात अयोध्या तो पहले जैसी नहीं रही मगर जन्मभूमि सुरक्षित रही। भगवान श्री राम के पुत्र कुश ने एक बार पुनः राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया और सूर्यवंश की अगली 44 पीढ़ियों तक इसकी अस्तित्व आखिरी राजा महाराजा वृहद्व्ल तक अपने चरम पर रहा॥ कौशालराज वृहद्वल की मृत्यु महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के हाथो हुई । महाभारत के युद्ध के बाद अयोध्या उजड़ सी गयी मगर श्री रामजन्मभूमि का अस्तित्व प्रभुकृपा से बना रहा।

महाराजा विक्रमादित्य द्वारा पुनर्निर्माण: ईसा के लगभग १०० वर्ष पूर्व उज्जैन के राजा विक्रमादित्य आखेट करते करते अयोध्या चले आये। थकान होने के कारण अयोध्या में सरयू नदी के किनारे एक आम के बृक्ष के नीचे वो आराम करने लगे। उसी समय दैवीय प्रेरणा से तीर्थराज प्रयाग से उनकी मुलाकात हुई और तीर्थराज प्रयाग ने सम्राट विक्रमादित्य को अयोध्या और सरयू की महत्ता के बारे में बताया और उस समय तक नष्ट सी हो गयी श्री राम जन्मभूमि के उद्धार के लिए कहा।

महाराजा विक्रमादित्य ने कहा की महाराज अयोध्या तो उजड़ गयी है,मिटटी के टीले और स्तूप ही यहाँ अवशेषों के रूप में हैं, फिर मुझे ज्ञान कैसे होगा की अयोध्या नगरी कहा से शुरू होती है,क्षेत्रफल कितना होगा और किस स्थान पर कौन सा तीर्थ है ॥

इस संशय का निवारण करते हुए तीर्थराज प्रयाग ने कहा की यहाँ से आधे योजन की दूरी पर मणिपर्वत है,उसके ठीक दक्षिण चौथाई योजन के अर्धभाग में गवाक्ष कुण्ड है उस गवाक्ष कुण्ड से पश्चिम तट से सटा हुआ एक रामनामी बृक्ष है,यह वृक्ष अयोध्या की परिधि नापने के लिए ब्रम्हा जी ने लगाया था।

सैकड़ो वर्षों से यह वृक्ष उपस्थित है वहा। उसी वृक्ष के पश्चिम ठीक एक मिल की दूरी पर एक मणिपर्वत है। मणिपर्वत के पश्चिम सटा हुआ गणेशकुण्ड नाम का एक सरोवर है,उसके ऊपर शेष भगवान का एक मंदिर बना हुआ है (ज्ञातव्य है की अब इस स्थान पर अयोध्या में शीश पैगम्बर नाम की एक मस्जिद है जिसे सन १६७५ में औरंगजेब ने शेष भगवान के मंदिर को गिरा कर बनवाया था ). शेष भगवान के मंदिर से ५०० धनुष पर ठीक वायव्य कोण पर भगवान श्री राम की जन्मभूमि है।

रामनामी वृक्ष(यह वृक्ष अब सूखकर गिर चुका है) के एक मील के इर्द गिर्द एक नवप्रसूता गाय को ले कर घुमाओ जिस जगह वह गाय गोबर कर दे,वह स्थल मणिपर्वत है फिर वहा से ५०० धनुष नापकर उसी ओर गाय को ले जा के घुमाओ जहाँ उसके स्तनों से दूध की धारा गिरने लगे बस समझ लेना भगवान की जन्मभूमि वही है।

रामजन्मभूमि को सन्दर्भ मान के पुरानो में वर्णित क्रम के अनुसार तुम्हे समस्त तीर्थो का पता लग जायेगा,ऐसा करने से तुम श्री राम की कृपा के अधिकारी बनोगे यह कहकर तीर्थराज प्रयाग अदृश्य हो गए॥

रामनवमी के दिन पूर्ववर्णित क्रम में सम्राट विक्रमादित्य ने सर्वत्र नवप्रसूता गाय को घुमाया जन्म भूमि पर उसके स्तनों से अपने आप दूध गिरने लगा उस स्थान पर महाराजा विक्रमादित्य ने श्री राम जन्मभूमि के भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया॥

ईसा की ग्यारहवी शताब्दी में कन्नोज नरेश जयचंद आया तो उसने मंदिर पर सम्राट विक्रमादित्य के प्रशस्ति को उखाड़कर अपना नाम लिखवा दिया।

पानीपत के युद्ध के बाद जयचंद का भी अंत हो गया फिर भारतवर्ष पर लुटेरे मुसलमानों का आक्रमण शुरू हो गया। मुसलमान आक्रमणकारियों ने जी भर के जन्मभूमि को लूटा और पुजारियों की हत्या भी कर दी,मगर मंदिर से मुर्तिया हटाने और मंदिर को तोड़ने में वे सफल न हो सके॥ विभिन्न आक्रमणों के बाद भी सभी झंझावतो को झेलते हुए श्री राम की जन्मभूमि अयोध्या १४वीं शताब्दी तक बची रही॥

चौदहवी शताब्दी में हिन्दुस्थान पर मुगलों का अधिकार हो गया और उसके बाद ही रामजन्मभूमि एवं अयोध्या को पूर्णरूपेण इस्लामिक साँचे मे ढालने एवं सनातन धर्म के प्रतीक स्तंभो को जबरिया इस्लामिक ढांचे मे बदलने के कुत्सित प्रयास शुरू हो गए॥

बाबर के आक्रमण के बाद अयोध्या में मस्जिद निर्माण कैसे हुआ,इस्लामिक आतताइयों ने कैसे अयोध्या का स्वरूप बदलने की कोशिश की और उसके बाद कई सौ सालो तक जन्मभूमि को मुक्त करने के लिए हिन्दुओं द्वारा किये गए युद्धों एवं बलिदानों एवं उन वीरों का वर्णन अगली पोस्ट में॥

सन्दर्भ:प्राचीन भारत, लखनऊ गजेटियर, लाट राजस्थान,रामजन्मभूमि का इतिहास(आर जी पाण्डेय),अयोध्या का इतिहास(लालासीताराम),बाबरनामा

संजय गुप्ता

Posted in जीवन चरित्र

मित्रो आज महान गणितज्ञ आर्यभट्ट की जयंती है,भारत के प्रथम उपग्रह आर्यभट्ट जिन महान गणितज्ञ के नाम पर रखा गया था उनको अब भारतवासी याद नहीं रखना चाहते हैं तभी तो उनकी जयंती पर आज कोई सूचना या उल्लास नहीं है,

आर्यभट्ट प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री रहे हैं। उनका जन्म 476 ईस्वी में बिहार में हुआ था। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय से पढाई की। उनके मुख्य कार्यो में से एक “आर्यभटीय” 499 ईस्वी में लिखा गया था।

इसमें बहुत सारे विषयो जैसे खगोल विज्ञान, गोलीय त्रिकोणमिति, अंकगणित, बीजगणित और सरल त्रिकोणमिति का वर्णन है। उन्होंने गणित और खगोलविज्ञान के अपने सारे अविष्कारों को श्लोको के रूप में लिखा। इस किताब का अनुवाद लैटिन में 13वीं शताब्दी में किया गया। आर्यभटीय के लैटिन संस्करण की सहायता से यूरोपीय गणितज्ञों ने त्रिभुजो का क्षेत्रफल, गोलीय आयतन की गणना के साथ साथ कैसे वर्गमूल और घनमूल की गणना की जाती है, ये सब सीखा।

खगोल विज्ञानं के क्षेत्र में, सर्वप्रथम आर्यभट ने ही अनुमान लगाया था कि पृथ्वी गोलाकार है और ये अपनी ही अक्ष पर घूमती है जिसके फलस्वरूप दिन और रात होते हैं। उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला था कि चन्द्रमा काला है और वो सूर्य की रोशनी वजह से चमकता है। उन्होंने सूर्य व चंद्र ग्रहण के सिद्धान्तों के विषय में तार्किक स्पष्टीकरण दिये थे। उन्होंने बताया था कि ग्रहणों की मुख्य वजह पृथ्वी और चन्द्रमा द्वारा निर्मित परछाई है।

उन्होंने सौर प्रणाली के भूकेंद्रीय मॉडल को प्रस्तुत किया जिसमे उन्होंने बताया कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केंद्र में है और उन्होंने गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा की नींव भी रखी थी। उन्होंने अपने आर्यभटीय सिघ्रोका में, जो पंचांग ( हिन्दू कैलेंडर ) बनाने में प्रयोग किया जाता था, खगोलीय गणनाओ के तरीको को प्रतिपादित किया था। जो सिद्धान्त कोपर्निकस और गैलीलियो ने प्रतिपादित किये थे उनका सुझाव आर्यभट्ट ने 1500 वर्षो पूर्व ही दे दिया था।

गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट के योगदान अद्वितीय है। उन्होंने त्रिकोण और वृत्त के क्षेत्रफलों को निकलने के लिए सूत्र का सुझाव दिया था जो सही साबित हुए। गुप्ता शासक, बुद्धगुप्त, ने उन्हें उनके असाधारण कार्यों के लिए विश्वविद्यालय का प्रमुख नियुक्त किया था। उन्होंने पाई की अपरिमित मान दिया। उन्होंने पाई का मान जो 62832/20000 = 3.1416 के बराबर था, निकाला जो बिल्कुल सन्निकट था।

वो पहले गणितिज्ञ थे जिन्होंने “ज्या ( sine) तालिका” दी, जो तुकांत वाले एक छंद के रूप में थी जहाँ प्रत्येक इकाई वृत्तचाप के 225 मिनट्स या 3 डिग्री 45 मिनट्स के अंतराल पर बढ़ती थी। वृद्धि संग्रह को परिभाषित करने के लिए वर्णमाला कोड का प्रयोग किया। अगर हम आर्यभट्ट की तालिका का प्रयोग करें और ज्या 30 (Sine 30, हस्झ के अनुरूप ) के मान की गणना करें, जोकि 1719/3438 = 0.5 है , एकदम सही निकलती है। उनके वर्णमाला कोड को सामान्यतः आर्यभट्ट सिफर के रूप में जाना जाता है

संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

खुशहाली और समृद्धि के पर्व बैसाखी पर आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं और बधाइयां.

(((( भक्त किरात और नंदी वैश्य ))))
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प्राचीन समय में काशी के समीप एक नगरी थी जो जंगलों से घिरी हुई थी । इसी नगरी में नंदी नाम के एक धनिक वैश्य रहते थे । वे धर्म-कर्म में विश्वास करते थे और श्रद्धा भक्ति भाव से भगवान का चिंतन करते थे ।
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उनका नियम था कि वे जंगल के मंदिर में प्रतिदिन पूजा करने जाते थे । दान करते गरीबों की सहायता करते ।
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एक दिन की बात है । एक शिकारी उस मंदिर के समीप से गुजर रहा था । दोपहर की धूप तन जला रही थी । मंदिर के प्रांगण में छायादार वृक्ष और स्वच्छ सरोवर देखकर वह वहीं ठहर गया तभी उसकी दृष्टि भगवान की मूर्ति पर पड़ी तो एकटक वह उस दिव्य स्वरूप में खो गया ।
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जाने कहां से उसके अंतर्मन में प्रेरणा हुई कि वह भगवान की पूजा करे । वह उठा और वहीं एक बिल्वपत्र पड़ा था उठा लिया और अंदर पहुंचा । बिल्वपत्र को वहीं रखकर वह सरोवर में से अंजली भर पानी लाया । पानी से स्नान कराकर उसने बिल्वपत्र चढ़ा दिया फिर अपनी बुद्धि के अनुसार अपनी हथेली दांतों से काटकर रक्त चढ़ा दिया ।
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पूजा से निवृत्त होकर वह पेड़ के नीचे लेटा तो उसे भूख-प्यास नहीं लग रही थी जबकि वह सुबह का भूखा था । इसे भगवान का ही चमत्कार समझकर उसने रोज वहां आकर पूजा करने का निश्चय किया ।
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दूसरे दिन प्रात: काल नंदी वैश्य पूजा करने आए । मंदिर में सड़ा हुआ बिल्वपत्र और खून के छींटे देखकर वह अवाक रह गए । ”यह अमंगलकारी कार्य किसने किया । ऐसा भ्रष्ट विघ्न पहले तो कभी नहीं हुआ । अवश्य मेरी पूजा में कोई त्रुटि रह गई है ।” ऐसा सोचकर उन्होंने मंदिर को धो-पोंछकर स्वच्छ किया और अपनी पूजा की ।
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तत्पश्चात घर लौटकर अपने पुरोहित को यह सब बताया। ”अवश्य कोई दुष्ट जगंली होगा । कल मैं स्वंय चलूगा और उसे डांटूगा कि ऐसा अनर्थ करने से महादेव रुष्ट हो जाएंगे ।” पुरोहित ने कहा । अगले दिन दोनों पूजा सामग्री लेकर मंदिर पहुंचे ।
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वहां कल जैसी ही स्थिति आज भी थी । नन्दी वैश्य और पुरोहित ने मंदिर को फिर साफ किया और शिव के महामंत्र का जाप किया । वेदमंत्रों की धुन से आस- पास का वातावरण गूंज उठा परतु दोनों की दृष्टि मंदिर आने वाले मार्ग पर लगी थी । और शिकारी दोपहर के समय आ गया । शिकारी की भयंकर आकृति देखकर दोनों भयभीत हो गए ।
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ऐसे खूँखार मानव से जो राक्षस सदृश्य लग रहा था डर जाना स्वाभाविक था। दोनों ही भगवान रुद्र की विशाल मूर्ति के पीछे जा छिपे । और उनकी आँखों के समक्ष ही उस जगंली ने उनकी पूजा नष्ट-भ्रष्ट कर दी ।
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अपनी पूजा शुरू की। जल से स्नान कराया और बिल्वपत्र चढ़ाकर अपनी घायल हथेली में पुन: चाकू मारा तो रक्त के साथ मांस भी निकल पड़ा। दोनों चीजें पूर्ण भाव से प्रभु को अर्पित कर दीं फिर साष्टांग दंडवत करके चला गया ।
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”महाराज ! यह तो कोई राक्षस है ।” नंदी वैश्य बोले : ”इसे तो किसी ज्ञान प्रलोभन या भय से नहीं रोका जा सकता | ऐसी चेष्टा भी करते हैं तो यह निर्दयी जीवित न छोड़ेगा ।”
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”सत्य कह रहे हैं आप ! यह मूर्ख है ।” ”तो क्या करें ? भगवान को यूं ही अपवित्र होने के लिए छोड़ दें ?” ”नहीं । इस समस्या का एक ही उपचार है । मूर्ति को यहां से ले चलो और अपने घर में स्थापित करो ।” दोनों ने यही निर्णय किया और घर लौट आए ।
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नंदी वैश्य ने आधा दर्जन मजदूर लिए और बैलगाड़ी में बैठकर मंदिर जा पहुंचा । ”एक दुष्ट जगंली मंदिर को अपवित्र करता है । समझाने पर भी नहीं मानता इसलिए मूर्ति को घर ले चलो ।” नंदी ने अपने मजदूरों से कहा । .
तत्काल मूर्ति को उखाड़ लिया गया और बैलगाड़ी में लादकर नगर में लाया गया । नंदी वैश्य ने पूर्ण विधि-विधान से मूर्ति को वेद मंत्रोच्चार के साथ अपने घर में स्थापित किया । रात-भर मूर्ति के समक्ष भजन-कीर्तन होता रहा ।
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दूसरे दिन शिकारी (किरात) अपने निर्धारित समय पर पूजा करने पहुंचा तो मूर्ति को वहा न देखकर सन्न रह गया । ”ऐं ! भगवान कहाँ गए ? लगता है कि कहीं छुप गए।” शिकारी ने मंदिर का कोना-कोना छान मारा ।
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भगवान वहां कहीं भी न थे । वह वहीं बैठकर जोर-जोर से रोने लगा । ”हे शम्भो !” वह भाव-विह्वल होकर रोने लगा: ”मुझे क्यों त्याग दिया भगवन् ! मुझसे क्या भूल हो गई जो आप इस तरह मुझे छोड़कर चले गए ?
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मैंने तो कोई अपराध नहीं किया । यदि भूलवश कोई अपराध हो भी गया है तो मुझे क्षमा कर दो प्रभु ! मैं आपकी पूजा के लिए व्याकुल हूँ ।” भगवान वहां होते तब तो उत्तर देते ?
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शिकारी ने उस मूर्तिस्थल को ही भगवान की संज्ञा दी और अपनी पूजा प्रारम्भ कर दी । ”हे जगन्नाथ ! बिना आराध्य के कैसी पूजा ? परंतु मैं विवश हूं । मेरा आवेग नहीं रुकता । मेरी यह पूजा स्वीकार करो और तत्पश्चात मैं अपने प्राण त्याग दूंगा क्योंकि बिना स्वामी के दास कैसे जीवित रह सकता है?
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उसने बिल्वपत्र और जल चढ़ाकर अपने हाथ से मांस काटकर रक्त सहित उसी स्थान पर समर्पित कर दिया जहा पहले मूर्ति थी । फिर सरोवर में स्नान करके अखंड ध्यान में बैठ गया ।
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उसके हृदय में कोई कामना नहीं रही थी । दिन-प्रतिदिन उसका ध्यान सघन हो रहा था । उसके हृदय में ‘ॐ-ॐ’ की धुन प्रतिध्वनित हो रही थी ।
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किरात की कठिन साधना स्वास से विरत होकर प्राण में पहुंच गई थी । कैलाश वासी महादेव अपनी समाधि में लीन थे । जब भक्त की प्राणयुक्त पुकार उनके मर्म से टकराई तो भगवान भोलेनाथ ने समाधि छोड़ दी और दिव्य दृष्टि से चंहु ओर देखा ।
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किरात को निष्काम भक्ति करते देखा तो दौड़े उसके समक्ष पहुंचे । ”वत्स ! आखें खोलो । मैं तुम्हारे समक्ष हूं । तुम्हारे कठिन तप और भक्ति भाव से मैं अति प्रसन्न हूं । तुम अपनी अभिलाषा व्यक्त करो ।” भगवान रुद्र ने प्रेम पूर्वक कहा ।
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किरात ने आखें खोलीं तो समक्ष अपने आराध्य की देखा । ”भगवान !” वह विह्वल होकर उनके चरणो से लिपट गया: ”आपने दर्शन देकर मुझे कृतार्थ किया । मैं सिर्फ इतनी अभिलाषा रखता हूँ कि मैं सदैव आपके ध्यान-भक्ति और सेवा में निरत रहूं ।”
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”तथास्तु ! आज से तुम मेरे पार्षद हुए । मैं तुम्हें अपनी सेवा में लेता हूं ।” किरात प्रसन्नता से नाच उठा । उसकी यह दशा देखकर भोले भंडारी भी डमरू बजाने लगे और सुंदर नृत्य कर उठे ।
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उनका डमरू बजा तो देवी-देवताओं ने भी अन्य वाद्ययंत्रों से उस आनन्दपूर्ण स्थिति का आनंद बढ़ा दिया । तीनों लोकों में ‘ओम-ओम’ की प्रतिध्वनि हो रही थी । शंख मृदंग ढोलक इत्यादि की सुरीली लय से सर्वत्र आनंद उमड़ उठा । शिव भक्तों में तो जैसे आनंद की बाढ़ आ गई । चंहु ओर ‘बम भोले’ गुंजायमान हो रहा था ।
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नंदी वैश्य भी अपने घर में बैठे थे । जब उन्होंने सुना कि जंगल वाले मंदिर पर स्वयं देवाधिदेव डमरू बजाकर नृत्य कर रहे हैं तो वह नंगे पांवों ही दौड़ते चले गए ।
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मंदिर पर अपार भीड़ एकत्र थी । कितना विहंगम दृश्य था ! नंदी वैश्य ने किरात को भगवान् शंकर के साथ नृत्य करते देखा तो उन्हें आश्चर्य के साथ किरात के प्रति अपने पूर्व विचारों पर क्षोभ हुआ ।
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”मैं कितना अधम हूं, जो भगवान के प्यारे भक्त को अपशब्द कहता था । मैंने ही उसे उसके आराध्य की पूजा न करने देने का निष्फल प्रयास किया ।”
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नंदी वैश्य दौड़कर किरात के चरणों से लिपट गए । ”हे महात्मन ! मेरा अपराध क्षमा करो । मैंने ही भगवान की मूर्ति ले जाने का अपराध किया । मैं अधम हूं । मुझे क्षमा करो ।”
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”उठो मेरे प्रेरक !” किरात ने नंदी को उठाया: ”तुम्हारी ही कृपा से तो मुझ जैसे अबुद्धि को भगवान के साक्षात दर्शन हुए । मैं तुम्हारा ऋणी हूं ।”
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”तुम महान हो भक्त ! तुम्हारी भक्ति श्रेष्ठ है । अब तुम ही मेरा उद्धार कर सकते हो । मैं तुम्हारी शरण में हूं ।”
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किरात ने उन्हें भोलेनाथ के समक्ष प्रस्तुत किया । ”हे महाकाल !”
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भोलेनाथ ने कहा : ”यह कौन है ! मैं इसे नहीं पहचानता ।”
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”नाथ ! यह आपके परमभक्त हैं । प्रति दिन आपकी पूजा करते हैं ।”
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”मुझे स्मरण नहीं । मुझे तो केवल तुम ही याद ही । तुम ही मेरे प्रेमी हो । मैं तो उनका मित्र हूं जो निष्काम हृदय से मेरा सुमिरन करते है ।”
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”हे जगतपिता ! मैं आपका भक्त हूं और आप मेरे गुरु हैं मित्र हैं । आपने मुझे स्वीकार किया। इन्हें भी स्वीकार कीजिए ।”
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भक्त की इच्छा भगवान पूर्ण न करें ? भक्त किरात ने नंदी को स्वीकार किया तो भगवान जगन्नाथ कैसे अस्वीकार करते ?
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”तथास्तु !” महादेव ने कहा । नंदी वैश्य प्रसन्नता से प्रभु के चरणों में गिर गए । यही किरात और नंदी वैश्य भगवान के गण नंदी और महाकाल के नाम से प्रसिद्ध हुए

संजय गुप्ता

Posted in संस्कृत साहित्य

ब्राह्मण क्यों देवता ?

नोट–कुछ आदरणीय मित्रगण कभी -कभी मजाक में या
कभी जिज्ञासा में,
कभी गंभीरता से
एक प्रश्न करते है कि

ब्राम्हण को इतना सम्मान क्यों दिया जाय या दिया जाता है ?

        _इस तरह के बहुत सारे प्रश्न

समाज के नई पिढियो के लोगो कि भी जिज्ञासा का केंद्र बना हुवा है ।_

तो आइये
देखते है हमारे
धर्मशास्त्र क्या कहते है इस विषय में–

            शास्त्रीय मत

पृथिव्यां यानी तीर्थानि तानी तीर्थानि सागरे ।
सागरे सर्वतीर्थानि पादे विप्रस्य दक्षिणे ।।
चैत्रमाहात्मये तीर्थानि दक्षिणे पादे वेदास्तन्मुखमाश्रिताः ।
सर्वांगेष्वाश्रिता देवाः पूजितास्ते तदर्चया ।।
अव्यक्त रूपिणो विष्णोः स्वरूपं ब्राह्मणा भुवि ।
नावमान्या नो विरोधा कदाचिच्छुभमिच्छता ।।

•अर्थात पृथ्वी में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी समुद्र में मिलते हैं और समुद्र में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी ब्राह्मण के दक्षिण पैर में है । चार वेद उसके मुख में हैं अंग में सभी देवता आश्रय करके रहते हैं इसवास्ते ब्राह्मण को पूजा करने से सब देवों का पूजा होती है । पृथ्वी में ब्राह्मण जो है विष्णु रूप है इसलिए जिसको कल्याण की इच्छा हो वह ब्राह्मणों का अपमान तथा द्वेष नहीं करना चाहिए ।

•देवाधीनाजगत्सर्वं मन्त्राधीनाश्च देवता: ।
ते मन्त्रा: ब्राह्मणाधीना:तस्माद् ब्राह्मण देवता ।

•अर्थात् सारा संसार देवताओं के अधीन है तथा देवता मन्त्रों के अधीन हैं और मन्त्र ब्राह्मण के अधीन हैं इस कारण ब्राह्मण देवता हैं ।

ऊँ जन्मना ब्राम्हणो, ज्ञेय:संस्कारैर्द्विज उच्चते।
विद्यया याति विप्रत्वं, त्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम्।।

ब्राम्हण के बालक को जन्म से ही ब्राम्हण समझना चाहिए।
संस्कारों से “द्विज” संज्ञा होती है तथा विद्याध्ययन से “विप्र” नाम धारण करता है।

जो वेद,मन्त्र तथा पुराणों से शुद्ध होकर तीर्थस्नानादि के कारण और भी पवित्र हो गया है,वह ब्राम्हण परम पूजनीय माना गया है।

ऊँ पुराणकथको नित्यं, धर्माख्यानस्य सन्तति:।_
अस्यैव दर्शनान्नित्यं ,अश्वमेधादिजं फलम्।।

जिसके हृदय में गुरु,देवता,माता-पिता और अतिथि के प्रति भक्ति है। जो दूसरों को भी भक्तिमार्ग पर अग्रसर करता है,जो सदा पुराणों की कथा करता और धर्म का प्रचार करता है ऐसे ब्राम्हण के दर्शन से ही अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

पितामह भीष्म जी ने पुलस्त्य जी से पूछा–
गुरुवर!मनुष्य को देवत्व, सुख, राज्य, धन, यश, विजय, भोग, आरोग्य, आयु, विद्या, लक्ष्मी, पुत्र, बन्धुवर्ग एवं सब प्रकार के मंगल की प्राप्ति कैसे हो सकती है?
यह बताने की कृपा करें।*

पुलस्त्यजी ने कहा–
राजन!इस पृथ्वी पर ब्राम्हण सदा ही विद्या आदि गुणों से युक्त और श्रीसम्पन्न होता है।
तीनों लोकों और प्रत्येक युग में विप्रदेव नित्य पवित्र माने गये हैं।
ब्राम्हण देवताओं का भी देवता है।
संसार में उसके समान कोई दूसरा नहीं है।
वह साक्षात धर्म की मूर्ति है और सबको मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाला है।

ब्राम्हण सब लोगों का गुरु,पूज्य और तीर्थस्वरुप मनुष्य है।

पूर्वकाल में नारदजी ने ब्रम्हाजी से पूछा था–
ब्रम्हन्!किसकी पूजा करने पर भगवान लक्ष्मीपति प्रसन्न होते हैं?”

ब्रम्हाजी बोले–जिस पर ब्राम्हण प्रसन्न होते हैं,उसपर भगवान विष्णुजी भी प्रसन्न हो जाते हैं।
अत: ब्राम्हण की सेवा करने वाला मनुष्य निश्चित ही परब्रम्ह परमात्मा को प्राप्त होता है।
ब्राम्हण के शरीर में सदा ही श्रीविष्णु का निवास है।

जो दान,मान और सेवा आदि के द्वारा प्रतिदिन ब्राम्हणों की पूजा करते हैं,उसके द्वारा मानों शास्त्रीय पद्धति से उत्तम दक्षिणा युक्त सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान हो जाता है।

जिसके घरपर आया हुआ ब्राम्हण निराश नही लौटता,उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है।
पवित्र देशकाल में सुपात्र ब्राम्हण को जो धन दान किया जाता है वह अक्षय होता है।
वह जन्म जन्मान्तरों में फल देता है,उनकी पूजा करने वाला कभी दरिद्र, दुखी और रोगी नहीं होता है।जिस घर के आँगन में ब्राम्हणों की चरणधूलि पडने से वह पवित्र होते हैं वह तीर्थों के समान हैं।

ऊँ विप्रपादोदककर्दमानि,
न वेदशास्त्रप्रतिघोषितानि!
स्वाहास्नधास्वस्तिविवर्जितानि,
श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि।।

जहाँ ब्राम्हणों का चरणोदक नहीं गिरता,जहाँ वेद शास्त्र की गर्जना नहीं होती,जहाँ स्वाहा,स्वधा,स्वस्ति और मंगल शब्दों का उच्चारण नहीं होता है। वह चाहे स्वर्ग के समान भवन भी हो तब भी वह श्मशान के समान है।

भीष्मजी!पूर्वकाल में विष्णु भगवान के मुख से ब्राम्हण, बाहुओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई।

पितृयज्ञ(श्राद्ध-तर्पण), विवाह, अग्निहोत्र, शान्तिकर्म और समस्त मांगलिक कार्यों में सदा उत्तम माने गये हैं।

ब्राम्हण के मुख से देवता हव्य और पितर कव्य का उपभोग करते हैं। ब्राम्हण के बिना दान,होम तर्पण आदि सब निष्फल होते हैं।

जहाँ ब्राम्हणों को भोजन नहीं दिया जाता,वहाँ असुर,प्रेत,दैत्य और राक्षस भोजन करते हैं।

ब्राम्हण को देखकर श्रद्धापूर्वक उसको प्रणाम करना चाहिए।

उनके आशीर्वाद से मनुष्य की आयु बढती है,वह चिरंजीवी होता है।ब्राम्हणों को देखकर भी प्रणाम न करने से,उनसे द्वेष रखने से तथा उनके प्रति अश्रद्धा रखने से मनुष्यों की आयु क्षीण होती है,धन ऐश्वर्य का नाश होता है तथा परलोक में भी उसकी दुर्गति होती है।

चौ- पूजिय विप्र सकल गुनहीना।
शूद्र न गुनगन ग्यान प्रवीणा।।

कवच अभेद्य विप्र गुरु पूजा।
एहिसम विजयउपाय न दूजा।।

   ------ रामचरित मानस......

ऊँ नमो ब्रम्हण्यदेवाय,
गोब्राम्हणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय,
गोविन्दाय नमोनमः।।

जगत के पालनहार गौ,ब्राम्हणों के रक्षक भगवान श्रीकृष्ण जी कोटिशःवन्दना करते हैं।

जिनके चरणारविन्दों को परमेश्वर अपने वक्षस्थल पर धारण करते हैं,उन ब्राम्हणों के पावन चरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है।।
ब्राह्मण जप से पैदा हुई शक्ति का नाम है,
ब्राह्मण त्याग से जन्मी भक्ति का धाम है।

ब्राह्मण ज्ञान के दीप जलाने का नाम है,
ब्राह्मण विद्या का प्रकाश फैलाने का काम है।

ब्राह्मण स्वाभिमान से जीने का ढंग है,
ब्राह्मण सृष्टि का अनुपम अमिट अंग है।

ब्राह्मण विकराल हलाहल पीने की कला है,
ब्राह्मण कठिन संघर्षों को जीकर ही पला है।

ब्राह्मण ज्ञान, भक्ति, त्याग, परमार्थ का प्रकाश है,
ब्राह्मण शक्ति, कौशल, पुरुषार्थ का आकाश है।

ब्राह्मण न धर्म, न जाति में बंधा इंसान है,
ब्राह्मण मनुष्य के रूप में साक्षात भगवान है।

ब्राह्मण कंठ में शारदा लिए ज्ञान का संवाहक है,
ब्राह्मण हाथ में शस्त्र लिए आतंक का संहारक है।

ब्राह्मण सिर्फ मंदिर में पूजा करता हुआ पुजारी नहीं है,
ब्राह्मण घर-घर भीख मांगता भिखारी नहीं है।

ब्राह्मण गरीबी में सुदामा-सा सरल है,
ब्राह्मण त्याग में दधीचि-सा विरल है।

ब्राह्मण विषधरों के शहर में शंकर के समान है,
ब्राह्मण के हस्त में शत्रुओं के लिए बेद कीर्तिवान है।

ब्राह्मण सूखते रिश्तों को संवेदनाओं से सजाता है,
ब्राह्मण निषिद्ध गलियों में सहमे सत्य को बचाता है।

ब्राह्मण संकुचित विचारधारों से परे एक. नाम है,
*ब्राह्मण सबके अंत:स्थल में बसा अविरल राम है.🙏🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌞इन्सान की सोच ही जीवन का आधार हैं:-
~~~ו×~~~ו×~~~ו×~~~ו×~~~ו×~~

*तीन राहगीर रास्ते पर एक पेड़ के नीचे मिले..
तीनो लम्बी यात्रा पर निकले थे..
कुछ देर सुस्ताने के लिए पेड़ की घनी छाया में बैठ गए.. तीनो के पास दो झोले थे एक झोला आगे की तरफ और दूसरा पीछे की तरफ लटका हुआ था..

तीनो एक साथ बैठे और यहाँ-वहाँ की बाते करने लगे जैसे कौन कहाँ से आया?
कहाँ जाना हैं?
कितनी दुरी हैं ?
घर में कौन कौन हैं ?
ऐसे कई सवाल जो अजनबी एक दुसरे के बारे में जानना चाहते हैं..

तीनो यात्री कद काठी में सामान थे पर सबके चेहरे के भाव अलग-अलग थे.. …..

एक बहुत थका निराश लग रहा था जैसे सफ़र ने उसे बोझिल बना दिया हो.. …….

दूसरा थका हुआ था पर बोझिल नहीं लग रहा था और तीसरा अत्यन्त आनंद में था.. …. …

एक दूर बैठा महात्मा इन्हें देख मुस्कुरा रहा था..

तभी तीनो की नजर महात्मा पर पड़ी और उनके पास जाकर तीनो ने सवाल किया कि वे मुस्कुरा क्यूँ रहे हैं..

इस सवाल के जवाब में महात्मा ने तीनो से सवाल किया कि तुम्हारे पास दो दो झोले हैं इन में से एक में तुम्हे लोगो की अच्छाई को रखना हैं और एक में बुराई को बताओ क्या करोगे ?

एक ने कहा मेरे आगे वाले झोले में, मैं बुराई रखूँगा ताकि जीवन भर उनसे दूर रहू.. …

और पीछे अच्छाई रखूँगा..

दुसरे ने कहा- मैं आगे अच्छाई रखूँगा ताकि उन जैसा बनू और पीछे बुराई ताकि उनसे अच्छा बनू..

तीसरे ने कहा मैं आगे अच्छाई रखूँगा ताकि उनके साथ संतुष्ट रहूँ और पीछे बुराई रखूँगा और पीछे के थैले में एक छेद कर दूंगा जिससे वो बुराई का बोझ कम होता रहे हैं और अच्छाई ही मेरे साथ रहे अर्थात वो बुराई को भूला देना चाहता था…..

यह सुनकर महात्मा ने कहा –
पहला जो सफ़र से थक कर निराश दिख रहा हैं जिसने कहा कि वो बुराई सामने रखेगा वो इस यात्रा के भांति जीवन से थक गया हैं क्यूंकि उसकी सोच नकारात्मक हैं उसके लिए जीवन कठिन हैं..

दूसरा जो थका हैं पर निराश नहीं, जिसने कहा अच्छाई सामने रखूँगा पर बुराई से बेहतर बनने की कोशिश में वो थक जाता हैं क्यूंकि वो बेवजह की होड़ में हैं..

तीसरा जिसने कहा वो अच्छाई आगे रखता हैं और बुराई को पीछे रख उसे भुला देना चाहता हैं वो संतुष्ट हैं और जीवन का आनंद ले रहा हैं..
इसी तरह वो जीवन यात्रा में खुश हैं..!*
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संजय गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

👉 ‘समय’ और ‘धैर्य’ 👈
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एक साधु था , वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था ,”जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”
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बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नहीँ देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।
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एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसनेँ उस साधु की आवाज सुनी , “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।” ,और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया।
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उसने साधु से पूछा -”महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैँ जो चाहता हूँ ?”
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साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम.जो कुछ भी चाहता है मैँ उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या ?”
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युवक बोला-” मेरी एक ही ख्वाहिश है मैँ हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। “
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साधू बोला ,” कोई बात नहीँ मैँ तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे !”

और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा , “ पुत्र , मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं,
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लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो “
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युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली , पकड़ते हुए बोला , ” पुत्र , इसे पकड़ो , यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है , लोग इसे “धैर्य ” कहते हैं ,
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जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना , याद रखना जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है। “
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युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा ।
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और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।
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मित्रो , ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।
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अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।👌
.संजय गुप्ता