Posted in मंत्र और स्तोत्र

हनुमान चालिसा के दो श्लोक श्री हरि रामस्वरुप के भक्तो के मार्गदर्शन की दृष्टि से बहुमूल्य है।


हनुमान चालिसा के दो श्लोक श्री हरि रामस्वरुप के भक्तो के मार्गदर्शन की दृष्टि से बहुमूल्य है।

राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
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हिंदी अर्थ- श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले है, जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता
अर्थात् आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।

तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
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हिंदी अर्थ- आपका भजन करने से श्री राम जी प्राप्त होते है और जन्म जन्मांतर के दुख दूर होते है।

और ये समूह श्री हरि का समूह है तो उनके परम भक्त हनुमानजी के बिना अधूरा है।

🙏आज तो उनका अवतरण दिवस भी है।तो समूह के सभी आदरणीय वरिष्ठ जनो और प्रिय अनुजो को #हनुमान #जी #के #अवतरण #दिवस #की #शुभकामनाएँ🙏

🌸श्रीकृष्ण और हनुमान जी : (द्वापरयुग)🌸

एक बार सुदर्शन चक्र को स्वयं की शक्ति पर अभिमान हो गया था और भगवान श्री कृष्ण ने उनके अभिमान को दूर करने के लिए श्री हनुमान जी की सहायता ली थी। सुदर्शन चक्र को यह अभिमान हो गया था कि उसने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय किया था। वह लोकालोक के अंधकार को दूर कर सकता है। भगवान श्री कृष्ण अतंत उसकी ही सहायता लेते हैं।✳️

भगवान अपने भक्तों का सदा कल्याण करते हैं इसलिए उन्होंने हनुमान जी का स्मरण किया तत्काल हनुमान जी द्वारिका आ गए। जान गए कि श्री कृष्ण ने क्यों बुलाया है। श्री कृष्ण और श्री राम दोनों एक ही हैं, वह यह भी जानते थे इसलिए सीधे राजदरबार नहीं गए कुछ कौतुक करने के लिए उद्यान में चले गए। वृक्षों पर लगे फल तोड़ने लगे, कुछ खाए, कुछ फेंक दिए, वृक्षों को उखाड़ फेंका, कुछ को तोड़ डाला तथा वाटिका को वीरान बना दिया। फल तोड़ना और फेंक देना, हनुमान जी का मकसद नहीं था, वह तो श्री कृष्ण के संकेत से कौतुक कर रहे थे। बात श्री कृष्ण तक पहुंची, किसी वानर ने राजोद्यान को उजाड़ दिया है। ✳️

श्री कृष्ण ने सेनाध्यक्ष को बुलाया। “कहा, आप सेना के साथ जाएं तथा उस वानर को पकड़कर लाएं।”

श्री कृष्ण मन ही मन मुस्करा रहे थे। सेनाध्यक्ष सेना सहित तत्काल वाटिका पहुंचे तथा उन्होंने हनुमान जी को ललकार कर कहा, “बाग क्यों उजाड़ रहे हो? फल क्यों तोड़ रहे हो? चलो, तुम्हें श्री कृष्ण बुला रहे हैं।”

हनुमान जी ने सेनाध्यक्ष से कहां, “मैं किसी कृष्ण को नहीं जानता। मैं तो श्री राम का सेवक हूं। जाओ, कह दो, मैं नहीं आऊंगा।”

सेनाध्यक्ष क्रोधित होकर बोले, “तुम नहीं चलोगे तो मैं तुम्हें पकड़कर ले जाऊंगा।”

हनुमानजी ने सेनाध्यक्ष को पूंछ में दबोच कर दूर राजमहल की तरफ फैंक दिया। सेनाध्यक्ष ने दरबार में पहुंचकर भगवान को बताया, “वह कोई साधारण वानर नहीं है। मैं उसे पकड़कर नहीं ला सकता।”

श्री कृष्ण ने हनुमान जी को कहलवा भेजा की आपको श्री राम बुला रहे हैं तथा सुदर्शन चक्र को आदेश दिया,” हे सुदर्शन जी! द्वार पर रहना।”

कोई बिना आज्ञा अंदर न आने पाए तथा अगर कोई बिना आज्ञा के अंदर आने का प्रयास करें तो आप उनका वध कर दें। श्री कृष्ण समझते थे कि श्री राम का संदेश सुनकर तो हनुमान जी एक पल भी रुक नहीं सकते। दरबार के द्वार पर सुदर्शन ने उन्हें रोक कर कहा, “बिना आज्ञा अंदर जाने की मनाही है।”

जब श्री राम बुला रहे हों तो हनुमान जी विलंब सहन नहीं कर सकते। हनुमान जी ने सुदर्शन को पकड़ा और ईलायची की भांति दाड़़ में दबाकर मुंह में रख लिया। भगवान राम के स्वरुप में श्री कृष्ण जी सिंहासन पर बैठ गए। सिंहासन पर बैठे श्री राम को देखकर हनुमान जी श्री कृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। श्री कृष्ण ने हनुमान जी को गले लगा लिया। श्री कृष्ण ने हनुमान जी से पूछा, “हनुमान! तुम अंदर कैसे आ गए? किसी ने रोका नहीं?”

हनुमानजी से उत्तर दिया “रोका था भगवन, सुदर्शन ने, मैंने सोचा आपके दर्शनों में विलंब होगा, इसलिए उनसे उलझा नहीं, उसे मैंने अपने मुंह में दबा लिया।”

यह कहकर हनुमान जी ने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के चरणों में डाल दिया। सुदर्शन चक्र का घमंड चूर हो चुका था। श्री कृष्ण यही चाहते थे। श्री कृष्ण ने हनुमान जी को हृदय से लगा लिया, हृदय से हृदय की बात हुई और श्री कृष्ण ने हनुमान जी को विदा कर दिया।

परमात्मा अपने भक्तों में अपने निकटस्थों में अभिमान रहने नहीं देते। अगर श्री कृष्ण ने हनुमान जी की साहयता से सुदर्शन चक्र का घमंड दूर न करते तो सुदर्शन जी परमात्मा के निकट रह नहीं सकते थे। परमात्मा के निकट रह ही वह सकता है जो ”मैं” से रहित होकर “न मैं” जान लेता है अर्थात “नमः” को जान जाता है। नमः का अर्थ ही है की मैं कुछ नही हूं वरण परमेश्वर ही सर्वत्र है तथा उन्हीं परमेश्वर को मैं बारंबार नमन करते हूं। अतः भक्ति मार्ग का पहला कदम है अहम और अभिमान रहित जीवन।

🙏जय जय हनुमान….जय जय श्री राम🙏

 

श्रीमद् भगवद्गीता चिंतन

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